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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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7/23/07

बिना परहित के प्रशंसा नहीं मिलती

आत्म प्रवंचना मनुष्य का स्वाभाविक दोष है जो उसकी मानसिक कुंठाओं, असफलताओं और निराशाओं से प्रकट होता है। यह मनुष्य की प्रवृति है कि वह चाहता है कि लोग उसकी और उसके कर्मों की प्रशंसा करे। इसलिये वह कुछ काम ऐसे चालाकी से करता है कि उसमें स्वार्थ तो उसका सिद्ध हो पर वह दूसरों के लिए हितकर लगे। उसके मन में परमार्थ का भाव बिल्कुल नहीं होता पर वह चाहता है कि उसकी छबि लोगों में एक परमार्थी की बने। यह संभव नहीं हो पाता। क्योंकि सभी लोग तो ऎसी ही चालाकी कर रहे हैं और इस कारण सब एक दुसरे की पोल जानते हैं और कोई एक दुसरे की प्रशंसा तब तक नहीं करता जब तक उससे स्वार्थ सिद्ध न हो और करते हैं भी हैं तो वह झूठी प्रशंसा। समाज में वास्तविक प्रशंसा उसी को मिलती है जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का वाकई कोई ऐसा काम करता है जिससे उसको लाभ होता है या प्रतिष्ठा बढती है तो उसे सच्ची प्रशंसा मिलती है। सबके लिए यह संभव नही है और सब करते भी कुछ नहीं पर लोगों कि मुख से प्रश्नासा सभी चाहते हैं और नहीं मिल पाती तो वह अपने मुहँ से अपनी प्रशंसा कर लोगों को बोर करते हैं।


जब लोग अपने मुहँ मियाँ मिट्ठू बनते हैं तो कोई सामने कहता कुछ भले ही न हो पर मन में या पीठ पीछे उससे अपने बोरियत का अहसास अवश्य व्यक्त करते हैं। अपने सामान्य दायित्व पूरा कर भी लोग समाज से प्रशंसा चाहते हैं। दुसरे के लिए करने का भाव विरलों में ही होता है पर दुसरे के श्रीमुख से प्रशंसा सुनने का लोभ पूरा न होते देख आत्मप्रवंचना में जूट रहते हैं, भला क्या यह संभव है। आप अपने घर के लिए शक्कर लाए और पडौसी उसकी मिठास को अनुभव करे। आप गाडी खरीद कर चलाये और उसका आनन्द दूसरा अनुभव करे। आप अपने कार्यालय में अपना नियमित दायित्व पूरा करें और आपके अधिकारी और सहकर्मी उसकी प्रशंसा करें।


ऎसी बातें संभव नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि आप अनचाहे ही सही थोडा बहुत ही सही परहित का कार्य अवश्य करें और खाली-पीली आत्म-प्रवंचना करेंगे तो मजाक का पात्र बनेंगे ही। प्रशंसा तभी मिल सकती है जब आप अपने कार्य से दुसरे का हित सिद्ध करें ।

7/22/07

प्रतिमाओं के आंसू निकलना और हैरी पॉटर का जिंदा रहना

हनुमान जी की मूर्ती से आंसू या पानी निकलने और हैरी पॉटर के जिन्दा रहने की ख़बर के बीच आख़िर क्या सामंजस्य हो सकता है ?

हेरी पॉटर सीरीज की सातवीं एवं अंतिम किश्त में उसे जिन्दा रखा गया है और इससे उसके चहेतों में ख़ुशी हुई और ब्रिटेन और अमेरिका के साथ भारत एवं चीन में भी किताब की दुकानों के सामने भी जश्न का माहौल रहा। दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में कई बच्चे रातभर जागें और सुबह चार बजे ही किताब खरीदने दुकानों पर पहुंच गये। मुझे इन सब बातों से बहुत आश्चर्य हुआ है।

इधर कहीं हनुमान जीं की मूर्ती से आंसू या पानी बहने की ख़बर पर मंदिर में लोगों की भीड़ जमा हो गयी। लोग इसे चमत्कार बता रहे थे। ऐसा पहले भी हो चुका है जब गणेश जी कि प्रतिमा के दूध पीने का चमत्कार हुआ था। लोगों के झुंड के झुंड उन्हें दूध पिलाने के लिए चले जा रहे थे- तमाशा देखने वालों में हम भी थे- और यह हमारा दुर्भाग्य था कि जब हम पहुंचे तब तक चमत्कार बंद हो चुका था।

हमारे लिए दोनों घटनाओं में समानता आदमी के मन को लेकर है जो देह का संचालन करता है। अगर प्रतिमा की आंख से आंसू निकलना या उसका दूध पीना अंधविश्वास है तो हैरी पॉटर पश्चिम से आयातित एक बहुत बड़ा भ्रमजाल और मनोरंजक दोनों ही हैं। बस अन्तर है समाचार माध्यमों द्वारा उसके प्रस्तुतिकरण को लेकर है। हैरी पॉटर से व्यावसायिकता जुडी हुई है तो विश्लेषक उसे अपनी मजबूरियों के चलते दिलचस्प बताते हैं और प्रतिमाओं के साथ कोई विज्ञापन नहीं आता उसे अंधविश्वास बताते हैं। पश्चिम वाले भारत को अंधविश्वासों का देश कहते हैं और मैं उनकी बात मान भी लेता हूँ पर हैरी पॉटर के व्यवसाय में जो उन्होने करतब दिखाए हैं उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि पश्चिम वाले भ्रमजाल में जीते हैं और जेम्स बांड और हेरी पॉटर जैसे कल्पित पात्रो की सहारे अपने लोगों के मन पर नियन्त्रण रखते हैं- फिर हमारे बाबा लोग अगर प्रतिमाओं को दूध पिलाकर लोगों का मन खुश कर देते हैं तो उसमें बुराई क्या है?

उनके भ्रमजाल से तो अपने देश का अंधविश्वास ही ठीक है-हालांकि यहाँ के लोग अंधविश्वासी हैं यह मैं नहीं मानता। कई लोग तो केवल मनोरंजन और प्रयोग के लिए इसमें शामिल हो जाते हैं अन्दर से जानते हैं कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है। खबर आती है लोग पहुंच जाते हैं फिर अपने घर चले जाते हैं और भूल भी जाते हैं क्या हुआ था। वापस लोटकर ईश्वर में अपने विश्वास और आस्था के साथ अपने काम में लग जाते हैं पर दुनिया के लोग कहते हैं कि यह देश अंधविश्वास का देश है तो कहते रहें । इस देश के समाचार माध्यम ऎसी खबरों को अंधविश्वास साबित करने के लिए विशेषज्ञ बुला लेते हैं और फिर टिप्पणियों का दौर। इसे सीधे अंधविश्वास करार देने के लिए तमाम तरह के वैज्ञानिक तर्क किये जाते हैं ।

मगर जनाब! यह हेरी पॉटर कौन है? जिसके मरने को लेकर लोग चिंतित थे और उसके जिन्दा रहने पर जश्न मना रहे हैं? कोई पता ठिकाना है ? कमाल है कि कोई भी नही लिख रहा कि यह भ्रमजाल है। वाह री व्यवसायिकता! बड़ी दिलचस्पी से आकर्षक शब्द और चित्रो के साथ इसे इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे कोई इसमें वास्तविकता हो। और कौन लोग हैं ऐसा करने वाले? जो प्रतिमाओं के दूध पीने या आंसू निकलने पर अंधविश्वास का शोर मचाते हैं । मगर जनाब ! एक कल्पित पात्र के लिए लोगों के मन में झूठे जज्बात पैदा करना एक भ्रमजाल रचना नहीं तो और क्या है?

आप यह कतई नहीं समझें कि मैं हेरी पॉटर की किताब पढने का विरोध कर रहा हूँ। अगर आपको किताब पढ़ना है और मिल जाती है तो बडे चाव से पढो। मैं तो इससे भी आगे बढकर इसके लेखक की भी प्रशंसा करूंगा कि आज के इस इलेक्ट्रोनिक युग में किताबों के प्रति लोगों का रुझान पढने के लिए बनाए रख सके। मैं तो उस भ्रमजाल के बात कर रहा हूँ जो व्यवसाय में रचे जाते हैं । मैं जेम्स हेडली की किताबें ख़ूब पढता था और वह इस तरह बाजार में पेश की जाती थी जैसे एकदम नईं हौं। एक बार मैंने उनके बारे में एक जगह पढा तो पता चला कि उनका तो मेरे पढ़ना शुरू करने से पहले ही देहावसान हो चूका था। कुछ लोग तो कहते हैं इस नाम का कोई लेखक ही नहीं था। सत्य क्या है मैं आज तक नहीं जानता। उनकी किताबें पढने में मेरी रूचि थी उनमें नहीं ।

पढना अच्छी बात है फिर इस तरह के भ्रमजाल में लोगों को डालना अजीब सा लगता है। अगर यह ठीक है तो फिर वह भी ठीक है। प्रतिमाओं में आस्था रखने वाले लोग बहुत हैं पर ऐसे अंधविश्वासों में यकीन करने वाले लोगों की संख्या नगण्य है। जितना प्रचार किया जाता है उतना अंधविश्वास मुझे कहीं जमीन पर दिखाई नहीं देता- यह अलग बात है कि किसी के विश्वास को ठेस न लगे इसीलिए कोई किसी को टोकता नहीं है। मैं स्वयं निरंकार ईश्वर का उपासक हूँ पर फिर भी मंदिरों में जाता हूँ क्योंकि वहाँ शांति पूर्ण वातावरण रहता है जहाँ ध्यान लगाने में आसानी होती है। मैं किसी भी प्रकार के अंधविश्वास में यकीन नहीं करता और किताबें भी ख़ूब पढता हूँ और मौका मिला तो हेरी पॉटर भी पढूंगा पर यह भ्रमजाल मुझे अजीब लगता है कि एक कल्पित पात्र के मर जाने पर चिंता और जिन्दा रहने का इस तरह प्रचार किया जाये ।

6/26/07

भयभीत पर उसका भय ही करता है शासन-चिन्तन

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है'भय'! सभी व्यक्ति किसी न किसी से डरते हैं। मनुष्य पर कोई शासन करता है तो उसके अन्दर मौजूद 'भय का भाव'!इसीलिये शासन करने वाले उसे हथियार की तरह उपयोग में लाते हैं।
सब जीवों में बौद्धिक रुप से सबसे शक्तिशाली जीव है और इसीलिये शासक म्रत्युदंड का , सेठ-साहूकार भूख का , और धर्म प्रचारक ईश्वर और नरक का भय दिखाकर पूरे समुदाय पर अपना नियंत्रण रखते हैं। अपमान,मृत्यु, भूख और बीमारी के भय से ग्रसित आदमी अपने उद्धार के लिए कहीं भी अपनी बुद्धि गिरवी रखने को तैयार हो जाता है। इस संसार में मनुष्य ही ऐसा एक जीव है जिसकी देह की मृत्यु के पश्चात कोई जरूरत नहीं रह जाती-पर जीवित रहते उसके देह की बहुत उपयोगिता होती है और उसका उपयोग तभी संभव है जब उसकी बुद्धि पर नियन्त्रण कर लिया जाये इसीलिये चालाक लोग उसकी बुद्धि को गिरवी रखने के लिए तमाम तरह की योजनाओं और उपायों का आविष्कार कर गये हैं जिनका उपयोग आज तक हो रहा है-रुढियों,रीतियों,और मान्यताओं के नाम पर फुसलाने का काम सदियों से चल रहा है।
मनुष्य में बौद्धिक तत्व की प्रधानता के कारण उसमें ज्ञानार्जन के साथ उसका उपयोग करने की असीम क्षमता है।फिर भी इसके साथ उसमें अकेलेपन का भय विद्यमान रहता है और समूह में रहने की प्रवृति के चलते वह एक समूह बनाकर रहना चाहता है। इस तरह अनेक समूह होते हैं आदमी को लगता है कहीं उस पर आक्रमण न हो जाये इसीलिये वह अपने समूह को मजबूत देखना चाहता है। आजकल हम जति, भाषा, धर्म और क्षेत्रों के नाम पर जो समूह बने देखते हैं, वह इसीका परिणाम है। हम इन्हें आजकल समाज भी कहते हैं।
जब समूह बनता है तो फिर उसके लिए नियम और नेतृत्व होना जरूरी है। नियम के अनुसार समूहों को चलाने का दायित्व और अधिकार शीर्ष नेतृत्व को सौंपा जाता है। फिर शुरू होता है नेतृत्व या कहें समूह प्रमुख का खेल। एक बार शासन और सम्मान मिल गया तो फिर उसे बनाए रखने के लिए दांव-पेंच और जोड़-तोड़ के लिए अपनी सारी शारीरिक और बौद्धिक ताकत के उपयोग का प्रयास केवल इसीलिये होता है ताकि लोगों पर उनका प्रभाव निरन्तर बना रहे। उनकी इस सक्रियता को राजनीति भी कह सकते हैं ।
व्यक्ति में बुद्धि है तो सोच होगी और वह तमाम तरह के प्रश्न उठाएगा और जवाब मांगेगा इसीलिये समूह प्रमुख दुसरे समूह के भय को बनाए रखना चाहते हैं , इतना ही नहीं वह उसके अन्दर भी तमाम तरह के तनाव बनाए रहते हैं ताकि समूह या समाज के लोग एक दुसरे से डरें और कभी भी उसके नेतृत्व की क्षमता और योग्यता पर कोई उंगली न उठा सके-अगर कोई एक उठाएँ तो दूसरा उसका विरोध करे ऐसे व्यूह रचना की जाती है। दुसरे समूह प्रमुख से कभी दोस्ती और कभी दुश्मनी का खेल खेलते रहो ताकि लोग अपने समूह प्रमुख पर अपनी दृष्टि लगाए रहें । यह खेल आज का नहीं है सदियों से चल रहा है । संदर्भ, विषय , नाम और व्यवस्थाओं के स्वरूप बदले पर मूल भाव वही रहा कि आदमी की मन में मौजूद भय की भावना से ही उस पर शासन करो।
आदमी के अन्दर एक और भय कि उसके मरने का बाद क्या होगा। उसके लिए एक और ठेकेदार बने जो उसे नरक से बचाकर स्वर्ग का टिकट दिलाने की सौ फ़ीसदी गारंटी देते हैं । इन लोगों का वर्ग इतना अधिक ताकतवर बन गया कि शासक और सेठ-साहूकार वर्ग के लोग तक इनके पास अपनी बुद्धि गिरवी रखें लगे। इसका सीधा अर्थ यही है कि आदमी चाहे अपने जीवन में जो भी हो पर स्वाभाविक कमियाँ सब में एक समान होती हैं-जिससे सामान्य आदमी डरता है खास पर भी वह अपना प्रभाव बनाए रहता है।
इस वर्ग ने बिना अस्त्र-शस्त्र के हर जति, धर्म ,भाषा, प्रदेश, और राष्ट्र पर राज किया और वह भी केवल अपनी बुद्धि से दूसरों में भ्रम पैदा कर- ऎसी अज्ञात शक्ति का भय जो वास्तव में कभी हमारी शत्रु हो ही नहीं सकती। हम सत्कर्म करें , अच्छे बुरे की पहचान समझें, अक्षम को सक्षम बनाएं और अपनी वाणी पर नियन्त्रण करें तो किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है, पर डर है कि लगता है और हम उससे बचने के लिए ऐसे लोगों की शरण में जाते हैं जो डर भगाने का व्यापार करते हैं-और वह इसका ख़ूब लाभ उठाता है ।
सेठ-साहूकार हमेशा लोगों के भूख का भय दिखाकर उन्हें अपने नियंत्रण में रखते हैं। हर आदमी धनिक की खुशामद करता है भले ही कोई तात्कालिक रुप से आर्थिक फायदा हो या न हो, पर यह भय बना रहता है कि कब उनके पास जाकर पैसे मांगने की जरूरत पड़ जाये। धनिकों की जीं हजुरी करने वालों की संख्या उनसे लाभ लेने वालों से कहीं ज्यादा इसीलिये दिखती है क्योंकि अनेक लोग तो केवल भावी लाभ की आशा में उनके साथ लग जाते हैं।
यह भय एक हथियार के रुप में अब ज्यादा ही इस्तेमाल होता है कि लोग अपने मुहँ से ही अपने बाहुबल और ऊंची पहुंच होने के दावे करते मिल जायेंगे ताकि लोग उनसे डरें। अब लोगों में सीधा, सरल और सात्विक दिखने की बजाय स्वयं को शक्तिशाली दिखने की होड़ लगी रहती, और कुछ तो भयावह दिखने का भी प्रयास करते हैं।
कुल मिलाकर भय वह भाव या हथियार है जो एक चालाक और शक्तिशाली आदमी को दुसरे पर शासन कराने की सुविधा प्रदान करता है। जो भयमुक्त होकर जीते हैं वही असली जीवन जीं पाते हैं। मजे की बात यह है कि हम जिनसे डरते हैं वह भी किसी से डरते हैं तब क्यों न मुक्त भाव से जियें।एक बात याद रहे दुसरे को वही भय दिखाते हैं जो स्वयं अन्दर से डरे रहते हैं। अपने इष्ट का नित -प्रतिदिन स्मरण, ध्यान और योग के द्वारा हम अपने भय पर काबू पा सकते हैं।( इस विषय पर शेष चर्चा अगले अंक में )

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