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8/23/09

आज गणेश चतुर्थी है-आलेख (today ganesh chaturthi-hindi article

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भगवान शिव को सत्य का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय अध्यात्म में अनेक प्रकार के भगवत् स्वरूपों की चर्चा आती है पर उनमें शायद ही कोई अन्य स्वरूप हो जिसके पूरे परिवार के समस्त सदस्य ही जनमानस द्वारा सहज रूप से भगवत्रूप मान लिये जाते हैं। भगवान शिव और पार्वती के साथ उनके पुत्र श्री कार्तिकेयन और श्री गणेश दोनों ही भगवतस्वरूप भारतीय जनमानस के हृदय में विद्यमान हैं। कार्तिकेयन को देवताओं का सेनापति माना जाता है और यही देवता इस प्रथ्वी का भरण भोषण करते हैं।
भगवान श्रीगणेश जी एक लीला की बहुत चर्चा होती है। वह यह है कि एक बार देवताओं में यह होड़ लगी कि उनमें कौन श्रेष्ठ है। तब यह तय हुआ कि जो प्रथ्वी का चक्कर पहले लगा लेगा उसे ही श्रेष्ठ माना जायेगा। दावेदारों में श्रीगणेश जी ने भी अपना नाम लिखाया। बाकी सभी देवता तो चक्कर लगाने चले गये पर महाराज गणेश जी वहीं जमे रहे। इधर उनके समर्थक इस बात को लेकर चिंतित थे कि श्री गणेश जी एक तो वैसे ही भारी है तिस पर बड़े आराम से अपने माता पिता के पास ही बैठकर आराम फरमा रहे हैं। ऐसे में यह जीतेंगे कैसे? आखिर जब बहुत देर हो गयी तो श्रीगणेश जी उठे और अपने माता पिता की प्रदक्षिणा कर फिर वही बैठ गये और कहा कि मैने तो पूरी सृष्टि का चक्क्र लगा लिया।
वह विजेता घोषित किये गये। यही कारण है कि कहीं भी पूजा करने से पहले भगवान श्रीगणेशजी की स्तुति गायी जाती है। मगर उपरोक्त कथा ही परिचय के रूप में पर्याप्त नहीं है। माता पिता की प्रदक्षिणा करने से अधिक महत्व का कार्य तो उन्होंने भगवान श्री वेदव्यास का महाभारत जैसा महाग्रंथ स्वयं लिख कर पूरा किया। सच बात तो यह है कि यही महाभारत जैसा महाग्रंथ-जिसमें शामिल श्री मद्भागवत् जैसा वह उपग्रंथ शामिल है जिसमें जीवन और सृष्टि के ऐसे रहस्य शामिल हैं जो आज भी प्रमाणिक माने जाते हैं-भारतीय जनमानस के लिये एक ऐसा ग्रंथ है जो उनके लिये एतिहासिक और अध्यात्मिक धरोहर है।
इस तरह भगवान श्री गणेशजी एक तरह से दिव्य लेखक हैं और उन्होंने अपनी उस महान रचना के लिये कोई पारिश्रमिक नहीं मांगा। महाभारत की रचना लिखवाने के लिये भगवान श्री वेदव्यास ने श्री गणेश की तपस्या की थी। जब वह प्रकट हुए तो वेदव्यास की समक्ष यह शर्त रखी कि ‘वह निरंतर लिखेंगे और अगर श्री वेदव्यास की वाणी कहीं अवरुद्ध हो गयी तो वह उसे बीच में ही छोड़ देंगे।’
इस तरह वह वह अनुपम ग्रंथ पूरा हुआ। सरस्वती देवी बुद्धि की देवी मानी जाती है और अनेक भक्त सदबुद्धि पाने के लिये उनकी आराधना करते हैं पर सच तो यह है कि अच्छी या बुरी बुद्धि के लिये सरस्वती देवी जी का न दायित्व है न दोष। वह तो सभी को बुद्धि प्रदान करने वाली हैं-अच्छी भी और बुरी भी- जिनको इससे वंचित रखती हैं उनका जीना न जीना बराबर हो जाता है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग मनुष्य के रूप में पैदा होते हैं पर उनकी बौद्धिक विकलांगता उनके साथ ही उनके परिवार के लिये भी कष्टदायक होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि सरस्वती देवी तो बुद्धि की देवी हैं। कभी कभी वह देवताओं के कहने पर बुद्धि को दोष पूर्ण भी बना सकती हैं जैसे देवताओं के आग्रह पर कैकयी की दासी मंथरा की बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी ताकि भगवान श्रीराम बनवास जाकर राक्षसों का संहार कर सकें।
इसी बुद्धि को नियंत्रण कर बड़े बड़े काम करने के लिये ही श्रीगणेश जी की उपासना की जाती है। हर अच्छा काम करने से पूर्व इसलिये ही श्रीगणेश जी की स्तुति की जाती है ताकि भक्त की बुद्धि और बल का समन्वय बना रहे। अगर बुद्धि में शुद्धता नहीं है तो कोई शुभ काम पूर्ण हो ही नहीं सकता-इसी कारण श्रीगणेश जी की स्तुति की जाती है।

देश में अनेक भगवत्स्वरूपों के स्मरण करते हुए पर्व मनाये जाते हैं पर इस दौरान केवल शोरशराबा कर भक्ति का दिखावा करना एक तरह से स्वयं को धोखा देना है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में वर्णित सभी भगवत्स्वरूपों में प्रथक प्रथक गुण हैं और शायद इसलिये ही सभी का स्मरण करने की परंपरा प्रारंभ हुई है कि उनके गुणों की चर्चा कर मनुष्य अपने अंदर उनको स्थापित करे पर इसके विपरीत केवल उनका नाम लेकर दिखावा कर स्वयं को भक्त होने का धोखा देते हैं। दरअसल यह अवसर होता है कि सत्संग कर उनके देवस्वरूपों की चर्चा कर उनके गुणों की चर्चा की जाये। इस तरह की चर्चा करने से भी गुणों का समावेश अपने अंदर होता है। बाहर से अंदर गुण ले जाने के लिये तीन प्रक्रियायें हैं, दर्शन(तस्वीर को देखते हुए भगवान के गुणों का स्मरण), अध्ययन और श्रवण। यह तभी संभव है जब ऐसा संकल्प हो।
कुछ लोग कहते हैं हिन्दू धर्म में ढेर सारे भगवान हैं यह गलत है। यह कहने वाले अज्ञानी हैं। सच तो यह है कि ऐसा करने से भक्तों को सत्संग की सुविधा मिल जाती है। सभी भगवत्स्वरूपों में अलग अलग गुण हैं। चूंकि सभी मानव लीला में रूप में प्रकट होते हैं तो उनमें इसलिये उनकी देह सर्वगुण संपन्न नहीं होती। सत्संग में उनके गुणों की चर्चा भी हो तो उनकी लीलाओं में मानवीय चूकों पर भी विचार हो जाता है। चूंकि होते तो सभी भक्त ही हैं और किसी न किसी स्वरूप पर उनका मस्तिष्क स्थिर रहता ही है इसलिये वार्तालाप युद्ध में नहीं बदलता। इसके विपरीत अन्य धर्मों में बस एक ही महापुरुष के नाम पर ही सारा समाज खड़ा है और वहां इसलिये सत्संग नहीं हो पाता क्योंकि उस दौरान किसी प्रकार की कमी की चर्चा अपराध हो जाता है। हमारे समाज में सत्संग की जो परंपरा है वही उसे एक किये रहती है। विभिन्न जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों और समूहों को सत्संग की छत्रछाया में बैठकर आनंद लेते हुए देखा जा सकता है।
इस अवसर पर सभी ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई इस संदेश के साथ कि भगवान श्रीगणेश की ध्यान अवश्य करें। उनके गुणों का स्मरण स्वयं करने के साथ ही अपने परिवार के सदस्यों को भी इसके लिये प्रेरित करें। वर्तमान युग में जो हालत हैं उनको हम नहीं बदल सकते पर उनसे होने वाले तनाव से मुक्ति तभी संभव है जब हमारा बुद्धि पर नियंत्रण हो।
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