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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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4/1/09

हिंदी लेखन और प्रकाशन के बीच है अहंकार की दीवार-आलेख

हिंदी में स्तरीय गद्य रचना करने -नाटक, कहानी, निबंध और हास्य व्यंग्य- वाले लेखकों की कमी की शिकायत अक्सर सुनने में मिलती है। अनेक लोग फिल्मों में कथा, पटकथा और संवादों में दोहराव तथा पत्र पत्रिकाओं में भी स्तरीय साहित्य न पढ़ने की शिकायत करते हैं। कवितायें लिखने वाले बहुत मिल जायेंगे पर गद्य रचना करने वाले बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। अगर मिलते भी हैं तो उनकी रचनाओं को स्तरीय रचनायें मानना कठिन होता है। यही कारण है कि आम पाठक के मन में यह बात घर कर गयी है कि हिंदी में लिखने वाले कम ही हैं। यह बात सच नहीं है बल्कि इसके पीछे जिम्मेदार है हमारे देश के फिल्म, प्रकाशन तथा अन्य व्यवसायिक संस्थाओं का प्रबंधन।

हिंदी में व्यवसायिक रूप से मौलिक तथा स्वतंत्र रचनायें लिखने का मतलब है कि अपने लिये ही लिखना। आज भी शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो हिंदी में गद्य लेखन को व्यवसायिक रूप से अपनाने का विचार करेगा। हां, स्वांत सुखाय कुछ लिख रहे हैं पर एक तो उनकी संख्या सीमित है दूसरा उनको प्रोत्साहन देने वाला कोई नहीं है। बड़ी विचित्र स्थिति है कि देश में अनेक किताबें हिंदी में प्रकाशित होती हैं और उनको पुरस्कार भी मिलते हैं पर आम पाठक की उनमें रुचि नहीं होती। आम पाठक जिस प्रकार की सामाजिक, जासूसी या अन्य सामग्री पढ़ता है उसे साहित्य नहीं माना जाता। इस देश में अनेक फिल्में बनी पर उनकी कहानियां भारतीय साहित्य का हिस्सा नहीं बनी। एक तयशुदा फार्मूले में बनने वाली फिल्मों ने देश में आम आदमी के अंदर डर और खौफ का माहौल ही पैदा किया। कहने वाले तो यही कहते हैं कि फिल्मों ने जिस तरह इस देश की मानसिकता को विकृतियां, कायरता और विलासी भाव का बनाया वह काम तो अंग्रेज भी नहीं कर सके। मगर यह अलग विषय है। हिंदी फिल्मों ने डटकर कमाई की पर इस समाज को कुछ दिया नहीं! हिंदी भाषा को तो कुछ भी नहीं दिया लेखकों को वह क्या देते?
फिल्म वालों के पास भी लेखक हैं पर उनका वहां क्या सम्मान है सभी जानते हैं। एक बात याद रखने वाली बात है कि लेखन ही ऐसा व्यवसाय है जहां व्यक्ति पैसे के साथ सम्मान भी चाहता है। जहां यह सोचकर उसका सम्मान न हो कि वह पैसा ले रहा है वहां लेखक अपनी आत्म अभिव्यक्ति के प्रति अपनी रुचि खोकर दूसरे के निर्देशों के अनुरूप अपनी रचना करता है और इस तरह वह समाज का दर्पण नहीं बल्कि किराये का दर्पण होकर रह जाता है।

समस्या यह नहीं है कि देश में हिंदी गद्य लेखकों की कमी है बल्कि प्रकाशक, फिल्म निर्माता और नाटककार चाहते हैं कि कोई फटेहाल बस्ता टांगे व्यक्ति उनके दरवाजे पर भीख मांगने केे अंदाज में खड़ा हो और उसकी रचना सस्ते मेें खरीद कर वह अपना नाम कर सकें-लेखन से अलग गतिविधियों के लिये प्रसिद्ध व्यक्तियों की रचनायें छापने के लिये हाथ जोड़े खड़े रहते हैं पर किसी आम लेखक को प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचाने का काम कभी नहीं कर पाते। फिल्म बनाने वाले अपने लिये हीरो का अभिनय करने वाला कोई लड़का और प्रकाशक अपनी पुस्तकें बेचने के लिये जुगाउ ढूंढ लेते हैं पर हिंदी का लेखक ढूंढने के लिये वह कोई प्रयास नहीं करते। आप देखिये देश में इतने सारे हिंदी प्रकाशन हैं और साथ में फिल्मों में भी अनेक गीतकार और कहानीकार हैं पर कोई अपने बेटे या बेटी को हिंदी का लेखक नहीं बनाता। स्थिति यह है कि हिंदी फिल्मों में काम करने वाले लेखकों और गीतकारों के बेटे अपने माता पिता के संबंधों का लाभ उठाकर नायक, नायिका,निर्देशक और निर्माता तो बन जाते हैं पर कोई लेखक नहीं बनता। जिस लेखक के सहारे समाज को मार्गदर्शन करने वाली रचनायें बन सकती हैं उसका सम्मान कोई नहीं करना चाहता।

जिनके पास धन बल है वह अपने अहंकार में चूर हैं। लेखक की मांग है पर उसका पेट भरना कोई नहीं चाहता। फिल्मी हीरो हीरोईन बनने के लिये अनेक लड़के घर से भागते हैं पर कोई लेखक होने के लिये घर से नहीं भागता। अगर कोई भूला भटका लेखक फटेहाल बगल में बसता लटकाये प्रकाशकों या फिल्म निर्माताओं के द्वार पर पहुंच भी जाये तो उसके लिये यह संभव नहीं है कि उसकी बात पर गौर किया जाये। फिल्म हो या हिंदी प्रकाशन आज भी इसी इंतजार मेें कि कोई चपले चटकाता हुआ लेखक उनके पास आये पर इस बात को भूल रहे हैं कि अब रोटी कमाना आसान नहीं है और जिनके पास बाप दादों की पूंजी नहीं है ऐसे हिंदी में गद्य या पद्य लिखने वालों के लिये रोटी का लंबे समय तक इंतजार करना संभव नहीं है। इसलिये लेखन से इतर वह अपने व्यवसाय से कमाने के बाद ही लिखते हैं। उनके पास इतना समय नहीं है कि वह प्रकाशकों को या फिल्म निर्माताओं के घर चक्कर लगा सकें। उसी तरह पांच या दस रुपये के टिकट लगाकर पत्र पत्रिकाओं में रचनायें भेजने के लिये भी अब कौन तैयार होगा जबकि उनका जवाब नहीं आता। आज भी यह बेरहम शर्त सभी प्रकाशक लगाये बैठें है कि अगर आप अपनी अस्वीकृत रचनायें वापस चाहते हैं तो साथ में टिकट लगा लिफाफा भेजें। यह प्रकाशन आज भी पुरानी मानसिकता में जी रहे हैं। यही कारण है कि उनके प्रकाशन विज्ञापनों के कारण जीवित हैं न कि पाठकों के कारण।

कुछ पाठक इस लेखक के आलेख पढ़कर अक्सर यह कहते हैं कि आप अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं को क्यों नहीं भेजते। वह अपना जवाब इस आलेख में ढूंढ लें। अंतर्जाल पर हिंदी पाठकों का आवागमन कम है पर आगे बढ़ेगा। आज की नयी पीढ़ी पूरी तरह इंटरनेट की तरफ जा रही है। हिंदी में लेखक कोई पेड़ पर नहीं टंगे जो मिल जायेंगे। इंटरनेट पर ब्लाग पर आगे लोग लिखेंगे-उनमें व्यवसायिक भी होंगे और शौकिया भी। आखिर मौलिक और स्वतंत्र लेखन करना कोई आसान काम नहीं है। अनुवादक ढेर सारे मिल जायेंगे क्योंकि उसमें त्वरित गति से पैसा मिलता है। कवितायें लिखने वाले तो लाखों हैं पर गद्य लेखकों का लगभग टोटा है। इंटरनेट पर लिखते हुए यह लगता है कि भले ही किसी पाठ को प्रकाशित होने वाले दिन दस लोगों ने पढ़ा पर कालांतर में वह लाखों लोग पढ़ेंगे और पढ़ते ही रहेंगे। पत्र पत्रिकाओं में एक दिन में लाखों लोग पढ़ते हैं पर फिर कोई नहीं पढ़ता। कहने वाले कह भी सकते हैं कि ‘इस लेखक के लिये अंगूर खटटे हैं पर सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लिखने से यह विश्वास पैदा हुआ है कि लोगों की उन विषयों में रुचि है जिन पर यह लेखक लिख रहा है।

अभी भी अनेक लोग हिंदी ब्लाग में स्तरीय लेखन न होने की बात करते हैं पर सच बात तो यह है कि यहां ऐसा बहुत पढ़ने और देखने को मिल रहा है जो बाहर नहीं मिल रहा। आगे चलकर बहुत सारे नये और युवा लेखक आयेंगे और फिल्म और प्रकाशन जगत को यहां आकर ही अपने लिये रचनाकार तलाशने होंगे। कोई रचनाकार या लेखक पहले ही दिन व्यवसायिक नहीं हो जाता। हर आदमी पहले स्वांत सुखाय लिखना प्रारंभ करता है और अब जो लोग ऐसा करेंगे वह इंटरनेट पर ही करेंगे। अभी तो हिंदी पर अपनी रोटी सैंकने वाले ब्लाग लेखकों को रिजेक्टेट पीस समझ रहे हैं पर वह यह न भूलें कि ब्लाग जगत के विस्तार के साथ उनके संस्थानों पर भी यही शब्द लागू होेगा। हिंदी लेखक और प्रकाशन के बीच एक अहंकार की दीवार है जिसे गिरना ही होगा। अभी तक प्रकाशन जगत में यह अहंकार है कि वह सवौपरि है और किसी लेखक को आवाज देकर बुलायेगा नहीं तो लेखक भी अब लेखन पर निर्भर नहीं है और उसे अपनी चप्पलें चटकाते हुए घूमने की जरूरत नहीं है। शेष फिर कभी।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

3/14/09

हिंदी दूसरों को कमाकर देती है, पर स्वयं गरीब रहती है-आलेख

अंतर्जाल पर हिंदी में सक्रिय कई ऐसे ब्लाग लेखक हैं जिन्हें लिखते हुए छह साल हो गये हैं। उन लोगों की प्रशंसा करना चाहिये कि उन्होंने अपने प्रयासों से हिंदी ब्लाग जगत को एक दिशा देने के लिये बहुत बड़ा काम किया है। इन ब्लाग लेखकों में कई हिंदी भाषा के विशारद हैं और उनकी विद्वता किसी को भी चिढ़ा सकती है। इसके बावजूद यह भी एक तथ्य है कि उनमें अनेक प्रकार के मतभेद हैं और इसी कारण होता यह है कि आज एक बात कह रहे हैं कल दूसरी बात कहने लगते हैं तब उनसे सीखने वाले ब्लाग लेखकों में मतिभ्रम हो जाता है।

दरअसल समस्या यह नहीं है कि हिंदी में लिखने वाले नहीं है या इच्छुक लोगों की कमी है। कुछ पुराने भावुक ब्लाग लेखक पहले विकिपीडिया और अब नाॅल पर लिखने के लिये अपीलें कर रहे हैं। उनकी अपीलों के कारण कारण कुछ ब्लाग लेखक कभी जिज्ञासावश तो कभी उत्सुकतावश वहां अपनी रचनायें और पाठ डाल देते हैं। इस लेखक ने भी कुछ पाठ इन पर रखे हैं। मगर कई ब्लाग लेखक विकिपीडिया और नाॅल पर लिखने के लिये की गयी अपीलों पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। ऐसे में बहस की दिशा समझ में नहीं आती। ऐसी ही एक बहस एक सुझाव आया है कि हिंदी के लिये सर्वर बनाया जाये। एक तरफ ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने हिंदी प्रेम की वजह से विकिपीडिया में योगदान देते दूसरों से ऐसा करने का आग्रह करते हैं पर कुछ लेखक यह कहकर विरोध करते हैं कि विकिपीडिया और नाल विदेशी सर्वरों पर आधारित हैं और वह नियम बदलकर कभी हिंदी लेखकों का लिखा जब्त कर सकते हैं। समर्थक ब्लाग लेखक भी यह तर्क देते हैं कि अंतर्जाल पर लिखी गयी सामग्री की तो कोई भी नकल कर सकता है तो फिर विकिपीडिया के लिये लिखने में क्या बुराई है?
इस बहस से अलग विषय है हिंदी और देशी भाषाओं के सर्वर की। सच बात तो यह है कि हमारा देश न केवल अपने यहां बल्कि विदेशों के प्रचार माध्यमों मेंं भी अपना पैसा लगा रहा है। हिंदी के लिखने पढ़ने मेंं गूगल के योगदान पर अधिक क्या लिखना? उसके टूलों के कारण ही यहां हिंदी लिखी जा रही है। कुछ मुददे ऐसे हैं जिन पर बहस की गुंजायश नहीं है। जिस तरह भारत के पैसे ेसे विश्व में क्रिकेट चल रहा है वैसे ही अन्य प्रचार माध्यमों को भी इससे बहुत सारी सहायता मिल रही है। भारतीय केवल अपने देश में नहीं है बल्कि बाहर है। यही स्थिति पैसे की भी है। भारतीयों का पैसा कितना बाहर लगता है कोई नहीं जानता? अनेक भारतीय कंपनियां विदेशों में सक्रिय हैं और उनमें आम भारतीय निवेश करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत एक बहुत बड़ी आर्थिक ताकत है पर उसका उपयोग करने के लिये कुशल प्रबंधन का अभाव है और अंतर्जाल पर हिंदी लिखने के मामले में पिछड़ना इसी बुराई का एक हिस्सा भर है। केवल धन में ही नहीं तकनीकी दृष्टि से भी भारत कितना सक्षम है इस पर विस्तार से लिखना सूरज को दिया दिखाने के बराबर है। फिर भी आखिर ऐसा क्या है कि हमारे पास हिंदी और देशी भाषाओं का सर्वर नहीं है।

प्रसंगवश याद आया। जब इंटरनेट शुरु हुआ था तब याहू के बारे में यह कहा गया कि उसकी स्थापना एक पुराने भारतीय अभिनेता ने की है। अनेक पाठकों को यह पता ही नहीं होगा कि यह भी एक विदेश में स्थित कंपनी ही है जिसका किसी भारतीय अभिनेता से संपर्क नहीं है-अंतर्जाल पर ढाई वर्ष से सक्रिय रहने पर इस ब्लाग लेखक को भी यही आभास बहुत समय तक रहा। याहू नाम का प्रचार कुछ इस तरह का है कि लोग आज भी इसे देशी समझते हैं और आम प्रयोक्ता अपना इमेल उसी पर ही बनाता है। इस लेखक ने भी गूगल पर तब ईमेल बनाया जब ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये उसकी आवश्यकता हुई। अंतर्जाल पर हिंदी के लिये समर्पित ब्लाग लेखक विकिपीडिया और नाॅल के लिये लिखने की अपील करते हैं इस पर आपत्ति करना तो ठीक नहीं है पर इसके प्रत्युत्तर में कुछ लोग बारबार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर इतने सारी धनी और तकनीशियन होते हुए भी हिंदी या देशी भाषाओं का लेखन विदेशियों के सहारे क्यों हैं? तय बात है कि यहां के धनपतियों में आत्ममुग्धता की स्थिति है। यहां का धनपति विनिवेश करते ही पैसा कमाना चाहता है जबकि विदेशी विनिवेश योजना के साथ करते हैं और उनमें अपने देश और भाषा के लगाव भी अनुकरणीय होता है। यहां के धनपति क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनलों में पैसा लगा रहे हैं ताकि तत्काल पैसा कमाया जा सके। टीवी चैनलों की हालत यह है कि किस अभिनेता ने रात को किसी अभिनेत्री के कान में क्या कहा? इसे प्रमुख खबर बनाते हैं। देश में पैसा कमाने वाले बहुत हैं पर अच्छे प्रबंधक हैं यह कहना गलत होगा। ऐसे धनपति चाहे अपने फोटो और बयान कितनी बार ही अखबारों या टीवी चैनलों पर दिखा लें पर वह सेठ नहीं है। सेठ वह होता है जो अपने धन से समाज,भाषा और सामूहिक विकास के लिये धन देता है या प्रायोजन करता है। इस देश के धनपतियों और धार्मिक ठेकेदारों का उद्देश्य केवल मौजूद साधनों का दोहन करना होता है निर्माण नहीं ।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण है गंगा और यमुना का प्रदूषण। आप देखिये इन दोनों पवित्र नदियों के किनारे अनेक धार्मिक नगर हैं और वहां अनेक प्रकार के होटल और आश्रम हैं। अनेक धनपति समय समय पर वहां अपनी श्रद्धा दिखाने पहुंचते हैं तो अनेक साधु संतों ने वहां आश्रम बना लिये। मगर गंगा और यमुना दोनों ही प्रदूषित होती गयीं। क्या आपने सुना है कि किसी धनपति या प्रसिद्ध साधु ने इसके लिये कोई आंदोलन किया हो। कहने को बातें सभी करते हैं पर ठोस प्रयास किसी ने नहीं किया। समाज के शीर्षस्थ नेतृत्व का यह नकारापन जग जाहिर है। गंगा यमुना की संस्कृति के नारे लगते रहे पर वह दोनों मैली होती रहीं।

समाज और भाषा के शीर्षस्थ लोगों के नकारापन के कारण ही अनेक ब्लाग लेखक अपने हिंदी समर्पण की भावना के वशीभूत होकर ही विकिपीडिया और नाल में हिंदी भाषा के विकास के लिये लिखने की अपील करते हैं। यह अपील वह ब्लाग लेखकों से इसलिये करते हैं क्योंंकि वह उनको पढ़ते हैं पर हिंंदी सर्वर की बात करें तो धनपतियों और भाषा के ठेकेदारों को कहां इतना समय है कि वह इसके लिये सोचें। क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनलों पर उनके लिये इतना पैसा फैला है कि वह उनके दोनों हाथों से समेटा ही नहीं जाता। एक आम हिंदी भाषी ब्लाग लेखक को अंतर्जाल पर हिंदी लिखना अपना युद्ध लगता है जिसे सभी लड़ रहे हैं। फिर विकिपीडिया और नाल की बात ही क्या? ब्लाग स्पाठ और वर्डप्रेस के ब्लाग भी विदेशियों की ही देन है। कई बार ऐसा लगता है कि कितना ही अच्छा होता कि देश के धनपतियों और तकनीशियनों के समन्वय से ऐसे ही साफ्टवेयरों का निर्माण हुआ होता। विकिपीडिया और नाॅल की तरह कोई अपने देश के लोगों का बनाया मंच होता। वैसे नाल का प्रचार इतना है नहीं और विकिपीडिया पर अब हिंदी के लोगों की निर्भरता कम ही होती जा रही है। भारतीय विषयों पर अनेक समर्पित ब्लाग और वेबसाईट लेखकों ने भारतीय विषयों को अंतर्जाल पर चढ़ा दिया है। वैसे भी इस देश में लोग सर्च इंजिनों में शब्द डालकर ही अपने विषय ढूंढते हैं और कई जगह विकिपीडिया से पहले उनके ब्लाग या वेबसाईटें आ जाती हैं। फिर वर्डप्रेस,नारद,ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत, हिंदी ब्लाग जगत और वेबदुनियां की भी भूमिका सर्च इंजिनों में बढ़ती दिख रही है। मुश्किल यही है कि पाठकों की कमी और धनार्जन न होना लेखक को प्रोेत्साहित नहीं कर पाता। ऐसे में शौकिया लेखक ही लिखते हैं। जब पाठकों के साथ लेखकों की संख्या भी बढ़ेगी तो नाल और विकिपीडिया पर लिखने वालों की संख्या भी बढ़ेगी।
निष्कर्ष यह है कि अंतर्जाल पर हिंदी स्थापित करने के लिये एक समग्र आंदोलन की आवश्यकता है जिसमें देश के धनपति,तकनीशियनों और लेखकों के साथ अन्य प्रचार माध्यमों के समन्वित प्रयास होने चाहिये। उससे पाठक संख्या निश्चित रूप से बढ़ेगी। हालांकि यह केवल कल्पना ही है। हां, जब हिंदी के पाठक बढ़ने लगे और धनपतियों को लगा कि उससे तत्काल-दीर्घकाल में नहीं-लाभ उठाया जा सकता है तो एक क्या दस हिंदी के सर्वर बन जायेंगे। शायद यह दुनियां की इकलौती भाषा है जो सभी को कमाकर देती है पर स्वयं गरीब बनी रहती है। ऐसा नहीं है कि हिंदी से कोई कमा नहीं रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो गूगल हिंदी में लिखने वाले इतने बेहतर टूल नहीं लाता। यह क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनल हिंदी वालों से खूब कमा रहे हैं पर अपनी बढ़ती दौलत उन्हें अंध बना देती है और मातृभाषा उनको गरीब दिखाई देती है। कई तो कह भी देते हैं कि ‘आजकल हिंदी से काम नहीं चलता।’
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