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12/31/10

अदालत के फैसलों पर उंगली उठाना उचित नहीं-हिन्दी आलेख

छत्तीसगढ़ में निचली अदालत ने नक्सलियों में मददगार तीन लोगों को सजा सुनाई है। इनमें एक कोई डाक्टर हैं जिनको आजीवन कारावास की सजा देने पर भारतीय अदालतों के विरुद्ध एक प्रचार अभियान प्रारंभ हो गया है। दरअसल अदालत के निर्णय पर कभी इस तरह की सार्वजनिक बहस नहीं चली जैसी राममंदिर तथा नक्सलियों मे मददगार भद्र पुरुषों पर सजा पर हो रही है। यह बहस प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवियों ने प्रारंभ की है जिनके चिंतन और अध्ययन की शुरुआत कार्ल मार्क्स की पूंजी किताब से शुरु होकर मज़दरों एक हो के नारे पर खत्म हो जाती है। अलबत्ता भारत में निम्नजातियों के उद्धार, भारतीय धार्मिक विचारों से अलग विचार मानने वाले लोगों की रक्षा तथा गरीबों के इलाज के नारे भी लगाये जाते हैं। इतिहास बताया जायेगा पश्चिम का और आधार ढूंढे जायेंगे भारतीय संदर्भों में, यही इन विचाराधाराओं के बुद्धिजीवियों के प्रयास हैं जो कि शुद्ध रूप से व्यवसायिक हैं क्योंकि इनसे इनको नाम तथा नामा दोनों ही मिलता है। जहां तक पूंजीवादी लेखकों का प्रश्न है तो उन्हें भी इनके विरुद्ध लिखने पर शाबाशी मिल जाती है। अलबत्ता विचाराधाराओं के लेखक प्रायोजित होने के कारण अपने संकीर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लिखते हैं। ऐसे में स्वतंत्र और मौलिक लेखकों को अपनी बात कहने का अवसर कभी नहीं मिलता है। यह तो भला हो इंटरनेट कंपनियों का जो उन्होंने ब्लाग जैसी साईटों को बनाकर यह अवसर दिया है। मज़े की बात यह है कि प्रगतिशील और जनवादी विचारक पूंजीपतियों की इसी सेवा का लाभ उठाते हुए भी धारा वही पुरानी चलते हैं केवल नारे लगाने वाली।
प्रगतिशील और जनवादियों की यह खूबी है कि वह कल्पित मिथक नहीं रचते बल्कि जीवित इंसान को या फिर जिसके जीवन के प्रमाण हो उसे ही मिथक बनाते हैं ताकि उसे कल्पित कहकर कोई चुनौती न दे। यह अलग बात है कि ऐसा करते हुए वह ऐसी हरकतें भी करते हैं जिससे लगता है कि राई जैसे आदमी को पर्वत बना रहे हैं। उनकी दूसरी खूबी यह है कि बात खेत की हो तो वह खलिहान की सुनेंगे। अगर खलिहान की बात हो तो खेत की कहेंगे। पूर्व में खड़े होकर पश्चिम की तो उत्तर में खड़े होकर दक्षिण की बात करेंगे-इसका उल्टा भी हो सकता है या दिशाऐं भी उधर की जा सकती हैं। मतलब यह कि आप जिस दिशा में रहते हैं तो दूसरी दिशा की स्थिति को आप नहीं जानते इसलिये इनकी बातों पर यकीन न करें तो चुनौती भी नहीं दे सकते। फिर जीवधारी मिथकों पर कुछ कहना कठिन होता है।
इन्हीं लेखकों ने राममंदिर पर अदालत के निर्णय को चुनौती दी। मंदिर बनेगा या नहीं अब इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा क्योंकि आमजन अब इस विवाद से दूर हो चुका है। मगर पत्थरों के बने एक ढांचे के गिरने पर जनवादी तथा प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने जो प्रायोजित विलाप किया वह देखने लायक था। इतना तो उस धर्म के लोग भी नहीं रोये होंगे जितना इन दोनों समूहों के बुद्धिजीवियों ने रोया। पत्थर में जान नहीं होती पर इन्होंने डाली भले ही यह बात मिथक लगे। आम इंसान समय के साथ आगे जाता है पर यह लोग इतिहास की अर्थी कंधे पर लेकर जिस तरह चलते हैं वह प्रशंसा के योग्य है।
अब इनके हाथ लग गये हैं गरीब बच्चों का इलाज करने वाले एक डाक्टर साहब जिन पर राजद्रोह का आरोप लगा और अब सजा मिली। जहां तहां उनको रिहा करने की अपील की जा रही है। ऐसा नाटक किया जा रहा है जैसे कि इनके लिखने तथा प्रदर्शन करने के अभियान से वह रिहा ही हो जायेंगे। भारतीय न्याय प्रणाली की जरा समझ रखने वाले को भी यह पता है कि अब मामला हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में जायेगा। इसका अंतिम परिणाम न्यायालयों की निर्णयों पर ही निर्भर है और उन पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालना संभव नहीं है। ऐसे में यह बुद्धिजीवी वर्ग संदेह के दायरे में स्वयं ही आता है। ऐसा लगता है कि वह भारतीय समाज को यह संदेश दे रहा है कि अगर न्यायालय के निर्णय उसके अनुकूल न रहे तो वह भारतीय न्याय प्रणाली पर भी उंगली उठायेगा। ऐसी शक्ति केवल पैसा लेकर बुद्धि विलास करने वालों के लिये संभव है स्वतंत्र और मौलिक लेखकों के लिये नहीं।
डाक्टर साहब को मिली सजा पर जिस तरह उसके विरुद्ध प्रचार अभियान प्रारंभ हुआ है उससे लगता है कि दुनियां के कुछ नकारात्मक संगठन जिनको पूंजीपतियों से ही पैसा मिलता है इस विषय पर अब बावेला मचाने वाले हैं। वैसे ही जैसे राम मंदिर पर मचा रहे हैं। अभी तक यह वर्ग भारत के राजनीति, सामाजिक, भारतीय धार्मिक, तथा आर्थिक प्रतिष्ठानों पर शाब्दिक हमला करता था पर अब न्यायिक व्यवस्था पर उंगली उठाने लगा है।
उन डाक्टर साहब का नाम पहले कोई नहीं जानता था। कहते हैं कि बच्चों का इलाज करते थे। हमें उन डाक्टर साहब से कोई गिला शिकवा नहीं है। एक मौलिक स्वतंत्र लेखक अगर गिला करे तो भी किस दम पर उसकी जानकारी के स्त्रोत भी तो प्रचार माध्यम ही है। इन्हीं प्रचार माध्यमों में यह कहीं न पता चला कि उन्होंने कितने बच्चों का कब कहां इलाज किया। मुफ्त किया कि कम पैसे लिये। भगवान ही जानता है कि करते थे भी कि नहीं या पहले करते थे अब केवल सामाजिक गतिविधियों तक ही सीमित हो गये थे। उनकी पत्नी के अनुसार ही वह घर का खर्चा अपने दम पर चलाती हैं तो डाक्टर साहब क्या मुफ्त इलाज करते थे? तब दवा का पैसा कहां से आता होगा? फिर दूसरी बात यह कि डाक्टर साहब की चर्चा जिन गतिविधियों के कारण हो रही हैं वह उनके व्यवसाय से इतर हैं। सीधी बात कहें तो राजनीतिक हैं। एक योजना के बारे में तो यह कहा जा रहा है उसकी कल्पना उन्होंने की और राज्य सरकार ने उनको अपनाया। सवाल यह है कि फिर राजद्रोह जैसा आरोप लगा क्यों?
डाक्टर साहब जिस विचारधारा के आदमी हैं उसमें हिंसा एक स्वीकार्य सिद्धांत है। ऐसे में हिंसक तत्वों से उनका संपर्क होना कोई ज्यादा बड़ी बात नहीं है। हिंसक तत्वों को हमेशा ही बौद्धिक संपन्न लोगों से सहायता की अपेक्षा रहती है क्योंकि वह हथियार चलाना जानते हैं पर कहां चलाना है इसके लिये उनकी अक्ल काम नहीं करती। हम यह नहीं कहते कि डाक्टर साहब ने ऐसी सहायता की होगी पर जब आप हिंसक तत्वों से संपर्क रखते हैं तो शक के दायर में तो आते ही हैं। खासतौर से तब जब हम जैसे मौलिक और स्वतंत्र लेखक ऐसी हिंसा को पूंजीवाद के पिछले दरवाजे से प्रायोजित किया मानते हैं। आजतक अनेक बार यह पूछा गया कि गरीब, भूखे तथा मज़बूर लोगों के पास रोटी का निवाला नहीं होता पर उनके पास डेढ़ लाख की बंदूक आ जाती है, कहां से? उनके कथित नुमाइंदों के पास अच्छे कपड़े, गाड़ियां तथा अन्य वस्तुऐं कहां से आती हैं? अमेरिका तथा पश्चिमी सम्राज्यवादी पूंजीवाद के खिलाफ खड़े लोग अंततः गोलियां चलाकर राज्य को ही हथियार खरीदने को मज़बूर करते हैं, क्या पूंजीवाद की मदद नहीं है।
सजा तीन को हुई पर डाक्टर साहब को हीरो बनाया जा रहा है? शक तो उठना स्वाभाविक ही है। हमारी दिलचस्पी बाकी दो में भी है मगर ऐसा लगता है कि वह पूंजीवाद के विरोधियों के लिये नगण्य हैं या फिर उनको नायक बनाने से कोई मसाला नहीं मिलने वाला। यह भी संभव है कि नोबल पुरस्कार तो किसी एक को ही मिल सकता है इसलिये बाकी दो को क्यों डाक्टर साहब का प्रतिद्वंद्वी बनाया जाये। कहीं यह अगले शांति नोबल पुरस्कार को भारत लाने के लिये कवायद करने के लिये प्रचार अभियान तो नहीं चलाया जा रहा?
इस लेखक वर्ग ने चीन के उस नोबल पुरस्कार प्राप्त विजेता को शायद अपना आदर्श बनाया है जो जेल में है। संभव है डाक्टर साहब को भी नोबल मिल जाये क्योंकि कहीं न कहीं उनके मन में पश्चिम के लोगों में भी सहानुभूति दिख रही है। मुश्किल यह है कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में राज्य से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की आशा नहीं की जाती पर चीन में यह संभव है इसलिये उस पर दबाव बनाया गया मगर भारत में यह संभव नहीं है। जब इस मामले की सुनवाई अदालत में चल रही थी तब डाक्टर साहब को जमानत मिली उस समय उनके समर्थकों ने जश्न मनाया था पर न्याय प्रणाली पर उनका यह दबाव बनाये रखने का प्रयास नहीं चला। अब प्रतिकूल निर्णय पर उनका गुस्सा इसलिये भी गलत लगता है क्योंकि इसी अदालत ने उनको जमानत भी दी थी। मतलब अदालत का निर्णय अनुकूल हो तो जश्न मनाओ और प्रतिकूल हो गुस्सा दिखाओ। यह नीति चिंतनहीन बुद्धिजीवियों को ही शोभा देता है। ऐसें ही बुद्धिजीवी बाबा रामदेव के आभामंडल पर शाब्दिक आक्रमण करते हैं जो ऐसे प्रमाण अपने साथ रखते हैं जिनसे पता लगता है कि उन्होंने कितने बीमारों को ठीक किया। अच्छा होता सजायाफ्ता डाक्टर साहब की चिकित्सा से लाभान्वित लोगों की जानकारी यह लोग भी देते। खाली नारे लगाने से बात नहीं बनती।
विश्व में पश्चिमी देशों में उत्पन्न सभ्यता का बोलबाला है जिनकी राजनीति का अधिकतर हिस्सा प्रचार के आधार पर सत्ता कायम करना है और जो लोकतंत्र की पक्रिया का भी एक हिस्सा बन गया है। पश्चिमी विश्व पूर्वी देशों में अपना राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक प्रभाव बनाये रखने के लिये प्रचार का सहारा लेते हैं और इसके लिये उन्होंने अनेक तरह के सम्मान तथा संस्थाओं का सृजन कर रखा है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उनके हितों के लिये ही काम करते हैं। इन्हीं सम्मानों को पाने तथा अपनी कथित मानवाधिकार, समाज सेवा तथा गरीबों का इलाज करने के उद्देश्य के लिये पश्चिमी पूंजीपतियों तथा सरकारों से धन पाने के लिये पूर्वी देशों के अनेक बुद्धिजीवी, विचारक तथा समाज सेवक उतावले रहते हैं। ऐसे में पूंजीवादी, समाजवादी या साम्यवादी विचाराधाराओं को मुखौटा लगाये अनेक लोग बकायदा योजनाबद्ध ढंग से व्यवसायिक प्रचार कार्य कर इन्हीं पश्चिमी देशों की सेवा करते हैं ताकि उनका सम्राज्य बना रहे। स्थिति यह है कि समाजवादी और साम्यवादी विचारक पश्चिम के पूंजीवाद को कोसते रहते हैं पर उनके चेले चपाटे तथा रिश्तेदार इन्हीं पश्चिमी देशों मेें अपना निवास बनाकर आराम से रहते हैं।
डाक्टर साहब बड़ी अदालत में राहत पा जायें यह कामना हम भी करेंगे क्योंकि उनके समर्थक यही दावा कर रहे हैं कि वह निर्दोष हैं। एक आम लेखक के रूप में जब टीवी पर डाक्टर साहब का चेहरा देखा तब लगा कि बहुत मासूम हैं पर अदालतें तो सबूत देखती हैं। मन में एक शंका भी हुई कि कहीं वह वास्तव में अपनी मासूमियत की वजह सें अपने ही समूह या साथियों की चालाकी का शिकार तो नहीं बने क्योंकि उसके बाद जो प्रचार अभियान प्रारंभ हुआ है उसमें अनेक प्रायोजित बुद्धिजीवी अपना समय पास करने वाले हैं। एक लंबे समय तक चलने वाला प्रचार अभियान देखने को मिलने वाला है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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4/9/10

राष्ट्रनिरपेक्ष दिखने का प्रयास-हिंन्दी लेख (national intrest-hindi article

प्रकाशन तथा अन्य संचार माध्यमों में विदेशी विनिवेश का अक्सर यह कहकर विरोध किया जाता है कि उनका इस देश के हितों से कोई सरोकार नहीं रहेगा। विदेशी पूंजीपति से सुजज्जित प्रचार और प्रकाशन संगठन देश के प्रति वफादारी नहीं दिखायेंगे? उस समय कुछ भोलेभाले बुद्धिजीवी देशभक्ति के भाव के कारण यह सुनकर चुप हो जाते हैं। मगर नक्सनवाद पर जिस तरह संगठित प्रचार माध्यमों का कथित निष्पक्ष रवैया है वह उनके देशभक्ति के भाव में निरपेक्षता दिखा रहा है और तब उनका यह तर्क खोखला दिखाई देता है कि विदेशी विनिवेशकों को देश के हितों से कोई सरोकार नहीं रहेगा अतः उनका आगमन प्रतिबंधित रखना चाहिये।
एक किस्सा है जिसे अधिकतर लोगों ने सुना होगा। एक लड़के द्वारा बार बार ‘शेर आया’ ‘शेर आया’ कहकर गांव के लोगों को  अनावश्यक रूप से पुकार कर एकत्रित किया जाता था। एक बार सच में शेर आया पर गांव वाले नहीं आये और वह उसे मारकर खा गया। इसे ध्यान रखना चाहिये। संगठित प्रचार माध्यमों जिस तरह कथित रूप से निष्पक्षता दिखाते हुए समाज और देश हित के प्रति निरपेक्षता दिखा रहे है उसके बाद उनको यह आशा नहीं करना चाहिये कि उनके द्वारा कभी किसी प्रसंग में सहानुभूति प्राप्त करने का अभियाना चलाया गया तो आम दर्शक या पाठक वैसे ही उपेक्षा कर सकता है जैसे कि गांव वालों ने लड़के के प्रति दिखाई थी। संगठित प्रचार माध्यम कुछ संस्थान लोगों के जज़्बातों से खेल रहे हैं और इसे हर आदमी जान चुका है। नक्सली हिंसा में सुरक्षाबल के जवानों की मौत पर जिस तरह की बातें की जाती हैं उससे लोगों में जो गुस्सा भरता है उसका अंदाजा संगठित प्रचार माध्यमों में सक्रिय कुछ लोगों को नहंी है। वह आम आदमी तक खबर और दृष्टिकोण पहुंचाने की होड़ में इस बात को भूल जाते हैं कि उनके उपभोक्ता दर्शक और पाठकों के जज़्बात व्यवसायिक नहीं भावनात्मक होते हैं। ऐसे में किसी हिंसा के पक्ष या विपक्ष में तर्क कराने की बजाय आम आदमी की इकतरफा उग्र अभिव्यक्ति का प्रदर्शन करना चाहिये-आवश्यक हो तो व्यवस्था की नाकामी का प्रश्न उठाया जाये पर कम से कम हिंसक तत्वों के ऐजेंडे को इस तरह न  प्रस्तुत  किया जाये कि जैसे कि वह नायक हों।
विश्व भर में आतंकवाद एक व्यवसाय बन चुका है। जिस संगठित प्रचार माध्यम को इस पर असहमति हो वह अपने ही समाचारों का विश्लेषण कर ले क्योंकि इस लेखक का आधार भी वही हैं। कथित रूप से जो महान बुद्धिजीवी हैं उनको यह समझायें कि वह कल्पित जन कल्याण के नाम होने वाली हिंसा का समर्थन कर रहे हैं। यह सच है कि जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के नाम पर बने समूहों मे आपसी हिंसा होती है पर इसके लिये उनके स्वरूप नहीं बल्कि शिखर पुरुषों की आपसी रंजिशें जिम्मेदार होती हैं यह अलग बात है कि वह समाज हित की आड़ में अपने आपको निर्दोष साबित करने का प्रयास करते हैं।
आतंकवादियों को बड़े पैमाने पर धन मिलता है जिससे वह स्वयं ऐश करते हैं। अनेक स्थानों पर वह महिलाओं की देह से खिलवाड़ करने की खबरे छपती हैं। वह आधुनिक हथियार खरीदते है। उनके पास महंगी गाड़ियां हैं। भारत में अपराध कर विदेश भाग जाने की उनको सुविधा मिल जाती है। ऐसे हिंसक तत्वों के स्थानों पर जब शराब और जुआ के दौर चलने की खबरें इन्ही संगठित प्रचार माध्यमों द्वारा दी जाती है। तब गरीबों, आदिवासियों, मजदूरों तथा शोषकों के लिये उनके लड़ाई के दावे पर यकीन कैसे किया जा सकता है। आप किसी विषय पर चर्चा करते हुए निष्पक्ष रहें पर इस तरह नहीं कि देश के प्रति निरपेक्षता दिखाई दे।

इस संबठित प्रचार माध्यमों का एक तय प्रारूप है। उनहोंने आर्थिक, सामाजिक,राजनीतिक तथा सामरिक विषयों पर कुछ ऐसे विशेषज्ञों का पैनल बना रखा है जो एक निश्चित सीमा के बाहर ही अपने विषय से बाहर नहीं देख पाते। उनके पूरे विश्व में आ रहे परिवर्तनों का आभास तक नहीं है। इसलिये वह रटी रटाई बातें करते हैं। घटनाओं के स्थान तथा तारीख बदल जाती है पर उनके बयान नहीं बदलते। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आजकल इन संगठित प्रचार माध्यमों की ताकत बहुत अधिक है।
कुछ माह पहले भारत तथा पाकिस्तान के दो प्रकाशन संस्थाओं ने दोनों देशों के बीच मैत्री भाव स्थापित करने का अभियान छेड़ा था। उस समय अंतर्जाल लेखको ने संदेह व्यक्त किया था कि अब यहां पाकिस्तान के लिये प्रायोजित मैत्री अभियान शुरु होगा। कुछ समय बाद वह दिखने लगा। भले ही वह दो संस्थान हैं पर यकीनन वह इस तरह दोनों देशों के-खासतौर से भारत के-बौद्धिक वर्ग के लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से एक संदेश दे रहे थे। उसके बाद तो यहां एक तरह से पाकिस्तान के लिये सद्भाव के प्रचार का जो दौर शुरु हुआ उसमें 26/11 को मुंबई पर हुए हमले की यादें लोगों से विस्मृत करने की योजना के रूप में देखा गया। एक तो अभी शादी और तलाक का नाटक चला गया जिसमें यह बताने का प्रयास हुआ कि यह सब तो दोनों देशों के बदमाश करते हैं और आम आदमी को इससे कोई मतलब नहीं है। पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत में आयोजित एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में नहीं बुलाया गया तो उस पर इन्हीं संगठित प्रचार माध्यमों ें कुछ ने तो शोक जैसा माहौल दिया। तय बात है कि इसके पीछे आर्थिक लाभ तथा सुरक्षा का कोई स्वार्थ है जिसे छिपाया जाता है, या फिर मन में यह भय है कि पाकिस्तान में रह रहे अपराधी कहीं उनकी पोल न खोल कर रख दें।
यह बातें इतना परेशान नहीं  करती अगर निरंतर जारी नक्सली हिंसा में देश के सुरक्षा कर्मियों की मौत के बाद भी देश के ही अंदर के इलाकों पर उनकी उपस्थिति पर आपत्ति नहीं दिखाई जाती। उन पर कल्पित आरोप लगाकर यही साबित करने से तो यही साबित  होता है कि कुछ लोगों की यह मजबूरी है कि वह देश निरपेक्ष दिखकर बाहर के लोगों को खुश रखें। भारत में अधिकतर समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा टीवी चैनलों में काम करने वाले व्यक्तित्व समझदार हैं और उनकी देशभक्ति पर शक नहीं किया जा सकता पर उनमें कुछ ऐसे हैं जिनको आत्ममंथन करना ही होगा कि कहीं  वह अनजाने में तो अपने ही देश के शत्रुओं के हाथ में नहीं खेल रहे। उनको किसी लाचारी या लालच में काम न करता हुआ दिखना है ताकि देश की आम पाठक तथा दर्शक उनकी तरफ सवाल न उछाले। सबसे बड़ी बात यह है कि उनको अपनी शक्ति का अहसास होना चाहिये कि वह अपने प्रयासों से देश को एक दिशा दे सकते हैं। उसी तरह उनके कुछ प्रसारणों तथा प्रकाशनों से देश का मनोबल गिरता हे। इसलिये वह इस बात का ध्यान रखें कि देश की रक्षा करने वाले तथा समाज का सच में हित चाहने वालें लोग उनके अनजाने में किये गये प्रयासों से आहत न हों। अपनी व्यवसायिक प्रतिष्ठा बनाने के लिये निष्पक्ष रहना आवश्यक है पर अगर वह राष्ट्रनिरपेक्ष रहने का प्रयास करेंगे तो उससे उनके उपभोक्ता दर्शक तथा    पाठक उनसे निंराश हो जायेंगे। जिसका कालांतर में उनके व्यवसायिक हितों पर ही प्रभाव पड़ेगा।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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