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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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5/8/16

हमारी गलती थी-हिंदीशायरी (Hamari Galti Thi-HindiShayari)

उनकी भोली सूरत
सरल चाल देखकर
यकीन कर लिया।

हमारी गलती थी
उन्होंने बदला विश्वास
छीनकर लिया।
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उनका बुलाने का
मन नहीं था
हम भी कहाँ जाने वाले थे|
नज़रे तो उनसे
कई बार मिली थीं
मगर दिलों के जज्बातों पर
रूखेपन के ताले थे|

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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4/21/16

मन से लाचार-हिन्दी कविता(Man Se Lachar-HindiKavita)

गैर के दर्द पर
वह संवेदनायें क्या जतायेंगे
अपने पर जो न तरस खायें।

भर लेते अपने ही अंदर
भय के भूत
आंखों से आंसु बरसायें।

कहें दीपकबापू मन से
लाचार लोगों की फौज में
नरमुंड बहुत दिखते
उम्मीद तभी करें जीत की
जब किसी में वीर रस पायें।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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4/12/16

गरीब का नारा अमीर का चारा-हिन्दी कविता(Garib ka Amir chara-HindiPoem)

गरीब के भले का
दीवार पर लिखा नारा होगा
अमीर के खातों का
बढ़ता दिखा चारा होगा।

कहें दीपकबापू गर्मियों में
पानी की बूंदे तरसायेंगी
गर्म हवायें जलायेंगी
रोकर या हंसकर झेलें
भाग्य में लिखा चढ़ता पारा होगा।
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3/4/16

बिना शास्त्र के भलाई यज्ञ-हिन्दी कविता(Bina Shastra ke Bhalai Yagya-Hindi Kavita)

पुरानी किताबों से 
मन में बैर था
नयी घर लाये।

दिमाग खाली था
उधार में पुरानी सोच
नयी समझकर भर लाये।

कहें दीपकबापू ज्ञान से
अहंकारी रखें बैर
बिना शास्त्र के करें
भलाई का यज्ञ
फल से अधिक
हानि का डर लाये।
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9/7/15

मुर्दा दिमाग और ताजी हवा-हिन्दी कविता(Murda Dimag aur Tazi Hawa-Hindi Poem)


कठिन जिंदगी
बाप और भाई से
रुपया बड़ा जरूर बनायेगी।

रुपये डालर की दर
महंगी होकर
रिश्तों को सस्ता बनायेगी।

कहें दीपकबापू हैरान हैं
विकास के पैमाने
कभी समझ नहंी आये
संवेनाओं की कीमत
कभी लगा नहीं पाये
सामानो में फंसे ज़माने के प्राण
मुर्दा दिमागों को ताजी हवा
अपनी कीमत क्या बतायेगी।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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8/30/15

ब्याज के रूप में दान से स्वर्ग-हिन्दी व्यंग्य क्षणिकायें(byaj ke roop mein dan swarg dilayega-hindi satire poem)

किराये पर रहते लोग
सुंदर मकान का
सपना भी बिक जायेगा।
कहें दीपकबापू कर्ज पर
चल रहा संसार
यह सवाल भी है कि
ब्याज की राह पर
कितना चल पायेगा।
-------------
विज्ञापन में सुंदर मकान
चमकदार सड़कें देखकर
स्वर्ग का अहसास
दिल में जरूर आयेगा।
कहें दीपकबापू पुण्य के रूप में
कर्ज लेना है
ब्याज का दान
वहां निवास करायेगा।
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8/26/15

दिमाग की खिडकियां-हिन्दी कविता(dimag ki khidkiyan-hindi poem)

जब दुनियां है गोल
रिश्तो का कहीं सस्ता
कहीं महंगा होगा मोल।

घूमते घूमते कहीं
पुराने यार टकरा जाते हैं
यादों का पी जाते घोल।

कहें दीपक बापू हंसते हंसते
जीना सीख लो
दिल के दरवाजे बंद कर
दिमाग की खिड़कियां रखना खोल।
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8/21/15

दिल और शब्द-हिन्दी कविता(dila aur shabd-hindi poem)


दिल के भाव
शब्दों में समझे
श्रोता और पाठक की
 समझ का सवाल है।

नीयत और इरादे
स्वर में छिप जाते
व्याकरण भी ढाल है।

कहें दीपक बापू परमार्थ में भी
लोग अर्थ ढूूंढ लेते
जब श्रोता और दर्शक
समझदारी से भागता
अपनी बचाता खाल है।
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8/15/15

गुलाम में आजादी का भ्रम-15 अगस्त पर हिन्दी कविता(gulam mein azadi ka bhram-special hindi poem on 15 August)

आजाद तन है
मन विषयों के जाल में
बुरी तरह फंसा है।

गुलाम सभी है
बन गये जरूरत के
पर हर कोई एक दूसरे पर
हमेशा हंसा है।

कहें दीपक बापू ज्ञान से
बड़ा हो गया जहां विज्ञान
हर गुलाम आजाद होने के
भ्रम में धंसा है।
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8/10/15

अमन के घर भी भस्म कर देते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता(aman ke ghar bhi basma kar dete hain-hindi satir poem)

दर्द के व्यापारी
कभी अपने चेहरे पर भी
जख्म कर लेते हैं।

खाली बैठे होते
तब भरे बाज़ार रक्त
बहाने की रस्म भी कर लेते हैं।

कहें दीपक बापू खुशी से
जीना नहीं सीखा ज़माना
मस्ती के लिये
झगड़े का ढूंढता बहाना
जज़्बात सजाये बैठे दुकान पर
बेचने के लिये
वह अमन के घर भी
भस्म कर देते हैं।
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8/6/15

दिल नहीं बहला पाते लोग-हिन्दी कविता(dil nahin bahala paate log-hindi poem)

पैसे के लिये
कोई खेलने में लगा
कोई तमाशा करता है।

जिसकी जीत पर लगते दाव
बेचकर सम्मान हारता
दोस्तों में निराशा भरता है।

कहैं दीपक बापू खेलते हुए भी
दिल नहीं बहला पाते लोग
गैरों के तनाव पर हंसने का
पाल बैठे रोग
सत्य के शब्द नहीं पसंद
खून के बिखरे छींटों से
हर कोई चमत्कार की
आशा करता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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8/1/15

हिन्दी के चिराग-हिन्दी कविता(hindi ke chirag-hindi poem)


अनजान में भटके
राही को सही रास्ता
सुझा सकते हैं।

जानकर चले तबाही के रास्ते
उसे समझाते हुए अपनी अक्ल के
चिराग बुझा सकते हैं।

कहें दीपक बापू शहर बड़े हैं
हादसों के डर से सहम जाते
एक वहम से बचते
दूसरा साथ लाते
अंग्रेजी में भटके इस तरह
उनको खुश करने के लिये
हिन्दी के चिराग
चाहे जब बुझा सकते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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7/29/15

खूंखार के सहारे-हिन्दी कविता(khoonkhaar ke sahare-hindi poem)

कुछ लोगों के चेहरे
उतरे लगते
उनकी वाणी से निकलते शब्द
कांप रहे हैं।

लगता है कोई खूंखार आदमी
फंसने वाला है
जिसके सहारे वह
रोटी फांक रहे हैं।

कहें दीपक बापू कल की बात
आज याद करते
बरसों पहले बहा खून भूल गये
प्राण शक्ति इतनी कम
सोचते हुए भी हांफ रहे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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7/26/15

प्रचार माध्यमों की व्यंजना शैली में धार्मिक उन्माद का भाव रहता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(prachan madhyamon ke vyanjana shaili mein dharmik unmad ka bhav-hindi thought article)

                              आज एक अभिनेता ने एक कैदी को फांसी की सजा दिये जाने का ट्विटर पर विरोध किया है। हमें पता नहीं कि उस अभिनेता ने ऐसा क्या अनुभव किया कि ऐसी बात लिख दी जो उनके ही प्रशंसकों को धार्मिक दृष्टि से नाराज कर सकती है हालांकि इसके लिये उसे जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता वरन् प्रचार माध्यम सांकेतिक रूप से इसमें धर्म तत्व का तड़का लगाने का प्रयास कर रहे हैं। मूलत न्यायालय और प्रशासनिक मसलों पर जिस तिरह प्रचार माध्यम व्यंजना शैली में सांप्रदायिकता उन्माद फैलाने वाले धार्मिक विषय जोड़ रहे हैं वह अत्यंत चिंताजनक है।
  कभी कभी तो यह लगता है कि हमारे प्रचार व्यवसायियों को देश में स्थाई शांति पसंद नहीं है। शायद उनको लगता है कि जिस तरह बिना झगड़े फसाद वाली फिल्में ज्यादा दर्शक नहीं जुटा पाती, उसी तरह जब तक देश में हिंसक या तनाव वाली वारदातें न हों तब तक उनके समाचार और बहसों के लिये दर्शक नहीं मिल पायेंगे। यही कारण है कि वह देश में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के इस तरह प्रयास करते लगते हैं जैसे कि देश की एकता की रक्षा और अखंडता के लिये बहुत चिंतित हों।  यह अलग बात है कि चिंतित केवल वह अपने विज्ञापनों का समय पास करने के लिये ही होते हैं।
                              सबसे बड़ी समस्या न्यायालयीन और प्रशासनिक के क्षेत्राधिकार वाले  मसलों पर सार्वजनिक बहस इस तरह करते हैं जैसे कि वहा कोई मुकदमा चला रहे हों।  अपने यहां वह प्रायोजित विद्वान बुलाते हैं इसलिये कोई उनसे कहता नहीं पर अंतर्जाल पर इन संगठित माध्यमों के लिये मित्रतापूर्ण भाव नहीं दिखता।  इनके समाचारों की स्थिति यह है कि दोपहर को अगर क्रिकेट, राजनीति और फिल्म से जुड़ी सनसनी खबर आ जाये तो फिर यह समझते देर नही लगती कि रात तक वही चलेगी। यही कारण है कि आजकल हम रात को टीवी समाचार छोड़कर अंतर्जाल पर पाठ लिखने लगते हैं।
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7/19/15

समाज सुधारने के घरेलु नुस्खे-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख(samaj sudharen ke gharelu nuskhe-hindi thought satier article)

                              हमारे देश में समाज सुधारने के लिये अनेक स्वयंसेवी संगठन बन गये हैं। इनके अनेक संगठनों के पदाधिकारी चंदा लेकर अपना घर भर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि जिस विषय में ज्ञान नहीं है उसमें ही विशेषज्ञ होने का प्रचा करते हैं।  हमने तय किया कि समाज सुधारने पर चिंत्तन कर कोई ऐसा उपाय किया जाये जिससे वास्तव में यहां आदर्श लोगों का समूह बन सके।
जो लोग चाहते हैं कि उनके परिवार के सदस्य साहसी बने वह उन्हें फिल्में देखने से बचायें। फिल्में हर फिल्म में सारी समस्याओं हल एक काल्पनिक नायक से हल होती दिखाते हैं।
                              जो लोग चाहते हैं कि उनके परिवार के सदस्य घरेलू तथा बाह्य खेलों में हृदय से रुचि लें वह उन्हें क्रिकेट खेलने से बचायें। क्रिकेट खाये पीये अघाये लोगों का खेल है जो मनुष्य को सुस्त और संकीर्ण विचार वाला बनाता है।  सबसे बड़ी बात तो यह कि परिवार के सदस्यों के सट्टे की आदत  में फंसने की संभावना रहती है।
                              जो लोग चाहते हैं कि उनके परिवार के सदस्य सामान्य रूप से कुशाग्र बुद्धिमान, परिश्रमी तथा ईमानदार बनायें वह उन्हें टीवी के सामाजिक धारावाहिक देखने से बचायें। टीवी धारावाहिकों जो अतिनाटकीयता देखने को मिलती है वह आमतौर से परिवारों में नहीं होती।  अगर कोई अधिक देखेगा तो वह परिवार के सदस्यों पर ही हर बात पर शंका करेगा। उसे लगेगा कि उसके अलावा अन्य सभी सदस्य उसके शत्रु हैं।  दूसरी बात यह कि इन धारावाहिकों में घर का कामकाज नौकरों के भरोसे होते दिखता है इससे परिवार के सदस्यों को यह गलत फहमी हो सकती है कि घरेलू काम करना तो उनके धर्म ही नहीं है।
                              नोट-कामेडी धारावाहिक देखने से रोकने का प्रयास न करें हालांकि इससे उनके ऐसे व्यंग्यकार बन जाने की शंका रहेगी जो किसी पर भी फब्तियां कसने से बाज नहीं आता।  कोई और न मिले तो स्वयं पर ही फब्तियां कसता है।
वैधानिक चेतावनी-यह सुझाव अनुमान के आधार पर दिये जा रहे हैं। इनका कहीं परीक्षण नहीं किया गया है।  इनका अनुसरण किसी मनोवैज्ञानिक से पूछकर करें वरना किसी घटना के लिये स्वयं ही जिम्मेदार होंगे।
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7/14/15

बाहुबली फिल्म की सफलता से निकले संदेश-हिन्दी चिंत्तन लेख(bahubali film ki safalata se nikle sandesh-hindi thought article)

        बाहुबली फिल्म ने भारतीय मनोरंजन जगत में तहलका मचा दिया है। दक्षिण की हिन्दी भाषा में अनुवादित वाणी से सुसज्जित फिल्म बाहुबली ने जो व्यापार किया है उससे मुंबईया फिल्मों की असलियत सामने आ गयी है। दरअसल दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग शुद्ध रूप से सार्वजनिक व्यवसायिक सिद्धांतों पर आधारित है जबकि मुंबईया फिल्म वाले उसे पारिवारिक दुकान की तरह चलाते हैं। आप नज़र डालिये तो पायेंगे कि  वर्तमान के अधिकतर फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के होने के काम पा जाते हैं। सामान्य परिवार के युवक और युवतियेां के लिये इस क्षेत्र में अवसर एकदम बंद कर दिये गये हैं। अनेक अभिनेता तो पचास पार करने के बाद भी नवयौवनाओं के साथ नायकों का अभिनय कर रहे हैं। ऐसे में सवाल आता है कि क्या देश में आकर्षक और प्रतिभाशाली युवकों की क्या कमी है? मगर मुंबईया फिल्म व्यवसाय रूढ़िवादी हो गया है।  अनेक अभिनरेता तो केवल चेहरे की सज्जा के कारण नायक बनते है वरना अधिकतर की आंखें सपाट हैं। इनके अभिनय में स्वाभाविकता का अभाव दिखता है। इसके विपरीत दक्षिण भारतीय अभिनेता और अभिनेत्रियों स्वभाविकता के साथ अपना काम करते हैं। उनमें आकर्षण भी अधिक होता है।
                              जिन लोगों ने टीवी पर दक्षिण भारतीय अतिभनेता और अभिनेता का काम देखा है वह हिन्दी भार्षी दर्शक इस बात को अब समझते हैं कि मुंबईया फिल्म व्यवसाय अब अपने बुढ़ापे को ढो रहा हैै। बाहुबली फिल्म देखकर आने वाले लोगो का कहना है कि अगर इसी तरह दक्षिणी फिल्मों का हिन्दी में तत्काल प्रसारण होता रहा तो  मुंबईया फिल्म के लिये भारी संकट खड़ा हो सकता है। यह सभी जानते हैं कि मुंबईया फिल्म उद्योग के पीछे की शक्तियां येनकेन प्रकरेण उसके संकटों का निवारण करने के लिये प्रयास करती है। हमने कहीं पढ़ा  था कि  एक समय अंग्रेजी फिल्मों के हिन्दी अनुवाद के प्रसारण दौर शुरु हुआ और उस समय जब मुंबईया फिल्म उद्योग के लिये संकट खड़ा होता दिखा तो उसे रोकने के  प्रयास हुए। कुछ समय बाद वह दौर थमा तो नहीं पर कम जरूर हो गया। बहरहाल बाहुबली फिल्म की सफलता के बहुत सारे अर्थ निकाले जा रहे हैं पर हमारा मानना है कि फिल्मों के प्रभाव क्षणिक ही होते हैं। ऐसी फिल्मों की निरंतरता ही बुढ़ा चुके मुंबईया फिल्म उद्योग को व्यवसायिक चुनौती दे सकती है।
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7/8/15

ज्ञानी कभी अनाचार नहीं करते-हिन्दी चिंत्तन लेख(gyani kabhi anachar nahi karate-hindi thought article)


                              हम लोग कई जगह चलते और बैठते समय अपने आसपास चींटियां तथा चैंटे घूमते देखते हैं। अनेक लोग अपने पांव तले रौंदने से बचाने के लिये अपनी दैहिक स्थिति बदल देते हैं तो कुछ लोग जबरन इन पर पांव रखकर इन्हें मार डालते हैं।  एक तीसरी स्थिति भी होती है कि हम चलते हुए इनको अनजाने में मार डालते हैं, पर यह चर्चा का विषय नहीं है। चर्चा का विषय यह है कि जो लोग शक्ति होते हुए भी चींटी नहीं मारते वह वास्तव में ज्ञानी है और जो जानबूझकर मारते हैं वह अज्ञानी है। इंसान के अंदर अन्य जीवों की अपेक्षा विवेक के कारण अधिक शक्ति होती है यह ज्ञानी जानते हैं पर अज्ञानी उसका दुरुपयोग कर स्वयं के सामने यह प्रमाणित करते हैं कि वह शक्तिशाली है। यही स्थिति उन अधिक धनी, उच्च पद और बाहूबलियों की होती है जा ेअपनी शक्ति को लेकर वह भ्रम मेें रहते हैं कि वह है भी कि नहीं।  यह भ्रम उन्हें प्रयोग के लिये प्रेरित करता है और वह कमजोर पर अपनी शक्ति का प्रयोग कर उसे प्रताड़ित कर मनोरंजन करते हैं  ऐसे शक्तिशाली ज्ञान की दृष्टि से अधिक कमजोर होते हैं और अंततः अपने पास आने के लिये संकट को निमंत्रण देते हैं।
                              कहा जाता है कि थोथा चना बाजे घना, जिसका आशय यही है कि जिसमें कम शक्ति या बुद्धि होती है वह उसके अधिक होने का प्रदर्शन के लिये निरर्थक प्रयास करता है। अनेक बार ऐसे लोग हास्यास्पद हरकतें करते हैं।  मुश्किल तब होती है पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर बैठे लोग अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में अपनी शक्ति का प्रदर्शन केवल इसलिये करते हैं ताकि समाज में जो उनके लिये भय या सम्मान है तो वह उन्हें स्वयं को दिखे।  आज स्थिति यह है कि समाज, अर्थ, कला और तथा धर्म के शिखर पर बौने चरित्र के लोग जब पहुंचत हैं तो वह खतरनाक भी हो जाते हैं।  यही कारण है कि हम आजकल अपराधों में छोटे की बजाय बड़े वर्ग के लोग लिप्त पाय जा रहे हैं।  बहरहाल जिन लोगों के पास धन, पद और प्रतिष्ठा के शिखर पर विराजमान हो जायें उन्हें अपनी अध्यात्मिक आंखें खुली रखना चाहिये।
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