10/5/08

अध्यात्म का ज्ञान और सांसरिक उत्पाद मिलने का एक ही स्थान

भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहलंे और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।

12/4/08

जिस्म की भूख पर हैं सब खामोश-हिन्दी शायरी

किसी भूखे को रोटी खिलाने का
उनकी किताबों में कोई इलाज नहीं
ढेर सारे कसूरों की सजाएं है
कसूरवार की मजबूरी समझने का
कोई कहीं रिवाज नहीं
जमाने को सिखाते हैं तमाम तरीके
जन्नत में जाने के
अपनी हकीकतो से दूर
ख्वाबों में जाने के
सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया
फिर भी उसके नाम पर सुनाते हैं
चंद किताबें पढ़कर फैसले
इंसान की भूख को पढ़ने का
कहीं कोई मिजाज नहीं
सभी को मोहब्बत का पैगाम देते हैं
पर जिस्म की भूख पर है खामोश
क्योंकि उस पर किसी का बस नहीं
अरे, ऊपर वाले का नाम लेकर
दुनियो को उसके दस्तूर पर चलाने वालों
उससे पूछ का बताओ
भूखा अगर रोटी की चोरी करे
तो उसकी सजा क्यों होना चाहिए
अगर वह इंसान के पेट में भूख नहीं बनाता तो
मान लेते उसका होगा वजूद
इस धरती पर भी कहीं

4/4/08

मनुस्मृति:सड़ी-गली और कम तौल कर वस्तु न बेचें

नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमर्हति
न चासारं न च नयूनं न दूरेण तिराहितम्


एक वस्तु के स्थान पर दूसरी, सड़ी गली, तोल में कम, परे से ठीक दिखने वाली पर खराब तथा ढकी हुई वस्तु नहीं बेचना चाहिए। जिस समय ग्राहक को वस्तु बेची जाये तो उसे उसकी वास्तविकता बता देना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस घोर कलियुग में तो व्यापार मेंे कदम-कदम पर धोखे हो रहे हैं। अब तो यह इतना खुलेआम होने लगा कि यह कहना कठिन है कि व्यापार में अब ईमानदारी नाम की भी रह गयी है। धोखाधड़ी को चतुराई और लुट को लोग व्यापार कहने लगे हैं। व्यापारी तो अब सब हो गये है-यहां तक कि साधू संत भी अपनी चीजें बेच रहे हैं और आश्रमों के नाम पर फाइव स्टार होटल बना रहे हैं। धर्म का केवल नाम रह गया है। उसमें भी तमाम तरह की धोखाधड़ी हो रही है। इस पर छोटे लोगों की क्या कहें बड़े-बड़े व्यापारी भी वह सब कर रहे हैं जिसे हमारे धर्मशास्त्रों ने वर्जित किया है। हालत यह है कि इधर ग्राहक से पैसे एंेठते हैं उधर तमाम तरह के दान देकर आयकर से छूट लेते हैं। सच तो यह है कि मनुस्मृति को शायद इसलिये प्रचलन से बाहर कर दिया गया है कि वह कई तरह के कटु सत्य दिखाते हुए आदमी की सही राह पर चलने के लिये प्रेरित करती है।

मनु स्मृति में मनुष्यों में सात्विकता का भाव स्थापित किया गया है। उसमें जीवन के हर पहलु पर विचार प्रकट किया गया है। व्यापार में नैतिकता की बात करने वाली इस पुस्तक में ग्राहक को न ठगने की हिदायत दी गयी है जबकि आजकल अनेक तरह के विज्ञापन धार्मिक स्थानों पर ऐसेी वस्तुओं के लिये भी किये जाते है जो वास्तव में वैसी नहीं होती जैसी की प्रचारित की जाता है। हम भारतवासी बहुत भावुक होते हैं और साधुसंतो पर विश्वास करते है। इसलिये कई तरह के ठगने वाले व्यापार उनकी आड़ में भी हो रहे है।

इसके बावजूद हमें अपने आचरण पर दृष्टि डालनी चाहिए और अगर हम व्यापार कर रहे हैं या सेवा कर रहे हैं तब हमें नैतिकता का पालन करना चाहिए।

23/3/08

अमेरिका विरोध का तार्किक आधार क्या है?

भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग हमेशा अमेरिका का विरोध करता है और उसके तर्क हमेशा ही खोखले होते हैं। अमेरिका ने अमुक देश पर हमला किया और अमुक देश में वह दखल दे रहा है। वह एक पूंजीवादी देश है अपनी दादागीरी दिखाता है आदि-आदि तमाम तरह के तर्क देकर लोग उसका विरोध करते हैं। आजकल मध्य एशिया में उसकी उपस्थिति को मुद्दा बनाकर उसका विरोध हो रहा है।

मैं कोई अमेरिका का समर्थक नहीं हूँ और न ही उसका साथ भारत के राजनीतिक संबंधों का विश्लेषण कर रहा हूँ। मेरा इरादा तो अमेरिका के साथ सामाजिक, साँस्कृतिक और आर्थिक संबधों पर दृष्टिपात करना है जिसके कारण आज भी अनेक बुद्धिजीवियों के दुष्प्रचार के बावजूद इस देश के आम नागरिकों में अमेरिका की खराब छवि नहीं बन पायी है। अधिकतर उच्च शिक्षा प्राप्त लोग वहाँ जाकर रोजगार प्राप्त करने का सपना संजोये हुए रहते हैं।
अमेरिकी समाज खुलेपन का समर्थक है। वहाँ धर्म, जाति और भाषा के नाम पर कोई बन्धन नागरिकों पर जबरन थोपा नहीं जाता। वहाँ की व्यवस्था उदारीकरण की पोषक है। वह अपने यहाँ किसी संस्कृति और धर्म की आगमन पर विचलित नहीं होते। सबसे बड़ी बात भारत से गए लोगों को वहाँ आर्थिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और साँस्कृतिक क्षेत्र में अपना मुकाम बनाने में जो सफलता मिली वह कहीं और नहीं मिली। अमेरिका का विरोध करने वाले किसी और देश का नाम बताएं तो जाने-हाँ ब्रिटेन और पश्चिमी रास्त्रों में कुछ लोगों को सफलता मिली है पर वह भी एक पश्चिमी राष्ट्र है और अमेरिका से उसका गठबंधन है। इसका अलावा अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्र कभी किसी पर अपनी संस्कृति थोपते नहीं है जबकि मध्य एशिया के राष्ट्र अपने राज्य की ताकत का उपयोग इसके लिए करते हैं। किसी दूसरे की संस्कृति न पनप सके इसलिए लिए कानून बना रखे हैं। आज हम अपने देश में जो पाश्चात्य सभ्यता फैलती देख रहे हैं वह लोगों की स्वेच्छा से फ़ैल रही है न कि कोई उन पर दबाव डाल रहा है।

कहने को मध्य एशिया में भारतीय भी बहुत हैं पर क्या वह अमेरिका की तरह खुली हवा में साँस ले पा रहे हैं? उस दिन मैं एक अख़बार में एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इजरायल के साथ मध्य एशिया के अन्य राष्ट्रों पर धर्म के आधार पर आतंकवाद बढाने का आरोप लगाया गया था। अमेरिका अपने यहाँ हमले के बाद आतंकवाद से लड़ रहा है। उसमें शक्ति है और वह अपने दुश्मनों को निपटा रहा है-अपने दुश्मन को निपटाने के लिए किसी को कहीं भी हमला करने का अधिकार है।
हमारे दर्शन के अनुसार राजनीति में अपने देश के प्रजा की रक्षा के लिए सजग रहते हुए साम,दाम, दंड और भेद चारों नीतियों को अपनाना चाहिए।हमारे दर्शन में व्यक्ति को अहिंसा की मार्ग पर चलने के लिए कहा जाता है पर राज्य को अपने शत्रु पर हमला कर उससे प्रजा और उसके धर्म की रक्षा का सन्देश भी उसमें है। कहने से सब अहिंसक और मानवतावादी नहीं हो जाते इसलिए राज्य और राजा को अपनी प्रजा की रक्षा के लिए हिंसा करनी ही पड़ती है। जिन विद्वानों ने लोगों को अहिंसक रहने का उपदेश दिया है उन्होने ही अपने देश की गुप्तचर व्यवस्था और सेना को मजबूत रखने का विचार दिया है। अपने गुप्तचरों के द्वारा शत्रु राष्ट्र की निगरानी करने का भी विचार दिया है।

अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और उसे अहंकार है-यह मान लिया पर कहीं मानवाधिकारों का उल्लंघन का जिस ताकत से वह मामला उठाता है कोई अन्य नहीं उठता। वह जिन राष्ट्रों के खिलाफ लड़ रहा है मानवाधिकारों के मामले में उनका रिकार्ड बहुत खराब है।कहने को अमेरिका हमारे से दूर है पर हमारे आसपास पडोसी देश अपने यहाँ मानवाधिकारों का जिस तरह उल्लंघन कर रहे हैं उस पर भी वह उन देशों को धमकाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप किसी व्यक्ति को अहिंसा के मार्ग पर चलने और साधू की तरह रहने के लिया प्रेरित किया जा सकता है पर किसी देश के राज्य प्रमुख को ऐसा सन्देश नहीं दिया जा सकता है। अमेरिका भारत का मित्र देश इसलिए है क्योंकि भारत उसके हितों को हानि नहीं पहुंचता जो उसका हानि पहुँचाते हैं उनको वह छोड़ता नहीं है। वह किसी का मित्र नहीं है उसके मित्र है अपने हित और जब उनको हानि नहीं पहुंचा सकते और ऐसा करने से हमारे देश को कोई लाभ नहीं है तो उसके साथ संबंधों में दूरी क्यों बनायी जाये? इसके साथ वह जिन देशों से लड़ रहा है क्या वह हमारे वास्तव में मित्र हैं या दिखावा करते हैं-यह देखकर ही अमेरिका का विरोध किया जा सकता है। अमेरिका के विरोध का कोई ठोस तार्किक आधार यहाँ के लोगों को समझ में नहीं आता। वैसे भी कौटिल्य के अर्थशास्त्र कि अनुसार अपने से संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र से संधि कर लेना चाहिऐ - क्या यह अमेरिका से मित्रता करने में लागू नहीं होता? अगर नहीं तो उसके ठोस विरोध का आधार क्या है? उसमें यह भी बताना चाहिए कि वह भारत को आगे किस तरह से हानि पहुंचा सकता है?

6/3/08

आज महाशिवरात्रि है

आज महाशिवरात्रि का पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। भगवान् शिव हमारे आराध्य देवता हैं और हिन्दू आध्यात्म में उनको सत्य स्वरूप माना जाता है। हमारे देश के लोग अनेक देवताओं की पूजा करते हैं और भगवान् शिव सब देवताओं के भी भगवान् हैं। उनको सत्य स्वरूप इसलिए भी माना जाता है क्योंकि उनका चरित्र ही शाश्वत सत्य के निकट दिखाई देता है।

समुद्र मंथन के समय विष पीकर उन्होने पृथ्वी पर जीवन का मार्ग प्रशस्त किया। उसके बाद भागीरथ की तपस्या से प्रभावित होकर श्री गंगा जी को प्रथ्वी पर लाने से पहले अपनी जटाओं में धारण कर उसके वेग से बचाया। अपने भक्तो की संक्षिप्त तपस्या से ही प्रसन्न होने के कारण उन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। आज उनका लोग स्मरण कर उनसे इसी तरह पृथ्वी पर जीवन की रक्षा की आशा करते हैं।

उन भगवान् शिव जी को मैं नमन करता हूँ और अपने मित्रों, पाठको और साथियों को शुभकामनाएँ देता हूँ।

27/2/08

आदमी की पहचान का प्रश्न-हिन्दी आलेख

प्रत्येक आदमी की जो पहचान है वह उसकी जाति, धर्मा, भाषा, क्षेत्र से है और हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते। यह पहचान आखिर छिपाई कैसे जा सकती है? कहीं किसी विशेष पहचान के लोगों की बहुतायत है तो वहाँ अल्पसंख्या वाले अपने को कमजोर अनुभव करते हैं और कभी उनको इसके लिए जलील भी होना पड़ता है। इस पर तमाम तरह के बुद्धिजीवी लोग अपने ख्याल रखते हैं-'ऐसा नहीं होना चाहिए' 'यह ग़लत है' और 'इस अन्याय को रोकना चाहिए'। इसके साथ ही बड़ी-बड़ी बहस होती हैं। मगरा नतीजा धाक के तीन पात। ऐसे विवाद कोई किसी एक देश में होते हैं यह बात नहीं बल्कि ऐसे संघर्षों से पूरी दुनिया का इतिहास भरा पडा है।


बहस करना विचार व्यक्त करना अलग बात है और समस्या के हल के लिए ईमानदारी से काम करना अलग बात है। हम हर पहचान के आदमी को सम्मान देने की बात तो करते हैं पर क्या वह पहचान किसी वास्तविक धरातल पर दिखाईं देती हैं? कभी इस पर विचार नहीं करते। आख़िर हम अपनी दूसरों की पहचान को देखते ही क्यों हैं? कोई अमुक, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र का आदमी है-इस बात पर नज़र डालते ही क्यों हैं? हम तय कैसे करते हैं और कोई हमारे बारे में कैसे तय करता है? हम परंपरा से अलग होकर यह क्यों नहीं कहते कि यहाँ किसी को उसकी वर्त्तमान रूप में प्रचलित पहचान से नहीं देखा जाना चाहिए। जब तक अपनी और दूसरों की वर्तमान प्रचलित पहचान के साथ चलेंगे तब तक समाज में विवाद और फ़साद कम नहीं होंगे। विश्व के किसी इलाक़े में बहुसंख्यक पहचान वाले अपने समूहों से कम त्रस्त नहीं होते पर उनका गुस्सा जब सामूहिक रूपसे उतरता है को उसका सबसे अधिक शिकार पृथक पहचान वाले अल्प संख्या वाले लोगों के समूह बनते हैं-पर इसमें आम आदमी नहीं बल्कि उन लोगों के समूह प्रमुख जिम्मेदार होते हैं क्योंकि जब अपने सदस्यों पर नियंत्रण नहीं रख पाते तब वह उनका ध्यान बंटाने के लिए ऐसे विवाद खड़े करते हैं ताकि अपने नेतृत्व की कमी छिपाने के लिए लोगों का ध्यान कहीं ओर लगाया जाये।हम कहते हैं कि लोगों को उसकी प्रचलित पहचान से मत देखो तो सवाल है की जब हम सबके मन में है यानि हमारे खून में है तो उससे अलग कैसे हुआ जा सहकता है।

पहले हम पाश्चात्य विज्ञान की बात कर लें। उसके अनुसार हम जो देखते, सुनते अनुभव करते हैं वह हमारे रक्त मे स्थापित हो जाता है और जब अवसर आता है तब वह स्वत सामने आता है। किसी का चेहरा और शब्द वैसे के वैसे ही नहीं हम आत्मसात करते वरन वह हमारे शरीर में मौजूद रक्त के कणों में वह सब विलीन हो जाता है। इसका आशय यह है यह जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की पहचान हमारे खून में होती है। उसका कोई भौतिक स्वरूप हमारी देह में नहीं होता. जब कान से शब्द सुनते, आँखों से दृश्य देखते और स्पर्श से अनुभव करते हुए वह पहचान हमारी बुद्धि में आती है।

उसी तरह हमारा दर्शन भी कहता है की हमारी इंद्रियाँ रूप, शब्द, स्पर्श, गंध और रस से ग्रहण करती हैं और वही देह में विकार भी पैदा करतीं हैं। हम अनेक बार तमाम तरह की पहचान के लोगों पर अन्याय के मसले पर मुखर होते हुए उनकी संज्ञा अपने आधार पर तय कर देते हैं। क्या वह एक वास्तविकता है? नहीं! यह एक भ्रम है। कम से कम हमारा दर्शन तो यही कहता है। मनुष्य देह में वह विकार हैं जो उसे अन्याय और दूसरे पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करते हैं। हमने कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया किसी और ने किया पर हम कभी नहीं करेंगे इसकी गारंटी कौन दे सकता है। गुण ही गुणों को बरतते हैं और जब हमारा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण ही नहीं है तो हम कैसे कह सकते हैं की 'उसने किया है और हमने किसी पर अन्याय नहीं किया"। कभी हम भी अपने अहंकार में आकर वह सब कर सकते हैं जो किसी और ने किया होता है।

हम बचपन से लेकर बड़े होते हैं-तब अपने माता-पिता और गुरुओं से ही समाज को विभाजित करने वाले शब्द सीखते हैं। कई तरीके की अच्छी और बुरी विचारधाराएँ उनके कथनों को सुनते हुए हमारी स्मृतियों में बस जातीं ऑरा हमा उनसे कभी अलग नहीं हो पाते और उनसे अलग होने के लिए हमें नया अध्ययन करने की आवश्यकता होती है पर उसका ना तो अवसर मिलता है और न आवश्यकता-इच्छा अनुभव होती है। समय अनुसार उस पर चलते जाते हैं। सिद्धांतों की बात बहुत करते हैं पर उससे अलग नहीं हो सकते इसलिए ऐसी बहसों में उलझ जाते हैं जो बाद में निरर्थक साबित होतीं हैं ।

कुल मिलाकर हमारे मन में समाज, व्यक्ति, भाषा, जाति, और भाषा को लेकर हमारे अंदर पूर्वाग्रह इस तरह स्थापित हो जाते हैं कि हम उनको अपनी पहचान समझने लगते हैं। जब तक इनसे मुक्त होने का मन नहीं बनाएँगे तब तक विभिन्न समाजों में द्वंद्व और विवाद बने रहेंगे यह अलग बात है कि कभी हम स्वयं इसका हिस्सा होंगे तो कभी बाहर बैठकर चर्चा करेंगे। (शेष फिर कभी)

22/2/08

वह रोकना चाहते बाहर से आगमन-साहित्यक कविता

अपने स्वाभिमान की रक्षा की बात
चाहते अपने लिए आजाद रात
ऊंचे दिखाते अरमान
अपने आप को समझें महान
पर खौफ के साए में ही जीते वह लोग
अपने इलाकों में आते पंछियों पर करते घात
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

अपने घर से बाहर जाते लोगों पर बस नहीं
जाकर तरक्की करेंगे कहीं
उनके नाम पर अपने घर में जश्न मनाएंगे
सबको अपने सामने चमकाएंगे
अपने घर का पलायन उन्हें सुहाता
पर घर पर किसी पंछी का चहचहाना उनको नहीं भाता
आदमी को पहचानने का दावा
देख नहीं पाते उसका मन
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

सच से परे जीते वह लोग
दिमाग में हैं लड़ने का रोग
जिस सर्वशक्तिमान ने बनायी
यह धरती और इंसान
वह भी नहीं कर पाता
अपने कब्जे में इंसान का मन
नहीं रोक सकता
इधर से पलायन और उधर से आगमन
सजाये बैठे हैं अपने लिए लोहे के महल
करते हैं भ्रम फैलाने की पहल
दुनिया के इस सच से परे
आदमी नहीं चलाता है उसे उसका मन
घूमती दुनिया और घड़ी कभी नहीं रुकती
कहीं उजड़ता तो कहीं बसता है चमन
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

2/2/08

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं (सर्वशक्तिमान-३)

भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और आध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ:: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता। मैं स्वयं ही इस बात का उदाहरण देता हूँ। तमाम तरह के आध्यात्म ग्रंथ मैने बचपन में ही पढ़े और आज भी बड़ी रूचि के साथ पढ्ता हूँ। जब मेरी उम्र आठ साल थी तबा पडोस में रहने वाले एक पन्डित जी की बहू से मेरी माताजी ने पढ़ने के लिए तुलसीदास जी की श्री राम चरितमानस ली थी। मैं भी उसे पढ़ने लगा। मैने उसे धार्मिक भावना से नहीं कहानी की दृष्टि से पढ़ा। उसे कई बार पढ़ा। एक दिन पन्डित जी ने अपनी बहू से वह माँगी तो उसने उनको बताया की ''वह पडोस का लड्का है न वह उसे पढता है।''
उन्होने मुझे बुलाया और कहा'जब पढ़ लो तो वापस कर देना, पर इसको आदर से रखना। तुम इससे बहुत कुछ सीखोगे।''

फिर कभी उन्होने वह मुझसे वापस नहीं माँगी और जब हमने वह मकान खाली किया तब मैं उनको वापस कर आया, पर तब तक मेरे अंदर वह बीज अनुकुरित हो चुका था जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। फिर तो मैने वाल्मीकि रामायण को पढ़ना शुरू किया और अपने जेब खर्च से मैं वह सब धार्मिक किताबें ले आया जो भारतीय अध्यात्म का आधार स्तंभ हैं। आज जब मैं किसी आध्यात्म विषय पर लिखता या बोलता हूँ तो अधिकतर लोग विद्वान होने का अहसास पाल लेते हैं। अब यह मैं नहीं जानता की ऐसा है कि नहीं पर मुझे अपने तर्क भी गढने की आदत भी है और में भी कभी-कभी ऐसे सत्संगों में जाता हूँ पर कुछ नया सुनने से अधिक कोई विचार नहीं आता. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इतना ज्ञान तो मैं किताबों में पड़ चुका हूँ पर फिर भी वहाँ जाना मुझे अच्छा लगता है। इसलिए जब आज कल के तथाकथित बाबा लोग भारत के प्राचीनतम परंपरा के महिमा की बात करते हैं तो ऐसा लगता है की कोई ग्राहकों का समूह उनके सामने खड़ा है जिसे वह भारतीय आध्यात्म- जिसका कोई पेटेंट नहीं है- उसे बेच रहे हैं। वह हमेशा ही शिष्य को सिखाते रहते हैं और वह सीखता नहीं है और हर ख़ास मौके पर उनके दर्शन करने चला जाता है और वहाँ हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट अपने धर्म का पालन करता है जिसका भारत की प्राचीन गुरु-परंपरा से कोई लेना-देना हो मुझे नहीं लगता। एक बात अपने निष्कर्ष के तौर पर कहना चाहता हूँ कि आज के तथाकथित गुरुओं को एकलव्य जैसा शिष्य चाहिऐ जो उनको आज के युग में अपना अंगूठा काटकर न भेंट करे-क्योंकि उससे उनकी आश्रम फाईव स्टार आश्रमों थोडे ही बन पायेगा- बल्कि दूसरों को अंगूठा दिखाकर जुटाए पैसे से उनको भेंट दे पर अर्जुन जैसा शिष्य नहीं चाहिए जो दुष्कर्म करने वालों का समर्थन करने पर उनका प्रतिवाद करे। इन संतो और भक्तों को पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं है भले ही कितना भी बखान कर लें. (क्रमश:)