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03/02/12

विकास और धूल-हिन्दी कविताएँ (vikas aur dhool-hindi kavitaen)

सड़क पर पहियों के नीचे
कुचली जाती धूल
आँख और मुंह में घुसकर
अपनी ताकत दिखाती है,
कहें दीपक बापू
ऊंची इमारतों के सामने
कैसे अस्तित्व बचाएं
तेज रोशनी से चमकते बल्बों
को कैसे चिढ़ाएं
यही वह सिखाती है।
--------------
विकास सड़क पर
पहियों की सवारी कर रहा है,
जेब खाली है
आदमी उधार के कागज़ भर रहा है।
कहें दीपक बापू
कर्ज़ लेकर पीने के लिए घी
खरीद भी लें
असली होने का भरोसा नहीं
पेट वैसे भी
                                                            ज़हरीली गैसों से मर रहा है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com
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27/01/12

बसंत पंचमी-आंनद तो पूरे महीने लिया जा सकता है-हिन्दी लेख (A hindi article or lekh-basant panchami-anand ka mahina, month of enjoyment)

              इस बार की बसंत पंचमी में सर्दी का प्रकोप घेर कर बैठा है। कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा कि मौसम समशीतोष्ण हुआ हो, अलबत्ता लगता है कि सर्दी थोड़ा कम है पर इतनी नहीं कि उसके प्रति लापरवाही दिखाई जा सके। जरा लापरवाही शरीर को संकट में डाल सकती है। 
                 अगर पर्व की बात करें तो बसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। यह मौसम खाने पीने और घूमने के लिये बहुत उपयुक्त माना जाता है-यानि पूरा माह आनंद के लिये उपयुक्त है। समशीतोष्ण मौसम हमेशा ही मनुष्य को आनंद प्रदान करता है। वैसे हमारे यहां भले ही सारे त्यौहार एक दिन मनते हैं पर उनके साथ जुड़े पूरे महीने का मौसम ही आनंद देने वाला होता है। ऐसा ही मौसम अक्टुबर में दिपावली के समय होता है। बसंत के बाद फाल्गुन मौसम भी मनोरंजन प्रदान करने वाला होता है जिसका होली मुख्य त्यौहार है। दिवाली से लेकर मकर सक्रांति तक आदमी का ठंड के मारे बुरा हाल होता है और ऐसे में कुछ महापुरुषों की जयंती आती हैं तब भक्त लोग कष्ट उठाते हुए भी उनको मनाते हैं क्योंकि उनका अध्यात्मिक महत्व होता है। मगर अपने देश के पारंपरिक पर्व इस बात का प्रमाण हैं कि उनका संबंध यहां के मौसम से होता है।
                प्रसंगवश फरवरी 14 को ही आने वाले ‘वैलंटाईन डे’ भी आजकल अपने देश में नवधनाढ्य लोग मनाते हैं पर दरअसल मौसम के आनंद का आर्थिक दोहन करने के लिये उसका प्रचार बाजार और उसके प्रचार प्रबंधक करते हैं।
                  बसंत पंचमी पर अनेक जगह पतंग उड़ाकर आनंद मनाया जाता है हालांकि यह पंरपरा सभी जगह नहीं है पर कुछ हिस्सों में इसका बहुत महत्व है।
             बहुत पहले उत्तर भारत में गर्मियों के दौरान बच्चे पूरी छूट्टियां पतंग उड़ाते हुए मनाते थे पर टीवी के बढ़ते प्रभाव ने उसे खत्म ही कर दिया है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि पहले लोगों के पास स्वतंत्र एकल आवास हुआ करते थे या फिर मकान इस तरह किराये पर मिलते कि जिसमें छत का भाग अवश्य होता था। हमने कभी बसंत पंचमी पर पतंग नहीं उड़ाई पर बचपन में गर्मियों पर पतंग उड़ाना भूले नहीं हैं।
                आज टीवी पर एक धारावाहिक में पंतग का दृश्य देखकर उन पलों की याद आयी। जब हम अकेले ही चरखी पकड़ कर पतंग उड़ाते और दूसरों से पैंच लड़ाते और ढील देते समय चरखी दोनों हाथ से पकड़ते थे। मांजा हमेशा सस्ता लेते थे इसलिये पतंग कट जाती थी। अनेक बाद चरखी पकड़ने वाला कोई न होने के कारण हाथों का संतुलन बिगड़ता तो पतंग फट जाती या कहीं फंस जाती। पतंग और माजा बेचने वालों को उस्ताद कहा जाता था। एक उस्ताद जिससे हम अक्सर पतंग लेते थे उससे एक दिन हमने कहा-‘मांजा अच्छा वाला दो। हमारी पतंग रोज कट जाती है।’
            उसे पता नहीं क्या सूझा। हमसे चवन्नी ले और स्टूल पर चढ़कर चरखी उतारी और उसमें से मांजा निकालकर हमको दिया। वह धागा हमने अपने चरखी के धागे में जोड़ा  । दरअसल मांजे की पूरी चरखी खरीदना सभी के बूते का नहीं होता था। इसलिये बच्चे अपनी चरखी में एक कच्चा सफेद धागा लगाते थे जो कि सस्ता मिलता था और उसमें मांजा जोड़ दिया जाता था।
           बहरहाल हमने उस दिन पतंग उड़ाई और कम से कम दस पैंच यानि पतंग काटी। उस दिन आसपास के बच्चे हमें देखकर कर हैरान थे। अपने से आयु में बड़े प्रतिद्वंदियों की पंतग काटी। ऐसा मांजा फिर हमें नहीं मिला।     यह पतंग उड़ाने की आदत कब चली गयी पता ही नहीं चला। हालांकि हमें याद आ रहा है कि हमारी आदत जाते जाते गर्मियों में इतने बड़े पैमाने पर पतंग उड़ाने की परंपरा भी जाती रही। पहले क्रिकेट फिर टीवी और इंटरनेट ने पतंग उड़ाने की परंपरा को करीब करीब लुप्त ही कर दिया है।
         एक बात हम मानते हैं कि परंपरागत खेलों का अपना महत्व है। पहले हम ताश खेलते थे। अब ताश खेलने वाले नहीं मिलते। शतरंज तो आजकल भी खेलते हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता होने के कारण साथी खिलाड़ी मिल जाते हैं। जितना दिमागी आराम इन खेलों में है वह टीवी वगैरह से नहीं मिलता। हमारे दिमागी तनाव का मुख्य कारण यह है कि हमारा ध्यान एक ही धारा में बहता है और उसको कहीं दूसरी जगह लगाना आवश्यक है-वह भी वहां जहां दिमागी कसरत हो। टीवी में आप केवल आंखों से देखने और कानों से सुनने का काम तो ले रहे हैं पर उसके प्रत्युत्तर में आपकी कोई भूमिका नहीं है। जबकि शतरंज और ताश में ऐसा ही अवसर मिलता है। मनोरंजन से आशय केवल ग्रहण करना नहीं बल्कि अपनी इंद्रियों के साथ अभिव्यक्त होना भी है। अपनी इंद्रियों का सही उपयोग केवल योग साधना के माध्यम से ही किया जा सकता है।  इसके लिये आवश्यक है कि मन में संकल्प स्थापित किया जाये।
        वैसे बसंत पंचमी पर लिखने का मन करता था पर किसी अखबार में छपने या न छपने की संभावनाओं के चलते लिखते नहीं थे पर अब जब इंटरनेट सामने है तो लिखने के लिये मन मचल उठता है। अब सुबह घर में सुबह बिजली नहीं होती। हमारे घर छोड़ने के बाद ही आती है। इधर रात आये तो पहले सोचा कुछ पढ़ लें। एक मित्र के ब्लाग पर बसंत पंचमी के बारे में पढ़ा। सोचा उसे बधाई दें पर तत्काल बिजली चली गयी। फिर एक घंटा बाद लौटी तो अपने पूर्ववत निर्णय पर अमल के लिये उस मित्र के ब्लाग पर गये और बधाई दी। तब तक इतना थक चुके थे कि कुछ लिखने का मन ही नहीं रहा। वैसे इधर सर्दी इतनी है कि बसंत के आने का आभास अभी तो नहीं लग रहा। कुछ समय बाद मौसम में परिवर्तन आयेगा यह भी सच है। बसंत पंचमी का एक दिन है पर महीना तो पूरा है। इस अवसर पर ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई। उनके लिये पूरा वर्ष मंगलमय रहे।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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14/01/12

चंद पल की मुलाकात-हिन्दी शायरियाँ (chand pal ki mulakat-hindi shayriyan kavitaen or poem)

चंद पलों की मुलाकात
ज़िंदगी भर का रिश्ता नहीं बनाती,
इंसानों की नीयत और ख्याल
बदलते देर नहीं लगती,
पल भर में मिलने की खुशी
हक़ीक़तों के सामने आते ही होती काफ़ूर
फिर हमेशा सताती।
कहें दीपक बापू
फिर भी बेजुबानों पर भरोसा किया जा सकता है
जुबान वालों  का क्या
पल भर में उनकी बात बदल  जाती,
किसी की नीयत समझने का दावा करना बेकार है
जो बार बार मतलब देखकर बदल जाती।
-----------------
इश्क में आशिक
आसमान से तारे तोड़ने की
बात कुछ यूं करते हैं,
गोया उसके खरीदने के लिए
ज़मीन पर किस्तें भरते हैं।
कहें दीपक बापू
वादों का क्या
चाहे जब जिससे जितने कर लो,
बस अपना भरोसा किसी के दिल में भर लो,
कहने वालों का क्या
भले बाद में फँसने वाले
वादाखिलाफी पर आहें भरते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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09/01/12

फेसबुक पर वार्तालाप में भाषा का तोतलापन अखरता है-हिन्दी लेख (fecebook par vartalap mein bhasha ka totlapan akharta hai-hindi lkeh)

        फेसबुक पर आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि पुराने लोग भी सक्रिय हैं पर उनमें अधिकतर लेखक नहीं है इसलिये हिन्दी साहित्य की परंपराओं के ज्ञान का उनमें अभाव है। ऐसे में नयी पीढ़ी के लोगों से यह अपेक्षा तो करना कठिन है कि वह उन्हें समझ सकें खासतौर से जब वह स्वरचनाकर्म से अधिक कट पेस्ट यानि किसी का पाठ उठाकर अपने पृष्ठ पर रखने के आदी हों। हमारे प्रचार माध्यमों ने तो नयी पीढ़ी में यह बात स्थापित कर दी है कि ब्लॉग, ट्विटर या फेसबुक पर केवल आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, फिल्म, टीवी तथा कला क्षेत्र के शिखर पुरुष ही लिखते हैं और उनकी ही परवाह करना चाहिए। आम लेखक तो फोकटिया हैं और उनकी कोई बात सम्मानीय या पठनीय नहीं है।
       यही कारण कि फेसबुक तथा ब्लॉग पर जब हमने अपनी रचनायें बिना नाम के देखीं तो वहां प्रतिकूल टिप्पणियां लिखीं। ऐसा लगता है कि बजाय प्रतिकूल टिप्पणियां करने के साथ उनको यह बात समझाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में साभार रचनायें लेने की परंपरा है। उसमें लेखक का नाम अवश्य दिया जाता है। जिन टीवी चैनलों के पास किसी खास समाचार का दृश्यव्य प्रसारण नहीं है वह दूसरे से साभार लेते हैं। हालांकि यह उदाहरण समझाने के लिये पर्याप्त या उचित नहीं है। हिन्दी टीवी चैनल साभार प्रसारण लेते हैं पर वह या तो विदेशी चैनल का या फिर देश का अंग्रेजी चैनल हो। मतलब यह कि हिन्दी वाले की हिन्दी से सोतिया डाह तो रहती ही है। यह बात इंटरनेट पर भी दिखाई देती है जब चोरी के पाठ प्रकाशित होते दिखते हैं।
         बहरहाल फेसबुक पर एक वेबसाईट संचालिका ने हमसे अपने पाठ प्रकाशित करने की अनुमति मांगी तो हमने उसे सहर्ष नाम प्रकाशित करने की शर्त पर दी। उसने ऐसा किया भी! उसकी इस क्रिया पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। दरअसल उसने भ्रष्टाचार पर उस कविता को ही लिया जो कि हमारी इस विषय पर लिखी गयी सबसे हिट कविता है। इसी कविता ने एक नहीं दो ब्लॉग को हिट बना रखा है। हमें यह देखकर हैरानी हो रही है कि केवल ब्लॉग को नियमित या अपडेट बनाये रखने के लिये लिखी गयीं कविताओं ने अधिक पाठक जुटायें हैं बनिस्बत उन बड़े लेखों के जो बड़े मनोयोग से लिखे गये। इसका कारण यह भी है कि नयी पीढ़ी के युवा ज्यादा समय खराब करने के थोड़े समय में अधिक पढ़ना चाहता है। वह कहानी भी कविता में पढ़ना चाहता है। अगर विषय गंभीर हो तो एक लघु कथा लिखने से काम चल सकता है पर हास्य हो तो कविता ही ठीक जमती है।
          हमें इंटरनेट पर सक्रियता से जहां खुशी मिली वहीं इस बात का दुःख भी होने लगा है कि नयी पीढ़ी भाषा के लिहाज से तोतली हो रही है। रोमन लिपि में अंग्रेजी और हिन्दी का मिश्रण प्रसन्नता नहीं दे सकता। हैरानी की बात है कि हिन्दी टूलों की उपलब्धता के चलते यह हो रहा है। खासतौर से जब यह जीमेल पर ही उपलब्ध हो और प्रयोक्ता उसके उपयोग में असमर्थ हों। लड़के लड़कियां अगर यह सोच रहे हैं कि वह अभिव्यक्त होकर कोई बड़ा नाम करेंगे तो वह गलतफहमी में हैं। फेसबुक पर लिखने के बाद प्रतिक्रियायें मिल जाती हैं पर कालांतर में वह भी बोरियत लगने लगेगी। फेसबुक पर तो यह आशा करना ही बेकार है कि कोई अपने अभिव्यक्त होने की लंबी पारी खेल सकता है। इससे अच्छा तो यह है कि ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर ब्लॉग लिखकर प्रयास करना श्रेयस्कर है। फेसबुक में केवल अपने समूहों से जुड़े हुए लोग ही साथी होते हैं जबकि ब्लॉग एक सार्वजनिक पत्रिका की तरह उपयोग में लाये जा सकते हैं। जिन युवक युवतियों में मन में हिन्दी लिखने का आनंद प्राप्त करने की इच्छा है वह फेसबुक के साथ ही ब्लॉग जरूर बनायें। कुछ समय तक उनको टिप्पणियां मिलेंगी पर बाद में बंद हो जायेंगी मगर सर्च इंजिनों में वह हमेशा जीवंत बना रहेगा। ऐसे में अगर केवल अपने अंदर बैठे लेखक को जिंदा रखने के लिये एकांत यात्रा करनी होगी। हालांकि ब्लॉग पर फेसबुक की तरह लिखना अधिक परिणामदायक नहीं रहेगा ऐसे में हिन्दी टूलों के साथ प्रभावी हिन्दी का भी ज्ञान रखना होगा। वह केवल पुराने लेखकों की रचनाओं से मिल सकता है। नये लेखकों ने तो अंग्रेजी का मिश्रण करना प्रारंभ कर दिया है।      
              फेसबुक पर पिछले एक दो महीने से हम अधिक सक्रिय रहे हैं। वहां अपने ब्लॉग के लिंक देखने अक्सर जाना होता है। अनेक महानुभावों ने संपर्क किया है। उनसे चैट में भाषा का तोतलापन अखरता है। हम आपसी संवाद पर अपने साथियों पर कोई आक्षेप नहीं कर रहे पर इतना तय है कि यह रोमन लिपि में लिखना या पढ़ना हमको तोतलापन लगता है। चूंकि लेखक हमेशा भावुक होता है इसलिये हमारे लिये वार्तालाप के समय टिप्पणियां करना ठीक नहीं लगता। यह सही है कि ऐसे संवाद के समय शीघ्रता होती है इसलिये कही दूसरी जगह से कट पेस्ट करने में देरी करना अच्छा नहीं लगता है पर अभ्यास हो जाये तो कुछ भी असहज नहीं है। हिन्दी तो फिर भी सरलता से लिखी जाती है पर चीनी लिखने में कठिन है मगर फिर भी चीन के नागरिक उसमें लिखते हुए संकोच नहीं करते। हमारा उद्देश्य आक्षेप करना नहीं बल्कि नयी पीढ़ी के लोगों को यह समझाना है कि भाषा की कमी उनकी अभिव्यक्ति को कमजोर बनाने के साथ विचार को क्षणिक आवेग के रूप में प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात आत्मीयता का वैसा संबंध वह कभी नहीं बना सकती जैसे कि हमारे अपने साथ ब्लॉग लेखकों के साथ प्रभावी हिन्दी के कारण बने।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
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02/01/12

फोकट में ईमानदारी-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (fokat mein imandari-a short hindi comedy satire or short story,hindi kahani)

                विद्यालय के संचालक ने प्राचार्य को बुलाकर कहा कि-‘‘देखो मैंने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया है। तुम अपने साथ शिक्षकों को मेरे साथ रैली में भाग लेने के लिये तैयार रहने के लिये कहो। विद्यालय के छात्रों के लिये देश में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के संबंध में विशेष ज्ञान देने का प्रबंध करो। मैं चाहता हूं कि मेरे साथ मेरे विद्यालय का नाम भी प्रचार के शीर्ष पर पहुंचे।’’
           प्राचार्य ने कहा-‘‘महाशय, आपका आदेश सिर अंाखों पर! मगर इसी अंादोलन की वजह से हमारे विद्यालय के शिक्षक अब जागरुक हो गये हैं। आप जितने वेतन की रसीद पर हस्ताक्षर करते हो उसका चौथाई ही केवल भुगतान करते हैं। वह चाहते हैं कि कम से कम आधी रकम तो दें। विद्यार्थियों के पालक भी तयशुदा फीस से अलग चंदा या दान देकर नाराज होते हैं। ऐसे में आप स्वयं भले ही इस आंदोलन में सक्रियता दिखायें पर विद्यालय की सक्रियता पर विचार न करें, संभव है यह बातें आपके विरुद्ध प्रचार का कारण बने।’’
संचालक ने कहा-‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, यह भ्रष्टाचार है! कतई नहीं, यह तो मेरा निजी प्रबंधन है। हम तो केवल सरकारी भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं!’’
            प्राचार्य ने कहा-‘हमारे पास कुछ मदों मे सरकारी पैसा भी आता है।’’
संचालक ने कहा-‘‘वह मेरा निजी प्रभाव है। ऐसा लगता है कि तुम देश का भ्रष्टाचार रोकने की बजाय उसकी आड़ में तुम मेरे साथ दाव खेलना चाहते हो! तुम मेरा आदेश मानो अन्यथा अपनी नौकरी खोने के लिये तैयार हो जाओ।’’
             आखिर प्राचार्य ने कहा-‘‘आपका आदेश मानने पर मुझे क्या एतराज हो सकता है? पर संभव है कि छात्रों के पालक अपने बच्चों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध तिरस्कार का भाव देखकर नाराज हो जायें। आप तो जानते हैं कि अधिकतर माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर बड़े पद पर पहुंचे। बड़ा पद भी वह जो मलाईदार हो। ऐसे में अगर उसकी निष्ठा कहीं ईमानदारी से हो गयी तो संभव है वह अधिक पैसा न कमा पाये। भला कौन माता पिता चाहेगा कि उसका बेटा मलाई वाली जगह पर बैठकर माल न कमाये। सभी चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार खत्म हो पर उनके घर में ईमानदार पैदा हो यह कोई नहंीं चाहता। कहंी ऐसा न हो कि हमारे इस प्रयास पर पालक नाराज न होकर अपने बच्चों को दूसरे स्कूल पर भेजना शुरु करें और आपकी प्रसिद्धि ही विद्यालय की बदनामी बन जाये।’’
             संचालक कुछ देर खामोश रहा और फिर बोला-‘‘तुम क्या चाहते हो मैं भी वहां न जाऊं?’
प्राचार्य ने कहा-‘‘आप जाईये, पर अपने स्कूल का परिचय न दें। आप सारे देश में ईमानदारी लाने की बात अवश्य करें पर उसे अपने विद्यालय से दूर रखें।’’
           संचालक खुश हो गया। प्राचार्य बाहर आया तो एक अन्य शिक्षक जिसने दूसरे कमरे में यह वार्तालाप सुना था उससे कहा-‘‘आपने मना किया तो अच्छा लगा। बेकार में हमारे हिस्से एक ऐसा काम आ जाता जिसमें हमें कुछ नहीं मिलता। यह संचालक वैसे ही छात्रों से फीस जमकर वसूल करता है पर हम शिक्षकों को देने के नाम पर इसकी हवा निकल जाती है। वैसे आपके दिमाग में ऐसा बोलने का विचार कैसे आया?’’
         प्राचार्य ने कहा-‘‘अपनी जरूरतें जब पूरी न हों तो ईमानदारी की बात करना भी जहर जैसा लगता है। वैसे फोकट में भ्रष्टाचार का विरोध करना मैं भी ठीक नहीं समझता। खासतौर से जब इस आंदोलन को चलाने वाले घोषित रूप से चंदा लेने वाले हों। हमें अगर कोई पैसा दे तो एक बार क्या अनेक बार ऐसे आंदोलन में जाते। फोकट में टांगें तोड़ना या भाषण देना तो तब और भी मुश्किल हो जब हमें यही अपनी मेहनत का पैसा कम मिलता है।’’
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28/12/11

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) के लिये आत्ममंथन का समय-हिन्दी लेख (anna hazare ke liye atmamanthan sa samay-hindi lekh or article)

              अन्ना हज़ारे ने अपना अनशन तथा जेलभरो आंदोलन फिलहाल स्थगित कर अच्छा ही किया है। जब हम अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करते हैं तो उसके राजनीतिक पक्ष की चर्चा अधिक होती है और सामाजिक पक्ष पीछे रह जाता है। हमने जब भी इस पर लिखा है सामाजिक पक्ष को अधिक छूने का प्रयास किया है। एक बात के लिये यह आंदोलन हमेशा याद रखा जायेगा कि इसने संपूर्ण देश के समस्त समाजों के सभी लोगों को चिंत्तन और मनन के विवश किया। मूल प्रश्न भ्रष्टाचार से जुड़ा होने के बावजूद ऐसे अनेक विषय हैं-जिनका संबंध कहीं न कहीं उससे है-जिन पर चर्चा हुई। जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आमतौर से सरकारी क्षेत्र के भ्रष्टाचार की बात होती है पर उद्योग, व्यापार, कला, तथा धर्म के क्षेत्र के कदाचार छिप जाता है। संभव है हम जैसे चिंतकों के इस मत से कम ही लोग सहमत होंगे कि हमारे समाज का यह सामान्य दृष्टिकोण ही ऐसे भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार हैं जिसमें धन को सर्वाधिक महिमामय माना जाता है। सिद्धांतों की बात करना सभी को अच्छी लगती है पर जहां धन का मामला आये वहां सभी की आंख बंद हो जाती है।
             अपने आंदोलन के अकेले शीर्षक अन्ना साहेब हैं पर उनके विस्तार में अनेक प्रश्न चिन्ह थे। किसी पाठ में फड़कते शीर्षक के साथ बहुत सारे शब्द होते हैं जिनमें विषय से जुड़े सार का सार्थक होना आवश्यक है। इसके अभाव में शीर्षक एक नारा होकर रह जाता है। हम जैसे गीता साधकों के लिये यह आंदोलन अध्ययन और अनुसंधान के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इस दौरान हमने केवल अन्ना के वाक्यों के साथ ही उनकी पर्दे पर दिख रही गतिविधियों को बहुत ध्यान से देखा। अन्ना के बारे में दूसरे लोग और दूसरे लोगों के बारे मे अन्ना क्या कह रहे हैं इसमें हमने दिलचस्पी नहीं रखी बल्कि अन्ना अपने इस आंदोलन से इस समाज के लिये क्या नया ढूंढ रहे हैं यह प्रश्न हमेशा हमारे लिये महत्वपूर्ण रहा है। अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा रही और हमारा मानना है कि ज्ञानी और ध्यानी अनशन जैसी हल्की गतिविधि से तब तक दूर रहें जब तक यह आवश्यक न हो। आंदोलनों और अभियानों का शांतितिपूर्ण प्रदर्शन करना ठीक है पर अनशन जैसी गतिविधि विचलित कर देती है।
               अन्ना ने जब अपना अनशन स्थगित किया तो प्रचार माध्यम उनका मखौल उड़ा रहे हैं। इन्हीं प्रचार माध्यमों ने उनके इसी आंदोलन पर अपने विज्ञापनों का समय पास कर कमाई की। टीवी चैनलों को इतने सारे दर्शक मिले होंगे कि वह कल्पनातीत होगा। हमारा मानना तो यह है कि यह आंदोलन ही आम जनमानस को भरमाने के लिये आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का एक योजनाबद्ध प्रयास था। टीवी चैनलों में शामिल हुए जिन बुद्धिजीवियों ने उनके मुंबई में कम भीड़ होने की जो बात कही है वह इसी का ही परिणाम है। लोकपाल या जनलोकपाल से इतर बहस इस पर चल रही है कि क्या अन्ना साहेब का जादू खत्म हो गया है। तो क्या यह जादू चल रहा था?
          अन्ना मूलतः अकेले थे पर उनके पीछे अनेक ज्ञात अज्ञात संगठन आये जिनके अपने अपने लक्ष्य थे। जनलोकपाल उनका नारा था जो संसद में लोकपाल का बिल पास होते ही फ्लाप हो गया। अन्ना के अनेक साथियों को लगा कि उनका नारा अब चलने वाला नहीं है। यकीनन अन्ना ने यह सब देखा होगा। अन्ना ने बहुत कुछ कहा पर हमें लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ नहीं भी कहा। उनके सामने अनेक ऐसे सत्य अदृश्य रूप में प्रकट हुए होंगे जिनको देखकर वह आश्चर्यचकित हुए होंगे। वह उनको देखते होंगे पर उनका बयान करना उनके लिये कठिन रहा होगा। वह ऐसे सात्विक पुरुष हैं जो राजस पुरुषो के क्षेत्र में घुसकर उनको त्रास देता है। अभी तक उन्होंने राजस पुरुषों से जो द्वंद्व किया था उसमें भी उनके विरोधी राजस पुरुषों की सहायता लेते रहे होंगे। एक को परास्त किया तो दूसरा विजेता बना होगा। इस बार वह राजस पुरुषों के विशाल समूह से लोह लेने निकले थे और धीरे धीरे उनके इर्दगिर्द अपने राजसी वृत्ति के लोगों का आंकड़ा कम होता जा रहा था। राजस पुरुष पराक्रमी होते हैं जबकि सात्विक पुरुषों को पराक्रम की आवश्यकता नहीं होती। यदि राजस पुरुषों के विशाल समूह से सामना करना हो तो पहले अपने पराक्रम का भी परीक्षण करना चाहिए। अन्ना ने यह बात अब जाकर अनुभव की होगी। हम नहीं मानते कि अन्ना हारकर बैठ जायेंगे। दूसरी बात यह भी लगती है कि वह अपने वर्तमान राजस पुरुषों के साथ लेकर अपना अभियान चलने वाले भी नहीं है।
        हम जब अन्ना हजारे के अभियान से राजनीतिक पक्ष से हटकर उसका सामाजिक पक्ष देखते हैं तो लगता है कि अन्ना हजारे की त्यागी छवि जनमानस में है। इसलिये भविष्य में उनको समर्थन नहीं मिलेगा यह सोचना बेकार है। मुश्किल यह है कि अन्ना हजारे को बौद्धिक वर्ग का समर्थन अधिक नहीं मिला। इसका कारण यह है कि इस देश ने कई आंदोलन और उसके परिणाम देखे हैं जिससे निराशावादी दृष्टिकोण उभरता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े स्वयं सेवी और उनके संगठनों की निष्ठा को लेकर लोगों के मन में अनेक संदेह थे। देश के बौद्धिक समाज से जुड़े अनेक लोगों के लिये वह किसी भी दृष्टि से स्वयंसेवक नहीं थे। समाज सेवा में उनकी भूमिका धनपतियों और आमजनमानस के बीच उनकी भूमिका मध्यस्थ की थी। वैसे हमारा मानना है कि अन्ना को अपना अभियान राजनीति से जुड़े विषय से हटकर समाज में फैले अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और भेदभाव मिटाने के लिये प्रारंभ करना चाहिए। हालांकि यह कहना कठिन है कि इसके लिये उनको प्रायोजक मिलेगा या नहीं। एक बात तय रही कि बिना प्रायोजन के ऐसे आंदोलन चल नहीं सकते।
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20/12/11

श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने पर चर्चा-हिन्दी लेख (disscusion in bain on shri madabhagwat gita on russia-hindi lekh or article)

                समाचार तो यह है कि श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने के लिये रूस के एक शहर में की अदालत में याचिका दायर की गयी है। यहां इस समाचार को लेकर गीता के विषय में संशय उठ रहे हैं। जिस तरह भगवान श्रीराम के विभिन्न रूप हैं उसी तरह श्रीगीता ने भी अपने भक्तों के अनुरूप धारण कर लिये हैं। भगवान श्रीराम के स्वरूप का प्रश्न है तो अनेक प्रचलित हैं-बाल्मीकी के राम, दशरथ पुत्र राम, कौशल्या के राम, तुलसी के राम-उनमें सबसे श्रेष्ठ रूप माना गया है घट घट में बसे राम! महाभारत युद्ध के समय श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को जो तत्वज्ञान दिया था वह श्रीमद्भागतगीता के रूप में स्मरण किया जाता है। मूलतः यह वेदव्यास रचित महाभारत ग्रंथ का एक महत्वपूर्ण भाग है। अगर कहें अगर श्रीमद्भागत गीता वाला अंश नहीं होता तो शायद ही कोई महाभारत काल को याद करता। यह भी संभव है कि अगर यह अंश न होता तो भगवान श्रीकृष्ण ने भी वह प्रतिष्ठा अर्जित नहीं की होती जो आज तक अक्षुण्ण बनी हुई है। हम इससे भी आगे जाकर यह कहें कि आज हमारे देश की विश्व में अध्यात्म गुरु की जो छवि है वह श्रीमद्भागवत गीता के कारण ही है तो गलत न होगा। गीता के तत्वज्ञान के रूप में कोई बदलाव नहीं आया पर जिन भगवत्भक्तों ने इसकी साधना से कृपा पायी उन्होंने अपना जीवन इसके प्रचार में इस सीमा तक समर्पित कर दिया कि उनके शब्दों के संचय समूह भी गीतातुल्य सम्मानीय बन गये। उनके साथ उन महापुरुषों के नाम भी जुड़े। ऐसे में अनेक महापुरुषों के नाम से गीता का नाम जुड़ा है। उन महापुरुषों के शब्द संचय समूहों में श्रीमद्भागवत गीता शीर्षक सर्वोपरि है पर उपशीर्षक में कहीं न कहीं उनके स्वयं या आश्रम के नाम जुड़े हुए हैं। नहीं भी जुड़े हैं तो प्रतीक चिन्ह उनकी प्रथक गीता होने की पहचान देते हैं।
               दस बरस पूर्व जब हमें योगसाधक के रूप में ज्ञान पाने की जिज्ञासा जागी तो हमने गोरखपुर प्रेस की अपने घर में रखी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन प्रारंभ किया। उसमें हर पाठ के साथ उसके अध्ययन की महत्ता तथा पुण्य का प्रभाव भी प्रकाशित था। हम तो श्रद्धा के साथ पढ़ते थे। एक दिन हमें एक ब्राह्मण मित्र मिला। वह हमारी तरह ही साहित्यक रुचि वाला है। अध्यात्म में उसकी रुचि शायद इतनी नहंी है पर पारिवारिक पृष्ठभूमि के नाते उसका ज्ञान की कमी भीनहीं थी। उसे हमने अपनी गीता साधना की चर्चा की तो उसने हमसे कहा‘भाई साहब, आप श्रीमद्भागवत गीता का वही प्रकाशन पढ़ें जिसमें केवल श्लोकों के अनुवाद हों कि साथ में महात्म्य हो। उसमें उसके अध्ययन का महत्व आदि नहीं बताया गया हो। तभी आप समझ पायेंगे वरना आप दूसरी तरह की कहानियों में अपनी ऊर्जा नष्ट करेंगें।’’
            हम हैरान रह गये। बात यह थी कि हम महत्त्ता बताने वाली जिन कहानियों को साथ में पढ़ रहे थे उसमें कोई एक भी पाठ नहीं था जिसमें ब्राह्मण पात्र न हो। ऐसे में उस मित्र की बात थोड़ी चौंकाने वाली लगी मगर जब हमने नयी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना प्रारंभ किया तो लगा कि वास्तव में मित्र के हृदय से यह बात भगवत्कृपा की उपज थी। उस दिन हमने अपने मित्र से जब इस बात की चर्चा करते हुए श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्यान प्रस्तुत किया तो उसने जो कहा वह लिखना अपने मुंह मियां मिट्ठु बनना होगा।
              नियमित योग क्रिया से निवृत होने के बाद गीता की साधना करना हमारे दिन का सबसे स्वर्णिम समय होता है। अब यहां हम श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा करने नहीं जा रहे पर जो लिख रहे हैं वह कहीं न कहीं उनसे प्रभावित है।
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           इस्कॉन नाम की एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो भगवान श्रीकृष्ण के संदेशों का प्रचार करती है। उसके आश्रमों में हमारा जाना हुआ है। हम उनमें कोई दोष नहीं देखते। देखने वाले देखते भी हैं। हम देखते हैं सुनते हैं पर लिप्त नहीं होते। सुना देख और भूल गये। उनके संस्थान से प्रकाशित श्रीमद्भागवत का एक संस्करण हमारे पास भी है। इसका अनुवाद विश्व के अनेक भाषाओं के इसलिये हुआ है क्योंकि इस्कॉन ने अनेक देशों में अपना स्थान बनाया है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम तथा भगवान शिवजी के अनेक भक्तों ने विश्व में उनका प्रचार किया है पर संगठित रूप से यह काम इस्कॉन ने किया है उतना शायद ही कोई कर सका हो। अनेक भारतीय संतों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है पर इससे भारतीय अध्यात्म का प्रचार कम उनकी छवि अधिक बनी है। इस्कॉन की जो कार्यशैली हमने देखी है उसमें दोष हम नहीं देखते पर इतना तय है कि श्रीमद्भागवत गीता के प्रचार में उनकी भूमिका हो सकती है वह उसमें वर्णित तत्वज्ञान के दर्शन उसमें नहीं होते। इस्कॉन के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद की कृपा से श्रीमद्भागवत यथारूप प्रस्तुत की गयी है पर उसमें व्याख्या ज्यादा है। हमने नहीं पढ़ी पर उसमें कुछ आपत्तिजनक हो सकता है इस पर यकीन नहीं है। अनुवाद करने या पढ़ने वालों की समझ का फेर हो सकता है। इस फेर में कोई नाराज हो गया तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जब आत्मा जीवन धारण करता है तो वह सत्य लगता है पर होता तो झूठ है। देहधारी जीव विवादास्पद हो जाते हैं पर आत्मा निर्विवाद है।  यही स्थिति तत्वज्ञान की है। वह सूक्ष्म है जब उसे व्याख्या देकर व्यापक बनाया जाता है तो वह देहधारी जीव की तरह विवादस्पद हो जाता है। यह समझ का फेर अपने देश में ही बहुत सारे गीता सिद्धों को भी है कि श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अत्यंत गूढ़ है जबकि एक बार अगर श्रीमद्भागवत हृदय में आत्मसात होना प्रारंभ हो तो एक जीवन के प्रति स्वयमेव दृष्टिकोण अन्य लोगों से प्रथक हो जाता है। यह अलग बात है कि कथित गीता सिद्ध इसे रहस्यमय कहकर स्वयं को ज्ञानी साबित करते हैं जैसे उनको समझ में सब कुछ आ गया है। कुछ लोग इस बात से नाराज हो सकते हैं कि मगर गीता सिद्ध अपना ज्ञान दिखाने उन लोगों के पास नहीं जाते जिनकी उसमें रुचि नहीं है। न ही सार्वजनिक रूप से श्रीमद्भागवत गीता पर प्रवचन करते हैं। गीता सिद्ध संगठन बनाकर नहीं चलते क्योंकि वह हंस होते हैं। संगठन तो कौए बनाकर चलते हैं।
               अब तो प्रश्न हैं एक तो क्या इस्कॉन की श्रीमद्भागवत पर प्रतिबंध लगाने की बात है या मूल रूप से गोरखपुर प्रेस जैसे प्रकाशन से जुड़ी श्रीमद्भागवत गीता को भी उसमें शामिल किया गया है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि क्या श्रीमद्भागवत गीता के शब्द उच्चारण पर ही प्रतिबंध लगाने का विचार हो रहा है या उसके श्लोकों के स्थानीय भाषा में अनुवाद पर भी रोक लगेगी। एक रूसी नेता ने भारत में इस विषय पर हो रहे प्रदर्शन पर कहा कि श्रीमद्भागवत गीता का प्रवेश हमारे देश में दो सौ वर्ष पहले ही हो गया था। इससे तो लगता है कि रूस में इसके इतने अनुवाद हो चुके होंगे कि उनको रोकना संभव नहीं होगा।
         जिस तरह का इसमें तत्वज्ञान है और आधुनिक विज्ञान उसके सामने फीका है उसे देखकर तो यह लगता है कि इसका प्रचार वहां स्वयमेव बढ़ेगा। इस विवाद की भारत में चर्चा करने का मतलब इसलिये भी नहीं है क्योंकि यह तत्वज्ञान है इसे कोई नहीं बदल सकता। जहां तक हम जैसे आम गीता साधकों की भावनाओं के आहत होने का प्रश्न है तो यह एक भुलावा है। यह प्रचार माध्यमों के लिये समय पास करने के लिये अच्छा विषय बन गया है।
           हमारा मानना है कि श्रीमद्भावगत गीता में मनोरंजन नहीं है। जिसकी रुचि नहीं है उसे अहंकारवश गीता का ज्ञान देना भी तामस बुद्धि का परिचायक है। जिसकी भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति नहीं है उसके सामने तो इसका नाम लेना भी निरर्थक है। अगर कोई यह सोचकर कि श्रीमद्भागवत गीता से ज्ञान मिल जाये ताकि लोगों के सामने अपने ज्ञानवान होने का प्रदर्शन करूं और वह इसे पढ़ने लगे तो जल्दी बोर हो जायेगा। संभव है कि वह अर्थ रटकर उसे सुनाने लगे पर इसका आशय यह कतई नहीं कि वह ज्ञानी है। सच्चे गीता साधक श्रीमद्भागवत गीता शब्द सुनकर न तो भावविभोर होते हैं न उसकी निंदा सुनकर विचलित होते हैं। उनके लिये यह विवाद एक हल्की मुस्कराहट लाने से अधिक प्रभाव नहीं रखता। मान अपमान से परे होने के गुण का महत्व आखिरी श्रीगीता में ही बताया गया है। ऐसी श्रीमद्भागवत गीता और उसके सृजनकर्ता भगवान श्रीकृष्ण का कोई अपमान भी कर सकता है या किसी में इतनी औकात है यह गीता सिद्ध नहीं मानते। ऐसा करने वालों का जो हश्र होगा उसकी कल्पना वही कर सकते हैं जो तत्वज्ञानी हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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14/12/11

आओ भोग रोग और योग पर चर्चा करें-हिन्दी लेख (bhog rog aur yog par charcha-hindi lekh or article)

           भारत में विश्व की करीब बीस प्रतिशत आबादी है पर हृदय रोगियों की संख्या पचास फीसदी हो गयी है। देश के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा अंतर्राष्ट्रीय विषयों में मस्त रहने वाला हमारा समाज शायद ही इस पर चिंतित होता दिखा रहा है। इसके अलावा आये दिन मधुमेह, चर्बी, सांस तथा अन्य रोगियों की संख्या भी निरंतर बढते रहने के आकंड़े आते रहते हैं पर शायद ही कोई बहस इस पर होती है कि हमारा समाज स्वास्थ्य की दृष्टि से कितना खोखला होता जा रहा हैं उससे भी हैरानी की बात यह है कि अनेक मनोविज्ञानिक विशेषज्ञ तो यह भी कहते हैं कि देश की आबादी का एक बहुत बडा मनोविकारों का शिकार है पर इलाज की यह स्थिति है कि मनोरोगी न स्वयं यह बात जानते हैं न उनके परिजन इसे स्वीकार करते हैं। ऐसे में हम जब ज्वलंत विषयों पर चर्चा करते हैं तो वह कहना कठिन होता है कि सामने वाला मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति है।
       समाज में हम जब दैहिक तथा मानसिक रोगियों की जो स्थिति देख रहे है तो अत्यंत चिंताजनक है। अपने आसपास के लोगों से व्यवहार करते समय उनसे हम सतर्कता बरतें पर यह तभी संभव है कि हम यह जान पायें कि वह रोगी है। किसी को कोई दैहिक काम दें तो यह पता लगाना कठिन है कि वह उसे कर पायेगा या नहीं। उसमें क्षमता है कि नहीं। साथ ही जब किसी के साथ आपसी संवाद करें तो यह कहना भी कठिन है कि वह मानसिक विकार से ग्रसित है कि नहीं। सच बात तो यह है कि अब पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति ढूंढना कठिन है जबकि हम अपने समाज को एक शक्तिशाली होने का भ्रम पाल रहे हैं।
       एक नहीं ऐसी बल्कि कई ऐसी घटनायें हो रही हैं कि लोग मोटर साइकिल या कार लेकर रास्ते पर निकल पड़ते हैं। खाली मार्ग देखकर अनौपचारिक रेस लगाने लगते हैं बिना यह विचारे कि आगे कोई दूसरा वाहन हो सकता है या कहीं कोई गड्ढा या पेड आ सकता है। किसी दूसरे वाहन से टकराव हो सकता है। नतीजा दुर्घटनायें होती है। इसमें कई जवान मौतें हो चुकी हैं। अगर आप ऐसे वाहन चालकों की मनोविज्ञानिक स्थिति का पता लगाये तब उनका कोई परिजन नहीं मानेगा कि दिमागी रूप से वह अस्वस्थ थे पर मनोविज्ञानिक मानते हैं कि यह सब मनोविकारों का नतीजा है। सवाल यह है कि हमने आखिर सभ्य और स्वस्थ मानव के लिये कौनसे मानक तय किये हैं। हमारे एक योगाचार्य कहते हैं कि बढ़ती दुर्घटनायें इस बात का प्रमाण है कि लोगों का आज्ञाचक्र स्वभाविक ढंग से काम नहीं करता है।
          पश्चिमी रहन सहन के चलते लोगों की जीवन शैली में बदलाव आया है पर हमारी जलवायु वैसी नहीं है जैसे कि अमेरिका या यूरोप में है। कभी सर्दी और गर्मी का मौसम तो कभी बरसात अपना उग्र रूप दिखाती है। लोगों ने आनंद लेने के लिये तौर तरीकों में ंपरिवर्तन किया है। शोरशराबा करना और भीड़ लगाकर अपने वैभव और व्यक्तित्व का प्रदर्शन करने की बढ़ती प्रवृत्ति ने लोगों को विलासी बना दिया है।       इन्हीं विलासिता पूर्ण साधनों के एकत्रीकरण के लिये अपराध भी बढ़ा है।
            पहले तो धनवानों के लिये राजरोगों का भय था पर भोजन, जल, तथा औषधियों के नकली या मिलावटी होने की वजह से अल्प धनियों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है। ऐसे में हम जब आर्थिक विकास की बात करते हैं तो हंसी और निराशा दोनों ही आती है। अध्यात्मिक विकास की बात को एकदम नकार दिया गया है। कहीं कहंी तो धर्म के नाम पर भी आदमी की अध्यात्मिक भूख शांत करने के लिये नृत्य संगीत और गीतों का सृजन फिल्मी तर्ज पर हो रहा है। ऐसे में लगता नहीं है कि हम अपने पुराने समाज को याद करते हैं जो सीमित साधनों में प्रसन्नचित्त रहता था। अगर यही विकास है तो फिर हमें मानना चाहिए कि यह विकृत विकास है जिसमें मानव सभ्यता चमकदार दिखाई देती है पर दरअसल वह विनाश की तरफ बढ़ रही है।
        आज हमारे समाज में योग के प्रति रुझान इसलिये नहीं बढ़ा कि उसकी शक्ति की व्यापकता को लोग समझ रहे हैं बल्कि वह अपने भोगों से उत्पन्न विकारों से मुक्ति पाने वाली दवा के रूप में इसे मान रहे हैं। यही कारण है कि प्राणायाम तथा आसनों का प्रचार अधिक हो रहा है जबकि ध्यान के साथ धारणा को एकदम भुला दिया गया है। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा समाज आधुनिक भोगों के साथ जीना चाहता है और भारतीय अध्यात्म से उसका बस इतना ही संबंध है कि वह इसके लिये अधिक शक्ति प्रदान करे। सीधी बात कहें आधुनिक भौतिकतवाद के प्रति समाज का आकर्षण चरम पर है जो अंततः उसके विनाश का कारण बन सकता है। यह अलग बात है कि दर्द पूरे समाज को एक साथ नहीं होता। टुकड़ों टुकड़ों में होता है। जख्म होता है तो धीरे धीरे उसका दर्द कम होता है पर दूसरे को होता है तो वह कराहता है और पहले वाला उसे देखता है। इस तरह क्रम चल रहा है। इस बात का कौन ध्यान रखता है कि आजकल जवान मौतों का सिलसिला अधिक हो गया है और उसे रोका जाना चाहिए। कहने वाले तो कह सकते हैं कि मौत तो किसी भी आयु में हो सकती है।
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