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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

11/4/16

बगदादी एक कल्पित पात्र है जो कभी नहीं मरेगा-हिन्दी व्यंग्य लेख (Baghdadi A Dream Parson who not Dead anytime-Hindi Satire Article)


            बगदादी नाम का कोई व्यक्ति इस धरती पर पैदा ही नहीं हुआ जो मरेगा। वह बिना पैदा हुए ही अमर हो गया है।  दरअसल पूरे विश्व के प्रचार माध्यम अंततः माफिया और पूंजीपतियों के सहारे चलते हैं।  खासतौर से विश्व की हथियार बनाने वाली कंपनियां कहंी न कहीं विश्व मेें आतंकवाद के कारण बहुत फायदे में रहती हैं।  मध्य एशिया में राष्ट्र तो नाम के हैं वरना तो वहां भी कबीलों के सरदारों का अब भी वर्चस्व है।  यह सरदार पैसे, पद और प्रतिष्ठा के भूखे हैं-इस कदर कि हिंसा या अहिंसा का उनके लिये कोई अर्थ नहीं है। सऊदी अरब तथा तुर्की ने मिलकर इन सरदारों को आतंकवाद का ठेका दिया और बगदादी नाम का एक कल्पित शासक गढ़ दिया-जिसके नाम के पीछे यह सब छिपे रहें। फिर उनके खरीदे बुद्धिजीवी पटकथा लिखकर उसे चलाते रहे।  कहीं से एक फोटो उठाकर अंतर्जाल पर टांग दिया और कहा यही है बगदादी।
           पांच बार उसे मार चुके।  इराक की सेना एक बार दावा करती है कि हमने उसे मारा तो अमेरिका का खंडन आता है। दूसरी बार तुर्की का खंडन आता है।  अब मोसुल में उसे घिरा बताया गया और हम सोच रहे थे कि उसके पटकथाकारों से कहें कि ‘यार, उसे अब वहां से निकालो, वरना तुम्हारा सारा खेल खत्म हो जायेगा।’
       इससे पहले कि हम यह बात फेसबुक पर लिखने का समय निकाल पाते तब तक ब्रिटेन के विदेशमंत्री का बयान आया कि-‘बगदारी मोसुल से निकल गया है।’
     हमें बरबस हंसी आ ही गयी।  इससे पहले मजेदार खबरे आ रही थीं
     ‘बगदादी बुरी तरह घायल है और बिना किसी के सहारे के चल नहीं सकता।’
       ‘बगदादी मोसुल में बनी सुंरगों में इधर उसे उधर भाग रहा है।’
     ‘मोसुल में इराकी सेना ने उस जगह को घेर लिया है जहां बगदादी छिपा है।’
       बगदादी अगर इस धरती पर होता तो ही मौसुल में मिलता। बगदादी की वजह से न केवल कंपनियों के हथियार बिक रहे हैं वरन पूंजीपतियों के टीवी चैनल उसके समाचारों तथा फिर बहसों से अपने विज्ञापनों का समय पास करते हैं।  हमारी दृष्टि से बगदादी नाम का कोई व्यक्ति हुआ ही नहीं जो घायल हो जाये या मरकर अमर हो।  इतना ही नहीं अरब देशों में चल रहा संघर्ष अभी थमने वाला नहीं है क्योंकि वहां पेट्रोल है तो पश्चिमी देशों के पास हथियारों का जखीरा। बगदादी एक ऐसा कल्पित खलनायक हैं जिसका कोई ढूंढ ही नहीं सकता।  उसकी पटकथा लिखने वाले बहुत हैं। एक मारेगा तो दूसरा जिंदा कर लेगा।  एक भगायेगा तो दूसरा नचायेगा। हमारे यहां आचार्य चतुरसन का एक लिखा उपन्यास प्रसिद्ध है ’चंद्रकांता संतति’-जिसे हमने पढ़ा नहीं है-पर कहा जाता है कि उसके पात्र भी कुछ इसी तरह के हैं।
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10/25/16

राज्यप्रमुख अगर जनसामान्य को अर्थसिद्धि न दे सके वह प्रशंसनीय होता-हिन्दी लेख (State Chief Doesn't Clear Finacial Prblamb, He criticise by public-Hindi Article)

     
                           हमने बचपन में अनेक ऐसी कथायें पढ़ी थी कि अमुक राजा ने गरीब आदमी को देखकर उसे अमीर बनाया। बेबस स्त्री को संकट से बचाया।  अनेक राजा जनता दरबार लगाते थे आदि आदि यह कहानियां शायद राजपद की महिमा में लिखी गयी हों पर अब लगता है कि यह बकवास है। इसी तरह आज भी यही हो रहा है पर प्रश्न यह है कि इन राजपद पर विराजमान लोगों के संवदेनशील होने पर खुश होने की बजाय इस पर विचार करना चाहिये कि उनके राजकर्मचारी इतने कुशल क्यों नहीं है कि जनता के पास शिकायतें करने का अवसर ही न हो।  लोकतांत्रिक प्रणाली में अब यह स्थिति हो गयी है कि जनप्रतिनिधि राज्य के स्वामी हो गये हैं पर उनकी सोच भोग तक ही सीमित है।  फलां राजपदधारी संवेदनशील है-यह प्रचार खोखला लगता है। आखिर यह पदासीन लोग अपने अनुचरों को संवदेनशील होकर कुशल से कार्य करने के लिये प्रेरित क्यों नहीं करते ताकि पूरे समाज का भला हो सके-एक दो व्यक्ति का भला कर वह प्रशंसा जरूर बटोरते हैं पर इससे यह प्रमाणित होता है कि उन्हें अपने अनुचरों में राजकाज में कुशल प्रबंधन तथा कार्य की प्रेरणा स्थापित करने की योग्यता नहीं है। हम तो अब सोचते हैं कि एक राजा ने एक का भला किया तो क्या तीर मार लिया? हमारा मानना है कि राजा कितना भी बुद्धिमान, संवेदनशील और धर्मभीरु हो अगर वह सामान्य जनमानस के अर्थ की सिद्धि नहीं करता तो प्रशंसायोग्य नहीं होता।
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हिन्दूत्व पर निर्णय स्वागत योग्य
                       सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दुत्व को जीवन शैली मानने के अपने निर्णय पर अपनी स्थिति बरकरार रखी है।  इसका मतलब यह है कि धर्म का नाम लेकर हिन्दूओं को गाली देने वाले अत्यंत कठिनाई अनुभव करेंगे।  दूसरी समस्या प्रगतिशील और जनवादियों के सामने तब आयेगी जब  मिलती जुलती जीवन शैली के कारण अन्य धर्मों के लोगों को हिन्दूत्व अपने जैसा ही बतायेंगे।  वैसे हम बता दें कि हिन्दूत्व के साथ सिख, जैन और बौद्ध धर्म का भी इस मायने में सीधा जुड़ जायेगा क्योंकि इनके अनुयायियों की जीवन शैली भी भारतीय परंपराओं से जुड़ी है। महत्वपूर्ण बात यह कि राष्ट्रवादियों के शाब्दिक प्रहार पहले से अधिक जोरदार होंगे जिसे झेलना पंथनिरपेक्षों के लिये अत्यंत कठिन होगा।  

                                सर्वोच्च न्यायालय ने अपने उस निर्णय को बदलने से इंकार कर दिया है जिसमें हिन्दूत्व को धर्म नहीं वरन् जीवन शैली बताया था।  हिन्दुत्व विरोधियों के लिये यह बड़ा झटका होगा क्योंकि वह धर्म का नाम देकर इसे चाहे जब शाब्दिक लट्ठ मारने लगते थे।  सबसे बड़ा झटका उन्हें इस बात से लगेगा जब जीवन शैली और अध्यात्मिक दर्शन के के कारण हिन्दुत्व पंथनिरेपक्षता यानि किसी भी विशेष पूजा पद्धति से जुड़ा न होने के कारण अलग ढंग से प्रचारित होगा।

                            बढ़िया चिंत्तक है जो अध्ययन के लिये आये विषय का संपूर्ण अध्ययन करता है। एक चिंत्तक को किसी भी विषय के ऊपरी या निचले स्तर से अपना अध्ययन करना चाहिये। आपने एक बार अपने घर के बाहर गड्ढे के बारे में लिखा था। अच्छा लगा क्योंकि वह चिंत्तन को नीचे के सिरे से देखने का प्रक्रिया थी।  विकास का अंतिम सिरा वहीं है जहां हम हैं।
अब आते हैं सार्वजनिक विषयों पर विचार की प्रक्रिया पर जिसमें कभी ऊपरी सिरे से दृष्टिपात करना चाहिये। कैसे? हम बताते हैं।
               विश्व की सबसे ताकतवर संस्था कौनसी है?
               हम ही जवाब देते हैं ‘विश्व बैंक’-आज अंतर्जाल पर एक संदेश पढ़ा जिसमें बताया गया कि उसने चीन को झुका दिया था। 
               अब हमारा चिंत्तन यहीं से शुरु हुआ जो विकीलीक्स और पनामलीक्स तक आता है। पनामा लीक्स में हमारे प्रिय मित्र पुतिन के साथ दुश्मन नवाज शरीफ तो कभी खुशी और कभी गम देने वाले शी जिनपिंग का भी नाम है।  अनेक भारतीय उद्योगपतियों के भी इसमें नाम होने की संभावना है। हमारा मानना है कि काला धन रखने वाले पश्चिमी बैंक भी विश्व बैंक जैसी नहीं तो उसके बाद दूसरी ताकत हैं।  अपना चिंत्तन तो यह कहता है कि जनता के सामने बहिष्कार का नारा कमरे के अंदर व्यापारिक समझौते भी मारा होता है। पुतिन इसी पनामा लीक्स से बचने के लिये अमेरिका से परमाणु बम की धमकी दे रहे हैं तो चीनी शीजिनपिंग इधर उधर विदेशों में जाकर अपनी ताकत अपने ही देश को लोगों को दिखा रहे हैं।  नवाज शरीफ ने अपना नायक कश्मीर के मृत आतंकवादी को इसलिये ही बनाया ताकि आम जनता पनामा लीक्स का अपराध भूल जाये।  कहना यह है कि भारत के उद्योगपतियों को लेकर परेशान न हों इस समय उनकी पूरे विश्व में तूती बोलती है और शी जिनपिंग तो उनके सामने एक खरगोश है।  कालेधन रखने वाले बैंक के ग्राहक आपस में वैसे ही मित्र होते होंगे। एक दूसरे के दुश्मन भले दिखें पर न हानि करेंगे न युद्ध! सब ऐसे ही चलता रहेगा। 
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10/11/16

संघ प्रमुख भागवत ने कश्मीर में हिन्दूओं की वापसी की बात कहकर अच्छा किया (RSS Chief Mohan Bhagwat Good Say For Return Of Pandit In Jammu Kashmir Velly)


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संचालक श्रीभागवत ने समूचे कश्मीर में हिन्दूओं की वापसी की बात कहकर अच्छा काम किया है। जम्मू कश्मीर के धार्मिक आधार पर भारत से प्रथक करने वालों के आंदोलन को समर्थन देकर पाकिस्तान समूचे कश्मीर में खराब हालात की चर्चा करता है। पहली बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक के संचालक श्रीमोहन भागवत ने भारत से संरक्षित ही नहीं वरन् पाक अधिकृत कश्मीर व गिलगित में हिन्दू पंडितों की वापसी का लक्ष्य प्रकट कर यह साबित किया है कि हम भी अब इसे धार्मिक आधार पर देखने को तैयार हैं। हमारी राय है कि हिन्दूओं की कश्मीर में वापसी का मुद्दा अब पाकिस्तानी दुष्प्रचार को खंडित करने के लिये उठाया ही जाना चाहिये। अभी तक धर्मनिरपेक्षत सिद्धांतों की दुहाई देने वाले कभी यह बात नहीं कह सके कि गिलगित बालटिक वह पाक अधिकृत कश्मीर में जब तक हिन्दूओं की वापसी नहीं होगी तब वहां संयुक्तराष्ट्रसंध के प्रस्ताव के अनुसार जनमत संग्रह नहीं हो पायेगा।
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अभी यह पता नहीं कि राष्ट्रवादी विचारक संघप्रमुख की इस बात को आगे कहां तक ले जाये पायेंगे। अलबत्ता धर्मनिरेपक्ष, उलटपंथी तथा हिन्दू विरोधी विचारक इस विचार पर बवाल जरूर मचायेंगे। जम्मू कश्मीर की वर्तमान मुख्यमंत्री को भी यह बात साफ करना चाहिये कि हिन्दूओं की वापसी को मुख्य मुद्दा माने। दरअसल कश्मीर की स्थिति यह है कि वहां शिया मत वाले ज्यादा हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से ईरान से संचालित हैं जबकि चरमपंथी सऊदी अरब के पिट्ठू हैं। दोनों में सीधे संघर्ष है पर भारत में हिन्दू बाहुल्य राज्य प्रबंध के विरुद्ध दोनों एक ही हैं-क्योंकि ईरान तथा सऊदी अरब भले ही तात्कालिक स्वार्थ या भय से भारत के मित्र दिखते हों पर किसी भी हालत में कश्मीर की स्थिरता बनाये रखने में सहायक नहीं होंगे। दोनों में फूट पैदाकर समस्या का हल करने की सोचना भी मूर्खता हैं। वहां हिन्दू तत्व ही विजय दिलाने में सहायक होगा पर इसके लिये जो वैचारिक दृढ़ता चाहिये उसके लिये राष्ट्रवादियों को पूरे देश में राज्यप्रबंध सुधार कर अपना कौशल दिखाना होगा।


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जिस तरह उरी के बदले को लेकर देश के कथित परंपरागत निरपेक्ष बुद्धिमान राष्ट्रवादियों के सत्ता में स्थाई अस्तित्व बन जाने की संभावना से चिंतित हैं उससे साफ लगता है कि उनके प्रायोजन में कहीं न कहीं विदेशी आर्थिक शक्तियों का ही हाथ रहा है।

9/25/16

किताबों के शब्द जिंदगी की चाल नहीं तय नहीं करते-दीपकबापूवाणी (kitabon ke shabd zindagi ki chal tay nahin karte-DeepakBapuWani)


मत पूछना हमारा पता-हिन्दी कविता
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अपने कंधों पर
स्वार्थों की अर्थी
ढोना आसान नहीं होता।

जब तक चलती सांस
दौलत से रिश्ता तोड़ना
आसान नहीं होता।

कहें दीपकबापू सब मित्रों से
मत पूछना कभी हमारा पता
अपनी लतों के
पीछे भागती भीड़ से
गुम होना आसान नहीं होता।
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अमीरों की यह खुशफहमी है कि उनकी दुनियां ही में गरीब भी रहते हैं।
पैसे की जंजीर में बंधे अक्लमंद नहीं समझाते इसे नसीब भी कहते हैं।
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इंसानों में स्वार्थ मे बनते संबंध, बुद्धिमान भावना के नहीं बांधे बंध।
‘दीपकबापू’ जिंदगी का सच न जाने, इश्क के दरिया में बहें जो अंध।।
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बुद्धि के द्वार बंद जिनके वही समाज के महानायक बन जाते हैं।
अपनी सोच जो भूलते चतुर व्यापारियों के गायक बन जाते हैं।
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धरती के पुत्र सभी कहलायें फिर भी टुकड़ों के सौदे किये जाते हैं।
फसल लहराते किसान अपना खेत धनपतियों के नाम किये जाते हैं।
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हर दिन हर पल जिंदगी रंग बदले यह समझता कौन है।
राह चलने के लिये है जहां रुके वहां जिंदगी का मौन है।
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हम उसे अब कहां ढूंढें, अपना पता दिये बिना वह चला गया।
क्या आस करें, दिल में हमारे नाम की तख्ती भी जला गया।।
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किताबों के शब्द जिंदगी की चाल नहीं तय नहीं करते।
स्वच्छंद पक्षी देखो हवाओं की चाल से भय नहीं भरते।
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9/21/16

पाकिस्तान में भी दिखते हैं सच बोलने वाले-हिन्दी संपादकीय (sum Pakistani Scholar True Speak for Hindu Religion And India-Hindi Editorial


फेसबुक पर कुछ मित्रों को पाकिस्तान की आंतरिक हलचलों में बहुत रुचि है और वह अपने मुखपुस्तिका की दीवार पर वहां के चैनलों पर विद्वानों के बहस करने वाले वीडियो चिपका देते हैं। जो वीडियो यूट्यब से सीधे लिंक से आते हैं उनसे वहां के अन्य चैनलों की बहस के भी वीडियो दिखाई देते हैं।  अनेक बार हम वहां की बहसों को सुनते हैं।  इतना ही नहीं कभी कंप्यूटर पर सीधे पाकिस्तानी चैनलों को भी देख लेते हैं।  इससे यह तो पता चल ही जाता है कि सरहद पार क्या चल रहा है।  पाकिस्तानी चैनलों में एंकर वक्तओं के बीच कम टोकाटोकी करते हैं जबकि भारत में अनेक बार तो पूरी बहस ही शोरशराबे में डूब जाती है।  बहरहाल एक बात तय है कि पाकिस्तानी मीडिया अपने ही सरकारी एजेंडे को भारत तथा हिन्दूओ  के विरोध में चलाता है पर इसके बावजूद कुछ वक्ता इसके विपरीत ऐसी टिप्पणियां करते हैं जो हमारे ही फेसबुकिए उठाकर रखते हैं।  पाकिस्तान के विद्वान हैं हसन निसार। हम उन्हें नहीं जानते मगर फेसबुकिऐ उनकी बहसों के वीडियो वाल पर चिपका जाते हैं।
भारत मे हिन्दू गाय को माता क्यों मानते हैं? इस विष पर हसन निसार ने कलकत्ता के एक हिन्दू विद्वान की किताब का हवाला देकर बताया था कि पहले सब्जियां नहीं होती थीं।  भैंसों का दूध भी पीने की परंपरा नहीं थी तब गाय मनुष्य के लिये एक तरह से पारिवारिक सदस्य बन गयी थी। उसका दूध, धी, दही तथा पनीर आदि बनता था जो सब्जी के रूप में खाया जाता था। जिस तरह मां का दूध बच्चे के लिये उपयोगी है उसी तरह गाय का दूध भी सभी के लिये अच्छा है। इसलिये हिन्दू परंपरागत रूप से गाय को माता का दर्जा देते हैं और इस पर हंसना बुरी बात है।
हसन निसार अनेक बहसों में भारत तथा हिन्दू विरोधी जैड हामिद के तर्कों की  धज्जियां उड़ायीं हैं।  हम अक्सर भारत में पाक समर्थन बयान देने वालों पर उत्तेजित हो जाते हैं। ऐसे  में हसन निसार को पाकिस्तानी टीवी पर बेबाकी से जब वहीं के राज्यप्रबंध की धज्जियां उड़ाते हुए हिन्दू विरोधी भावना स्थापित करने का प्रतिकार करते हैं तो लगता है कि उन्हें कहीं परेशानी न झेलना पड़ें।  एक बार उन्होंने कहा था कि अगर मेरी बात किसी को बुरी लगती है तो माफी मांग लेता हूं पर अपना विचार नहीं बदलता। भारत में अनेक कथित राष्ट्रवादी विद्वान पर भी भी तैमूर लंगड़े, मोहब्बत बिना कासिम, अब्दुलशाह अब्दाली और बाबर के लिये क्रूर, अय्याश तथा लुटेरा शब्द प्रयोग ऊंची आवाज नहीं करते जबकि हसन निसार खुल्लमखुल्ला करते हैं।  मुगलों के बारे में ऐसी बातें कहते हैं जो हिन्दूवादी भी दबे स्वर में एकाध बार ही कह पाते हैं।  अपने ही धर्म पर ऐसी टिप्पणिंयां करते हैं कि अगर भारत में कोई करे तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाये। हमारे यहां के कट्टर हिन्दू विद्वान ऐसी टिप्पणियां करने की सोच भी नहीं सकते। 
उरी हमले के बाद पाकिस्तानी चैनलों पर वक्ता भारत पर आक्षेप भी कर रहे हैं तो डरे हुए भी दिखते हैं ।  हसन निसार अनेक बार खुलकर भारत से अच्छे संबंध बनाने के लिये कश्मीर मुद्दा छोड़ने की बात कह चुकें हैं पर बाकी लोग तो अच्छे संबंधों के साथ कश्मीर मुद्दा छोड़ने की बात नहीं भूलते।  बहरहाल फेसबुकिए मित्रों का धन्यवाद जो कभी सरहद पार का हाल जाने के लिये प्रेरित करते हैं।
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9/5/16

अन्ना के चेलों के पास जीतने पर भी असली हीरा आया ही नहीं (Anna Hazare and His Followers)

हमने बचपन से ही देखा है कि जिस आदमी की पुलिस प्रशासन पर पकड़ है उसकी खूब चलती है। हमारी मार्केट में दुकान थी। एक दुकानदार का सम्मान इसलिये हुआ करता था क्योंकि वह सरकारी महकमों में काम करा देता था। उसके यहां पुलिस प्रशासन के लोग आकर बैठते थे। मजे की बात यह कि कोने पर दुकान होने के बावजूद उसकी दुकान पर ग्राहक कम आते थे। सुना था कि उसकी कोई चावल मिल में साझेदारी भी थी और वह वहां समय पास करने के लिये बैठता है। ताश का माहिर खिलाड़ी था और हमारे दादाजी के साथ जोड़ी बनाकर कोटपीस खेलता था। यह अलग बात है कि हमारे ताऊ व पिताजी उसकी दुकान से दुकान लगी होने के बावजूद किसी सरकारी काम में उसकी मदद लेना पसंद नहीं करते थे। समय के साथ बड़े हुए तो पता चला कि वह शुल्क के साथ मध्यस्थता करवाता था-उसके लिये हमारे मन में आज भी इतना सम्मान है कि दलाल शब्द प्रयोग नहीं करना चाहते।
हमारे एक सहकर्मी गांव की पृष्ठभूमि के थे। उन्होेंने बताया कि गांव में लोग न्यायालयीन मुकदमों से नहीं वरन् पुलिस से ज्यादा डरते हैैं। उनके लिये वही आदमी बड़ा है जो उन्हें पुलिस से बचाता रहे। इससे हमने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत मेें लोगों को भय केवल इस बात का रहता है कि कहीं किसी कारण से निरपराध कानून के शिकंजे में न फंसें इसलिये पुलिस से बचना चाहिये। फिर हमने देखा कि अपराधियों ने भी ऐसे संपर्क बना लिये कि पुलिस से बचते रहें। अब हम लोकतंत्र में देख रहे हैं कि ऐसे लोग समाज के ठेकेदार बन रहे हैं जो अपने अपराध या कांड छिपाने के लिये सेवा का पद धारण करते हैं।
अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के समय अनेक ऐसे लोग उसमें शामिल हुए जिन्हें तत्कालीन स्थापित दलों में जगह बनती नहीं दिख रही थी और वह नये दल की आशा में अपना चेहरा स्थापित करने आये। उनकी नीयत भी ऐसी ही थी कि सत्ता समीकरण उनके पक्ष में हो जायें तो पुलिस प्रशासन पर उनका वर्चस्व स्थापित हो जाने पर काले कारनामे छिपाने का अवसर मिल जायेगा। दिल्ली में अन्ना हजारे जी ने कोई राजनीतिक भूमिका नहीं निभाई पर उनकी छाया के प्रभाव से ही चेले चुनाव जीत गये। आमजन भले ही बदलाव की आशा कर रहे थे पर हम जानते थे कि यह एक छलावा साबित होगा। जोश में आकर अन्ना के चेले चुनाव मैदान में तो आ गये पर जीतने पर पता चला कि असली हीरा पुलिस प्रशासन तो उनके हाथ आया ही नहीं। अन्ना के विजेता चेले एक एक कर पुलिस के हत्थे चढ़ रहे हैं और विशेषज्ञों की माने तो कुछ और भी फंसने वाले हैं। असली बात यहीं आकर टिकती है कि क्या अगर पुलिस अन्ना के चेलों के पास होती तो वह क्या फसते? यही कारण है कि पंजाब और गोवा में वह अपना भाग्य आजमा रहे हैं। लोकतंत्र में सत्ता प्रतिष्ठान के विरुद्ध असंतोष जरूर होता है और अन्ना के चेलों को इन राज्यों में मतों का अच्छा प्रतिशत भी प्राप्त होगा। जहां तक राज्य प्रबंध में स्वच्छता का प्रश्न है अन्ना के चेलों से से आशा करना अब निरर्थक साबित होगी। यह पता नहीं है कि सत्ता उनके पास आयेगी या नहीं पर आ गयी तो अन्ना के शिष्य निष्कलंक बने रह सकते हैं। इसी आशा में लोकतंत्र का झंडा उन्होेंने उठाया है। वैसे दिल्ली में मंत्री का सीडी कांड अन्ना के चेलों के रथ को ऐसे गड्ढे में ले गया है जहां से उसका निकलना कठिन है भले ही वह सोचते हों कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है।
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8/17/16

चिंतायें बेचते महंगे दाम-हिन्दी कविता (Chintaey bechte Mahange Dam-HindiPoem)


सोचते सभी
मगर कर नहीं पाते
भलाई का काम।

कहते सभी निंदा स्तुति
मगर कर नहीं पाते
बढ़ाई का काम।

कहे दीपकबापू चिंत्तन से
जी चुराते मिल जाते 
हर जगह लोग
चिंतायें बेचते महंगे दाम
करते लड़ाई का काम।
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7/31/16

सड़क स्मार्टफोन और इश्क-हिन्दी हास्य कविता (Road SmartPhone and love-Hindi Hasya kavita)

प्रेमिका ने कहा प्रेमी से
संभलकर कर मोटरसाइकिल चलाना
अपने शहर में
सड़क में कहीं गड्ढे
कहीं गड़्ढों में सड़क है।

प्रेमी ने कहा
‘प्रियतमे! तुम भी बैठे बैठे
स्मार्टफोन पर अपने
चेहरे पर मेकअप करते हुए
सेल्फी मत लेना
हिलने में खतरे बहुत
गिरे तो टीवी पर सनसनी
समाचार बन जायेंगे
अस्पताल पहुंचे तो ठीक
श्मशान में शोकाकुल
मुझे बहुत शर्मांयेंगे
कहेंगे इश्क ने
किया इसका बेड़ा गर्क है।
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-दीपक ‘भारतदीप’-

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