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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

18/11/09

अखबार की सुर्खियों में-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (akhbar ke surkhiyan-hindi vyangya kavitaen)

 हमने कहा था

‘जख्म पर मरहम लगा दो’

उन्होंने नमक छिड़क दिया।

पीड़ा से हम कराहते रहे

उन्होंने कहा

‘कुछ जोर से कराहो

ताकि हम मरहम लगाकर

जमाने को बता सकें कि

हमने किसी का दर्द कम किया’।

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नजारे तो इस दुनियां में बहुत हैं

मगर लोगों को बस दंगल ही भाता ।

अपने मंगल की बजाय

दूसरे के अमंगल पर मजा आता।

जिंदगी खेल है नजरिये का

जैसी नजर

वैसा ही जमाना हो जाता।

तारीफ के लिये कौन करे

इंसानों का भला

शिकायत के लिये

मजबूर करने वालों का नाम

अखबार की सुर्खियों में ही नजर आता।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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14/11/09

राहत और परेशानी-व्यंग्य कवितायें (rahat aur pareshani- hindi vyangya kavitaen)

आसमान से बादल बरस रहे हैं
क्योंकि पेड़ पौधे, पक्षु और पक्षी
पानी को तरस रहे हैं।
आम इंसान को खुशफहमी है कि
देवता उस पर मेहरबान है
उनकी पूजा पर ही ध्यान है,
कुछ इनमें ऐसे भी है
जो राहत का करते हैं व्यापार
सूखा जाता देख उनका दिल झूलस रहे हैं।
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अपने हर ख्वाब को
सच में बदलता देखकर भी
इंसान हताश हो जाता है,
अब नया कौनसा देखे
यह सोचकर परेशानी जुटाता है।

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12/11/09

काहे का गज़ब-हास्य व्यंग्य (kaisa gazab-hindi hasya vyangya)

सप्ताह में उस दुकान से एक बार तो बेकरी का सामान जरूर खरीदते हैं। ऐसा बरसों से चल रहा है। वह दुकानदार अच्छी तरह जान गया है। उसके कुछ पुराने कर्मचारी भी अब देखते ही सामान पूछना शुरु कर देते हैं भले ही दूसरे ग्राहक खड़े हों। हालांकि उस दुकानदार से हमारी कोई खास आत्मीयता नहीं है, यहां तक कि उसके साथ अभिवादन तक नहीं होता। हम दुकान पर पहुंचते ही सीधे सामान मांगना शुरु कर देते हैं।
उस दिन 145 रुपये का सामान लिया और उसे पांच सौ का नोट दिया। उस दुकानदार ने उसे अच्छी तरह रौशनी में देखा और फिर उसने अपनी दराज में रखा और बाकी पैसे वापस करने के लिये नोट गिनने लगा। इसी दौरान वह हमसे कहता रहा कि ‘आजकल नोट नकली आ रहे हैं इसलिये ध्यान से देखना पड़ता है।’ आदि आदि।
हम केवल मुस्कराये। उसने नोट गिनकर हमें दिये। हम उसे बिना गिने ही अपनी जेब में रखने लगे यह सोचकर कि इतना बड़ा सौदा नहीं है कि वह रकम कम देगा-ज्यादा देगा इस पर तो विचार ही नहीं किया? सामान का पैकेट और रुपये हाथ में लेकर अपने स्कूटर के पास पहुंचे और सामान रखकर नोट पर्स में रखने लगे पर लगा कि कुछ गड़बड़ है। नोट अधिक लग रहे थे। हमने गिने तो उसमें सौ रुपया अधिक था।
हमने बिना कुछ सोचे बिचारे वह नोट उसके पास जाकर बढ़ाया और कहा‘-भई, आपने यह सौ का नोट अधिक दे दिया।’
उसे हैरानी हुई और हमसे नोट अपने हाथ में लेते हुए बोला-‘हो सकता है कि बात करते हुए हमसे नोट गिनने में गलती हो गयी। वैसे आप पहले आदमी हैं जो नोट वापस कर रहे हैं। ऐसे कई बार गलती हमें बाद में याद आती है पर कोई भी आदमी हमें नोट वापस नहीं करता। अपने पास रखकर सभी पचा जाते हैं। आपकी ईमानदारी अच्छी लगी।’
हमने हंसते हुए कहा-‘सच तो यह है कि हम नोट गिन नहीं रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर गिने। यकीन करो कि अगर यह एक बार पर्स के हवाले होते तो फिर हमें भी वापस करने की याद नहीं आनी थी। वैसे आपके साथ जिन लोगों ने जानबूझकर ऐसा किया उनको आपका पैसा पच ही गया आप यह कैसे कह सकते हैं?’
वह दुकानदार हमें घूरकर देखने लगा और बोला-‘हां, यह तो नहीं सकता कि वह पचा पाते हैं कि नहीं।’
हमने उससे कहा-‘वह आपका दिया अधिक पैसा रख लेते हैं पर कितनी देर? यह तो माया चलती फिरती है इसलिये वह रुपया आखिर वह फिर कहीं जाना है। यह हमारी ईमानदारी का प्रमाण नहीं बल्कि डर का प्रमाण है। एक तो यह रुपया अधिक देर हमारे पास वैसे ही नहीं रहेगा। दूसरा पचेगा भी नहीं! इसलिये वापस किया।’
अधिक देर बात करना ठीक नहीं था। हमने सौदा रखा और वहां से चले आये। उसके बाद भी अनेक बार उसकी दुकान पर गये पर कभी इसकी चर्चा नहीं की।
उस दिन दुकान पर पहुंचे तो उसने हमसे पूछा-‘आपको मैंने बैग दिया है कि नहीं।’
मुझे आश्चर्य हुआ और हमने उससे कहा-‘नहीं, आपने मुझे कोई बैग नहीं दिया।’
उसने अपने पीछे हाथ किया और एक हैंडबैग हमारी तरफ बढ़ाते हुए कहा-‘मैंने पूछने की गुस्ताखी इसलिये की क्योंकि यह केवल कुछ खास ग्राहकों को दिवाली का गिफ्ट दिया था। मुझे याद नहीं आ रहा था कि आपको दिया कि नहीं। हर साल हम कुछ न कुछ ग्राहकों को उपहार देते हैं।
मैंने वह हैंडबैग अपने हाथ में लिया। उसके यहां के एक कर्मचारी ने मुझसे कहा कि ‘सेठ जी बहुत दिनों से आपको यह उपहार देने के लिये कह रहे थे, मैं ही भूल जाता था। आज सेठ जी खुद पूछा तब मुझे भी याद आया।’
उस समय भी वहां पर पांच लोग दूसरे खड़े थे पर उसने बिना उनका विचार करते हुए मुझे हैंडबैग दिया। इतने बरसों से उसने दूसरे खास ग्राहकों को गिफ्ट दिया पर हमें खास नहीं माना। उसके खास तो उसके थोक व्यापारी रहे होंगे। खेरिज ग्राहकों में उसने किसी दूसरे को खास माना होगा यह भी नहीं लगता। बहरहाल उस सौ रुपये की वापसी ने उसकी नजरों में खास बना दिया। उसकी नजर में हम ईमानदार हैं पर हमें खुद को नहीं लगता। वैसे पहले भी कई बार अनेक दुकानदारों को अधिक पैसे हमने वापस लौटाये हैं। वह लोग कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। किस बात की! ईमानदारी की! अरे भई, हमने कई बरस पहले एक बार अपनी जिंदगी में अजमाया है। रास्ते से बीस का नोट मिला था उसे रख लिया। मगर उसके एक दिन बाद ही हमारी साइकिल को एक टूसीटर वाले ने टक्कर मारकर तोड़ दिया। हम बच गये यह गनीमत थी पर उस साइकिल को बनवाने में सौ रुपये लग गये। बस तब से तय कर लिया कि ऐसे पैसे को हाथ भी नहीं लगायेंगे।
यह हमारा डर है जो जबरदस्ती ईमानदार बनाये दे रहा है। कोई जब यह कहता है तो हम उसे समझाने लग जाते हैं कि ‘भई, ऐसा नहीं है। दरअसल हमारा हाजमा खराब है कि ऐसा पैसा हमें पचता नहीं। यह एक रोग है जिसका इलाज किसी के पास नहीं है।’
पहले शराब पीते थे। अब छोड़ दी। जो अब हमारे सामने पीते हैं और हमें परे देखकर कहते हैं कि‘अच्छा हुआ तुमने छोड़ दी। वाकई क्या गजब की तुम्हारी संकल्प शक्ति है।’
हम उनको समझाते हैं कि‘नहीं यार, इससे हमें उच्च रक्तचाप हो गया था। डाक्टर से कहा छोड़ दो नहीं तो मुश्किल में आ जाओगे यह संकल्प शक्ति नहीं हमारा डर है जो हमें पीने नहीं देता। हम तो उन लोगों के कायल हैं जो शराब पीकर पचा जाते हैं।’
वह पीने वाले कहते हैं कि ‘नहीं यार, तमाम तरह की व्याधियां हमारे शरीर में हैं तुम क्या जानो? मगर क्या करें पीना नहीं छूटता।’
उस दिन पार्क से योग साधना कर वापस आ रहे थे तो एक ऐसे सज्जन हमें मिले जो योग साधना के फायदे हमें सुनाकर उस शिविर में ले गये जिसमें योग साधना सिखाई जा रही थी। इस बात को सात वर्ष होने के आ गये। उन्होंने कुल जमा सात दिन भी वहां हाजिरी नहीं दी पर हमें याद है वह किसी तरह हमें वहां लगे और फिर वह शिविर छोड़ दिया । मगर हम डटे रहे। वह कहने लगे-‘यार गजब करते हो? अनवरत छह साल से ऊपर हो गया पर तुम्हारा क्रम भंग नहीं हुआ। मान गये तुम्हारे दृढ़ निश्चय को!’
हमने उसको भी समझाया-‘यार, यह बात नहीं है। इसके बिना हम अब चल ही नहीं सकते। जब किसी दिन किसी मरीज को अस्पताल से देखकर आते हैं उसके अगले दिन ही अपनी योगसाधना की अवधि और आसन बढ़ा देते हैं क्योंकि हमें डाक्टरों से बहुत डर लगता है। वैसे कभी कभी पौन घंटा घर पर ही करते हैं पर जब किसी की गमी से जाते पर वहां जब अन्य लोग बीमारियों का बखान करते हैं तो उनको उनको सुनकर हमारे अंदर डर का बवंडर खड़ा होता है और हम घर पर ही अधिक समय लगाते हैं या फिर बाहर अपने एक मित्र के यहां करने चले जाते हैं। इसमें दृढ़ संकल्प जैसी कोई चीज हमें नहीं लगती।’
लोग पता नहीं हमारी बात समझते हैं कि नहीं! क्योंकि वही लोग जब दोबारा मिलते हैं तो फिर वही बात-‘आप तो गजब करते हैं।’
हम कभी नहीं समझ पाते कि इसमें गजब क्या है? हम डरते हैं तो बचने के रास्ते ढूंढते रहते हैं और लोग तो बहादुर हैं ओर फिर उनका हाजमा हमसे बेहतर है। उल्टे हम तो उन लोगों के प्रशंसक हैं जो गलत पैसा हजम कर जाते हैं। शराब पीकर भी मजे में रहते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह कि बिना योग साधना के बहुत से लोग स्वस्थ होकर विचरण करते हैं उनकी प्रशंसा करना भी हमें अच्छा लगता है। बचपन से सुनते आ रहे हैं कि बुरे काम का बुरा परिणाम होता है। इसलिये हम उन लोगों को ही योगी मानते हैं जो बुरा काम कर भी अपनी जिंदगी मजे में गुजारते हैं। कम से कम बाहर से तो ऐसा ही लगता है। अंदर की बात वही जाने। बाकी सभी जानते हैं कि हमारे अंदर डर है जिसका कहीं कोई इलाज नहीं है।
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10/11/09

पसंद का संकट-हिंदी व्यंग्य (pasand ka sankat-hindi vyangya)

अधिकतर लड़कियां अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती। यह पता अब जाकर इस आधुनिक समाज को चला है। सच कहें तो सदियों से पेट में दबी बात अब जुबान में आयी है वरना तो कौन इसे मानता? आधुनिक संचार माध्यमों में तमाम बुराईयां हो सकती हैं पर उससे ऐसे सच सामने भी आने लगे हैं जिन पर समाज जानबूझकर पर्दा डालता आया है। अपने घर का सच बताने में हर पुरुष शर्माता है। चार लोगों के बीच वह यह साबित करता है कि उसका अपने घर पर पूरा नियंत्रण है। अगर कोई गलती से कह दे कि ‘मेरी घर में नहीं सुनी जाती है तो सुनने वाले उसकी मजाक उड़ायेंगे।
इसके विपरीत चार औरतें आपस में मिलेंगी तो अपने परिवार के दोष गिनाने में नहीं चूकेंगी। सासें एकत्रित हुईं तो बहुओं और अगर बहुऐं मिली तो सासों की शिकायत करती हैं।
कोई कोई तो कहते भी नहीं झिझकती कि ‘हमारे पति तो अपनी मां के चमचे हैं।’
कोई मां भी कह जाती है कि ‘मेरा लड़का तो जोरु का गुलाम है।
मान लीजिये ऐसे वार्तालाप में कोई पुरुष दूसरे की निंदा सुन रहा हो तो वह भी ऐसा जाल में फंसता है कि चर्चा किये जाने वाले पुरुष को वैसा ही समझ लेता है। अगर औरत के साथ पुरुष का रक्त संबंध हुआ तो वह उस पुरुष के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी भी कर जाता है-‘कैसा आदमी है? क्या उसे घर चलाने की अक्ल नहीं है, लगता है बाप ने कुछ सिखाया ही नहीं है।’
एक औरत मां, पत्नी, बहिन सास तथा दादी तथा अन्य रिश्तों में पुरुष का साथ निभाती है तो पुरुष भी पुत्र, पति, ससुर तथा भाई के रूप में निभाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि स्त्री पुरुष के संबंध उसके रिश्तों के अनुसार बनते और बिगड़ते हैं। जब कहीं स्त्री पुरुष के आपसी रिश्ते बिगड़ते हैं तो रक्त संबंधों के अनुसार हर कोई किसी का पक्ष भी लेता है। कहते हैं कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य कोई नहीं जानता पर यह फार्मूला पुरुष पर भी समान रूप से लागू है।
सफल पुरुष वही है जो स्त्रियों के आपसी संबंधों में बस हां हु ही कहता रहे।
कई बार पत्नी ताना देती है कि ‘जाओ, अपनी मां की बात सुनो। मेरी सुनते ही कहां हो?’
उसके तत्काल बाद मां की भी ताना मिल सकता है कि ‘जा जोरु के गुलाम! तेरी बात पर अब मेरा भरोसा नहीं रहा।’
एक दिन हम एक सेठजी की दुकान पर खड़े थे। उनका एक मित्र आया और बोला-‘तुझे कल सामान खरीदने बाहर चलना है कि नहीं। इतनी देर से दुकान पर न बताने आया और न ही नौकर के हाथ से संदेश भेजा।’
सेठजी ने कहा-‘यार, घर पर एक काम है। देखना पड़ेगा कि चल पाऊंगा कि नहीं।’
उस समय फोन की सुविधा ऐसी नहीं थी जैसी आज है। वह आदमी बोला-‘सीधा कह न! बीबी से पूछे बिना कोई काम नहीं कर सकता।’
सेठजी ने भी सरल भाव से कहा-‘तुम क्या बीबी से बिना पूछे चल रहे हो। परसों जब मैंने चलने को कहा था तो क्यों नहीं चला? तेरा नौकर बता रहा था कि घर से मना कर दिया है। अब तुम मेरे को अपनी सफाई मत देना।’
वह आदमी हंस कर चला गया। उसके जाने के बाद सेठजी हमसे बोले-‘एक बात कहूं। बाहर आदमी कितना भी शेर बनता हो पर घर में होते सभी भीगी बिल्ली हैं। यह अलग बात है कि कोई इस बात को मानता है कि नहीं।’
औरत अगर बहु है तो वह चाहती है कि पति अपनी मां यानि उसकी सास से पहले उसकी बात सुने। अगर मां है तो वह चाहती है कि इतने बरसों से जिस लड़के को पाला है वह मेरी बात सुने।’
फिर इस पर बहने और अन्य रिश्ते भी होते हैं। बहिन सोचती है कि भाई अपनी साली से अधिक हमें तवज्जो दे। साली है तो वह चाहती है कि जीजाजी हमें अपनी बहिन से अधिक सम्मान दें।
हमारे यहां समाज पुरुष प्रधान इसलिये है क्योंकि अभी भी अधिकतर प्रत्यक्ष आय का भार उस पर है-याद रहे अमेरिकी विशेषज्ञ कहते हैं कि सामान्य भारतीय गृहिणियां अपनी पति से अधिक आय करती हैं यानि वह इतना काम करती हैं कि अगर उनका रुपये में मूल्यांकन हो तो पति से अधिक आय उनकी होना चाहिये। इस प्रत्यक्ष आय के कारण उसका प्रभाव घर पर रहता है पर दूसरी समस्या उसके साथ यह है कि वह हमेशा घर से बाहर ही होता है। दिन में घर पर क्या हुआ? किसने क्या कहा? उसे पता तब चलता है जब वह शाम को घर वापस आता है। हर कोई अपने हिसाब से अपनी बात उसे सुनाता है। ऐसे मेें उसकी थकान और तनाव बढ़ जाता है। यह घर घर की कहानी है। इस पर हंसने जैसी कोई बात नहीं है। यदि इन बातों पर आप हंसते हैं तो इसका आशय यह है कि अभी आपका विवाह नहीं हुआ या फिर आप हमसे क्या अपने आपसे अपना सच छिपा रहे हैं।
अब सवाल है कि लड़कियां ही ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है तो फिर उसके जीवन साथी से आप क्या कहेंगे? मां की बात सुन क्योंकि पुरुष तो तू है। इधर दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा के भी कानून बना रखे हैं तब आदमी पर एक दबाव तो रहता ही है। एक अजीब संयोग है कि इस समय वंदेमातरम को लेकर तमाम तरह की चर्चा है ऐसे में ही एक टीवी चैनल से यह संदेश निकला कि ‘लड़कियां ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है।’ इन्हीं लड़कियों में ही भविष्य की मातायें हैं और कभी वंदेमातरम शब्द सुनकर उनको भी खुशी होगी पर अभी उनके लिये इसका क्या मतलब? ऐसे में अगर कोई लड़का अगर पसंद होने और करने के लिये-आजकल दोनों की मर्जी चलती है- किसी लड़की से मिलने गया और जाते ही बोला दिया ‘वंदेमातरम’, तब वह तो पहली नजर में ही अस्वीकृत कर दिया जायेगा। हमने टीवी चैनल के उस कार्यक्रम के कुछ हिस्से कभी कभी देखे हैं और उसमें लड़कियों की लड़कों की माताओं पर टिप्पणियां भी सुनी है तब यह सोचते हैं कि समाज ने बहुत समय से कई बातें दबा कर रखी हैं जो सामने आ रही हैं।
हमारे एक सेठ जी कहते थे कि सफल पुरुष वही है जो औरतों की विवाद में बस हां हु करता रहे। जिस आदमी ने सोचा कि मैं कोई फैसला कर शांति करवाऊं वह अपने घर के साथ ही अपने दिल की भी शांति ऐसे दांव पर लगा देगा कि काम पर भी उसका मन नहीं लगेगा।’
बहरहाल स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के साथ ही स्त्रियों के आपसी रिश्ते भी होते हैं और उनके बीच जब पुरुष फंसता है और बात ऊंच नीच हुई तो पुरुष का ही नाम खराब होता है क्योंकि नाम उसके घर पर ही चलता है। इस विषय पर एक विद्वान का कथन याद आ रहा है। जब यह निर्णय किया गया कि स्कूल में प्रवेश के समय पिता के नाम की अनिवार्यता नहीं होगी और मां भी अपना नाम वहां लिखा सकती है। तब उन विद्वान ने कहा था कि ‘पुरुष का तो बस एक नाम ही था वरना तो घर तो चलाती स्त्रियां ही हैं। अब वह नाम भी पुरुष के हाथ से गया।’
कहने का तात्पर्य यही है कि इस संसार में किसी रिश्ते को समझना और उस बयान करना ही गलती है। हालात, समय और स्वार्थ अपने हिसाब से संबंध बदलते रहते हैं।

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09/11/09

हमदर्दी जताने की कला-व्यंग्य कविता (hamdardi ke kala-vyangya kavita)

हमदर्दी जताने की कला
हमें कभी नहीं आई
किसी का दर्द देखकर
मन रोया मन भर आंसु
पर आंखें दरिया न बन पाई।
शायद लोग दिमाग से सोचते हैं
इसलिये हमदर्दी के शब्द जल्दी ढूंढ लेते
दिल तक नहीं पहुंचता
दूसरे का दर्द
कर लेते हैं दिखावे में कमाई।
नहीं करना सीखा पाखंड
इसलिये दूसरे के घाव पर मरहम लगाकर भी
अपने लिये ओढ़ लेते हैं तन्हाई।

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08/11/09

योग साधना के व्यापक अर्थ हैं-चिंत्तन आलेख (yogsadhna-hindi lekh)

वह योगासन शिक्षक हैं न कि एक संपूर्ण योग गुरु-कम से कम योग के संबंध में उनका से कथन कि ‘योग तो एक सांस लेने की क्रिया  है’ यही समझा में आ सकता है। जिस भारतीय योग को हम जानते हैं उसके आठ भेद हैं-यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्यहार,धारणा,ध्यान और समाधि।
भारतीय योग एक विज्ञान है न कि एक सामान्य व्यायाम। योग का सामान्य अर्थ है ‘जोड़ना’ पर वास्तव में इसका भावार्थ है स्वयं को पहले आत्मा और फिर परमात्मा से जोड़ना। इसमें संकल्प का सबसे बड़ा खेल है। अगर साधक का संकल्प पवित्र और दृढ़ है तो वह समस्त प्रक्रियाओं को सहजता से पार करता है। योग जीवन जीने की एक कला है न कि केवल अपने को स्वस्थ रखने वाला व्यायाम।
पहले हम संकल्प की बात करें। सांस तो सभी लेते हैं। बुद्धिमान विक्षिप्त, ज्ञानी विज्ञानी, अपराधी फरियादी और विशिष्ट सामान्य मनुष्य हमेशा सांस लेते हैं। फिर भी सभी प्रकार के मनुष्यों में अंतर होता है जो उनके कर्म तथा व्यवहार से प्रकट होता है। इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक है योग का दूसरा है रोग का। भोग तो सभी करते हैं पर योगी न केवल संयम बरतते हुए उसका पूरा आनंद उठाते हैं जबकि भोगों में ही अपना लक्ष्य देखने वाले रोग की तरफ अग्रसर होते हैं और उनका आनंद भी क्षणिक ही प्राप्त होता है।
मनुष्य का संकल्प हमेशा पवित्र होना चाहिये। उसके बाद आता है नियम। योग करने के लिये हमेशा साफ सुथरा स्थान चुनना चाहिये। जिन वस्तुओं के उपभोग को योग ज्ञान निषिद्ध बताता है उससे परे रहना चाहिये। योग हमेशा खाली पेट प्रातः करना चाहिये। अगर शाम को करना हो तो पांच घंटे पूर्व कोई वस्तु खाना नहीं चाहिए। अर्थात इसका नियम है। फिर आते हैं योगासन और प्राणायम पर। योगासन के माध्यम से अपनी देह के विकार निकालते हुए बाद में प्राणायाम के द्वारा अपने विकारों को ध्वस्त करना भी जरूरी है। फिर आता है धारणा, प्रत्याहार तथा समाधि। कहने का तात्पर्य यह है कि योग एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे गुजर कर मनुष्य अपने जीवन में प्रखरता और तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त करता है।
अब हम उन योग शिक्षक द्वारा दिये जा रहे प्रशिक्षण की बात करें तो निश्चित रूप से उनकी प्रशंसा करना चाहिये। सच तो यह है कि जो लोग योग करना चाहते हैं यह योगासन और प्राणायाम उनके अनुसार सीख लें। अब सवाल आता है कि फिर आखिर उनसे असहमति किस बात की है। हमारी असहमति तो केवल इस बात पर है कि योग साधना का इतना संकीर्ण उद्देश्य मत प्रचारित करिये कि पूरा विश्व उसे केवल दैहिक साधना मानकर रह जाये। बात थोड़ी आगे भी करें तो लगता है कि जब आदमी देह और मन के विकारों से मुक्त हो जाता है तो वह इतना प्रखर और बुद्धिमान हो जाता है कि उस पर कोई अपनी बात बिना प्रमाण के लाद नहीं सकता। वह मन और देह का ऐसा विशेषज्ञ हो जाता है जो अपने चित्त की अवस्था को भी दृष्टा की तरह देखता है। निद्रा और जाग्रतावस्था दोनों में वह सतर्क रहते हुए जीवन का आनंद आता है।
योग को व्यायाम या सांस लेने की क्रिया कहना अपना अज्ञान प्रदर्शन करना ही है। उसी तरह यह कहना कि योग से किसी धर्म को खतरा नहीं है, अपने आप में इसका प्रमाण है कि इसका अध्यात्मिक महत्व आपको नहीं मालुम है। योग साधना करते हुए आदमी आत्मकेंद्रित होता चला जाता है और जब वह दृष्टा की तरह चरम विचार के शिखर पर पहुंचता है तब उसे जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है उसके आगे आज के सारे मौजूदा धर्म एक भ्रम लगते हैं। तय बात है जो जितना परमात्मा के निकट जाकर निहारेगा उतना ही उसके नाम पर फैलाये भ्रम से मुंह फेरेगा। इस हिसाब से तो धर्म के नाम पर फैले कर्मकांड उसके लिये त्याज्य हो जायेंगे। इसे वह लोग जानते हैं जो योग साधना के प्रभाव को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। खासतौर से जो श्रीगीता का अध्ययन कर ले उसके सामने तो सारे संसार  का सत्य खड़ा हो जाता है। एक बात जो साधकों को परेशान करती है कि वह अपने इस जीवन के उतार चढ़ाव की पहचान कैसे करें? इसके लिये उनको ज्ञान की जरूरत पड़ती है और यह उद्देश्य श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र और बहुत शानदार ग्रंथ का अध्ययन कर प्राप्त किया जा सकताहै। विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक योगासन और प्राणायम में अत्यंत दक्ष हैं पर श्री मद्भागवत गीता के संदेश का अर्थ अभी उनको समझना होगा। श्रीगीता का ज्ञान पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण करना भी जरूरी है जो कि योग का ही एक भाग है।
जो साधक दक्ष हो गये वह धर्म के नाम चल रही भ्रामक विचारों को त्याग देंगे। कर्मकांड उनको बेकार लगेंगे। श्रीमद्भागवत गीता में स्वर्ग पाने के विचार को त्यागने का स्पष्ट मत व्यक्त किया गया है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को छोड़ कर अन्य सभी विचाराधारायें स्वर्ग का सपना दिखाती हैं।
अब तो यह लगने लगा कि योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने और समझने का विचार करना चाहिए। जब योगासन और प्राणायाम से देह और मन के विकार निकल जाते हैं तब एक स्फूर्ति आती है तब मन कुछ नया चाहता है। ऐसे में आदमी के अहंकार और प्रचार का मोह भी आ जाता है जो उसे ऐसे रास्ते पर ले जाता है जहां भटकाव के अलावा और कुछ नहीं होता। योग शिक्षक विश्व भर में लोक प्रिय हैं पर अभी भी शायद कहीं कुछ बाकी है जो अन्य विचाराधाराओं के समूहों में अपना लोहा मनवाना चाहते हैं। अपने समुदाय में शायद उनको लगता है कि अब इससे अधिक सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते। अगर ऐसा न होता तो शायद वह ऐसी जगह न जाते जो बाद में उनके लिये बदनामी का कारण बनती। एक बाद तय रही कि योगासन और प्राणायाम करने से दैहिक और मानसिक रूप से स्वस्थ भले ही हो जाये पर ज्ञानी नहीं हो जाता है। उसके लिये जरूरी है श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन ताकि वह समझ सके कि जीवन का रहस्य क्या है?
दूसरी बात यह है कि योगसाधना ओउम शब्द तथा मंत्रों के जाप बिना अधूरी है-कम से गात्रत्री मंत्र तो अवश्य ही जाप करना चाहिये। श्रीगीता में ओउम शब्द तथा गायत्री मंत्र का महत्व प्रतिपादित किया गया है। याद रखिये श्रीमद्भागवत गीता का कथन भगवान श्रीकृष्णजी का है जिनको योगेश्वर भी कहा जाता है। चूंकि दूसरी विचाराधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं करते इसलिये उनको आधीअधूरी योग साधना बताकर उनको भ्रमित करना ठीक नहीं है। फिर इस समय सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले अपने पूरे समुदाय में जाग्रति लाने का प्रयास ही जारी रखना चाहिये। यह काम खत्म नहीं हुआ है भले ही प्रचार माध्यमों में ऐसा प्रचार होते दिखता है। दूसरी बात यह है कि यह सम्मान इसलिये भी मिल रहा है क्योंकि आपका अपना समुदाय ही दे रहा है और जिसकी ताकत विश्व भर में फैली है।
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02/11/09

आज श्री गुरुनानक जी का 541वां प्रकाश पर्व-आध्यात्मिक लेख (gurunanak jayanti and prakash parv-hindi lekh)

आज श्री गुरुनानक देव जी का 541वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। सच तो यह है कि समाज को अमृत संदेश देने वाले महापुरुष आत्मा को अजन्मा और अमर मानते हैं इसलिये उनकी जयंती का प्रकाशपर्व में रूप में ही मनाया जाना चाहिये क्योंकि वह प्रकट होकर फिर अपने परमधाम चल जाते हैं और उनकी देह ही केवल जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त होती है जबकि वह स्वयं अपने भक्तों के स्मरण में सदैव जीवंत रहते हैं।

श्री गुरुनानक देव जी ने स्वयं किसी धर्म की स्थापना नहीं की। उनके बाद आये गुरुओं से अपने समय की हालातों को देखकर सिख पंथ की स्थापना भी धर्म रक्षा के लिये की थी। श्री गुरुनानक देव जी का जीवन सदैव समाज चिंतन और सुधार में बीता। बहुत कम लोग हैं जो आज के सभ्य भारतीय समाज में उनकी भूमिका का सही आंकलन कर पाते हैं। उनके काल में भारतीय समाज अंधविश्वासों और कर्मकांडों के मकड़जाल में फंसा हुआ था। कहने को लोग भले ही समाज की रीतियां निभा रहे थे पर उसकी रक्षा के लिये उनके पास कोई योजना नहीं थी। राजनीतिक रूप से विदेशी आक्रांता अपना दबाव इस देश पर बड़ा रहे थे। उसके साथ ही उनके साथ आये कथित विद्वान लोगों को माया मोह की तरफ दौड़ाते दिखे। अधिकतर राजाओं का जीवन प्रजा की भलाई की बजाय अपने निजी राग द्वेष में बीत रहा था। वह राज्य के व्यवस्थापक का कर्तव्य निभाने की बजाय उसके उपभोग के अधिकार में अधिक संलग्न थे। यही कारण था कि जन असंतोष के चलते विदेशी राजाओं ने उनको हराने का सिलसिला जारी रखा। इधर सामान्य लोग भी अपने कर्मकांडो में ऐसे लिप्त रहे उनके लिये ‘कोई नृप हो हमें का हानि’ की नीति ही सदाबहार थी।

मुख्य विषय यह था कि समाज धीरे धीरे विदेशी मायावी लोगों के जाल में फंसता जा रहा था और अपने अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति उसका कोई रुझान नहीं था। ऐसे में महान संत श्री गुरुनानक देव जी ने प्रकट होकर समाज में अध्यात्मिक चेतना जगाने का जो काम किया वह अनुकरणीय है। वैसे महान संत कबीर भी इसी श्रेणी में आते हैं। हम इन दोनों महापुरुषों का जीवन देखें तो न वह केवल रोचक, प्रेरणादायक और समाज के लिये कल्याणकारी है बल्कि सन्यास के नाम पर समाज से बाहर रहने का ढोंग करते हुए उसकी भावनाओं का दोहन करने वाले ढोंगियों के लिये एक आईना भी है जिसमें वह तथा उनके भक्त असलियत देख सकते हैं। इन दोनों महापुरुषों ने पूरा जीवन समाज में रहकर समाज के साथ व्यतीत किया। भारतीय अध्यात्मिक संदेश अपने पांवों पर अनेक स्थानों घूमते हुए सभी जगह फैलाया। श्री गुरुनानक देव जी तो मध्य एशिया तक की यात्रा कर आये।
श्री गुरुनानक देव जी के सबसे निकटस्थ शिष्य मरदाना को माना जाता है जो कि जाति से मुसलमान थे। आप देखिये उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरुनानक जी के सेवा में गुजारा। इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उसने कोई अपना धर्म छोड़ने या पकड़ने का नाटक किया। दरअसल उस समय तक धर्म शब्द के साथ कोई संज्ञा या नाम नहीं था। मनुष्य यौनि मिलने पर संयम, परोपकार, दया तथा समभाव से जीवन व्यतीत किया जाये-यही धर्म का आशय था। आज धर्मों के जो नाम मिलते हैं वह एक सोचीसमझी साजिश के तहत समाज को बांटकर उस पर शासन करने की नीति का परिणाम है।
श्री गुरुनानक देव जी के समय इस देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक दृष्टि से संक्रमण काल था। वह जानते थे कि भौतिकवाद की बढ़ती प्रवृत्ति ही इस समाज के लिये सबसे बड़ा खतरा है और जिसमें धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इससे व्यक्ति की चिंतन क्षमता का हृास होता है और वह बहिर्मुखी होकर दूसरे का गुलाम बन जाता है। भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता मनुष्य को दास बना देती है। अधिक संचय की प्रवृत्ति से बचते हुए दान, सेवा और परोपकार करने से ही समाज समरसता आयेगी जिससे शांति और एकता का निर्माण होगा-यही उनके संदेशों का सार था। सबसे बड़ी बात उनका जोर व्यक्ति निर्माण पर था। हम अगर इस पर विचार करें तो पायेंगे कि व्यक्ति मानसिक रूप से परिपक्व, ज्ञानी और सजग होगा तो भले ही वह निर्धन हो उसे कोई भी बांध नहीं सकता। यदि व्यक्ति में अज्ञान, अहंकार तथा विलासिता का भाव होगा तो कोई भी उसे पशु की तरह बांध कर ले जा सकता है। आज हम देख सकते हैं कि टीवी चैनलों पर कल्पित पात्रों पर लोग किस तरह थिरक रहे हैं। उसी में अपने नये भगवान बना लेते हैं। कई युवक युवतियों यह कहते हुए टीवी पर देखे जा सकते हैं कि हम तो अमुक बड़ी हस्ती को प्यार करते हैं। यह अध्यात्मिक ज्ञान से दूरी का परिणाम है। इसलिये आवश्यकता इस बात है कि बजाय हम इस बात पर विचार करें कि दूसरे धर्म के लोग हमारे विरोधी हैं इस बात पर अधिक जोर देना चाहिये कि हमारे समाज का हर सदस्य दिमागी रूप से परिपक्व हो। अध्यात्मिक रूप से अपरिपक्व युवक हो युवती समाज रक्षा में सहयोगी नहीं बन सकते।

इस देश की मुख्य समस्या यह है कि मनुष्य ही मनुष्य का पशु रूप में दोहन करता है। श्री गुरुनानक देव जी ने इसी तरफ इशारा करते हुए कहा है कि
‘जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु।’
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य का ही रक्त पीता है उसका चित कैसे निर्मल हो सकता है।
‘खावहि खरचहि रलि मिलि भाई।
तोटि न आवै वधदो जाई।।;;
हिंदी में भावार्थ-
भाई, सभी मिलकर खर्च करो और खाओ। इससे टोटा नहीं पड़ता बल्कि वृद्धि होती है।’
ऐसे एक नहीं हजारों संदेश है जो आज के संदर्भ में ही उतने प्रासंगिक हैं जितने उनके इस धरती पर प्रकट रहते हुए थे। ऐस महान संत श्री गुरुनानक देव जी का स्मरण करने मात्र से हृदय प्र्फुल्लित हो उठता है। उनका जीवन इसलिये भी प्रेरक है क्योंकि उन्होंने उसे सामान्य मनुष्य की तरह बिताया। ऐसे महान संत को कोटि कोटि प्रणाम। वाहे गुरु की जय, वाहे गुरु की फतह।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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31/10/09

समाज हित के लिये सकारात्मक दृष्टिकोण आवश्यक-आलेख (positive think neccesary for social welfare-hindi article)

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में व्यक्ति को सदैव सकारात्मक सोच की प्रेरणा दी जाती है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि मनुष्य का मन उसे अपने सुख सुविधायें पाने के लिये हमेशा विचलित किये रहता है। ऐसे में मनुष्य या तो दिमागी रूप से आलसी होकर रह जाता है या फिर उसके अंदर नकारात्मक विचारों के प्रति रुझान बढ़ता है।

देखा जाये तो हमारे देश में नकारात्मकता का बोलबाला हमेशा ही रहा है इसलिये धर्मग्रंथों में नाटकीयता के साथ अध्यात्मिक ज्ञान भी सम्मिलित किया गया है पर लोग उनमें शामिल नाटकीय विषयों को मनोरंजन की दृष्टि से देखते हैं जबकि उसमें शामिल अध्यात्मिक ज्ञान ही ग्रहण करने लायक है यह बहुत कम लोग सोच पाते हैं।
लोगों के दृष्टिकोण का यह हाल है कि उनको नकारात्मक विषयों के प्रति अधिक रुझान रहता है।
हमारे देश में यह पंरपरा है कि लड़का जब बाहर कहीं जाता है तो अपने माता पिता के पांव छूता है और आता है तो छूता है। ऐसे दृश्य को लोग निरपेक्ष भाव से देखते हैं। कभी आपसी चर्चा में ऐसे नहीं कहते कि ‘अमुक लड़का अपने माता पिता के पांव छूता है’। इसके विपरीत अगर किसी लड़के ने माता पिता पर हमला कर दिया तो चीत्कार कर उठते हैं ‘आजकल कैसा खराब जमाना आ गया है’।
ठीक उसी तरह हर माता अपने माता अपने बच्चे को प्यार करती है पर कुछ ऐसी घटनायें ऐसी भी हो जाती हैं जब वह अपने बच्चे का गला घोंट देती है। तब भी ऐसी ही चीत्कार। कहने का तात्पर्य यह है प्रेम और सम्मान निरपेक्ष भाव से देखे जाते हैं और चर्चा के लिये घृणा के साथ हिंसा के विषय लोगों को अच्छे लगते हैं। यह आज से नहीं बल्कि बहुत समय से होता रहा है। आजकल समाचार पत्र और टीवी ने तो एक तरह से आदमी की सोच को लुप्त ही कर दिया है। उसमें आये दिन ऐसे ही समाचार आते हैं। उसमें खलपात्रों का भी प्रचार किया जाता है। अमुक डान ने यह किया तो अमुक ने वह किया। एक तो समाज में वैसे ही नकारात्मक सोच की प्रधानता उस परा टीवी और समाचार पत्रों के खलपात्रों का महिमामंडल आज की पीढ़ी को भटका रहा है। सच तो यह है कि समाज में अच्छाई और बुराई का भेद ही समाप्त हो चुका है। बुराई और दुस्साहस को सक्रियता और अच्छाई को निष्क्रियता की तरह प्रदर्शन करना अंततः इस देश के लिये भारी संकट बनता जा रहा है।

अपने विषयों की प्रस्तुति की आक्रामक अभिव्यक्ति करने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है यही कारण है कि फिल्म, नाटक, धारावाहिक और साहित्य में सकारात्मक सृजन का अभाव दृष्टिगोचर हो रहा है। लोग तात्कालिक उपलब्धियों के लिये चीख और चिल्ला कर अपनी अभिव्यक्ति इस तरह दे रहे हैं जैसे कि उसके बिना उनकी कोई सुनेगा ही नहीं। यह सही है कि किसी भी प्रकार के दृश्यव्य और शाब्दिक सृजन में नायक की प्रतिष्ठा तभी बढ़ती है जब उसके सामने खलनायक हो पर इसमें नाटकीयता के साथ संदेश भी होना चाहिए। मगर हमेशा ही नायक और खलनायक की द्वंद्वपूर्ण कथा संदेश देने वाली नहीं होती। हमारे पुराने ग्रंथों में भी नायक और खलनायकों की चर्चा है पर उनमें ऐसे भी पूज्यनीय लोग भी चर्चित रहे हैं जिन्होंने किसी भौतिक खलनायक का मुकाबला न करते हुए अपने सृजन से ही अपना नाम प्रतिष्ठित किया। हम भगवान श्रीराम और कृष्ण का नाम जानते हैं पर इन्हें जननायक की तरह प्रतिष्ठित करने वाले बाल्मीकी और वेदव्यास कभी प्रत्यक्ष किसी बैरी से नहीं लड़े। महाराज शुकदेव ने श्रीमद्भागवत की कथा का प्रतिपादन किया। विदुर और उनके पुत्र संजय ने भी अपना नाम प्रतिष्ठित करते हुए किसी प्रकार का युद्ध नहीं किया। कहने का तात्पर्य यह है कि दृश्यव्य और शाब्दिक सृजन में नायक और खलनायक की द्वंद्वपूर्ण नाटकीयता का महत्व तो होता है पर सभी कुछ वही नहीं होता। सकारात्मक संदेश देने वाले लोग भी नायक से कम नहीं होते।
वैसे इस नकारात्मक सोच के पीछे हमारी फिल्मों का भी कम योगदान नहीं है। उसमें नायक, नायिका, खलनायक और खलनायिका की प्रधानता रही है। लोग भी इसके आदी हो गये हैं। नायक या नायिका तो सभी नहीं बन सकते-आजकल के जमाने में सभी लोग इस सत्य का जाने गये हैं-इसलिये लोग वास्तविक खलनायकों के कृकृत्यों का मुकाबला करने की बजाय उनको अनदेखा कर जाते हैं। दरअसल निष्क्रियता को लोगों ने अच्छाई का प्रमाण मान लिया है।
दिल्ली में हाल ही में हुई एक धटना याद आ रही है। उसमें कार में जा रहे एक दंपत्ति को भीड़ भरे बाजार में लुटेरों ने लूट लिया। पत्नी कार से उतर कर ठेले वाले से सब्जी ले रही थी-इसका मतलब वह भीड़ वाला इलाका था-उसी समय लुटेरों ने उसके पति पर हमला कर दिया। पत्नी अपने पति को बचाने आई तो उस भी हमलावर टूट पड़े। लोग खड़े देख रहे थे क्योंकि वह नायक नहीं बन सकते थे। खामोशी से सब देखने में उनको अच्छाई नजर आई। वैसे भी फिल्मों में दिखाया जाता है कि खलनायकों से लड़ने वाले पुलिस अधिकारियों या अन्य पात्रों के परिवारों को ही साफ कर दिया जाता है। शोले भले ही हिंदी फिल्मों की सबसे लोकप्रिय फिल्म रही हो पर उसने समाज में भले लोगों को निष्क्रियता का भाव अच्छाई के नाम पर भरने का जो काम किया उसे तो एक घृणित फिल्म कहना ही ठीक होगा।

पिछले कुछ दिनों में ऐसी अनेक वारदातें हो चुकी हैं जिसमें भीड़ ने अपराधियों को पीटकर मार डाला। इस विषय पर कभी आप फिल्म बनते नहीं देखेंगे क्योंकि इससे समाज में सक्रियता का संदेश जायेगा। इन्हीं फिल्मों की आड़ में पता नहीं कौन कौन अपना पैसा लगाकर अपने प्रायोजित संदेश दे रहा है यह अलग से चर्चा का विषय है। समस्या यही नहीं है बल्कि फिल्म और टीवी वालों के इन अदृश्य प्रायोजकों को रेडियो और अखबारों से भी सहायता मिल रही है। इस तरह के संदेशों से आदमी नायक या खलनायक ही बनेगा। नायकों के लिये सुरक्षित स्थान हो गये हैं पर खलनायकों के लिये जगहें अधिक खाली रहती हैं। इसलिये समाज के अनेक युवक युवतियों का रुझान खलपात्र की भूमिका अदा करने की ओर आकृष्ट होता हो तो आश्चर्य क्या है? खासतौर से जब पर्दे के नायकों द्वारा सामाजिक खलनायकों की दरबार में नृत्य प्रस्तुति की जाती हो तब तो यही संदेश जाता है कि खलनायकों की समाज में असली भूमिका है।

बहरहाल इसका एक ही उपाय है कि हम अपने अध्ययन, श्रवण, और चिंतन में ऐसे लोगों पर भी विचार करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दें जो नाटकीयता से पृथक होकर समाज सेवा, रचनाकर्म, तथा वैज्ञानिक प्रस्तुति करते हों। द्वंद्वपूर्ण नाटकीयता से परे नहीं रहा जा सकता पर उस पर चर्चा करने की बजाय ऐसे विषयों को महत्व दें, जो सकारात्मक विचार तथा सहज भाव पैदा करने वाले हों। इस समय समाज में अस्थिरता, भय और असुरक्षा का भाव है उसके लिये यह जरूरी है।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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