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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

5/25/17

पतझड़ में सावन का सपना बिक जाता है-फेसबुक पर लिखी गयी व्यंग्य कवितायें (peom writhing ong Fecebook)

वह सजते हैं
बाज़ार में उन्हें जो सजना है।
सूरत चमकानी है
अपनी काली नीयत से जो बचना है।
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मन का क्या
उसे तो मचलना है।
पैरों के इरादे जरूर देखना
कठिन राह पर जिन्हें चलना है।
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अपनी मस्ती में जीने की
आदत पुरानी हो गयी है
नयी अदा दिखाने की
चाहत ही खो गयी है।

पतझड़ में
सावन का सपना
बिक जाता है।
अभावों में
हमदर्दी के बाज़ार में
वादा ही टिक पाता है।
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दूरदराज के अपने किस्से
सुनाकर भरमाते हैं।
अपने घर के हाल पर
वही बोलने में शरमाते हैं।
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नया मुखौटा लगाकर
रोज नया वादा कर जाते हैं।
हर बार माल पार
पहले से ज्यादा कर जाते हैं।
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चंद चेहरे होते
जिनकी एक पल की नज़र
निहाल कर देती है।
पर थोड़ी तसल्ली भी
बेहाल कर देती है।
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अब कोई साथ निभाये
बड़ी बात होती है।
वरना तो यकीन की
रोज मात होती है।
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सभी के अपने दाव हैं
कोई छिपकर कोई दिखकर
लगाता है।
जो जीता वहीं
सिकंदर कहलाता है।
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महलों के मरीज-हिन्दी व्यंग्य कविता
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शीत यंत्र में
अपनी देह
गर्मी से बचा रहे हैं।
दवा से
खाना पचा रहे हैं।
कहें दीपकबापू
पंचतारा अस्पतालों में
चिकित्सा के व्यवसायी
महलों के मरीज नचा रहे हैं।
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उधारीकरण के दौर में
ठगों के भी मजे हैं।
मन के बीमार
ब्याज पर
शिकार की तरह सजे हैं।
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तश्तरी में सजाकर
कोई तोहफे की तरह
सम्मान नहीं देता।
नरक के भय बिना
कोई दान नहीं देता।
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दौलत सब कुछ होती
अमीर चिंता में नहीं जीते।
मेहनतकश जिंदा नहीं होते
केवल हवा खाते पानी पीते।
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4/23/17

तमिलनाडू के किसानों के आंदोलन पर ध्यान न देना शर्मनाक-हिन्दी संपादकीय (No attension Gives to tamilnadu Farmers Agitation is Very Shemful f;or Government)

           अगर हम देश के राजकीय व्यवस्था को एक देह माने तो सरकार का सिर मुख व मुख प्रधानमंत्री होता हे और अंत में चरण की उंगलियां पटवारी, पोस्टमेन और पुलिसमेन होता है। आदमी कितना भी सुंदर व ताकतवार दिखे पर उसकी चरण की उंगलियां नही है या लड़खड़ा रही हैं तो चलना तो दूर वह खड़ा भी नहीं रह सकता।  हमें यह देखना चाहिये कि हमारी राज्य व्यवस्था की अंतिम स्थिति क्या है? अर्थतंत्र में मजदूर व श्रमिक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है-हालांकि वह भी चरण की उंगलियां हैं।  अब हम समूचे देश के मनोबल का हाल जाने तो पता लगेगा कि जिनके हिस्से परिश्रम का काम है उन्हें आज भी सम्मानीय नहीं माना जाता है।  सभी को यह लगता है कि मेहनत करने वाले जरूरत से ज्यादा मांग करते हैं। यह भी माना जाता है कि ऐसे लोगों को केवल रोटी खानो के अलावा अन्य कोई मन की बात सोचना भी नहीं चाहिये।  
                            ऐसे में हम भले ही देश के विकास का कितना भी ढोल पीट लें हमारे समाज की सच्चाई कभी छिप नही सकती यही कारण है कि कोई भी विदेश हम पर गरीबी व भुखमरी का ताना कस देता है। तमिलनाडु के किसान इतने दिन से दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं पर लगता नही है कि किसी को उनसे हमदर्दी हो-दया शब्द हमें बड़ा भयावह लगेगा क्योंकि इसकी जरूरत तो पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पुरुषों को है जो सदैव पतन की आशंकाओं से भयाक्रांत हैं।  ऐसा लगता है कि किसानों,  मजदूरों और छोटे व्यापारियों को ठीक उसी तरह ही व्यवस्था का प्रयोक्ता मानकर हेय श्रेणी दी गयी है जैसे कि प्रचार माध्यम सोशलमीडिया पर सक्रिय विचारकों को देता है-उसकी नज़र में यहां सब मामूल लोग हैं क्योंकि वह किसी प्रचार संगठन में गुंलामी नहीं करते। अंत में हम इतनी चेतावनी देते हैं कि हमारे वर्तमान शिखर पुरुष वैसी ही गलतियां कर रहे हैं जैसे कि प्राचीन काल में हुईं और जिस कारण हमारा देश सदियों गुलाम रहा।

                                  हमें सोचते है। कि तमिलनाडू के किसान जब इतने दिन से आंदोलन कर रहे हैं तो कोई तो वजह होगी। आखिर पीड़ायें इतनी होंगी कि वह इस भरी गर्मी में आंदोलन कर रहे हैं। यह शर्म की बात है कि इतने दिनों से कोई भी कुछ नहीं कर रहा है।
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                   भावनाओं पर चोट का बहाना लेकर अज्ञानी लोग उत्तेजना पैदा करते हैं। हमारा मानना है कि विदेशी धर्म वालों में यही कमी है कि वह आस्था की आड़ में अपनी विचारधारा और इष्ट पर बहस से बचते हैं।  हम कभी यह नहीं कहेंगे कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण पर आपका विचार क्या है क्योंकि हमें पता है कि आपने पूर्ण अध्ययन नहीं किया है। 

2/28/17

प्रचार के लिये आजादी वाजादी पर खतरे का नारा सुनकर घबड़ायें नहीं-लघुहिन्दीव्यंग्य (intolrent Suject now Not Important-HindiComedySatire)


                  यह जो दिल्ली में आजादी वाजादी का जो अभियान चल रहा है, उससे राष्ट्रवादियों को अधिक परेशान नहीं होना चाहिये। आजकल प्रचार में विज्ञापन युग है जिसमें समाचारों का होना भी जरूरी है। इसलिये चार प मिलकर-पूंजीपति, प्रचारक, पथप्रदर्शक तथा प्रबंधक-मिलकर जनता को व्यस्त रखने के लिये ऐसे प्रायोजन करते रहेंगे ताकि उनके अन्य काले व्यवसायों पर किसी का ध्यान न जाये और वह अनवरत चलते रहे। हम अंग्रेजी में चार म (four 'M")भी कह कह सकते हैं-मनीलैंडर,(MoneyLender) मीडिया, (Media) माइंडगेम प्लेयर (MindGame Player) तथा मैनेजर(Menager)।
आपने हिन्दी फिल्मों के अभिनेता और सांसद का एक पान मसाले का विज्ञापन देखा होगा जिसमें वह कहते हैं कि ‘हम इधर भी खिलाते हैं तो उधर भी खिलाते हैं।’ लोग टीवी चैनलों पर समाचार देखना कम कर रहे हैं इसलिये कोशिश यह हो रही है कि ऐसे सनसनीखेज समाचार बनवाकर प्रस्तुत किये जायें जिससे लोगों में तीव्र जज़्बात जागें और वह समाचार के साथ बहसों के साथ भी बने रहें। संभव है कि इस तरह का प्रयोजन हो जिसमें कुछ युवा यह सोचकर आ जाते हों कि हो सकता है कि आगे चलकर कहीं कोई सम्मान आदि मिल जाये-बदनाम होकर संभव किसी टीवी शो में भी काम मिल सकता है। आजकल नाम और नामा पाने के लिये मरे जा रहे हैं-बेरोजगारी इस देश में कम नहीं है-इसलिये थोड़े समय में एक अभिनय करने से अगर दोनों मिलें तो कौन छोड़ना चाहेगा? सो यही चक्क्र है।
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2/24/17

क्या जनवाद और प्रगतिवाद अब राष्ट्रवाद से हार रहा है-हिन्दी संपादकीय (what Commnusim And Progressive Movement will Loss Agaisnst natinalism-Hindi Editorial)

        
                              हमारे देश में महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी या रामनवमी के अवसर पर ही मंदिरों पर दर्शनार्थियों भीड़ नहीं लगती वरन    वारों के अनुसार भी वहां जमावड़ा होता है। सोमवार को शिवजी, मंगलवार को हनुमान जी, बुधवार को गणेश जी गुरुवार को सरस्वती, शुक्रवार को माता तथा शनिवार को नवग्रह को मंदिरों में भीड़ रहती है तो रविवार को सिखों के गुरुद्वारों में मौज रहती है। वैसे गुरु रूप में प्रतिष्ठित भारतीय धर्मो कं  संत अपने पंथ समुदाय के समागम रविवार को ही करते हैं। यह संत अपना पंथ निजी संस्थान की तरह चलाते हैं और उन्होंने सरकारी अवकाश का दिन रविवार समागम के लिये चुना है ताकि भक्त समुदाय अधिक संख्या में सके। उस फिर श्रीमद्भागवत, रामायाण कथाओं के सप्ताहों के साथ भजन संध्यायें होती हैं। सबकी खबरें स्थानीय अखबार में छपती हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर अधिक महत्व नहीं मिलता।
                                              जिनकी भारतीय अध्यात्मिक दर्शन या धार्मिक संस्कारों में दिलचस्पी नहीं है वह फिल्म आदि से अपना मन बहलाते हैं। अब जिनकी दिलचस्पी उसमें भी नहीं है वह अन्य विषयों की तलाश करते हैं। इनमें नये बुद्धिजीवियों के लिये कार्लमार्क्स का दर्शन चिंत्तन विलास का एक बहुत बड़ा स्तोत्र बन गया है। जिसमें गरीबों, पिछड़ों, महिलाओं और मजदूरों के कल्याण की सोचना और उस पर बोलना एक खास पहचान मानी जाती है। जनवादी और प्रगतिशील बौद्धिक अपना चिंत्तन विलास ऐसे ही करते हैं। जब तक 2014 में देश ने धुर दक्षिणपंथियों (राष्ट्रवादियों) को पूरी तरह सत्ता नहीं सौंपी थी तब तक इन जनवादियों और प्रगतिशीलों ने सरकारी मदद से खूब बौद्धिक विलास किया पर अब राष्ट्रवाद के ध्वजारोहण ने उनका सारा तानाबाना छिन्न भिन्न कर दिया है।
                                         हाल ही में महाराष्ट्र के निकाय चुनाव  परिणामों  ने जनवादियों और प्रगतिशीलों के लिये भारी चिंता पैदा की होगी-यह अलग बात है कि कोई कह नहीं रहा।  अब जरा महाराष्ट्र राज्य को देखें। दोनों दक्षिणपंथी दोहरा खेल दिखा रहे हैं। दोनों साथ मिलकर सरकार बनाये बैठे हैं पर उनमें एक विपक्ष की भूमिका भी निभा रहा है।  अब मुंबई महानगर पालिका में यही होने की तैयारी है।  ढाई ढाई साल में लिये दोनों दल मेयर बनाने जा रहे हैं। कायदा यह है कि एक मेयर बनाये तो दूसरा विपक्ष में बैठे पर दोनों धुर दक्षिणपंथी इस तरह की गोटिया बिछा रहे हैं कि प्रगतिशील और जनवादियों के लिये इधर न उधर जगह बचे।
                    समस्या यह है कि राष्ट्रवादियों के पास कोई वैचारिक, साहित्यक तथा सांस्कारिक प्रारूप नहीं है जिसके  आधार पर प्रचार में अपने लिये  अंक जुटा सकें। प्रगतिशील और जनवादी तो वैचारिक सम्मेलन कर लेते हैं पर राष्ट्रवादियों कोई ऐसी नीति नहीं बना सके जिससे वह उनके समानांतर चल सकें। इसकी बजाय वह भारत में धार्मिक सम्मेलनों का उपयोग करते हैं जहां भीड़ स्वतः आती है। इस तरह स्वतःस्फूर्त भीड़ के सामने  जनवादियों और प्रगतिशीलों के सेमीनार हाथी के सामने चींटी की तरह होते हैं।  हम जैसे अध्यात्मिक साधकों के लिये प्रतिदिन होने वाले यही समागम बौद्धिक शांति प्रदान करने वाले होते हैं। राष्ट्रवादी हमेशा ही जनवादियों और प्रगतिशीलों के सेमीनारों पर छींटाकशी करते हैं तब वह अनजाने में अपने ही प्रतिद्वंद्वियों को प्रचार भी कर जाते हैं पर देश में सामाजिक, धार्मिक तथा अध्यात्मिक समागमों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बावजूद राष्ट्रवादी कभी विद्वता की छवि नहीं बना पाते। इससे वह चिढ़ भी जाते हैं।
            एक स्वतंत्र लेखक होने के बावजूद तीनों विचाराधाराओं के लेखकों से हमारा दोस्ताना है-इसलिये इनके बीच अंतर्जाल पर होने वाले शाब्दिक द्वंद्वों से बच निकलते हैं। एक बात हम निसंकोच बता देना चाहते हैं कि राष्ट्रवादियों या दक्षिणपंथियों की अपेक्षा प्रगतिशीलों और जनवादियों की शाब्दिक शक्ति कहीं अधिक है तो अभिव्यक्ति की शैली भी अत्यंत तीक्ष्ण है।  इनका सामना करने वाले अध्यात्मिक तथा स्वतंत्र लेखक भी कम नहीं है पर राष्ट्रवादी उन्हें प्रोत्साहित नहीं करते।   कम से कम हमें एक बात की तसल्ली तो रहती है कि हम यहां अकेले ऐसे नहीं है जो डंड पेलते हैं वरन् स्वतंत्र तथा मौलिक लेखकों का एक बहुत बड़ा समूह यहां है जो अपनी शक्ति दिखाता है।    हम चाहते हैं कि जनवादी और प्रगतिशील विचारधारा भी बहती रहे पर अगर इसी तरह इनका राजकीय संबल टूटता रहा तो वह बाधित होगी तब हम जैसे चिंत्तकों के लिये लिखने के लिये भी कम बचेगा-यही चिंता का विषय है।
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