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15/05/13

मनुस्मृति से संदेश-व्यवसनी से व्यवहार विश्वसनीय नहीं (mani smriti sa sandesh-vyasani se vyavhar vishvasniya nahin)




    हमारे देश में भ्रष्टाचार, बलात्कार तथा अन्य प्रकार के अपराधों की संख्या  में भारी वृद्धि हो रही है।  यह केवल कानून व्यवस्था का प्रश्न नहीं बल्कि समाज में नैतिकता, आचरण तथा आदर्श व्यवहार के प्रति जो उदासीनता है उसे भी इसके लिये जिम्मेदार माना जा सकता है।  खासतौर से नशे की प्रवृत्ति को सामाजिक मान्यता ने लोगों में नैतिकता तथा अनैतिकता के अंतर को समझने की क्षमता को कम कर दिया है।  इससे वैचारिक रुगणता पैदा हुई जिससे विश्वास का संकट बढ़ता ही जा रहा है।
      खासतौर से शराब को तो अब ऐसा पेय मान लिया गया है जिसको न पीना अपने आपको पिछड़ा प्रमाणित करना है। चाहे जहां भी विवाह समारोह में चले जाईये वहां इसका उपयोग धड़ल्ले से होता देखा जा सकता है।  हैरानी की बात यह है कि शराब को समाज में परंपरा की तरह स्थापित करने वाले लोग ही कथित संस्कारों की रक्षा की बात करते है।  विवाह में दूल्हे और दुल्हन के सात फेरों के लिये अग्नि के फेरों के साथ ही पंडित के मंत्रोच्चार पर संस्कृति का निर्वाह होने पर गर्व करते हुए  लोग शराब पीकर नाचते हैं।  सीधी बात कहें तो समाज का सभ्रांत वर्ग जिस सीमा तक मर्यादा तोड़े वही नैतिकता की सीमा हैं। जहां वह रुक जाये वहां से अनैतिकता तथा अशिंष्टता की सीमा शुरु होती है।  यह कोई नहीं समझना चाहता कि देश में बढ़ती वैचारिक, व्यवहारिक तथा व्यवस्था में अशुद्धता के लिये पूरे  समाज का नियमित आचरण ही जिम्मेदार है।
मनृस्मृति में कहा गया है कि
--------------
मत्तोन्मर्त्ताध्यधीनैर्वालेन स्वविरेण वा।
असम्बद्ध कृतश्चैव व्यवहारो न सिद्ध्यति।।
         हिन्दी में भावार्थ-ऐसे व्यक्ति के साथ किया लेनदेन या व्यवहार प्रमाणिक नहीं होता जो मदिरा के सेवन में निंरतर रत हो क्योंकि उसके चरित्र में स्थायित्व नहीं होता।  इसके अलावा जिसका आचरण संदिग्ध हो उससे भी व्यवहार करने पर कोई अर्थ सिद्ध नहीं होता।
             सच बात तो यह है कि मदिरा तथा अन्य व्यसनों में लित्प आचरण, व्यवहार तथा वैचारिक रूप से संदिग्ध होते हैं। अब यह मान लिया जाये तो जब हम पूरे समाज पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि अगर इस ज्ञान को धारण कर जीवन की राह चलें  तो एकाकी जीवन जीने को बाध्य हो जायेंगे।  आसपास ऐसे लोग कम ही मिलेंगे जो व्यसनों से परे हों।  अपने साथ प्रतिदिन व्यवहार में आने वाले लोग के चयन की सुविधा  हमारे पास  बहुत कम ही होती है।  अगर उनके सामने अपने विचार बतायें तो उनके हृदय में हमारे प्रति शत्रुता का भाव पैदा हो सकता है।  ऐसे में एक ही उपाय है कि अपने कार्य की सिद्धि के लिये लोगों से संपर्क तो रखा जाये पर उनके आचरण पर भी दृष्टि होनी चाहिये।  विश्वास की कोई सीमा नहीं होती  मगर किसी पर  किया जाये और वह अपने काम में विफल रहे तो अपने अंदर निराशा को स्थान नहीं देना चाहिये।  खासतौर से व्यक्ति अगर नियमित रूप से नशे आदि का सेवन करने वाला हो तो उस पर गुस्सा भी नहीं होना चािहये।  इस त्रिगुणमयी माया के जाल में फंसे मनुष्य समुदाय विरले ही होते हैं जो विश्वास पर खरे उतर पाते हैं।     

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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21/04/13

राज्य दंड के भय से ही समाज में अनुशासन संभव-विशेष रविवारीय लेख (state punishment diciplane in society-special hindi article)

           पूरे देश में नाबालिग लड़कियों के साथ पाशविक व्यवहार करने की घटनायें बढ़ रही हैं।  इनको बलात्कार की घटना कहना अपराधियों के दृष्कृत्य को हल्का करना ही है।  वैसे तो किसी भी बलात्कार की घटना अपने आप में ही अत्यंत घृणित है पर नाबालिग के साथ ऐसा कृत्य पाशविकता की श्रेणी में आता है।  बलात्कार की सजा फांसी होना चाहिये पर नाबालिग के साथ ऐसा व्यवहार उससे भी बुरी तरह दंडनीय होना चाहिये। फांसी से आदमी मर जाता है पर अगर उसके हाथ पांव काटकर चौराहे पर डाल दिया जाये तो वह मरने से पहले मरने से बुरा होता है।  नाबालिग के साथ बलात्कार होने की बात थोड़ी अव्यवहारिक लगती है। खासतौर से जब वह इसका मतलब तक नहीं जानती हो।  जिस लड़की का न तो मासिक धर्म प्रारंभ हुआ है और न ही वह शारीरिक देह के से अवगत है उसके साथ ऐसा खिलवाड़ अच्छे खासे व्यक्ति को क्रोध दिलवा देता है।
     बहरहाल दिल्ली में पांव साल की मासूम बच्ची दरिंदे की क्रूरता के बावजूद मरने से बच गयी है।  अपराधी पकड़ लिया गया है। उसे अपने पाशविक कृत्य की सजा जो मिलेगी जो मिलना ही चाहिये। इस विषय पर भारतीय समाचार चैनलों ने जिस तरह प्रचारित किया है उसे देखकर तो यही लगता है कि बस यही एक प्रसारण योग खबर है बाकी का कोई स्तर नहीं है। अपनी इस खबर को अधिक दमदार बनाने के लिये वह पिछले एक दो दिन से नाबालिगों के साथ हुई घटनाओं पर प्रकाश डालकर ऐसा वातावरण बना रहे हैं कि इस देश में हर लड़की या महिला पर खतरा मंडरा रहा है।  खबर देना बुरा नहीं है पर इसी तरह खबरों पर निंरतर बने रहना हिन्दी समाचार चैनलों में प्रबंधकीय कौशल पर प्रश्न चिन्ह खड़े करेगा।  फिर इतने विशाल देश में ऐसी घटनायें  होती रही हैं। यह समाज के लिये अच्छा नहीं है पर सच यही है कि लोग इससे कुछ समय दुःखी होने के बाद भूल जाते हैं।  जिनके साथ हादसा होता है उनके लिये यह जिंदगी भर का दर्द है। वह उसे सहते रहते हैं।  पांच साल की बच्ची को यह नहीं मालुम कि उसके साथ क्या हुआ? वह जानकर करेगी भी क्या? स्वस्थ होकर वह इसे भुला दे तो अच्छा ही है।  यह उसके साथ जुड़े पूरे समाज का जिम्मा है वह उसे याद दिलाने का प्रयास न करे।  हमारे समाज की एक आदत यह भी है कि वह दूसरे के दर्द को बाहर लाकर अपने मन का बोझ हल्का करता है।
        लोगों ने बहस के दौरान समाज में परिवर्तन की बातें कहीं। इस बात पर केवल हंसा ही जा सकता है।  समाज में परिवर्तन प्रकृति करती है। यह परिवर्तन इंसान के बूते का नहीं है।  मनुष्य और पशुओं में उपभोग की प्रकृत्तियां एक जैसी होती हैं। दोनों में अंतर बस इतना है कि मनुष्य में विवेक शक्ति होती है जिससे वह उपभोग के बाद भी रचनात्मक सृजनात्मक कार्य कर प्रकृति के परिवर्तनों के साथ स्वयं जोड़ सकता है।  न वह स्वयं बल्कि वह पशु पक्षियों  के लिये प्रकृति के परिवर्तनों के अनुरूप उनके रहन सहन में हल्का बदलाव जा सकता है।  यह अलग बात है कि आमतौर से कुछ बुद्धिमान लोग रचना तथा सृजन का काम करते हैं और बाकी लोग पूरा जीवन उपभोगों के साथ बिता देते हैं। आम उपभोगी मनुष्य बुद्धि तथा मन को समझाने के लिये धर्म के नाम पर कर्मकांड कर वह स्वयं के लिये मनुष्य होने का प्रमाण पत्र जुटाता है।  जो यह भी नहीं करते हैं वह मनुष्य समाज में परिवर्तन का स्वप्न पालते हैं।  अपने साथ बुद्धिजीवी होने की पहचान वह नारे लगाकर जोड़ते हैं। हम नाबालिग या बालिग लड़कियों  के साथ जिन दुर्व्यवहार की घटनाओं पर सार्वजनिक रूप से आर्तनाद कर रहे है वह मनुष्य की उन खूंखार प्रवृत्तियों से उपजे घटनाक्रम का परिणाम है जो पशुओं में भी होती है। यह अलग बात है कि बुद्धि की सीमा के चलते सीमित खतरनाक होते हैं जबकि बुद्धि तथा विवेक की व्यापकता के चलते मनुष्य इतना खतरनाक हो जाता है कि हिंसक पशुओं से उसकी तुलना करना भी पशुओं के लिये अपमानजनक लगता है।  ऐसे लोगों को दैत्य ही कहा जा सकता है जो पशुओं में नहीं पाये जाते हैं।
        हम भारत के सदंर्भ में इन घटनाओं का अवलोकन करें तो इसके लिये सामान्य ज्ञान रखने वालों से अधिक मनोवैज्ञानिकों से राय मशविरा करना होगा।  पांच साल की बच्ची के साथ पाशविक व्यवहार बलात्कार से अधिक खतरनाक अपराध है। यह हुआ कैसे? यह सोचने का विषय है।  दरअसल हमें अपने उपभेाग के सामानों की तरफ ध्यान देना होगा।  अनेक विशेषज्ञों ने मोबाइल तथा कंप्यूटर के खतरनाक परिणामों के बारे में यही कहा है कि इससे मस्तिष्क में विकारों का निर्माण होता है।  अनेक स्वास्थ्य विशेषज्ञ समाज में मनोविकारों के बढ़ते प्रकोप का उल्लेख कर रहे हैं।  मगर उपभोग का सामान बेचने वाला बाज़ार तथा उसके प्रचारक टीवी चैनल इस बात को महत्व नहीं देंगे।  उनके लिये सतही बहस होना ही ठीक है।  दिसंबर माह में एक लड़की की सामूहिक बलात्कार की हत्या के बाद अप्रैल माह में यह घटना हुई।  इससे सभी प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापनों के बीच एक सामग्री के प्रसारण के लिये विषय मिल गया है।  टीवी चैनलों पर समाचारों और बहसों के संचालक इस अवसर पर घड़ियाली आंसु बहाकर अच्छे अभिनय का परिचय दे रहे हैं।  उनका मकसद केवल दर्शकों और श्रोताओं की भावनाओं का उभारना मात्र है ताकि विज्ञापनों का क्रम चलता रहे।   दरअसल यह घटना देश में उपभोग के सामानों के कारण उपजे विकार का परिणाम हो सकती है।  इसमें   राज्य दंड के भय से रहित होने के भाव से घी में आग डालने का काम किया होगा। ऐसा हमारा मानना है।  
मनुस्मृति में कहा गया है कि
...........................................
तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराधि चराणि च।
भयाद्भोगाव कल्पन्ते सवधर्मान चलन्ति च
       इसका हिन्दी अनुवाद यह है कि संसार के सभी स्थावर जंगम जीव राजा के दंड के भय से अपने कर्तव्य का पालन करते और अपने भोग को भोगने के लिये समर्थ होते है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर राज्य दंड का भय ही समाज में व्यवस्था बनाये रखता है।
     ऐसी घटनाओं के पीछे समाज में व्याप्त खतरनाक विकारों के साथ ही राज्य के दंड से भय रहित होने का भाव भी है।  जो लोग शांति से जीवन गुजारना चाहते हैं उनके लिये राज्य के दंड के भय से स्वतः ही अनुशासित रहतें हैं  पर जिनकी प्रवृत्तियां उन्मादी हो गयी है वह बिल्कुल भय रहित लगते हैं।  राज्य व्यवस्था तो उनके लिये खरीदने बेचने की वस्तु हो गयी है। बलात्कार वैसे भी मानसिक विकार का सबसे प्रमाण माना जाता  है पर नाबालिग से ऐसे पाशविक व्यवहार को अत्यंत घृणित कहा जाता है।  ऐसे में जब राज्य के भय का दंड न हो तो तब ऐसे खतरनाक तत्व महादैत्य बन जाते हैं।  दूसरी बात यह कि कठोर कानून बनाने का विषय एक प्रथक विषय है। मूल बात तो कानून को लागू करने वाली प्रबंधकीय व्यवस्था से है जिसमें ढुलमुल रवैया साफ दिखाई देता है। ऐसी घटनाओं को बढ़ती आबादी के साथ बढ़ते अपराधों के रूप में  तो देखा  जा सकता है पर पूंजीवाद, शोषण या भ्रष्टाचार से जोड़ना एक व्यर्थ प्रयास लगता है।  बहरहाल एक बात तय है कि ऐसी घटनायें विश्व में भारतीय समाज का सम्मान

कम करने के लिये पर्याप्त हैं।


          लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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04/04/13

सपने बेचने का व्यापार-व्यंग्य कविता

सपने बेचने का व्यापार
बहुत सरल है
हल्दी लगे न फिटकरी
रंग चोखा आये।
जिदंगी के कड़वे सच से
उकताये ज़माने में
हर रोज  दिल बहलाने का
ख्याल पैदा कर
जेब बस यूं ही भरती जाये।
कहें दीपक बापू
दौलत के पहाड़ पर  चढ़े लोग
ज़माने के लिये बहुत फिक्रमंद दिखते हैं,
कलमकार कागज पर
उनकी मासूम अदाओं पर गीत लिखते हैं,
उगलती ज़मीन जो सोना
अब बंजर हो गयी
कदम कदम पर छाया दर्द और कड़वाहट
ऐसे में बहार लाने का सपनां
देखते देखते बाज़ार में
महंगे दाम में बिक जाये।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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27/03/13

होली 2013 के अवसर पर विशेष वीडियो-एक प्रयास (special video on holi festival of colours-e efford

यह विडियो प्रयोग के लिए प्रस्तुत किया जा रहा. अगर पाठकों और दर्शकों पसंद आया तो आगे भी ऐसे प्रयास होते रहेंगे। यह एक महानुभाव के अनुरोध पर प्रस्तुत किया जा रहा है. http://youtu.be/VvdgZmhxN8A

10/03/13

महाशिवरात्रि का पर्व और हमारे जन्मदिन का योग संयोग-हिन्दी संपादकीय(mahashiratri ka parva aur hamara janma dinka yog sanyog-hindi article or lekh)

       आज हमारा जन्मदिन और महाशिवरात्रि का पर्व एक दिन ही पड़ा। सच बात तो यह है कि हमने उस प्राचीन संस्कारित परिवार में जन्म लिया जहां जन्मदिन को मनाना तो दूर याद भी नहीं रखा जाता।  हमारी आधिकारिक जन्म तिथि और छठी में दर्ज दिनांक में डेढ़ वर्ष का अंतर है।  विद्यालय में पिताजी एक बार भरती कराने गये तो फिर बाकी सफर अपनी बुद्धि के सहारे ही तय किया।  यह पता ही नहीं कि विद्यालय में हमारी जन्मतिथि कब और कैसे दर्ज हुई।  बहरहाल हमें अब उसका अफसोस नहीं है।  सच बात तो यह है कि अध्यात्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण उन लोगों से हमारी अधिक मित्रता नहीं चलती जो केवल सांसरिक विषयों में ही व्यस्त रहते हैं। अवसर आने पर धार्मिकता के नाम पाखंड भर करते हैं।
  पहले अपनी अपनी जिंदगी के विषय पर अनेक लोगों से शिकायत होती थी पर जब श्रीमद्भागवत् गीता पढ़ी तो फिर लगने लगा कि हमने बेकार ही दूसरों के चरित्र पर प्रतिकूल टिप्पणियां कर अपना वक्त बर्बाद किया।  उसमें वर्णित ‘‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’’ के फार्मूले ने हमारी आंखें खोलकर रख दी।  उसके बाद जब समाज के विभिन्न लोगों के व्यवहार, विचार और व्यक्तित्व का अध्ययन किया तो पाया कि उनमें वह सब कमजोरियां हैं जो हममें पायी जाती हैं।  अंतर यह है कि हमने अपनी कमियों को पहचाना है और बाकी यह समझ नहीं पाते।  दूसरी बात यह है कि हमारे अंदर जो कमियां हैं वह कभी दूर नहीं हो सकती हैं क्योंकि उनका संबंध देह से हैं पर  यह अलग बात है कि जीवन में पड़ने वाले उसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।  नहीं भी बचा जा सके तो नियति मानकर खामोश हो जाते हैं।
      अपनी जिंदगी में दो अफसोस रह जायेंगे कि एक तो हमें  प्रारंभ से ही किसी ने योगविद्या से परिचित नहीं कराया दूसरा यह कि श्रीमद्भागवत् गीता का ज्ञान किसी ने उस रूप में नहीं समझाया जिसके संपर्क में अब आकर हमें लगता है कि अपना जीवन अधिक बेहतर ढंग से बिता सकते थे।  यह प्रारंभ से ही अध्यात्मिक प्रवृत्ति का परिणाम रहा कि भटकते भटकते हम योग विद्या तथा गीता के ज्ञान की तरफ  आ ही गये।  निरंकार सत्य ही सत्य है और यह संसार मायावी है यह अब साफ लगने लगा है।  अगर इस विषय पर लिखने  बैठें तो लेख लंबा हो जायेगा।  हां, इस पर यह जरूर कहना चाहेंगे कि जो हमने कल बिताया वह आज सपना हो गया और आज जो बिता रहे हैं वह कल सपना होगा।  हम लौटा कल वापस नहीं ला सकते इसका सीधा मतलब यह है कि यह संसार वाकई अयथार्थ है।  सत्य वह जिसे हम पकड़ सकते हैं, जो असत्य है उसे छू भी नहीं सकते।  अभी दो दिन पहले दूसरे शहर गये थे।  वहां कुछ अच्छे दृश्य देखने को मिले।  उस समय हम सोच रहे थे यह दृश्य कल अतीत हो जायेंगे।  बस याद रहेंगे, पर हम फिर उनको नहीं देख रहे होंगे।  देखेंगे भी तो वह वैसे ही दिखें यह जरूरी नहीं।  वैसे दिखें भी तो पहले की तरह प्रिय लगें यह भी संभव नहीं।  वह दृश्य था पर सपने की तरह बीत गया।  आंखों से देखा पर वह सपने की तरह बीत गया।  वह सच था तो हमने उसे पकड़ा क्यों नहीं? नहीं पकड़ा तो इसका मतलब वह मायावी था। तब यह बात समझ में आयी कि क्यों ऋषि मुनि इस संसार को असत्य या मायावी कहते हैं।  इसका मतलब यह नहीं कि हम निराशावादी हो गये हैं।  ठीक है आज जो निकल गया वह कल नहीं होगा पर जो कल होगा वह नवीनता लिये होगा।  यह शर्तिया बात है क्योंकि योग साधना और ध्यान के बाद हमें हर दृश्य नवीनता देता है।  पुराने प्रिय दृश्यों की सुखद अनुभूति दिमाग में रख लेते है। अप्रिय दृश्यों का दुःख भस्म कर आगे चल पड़ते हैं।  प्रिय दृश्य भी सपना थे यह सत्य स्वीकार करने के बाद जो आत्मविश्वास आता है वह अगले पल के लिये नवीनता तब ही दे सकता है जब योगसाधना की जाये।  पुराने ब्लॉग मित्रों ने बता दिया था कि इंटरनेट पर एक आभासी दुनियां हैं। आज जब ढेर सारे बधाई संदेश मिले तो हैरानी हुई।  इसका मतलब यह है कि आभासी दुनियां का भी विस्तार हुआ है।  दरअसल इंटरनेट तो सपने में भी एक उपसपने जैसा है।  जब सपने ही अब विचलित नहीं करते तब उपसपने  हमें अपनी जगह से हिला लें यह संभव नहीं।
       संयोग से आज महाशिवरात्रि का पर्व भी है।  शिव सत्य के प्रतीक माने जाते हैं।  आज अनेक शिव मंदिरों में जाने का अवसर मिला।  एक मंदिर में हम ध्यान लगा रहे थे।  वहां अनेक लोग जल और बेलपत्री चढ़ाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए नज़र आये।  हम ध्यान में ही जमे रहे। जब निवृत्त हुए तो एक सज्जन हमारे पास आये और बोले-‘‘यह सबसे अच्छा है।  मैं बहुत देर से देख रहा हूं कि आप ध्यान लगाये बैठे हैं और सबसे बड़ी पूजा यही है।’
      हम मुस्करा दिये।  दरअसल जब किसी के साथ मंदिर में जायें तो वह जब तक अपनी पूजा कर ले तब तक ध्यान लगाकर हम अपने अंदर ऊर्जा का संचय करते हैं।  श्रीमद्भागवत् गीता में ध्यान को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। ध्यान की शक्ति का बखान करना बेकार है क्योंकि जो इस विद्या को जानते हैं वही इसे मानेंगे।  भगवान शिव की जिस तीसरी आंख का ज्ञान कराया जाता है वह उनकी योग शक्ति का ही प्रतीक है। यह तीसरी आंख हमें ध्यान में दिखाई दे सकती है। जब हम बाहर की आंखें बंद कर भृकुटि पर दृष्टि जमायेंगे तब इसका आभास होगा। योग शक्ति ही मनुष्य और सत्य के बीच सेतु का काम करते हुए उनको मिला सकती है।  बाह्य वस्तुओं से शिव की उपासना करना बुरा नहीं है पर जब हम ध्यान लगाकर अपने भावों में ही उन वस्तुओं का सृजन कर उसे उनके चरणों में अर्पित करेंगे तब जीवन का आनंद दुगना हो जायेगा।  हमने अपने अंदर की ऊर्जा उनके चरणों में चढ़ाई  तब वह निश्चित रूप प्रसाद के रूप में दुगुना कर उसे वापस करेंगे। बाहर यह सब नहीं दिखेगा पर इसकी अनुभूति अंदर करने के लिये निरंतर ध्यान का अभ्यास करें तो निश्चित ही जीवन आनंदमय हो जायेगा।
     इस महाशिवरात्रि के पर्व पर अपने फेसबुक, ब्लॉग तथा ट्विटर के लेखकों और पाठकों को बधाई।  उनका भविष्य उज्जवल हो इसकी हम कामना करते हैं।  जन्मदिन की बधाई का आभार व्यक्त करते हुए यह आशा व्यक्त करते हैं कि वह भविष्य में भी अपना प्रेम बनाये रखेंगे।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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07/02/13

जज़्बातों के व्यापार में-हिन्दी कविता

कहीं रौशनी इतनी ज्यादा
उसे अंधेरों की तलाश है
कहीं अंधेरे घर खड़े हैं
उसके इंतजार में।
बाहर से दुनियां एक गेंद की तरह लगती जरूर
अंदर बंटी  नफरत और प्यार मे।
कहें दीपक बापू
जिन चीजों में दिल लगता है
महंगी मिलती बाज़ार में
अपने घाव सहलाने के लिये क्यों हमदर्द ढूंढे
अमीर हो गये बहुत लोग
जज़्बातों के व्यापार में।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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25/01/13

गणतंत्र (जनतंत्र) दिवस का विश्वरूपम-हिन्दी लेख (gantantra(jantantra diwas ka vishvarrpam-hindi lekh)

         गणतंत्र दिवस पर लिखा गया एक लेख इंटरनेट पर जबरदस्त हिट ले रहा है।  25 जनवरी 2012  को लिखे गये इस लेख का लिंक ही दे रहे है।  उस लेख की बातें दोहराने का कोई अर्थ यहां नहीं है।  उस लेख पर एक पाठक ने लिख दिया कि यह बोरिंग लेख है।  उसने सच कहा।  जब कोई लेख मस्तिष्क की गहराईयों में डूबकर लिखा जाता है तो उसे पढ़ना भी उसी तरह पड़ता है।  तय बात है कि लेखक और पाठक को गहराईयों में जाकर ही कुछ मिल सकता है। इंटरनेट पर चिंत्तन के रूप में लिखे गये लेखों में इसी तरह कह टिप्पणियां झेलने को तैयार भी रहना चाहिए। अगर कोई हमारा लेख झेल रहा है तो हमें भी टिप्पणियां भी झेलनी ही पड़ती हैं।  एक लेखक के रूप में हमारा स्वयं का मानना है कि उस लेख में कोई असाधारण बात नहीं थी।  अब आ गया  25 जनवरी 2013, लगता है कि इस बार भी हम ऐसा कुछ नहीं लिख सकते जो कि असाधारण हो।
         इस गणतंत्र की पूर्व संध्या पर हमारे सामने खड़ी है कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम’ जिसे प्रतिबंधों और  विरोध का सामना करना पड़ा है।  अभी तक यह तय करना कठिन है कि यह विरोध सैद्धांतिक है या व्यवसायिक। कमल हासन ने इस विरोध के जवाब में कहा है कि ‘यह तो सांस्कृतिक आतंकवाद’ है। इस सांस्कृतिक आतंकवाद की बात अनेक लोग पहले भी चुके हैं पर कमल हासन जैसे महान फिल्मकार के श्रीमुख से निकला यह शब्द अनेक लोगों को हिलाने वाला है।  जहां तक कमल हासन के व्यक्तित्व का प्रश्न है तो भारत में उनकी छवि अत्यंत धवल है।  महान फिल्मकार पर निर्विववाद व्यक्त्तिव के स्वामी कमाल हासन की ‘विश्वरूपम’ पर प्रतिबंध इस देश के अनेक लोगों को नाखुश कर सकता है।  सवाल यह है कि फिल्म पर प्रतिबंध और विरोध का कोई ऐसा पहलू भी है जिसे कोई नहीं देख रहा है।  कुछ लोगों ने अपना यह संदेह जता दिया है कि इस फिल्म के प्रति कुछ लोगों की व्यवसायिक सहानुभूति है जो इसका विरोध प्रायोजित करा रहे हैं।
       कमल हासन का कहना है कि जब फिल्म को अनुमति देने वाली संस्था की अनुमति मिल गयी तो कुछ लोग उसका विरोध  अपने पूर्ण समुदाय का प्रतिनिधि होने का दावा करते हुए कैसे कर सकते हैं।
      प्रतिप्रश्न भी सामने आया है कि आखिर सार्वजनिक प्रदर्शन से पूर्व  यह फिल्म किसी समुदाय विशेष के चालीस  ठेकेदारों को दिखाई क्यों गयी थी?
     कमल हासन भले आदमी है पर 94 करोड़ से बनी इस फिल्म से कमाने का विचार करने वाले व्यक्ति या समूह की रुचि इस पर विवाद खड़ा कर अधिक धनार्जन के लिये किया गया निश्चय भी हो सकता है।  प्रत्यक्ष रूप से कमलहासन अकेले इस फिल्म के स्वामी हैं पर पर्दे के पीछे उसके अनेक स्वामी भी हो सकते हैं।  ऐसे में एक धर्म विशेष के ठेकेदारों को विरोध के लिये प्रायोजित करने का विचार अगर किसी स्तर पर हुआ हो तो कोई बड़ी बात नहीं है।  दूसरी बात यह भी है कि  कमल हासन का वितरकों से विवाद पहले भी चल रहा है।  कमल हासन अपनी फिल्म पूरी दुनियां को एक साथ दिखाने के लिये इसे उन टीवी चेनलों को भी सौंपना चाहते थे जो आम दर्शकों से सीधे जुड़े हैं।  फिल्म के वितरक अपनी कमाई कम होने की आशंका से इस वैश्विक प्रदर्शन के  विरोधी हैं।  इसका मतलब यह है कि कहीं न कहीं फिल्म व्यवसाय से जुड़ा कोई ऐसा वर्ग भी हो सकता है जो ‘विश्वरूप’ को वैश्विक प्रदर्शन होने से रेाकना चाहता हो।
      कमाल हासन महान फिल्मकार हैं और उनकी आर्थिक हानि न हो इस पर सब सहमत हैं पर फिल्म पर प्रतिबंध या विरोध पर अलग अलग तर्क सामने आये हैं।  बहस चलते चलते गणतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी तक पहुंच गयी है।  कमल हासन स्वयं किसी विवाद में पड़ना या खड़े होना चाहें यह तो नहीं लगता पर उनके संपर्क सूत्रों के बारे में यह दावा नहीं किया जा सकता।  यह फिल्म आज नहीं तो कल प्रदर्शित होगी, यह बात तय है।  आतंकवाद से संबंधित विषय  पर अनेक फिल्में बन चुकी हैं।  धर्मों पर प्रहार करते हुए भी फिल्में बनती हैं। अभी हिन्दी में एक फिल्म बनी थी ‘ओ माई गॉड’। इसमें हिन्दू धर्म का विषय चुना गया था।  कुछ हिन्दू संगठनों ने इस पर आपत्ति की थी पर आमजनों ने इस फिल्म को बड़ी रुचि के साथ देखा।  सच कहें तो यह फिल्म हम जैसे अध्यात्म चिंतकों को अत्यंत पसंद आयी।  हमारा मानना है कि अध्यात्मिक ज्ञान  और धर्म को प्रथक प्रथक बताने वाली यह वैसी फिल्म थी जिस पर अनेक भारतीय चिंत्तक अपनी बात कहते रहे हैं।  एक तरफ हिन्दू धर्म पर प्रहार था तो वहीं श्रीमद्भागवत गीता का महत्व भी बताया गया।  शुद्ध रूप से मनोंरजक फिल्म थी।  उसने समाज में कोई परिवर्तन भले नहीं किया पर उसका विषय अनेक लोगों को पसंद आया।  यही कारण है कि हिन्दू धर्म के समर्थक कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम’ का  बचाव  करते हुए यही कह रहे हैं कि हमने भी तो अपने धर्म पर प्रहार करती हुई एक फिल्म झेली है तो दूसरे समुदायों में विरोघ कैसे हो सकता है?  अक्षय कुमार, मिथुन चक्रवर्ती, परेश रावल और गोविंद नामदेव ने इस फिल्म में जो अभिनय किया वह रोमांचित करने वाला है।  ऐसी फिल्मों को रोकना अनुचित है।  हम क्या मानते हैं कि आस्था के नाम पर लोगों को बरसों पुराने अंधविश्वासों में जीने की आदत पड़ी रहे?  क्या हम लोकतंत्र में  लोगों की आस्था बचाने के नाम पर सड़े गले समाज का अस्तित्व बनाये रखना चाहते हैं।  दूसरी बात यह कि धर्म को चौराहै का विषय मानना ही गलत है। जिसे मानना है अपने घर में माने। सड़क पर उसकी आस्था बचाने का काम राज्य को नहीं करना चाहिए।
    हम गणतंत्र के नाम पर धर्मतंत्र की रक्षा करने का लक्ष्य नहीं रखें तो अच्छा है।  हम कमाल हासन के सांस्कृतिक आतंकवाद वाली बात का समर्थन नहीं करते क्योंकि 94 करोड़ से बनी इस फिल्म के प्रचार के लिये इसका विरोध व्यवसायिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये भी हो सकता है पर चंद लोगों को किसी धर्म का ठेकेदार मानने के हम भी विरोधी हैं।  हालांकि प्रचार माध्यमों से यह  जानकारी मिली  है कि इस फिल्म को पहले ही समुदाय विशेष के ठेकेदारों को दिखाया गया था। ऐसी हालत  फिल्म से जुड़े लोगों को ही इसका जवाब भी देना होगा जो कमल हासन ने किया है।  
    बहरहाल प्रत्यक्ष रूप से गणतंत्र या अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा यह कोई बड़ा विषय है हमें नहीं लगता पर बाज़ार और उसके प्रचार समूहों के लिये विज्ञापन प्रसारित करने के लिये बहस के रूप में  प्रसारण सामग्री दिलाने में इसका बहुत बड़ा योगदान रहेगा यह बात तय है।  
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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16/01/13

पाकिस्तान पर अपनी शैक्षणिक सामग्री में सुधार के लिये दबाव डालें-हिन्दी लेख (pakistan change his educational material-hindi lekh or article)

                           पाकिस्तान को लेकर ढेर सारी बातें होती हैं। जब दोनों के बीच माहौल थोड़ा ठंडा होता है तब खेल और फिल्म या संगीत में पाकिस्तानी लोगों को बुलाकर अच्छे रिश्ते बनाने की बात होती है।  कुछ समय तक सब चलता है फिर अचानक कुछ ऐसा होता है कि दोनों मामलों में बढ़े हुए  कदम वापस ले लिये जाते हैं।  भारत में कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि राजनीति से अलग हटकर दोनों देशों के नागरिकों के आपसी संबंध बनाने पर जोर देना चाहिए।  यह प्रयास केवल पाकिस्तान से  क्रिकेट संबंध जोड़ने, टीवी कार्यक्रमों में पाकिस्तानी कलाकारो के अभिनय, भारतीय फिल्मों  में पाकिस्तानी गायकों के स्वर शामिल होने तथा कुछ बुद्धिमानों के आपसी मिलने से अधिक नहीं बढ़ पाते।  दरअसल हमारे देश के लोग पाकिस्तान की अंदरूनी स्थितियों को नज़रअंदाज करते हैं। वह इस बात को भूलते हैं कि पाकिस्तान की शैक्षणिक पुस्तकों में भारत तथा यहां के धर्मों पर प्रतिकूल सामग्री पढ़ाई जाती है।  हमारे देश और धर्मों के प्रति वहां नफरत के बीज बचपन में ही बो दिये जाते हैं। नागरिकों के आपसी संबंध बढ़ाने के प्रयास में चंद पाकिस्तानी जब यहां आते हैं तब उनको असलियत पता चलती है पर उनकी संख्या इतनी कम है कि वह वापस लौटकर अपने पूरे देश की मानसिकता नहीं बदल सकते।
          यही कारण है कि दोनों के नागरिकों के आपसी संबंधों का कोई फल नहीं निकलता।  इसके लिये यह आवश्यक है कि पाकिस्तान पर अपनी शैक्षणिक पुस्तकों में भारत था यहां के धर्मो के विरुद्ध सामग्री हटाने का दबाव डालना चाहिए।  दूसरी बात यह कि नागरिकों के आपसी संबंधों का विस्तार पाकिस्तान के सिंध, बलूचिस्तान, और पश्चिमी सीमा प्रांत में भी होना चाहिये जबकि वह अभी तक लाहौर तक ही सीमित रहता है। 
        पाकिस्तान के साथ जिस तरह भारत के संबंध रहे हैं उसे देखते हुए उसकी मित्रता की निरंतरता में हमेशा संदेह रहता है।  पाकिस्तान शुरुआत में धार्मिक पहचान वाला देश नहीं था पर धीरे धीरे वहां अन्य धर्मों के लोगों को पलायन अथवा धर्म परिवर्तन के लिये मजबूर किया गया।  दूसरी बात यह कि पाकिस्तान को मध्य एशिया के सहधर्मी राष्ट्रों से प्रथक करना आवश्यक है।  वह पाकिस्तान की जमीन को अपने धार्मिक लक्ष्यों के लिये उपयोग कर रहे हैं।  यह मध्य एशियाई  देश अपनी संपन्नता के कारण   पश्चिमी देशों से डर के कारण नहीं लड़ सकते इसलिये उनके विरोधियों को पाकिस्तान की जमीन दिलवाते हैं।  इसलिये कूटनीतिक ढंग से ऐसे प्रयास किये जायें जिससे वह पाकिस्तान का साथ छोड़ने के लिये मजबूर हों। यह बात तय है कि यह सब आग्रह करने से नहंी बल्कि कड़े कदमों से ही संभव है।  पाकिस्तान से संबंधों पर विचार करते समय इस बात का ध्यान करना चाहिये कि वह सर्वधर्मसमभाव मानने वाला देश नहीं है।  उसका धर्म ही उसकी सामरिक, आर्थिक, राजनीतिक और  सामाजिक शक्ति है।  वैचारिक रूप से वह कभी हमारे देश का वह सम्मान तब तक नहीं कर सकता जब तक उसके साथ सख्ती नहीं बरती जाती।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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