7/7/09

गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima)

गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव
जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।
आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि
जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।
जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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5/7/09

पूरे समाज को मूर्ख समझने की प्रवृत्ति-आलेख (hindi article)

हम अगर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की बात करें तो उसका सबसे बड़ा सूत्र हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ इसका आशय है कि जो हमारी इंद्रियों का जो कार्य है वही उसका गुण भी है। कान का काम है सुनना तो वह सुनता है। आंख का काम देखना तो वह देखती हैं। अब सवाल यह है कि हम कौनसी वस्तु देखते हैं या कौनसा सुर सुनते हैं यह हालत के अनुसार तो है पर हमारे अंदर मौजूद इच्छायें भी इसके लिये जिम्मेदार हैं। यह इच्छायें मन में पैदा होती हैं जिसका संचालन बुद्धि से होती है और बुद्धि वैसी होती है जैसे हमारा खान पान और रहन सहन होता है।
बहरहाल यह तो केवल एक चर्चा की गयी। हमारा मुख्य उद्देश्य तो यह देखना है कि जिसे तत्वज्ञान हो जाता है वह बहस आदि से दूर रहकर केवल सार्थक चर्चाओं में अपना समय व्यतीत करते हैं और उनमें अहंकार कदापि नहीं रह जाता। कम से कम वह पूरे समाज को अज्ञानी नहीं समझते।
दरअसल समलैंगिक मुद्दे पर जिस तरह भारतीय अध्यात्म ज्ञान के कथित आधुनिक पुरुष बहस में भाग ले रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उन लोगों ने तत्वज्ञान को रट लिया है पर धारण करने से परे हैं।
अगर समलैंगिक को कानूनी मान्यता मिल गयी तो जैसे देश के सारे युवक युवतियां इसी में लग जायेंगे-अगर यह कोई भय व्यक्त करता है तो न वह केवल तत्वज्ञान से अनभिज्ञ है बल्कि नंबर एक का ढोंगी है।
पूरा समाज! क्या बात करते हैं यह लोग? यह सही है कि इस देश के लोग भौतिक उपलब्धियेां के पीछे अधिक लगे हैं पर इसका मतलब नहीं है कि सभी मूर्ख हैं। समलैंगिकता के पक्षधर तो वह लोग हैं जिनके पास अधिक मात्रा में धन और सुविधाऐं हैं और शरीर से कम श्रम के कारण उनका दिमाग आलसी हो जाता है और फिर उसमें उल्टे सीधे विचार आते हैं। 110 करोड़ के इस देश में ऐसे लोगों की संख्या अगर एक लाख भी हो तो बहुत समझो जो समलैंगिक जीवन बिताने को तत्पर होंगे।
हमें अन्य धर्म के ठेकेदारों से कोई मतलब नहीं है पर भारतीय अध्यात्म के ठेकेदार ऐसी बात करें तो उन पर तरस आता है।
श्रीगीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि चार प्रकार के भक्त होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। इसका आशय यह है कि समाज में चार प्रकार के लोग रहेंगे ही चाहे जैसी भी हालत हो।
इधर प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रम जारी रखने के लिये कुछ न कुछ मुद्दा चाहिये। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि इन प्रचार माध्यमों को जीवन बनाये रखने के लिये अनेक प्रकार के मुद्दे बनाये जाते हैं। ऐसे में सामाजिक मुद्दे उठाकर धार्मिक नेताओं को बुलाया जाता है। एक बात यहां याद रखने की है सामाजिक मुद्दों पर धार्मिक ज्ञानियों को बोलना ही नहीं चाहिये क्योंकि अगर समाज गलत रास्ते पर है तो वह अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण है पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह उससे शून्य है। वैसे अगर यह धार्मिक ज्ञानी बोलते हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिये कि क्या उनके शिष्य इस राह पर चले जायेंगे? अगर नहीं तो उसकी इनको चिंता क्यों है? फिर यह भी उनसे पूछा जाना चाहिये कि आप जब बरसों से सक्रिय हैं तो फिर भी यह आशंका बनी हुई है कि समाज समलैंगिक हो जायेगा तो क्या आपकी नाकामी नहीं है? ऐसा लग रहा है कि कुछ धार्मिक और अध्यात्म के शिखर पुरुष कैमरे के सामने आने के आदी हो चुके हैं और उनको ऐसा लगता है कि वह हर विषय पर बोलने के लिये अधिकारी हैं या कहें कि वह अपने आपको ब्रह्मा समझने लगते हैं। उनका अहंकार उनके सिर चढ़कर बोलता नजर आता है जो कि अज्ञान का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।
वह इस तरह बात करते हैं जैसे कि समाज उनके लिये कोई पालतू पशु है जिसे वह चाहे जो चारा खिलायें उसे ही अच्छा समझे। मजे की बात यह है कि वह ऐसे लोगों को ज्ञान दे रहे हैं जो कभी समझेंगे ही नहीं। वह देह भक्तों के समक्ष श्रीगीता के उस ज्ञान को प्रस्तुत करते हैं जिसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि केवल उनके भक्तों को ही दिया जाना चाहिये।
चाहे कोई भी कितना तत्वज्ञानी क्यों न हो अगर वह इस तरह सभी लोगों को अज्ञानी और मूर्ख समझता है तो यह उसकी अज्ञानता का प्रमाण है। बुद्धि सभी में है पर अगर सही ढंग से समझाया जाये तो बात बन जाती है। जिस तरह धर्माचार्य हल्के विषयों पर बहसों में भाग लेते हैं उससे उनकी पोल देश के सामने खुल जाती है और उनके प्रति नकारात्मक संदेश जाता है।
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4/7/09

इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम-हिंदी शायरी (hindi shayri)

अपने पेट के लिये करते हो काम
लेते हो पूरा दाम।
अपने खून को पसीने की तरह
बहते क्यों कराहते हो
कोई आकर हमदर्दी दिखाये
क्यों चाहते हो
दौलत के पत्थरों से
दया की उम्मीद क्यों जगाते हो
ओ! मेहनतकशों को
इज्जत दिलाने की ख्वाहिश रखने वालों
बसते हैं जहां जज्बातफरोश
उस महफिल में उनको
चमकाने का झूठा दिलासा क्यों दिलाते हो
अपने लहू से सींचते हैं जो
अपने ही रोटियों का गुलशन
उनको इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम।
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2/7/09

यह काम तो पशु पक्षी भी नहीं करते-संपादकीय (editorial in hindi)

समलैंगिक मामले पर न्यायालय का निर्णय शिरोधार्य! लोगों के अपने दैहिक संबंधों पर स्वयं ही निर्णय करने का अधिकार होना चाहिये-अगर इससे किसी अन्य व्यक्ति को हानि नहीं पहुचती तो कोई आपत्ति प्रकट करना उचित नहीं है। इसका आशय यह कतई नहीं है कि समलैगिकता का समर्थन किया जाना चाहिये।
समलैंगिकता एक अप्राकृतिक संबंध है जो केवल मनोरोग का परिणाम ही हो सकता है। अगर हम अपने मनुष्य देह के अहंकार को छोड़ दें तो हम इस प्रकृत्ति में अन्य जीवों से अलग नहीं है। हां, शरीर की बनावट और बुद्धि की व्यापकता के कारण हम अन्य जीवों से अधिक सक्रिय और शक्तिशाली बन जाते हैं। हाथी और सिंह न हथियार बनाते हैं न चलाते हैं पर हम अपने द्वारा अविष्कार किये गये अस्त्र शस्त्रों से उन्हें मार डालते हैं पर निहत्थे होने पर हम में से किसी को साहस नहीं हो सकता कि जाकर इनसे लड़े। कहने का तात्पर्य यह है कि हम इस प्रकृत्ति में एक जीव भर हैं और केवल सामान्य कर्म को छोड़कर हमारी आवश्यकतायें अन्य जीवों से अलग नहीं है।
कुत्ता, बिल्ली, शेर, हाथी, चिड़िया या अन्य पशु पक्षी-जिनमें नर मादा का विभाजन किया जाता है-विपरीत लिंगों में ही अपने दैहिक और भावनात्मक संपर्क बनाते हैं। शायद ही कोई ऐसा जीव हो जो समलैंगिक संपर्क बनाता हो पर बौद्धिक रूप से सर्वाधिक शक्तिशाली मनुष्य को पता नहीं कहां से इस तरह का ख्याल भी आता है।
सच है इस सृष्टि को रचने वाले ने आदमी को शरीर की बनावट लोचदार और बुद्धि तीक्ष्ण दी है तो उसके खतरे भी बहुत दिये हैं। कभी कोई पशु पक्षी आत्महत्या नहीं करता और न ही समलैंगिक संबंधों में लिप्त रहता है। कहते है न कि जिस चीज में जितनी अच्छाईयां होती है तो उतनी ही बुराईयां भी होती हैं। धन न होना बुरा तो अधिक होना उससे भी बुरा! यही हाल बुद्धि का है। नहीं है तो भी बुरी और अधिक है तो वह भी बुरी।
आवारा कुत्ते आठ या दस होते हैं पर कुत्तिया एक, पर वह सभी उसी के पीछे लग जाते हैं। आपस में टकराते हैं पर कभी समलैंगिक संबंध बनाते उनको नहीं देखा। एक आश्चर्य की बात है कि जब कुत्तों की यौनक्रीड़ा का जो मौसम होता है उस समय कुत्ते अधिक दिखते हैं कुतिया कम-तब लगता है कि क्या उन्होंने भी इंसानों से मादा भ्रुण को गर्भ में ही निपटाने का कार्यक्रम तो कहीं नहीं चला रखा। खैर यह मजाकिया प्रसंग है जो यह बताने के लिये लिखा कि इस प्रकृत्ति के जीवों के दैहिक और भावनात्मक संबंध हमेशा ही विपरीत लिंग में बनते हैं। इसलिये समलैंगिक संबंध बनाने के लिये आतुर लोगों को चाहिये कि जब उनके दिमाग में ऐसे ख्याल हैं तो वह मनोचिकित्सकों के पास जरूर जायें। एक परिणामहीन दैहिक संबंध किसी भी दृष्टि से उनका हित नहीं कर सकता।
इसके बावजूद ऐसे मनोरोगियों के विरुद्ध कोई सार्वजनिक अभियान छेड़ने पर भी असहमति है। सुनने में आया है कि कुछ सामाजिक और धार्मिक ठेकेदार इसके लिये कमर कस रहे हैं? इससे उन लोगों को अवश्य असहमति होगी जो आदमी को स्वतंत्र रूप से रहने से रोकने के लिये बाध्य करने के विरोधी है। याद रहे, यह भी पश्चिम से आयातित मनोविकार है और यह उन्हीं सुख सुविधाओं की वजह से यहां आया जो अपने देश के आदमी द्वारा उनके उपभोग से शारीरिक परिश्रम कम होने के कारण मानसिक संतुलन बिगाड़ने वाली होती है। यह जरूरी नहीं है कि सभी का बिगड़े पर जिनका बिगड़ गया उन पर आक्रामक कार्यवाही की जाये इस पर अनेक लोग असहमत हैं। इन्हीं सुख सुविधाओं का यही सामाजिक ठेकेदार भी उपयोग करते हैं।
फिर एक दूसरी बात यह है कि इस देश में समलैंगिक संबंध कोई समूचा समाज नहीं बनायेगा। अलबत्ता प्रचार माध्यम जरूर कहीं न कहीं से एकाध घटना लाकर उसे प्रसिद्धि देंगे जैसे कि आपरेशन से स्त्री के पुरुष और पुरुष से स्त्री बनने की घटनाओं को देते हैं। यह समस्या इतनी छोटी है जैसे ऊंट के मूंह में जीरा। देश में ढेर सारी समस्यायें हैं जिनसे शहर के शहर प्रभावित होते हैं पर कोई सामाजिक या धार्मिक संगठन उसके लिये आगे नहीं आता। हां, बरसात नहीं हो रही थी और जब उसके आने समय निकट आ गया तो तमाम तरह की पूजा अर्चना और अनुष्ठान सभी कथित धर्मों और समाज के शीर्षस्थ ज्ञानियों ने किये ताकि उनके समाज को लगे कि वह कितने उनके लिये फिक्रमंद हैं। यह वाक्या भी कुछ ऐसे ही लग रहा है कि समस्त सामजिक और धार्मिक संगठनों के शीर्षस्थ लोग एक हल्की समस्या पर सस्ते में बोलकर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
कहीं किसी अस्पताल में जब हड़ताल होती है तो पूरा शहर त्रस्त होता है। उससे भी अधिक देश में जो भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता की हालत है उसके लिये किसी सामाजिक या धार्मिक ज्ञानी पुरुष को बोलते हुए नहीं देखा गया। किसी ने मिलकर देश की बड़ी समस्याओं के हल के लिये आंदोलन नहीं छेड़ा।
तात्पर्य यह है कि समलैगिक संबंध नहीं होना चाहिये पर होते है तो उनको रोकने जबरन प्रयास करने की बजाय समझाइश का प्रयास करना ही अच्छा है। यह काम सामाजिक तथा धार्मिक ज्ञानियों का है पर वह इससे बचने के लिये कानून बनाने की मांग करते हैं तो सवाल यह है कि आखिर उनका काम क्या है? सामाजिक तथा धार्मिक होने की वजह सुख सुविधायें भोग रहे यह शीर्षस्थ विद्वान और समाज सेवक उनका त्याग कर जमीन पर आकर ऐसे लोगों को समझाने के लिये अपनी देह को कष्ट क्यों नहीं देते। वह जाकर ऐसे मनोरोगियों को समझाते नहीं कि यह काम तो पशु पक्षी भी नहीं करते। उनको यह प्रयास करना चाहिये कि आदमी स्वतंत्र ढंग से सोचते हुए अच्छे मार्ग पर चले न कि उसे लट्ठ से जबरन चलाया जाये।
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26/6/09

मजाक करो या गुस्सा पर अनाम न रहो-आलेख

देश में सात करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं पर सभी लोग नहीं लिख सकते क्योंकि यूनिकोड पर जानने वालों की बहुत कमी है। हिंदी ब्लाग जगत पर जो लिख रहे हैं उनमे कुछ लोग बहुत अपने ज्ञान पर इतराते हैं तो यही कहना पड़ता है कि उन्होंने बहुत आसानी से ब्लाग लिखना सीख लिया होगा। शायद अब ब्लाग की अच्छी जानकारी आ जाने पर कुछ लोगों के मन में उसके दुरुपयोग की बात आने लगी है जो अब बेनाम टिप्पणियों में रूप में प्रकट हो रही है।
इस लेखक को पाठकों के लिये पढ़ने योग्य ब्लाग लिखने में तीन महीने लग गये थे। हालत यह थी कि ब्लाग स्पाट के ब्लाग से शीर्षक कापी कर वर्डप्रेस के ब्लाग पर रख रहा था क्योंकि वहां हिंदी आना संभव नहीं थी। हिंदी लिखने का तरीका भी विचित्र था। कंप्यूटर पर एक आउटलुक सोफ्टवेयर दिया गया था। उसमें कृतिदेव फोंट सैट कर यूनिकोड टेक्स्ट के द्वारा लिखने पर हिंदी में लिखा वर्डप्रेस के एचटीएमएल में प्रकाशित तो हो जाता था पर उसे लेखक स्वयं ही पढ़ सकता था। बाकी ब्लाग लेखक चिल्ला रहे थे कि भई यह कौनसी भाषा में लिखा है।
उसके बाद ब्लाग स्पाट के यूनिकोड से छोटी कवितायें ही लिख रहा था। सच तो यह है कि ब्लाग लिखने के मामले में हताश हो चुका था। फिर हिम्मत कर रोमन लिपि में टाईप कर काम चलाता रहा। उस समय एक लेख लिखना पहाड़ जैसा लगता था। बाद में कृतिदेव का यूनिकोड मिला तब जाकर आसानी लगने लगी।
बड़े शहरों का पता नहीं पर छोटे शहरों में जहां तक इस लेखक को जानकारी है बहुत कम लोग लिखने की सोचते हैं और उससे भी कम ब्लाग तकनीकी के बारे में जानते हैं। चाहे कोई ब्लाग लेखक कितना भी दावा करे कि वह तो शुरु से ही सब कुछ जानता है पर सच तो यह है कि अनेक वरिष्ठ ब्लाग लेखकों को भी बहुत सारी जानकारी अभी हुई है। आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले नारद फोरम पर आप सूचना न भी दें तो वह आपका हिंदी ब्लाग लिंक कर लेता है पर इसी नारद से यह धमकी मिली थी कि ‘आपका ईमेल पर प्रतिबंध लगा देंगे क्योंकि आप ब्लाग का पता गलत दे रहे हैं। वह मिल नहीं रहा।’
पहले तो ब्लाग का शीर्षक उनको भेजा फिर बिना http:// लगाकर पता दिया। फिर www लगाकर भेजा। इस लेखक ने तय किया नारद पर पंजीकरण नहीं करायेंगे। इधर दो तीन ब्लाग पर गद्य लिखना प्रारंभ कर दिया तो आज के अनेक धुरंधर अपनी टिप्पणी में कहने लगे कि आप नारद पर पंजीकरण क्यों नहीं कराते। अब तो सभी हमारे मित्र हैं अब उनसे क्या पूछें कि आप खुद ही उस समय स्वयं ही क्यों नहीं पंजीकरण कर रहे थे? संभव है उस समय वह ब्लाग का पता कट पेस्ट करना भी नहीं जानते होंगे।
तय बात है कि उनको भी तब यह समझ में नहीं आ रहा होगा कि वर्डप्रेस पर सभी के सामने चमक रहा ब्लाग उनके यहां कैसे लिंक होगा जब तक दूसरा भेजेगा नहीं। वर्ड प्रेस पर किसी वेबसाईट की इमेज कैसे सैट करें यह अभी एक माह पहले हमें पता लगा।
हमारे एक मित्र ब्लाग लेखक मित्र श्री शास्त्री जी के ब्लाग पर कुछ ब्लाग लेखक हमारे मित्र के आई डी से ही टिप्पणी देकर बता रहे थे कि किस तरह उनके नाम का भी दुरुपयोग हो सकता है? हम तो हैरान हो गये यह देखकर! यह सोचकर डरे भी कि कोई हमारे ईमेल की चोरी न भी कर सका तो वह आई डी की चोरी तो आसानी से कर सकता है। हमारे एक मित्र श्री सुरेश चिपलूनकर इस तरह का झटका झेल चुके हैं।
इतना तय है कि इस तरह की हरकतें करने वाला ब्लाग लेखक कोई पुराना ही हो सकता है। हमारे शहर में जान पहचान के लोग ब्लाग लिखने का प्रयास कर रहे हैं और हमसे आग्रह करते हैं कि आप किसी दिन आकर हमारी मदद कर जाओ। कुछ लोगों को जब हिंदी का इंडिक टूल भेजते हैं तो वह गद्गद् हो जाते हैं-उनके लिये यह जादू की तरह है। हम सोचते हैं कि उन ब्लाग लेखकों को हमारे जितना ज्ञान पाने में ही एक वर्ष तो कम से कम लग ही जायेगा। ऐसे में इतना तय है कि कोई नया ब्लाग लेखक ऐसा नहीं कर सकता कि वह दूसरे के आई. डी. का इतनी आसानी से उपयोग करे।
ऐसे में हमारा तो समस्त अंतर्जाल लेखकों से यही आग्रह है कि भई, क्यों लोगों को आतंकित कर रहे हो। हमारे यहां के आम लोग और लेखक किसी झमेले में फंसने से बचते हैं। ऐसे में जहां पैसा एक भी नहीं मिलता हो और इस तरह फंसने की आशंका होगी तो फिर अच्छे खासे आदमी का हौंसला टूट जायेगा। हमारे सभी मित्र हैं, शायद इसलिये आशंकित हैं कि कहीं कुछ लोग इतिहास में अपना नाम जयचंद की तरह तो दर्ज नहीं कराने जा रहे।
वैसे हम तो सारे प्रसिद्ध ब्लाग लेखकों को पढ़ चुके हैं। इतना भी जान गये हैं कि तकनीकी रूप से कितना सक्षम है्-यह भी अनुमान कर लेते हैं कि कौन ऐसा कर सकता है? बिना प्रमाण किये कुछ कहना ठीक नहीं है फिर समस्या यह है कि सभी हमारे मित्र हैं और किसी पर संदेह करना अपराध जैसा है। ब्लाग से संबंधित कुछ समस्याओं का सामना करते हुए इस लेखक को लगता है कि कुछ लोग अब दूसरे को परेशान करने में सक्षम हो गये हैं।
बहरहाल इस तरह की अनाम या छद्मनाम टिप्पणियां करने का प्रचलन बढ़ रहा है पर दूसरे के नाम का दुरुपयोग कर ऐसे ब्लाग लेखक कोई हित नहीं कर रहे हैं। उनकी इस हरकत से होगा यह कि नये लेखकों को प्रोत्साहन देने कठिन हो जायेगा। अंततः इसके नतीजे उनको भी भोगने पड़ेंगे-क्योंकि जब हिंदी ब्लाग जगत इस तरह बदनाम होगा तो फिर नये लेखक नहीं जुड़ेंगे बल्कि पाठक भी कटने लगेंगे। जो अनाम या छद्म नाम से लिख रहे हैं वह भी कोई न कोई असली नाम से ब्लाग तो इस आशा में लिख ही रहे हैं कि कभी न कभी तो वह प्रसिद्ध होंगे पर अगर देश में नकारात्मक संदेश चला गया तो फिर उनकी यह आशा धरी की धरी रह जायेगी। अंत में यहां दोहरा देना ठीक है कि कि हमारे साथ तो सभी मित्रता निभाते आये हैं इसलिये उनसे करबद्ध प्रार्थना है कि वह इस बात को समझें। उनके इस कृत्य पर इस लेखक का मानना है कि यह अपराध नहीं बल्कि उनका बचपना है आशा है कि वह इसे समझकर इससे निहायत फूहड़ हरकत से परे रहेंगे। एक बात तय है कि हम सब आपस में ही हैं और संख्या में कम हैं इसलिये इधर उधर शिकायत करने की बजाय एक दूसरे को समझाकर या डांट कर साध लेते हैं पर यह संख्या बढ़ी और किसी के लिये यह असहनीय हुआ तो सभी जानते हैं कि फोन नंबर के माध्यम से कोई भी पकड़ा जा सकता है। इससे भी ज्यादा तो हिंदी ब्लाग जगत के बदनाम होने की आशंका है जिससे उन लोगों की भी मेहनत पानी में जायेगी जो अनाम टिप्पणियों से ब्लाग लेखकों के लिये तनाव पैदा कर रहे हैं-नये लेखकों को यहां लाने में मुश्किल होगी क्योंकि वैसे भी लोग अन्य प्रकार के आतंकों से डरे हुए हैं। ऐसे में सीधे इस तरह का आतंक झेलने का वह सोच भी नहीं सकते। इस लेखक का दावा है कि अपनी हरकत के बाद वह स्वयं भी बैचेनी अनुभव करते होंगे। हमारी तो स्पष्ट मान्यता है कि आप मजाक या गुस्से में भले ही टिप्पणी दो पर अनाम न रहो। बाकी किसी की मर्जी है जैसा करे।
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23/6/09

अधंविश्वासों ने धार्मिक आधार को कमजोर किया है-आलेख

एक मित्र ब्लाग लेखक सुरेश चिपलूनकर ने कल कुछ फोटो बनारस शहर और गंगा नदी के भेजे। वह हिंदी ब्लागजगत के सक्रिय लेखक होने के साथ दूसरों से सतत संपर्क रखने की कला में भी सिद्ध हस्त हैं और अक्सर ऐसे फोटो और वेबसाईटें ईमेल पर भेजते रहते हैं जो वैचारिक और चिंतन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है। कल उनके फोटो के साथ इस बात का भी जिक्र था कि हिंदू धर्म के पवित्र माने जाने वाले बनारस और गंगा नदी में कितना कचड़ा दिखाई देता है। मेरा कभी बनारस जाना नहीं हुआ पर उसके बारे मेंे सुनता रहता हूं। अनेक लोग भी इस बात की चर्चा करते हैं कि वहां गंगा में अब प्रदूषण बहुत है। कहने को इसके लिये लोग अनेक कारण बतायेंगे पर सच बात तो यह है कि इसके लिये अंध श्रद्धालू भी कम जिम्मेदार नहीं है। हिंदू अध्यात्म विश्व का सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है पर यह भी उतना ही सच है कि सर्वाधिक अज्ञानी और अंधविश्वासी भारत में ही हैं और इसी कारण भारत के अधिकतर शहर और नदियों की पवित्रता पर विष की चादर बिछ गयी है। देखा जाये तो मंदिर केवल इसलिये बने ताकि लोग एक समूह में आकर वहां सत्संग और कीर्तन कर सकें पर अंधविश्वासों और अज्ञान की वजह से लोगों ने उनको वह कूंआं मान लिया जहां से पुण्य भरकर अपने साथ स्वर्ग ले जाया सके। अपने दैहिक कचड़े को वहां छोड़कर वह यह मान लेते हैं कि वह पवित्र हो गये। उनके उस कचड़े से दूसरे आने वाले श्रद्धालू उनको कितना कोसते हैं और उसका पाप उनके सिर ही आता है यह वह भूल जाते हैं।
पहले उन फोटो की बात करें। उनमें दिखाया गया था कि बनारस की सड़कों पर भारी कचड़ा जमा था। गंगा नदी में लाशें तैर रहीं थीं। कई जगह रेत में तो हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। लाशें देखकर अच्छा खासा आदमी डर जाये। उनको कुत्ते खा रहे थे। कई जगह कौवे उन पर बैठे थे। कई लाशें जलने को तैयारी थी तो पास में लोग नहाते हुए दिख रहे थे। कटे हुए बालों के झुंड वहां जमा थे। यह दृश्य देखकर हृदय से भक्ति करने वाले किसी भी आदमी का मन दुःखी हो सकता है। शरीर के बाल, पुराने जूते और कपड़े मंदिरों या तीर्थों पर जाकर फैंकना किस धर्म का हिस्सा है यह कहना कठिन है क्योंकि जिन ग्रंथों को हिंदू धर्म का आधार माना जाता है उनमें ऐसी कोई चर्चा नहीं है।
यह समस्या केवल बनारस तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के अनेक सिद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों मेेंं ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि हम अपने एक मित्र के साथ स्कूटर पर अपने ही शहर से तीस तीस किलोमीटर दूर एक प्रसिद्ध मंदिर गया। वह भी पवित्र दिन था और मित्र ने आग्रह इस तरह किया कि हमने सोचा चलो हम भी हो आते हैं। वहां जाकर अपना ध्यान भी लगायेंगे और घूमना भी हो जायेगा।

मंदिर पहाड़ी पर था और रास्ते में खेत खलिहान और तालाब देखकर बहुत अच्छा लगा। शहर से दूर ताजी हवा वैसे भी मन को प्रभावित करती है। जब उस मंदिर के निकट पहुंचे तो बहुत भीड़ थी। वैसे उस मंदिर पर भीड़ इतनी नहीं होती पर उस दिन खास दिन था इसलिये आवाजाही अधिक थी। हमने मंदिर से दो किलामीटर स्कूटर रखा-उसको रखने के पांच रुपये दिये क्योंकि ऐसे मौके पर भी भक्तों के साथ कोई रियायत नहीं होती। हम दोनों पैदल पहाड़ी पर चढ़ने लगे। वहां किनारे नाईयों के पास अपने बाल कटवाने वाले लोगों का झुंड लगा हुआ था। किनारे के दोनेां और पड़े बालो के झुंड किसी का मन खराब करने के लिये काफी थे। हम चलते गये तो आगे देखा कि लोग पुरानी चप्पलें वहीं छोड़ गये थे जो कई बार हमारे पैरों में बाधा पैदा कर देती थी। मंदिर पहुंचे तो लंबी लाईन लगी थी। हमने अपने मित्र से कहा कि इस धूप में इतनी देर लाईन में खड़े होना हमारे लिये संभव नहीं हैं। हम तो कभी दोबारा आकर दर्शन कर लेंगे।’
मित्र भी निराश हो गया था पर चलते चलते वह पता नहीं मंदिर से पचास मीटर पहले ही लाईन के बीच में लग गया हम उससे उस समय थोड़ा दूर थे। तब हम मंदिर के पास ही एक टैंट के में अपने बैठने की जगह तलाशने लगे। वह एक मैदान था। वहां बालों, पुराने कपड़ों और चप्पलों के बीच खड़ा होकर हम सोचने लगे कि ‘भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान’ में आखिर ऐसा कहां संदेश मिलता है कि धार्मिक स्थानों को अपने अंधविश्वासों से अपवित्र बनाया जाये। एक तो गर्मी फिर वहां के इस दृश्य ने हमें नरक के दर्शन कराकर पीड़ा ही दी और जब तक मित्र बाहर नहीं आया उससे झेलते रहे। एक बार तो गुस्सा आया कि लोगों से कहैं कि ‘यह कौनसा भक्ति करने का तरीका है।’ पर फिर सोचा कि जिस अध्यात्मिक ज्ञान की बात हम करेंगे उसके बारे में यह अधिक बतायेंगे। यहां कई ऐसे ज्ञानी हैं जिनको कबीर,तुलसी और सूर के दोहे जुबानी याद हैं पर अंधविश्वास की धारा में वही सभी से अधिक बहते हैं।
अगर पूरे बाल कटवा दिये जायें तो दिमाग को तरावट होती है। नये कपड़े या जूते पहने से भी देह को सुखद अनुभूति होती है। अगर किसी पवित्र स्थान पर जाकर ऐसी अनुभूति की तो कोई चमत्कार नहीं है पर उसको सिद्धि से जोड़ना भ्रम है। मंदिर निर्माण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य में सामुदायिकता की भावना का विकास करना है और उसमें सिद्धि और प्रसिद्धि को विचार तो केवल प्रचार या विज्ञापन ही है। जो लोग वहां अपनी गंदगी का त्याग करते हैं वह कहां जायेगी? इस पर कोई नहीं सोचता। अनेक लोग मंदिरों में केवल मत्था टेकने जाते हैं उनके लिये इस प्रकार की गंदगी वहां नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करती है।

चिपलूनकर जी ने ईमेल के ऊपर ही लिख दिया था कि अंधभक्ति और कमजोर दिलवाले इसे नहीं देखें। बहरहाल हमने फोटो देखे और इस बात को समझ गये कि वह कहना क्या चाहते हैं? उन फोटो को यहां दिखाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह एक व्यापक विषय है कि हम अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर अंधविश्वासों का बोझ कम तक ढोते रहेंगे? अक्सर देश की संस्कृति और संस्कार बचाने की बात करने वाले आखिर इस अंधविश्वास से आंखें बंद कर क्यों अपने अभियान चलाते हैं? आम पाठक शायद न समझें पर ब्लाग जगत पर सक्रिय ब्लाग लेखक यही कहना चाहेंगे कि यह सवाल तो सुरेश चिपलूनकर जी से ही किया जाना चाहिये। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि सुरेश चिपलूनकर जी परंपरावादी लेखकों के समूह के सदस्य हैं पर हम ऐसा नहीं मानते। उनकी उग्र लेखनी से निकले आलेखों पर सभी लाजवाब हो जाते हैं और जो विरोध करते हैं तो भी उनके तर्क कमजोर दिखते हैं। सच बात तो यह है कि सुरेश चिपलूनकर न केवल अंध विश्वासों के विरोधी है बल्कि उनके कई पाठ धर्म के नाम पर पाखंड के विरुद्ध लिखे गये हैं। उन्होंने अपने ही उज्जैन शहर के मंदिर पर हो रहे पाखंड और भ्रष्टाचार का उल्लेख अपने पाठ में लिया था। उनके इन प्रहारात्मक लेखों से लोग इसलिये भी प्रभावित होते हैं। उन्हें परंपरावादी लेखक तो हम नहीं मानते बल्कि आधुनिक विचाराधारा के परिपक्व श्रेणी के लेखकों में गिनती करते हैं।
प्रसंगवश परंपरपादी और प्रगतिशील लेखकों की बात भी कर लें। दोनों में कोई अधिक अंतर नहीं है। प्रगतिशील भारत के अंधविश्वासों को निशाना बनाते हुए यहां के समग्र चरित्र पर प्रहार करते हुए विदेशी विचारधाराओं की बात करते हैं जबकि परंपरावादी लेखक अपने पुराने ज्ञान को ही प्रमाणिक मानते हैं और अपने अंधविश्वास और पाखंड से बचते हैं। प्रगतिशील और परंपरावादियों से अलग ऐसे आधुनिक लेखक भी हैं जो अपने पुराने अध्यात्म को प्रमाणिक मानते हुए अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार करने का अवसर नहीं चूकते और यही कारण है कि यह तीसरा वर्ग ही भारत में परिवर्तन के लिये जूझता दिखता है। सच बात तो यह है कि कर्मकांडों का आधार स्थानीय होता है और उनका धर्म से संबंध केवल इसलिये दिखता है क्योंकि देश के अधिकतर लोगों के धार्मिक इष्ट एक ही है। कई जगह एक त्यौहार जिस तरह से मनाया जाता है तो दूसरी जगह दूसरे ढंग से। उसी तरह जाति से भी त्यौहार मनाने के तरीके से भिन्नता का आभास होता है। अगर हम कुल निष्कर्ष निकालें तो केवल अध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर ही सभी एक हैं कर्मकांडों में विरोधाभास है और वह धर्म का आधार कतई नहीं लगते। यह अलग बात है कि पहले पुराने और अब आधुनिक बाजार ने अपनी कमाई के लिये कर्मकांडों को ही धार्मिक आधार बना दिया है। सच बात तो यह है कि अंधविश्वासों की वजह से धर्म बदनाम ही हुआ है और पराये क्या अपने ही लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। भारत के अनेक महापुरुषों में पाखंड और अंधविश्वास से दूर रहने का संदेश दिया है और उनके कृतित्व का ही नतीजा है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है। शेष फिर कभी
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21/6/09

बहस करने वाले रामायण नहीं पढ़ते-आलेख

श्रीराम द्वारा रावण वध के बाद श्रीलंका से वापस आने पर श्रीसीता जी की अग्नि परीक्षा लेने का प्रसंग बहुत चर्चित है। अक्सर भारतीय धर्म की आलोचना करने वाले इस प्रसंग को उठाकर नारी के प्रति हमारे समाज के खराब दृष्टिकोण का प्रचार करते हैं। दरअसल समस्या वही है कि आक्षेप करने वाले रामायण पढ़ें इसका तो सवाल ही नहीं पैदा होता मगर उत्तर देने वाले भी कोई इसका अध्ययन करते हों इसका आभास नहीं होता। तय बात है कि कहीं भी चल रही बहस युद्ध में बदल जाती है। इन बहसों को देखकर ऐसा लगता है कि किसी भी विद्वान का लक्ष्य निष्कर्ष निकालने से अधिक स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना होता है।
यह लेखक मध्यप्रदेश का है और यहां के लोग ऐसी लंबी बहसों में उलझने के आदी नहीं है। कभी कभी तो लगता है कि देश में चल रहे वैचारिक संघर्षों से हम बहुत दूर रहे हैं और अब अंतर्जाल पर देखकर तो ऐसा लगता है कि बकायदा कुछ ऐसे संगठन हैं जिन्होंने तय कर रखा है कि भारतीय धर्म की आलोचना कर विदेशी विचाराधाराओं के सहारे अपना वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास करते रहेंगे। उनका यह कार्य इतना योजनाबद्ध ढंग से है कि वह बौद्धिक वर्ग की महिलाओं में भारतीय धर्म के प्रति अरुचि पैदा करते हैं क्योंकि उनको लगता है कि इससे वह भारतीय समाज को अस्थिर कर सकते हैं। हालांकि उनकी यह योजना लंबे समय में असफल हो जायेगी इसमें संशय नहीं है।
आईये हम उस प्रसंग की चर्चा करें। नारी स्वतंत्रय समर्थकों ने रामायण नहीं पढ़ी। श्रीसीता जी जब रावण वध के बाद श्रीराम के पास आयी तो वह उनको देखना भी नहीं चाहते थे-इसे यह भी कह सकते हैं कि वह इतनी तेजस्वी थी कि एकदम उन पर दृष्टि डालना किसी के लिये आसान नहीं था। वहां श्रीरामजी ने उनको बताया कि चूंकि वह दैववश ही रावण द्वारा हर ली गयी थी और उनका कर्तव्य था कि उसकी कैद से श्रीसीता को मुक्त करायें। अब यह कर्तव्य सिद्ध हो गया है इसलिये श्रीसीता जी जहां भी जाना चाहें चली जायें पर स्वयं स्वीकार नहीं करेंगे।
यह आलोचक कहते हैं कि श्रीसीता के चरित्र पर संदेह किया। यह पूरी तरह गलत है। दरअसल उन्होंने श्रीसीता से कहा कि ‘रावण बहुत क्रूर था और आप इतने दिन वहां रही इसलिये संदेह है कि वह आपसे दूर रह पाया होगा।’
तात्पर्य यह है कि भगवान श्रीराम ने श्रीसीता के नहीं बल्कि रावण के चरित्र पर ही संदेह किया था। बात केवल इतनी ही नहीं है। रावण ने श्रीसीता का अपहरण किया तो उसके अंग उनको छू गये। यह दैववश था। श्रीराम जी का आशय यह था कि इस तरह उसने अकेले में भी उनको प्रताड़ित किया होगा-श्रीसीता जी के साथ कोई जबरदस्ती कर सके यह संभव नहीं है, यह बात श्रीराम जानते थे।
भगवान श्रीराम और सीता अवतार लेकर इस धरती पर आये थे और उनको मानवीय लीला करनी ही थी। ऐसे में एक वर्ष बाद मिलने पर श्रीराम का भावावेश में आना स्वाभाविक था। दूसरा यह कि श्रीसीता से तत्काल आंख न मिलाने के पीछे यह भी दिखाना था कि उनको स्वयं की गयी गल्तियां का भी आभास है। एक तो वह अच्छी तरह जानते थे कि वह मृग सोने का नहीं बल्कि मारीचि की माया है। फिर भी उसके पीछे गये। यहां यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि श्रीसीता जी उनको किसी भी प्रकार की हिंसा करने से रोकती थीं। सोने का वह मृग भी श्रीसीता ने जीवित ही मांगा था। एक तरह से देखा जाये तो श्रीसीता अहिंसा धर्म की पहली प्रवर्तक हैं। श्रीसीता जी के रोकने के बावजूद श्रीराम धर्म की स्थापना के लिये राक्षसों का वध करते रहे। उसकी वजह से रावण उनका दुश्मन हो गया और श्रीसीता जी को हभी उसका परिणाम भोगना पड़ा। मानव रूप में भगवान श्रीराम यही दिखा रहे थे कि किस तरह पति की गल्तियों का परिणाम पत्नी को जब भोगना पड़ता है और फिर पति को अपनी पत्नी के सामने स्वयं भी शर्मिंदा होना पड़ता है।
मानव रूप में कुछ अपनी तो कुछ श्रीसीता की गल्तियों का इंगित कर वही जताना चाहते थे कि आगे मनुष्यों को इससे बचना चाहिये।
भरी सभा में श्रीसीता से भगवान श्रीराम ने प्रतिकूल बातें कही-इस बात पर अनेक आलोचक बोलते हैं पर सच बात तो यह है कि श्रीसीता ने भी श्रीराम को इसका जवाब दिया है। उन्होंने श्रीराम जी से कहा-‘आप ऐसी बातें कर रहे हैं जो निम्नश्रेणी का पुरुष भी अपनी स्त्री से नहीं कहता।’
इतनी भरी सभा में श्रीसीता ने जिस तरह श्रीराम की बातों का प्रतिकार किया उसकी चर्चा कोई नहीं करता। सभी के सामने अपने ही पति को ‘निम्न श्रेणी के पुरुषों से भी कमतर कहकर उन्होंने यह साबित किया कि वह पति से बराबरी का व्यवहार करती थीं। श्रीराम दोबारा कुछ न कह सके और इससे यह प्रमाणित होता है कि वह उस लीला का विस्तार कर रहे थे।
यहां यह याद रखने लायक बात है कि श्रीसीता अग्नि से सुरक्षित निकलने की कला संभवतः जानती थी और यह रहस्य श्रीराम जी को पता था। जब श्री हनुमान जी ने लंका में आग लगायी तब वह श्रीसीता की चिंता करने लगे। जब अशोक वाटिका में पहुंचे तो देखा कि केवल श्रीसीताजी ही नहीं बल्कि पूरी अशोक वाटिका ही सुरक्षित है। तब उनको आभास हो गया कि श्रीसीता कोई मामूली स्त्री नहीं है बल्कि उनका तपबल इतना है कि आग उनके पास पहुंच भी नहीं सकती। श्रीसीता को पुनः स्त्री जाति में एक सम्मानीय स्थान प्राप्त हो इसलिये ही श्रीराम ने इस रहस्य को जानते हुए ही इस तरह का व्यवहार किया।
श्रीराम ने गलती की थी कि वह जानते हुए भी मारीचि के पीछे गये। रक्षा के लिये उन्होंने अपने छोटे भाई श्रीलक्ष्मण को छोड़ा। जब श्रीराम जी का बाण खाकर मारीचि ‘हा लक्ष्मण’ कहता हुआ जमीन पर गिरा तब उनको समझ में आया कि वह क्या गलती कर चुके हैं।
उधर श्रीलक्ष्मण भी समझ गये कि मरने वाला मारीचि ही है पर श्रीसीता ने उन पर दबाव डाला कि वह अपने बड़े भाई को देखने जायें। श्रीलक्ष्मण जाने को तैयार नहीं थे श्रीसीता ने भी उन पर आक्षेप किये। यह आक्षेप लक्ष्मण जी का चरित्र हनन करने वाले थे। भगवान श्रीराम इस बात से भी दुःखी थे और उन्हें इसलिये भी श्रीसीता के प्रति गुस्सा प्रकट किया।
यह आलेख नारी स्वतंत्रय समर्थकों को यह समझाने के लिये नहीं किया गया कि कथित रूप से वह भगवान श्रीराम पर श्रीसीता के चरित्र पर लांछन लगाने का आरोप लगाते हैं जबकि भगवान श्रीराम ने कभी ऐसा नहीं किया। उल्टे उन्होंने उनके प्रिय भ्राता श्रीलक्ष्मण पर आक्षेप किये थे। हमारा आशय तो भारतीय धर्म के समर्थकों को यह समझाना है कि आप जब बहस में पड़ते हैं तो इस तरह के विश्ेलषण किया करें। रामायण पर किसी भी प्रकार किसी भी स्त्री के चरित्र पर संदेह नहीं किया गया। जिन पर किया गया है उनमें रावण और श्रीलक्ष्मण ही हैं जो पुरुष थे।
कहने का तात्पर्य यह है कि ग्रंथों में परिवार और समाज को लेकर अनेक प्रकार के पात्र हैं उनमें मानवीय कमजोरियां होती हैं और अगर न हों तो फिर सामान्य मनुष्य के लिये किसी भी प्रकार संदेश ही नहीं निकल पायेगा। फिर पति पत्नी का संबंध तो इतना प्राकृतिक है कि दोनों के आपसी विवाद या चर्चा में आये संवाद या विषय लिंग के आधार पर विचारणीय नहीं होते। मुख्य बात यह होती है कि इन ग्रंथों से संदेश किस प्रकार के निकलते हैं और उसका प्रभाव समाज पर क्या पड़ता है? श्रीसीता जी एकदम तेजस्वी महिला थी। लंका जलाने के बाद श्रीहनुमान ने उनसे कहा कि ‘आप तो मेरी पीठ पर बैठकर चलिये। यह राक्षण कुछ नहीं कर सकेंगे।’
श्रीसीता ने कहा-‘मैं किसी पराये मर्द का अंग अपनी इच्छा से नहीं छू सकती। रावण ने तो जबरदस्ती की पर अपनी इच्छा से मैं तुम्हारा स्पर्श नहीं करूंगी। दूसरा यह है कि मैं चाहती हूं कि मेरे पति की प्रतिष्ठा में वृद्धि हो। वह होगी क्योंकि तुम जैसे सहायक हों तब उनकी जीत निश्चित है।’
इससे आप समझ सकते हैं कि श्रीसीता कितनी दृढ़चरित्र से परिपूर्ण हो गयी थी कि अवसर मिलने पर भी वह लंका से नहीं भागी चाहे उनको कितना भी कष्ट झेलना पड़ा। वह कोमल हृदया थी पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह बिचारी या अबला थी।
नारी स्वतंत्रय समर्थकों ने हमेशा ही इस मसले को उठाया है और यह देखा गया है कि भारतीय धर्म समर्थक इसका जवाब उस ढंग से नहीं दे पाते जिस तरह दिया जाना चाहिये। अक्सर वह लोग श्रीसीता को अबला या बेबस कहकर प्रचारित करते हैं जबकि वह दृढ़चरित्र और तपस्वी महिला थी। वह भगवान श्री राम की अनुगामिनी होने के साथ ही उनकी मानसिक ऊर्जा को बहुत बड़ा स्त्रोत भी थीं। भगवान श्रीराम महान धनुर्धर पुरुष थे तो श्रीसीता भी ज्ञानी और विदुषी स्त्री थी। यही कारण है कि पति पत्नी की जोड़ी के रूप में वह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन के मूल आधार कहलाते हैं।
शेष फिर कभी
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14/6/09

श्रीगीता के संदेश को पढ़े और समझे बिना उसका प्रचार हास्यप्रद-आलेख

एक टीवी चैनल का एक दृश्य है। उसमें एक अधेड़ महिला-धारावाहिकों में काम करने वाली महिलाओं को बुढ़िया इसलिये भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि परदादी होने पर भी उनके बाल काले होते हैं-कुछ बोलते हुए पढ़ रही है-‘इस संसार में क्या साथ लाये हो और क्या ले जाओगे। जो कुछ भी पास में है यही छोड़ जाओगे।’
इतने में उसका पति आता है-यह बाद में ही पता चलता है क्योंकि उसके बाल सफेद हैं-और वह उसे देखकर चुप हो जाती है। वह उससे पूछता है-‘क्या पढ़ रही हो?’
वह उत्तर देती है-‘गीता पढ़ रही हूं।’
वह कहता है-‘अच्छा कर रही हो। इस उम्र में यही ठीक रहता है।’
अपने देश के हिंदी धारावाहिक चैनलों के निर्माता दर्शकों की धाार्मिक प्रवृत्तियों का दोहन करने के लिये मनोरंजन के नाम पर उसमें कुछ दृश्य ऐसे जोड़ते हैं जिससे उसके सामाजिक होने को प्रमाणित किया जा सके-यह अलग बात है कि वह इस आड़ में कर्मकांड और अंधविश्वास वाले दृश्य भी जोड़ते जाते हैं। प्रसंगवश इन्हीं चैनलों में नारी को घर की एक निष्क्रिय सदस्य माना जाता है जो हमेशा प्रपंचों में लगी रहती है। कोई नारी स्वातंत्र्य समर्थक बुद्धिजीवी इस विचार नहीं करता और कभी कभी तो लगता है कि वह भी इन्हीं से प्रभावित होकर अपने विचार व्यक्त करते हैं।
मगर इस चर्चा का उद्देश्य यह नहीं है। हम तो बात उस दृश्य की कर रहे हैं जिसने इस लेखक को हैरान कर रख दिया। वह महिला उस किताब को पढ़ते हुए जो वाक्य बोली थी वह कहीं श्रीगीता में नहीं है। श्रीगीता के संदेशों का जो आशय है उस पर यहां चर्चा नहीं की जा रही है। जब कोई यह कहता है कि वह श्रीगीता पढ़ रहा है तो उसका मतलब यह है कि वह संस्कृत के श्लोक पढ़ रहा है या उसका अनुवाद। जो लोग नियमित रूप से श्रीगीता पढ़ते हैं वह अच्छी तरह से जानते हैं कि उसमें क्या लिखा है? यकीनन उपरोक्त वाक्य कहीं भी श्रीगीता में नहंी है।
इतना ही नहीं इन संवादों भाव भी देखें। यह वैराग्य भाव को प्रेरित करते हैं जबकि श्रीगीता मनुष्य को संपूर्ण अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हुए विज्ञान में विकास के लिये प्रेरित करने के साथ ही जीवन में अपने स्वाभाविक कर्म करने के लिये प्रेरित करती है-जिन पाठकों को लेखक की इस बात पर संदेह हो वह उसे लेकर किसी श्रीगीता सिद्ध के पास ही जाकर उसकी जानकारी मांगें क्योंकि अनेक संतों और धार्मिक संस्थाओं द्वारा श्रीगीता के संबंध में जो उसका आशय प्रकाशित किया जाता है वह भी श्रीगीता में नहीं है।
इस दृश्य में ऐसे दिखाया गया है कि जिनकी जिंदगी की रंगीन नहीं रही है या जिनके रोमांस की आयु बीत गयी है उन्हें ही श्रीगीता का अध्ययन करना चाहिये। शायद कुछ लोगों को अजीब लगे पर सच यह है कि श्रीगीता का अध्ययन करने का समय ही युवावस्था है जिसमें लोग गल्तियां अधिक करते हैं। यही वह आयु होती है जिसमें पाप और पुण्य अर्जित किये जाते हैं। ऐसे में श्रीगीता का अध्ययन करने से ही वह बुद्धि प्राप्त होती है जो न केवल जीवन के चरमोत्कर्ष पर पहुंचाती है बल्कि स्वयं को गल्तियां करने से भी बचाती है।
अब आते हैं मुख्य बात पर।
आमतौर से हिंदी, हिन्दू और हिन्दुत्व को लेकर अनेक प्रकार की बहसें चलती हैं। निश्चित रूप से इसमें बुद्धिजीवी अपनी विचाराधाराओं के अनुसार विचार व्यक्त करते हैं। देश में लोकतंत्र है और इसमें कोई आपत्ति नहीं है पर यह प्रश्न तो उठता ही है कि वह जिन ग्रंथों को लेकर भारतीय धर्म की आलोचना करते हैं क्या वह उन्होंने पढ़े है? मगर यह सवाल केवल आलोचकों से ही नहीं वरन् भारतीय धर्मों के समर्थकों से भी है।
आलोचकों ने भारतीय धर्म का आधार स्तंभ मानते हुए वेदों और मनुस्मृति से चार पांच श्लोक और तुलसीदास का एक दोहा ढूंढ लिया है जिसे लेकर वह भारतीय धर्म पर बरसते हैं मगर समर्थक भी क्या करते हैं? वह दूसरे धर्मों के दोष गिनाने शुरु कर देते हैं। मतलब भारतीय धर्म के आलोचकों और प्रशंसक दोनों ही नकारात्मक सोच के झंडाबरदार हैं। नकारात्मक बहस में शब्द और वाणी में आक्रामकता आती है और प्रचार माध्यमों के लिये वह इसलिये रोचक हो जाती है।
देश का एक बहुत बड़ा बुद्धिजीवी समुदाय बहस बहुत करता है पर न तो वह भारतीय अध्यात्म ज्ञान की जानकारी रखता है और न ही रखना चाहता है। इसकी उसे जरूरत ही नहीं है क्योंकि प्रचार माध्यम उनको वैसे ही प्रसिद्ध किये दे रहे हैं। इससे हुआ यह है कि जिन लोगों के नाम के साथ भारतीय धर्म की पहचान लगी हुई है वह अध्यात्मिक ज्ञान को समझे बगैर ही उसका प्रचार प्रसार करते हैं-बशर्त इससे उनको व्यवसायिक लाभ होता हो। वह धारावाहिक जिन लोगों ने देखा होगा उनका मन उस निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और अभिनेत्री के प्रति अंधश्रद्धा से भर गया होगा-वाह क्या दृश्य है?
इधर भारतीय धर्म के व्यवसायिक साधु और संतों ने भी कोई कम हानि नहीं पहुंचाई है। अधिकतर प्रसिद्ध संतों और साधुओं ने अनेक तरह की संपत्ति का निर्माण किया है-हमें इस पर भी आपत्ति नहीं है क्योंकि लोग सभी जानते हैं और फिर भी उनके पास जाते हैं। यह लेखक भी कभी कभार उनके प्रवचनों में चला जाता है क्योंकि वही जाकर पता लगता है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान क्या है और उसे बताया किस तरह जा रहा है?
आज श्री बालसुब्रण्यम का एक आलेख पढ़ा जिसमें उन्होंने भक्तिकाल के साहित्य को सामंतशाही के विरुद्ध एक आंदोलन निरुपित किया। यह एक नया विचार था। उन्होंने वर्ण संबंधी ऐसे श्लोकों और दोहों की भी चर्चा की जिनको लेकर भारतीय धर्म को बदनाम किया जाता हैं। इस लेखक ने अपनी टिप्पणी लिखी जिसका आशय यह था कि भारतीय भाषाओं में अनेक बातें व्यंजना विद्या में लिखे जाने की प्रवृत्ति है और विदेशी पद्धति से चलने वाले विद्वानों उसका केवल शब्दिक या लाक्षणिक अर्थ लेते हैं।

सच बात तो यह है कि इस देश को सांस्कृतिक या धार्मिक खतरा विदेशी भाषाओं, विचारधाराओं और उनके प्रचारकों से नहीं बल्कि देश के लोगों की बौद्धिक गरीबी से है जो भले ही अंग्रेजी नहीं जानते पर उस पर आधारित शिक्षा पद्धति से शिक्षित होने के कारण बाहरी आवरण से अपनी भाषा और संस्कृति में रंगे जरूर लगते हैं पर भावनात्मक रूप से बहुत परे हैं। वह व्यवसायिक प्रचार माध्यमों और कथित साधु संतों की बातों से अपने अध्यात्म को समझते हैं जो उनको कर्मकांडों और अंधविश्वासों से कभी बाहर नहीं निकलने देती।
देश की फिल्मों, टीवी चैनलों, और व्यवसायिक प्रकाशनों में ऐसे ही अल्पज्ञानी लोग भारतीय धर्म के पैरोकार बनते हैं जो आलोचकों के वाद और नारों का उत्तर भी वैसा ही देते हैं जिनसे बहस और अभियानों का परिणाम नहीं निकलता।
हमें किसी की सक्रियता पर कोई आपत्ति नहीं करना चाहिए मगर जब यह बातें सामने आती हैं तो अपना दायित्व समझते हुए सचेत करना अपना कर्तव्य समझते हैं कि पहले भारतीय अध्यात्म ज्ञान को समझें फिर उसके समर्थन में आगे बढ़ें। यहां यह भी बता दें श्रीगीता में कोई लंबा चैड़ा ज्ञान भी नहीं हैं। न ही उसमें कोई रहस्य छिपा है-जैसा कि कुछ विद्वान दावा करते हैं। पढ़ने में समझ में सब आ जायेगा मगर पहले यह देखना होगा कि संकल्प किस तरह का है। अगर आप उससे सीखने और समझने के लिये पढ़ रहे हैं तो उसका ज्ञान स्वतः आता जायेगा। अगर आप ऐसे सिद्ध बनने की कामना करते हुए पढ़ना चाहते हैं जिससे ढेर सारे लोग गुरु मानकर पूजा करें तो ं तो फिर कुछ नहीं होने वाला। फिर तो आप प्रसिद्ध ज्ञानी जरूर हो जायेंगे। लोग आपके ज्ञान को श्रीगीता का ही ज्ञान कहेंगे मगर जो उसके नियमित पढ़ने वाले होंगे वह आपके पाखंड को समझ जायेंगे।
यहां कुछ उदाहरण देना अच्छा रहेगा
कई जगह लिखा मिल जाता है कि
1. ‘भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म ही मेरी पूजा है’।
स्पष्टीकरण-
पूरी श्रीगीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने कहीं भी ऐसा नहीं कहा। हां, उसमें निष्काम कर्म करने की प्रेरणा दी गयी है पर उसे भी अपनी पूजा नहीं कहा।
2.‘भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि सभी जीवों पर दया करो।’
स्पष्टीकरण-
श्रीगीता में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा गया बल्कि उसमें निष्प्रयोजन दया का संदेश है।
लेखक द्वारा यह चर्चा करने का उद्देश्य स्वयं को सिद्ध प्रमाणित करने के लिये नहीं किया जा रहा है बल्कि इस आशा के साथ किया जाता है कि अगर कोई ज्ञान में कमी हो तो उसमें सुधार किया जाये। शेष फिर कभी
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