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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

11/2/17

कहीं रौशनी कहीं अंधेरा पल रहा है-दीपकबापूवाणी (kahin roshni kahin andhera pal raha hai-DeepakBapuwani)


वाणी पर सजे दरबार के बहुत नाम, जैसी जगह देखी वैसा लिया मुख से नाम।
दीपकबापूभक्त रूप धरा थैला फैलाते, चले सवारी राजमार्ग फकीर बस नाम।।
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जिन सामानों में चैन ढूंढा पुराने हो गये, जमीन पर उतरे बिना सपने पुराने हो गये।
दीपकबापूभक्ति में ही शक्ति पाई, ताजा रहा नाम साथ जो थे सभी पुरान हो गये।।
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कहीं रौशनी कहीं अंधेरा पल रहा है, कोई संयोग से खुश कोई वियोग जल रहा है।
दीपकबापूएक जगह कई नजारे देखें, किसी का सूरज उदय तो किसी का ढल रहा है।।
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मौसम के खेल में इंसान चला है, प्रतिकूल में लगे सब बुरा अनुकूल में सब भला है।
दीपकबापूअपने लिये सब सामान जुटाये, चिराग तो वह जो सबके लिये जला है।।
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अपनी आस्था भी सरेआम दिखाते, भक्ति में नाम पर शोर मचाना सिखाते।
दीपकबापूगवैये बन गये रुहानी उस्ताद, शार्गिदो को बस नचाना सिखाते।।
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10/21/17

दिल का मजा क्या जो पांव थका देता है-दीपकबापूवाणी (Dil ka maza paanv ko dhaka deta hai-DeepaBapuWani)

ऊंचे पद चाहें किताबें कभी नहीं पढ़े, चाटुकारिता से तख्त की सीढ़ी चढ़े।
‘दीपकबापू’ देखें नहीं काबलियत का सबूत, तारीफ उनकी जो धोखे से बढ़े।।
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चंदन तिलक लगाने से भक्ति न मिले, बड़े बोले से कभी शक्ति न मिले।
‘दीपकबापू’ धर्म की पोथी सिर पर रखे, भटका मन कभी आसक्ति न हिले।।
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तन का विकार दिखे मन समझे न कोई, बोला शब्द सुने सोच जाने न कोई।
‘दीपकबापू’ दोहरेपन जीने की आदत हो गयी, अपना ही सच माने न कोई।।
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दिल का मजा क्या जो पांव थका देता है, वह जोश क्या जो अक्ल पका देता है।
‘दीपकबापू’ बेचैनी लिये भागते इधर उधर, वह चैन क्या मिले जो दर्द बका देता है।।
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नदियों का जल समेटता समंदर गहरा है, सुंदर वन समेटे पहाड़ घाटियों का पहरा है।
‘दीपकबापू’ आकाश समेटे सूरज चंद्रमा तारे, तारीफ से उसे कैसे खुश करें वह तो बहरा है।।
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10/9/17

अपने लिये रुपये सभी को कमाने हैं-दीपकबापूवाणी (Apne liye rupaye sabhi ko kamane hain-DeepakBapuWani)

भीड़ में चिल्लाने से अच्छा उदास हो जायें, लोगों से दूर अपने ही पास हो जायें।
दीपकबापूदर्द हो बनाया बिकने का सामान, आओ अपने स्वयं ही खस हो जायें।।
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अपने लिये रुपये सभी को कमाने हैं, भल्ला बेचें या भला धंधे उन्हें जमाने हैं।
दीपकबापूवादे करते नारे भी बहुत सुनाये, इंसान शिकारों की तरह लुभाने हैं।।
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सभी को पराये झगड़े पर मजा आता है, गैर गिरे तो हर कोई ताली बजाता है।
दीपकबापूभौतिक जाल में फंसाये अक्ल, वही फटे में टांग डाल सजा पाता है।।
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ज़माने की भलाई का शोर करते हैं, निरर्थक बातों से सभी को बोर करते हैं।
दीपकबापूमन बहलाते वादे और नारे से, शब्दों में पत्थर जैसा जोर भरते हैं।।
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जोगी जिंदगी में महल लगें कैदखाने, असिद्ध जाते अंदर सिद्धि का सौदा लगाने।
दीपकबापूमायाजाल में फंसाया उन्मुक्त भाव, चले बाज़ार त्यागी छवि चमकाने।।
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सच्चे योगी
राजनीति शास्त्र नहीं पढ़े हैं,
राजपदों पर शान से चढ़े हैं।
दीपकबापूदिल के सौदे में
जज़्बात पथरीली सोच में मढ़े हैं।
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झूठों ने भी तकदीर बदली है,
हारे पर सच्चे की पीर पगली है।
दीपकबापूशब्दों में बहकते नहीं
मक्कारों की लालच ठग ली है।।
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छाया पर भरोसा सदा किया करो
कभी धूप से भी लड़ लिया करो
दीपकबापूनिकालकर पसीना
उसकी खुशबू में भी जिया करो।
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घाव सहलाने का मजा लेने दो
हमारा खून बहते जाने दो।
हमें लड़ाई का मजा लेने दो यारों
मुश्किलों को ऐसे ही जाने दो।
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उमस का मौसम बंद हवायें
आओ कुछ पल उदास हो जायें।
दीपकबापूकब तक तक रहे बदहवास
आओ अकेले में अपने पास हो जायें।
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