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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

8/17/16

चिंतायें बेचते महंगे दाम-हिन्दी कविता (Chintaey bechte Mahange Dam-HindiPoem)


सोचते सभी
मगर कर नहीं पाते
भलाई का काम।

कहते सभी निंदा स्तुति
मगर कर नहीं पाते
बढ़ाई का काम।

कहे दीपकबापू चिंत्तन से
जी चुराते मिल जाते 
हर जगह लोग
चिंतायें बेचते महंगे दाम
करते लड़ाई का काम।
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7/31/16

सड़क स्मार्टफोन और इश्क-हिन्दी हास्य कविता (Road SmartPhone and love-Hindi Hasya kavita)

प्रेमिका ने कहा प्रेमी से
संभलकर कर मोटरसाइकिल चलाना
अपने शहर में
सड़क में कहीं गड्ढे
कहीं गड़्ढों में सड़क है।

प्रेमी ने कहा
‘प्रियतमे! तुम भी बैठे बैठे
स्मार्टफोन पर अपने
चेहरे पर मेकअप करते हुए
सेल्फी मत लेना
हिलने में खतरे बहुत
गिरे तो टीवी पर सनसनी
समाचार बन जायेंगे
अस्पताल पहुंचे तो ठीक
श्मशान में शोकाकुल
मुझे बहुत शर्मांयेंगे
कहेंगे इश्क ने
किया इसका बेड़ा गर्क है।
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-दीपक ‘भारतदीप’-

7/17/16

दौलत के लिये नया स्वांग रचाते-दीपकबापू वाणी (Daualt ke liye naya Swang rachate-DeepakBapu Wani)

दौलत के लिये नया स्वांग रचाते, बहुरुपिया हैं नाम सेवक नाम बताते।
‘दीपकबापू’ सेवा लेकर दाम चुकाते, सौदागर फिर भी अहसान जताते।।
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चालाक दूल्हों के साथ चमचे बराती, दूर खड़े तमाशा देखते घराती।
‘दीपकबापू’ किराये पर नचाते भांड, प्रसिद्धि पाते यूं ही वफा के घाती।।
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किसान की धरती नहीं हिलती, मेहनत कभी बेकार नहीं मिलती।
‘दीपकबापू’ बसे स्वर्णिम महल में, जहां चिंता की गलती नहीं खिलती।।
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नारों लगाने से आगे अक्ल पर ताले, शब्द गायें पर अर्थ से मुख टाले।
‘दीपकबापू’ प्रचार बाजार में सजे, वह अक्लमंद जिसे विज्ञापन पाले।।
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रात के नशे में बोल जाते हैं, सुबह अपनी बात से झोल खाते हैं।
‘दीपकबापू’ लगा होठों से जाम, कड़वे में मीठा रस घोल जाते हैं।
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जिंदगी में हमसफर भी चलते हैं, बिछड़ने से पहले बहुत मचलते हैं।
‘दीपकबापू’ अंधेरों से लड़ने के आदी, चिराग सदा बेपरवाह जलते हैं।।
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किताब पढ़ भी अकल कहां आती, उपाधि बाज़ार जहां नकल वहां छाती।
‘दीपकबापू’ पहचान में खाते धोखा, योग्यता खरीदने पर भी कहां आती।।
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7/2/16

मानवता के पुजारी-हिन्दी व्यंग्य कविता (Manavata ke Pujari-HindiSatirePoem)

आतंक के व्यापार में
गरीब के साथ अमीर भी
पल रहे हैं।

कातिल बने सौदागर
खरीददारों के घर भी
लाशों के खून से भरे चिराग
जल रहे हैं।

कहें दीपकबापू हिसाब में
कभी गड़बड़ी नहीं होती
मानवता के पुजारी भी
आग पर पानी डालने के बहाने
छल रहे हैं।
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6/17/16

फल नहीं देता-हिन्दी व्यंग्य कविता(Fal nahin deta-HindiSatirePoem)



जिस दिल में
प्रेम बीज बोया नहीं
मान का फल नहीं देता।

भावनाओं का वृक्ष
सूख जाने पर
हमदर्दी का फल नहीं देता।

कहें दीपकबापू रूखेपन से
इंसान सुखा देता संबंध
बेचैनी बढ़ती हृदय की
कीमत लेकर भी बाज़ार में
कोई उम्मीद का फल नहीं देता।
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6/3/16

बेपरवाही-हिन्दी कविता(Beparvahi-Hindi Poem)

कातिल नहीं देखते
किस का दिल टूटेगा
या शरीर रूठेगा।

थामा जिसने हथियार
चलाने पर होता आतुर
अक्ल तय नहीं कर पाती
किसका जीवन रूठेगा।

कहें दीपकबापू जज़्बात से
रिश्ता निभाना भूल गये लोग
धीमी हो गयी सोच
देख नहीं पाते
बेपरवाह चलने से
किसका साथ छूटेगा।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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5/27/16

पाखंड के दौर में-हिन्दी कविता(Pakhand ke Daur mein-Hindi Kavita)

अखबार का ज़माना है
विज्ञापन देकर 
चाहे जितने तमगे लगा लो।

पर्दे पर चलती कहानी में
अपने नाम के आगे
चाहे जितनी उपाधि लगा लो।

कहें दीपकबापू कर्म पर
अब किसका विश्वास रहा
फल में देरी पर
इंतजार नहीं रहा।
पाखंड के दौर में
धोखे की चाहे जितनी
बड़ी दुकान लगा लो।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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5/8/16

हमारी गलती थी-हिंदीशायरी (Hamari Galti Thi-HindiShayari)

उनकी भोली सूरत
सरल चाल देखकर
यकीन कर लिया।

हमारी गलती थी
उन्होंने बदला विश्वास
छीनकर लिया।
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उनका बुलाने का
मन नहीं था
हम भी कहाँ जाने वाले थे|
नज़रे तो उनसे
कई बार मिली थीं
मगर दिलों के जज्बातों पर
रूखेपन के ताले थे|

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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