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03/03/12

चुनाव परिणाम में चमत्कार की आशा-हिन्दी व्यंग ( chunam parinam aur chamtkar-hindi vyanga, result of election and miricle-hindi satire)

मतदाता खुद चमत्कार नहीं करते-हिन्दी व्यंग्य
लेखक दीपक भारतदीप
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                  चुनाव के समय नेताओं के आचरण पर अनेक तरह के कटाक्ष देखने को मिलते हैं मगर आम मतदाता पर कोई कुछ नहीं लिखता। यह मान लिया जाता है कि वह तो चेतन को धारण करने वाला जड़ वस्तु है। जैसा कहा जाएगा वैसा वह बिना हील हुज्जत के करेगा। स्थिति यह है हास्य कवि और व्यंग्यकार चुनावों के मौसम में नेताओं पर अनेक हास्य और व्यंग्य लिखकर और सुनाकर वाहवाही लूटते हैं। ऐसे में हम जैसे लोग धारा से अलग होकर लिखने की फिराक में रहते हैं। फोकटिया हैं इसलिए लिखने का मन नहीं करता। सोचते हैं कि कोई दूसरा लिखे तो हमारी भड़ास स्वयमेव ही ठंडी हो जाएगी। जब ऐसे नहीं होता तो लाचार और मजबूर होकर खुद ही लिखने बैठ जाते हैं। तनाव से मुक्ति का यह मार्ग भी कि आप अपने अंदर चल रही हलचल को बाहर अभिव्यक्त करें। फिर हम जैसे लेखक तो आत्ममुग्ध होते ही हैं जिनको लगता है कि चार लोगों में चर्चा कर क्या अपनी तौहीन कराएं सो कहीं लिखकर चाप दें। चापना इसलिए लिखा क्योंकि हमारे यहाँ छापना केवल दूसरों के अखबारों में ही होता है। बाकी लिखकर अपने यहाँ रख लिया तो उसे चापना ही कह सकते हैं।
         कुछ लोग पूछें कि मतदाताओं पर भला क्या लिखा जा सकता है? वह तो निरीह प्राणी है। हम नहीं मानते कि एक आम मतदाता के रूप में निरीह प्राणी है। कहते हैं कि गीदड़ कि तरह बरसों जीने से अच्छा है कि शेर कि तरह एक दिन जिया जाए। बाकी लोगों के क्या कहें हम स्वयं ही कभी मतदान के दिन शेरदिली का परिचय नहीं दे पाये। हम नहीं दे पाये तो बाकी लोग तो दे ही सकते थे, यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं। हाँ ! इस तरह दूसरों पर दोष देकर अपने आपको बारी कर देने में भी जिंदगी का सुख अनुभव होता है।
           इधर पाँच राज्यों में चुनाव समाप्त हुए तो संभावित परिणामों के विश्लेषण भी आ गए। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसमें हमारी दिलचस्पी नहीं है। कोय नृप हो हमें क्या हानि की तर्ज पर चलकर अनेक लोगों ने सुख पाया हम भी ले रहे हैं। नेताओं पर हास्य व्यंग्य करना हमें आता नहीं है। इधर यह भी लगता है कि एक आम मतदाता के रूप में हम स्वयं भी कम हास्यास्पद काम कम नहीं करते हैं।
             जब टीवी चैनलों पर इन चुनावों के संभावित परिणामों पर विश्लेषण सुने तो लगा कि आम मतदाता के मानस का विश्लेषण इस तरह हो रहा है जैसे वह जड़ हो। वह जाति के आधार पर मत डालेगा। अपने पूरे दिन में आने वाली समस्याओं से दूर होकर अपने धर्म को बचाने के लिए दूसरों के बहकावे पर वोट डालेगा। लब्बोलुवाब यह कि वह देश राज्य और शहर में परिवर्तन के लिए आम मतदाता स्वयं कोई चमत्कार नहीं करेगा। हाँ, एक विद्वान ने जो कहा उसका आशय यही था।
         वह विद्वान सही था या गलत इस पर हम कुछ नहीं कहेंगे, मगर एक एक बात तय है वाकई हमने आम मतदाताओं को कभी ऐसा चमत्कार करते नहीं देखा कि प्रायोजित प्रवाहित धाराओं से अलग कोई अप्रायोजित धारा बही हो। केवल एक दिन शेर की तरह जीने का अवसर मिलता है पर क्या बहुमत में उसका कभी प्रभाव दिखा है। लोग चार पाँच बुरों में एक कम बुरा चुनता है। यहाँ तक कि उसका निर्णय अपने आत्मविवेक से नहीं बल्कि प्रचलित संगठित प्रचार माध्यमों के प्रभाव में करता है। यही कारण है कि कभी ऐसा नहीं सुना गया कि कोई कम प्रचारित असंगठित उम्मीदवार जीतने का चमत्कार कर सका हो। मतलब यह कि जो लोग पाँच बरस तक यह उम्मीद करते हैं कि उनके हित के लिए कोई चमत्कार करे वह एक दिन का अवसर आने पर स्वयं कुछ नहीं करते। बस, संगठित प्रचारित धाराओं में बहते हुए चमत्कार कि सोचता है। कौन समझाये कि आधुनिक लोकतंत्र में चमत्कार बहुमत करता है न कि कोई एक व्यक्ति। भ्रष्टाचार को एक लोकपाल हटा देगा, यह भ्रम अपने यहाँ खूब चल रहा है। यह भ्रम फैलाने वाले भी नेताओं पर बरसते हैं पर मतदाता से चमत्कार को नहीं कहते क्योंकि वह एक आम आदमी है जिसका भीड़ में भेड़ की तरह करना है। अगर वाकई मतदाता चमत्कार करने लगे तो फिर यहाँ किसी भी आंदोलन से कोई महापुरुष नहीं बनेगा। भावावेश में आम इंसान आकर उनके पीछे भी चल पड़ता है। इस आशा के साथ कि शायद कोई चमत्कार हो जाएगा।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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26/02/12

दौलत के हाथ-हिन्दी कविता (daulat ke hath-hindi kavita,hand of maney-hindi poem)

उनके हाथ लंबे हैं,
क्योंकि वह दौलत के खंभे हैं,
लाचार हैं
इशारों से काम चलाते हैं,
झुक कर कुछ नहीं देख सकते
राह चलते हुए कंकड़ों से
टकराने पर भी लड़खड़ाते हैं।
कहें दीपक बापू
ऊंचाईयों पर सांस लेना कठिन है,
पहाड़ पर खौफ में ज़िंदगी
चाहे रात या दिन है,
दौलत और शौहरत की चाहत
जब पूरी होती है,
उसे बचाने में
काया की हिम्मत अधूरी होती है,
जिनके पेट बड़े हो गए बैठ बैठे
रोटी की भूख उनके लिए छोटी है,
दिल हो गए छोटे
मेहनतकशों के लिए उनकी नीयत खोटी है,
कर लेते हैं खुद को वह महलों में बंद
बाहर फैले बेबसी के माहौल देखने से
बस वह यूं ही बच पाते हैं।

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12/02/12

वेलेंटाईन डे (शुभेच्छु दिवस)आशिक और माशुका का मोबाइल प्रेम-हिन्दी हास्य कविता (valeltien day or valentain or velantien day par hasya kavita, comedy poem)

माशुका ने आशिक से कहा
"इस वेलेंटाइन डे पर
मुझे नया मोबाइल लाकर देना,
देखना नए मॉडल का हो
किसी अच्छी दुकान से लेना,
पिछली बार वेलेंटाइन डे पर
जो तुमने यह मोबाइल दिया था,
लगता है फुटपाथ से लिया था,
मेरी चेतावनी अपने ध्यान में रखना,
वरना पड़ेगा मज़ा चखना।"

सुनकर सकपकाया आशिक
फी रूआँसा होकर बोला
"लगता है यह वेलेंटाइन डे
मेरे शुभ को अशुभ करने आया है,
मैं तुम्हारा पहला प्यार हूँ
यह तुमने मेरे प्रेम पत्र के जवाब में बताया है,
हमारी प्रेम की पींगे केवल चार माह पुरानी है,
अभी तो मेरी पहले गिफ्ट तुम्हारे पास आनी है,
यह पिछले साल के आशिक का तोहफा
तुम्हें मेरा कैसे नज़र आया,
उस मासूम को तुमने कैसे भुलाया,
अच्छा हुआ तुमने मुझे बता दिया
अब मुझे तुमसे कोई संबंध नहीं रखना।"
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03/02/12

विकास और धूल-हिन्दी कविताएँ (vikas aur dhool-hindi kavitaen)

सड़क पर पहियों के नीचे
कुचली जाती धूल
आँख और मुंह में घुसकर
अपनी ताकत दिखाती है,
कहें दीपक बापू
ऊंची इमारतों के सामने
कैसे अस्तित्व बचाएं
तेज रोशनी से चमकते बल्बों
को कैसे चिढ़ाएं
यही वह सिखाती है।
--------------
विकास सड़क पर
पहियों की सवारी कर रहा है,
जेब खाली है
आदमी उधार के कागज़ भर रहा है।
कहें दीपक बापू
कर्ज़ लेकर पीने के लिए घी
खरीद भी लें
असली होने का भरोसा नहीं
पेट वैसे भी
                                                            ज़हरीली गैसों से मर रहा है।
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27/01/12

बसंत पंचमी-आंनद तो पूरे महीने लिया जा सकता है-हिन्दी लेख (A hindi article or lekh-basant panchami-anand ka mahina, month of enjoyment)

              कल वेलेंटाइन डे मनाया जाएगा। मूलत: यह त्यौहार पश्चिम से आया है पर हमारे बाज़ार ने नयी पीढ़ी को अपने जाल में फँसाने के लिए अब प्रचार का सहारा इस कदर लिया है कि सारे देश में इसकी चर्चा होती है। इस बार की बसंत पंचमी से सर्दी का प्रकोप घेर कर बैठा है। कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा कि मौसम समशीतोष्ण हुआ हो, अलबत्ता लगता है कि सर्दी थोड़ा कम है पर इतनी नहीं कि उसके प्रति लापरवाही दिखाई जा सके। जरा लापरवाही शरीर को संकट में डाल सकती है। 
                 अगर पर्व की बात करें तो बसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। यह मौसम खाने पीने और घूमने के लिये बहुत उपयुक्त माना जाता है-यानि पूरा माह आनंद के लिये उपयुक्त है। समशीतोष्ण मौसम हमेशा ही मनुष्य को आनंद प्रदान करता है। वैसे हमारे यहां भले ही सारे त्यौहार एक दिन मनते हैं पर उनके साथ जुड़े पूरे महीने का मौसम ही आनंद देने वाला होता है। ऐसा ही मौसम अक्टुबर में दिपावली के समय होता है। बसंत के बाद फाल्गुन मौसम भी मनोरंजन प्रदान करने वाला होता है जिसका होली मुख्य त्यौहार है। दिवाली से लेकर मकर सक्रांति तक आदमी का ठंड के मारे बुरा हाल होता है और ऐसे में कुछ महापुरुषों की जयंती आती हैं तब भक्त लोग कष्ट उठाते हुए भी उनको मनाते हैं क्योंकि उनका अध्यात्मिक महत्व होता है। मगर अपने देश के पारंपरिक पर्व इस बात का प्रमाण हैं कि उनका संबंध यहां के मौसम से होता है।
                प्रसंगवश फरवरी 14 को ही आने वाले ‘वैलंटाईन डे’ भी आजकल अपने देश में नवधनाढ्य लोग मनाते हैं पर दरअसल मौसम के आनंद का आर्थिक दोहन करने के लिये उसका प्रचार बाजार और उसके प्रचार प्रबंधक करते हैं। एक मज़े की बात यह है की भारतीय संस्कृति के समर्थक जहां इस वेलेंटाइन डे को मनाने का विरोध तो करते हैं पर साथ ही इस दिन को मित्र दिवस, मातृ पितृ दिवस या फिर शुभेच्छ दिवस मनाने की बात भी करते हैं। स्पष्टत: हमारे कथित संस्कृति समर्थक पश्चिम के पर्वों का विरोध तो करते हैं पर समाज पर वहाँ की विचारधारा के प्रभाव को समाज से पूरी तरह समाप्त करने का माद्दा नहीं रखते इसलिए अपने लाभ की खातिर उसमें अपने तत्व जोड़ने का प्रयास  करते हैं। इससे उनको प्रचार तो मिलता ही है।    
                  बसंत पंचमी पर अनेक जगह पतंग उड़ाकर आनंद मनाया जाता है हालांकि यह पंरपरा सभी जगह नहीं है पर कुछ हिस्सों में इसका बहुत महत्व है।
             बहुत पहले उत्तर भारत में गर्मियों के दौरान बच्चे पूरी छूट्टियां पतंग उड़ाते हुए मनाते थे पर टीवी के बढ़ते प्रभाव ने उसे खत्म ही कर दिया है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि पहले लोगों के पास स्वतंत्र एकल आवास हुआ करते थे या फिर मकान इस तरह किराये पर मिलते कि जिसमें छत का भाग अवश्य होता था। हमने कभी बसंत पंचमी पर पतंग नहीं उड़ाई पर बचपन में गर्मियों पर पतंग उड़ाना भूले नहीं हैं।
                आज टीवी पर एक धारावाहिक में पंतग का दृश्य देखकर उन पलों की याद आयी। जब हम अकेले ही चरखी पकड़ कर पतंग उड़ाते और दूसरों से पैंच लड़ाते और ढील देते समय चरखी दोनों हाथ से पकड़ते थे। मांजा हमेशा सस्ता लेते थे इसलिये पतंग कट जाती थी। अनेक बाद चरखी पकड़ने वाला कोई न होने के कारण हाथों का संतुलन बिगड़ता तो पतंग फट जाती या कहीं फंस जाती। पतंग और माजा बेचने वालों को उस्ताद कहा जाता था। एक उस्ताद जिससे हम अक्सर पतंग लेते थे उससे एक दिन हमने कहा-‘मांजा अच्छा वाला दो। हमारी पतंग रोज कट जाती है।’
            उसे पता नहीं क्या सूझा। हमसे चवन्नी ले और स्टूल पर चढ़कर चरखी उतारी और उसमें से मांजा निकालकर हमको दिया। वह धागा हमने अपने चरखी के धागे में जोड़ा  । दरअसल मांजे की पूरी चरखी खरीदना सभी के बूते का नहीं होता था। इसलिये बच्चे अपनी चरखी में एक कच्चा सफेद धागा लगाते थे जो कि सस्ता मिलता था और उसमें मांजा जोड़ दिया जाता था।
           बहरहाल हमने उस दिन पतंग उड़ाई और कम से कम दस पैंच यानि पतंग काटी। उस दिन आसपास के बच्चे हमें देखकर कर हैरान थे। अपने से आयु में बड़े प्रतिद्वंदियों की पंतग काटी। ऐसा मांजा फिर हमें नहीं मिला।     यह पतंग उड़ाने की आदत कब चली गयी पता ही नहीं चला। हालांकि हमें याद आ रहा है कि हमारी आदत जाते जाते गर्मियों में इतने बड़े पैमाने पर पतंग उड़ाने की परंपरा भी जाती रही। पहले क्रिकेट फिर टीवी और इंटरनेट ने पतंग उड़ाने की परंपरा को करीब करीब लुप्त ही कर दिया है।
         एक बात हम मानते हैं कि परंपरागत खेलों का अपना महत्व है। पहले हम ताश खेलते थे। अब ताश खेलने वाले नहीं मिलते। शतरंज तो आजकल भी खेलते हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता होने के कारण साथी खिलाड़ी मिल जाते हैं। जितना दिमागी आराम इन खेलों में है वह टीवी वगैरह से नहीं मिलता। हमारे दिमागी तनाव का मुख्य कारण यह है कि हमारा ध्यान एक ही धारा में बहता है और उसको कहीं दूसरी जगह लगाना आवश्यक है-वह भी वहां जहां दिमागी कसरत हो। टीवी में आप केवल आंखों से देखने और कानों से सुनने का काम तो ले रहे हैं पर उसके प्रत्युत्तर में आपकी कोई भूमिका नहीं है। जबकि शतरंज और ताश में ऐसा ही अवसर मिलता है। मनोरंजन से आशय केवल ग्रहण करना नहीं बल्कि अपनी इंद्रियों के साथ अभिव्यक्त होना भी है। अपनी इंद्रियों का सही उपयोग केवल योग साधना के माध्यम से ही किया जा सकता है।  इसके लिये आवश्यक है कि मन में संकल्प स्थापित किया जाये।
        वैसे बसंत पंचमी पर लिखने का मन करता था पर किसी अखबार में छपने या न छपने की संभावनाओं के चलते लिखते नहीं थे पर अब जब इंटरनेट सामने है तो लिखने के लिये मन मचल उठता है। अब सुबह घर में सुबह बिजली नहीं होती। हमारे घर छोड़ने के बाद ही आती है। इधर रात आये तो पहले सोचा कुछ पढ़ लें। एक मित्र के ब्लाग पर बसंत पंचमी के बारे में पढ़ा। सोचा उसे बधाई दें पर तत्काल बिजली चली गयी। फिर एक घंटा बाद लौटी तो अपने पूर्ववत निर्णय पर अमल के लिये उस मित्र के ब्लाग पर गये और बधाई दी। तब तक इतना थक चुके थे कि कुछ लिखने का मन ही नहीं रहा। वैसे इधर सर्दी इतनी है कि बसंत के आने का आभास अभी तो नहीं लग रहा। कुछ समय बाद मौसम में परिवर्तन आयेगा यह भी सच है। बसंत पंचमी का एक दिन है पर महीना तो पूरा है। इस अवसर पर ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई। उनके लिये पूरा वर्ष मंगलमय रहे।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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14/01/12

चंद पल की मुलाकात-हिन्दी शायरियाँ (chand pal ki mulakat-hindi shayriyan kavitaen or poem)

चंद पलों की मुलाकात
ज़िंदगी भर का रिश्ता नहीं बनाती,
इंसानों की नीयत और ख्याल
बदलते देर नहीं लगती,
पल भर में मिलने की खुशी
हक़ीक़तों के सामने आते ही होती काफ़ूर
फिर हमेशा सताती।
कहें दीपक बापू
फिर भी बेजुबानों पर भरोसा किया जा सकता है
जुबान वालों  का क्या
पल भर में उनकी बात बदल  जाती,
किसी की नीयत समझने का दावा करना बेकार है
जो बार बार मतलब देखकर बदल जाती।
-----------------
इश्क में आशिक
आसमान से तारे तोड़ने की
बात कुछ यूं करते हैं,
गोया उसके खरीदने के लिए
ज़मीन पर किस्तें भरते हैं।
कहें दीपक बापू
वादों का क्या
चाहे जब जिससे जितने कर लो,
बस अपना भरोसा किसी के दिल में भर लो,
कहने वालों का क्या
भले बाद में फँसने वाले
वादाखिलाफी पर आहें भरते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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09/01/12

फेसबुक पर वार्तालाप में भाषा का तोतलापन अखरता है-हिन्दी लेख (fecebook par vartalap mein bhasha ka totlapan akharta hai-hindi lkeh)

        फेसबुक पर आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि पुराने लोग भी सक्रिय हैं पर उनमें अधिकतर लेखक नहीं है इसलिये हिन्दी साहित्य की परंपराओं के ज्ञान का उनमें अभाव है। ऐसे में नयी पीढ़ी के लोगों से यह अपेक्षा तो करना कठिन है कि वह उन्हें समझ सकें खासतौर से जब वह स्वरचनाकर्म से अधिक कट पेस्ट यानि किसी का पाठ उठाकर अपने पृष्ठ पर रखने के आदी हों। हमारे प्रचार माध्यमों ने तो नयी पीढ़ी में यह बात स्थापित कर दी है कि ब्लॉग, ट्विटर या फेसबुक पर केवल आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, फिल्म, टीवी तथा कला क्षेत्र के शिखर पुरुष ही लिखते हैं और उनकी ही परवाह करना चाहिए। आम लेखक तो फोकटिया हैं और उनकी कोई बात सम्मानीय या पठनीय नहीं है।
       यही कारण कि फेसबुक तथा ब्लॉग पर जब हमने अपनी रचनायें बिना नाम के देखीं तो वहां प्रतिकूल टिप्पणियां लिखीं। ऐसा लगता है कि बजाय प्रतिकूल टिप्पणियां करने के साथ उनको यह बात समझाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में साभार रचनायें लेने की परंपरा है। उसमें लेखक का नाम अवश्य दिया जाता है। जिन टीवी चैनलों के पास किसी खास समाचार का दृश्यव्य प्रसारण नहीं है वह दूसरे से साभार लेते हैं। हालांकि यह उदाहरण समझाने के लिये पर्याप्त या उचित नहीं है। हिन्दी टीवी चैनल साभार प्रसारण लेते हैं पर वह या तो विदेशी चैनल का या फिर देश का अंग्रेजी चैनल हो। मतलब यह कि हिन्दी वाले की हिन्दी से सोतिया डाह तो रहती ही है। यह बात इंटरनेट पर भी दिखाई देती है जब चोरी के पाठ प्रकाशित होते दिखते हैं।
         बहरहाल फेसबुक पर एक वेबसाईट संचालिका ने हमसे अपने पाठ प्रकाशित करने की अनुमति मांगी तो हमने उसे सहर्ष नाम प्रकाशित करने की शर्त पर दी। उसने ऐसा किया भी! उसकी इस क्रिया पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। दरअसल उसने भ्रष्टाचार पर उस कविता को ही लिया जो कि हमारी इस विषय पर लिखी गयी सबसे हिट कविता है। इसी कविता ने एक नहीं दो ब्लॉग को हिट बना रखा है। हमें यह देखकर हैरानी हो रही है कि केवल ब्लॉग को नियमित या अपडेट बनाये रखने के लिये लिखी गयीं कविताओं ने अधिक पाठक जुटायें हैं बनिस्बत उन बड़े लेखों के जो बड़े मनोयोग से लिखे गये। इसका कारण यह भी है कि नयी पीढ़ी के युवा ज्यादा समय खराब करने के थोड़े समय में अधिक पढ़ना चाहता है। वह कहानी भी कविता में पढ़ना चाहता है। अगर विषय गंभीर हो तो एक लघु कथा लिखने से काम चल सकता है पर हास्य हो तो कविता ही ठीक जमती है।
          हमें इंटरनेट पर सक्रियता से जहां खुशी मिली वहीं इस बात का दुःख भी होने लगा है कि नयी पीढ़ी भाषा के लिहाज से तोतली हो रही है। रोमन लिपि में अंग्रेजी और हिन्दी का मिश्रण प्रसन्नता नहीं दे सकता। हैरानी की बात है कि हिन्दी टूलों की उपलब्धता के चलते यह हो रहा है। खासतौर से जब यह जीमेल पर ही उपलब्ध हो और प्रयोक्ता उसके उपयोग में असमर्थ हों। लड़के लड़कियां अगर यह सोच रहे हैं कि वह अभिव्यक्त होकर कोई बड़ा नाम करेंगे तो वह गलतफहमी में हैं। फेसबुक पर लिखने के बाद प्रतिक्रियायें मिल जाती हैं पर कालांतर में वह भी बोरियत लगने लगेगी। फेसबुक पर तो यह आशा करना ही बेकार है कि कोई अपने अभिव्यक्त होने की लंबी पारी खेल सकता है। इससे अच्छा तो यह है कि ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर ब्लॉग लिखकर प्रयास करना श्रेयस्कर है। फेसबुक में केवल अपने समूहों से जुड़े हुए लोग ही साथी होते हैं जबकि ब्लॉग एक सार्वजनिक पत्रिका की तरह उपयोग में लाये जा सकते हैं। जिन युवक युवतियों में मन में हिन्दी लिखने का आनंद प्राप्त करने की इच्छा है वह फेसबुक के साथ ही ब्लॉग जरूर बनायें। कुछ समय तक उनको टिप्पणियां मिलेंगी पर बाद में बंद हो जायेंगी मगर सर्च इंजिनों में वह हमेशा जीवंत बना रहेगा। ऐसे में अगर केवल अपने अंदर बैठे लेखक को जिंदा रखने के लिये एकांत यात्रा करनी होगी। हालांकि ब्लॉग पर फेसबुक की तरह लिखना अधिक परिणामदायक नहीं रहेगा ऐसे में हिन्दी टूलों के साथ प्रभावी हिन्दी का भी ज्ञान रखना होगा। वह केवल पुराने लेखकों की रचनाओं से मिल सकता है। नये लेखकों ने तो अंग्रेजी का मिश्रण करना प्रारंभ कर दिया है।      
              फेसबुक पर पिछले एक दो महीने से हम अधिक सक्रिय रहे हैं। वहां अपने ब्लॉग के लिंक देखने अक्सर जाना होता है। अनेक महानुभावों ने संपर्क किया है। उनसे चैट में भाषा का तोतलापन अखरता है। हम आपसी संवाद पर अपने साथियों पर कोई आक्षेप नहीं कर रहे पर इतना तय है कि यह रोमन लिपि में लिखना या पढ़ना हमको तोतलापन लगता है। चूंकि लेखक हमेशा भावुक होता है इसलिये हमारे लिये वार्तालाप के समय टिप्पणियां करना ठीक नहीं लगता। यह सही है कि ऐसे संवाद के समय शीघ्रता होती है इसलिये कही दूसरी जगह से कट पेस्ट करने में देरी करना अच्छा नहीं लगता है पर अभ्यास हो जाये तो कुछ भी असहज नहीं है। हिन्दी तो फिर भी सरलता से लिखी जाती है पर चीनी लिखने में कठिन है मगर फिर भी चीन के नागरिक उसमें लिखते हुए संकोच नहीं करते। हमारा उद्देश्य आक्षेप करना नहीं बल्कि नयी पीढ़ी के लोगों को यह समझाना है कि भाषा की कमी उनकी अभिव्यक्ति को कमजोर बनाने के साथ विचार को क्षणिक आवेग के रूप में प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात आत्मीयता का वैसा संबंध वह कभी नहीं बना सकती जैसे कि हमारे अपने साथ ब्लॉग लेखकों के साथ प्रभावी हिन्दी के कारण बने।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
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02/01/12

फोकट में ईमानदारी-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (fokat mein imandari-a short hindi comedy satire or short story,hindi kahani)

                विद्यालय के संचालक ने प्राचार्य को बुलाकर कहा कि-‘‘देखो मैंने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया है। तुम अपने साथ शिक्षकों को मेरे साथ रैली में भाग लेने के लिये तैयार रहने के लिये कहो। विद्यालय के छात्रों के लिये देश में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के संबंध में विशेष ज्ञान देने का प्रबंध करो। मैं चाहता हूं कि मेरे साथ मेरे विद्यालय का नाम भी प्रचार के शीर्ष पर पहुंचे।’’
           प्राचार्य ने कहा-‘‘महाशय, आपका आदेश सिर अंाखों पर! मगर इसी अंादोलन की वजह से हमारे विद्यालय के शिक्षक अब जागरुक हो गये हैं। आप जितने वेतन की रसीद पर हस्ताक्षर करते हो उसका चौथाई ही केवल भुगतान करते हैं। वह चाहते हैं कि कम से कम आधी रकम तो दें। विद्यार्थियों के पालक भी तयशुदा फीस से अलग चंदा या दान देकर नाराज होते हैं। ऐसे में आप स्वयं भले ही इस आंदोलन में सक्रियता दिखायें पर विद्यालय की सक्रियता पर विचार न करें, संभव है यह बातें आपके विरुद्ध प्रचार का कारण बने।’’
संचालक ने कहा-‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, यह भ्रष्टाचार है! कतई नहीं, यह तो मेरा निजी प्रबंधन है। हम तो केवल सरकारी भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं!’’
            प्राचार्य ने कहा-‘हमारे पास कुछ मदों मे सरकारी पैसा भी आता है।’’
संचालक ने कहा-‘‘वह मेरा निजी प्रभाव है। ऐसा लगता है कि तुम देश का भ्रष्टाचार रोकने की बजाय उसकी आड़ में तुम मेरे साथ दाव खेलना चाहते हो! तुम मेरा आदेश मानो अन्यथा अपनी नौकरी खोने के लिये तैयार हो जाओ।’’
             आखिर प्राचार्य ने कहा-‘‘आपका आदेश मानने पर मुझे क्या एतराज हो सकता है? पर संभव है कि छात्रों के पालक अपने बच्चों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध तिरस्कार का भाव देखकर नाराज हो जायें। आप तो जानते हैं कि अधिकतर माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर बड़े पद पर पहुंचे। बड़ा पद भी वह जो मलाईदार हो। ऐसे में अगर उसकी निष्ठा कहीं ईमानदारी से हो गयी तो संभव है वह अधिक पैसा न कमा पाये। भला कौन माता पिता चाहेगा कि उसका बेटा मलाई वाली जगह पर बैठकर माल न कमाये। सभी चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार खत्म हो पर उनके घर में ईमानदार पैदा हो यह कोई नहंीं चाहता। कहंी ऐसा न हो कि हमारे इस प्रयास पर पालक नाराज न होकर अपने बच्चों को दूसरे स्कूल पर भेजना शुरु करें और आपकी प्रसिद्धि ही विद्यालय की बदनामी बन जाये।’’
             संचालक कुछ देर खामोश रहा और फिर बोला-‘‘तुम क्या चाहते हो मैं भी वहां न जाऊं?’
प्राचार्य ने कहा-‘‘आप जाईये, पर अपने स्कूल का परिचय न दें। आप सारे देश में ईमानदारी लाने की बात अवश्य करें पर उसे अपने विद्यालय से दूर रखें।’’
           संचालक खुश हो गया। प्राचार्य बाहर आया तो एक अन्य शिक्षक जिसने दूसरे कमरे में यह वार्तालाप सुना था उससे कहा-‘‘आपने मना किया तो अच्छा लगा। बेकार में हमारे हिस्से एक ऐसा काम आ जाता जिसमें हमें कुछ नहीं मिलता। यह संचालक वैसे ही छात्रों से फीस जमकर वसूल करता है पर हम शिक्षकों को देने के नाम पर इसकी हवा निकल जाती है। वैसे आपके दिमाग में ऐसा बोलने का विचार कैसे आया?’’
         प्राचार्य ने कहा-‘‘अपनी जरूरतें जब पूरी न हों तो ईमानदारी की बात करना भी जहर जैसा लगता है। वैसे फोकट में भ्रष्टाचार का विरोध करना मैं भी ठीक नहीं समझता। खासतौर से जब इस आंदोलन को चलाने वाले घोषित रूप से चंदा लेने वाले हों। हमें अगर कोई पैसा दे तो एक बार क्या अनेक बार ऐसे आंदोलन में जाते। फोकट में टांगें तोड़ना या भाषण देना तो तब और भी मुश्किल हो जब हमें यही अपनी मेहनत का पैसा कम मिलता है।’’
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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