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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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7/5/18

भ्रष्टाचार से लड़े आंखों में छाले हो गये-दीपकबापूवाणी (Bhrashtachar se lade-DeepakBapuWani

सूरज का तेज चंद्रमा की शीतलता जाने नहीं, भक्ति नाटकीय करें भाव माने नहीं।
‘दीपकबापू’ ढूंढते दिल की तसल्ली बरसों तक, पथरीली सोच में रखने के खाने नहीं।।
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कालाधन ढूंढते उनके चेहरे काले हो गये, भ्रष्टाचार से लड़े आंखों में छाले हो गये।
‘दीपकबापू’ दहाड़ते थे भीड़ में शेर जैसे, महल बने पिंजरे पहरेदार स्वर्ण ताले हो गये।।
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चला रहे हैं लिपिक चपरासी राजकाज, राजा बेकार कर रहा अपने नाम पर नाज़
‘दीपकबापू’ भगवान भरोसे जीते हैं सदा, प्रजा कोष लूट लेते सेवक हो जाते बाज़।।
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बिगाड़ दिया देह मन विचार का यंत्र, जाप रहे बैठे अब गुरुओं और किताबें के मंत्र।
‘दीपकबापू’ अपनी नाव जल में चलायी नहीं, बता रहे शिष्यों को जलधारा का तंत्र।।
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नयी रीति चली गूंगों के बहरे बनते सरदार, मधुर वाचकों से तोतले ज्यादा हैं असरदार।
‘दीपकबापू’ नाकाबलियत छिपाते चालाकी से, वफा के पाखंड में माहिर हो गये गद्दार।।
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क्या सवाल करें जो कभी जवाब देते नहीं, हमदर्द बने दर्द की दवा साथ लेते नहीं।
‘दीपकबापू’ हंसते हुए पूरी जिंदगी गुजारते, नेकी दरिया में डाल चिंता लेते नहीं।
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2/4/18

पुते चेहरे चंद शब्द कह पाते, पराये भाव से ही दर्द सह पाते-दीपकबापूवाणी (pute chehre Chand shabd kah pate-DeepakBapuwani)

लोकतंत्र में प्रचार मंत्र चलता है,
अंधेरे में रौशनी का वादा जलता है।
‘दीपकबापू’ आंख कान मुंह बंद रखें
क्रांति का नारा विज्ञापन में पलता है।
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सत्ता के गलियारों में
बेबस का कोई हमदर्द नहीं होता।
गर्दन कटे आम इंसानों की
तख्तनशीनों को इसका दर्द नहीं होता।
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आतंक के सहारे रक्षानीति पली है,
 कत्ल से पहरेदारों की रोटी चली है।
‘दीपकबापू’ भय का व्यापार खूब चलाते
बहस में विज्ञापन की रौशनी जली है।
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पुते चेहरे चंद शब्द कह पाते,
पराये भाव से ही दर्द सह पाते।
‘दीपकबापू’ रुपहले पर्दे के ख्वाब
सच्चाई के दरिया में ही बह जाते।
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नारों पर दिमाग न लगाना
वादों में दिल न फसाना।
कहें दीपकबापू इश्तिहार पढ़कर
सच्चाई से अक्ल न लड़ाना।
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न उनकी हार न जीत है,
दलालों की धंधे से प्रीत है।
कहें दीपकबापू पशु जैसी प्रजा माने
हर दरबार की यही रीत है।
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चीख कर धर्म चेतना जगाते,
रक्षा के नाम दानपात्र लगाते।
‘दीपकबापू’ कमान में तलवार रखे
बंद कमरे में जंग के नारे लगाते।
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जिस पर भरोसा करें तोड़ देता है,
हमारा हिस्सा अपने में जोड़ देता है।
‘दीपकबापू’ नया नारा और वादा
नये धोखे की ओर मोड़ देता है।
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10/21/17

दिल का मजा क्या जो पांव थका देता है-दीपकबापूवाणी (Dil ka maza paanv ko dhaka deta hai-DeepaBapuWani)

ऊंचे पद चाहें किताबें कभी नहीं पढ़े, चाटुकारिता से तख्त की सीढ़ी चढ़े।
‘दीपकबापू’ देखें नहीं काबलियत का सबूत, तारीफ उनकी जो धोखे से बढ़े।।
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चंदन तिलक लगाने से भक्ति न मिले, बड़े बोले से कभी शक्ति न मिले।
‘दीपकबापू’ धर्म की पोथी सिर पर रखे, भटका मन कभी आसक्ति न हिले।।
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तन का विकार दिखे मन समझे न कोई, बोला शब्द सुने सोच जाने न कोई।
‘दीपकबापू’ दोहरेपन जीने की आदत हो गयी, अपना ही सच माने न कोई।।
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दिल का मजा क्या जो पांव थका देता है, वह जोश क्या जो अक्ल पका देता है।
‘दीपकबापू’ बेचैनी लिये भागते इधर उधर, वह चैन क्या मिले जो दर्द बका देता है।।
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नदियों का जल समेटता समंदर गहरा है, सुंदर वन समेटे पहाड़ घाटियों का पहरा है।
‘दीपकबापू’ आकाश समेटे सूरज चंद्रमा तारे, तारीफ से उसे कैसे खुश करें वह तो बहरा है।।
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