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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

10/19/08

कहीं यह आर्थिक मंदी कृत्रिम तो नहीं-आलेख

कहने को किसी भी देश के शेयर बाजारों के सूचकांक को उसकी आर्थिक ताकत का परिचायक माना जाता है पर कई लोग इसका समर्थन नहीं करते क्योंकि आम आदमी के जीवन यापन के लिये जो वस्तुऐं कृषि के माध्यम से प्राप्त होती हैं उसका इससे अधिक संबंध नहीं होता।
अन्य देशों की बात छोड़ कर अगर भारत की बात की जाये तो आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था को कृषि उन्मुख माना जाता है। भले ही प्रचार माध्यम शेयर बाजारों के उतरा चढ़ाव पर लंबी चौड़ी बहसें कर रहे हों पर यह सच सभी जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का इससे अधिक लेना देना नहीं हैं। उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी से से कई लोगों को रोजगार मिला है पर फिर भी देश में भारी बेरोजगारी है और उसके बावजूद यह देश अपनी कृषि के सहारे चल रहा है।
भारत के शेयर बाज़ार में मंदी या कई लोगों के चैन को छीन लिया है और जिन छोटे लोगों ने अपनी बड़ी बचतों (यह अलग बात है कि बड़े लोगों के हिसाब से वह भी छोटी होती है) को इनमें अधिक लाभ से लगा दिया था वह भी अब त्रस्त हैं। हालत यही है कि कई ऐसे लोग भी अपने व्यथा कथा कह रहे हैं जिन्होंने अपना विनिवेश चुपचाप कर उसके कागज़ एक तरफ रख दिए थे क्योंकि यह उनके लिए एक तरफ रखे गए पैसे की तरह था जिसका उपयोग कम से कम तात्कालिक रूप से करने वाले नहीं थे।

कई व्यवसायी पुरुषों तथा कामकाजी महिलाओं ने अपने परिवार को जानकारी देने की आवश्यकता अनुभव किये बिना इन म्यूचल फंडों में विनिवेश किया था। पिछले कुछ समय से लोगों का रुझान म्यूचल फंडों में अपनी बचत लगाने की तरफ बढ़ रहा था। कारण था इसमें कुछ कपनियों के भुगतान के तत्काल बाद ही लाभांश के रूप में एक निश्चित रकम की प्राप्ति। म्यूचल फंडों के बेचने वाले एजेंट पुराने साल के लाभांश को नए आवेदनों पर दिलवाने के नाम पर लोगों को इस तरफ खींचते रहे। सच तो यह है कि विनिवेशकों को १५ से २५ प्रतिशत तक की राशि लगाने के तत्काल बाद प्राप्त भी हुई।

इन म्यूचल फंडों में उन लोगों ने भी पैसा लगाया जो शेयर बाजार पर भरोसा नहीं करते थे। फिर इसमें कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के म्यूचल फंडों की उपस्थिति ने भी अन्य कंपनियों के म्यूचल फंडों के प्रति लोगों में विशवास कायम किया। कुल मिलाकर म्यूचल फंडों को इतना आकर्षक बनाया गया जिससे इसके साथ नए विनिवेशक भी जुड़े जो पहला शेयर बाजार से दूर थे। वैसे तो इन म्यूचल फंडों में पैसा उन्ही लोगों ने ही लगाया है जिनके पास बचत की राशि अतिरिक्त रूप में थी और अब बाजार के गिरने से उनको कोई अधिक फर्क नहीं पडा क्योंकि उनकी अपनी नियमित आय यथावत है पर वह अपने म्यूचल फंडों से वह जिस प्रकार के अतिरिक्त लाभ की आशा कर रहे थे वह प्राप्त नहीं हुआ। ऐसे विनिवेशक अधिकतर नौकरी पेशा हैं और अतिरिक्त लाभ की आशा पूर्ण न होने से निराश जरूर हैं पर मानसिक रूप से हताश बिलकुल नहीं हैं क्योंकि उनके नियमित खर्चों के भुगतान में उनको कोई परेशानी नहीं है। हाँ जिन लोगों ने इस चक्कर में अपनी नौकरी छोडी या सेवानिवृत्ति के बाद वहां से पैसा धन इन म्यूचल फंडों में लगाया उनके लिए हालत बहुत दु:खदायी हैं।

इसके अलावा जिन लोगों ने अपने छोटे व्यवसाय बंद कर नियमित रूप से इसमें अधिक धन पाने की आशा लगाई उनके लिए यह समय संकट का है। जिन लोगों ने रातों रात अमीर होने की आशा में अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया उनके लिए तो हालत बदतर हैं-क्योंकि न तो अब कहीं से कोई उनको लाभांश प्राप्त हो रहा है और न उनके म्यूचल फंडों की पूँजी उतनी है जितनी उन्होंने लगाई थी। जो लाभांश उनको पहले प्राप्त हुआ था उन्होंने अपने रहन सहन का स्तर बढाने में उसे लगा दिया।
अब इस मंदी के बारे में विचार करें तो यह एक कृत्रिम मंदी लगती है क्योंकि आखिर इस देश को औद्योगिक सम्राज्य चंद लोगों के हाथ में ही है और वह सभी मिलकर किसी खास रणनीति के तहत बाजार को अपने हिसाब से चलाने का मादा रखते हैं। जिन लोगों ने अपना अतिरिक्त धन म्यूचल फंडों में लगाया है वह चिंतित अवश्य हैं पर इसके बावजूद वह उनको औने पौने दाम पर बेचने के लिये तैयार नहीं। वह जानते हैं कि आगे पीछे फिर इनके दाम बढ़ने हैं। अगर उनकी पूरी रकम डूब जाती है तो वह इसके लिये तैयार दिखते हैं पर ऐसा नहीं होगा क्योंकि उसके बाद देश के उद्योगपति छोटे निवेशकों का विश्वास हमेशा के लिये खो बैठेंगे और जिनकी इस बाजार में दिलचस्पी हो उन्हें यह समझना चाहिये कि भारत की बैंकों का मुख्य आधार उसके छोटे बचत कर्ता ही रहे हैं-भले ही देश के अर्थशास्त्री उसकी परवाह करते हुए नहीं दिखते।

यह छोटे निवेशक आज के औद्योगिक स्वरूप का आधार हैं। वह अगर लाभांश लेते हैं तो फिर उससे इन्हीं कंपनियों का सामान भी खरीदते हैं। अगर देश के उद्योगपति इस तरह के खेल में अगर उनकी रकम डुबा बैठे तो भविष्य में संकट उनके लिये ही गहराने वाला है-शारीरिक और बौद्धिक श्रम कर कमाने वाला निवेशक तो फिर भी दोबारा कमा लेगा।
अमेरिका की मंदी का भारत में प्रभाव सच कम अफसाना अधिक लगता है। आखिर भारत की कृषि और उद्योग का अपना एक आधार है। उसके निवेशकों पर यहां के जो उद्योग निर्भर हैं उनका तो उबरना कठिन हो सकता है पर जिनके आधार भारत के छोटे निवेशकों पर टिका है वह फिर उबर आयेंगे।

अभी अनेक कंपनियों ने अपने लाभांश की घोषणा नहीं की है। उनके अगर आगे निवेश चाहिये तो लाभांश घोषित तो कभी न कभी करना ही होगा और तब बाजार उठेगा। इतिहास में एक बार बाजार जबरदस्त ऊपर उठा था तब किसी के समझ में नहीं आया था पर पोल बाद में खुली थी। उस समय भी कई निवेशक दिवालिया हो गये थे। आज की मंदी भी कम रहस्यमय नहीं है। भारतीय बाजारों मे सामान की खरीद फरोख्त निरंतर हो रही है। किसी कंपनी ने अपने उत्पाद या सेवा का मूल्य कम नहीं किया तब आखिर यह किस तरह मंदी को एक सच्चाई स्वीकारकिया जाये। बाजार में आम उपभोग की वस्तुओं का मूल्य सूचकांक निंरतर बढ़ रहा है तब शेयक बाजार के सूचकांक का गिरना किसी को भी रहस्यमय लग सकता है। इसमें वह बड़े निवेशक अपना फायदा ले सकते हैं जो बेचने के लिये मजबूर निवेशक से उसका निवेश खरीद लेंगे। कोई बाज़ार विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से तो नहीं कह रहा है कि यह मंदी कृत्रिम भी हो सकती है-क्योंकि उनको आगे भी अपने कार्यक्रम जारी रखने हैं-पर उनकी बातों से एसा सन्देश मिल ही जाता है. वैसे यह बात तो हर विशेषज्ञ मान रहा है कि अमेरिका की मंदी से इसकों जोड़ना ठीक नहीं है.
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

1 comment:

Suresh Chiplunkar said...

सही कह रहे हैं आप, शेयर मार्केट एक गोल झूले की तरह होता है, जब ऊपर जाता है तो मजा आता है, और नीचे आता है तो भय होता है, समझदार वही होता है जो ऊपर में उतर जाये फ़िर नीचे से चढ़े तो मजा ही मजा :) लेकिन यह साधने के लिये गहन अध्ययन की आवश्यकता है, जो आम निवेशक नहीं करता और फ़िर पछताता रहता है… सट्टा खेलना बुरी बात तब होती है, जब वह पैसा उधार लेकर खेला जाये…

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