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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

11/20/10

बिग बॉस मिथकों के सृजन की एक क्रिया-व्यंग्य चिंत्तन (bigg boss:mithakon ke srijan ki ek mithak ek kriya-vyangya chittan)

श्रीमद्भागवत गीता में एक दो वाक्य समझ में नहीं आता था। अब समझ में आने लगा है। वह क्या है, यह लिखें कि नहीं तय नहीं कर पाये। बहरहाल अब समाज में अच्छे, बुरे, सभ्य, असभ्य तथा विख्यात तथा कुख्यात का अंतर मिट गया है या मिटा दिया गया है यह कहना चाहिए। एक आम आदमी के रूप में जब कोई बदलाव करने की शक्ति का अपने अंदर अभाव महसूस हो तो फिर ‘सब चलता है’ कि तर्ज पर मौन रहना ठीक है। अब हालत यह है कि गुस्सा नहीं  आता। हर बात पर व्यंग्य ही छूटता है। समाज के शिखर पुरुष तो अब जैसे समर्पण की मुद्रा में है और आम आदमी हमेशा की तरह बेबस है। बीच में खड़े पात्रों ने सारी दुनियां की सामाजिक, अर्थिक, राजनीतिक, कल, साहित्य तथा धार्मिक क्षेत्रों में सक्रिय संस्थाओं को अपने हाथ में ले लिया है। कार्ल मार्क्स ने जिस पूंजीवाद की कल्पना की होगी उससे ज्यादा खूंखार वह है। इससे लड़ने के लिये जो उन्होंने पूंजी किताब लिखी उसके ध्वज वाहक होने का दिखावा करने वाले ही उसी पूंजीवाद के सरंक्षक हो गये हैं।
बात लंबी नहीं खीचेंगे क्योंकि आज के समय संक्षिप्तीकरण आवश्यक है। किसी को प्यार की भाषा बोलनी है तो वह बेमतलब है क्योंकि न वह अब आकर्षित करती है न सनसनी फैलाती है पर उससे ज्यादा वह लंबा वाक्य बोलने पड़ते हैं। इसलिये गालियां देकर भी प्रेम किया जा रहा है क्योंकि वह संक्षिप्त होने के साथ ही सनसनी फैलाने वाली होती हैं। लोगों के सामने या पर्दे पर लड़ो और बाहर आकर गले में बाहें डालकर बीयर या वाइन पियो। इधर हम बिग बॉस देखने लगे थे कि आखिर माज़रा क्या है? ऐसा क्या है कि प्रचार माध्यमों को उसकी जरूरत पड़ गयी है।
दरअसल बिग बॉस कोई कार्यक्रम नहीं बल्कि प्रचार माध्यमों को साक्षात्कार दिलाने तथा विज्ञापन जगत को नये चेहरे दिलवाने वाला एक फोरम भर है। चेहरे भी कौनसे? जो पहले अपने अपराधिक कृत्य अथवा मूर्खतापूर्ण गतिविधियों संलिप्पता के कारण बदनाम हुए हों। उन पर फैशियल पोतकर उनको फिर लोगों के सामने पेश करने का काम कर रहा है बिग बॉस!
पिछले चार पांच दिन से टीवी के समाचार चैनलों में जो साक्षात्कार आ रहे हैं वह बिग बॉस से निकले लोग हैं। पहले तो बिग बॉस के कार्यक्रम के समय पर सरकारी नियंत्रण पर विवाद हुआ तो तीन चेहरे ऐसे आये जो बिग बॉस से निकले थे। तीन दिन तक वही चेहरे हर टीवी चैनल पर दिखाई दिये। फिर एक टीवी चैनलों का स्टार समाचार चैनल लाया एक स्वर्गीय नेता के बेटे को साक्षात्कार के लिये। इसी समाचार चैनल की तीन महिला पत्रकारों ने एक सप्ताह पहले ही बाबा रामदेव का साक्षात्कार लिया था। उसके बाद  उसी मीडिया  के बेटे को लाया गया। आज तक समझ में नहीं आया कि स्वर्गीय नेता के उस बेटे की खासियत क्या है?। उसे मीडिया के बेटे क्यों कहा? दरअसल टीवी के ही एक चैनल पर इंसाफ धारावहिक की संचालिका के स्वयंवर कार्यक्रम की पटकथा का सृजन करने का दावा करने वाले एक लेखक को धमकाते हुए समर्थकों ने उस संचालिका के लिये मीडिया की बेटी शब्द का ही उपयोग किया गया था। सो अब हम यह मान कर चल रहे हैं कि पर्दे के पीछे शायद इन लोगों के लिये ऐसे ही संबोधन होते होंगे।
हैरानी इस बात की रही कि बिग बॉस से एक सुपात्र तथा एक सुपात्रनी के
वहां से निकाले जाने की बात टूट रही खबर के रूप में दिखाई जाने लगी। यह दोनों ही विवादास्पद थे-केवल टीवी चैनलों के प्रसारणों में यह बात समझें आम जनता तो इनको जानती ही नहीं। उससे पहले एक विवाहिता जोड़े ने जब बिग बॉस में दोबारा शादी पहली कहकर अपना स्वांग रचा तो उस पर विवाद हुआ या कहें कि प्रचार के लिये करवाया गया। अगले दिन दूल्हा बाहर! टूट रही खबर दिखी। फिर दूल्हा साक्षात्कार देने के लिये उपलब्ध हो गया। दोनों को समाज से बाहर निकालने की घोषणा करने वाला एक धार्मिक ठेकेदार भी चर्चा में दिखा! फिर यह दो अन्य निष्कासित हुए! अब आ गये दोनों समाचार चैनलों में अपना पक्ष रखने के लिये। दूसरे शब्दों में कहें कि समाचार चैनलों में विज्ञापनों के बीच सामग्री बनवाने में सहायता करने के लिये तीनों को प्रसिद्धि का फैशियल लगाने के साथ तैयार कर भेजा गया।
सैलिब्रिटी आखिर क्या है? हिन्दी में पूछे आजकल हस्ती किसे कहा जाता है? अब तो हालत यह है कि लोग बदनाम होने के लिये घूम रहे हैं। अगर यही हालत रही तो आगे हम अपराधियों के यह बयान सुनेंगे कि हमें किसी टीवी चैनल में कोई कार्यक्रम मिले इसलिये ही यह सारा काम किया ताकि हमें सुधारने के अवसर देकर किसी निर्माता को प्रसिद्धि मिले तो हमें पैसा भी जोरदर मिलेगा।
बाज़ार और प्रचार के स्वच्छ बुतनुमा चेहरों के पीछे जो इंसान हैं उनको केवल पैसा चाहिए-कहीं समाज पर नियंत्रण करने जरूरी हो तो यह काम भी वही लोग कर रहे हैं। अब नंबर एक और दो का धंधा कोई मतलब नहीं रखता। यह लोग प्रचार माध्यमों पर भी कहीं  न कहीं अप्रत्यक्ष रूप से अपना नियंत्रण रखते हैं ताकि विज्ञापन की कमाई कहीं अन्यत्र न चली जाये। इधर अपनी कंपनी का विज्ञापन का पैसा देकर प्रचार माध्यम चलाओ उधर लाभांश के रूप में वापस पाओ। एक नंबर वाले अपना सामान बेचते हैं पर दो नंबर वाले विज्ञापनों के लिये चेहरे तलाशते हैं। सभी को मालुम है कि प्रचार के लिये बनने वाली सामग्री के केंद्रों में भी कहीं न कहीं यही दो नंबर वाले होते हैं। सीधी बात कहें तो मैदान पर एक खेल हो रहा है जिसमें खास लोग मैदान में हैं और आम आदमी बाहर बिना टिकट बैठा है जो यह सोचकर खुश हो लेता है चलो अंदर नहीं गये तो क्या बाहर तो अपना अस्तित्व है। दुनियां के आर्थिक, सामजिक, राजनीतिक, कला, तथा धर्म के शिखर पर विराजमान बुत, एक और दो नंबर के धंधे वाले धनपति, समाज की दृष्टि से बुरे धंधे वाले वाले माफिया-पैसा है तो वह भी सम्मानीय होते हैं-और उनके प्रचारक या अनुचरों के घेरे में एक खेल इस मैदान पर हो रहा है।
शायद यह सदियों से चल रहा है बिग बॉस नाम का खेल! ऐसे में आम इंसान मैदान में क्या बाहर ही बैठे देख रहे हैं? मैदान पर देखने वाले भी किराये के हैं या उनकी रक्षा करने वाले पहरेदार! फिल्मों के अभिनेता और अभिनेत्रियां अपने परिवार के सदस्यों को अभिनय में ला रहे हैं। निर्देशक अपने बच्चों को निर्देशक बना रहे हैं। वहां से कोई नया चेहरा नहीं मिल रहा क्योंकि पचास के ऊपर के आदमी को भी नायक की तरह निर्माता निर्देशक भुना रहे हैं। फिर युवा चाहिए तो भला काम करने से छोटी आयु में प्रसिद्धि नहीं मिल सकती इसलिये युवाओं को बदनाम होकर नायक की तरह प्रतिष्ठित करने की कला का नाम है बिग बॉस।
हमने बहुत माथा पच्ची की पर बिग बॉस में कुछ दिखाई नहीं दिया। बहुत देर तक सोचते रहे कि आखिर ऐसा क्या है कि लोग इसे देख रहे हैं? थक गये तो अचानक आंखें बंद होने लगी। वैचारिक क्रियाओं ने स्वतः योग किया और बताया कि टी. आर. पी. नाम का एक भ्रम है। भले ही इन कार्यक्रमों और चैनलों को लोकप्रियता के आधार पर नंबर मिलते हों पर सभी फ्लाप हैं। देश में एक सौ दस करोड़ लोग हैं पर टीवी पर यह कार्यक्रम देखने वाले कितने हैं पता नहीं! मगर भ्रम बेचना है और इसमें आपाधापी में व्यवसायिक सृजनकर्ता अनेक मिथक गढ़ने लगे हैं। दरअसल समाज की इच्छा शक्ति को पूरी तरह मारने में नाकाम रहे यह लोग राम और कृष्ण को भी मिथक कहते हुए अपने पर्दे के नायकों को वर्ष का नायक नायिका, दशक की महानायक महानायिका और सदी का महानतम नायक नायिका गढ़कर अपने मिथकों को सत्य साबित करने का प्रयास करते हैं। यह एक नाकाम कोशिश है, जो केवल पर्दे पर दिखती है? आम आदमी का समाज निराश है, और इनसे उसका कोई मतलब नहीं है। बिग बॉस ऐसे ही मिथकों के सृजन की एक क्रिया है कोई कार्यक्रम नहीं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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