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9/17/13

जिंदगी सस्ती जीना महंगा-हिन्दी व्यंग्य कविता (zinagi sasti zeena mahanga-hindi vyangya kavita)




जरूरत की चीजें महंगी हो गयी
जिंदगी सस्ती होती जा रही है,
तरक्की का पैमाना है महंगाई
क्या उन्होंने खूब कहीं है,
बैठकर वातानुकूलित कक्षों में
आम इंसानों की रोज की जिंदगी का हिसाब
लिख रहे हैं वह लोग
जिन्होंने कभी तकलीफ नहीं सही है।
कहें दीपक बापू
पढ़ते हैं रोज अखबार,
बेगाना लगता है अपना ही घरबार,
कोई बना रहा है योजना
कोई बेच रहा है सपना
कोई वादे बांट रहा है,
आम इंसानों को बहलाने के
नये नये तरीके छांट रहा है,
हम भी मानते हैं
रोटी का भूख से
पानी का प्यास से
गरीब का दौलत की आस से
कोई रिश्ता नहंी है,
सच यह भी है कि इनके बिना
आदमी जिंदगी की चक्की में पिसता यहीं है,
मुश्किल यह है कि
जीना हो रहा है महंगा
जिंदगी सस्ती हो रही है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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9/10/13

आओ, हिन्दी दिवस मनायें-हिन्दी दिवस पर विशेष हास्य व्यंग्य(aao hindi diwas manayen-hindi divas par vishesh hasya vyangya rachna)



        दीपक बापू ने जब सुबह देखा कि आज 14 सितंबर हिन्दी दिवस है तब एक नये सफेद कपड़े-धोती, कुर्ता और टोपी-पहनकर घर से बाहर निकले। जेब में एक लघु साहित्यक पत्रिका  में अपनी रचनायें प्रकाशित करने के लिये अपनी दो कवितायें जेब में डालीं और चौड़ी सड़क पर फुटपाथ अपने पांव बढ़ाने लगे।  मन ही मन सोच रहे थे कि चलो बड़ी पत्रिकाओं में छप नहीं सकते क्यों न एक लघु साहित्यक पत्रिका को अपनी कविताओं का दान कर हिन्दी दिवस मनायें।  वहां का संपादक छापे या नहीं उसकी मर्जी, अपना तो कर्तव्य करना ही चाहिये।
        वह मस्ती से फुटपाथ पर चले जा रहे थे। रास्ते में एक काईयों का सभागार पड़ता था। उन्होंने तय किया था कि उसकी तरफ देखेंगे भी नहीं। जब उस काईयां सभागार का दरवाजा आया तो उन्होंने अपना मुंह फेर लिया-अपनी नाकामी का सबसे यही श्रेष्ठ तरीका भी है कि जो पंसद न हो उसकी उपेक्षा कर दो।  अचानक अंदर से आवाज आई-‘‘ओए, फ्लाप कवि! तू यहां कैसे आ गया?
                        दीपक बापू को काटो तो खून नहीं। उन्होंने अपना मुंह गेट की तरफ किया तो देखा आलोचक महाराज खड़े थे।  एक दम सफेद चिकना चूड़ीदार पायजामा और कुर्ता पहने थे। गले में सोने की चेन और मुंह में पान था।  दीपक बापू हैरान रह गये। एक तो काईयों के  सभागार से चिढ़ तिस पर पुराने बैरी का मिलना उनके लिये हिन्दी दिवस के अवसर भारी अपशकुन जैसा था।
                        उन्होंने आलोचक महाराज से कहा-‘‘महाराज, हम यहां आ नहीं रहे। गुजर कर जा रहे हैं। आप यहां कैसे?
                        आलोचक महाराज ने पास जाकर एक जगह पान की पीक को थूका और फिर वापस आकर बोले-दिख नहीं रहा। यह इतना बड़ा बैनर टंगा है हिन्दी दिवस पर महासम्मेलन  अब यह बताओ इस शहर में हमारे बिना कोई हिन्दी का कार्यक्रम हो सकता है। कोई वरिष्ठ लेखक या कवि ऐसा नहंी है जो हमारे बिना यहां किसी बड़े अखबार में अपना कविता छोड़िये क्षणिका  तक छपवा सके। फिर यह कैसे संभव है कि हिन्दी दिवस पर कोई हमारे बिना कार्यक्रम हो जाये।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘आपका कहना सही है। आपकी कृपा नहीं हुई तो हम यहां फ्लाप कवि माने जाते हैं।  बहुत प्रयास किया कि आप हमारी कवितायें को बड़े पत्र पत्रिकाओं में  प्रकाशित करने के लिये सिफारिश करें।  कितनी बार चाय पिलाई, पान खिलाया और कितनी बार तो ठंडा पेय भी आपकी सेवा में प्रस्तुत किया। छोटे मोटे पत्र और पत्रिकाओं में छपवाने के अलावा कोई अन्य सहायता नहीं दी।  बड़े प्रकाशन तो हमसे मुंहफेरे ही रहे।
                        आलोचक महाराज बोले-सस्ती सेवा की वैसा ही मेवा मिला।  अगर दारु, मांस तथा खाने का इंतजाम किया होता तो तुम्हें कवि बना देते। अभी तुमने कहा कि तुम फ्लॉप कवि हो। किसी दूसरे से न कहना। हमारी रचनत्मक दृष्टि से तुम तो कवि ही नहीं हो।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज आप हिन्दी के बहुत बड़े ठेकेदार हैं। चलिये मान लेते हैं! वैसे आपका एक चेला आपको बदनाम कर रहा है कि आपने उसकी अनेक कवितायें चुराकर अपने नाम से छपवाईं।  उस दिन मिला था। हमने  उसे समझाया कि पानी में रहकर मगर से बैर नहीं किया जाता।
                        आलोचक महाराज आंखें फाड़कर गुस्से में बोले-‘‘अच्छा! तू हमें ठेकदार और मगर बोलकर एक ही पंक्ति में दो झटके दे रहा है।  समझ ले आज से हमने तुझे बैन कर दिया। अब तो तू छोटे पत्र पत्रिकाओं में  भीअपनी कवितायें नहीं छपवा सकता। वैसे तू जा कहां रहा है?
                        दीपक बापू बोले-‘‘में अमुक त्रैमासिक के लिये दो कवितायें लेकर  जा रहा हूं।
                      आलोचक महाराज बोले-‘‘यहा कौनसी पत्रिका है। जरा पता देना! देखता हूं कैसे छापता है?’’
                        दीपक बापू ने जेब से दो कविताओं के साथ बीस का नोट निकाला और बोले-‘‘महाराज, आप नहीं रोक पायेंगे। देखों यह चाय के लिये बीस का नोट भी साथ ले जा रहा हूं।’’
                        आलोचक महाराज-‘‘अमुक पत्रिका का संपादक इतना सस्ता है? मैं उसकी खबर लेता हूं। इतने सस्ते में कवितायें छापेगा तो क्या खाक इज्जत कमायेंगा,’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘नहीं महाराज! उस पत्रिका के बाहर एक होटल वाला है। उसके यहां दो चाय पीऊंगा। वह खुश होकर दोनो कवितायें छपवा देगा। एक चाय पी तो एक छपवायेगा।  इसलिये उसकी दुकान  दो तीन घंटे बैठना पड़ेगा। अच्छा, हम चलते हैं।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘सुनो! तुम बीस रुपये का खर्च क्यों करते हो? यहां कार्यक्रम में बैठकर हमारी संख्या बढ़ाओ। में तुम्हें आधा कप चाय भी पिलाऊगा और एक उबाऊ नाम की एक नयी पत्रिका है उसमें एक या दो नहीं बल्कि तीन कवितायें छपवा दूंगा।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, हम अंदर आने को तैयार हैं मगर  आप हमसे मंच पर एक कविता सुनाने का मौका दें।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘यह संभव नहीं है! तुम निकल लो यहां से।  पता लगा कि तुम्हारी कविता कहीं लोगों को पंसद आ गयी और धोखे से कहीं तुम्हें महाकवि मान  बैठे तो मेरी साहित्यक दुकान ही बदं हो जायेगी। मेरे बहुत से मशहूर कवि चेले मुझसे नाराज हो जायेंगे। तुमने ही कहा था कि हम हिन्दी के ठेकेदार हैं। बरसों से यह काम कर रहे हैं। हम किसी ऐसे कवि या लेखक को पनपने का मौका नहीं दे सकते जो हमारे नियंत्रण से बाहर हो। तुम इसी तरह के आदमी हो।’’
                        दीपक बापू हंसकर बोले-‘‘ठीक है। चलता हूं।’’
                  आलोचक महाराज बोले-‘‘ऐसा करो। तुम दस श्रोंता ढूंढकर लाओ। मै तुम्हें एक क्षणिका सुनाने का अवसर दूंगा।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, आपके पास श्रोताओं की क्या कमी है? हमं देख रहे हैं, उधर आठ दस लोग खड़े हैं।  अंदर दूसरे लोग  भी कार्यक्रम प्रांरभ होने की प्रतीक्षा कर रहे होंगे।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘इनमें कोई श्रोता या दर्शक नहीं है।  इनमें कुछ कवि, लेखक और संपादक हैं तो एक विशिष्ट माननीय अतिथि हैं। श्रोता और दर्शकों का इंतजार हो रहा है। तुम ऐसा करो किसी भीड़ एकत्रित करने वाले आदमी को जानते हो तो  उससे सौ पचास श्रोता और दर्शक किराये पर ले आओ। हम सभी के लिये एक एक बिस्किट और आधी कप चाय का भी इंतजाम करेंगे।  तुम अगर यह काम कर सको तो तुम्हारे लिये एक नहीं दो क्षणिकायें सुनाने के अवसर का इंतजाम कर दूंगा। पूरी कविता का समय किसी हालत में नहीं दे सकता।’’
                        दीपक बापू ने कुछ सोचा और बोले-‘‘अच्छा अभी आता हूं।’’
                       दीपक बापू सोच रहे थे कि उन्होंने जो निश्चय किया है वह शायद आलोचक महाराज नहीं जानते। यह उनकी गलतफहमी थी।  दोनों जानते थे कि उस दिन अब उनकी मुलाकात नहीं होने वाली  थी।
                        दीपक बापू थोड़ा आगे बढ़े तो फंदेबाज मिल गया।  दीपक बापू उसे देखते ही बोले-‘‘पता नहीं, आज हिन्दी दिवस पर किसका मुंह देखकर हम घर से निकले थे। पहले आलोचक महाराज मिले।  उनसे पीछा छुड़कार अभी सांस भी नहीं ली कि  अब तुम मिल गये। यह दोनों अपशकुन हुए हैं और अब मुझे दूसरे मार्ग से घर वापस जाना चाहिये।’’
                        फंदेबाज बोला-‘‘आपने मेरी तुलना आलोचक महाराज जैसे आदमी से की हिन्दी दिवस के दिन आपकी इस टिप्पणी पर मुझे बहुत दुःख है।  उसने आपकी रचनाओं को कई जगह छपने नहीं दिया और मैं आपकी हाथ से रची गयी अनेक हास्य कविताओं का जन्मदाता हूं।  क्या मुझे पता नहीं है आप सड़ी गली पत्रिकाओं में मेरा नाम लेकर हास्य कवितायें लिखते हो। मैं तो इज्जत से आपको फ्लाप कवि कहता हूं जबकि दूसरे लोग फूहड़ कवि कहते हैं।  अच्छा आप जा कहां रहें हैं़?’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘अमुक पत्रिका के दफ्तर जा रहा हूं। वहां दो कवितायें देनी हैं।’’
                        फंदेबाज बोला-चलो मैं भी साथ चलता हूं। मैं अभी’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘चलो! एक से भले दो। वैसे भी वहां होटल में मुझे दो चाय अकेले पीनी पड़ती। अब तुम  मेरे साथ एक चाय पी लेना तो दूसरी पीने की झंझट से मैं बच जाऊंगा। उस होटल वाले ने चाय पीने की संख्या के हिसाब से कवितायें छपवाने का वादा किया है।’’
                        फंदेबाज बोला-ःवह होटल वाला तो बंद है।  मैं भी उसकी दुकान पर चाय पीने गया था पर पता लगा कि आज उसके पास दूध नहीं आया तो बंद करके चला गया।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘यही होना था! मैंने पहले आलोचक महाराज और फिर तुम्हें देखा तो मुझे शक हो गया  था कि आज कुछ अच्छा नहीं होने वाला।  चलो दूसरे मार्ग से घर चलते हैं।  अब वहां चलकर तुम्हें चाय पिलाते हैं। तुमसे बातचीत में हो सकता है कि कोई ऐसी हास्य कविता हाथ लग जाये जो हमें राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कर सके। उम्मीद पर आसमान टिका है और उसके नीचे खड़े हैं।  वह हम पर नहीं गिरेगा यह तय है।
                        दोनों वहां से चल पड़े।  दीपक बापू के हिन्दी दिवस की चिंदी चिंदी हो चुकी थी।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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7/25/13

कोई कोई होता है योगी-हिन्दी कविता (koyee koyee hota hia yogi-hindi poem or kavita)




भूखे हो तो रोटी
खुद तुम्हें जुटानी होगी,
बीमार हो तो तुम्हें अपनी दवा
खुद जुटानी होगी,
अगर घर से निकले बाहर
अपनी जरूरत पूरी करने के वास्ते,
ख्वाबों का बाज़ार सजा मिलेगा पूरे रास्ते,
सौदागरों को पैसा दो या बेचो पसीना
कोई तुम्हारा मालिक नहीं है
सभी हैं खून के भोगी।
कहें दीपक बापू
कोई नारे लगा रहा है,
कोई कागज पर शब्द नचा रहा है,
ज़माने का भला करने के लिये
जुलूस रोज निकल रहे हैं,
जिन्होंने कभी झंडे उठाकर
शिखरों पर सजा दिये बुत
खाली हाथ रहे उनके
दिल अभी तक जल रहे हैं,
न लूटे पैसा,
न मांगे पसीना,
न कभी खून चूसे
दर्द दूर करे सभी का
ऐसा होता है सदियों में कोई योगी।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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7/5/13

खाऊ पीऊ लोगों का कचड़ा विसर्जन-हिन्दी व्यंग्य (khau peeu logon ka kachda visarjan-hindi vyangya or satire)



       उत्तराखंड में प्रकृति प्रकोप के कारणों पर अनेक विद्वान तरह तरह के विश्लेषण कर रहे हैं। यह हैरानी की बात है कि भगवत्दर्शन के लिये गये लोगों के हताहत तथा उनके परेशान परिजनों के दुःखी होने पर चेतनवान बुद्धिजीवियों की उनसे  सहानुभूति तो है पर कोई इसमें भगवान का दोष नहीं देखना चाहता। सभी विद्वान तथा चेतनवान लोग इसे मानव सभ्यता के आ बैल मुझे मारनीति  का अनुसरण करने का परिणाम मान रहे हैं।  अध्यात्मिक ज्ञानी, वैज्ञानिक तथा सामाजिक विशेषज्ञ बहुत समय से हिमालय पर सैलानियों के सैरसपाटे के दौरान वह बिखरने वाले कचड़े पर चिंतित थे।  वहां  गैसों के उत्सर्जन  साथ ही कचड़े के विसर्जन को लेकर अनेक प्रचार माध्यमों पर बहसें हो चुकी हैं।  यह ठीक है कि पूरे विश्व में गैसों के उत्सर्जन से वातावरण गर्म हो रहा है और हिमालय उससे अछूता नहीं है पर अनेक वैज्ञानिक इस प्रकोप को स्थानीय अप्राकृतिक गतिविधियों का परिणाम भी  मानने में हिचक नहीं दिखा रहे।
          पिछले बहुत समय से हिमालय क्षेत्र में सैलानियों की संख्या बढ़ी है।  तय बात है कि यह सैलानी कोई वहां सफाई या वृक्षारोपण करने नहीं जाते। उनके जेब में पैसा तथा देह मे ं विचलित एक मन है जो उन्हें वहां ले जाता है। उनके पास भोजन और पानी के  स्तोत्र प्लास्टिक से बने होते हैं। इनमें भी कोई इतना ज्ञानी नहीं होता कि वह उस कचड़े को अपने ही बस्ते में भरकर उस क्षेत्र से बाहर आकर कूंड़ेदान में फैंके। उनके लिये यह सरकार का काम है। हम कचड़ा फैंके और सरकार उसे साफ करवाये।  सरकार न साफ कराये तो स्वैच्छिक संगठन यह काम श्रद्धा भाव से करें पर हम यह काम नहीं करेंगे। हम तो मौज मस्ती के लिये पैदा हुए हैं, यह भाव अधिकतर लोगों के मन में होता है।  हिमालय में तो लाखों लोग जाते रहे हैं ऐसे में वहां फैले कचड़े की मात्रा का अनुमान सहजता से  करना हो तो अपने ही शहर में स्थित पार्कों को देखें। कहीं दिन में हजार या सौ लोग आते होंगे।  बरसात और गर्मी में ऐसे उद्यान लोगों को आकर्षित करते हैं।  मुश्किल यह है कि लोग बिना खाये आनंद लेना जानते ही नहीं। सच कहें तो लोगों के लिये कहीं घूमने का अर्थ वहां जाकर खाना।
        हमने एक बड़ा उद्यान देखा। हमारा अनुमान है कि वहां दिन में हजार से अधिक लोग नहीं आते होंगे।  सुबह और शाम की  नियमित सैर करने वाले लोग ऐसे उद्यानों में कचड़ा नहीं करते।  वहां आने वाले कभी कभी कभार घूमने वाले लोग खाने और पीने के प्लास्टिक के पैकेट वहां लाते हैं।  कभी कभी कुछ शराब पीने वाले भी रात वहां आते होंगे क्योंकि विभिन्न शराबों के ब्रांड की बोतलों के साथ नमकीन के पैकट और पानी के पाउच पड़े मिलते हैं।  नियमित सैर करने वालों के लिये ऐसे ही लोग इन उद्यानों में नरक के दृश्य छोड़ देते हैं। कुछ नियमित सैर करने वाले श्रद्धा वश कचड़ा उठाकर फैंकते हैं पर कुछ लोग ऐसे लोगों को मन ही मन कोसते हैं जो ऐसा कचड़ा वहां फैंकते हैं। इन खाने वालों का यह तमीज सिखाना सहज नहीं है कि वह उस कचड़े को उठाकर नगर निगम के कचड़ादान तक पहुंचाये। नगर निगमों के कामकाज पर रोने वाले हर शहर में मिल जायेंगे पर अपनी करनी पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता। हम कचड़ा फैलायें और नगर निगम साफ करे, इस सोच ने हमारे देश के खाऊ पीऊ लोगों के दिमाग को भ्रष्ट कर दिया है।
         अमेरिका के राष्ट्रपति जूनियर बुश जार्ज बुश ने एक बार कहा था कि विश्व में महंगाई इसलिये बढ़ी है क्योंकि भारत में लोग ज्यादा खा रहे हैं। इस पर बावेला मचा था।  उस समय हमने भी उन पर एक व्यंग्य लिख डाला था।  तब इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि जरा अपने ही देश के कुछ लोगों की गलत आदतों पर भी नज़र डालें।  ऐसे में जब हम कभी किसी उद्यान में जाते हैं तब लगता है कि वाकई जार्ज बुश ने गलत नहीं कहा था।  कभी कभी तो अमेरिका वाले यह भी कहते हैं कि विश्व में पर्यावरण को गरम करने वाली गैसों के लिये चीन और भारत जैसे लोग जिम्मेदार हैं तो बहुत विरोध होता है।  चीन का हमें नहीं मालुम पर भारत में कुछ लोगों की आदतें देखकर मन में अप्रसन्नता पैदा होती है तब लगता है कि संभव है यह आरोप सही हो।
     लोगों  को लालसायें बढ़ गयी हैं।  उदारीकरण ने सामान्य व्यक्ति के आर्थिक स्तोत्रों तो संकीर्ण बना दिया है।  ऐसे में भारतीय समाज विरोधाभासों में जी रहा है।  इन विरोधाभासों से पैदां तनाव से बचने के लिये लोग इधर से उधर भागते हैं।  ऐसे में घूमना हो या सत्संग में जाना, उन्हें खाना चाहिये। स्थिति यह है कि जिसे सत्संग करना या कराना हो उसे कथा से अधिक खाने पर ध्यान पहले देना पड़ता है।  कहीं सत्संग हो रहा हो तो उस समय भीड़ कम मिलेगी जब केवल भगवत्चर्चा हो रही हो।  समापन जब भंडारा हो तब वहां जाकर भारी भीड़ देखिये।  भंडारे में प्रसाद लेने वाले श्रद्धालु बहुत सारे आ जाते हैं। उनसे कोई कह नहीं सकता कि तुम तो  केवल खाने आये हो।  इनमें कुछ चतुर होते हैं वह बिना पूछ कहते हैं कि‘‘ हम कथा तो नहीं सुन पाये, सोचा कि चलो भगवान का  प्रसाद तो ले ही आयें।
    गोया कि भगवान पर अहसान कर रहे हों।  उसी तरह उद्यानों के ऐसे खाऊ पीऊ लोग भी इस तरह आते हैं जैसे कि सरकार पर कृपा कर रहे हों। गोया हम नहीं आते तो पार्क की कौन इज्जत करता? उद्यानों में उनका आना जैसे नगर निगम का सम्मान बढ़ाने वाली बात हो। हमने तो आकर तुम्हारी इज्जत बढ़ाई और तुम अब यह कचड़ा साफ करो।  ऐसी मनोवृत्ति वाले लोगों के अंतर चेतना जगाने का काम कौन कर सकता है?
          पहले कुछ सामाजिक पत्रिकाओं में हमें शिकायत हैनाम के स्तंभ आते थे। उसमें कुछ लोग ऐसे कचड़ा फैलाने वालों की चर्चा करते थे। इसका सीधा मतलब है कि यह आदत पुरानी है। हम जब अपने विकास की बात करते हैं तो एक बात तय लगती है कि भौतिक विकास तो हो गया पर हमारा आंतरिक विकास कभी नहीं होगा। हम तो केवल उपभोगी बने रहना चाहते हैं।  दृष्टि और विचार इतने संकीर्ण हो गये हैं कि अपने पेट भरने के अलावा दूसरा काम करना कुछ लोगों को  बोझ लगता है।  जबकि चेतनावान लोग ऐसे केवल उपभोगी प्रवृत्ति वाले  लोगों को ही धरती पर बोझ मानते हैं। तय बात है चेतनावान लोगों की संख्या कम है और कोई उनकी सुनता भी नहीं है।  यह उपभोगी लोगों की भीड़ चेतनावन लोगों को असामाजिक विचारवान कहकर आगे बढ़ जाती है।    

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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4/4/13

सपने बेचने का व्यापार-व्यंग्य कविता

सपने बेचने का व्यापार
बहुत सरल है
हल्दी लगे न फिटकरी
रंग चोखा आये।
जिदंगी के कड़वे सच से
उकताये ज़माने में
हर रोज  दिल बहलाने का
ख्याल पैदा कर
जेब बस यूं ही भरती जाये।
कहें दीपक बापू
दौलत के पहाड़ पर  चढ़े लोग
ज़माने के लिये बहुत फिक्रमंद दिखते हैं,
कलमकार कागज पर
उनकी मासूम अदाओं पर गीत लिखते हैं,
उगलती ज़मीन जो सोना
अब बंजर हो गयी
कदम कदम पर छाया दर्द और कड़वाहट
ऐसे में बहार लाने का सपनां
देखते देखते बाज़ार में
महंगे दाम में बिक जाये।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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2/7/13

जज़्बातों के व्यापार में-हिन्दी कविता

कहीं रौशनी इतनी ज्यादा
उसे अंधेरों की तलाश है
कहीं अंधेरे घर खड़े हैं
उसके इंतजार में।
बाहर से दुनियां एक गेंद की तरह लगती जरूर
अंदर बंटी  नफरत और प्यार मे।
कहें दीपक बापू
जिन चीजों में दिल लगता है
महंगी मिलती बाज़ार में
अपने घाव सहलाने के लिये क्यों हमदर्द ढूंढे
अमीर हो गये बहुत लोग
जज़्बातों के व्यापार में।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
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1/3/13

क्रिकेट और फिल्म-हिन्दी व्यंग्य (cricketaur film-hindi vyangya or satire)

      कुछ लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि ‘आप कंप्यूटर पर इतना कैसे लिख लेते हैं? हमें कोई इसका जवाब नहीं सूझता।  सच बात तो यह है कि हमारे जैसे लोगों में इधर उधर की फालतु निंदा परनिंदा वाली बातों में समय बरबाद  करने की बजाय स्वस्थ मनोरंजन की चाहत होती है जिसके पूरा न होने पर वह स्वयं ही मनोरंजन का सृजन करने लगते हैं।  जब क्रिकेट की बातें हमारे दिमाग में भरी हुईं होती थीं उस दौर में हमारा लेखन कम हो गया था।  बाद में जब इसमें फिक्सिंग की बातें सामने आयी तो मन उचट गया।  उसी समय इंटरनेट कनेक्शन लिया था और पता नहीं यह ब्लॉगर और वर्डप्रेस के   ब्लॉग हमारे हाथ आ गये।  हमें पता नहीं था कि यह ब्लॉग हमें कहां ले जाने वाले हैं।  यकीनन वह क्रिकेट की जगह ले रहे थे।  यही कारण की इन पर हमारी शुरुआती रचनायें क्रिकेट का मखौल उड़ाने वाली थी। 
      सच बात तो  है कि अब तो हम यह मानने लगे हैं कि क्रिकेट कोई खेल नहीं है वरन् यह एक व्यवसाय है।  हमने यह देखा कि जब क्रिकेट का आकर्षण चरम पर था तब अनेक जगह इसका मनोरंजन की तरह वैसे ही आयोजन किया जाता जैसे फिल्मी गानों का आयोजन होता है।  गानों के कार्यक्रम में समस्या यह होती है कि जिसे गाना आता है वही माइक पर गा सकता है और बाकी लोगों को श्रोता बनना पड़ता है।  एसे में दर्शकों को गाना न आने का मलाल तो रहता ही है। क्रिकेट ने यह सुविधा दे दी कि इसे चाहे जो इसे खेल सकता है।  यही कारण है कि कहीं स्त्री- पुरुष, कहीं अधिकारी-कर्मचारी तो कहीं मालिक-नौकर के वर्ग बनाकर अवकाश के दिन मैच होते रहे।  जैसे ही फिक्सिंग के बाद क्रिकेट का आकर्षण कम हुआ यह सब बंद हो गया।
      हमारा मानना है कि क्रिकेट का आकर्षण अब न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है।  अगर अब यह चल रहा है तो केवल टीवी चैनलों की वजह से ही इसका अस्तित्व है।  बाज़ार और प्रचार प्रबंधक मिलकर क्रिकेट को पुनः लोकप्रिय बनाने का प्रयास कर रहे हैं।  इधर एक टीवी चैनल हिन्दी में भी कमेंट्री प्रसारित कर रहा है जो शुद्ध रूप से एक व्यवसायिक प्रयास है।  वरना तो क्रिकेट वाले भला कब हिन्दी बोलते हैं।  क्रिकेट के फिल्म जैसे ही मनोरंजक व्यवसाय होने का प्रमाण यह है कि पर्दे के अभिनेता अभिनेत्रियों जहां कहीं मैदान में इनाम लेते हैं तो  अंग्रेजी में ही बोलते है।  उनकी तरह  मैदान के खिलाड़ी भी  पर्दे पर आकर अंग्रेेजी में बोलते है। जो क्रिकेट में हिट हुआ उसका किसी किसी तरह से फिल्म के साथ नाता जुड़ ही जाता है।  सुपर क्रिकेट स्टार और सुपर फिल्म एक्ट्रेस के बीच इश्क का प्रायोजन कर उसे भी भुनाने के अनेक प्रयास हम देख चुके हैं। 
       बाज़ार के उत्पाद बेचने के लिये फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ क्रिकेट के खिलाड़ी भी पर्दे पर उतरते हैं।  प्रचार प्रबंधक भी इनके साथ ऐसे ही जुड़े रहते हैं जैसे कि यह उनके अपने नायक हों।  क्रिकेट के मैदान पर कंपनियों के विज्ञापन बोर्ड पूरी कहानी बयान करते हैं। इसे समझने वाला कोई पाठक अर्थशास्त्री होना चाहिये।  जब बीसीसीआई की क्रिकेट टीम कभी कभी लगातार हारने लगती है तब कुछ आम क्रिकेट प्रेमी चिल्लाते हैं कि ‘उस खिलाड़ी को हटा दो’, ’उसे कप्तानी से हटा दो’ या ‘‘इस बॉलर को टीम में क्यों नहीं लिया, उस बल्लेबाज को क्यों रख लिया’, तब हमें हसंी आती है।  अब इन आलोचकों को यह कौन समझाये कि अगर क्रिकेट के खिलाड़ियों का चयन आम लोगों की दृष्टि से होगा तो कंपनियों के उत्पाद कौन खरीदेगा और कौन बेचेगा? कोई खिलाड़ी अगर किसी विज्ञापन में बना हुआ है और टीम से हटा दिया जाये तो जो उत्पाद का नुक्सान होगा उसे कौन भरेगा? पता नहीं भारत के आम क्रिकेट प्रेमियों को यह कैसा भ्रम है कि क्रिकेट खेल उनकी वजह से चल रहा है? भले ही कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जो अब विशेषज्ञ बन गये हैं यह दावा करते हैं कि आम आदमी के लिये क्रिकेट खेला जा रहा है पर यह सच नहीं है। हां, कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जरूर तारीफ करने लायक हैं जो कि मानते है कि  क्रिकेट खिलाड़ियों को अच्छा खेलना चाहिए ताकि दर्शकों का मनोरंजन हो।  स्पष्टतः वह इस तर्क को ही हवा देते हैं कि यह खेल नहीं वरन् मनोरंजन है। यह अलग बात है कि अगर उनसे कहा जाये कि यह मनोरंजन है खेल नहीं तो वह उखड़ भी सकते हैं।
       भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ते हैं तो क्रिकेट में सबसे पहले बिगड़ते हैं।  जब बनाने की बात आती है तो भी क्रिकेट मैच दोबारा खेलने से ही शुरुआत होती है।  भारत में कुछ लोग दावा करते हैं कि क्रिकेट में रिश्ते बढ़ाने से भारत पाकिस्तान की दोस्ती बढ़ेगी।  हैरानी होती है!  यह नुस्खा बीस सालों में पांच दस बार आजमाया जा चुका है पर कभी परिणाम पर खरा नहीं उतरा।  कभी कभी संगीत और फिल्म में भी इस तरह के संपर्क जोड़कर संबंध मधुर करने की  बात कही जाती है।  यह दोनों ऐसे व्यवसाय है जिनमें पैसा खूब है।  जब पाकिस्तान से भारत का रिश्ता खराब होता है तो चोट इन्हीं दो क्षेत्रों में होती है।  पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ मैच न खेलने के साथ उसके गायकों और हास्य कलाकारों को मुंबई से भगा दिया जाता है। 
       हमें इन चीजों से कोई लेना देना नहीं है पर  जब पाकिस्तान इन कदमों से हताश होता नज़र आता है उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं उसके यहां के गायकों, नायकों और खिलाड़ियों के अलावा अन्य व्यवसायी भी  इससे लाभान्वित होते हैं।  इससे यह प्रमाण मिलता है कि क्रिकेट और फिल्म एक जैसे ही व्यवसाय है।  ऐसे में अगर बीसीसीआई की टीम कभी पाकिस्तान से हारती है तो वैसे ही अफसोस नहीं होता जैसे किसी फिल्म के पिट जाने पर कोई चिंता नहीं होती।  जीत जाती है तो भी हमें खुशी नहीं होती क्योंकि किसी की फिल्म हिट हो तो हमें क्या मिलता है।  क्रिकेट से हमारा ही नहीं अनेक मित्रों का मोह इतना भंग हुआ है कि अब तो वह क्रिकेट का नाम नहीं लेते पर हम जैसे लेखक के लिये यह भूलना कठिन होता है कि इस खेल ने हमारे पूरे पंद्रह वर्ष बरबाद किये। अगर हम क्रिकेट नहीं देखते तो यकीनन बहुत बड़े लेखक होते। 
    पहले इस क्रिकेट ने दुःखी किया तो हमने मैच देखने बंद या कम किये पर अब तो समाचार हो या मनोरंजन चैनल वह कहीं न कहीं क्रिकेट का विज्ञापन कर रहा है।  पहले हम इच्छा से देखते थे पर अब यह जबरन हम पर थोपा जा रहा है।  पाकिस्तान से दोस्ती का तो नाम भर है, टीवी चैनलों के  विज्ञापन देखें तो पता चलेगा कि दुश्मनी को भुनाया जा रहा है।  ऐसे में चिढ आती है तब ऐसे व्यंग्य लिखने का मन करता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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12/12/12

जिंदा कौम और मोमबत्तियां-हिन्दी कविता (jinda kaum aur mombattiyan-hindi kavita)

जिंदा कौम होने का अहसास-हिंदी कविता 
---------------------
जिंदगी में कभी शरीर कभी दिल पर
हादसों से घाव हो ही जाते हैं,
क्यों उनको याद कर जलाते हो खून अपना
दर्दों में जीने की आदत में
हम अपनी मुस्कराहट पर ताला लगाते हैं।
कहें दीपक बापू
बेबसी और लाचारी में
जीने के आदी हो गये हैं सभी,
या आराम की सोच से फुर्सत नहीं मिलती कभी,
शायद इसलिये जिंदा लोगों के दिल का हाल जानकर
उनके मुश्किलों हल करने से अधिक
मरने वालों की याद में
मोमबत्तियां जलाकर
अपनी जिंदा कौम होने का अहसास जताते हैं।
---------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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8/13/12

इंसान और अफसोस-हिन्दी कविता (insan ka fasos-hindi poem or kavita)


मिट्टी से बना इंसान
रात और दिन में चलता बुत की तरह
कोई उनमें शाह नहीं होता,
समंदर जैसी लहरें उठती हैं मन में
पर पिंजरे में बंद है, वह अथाह नहीं होता,
कहें दीपक बापू
भलाई बेच रहे लोग
अपना घर भरने के लिये
महफिलों में गरीबी पर  अफसोस के सुर
गाये जाते मजे के लिये
मगर गरीब का कोई हमराह नहीं होता।
----------------------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ग्वालियर


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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3/3/12

चुनाव परिणाम में चमत्कार की आशा-हिन्दी व्यंग ( chunam parinam aur chamtkar-hindi vyanga, result of election and miricle-hindi satire)

मतदाता खुद चमत्कार नहीं करते-हिन्दी व्यंग्य
लेखक दीपक भारतदीप
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                  चुनाव के समय नेताओं के आचरण पर अनेक तरह के कटाक्ष देखने को मिलते हैं मगर आम मतदाता पर कोई कुछ नहीं लिखता। यह मान लिया जाता है कि वह तो चेतन को धारण करने वाला जड़ वस्तु है। जैसा कहा जाएगा वैसा वह बिना हील हुज्जत के करेगा। स्थिति यह है हास्य कवि और व्यंग्यकार चुनावों के मौसम में नेताओं पर अनेक हास्य और व्यंग्य लिखकर और सुनाकर वाहवाही लूटते हैं। ऐसे में हम जैसे लोग धारा से अलग होकर लिखने की फिराक में रहते हैं। फोकटिया हैं इसलिए लिखने का मन नहीं करता। सोचते हैं कि कोई दूसरा लिखे तो हमारी भड़ास स्वयमेव ही ठंडी हो जाएगी। जब ऐसे नहीं होता तो लाचार और मजबूर होकर खुद ही लिखने बैठ जाते हैं। तनाव से मुक्ति का यह मार्ग भी कि आप अपने अंदर चल रही हलचल को बाहर अभिव्यक्त करें। फिर हम जैसे लेखक तो आत्ममुग्ध होते ही हैं जिनको लगता है कि चार लोगों में चर्चा कर क्या अपनी तौहीन कराएं सो कहीं लिखकर चाप दें। चापना इसलिए लिखा क्योंकि हमारे यहाँ छापना केवल दूसरों के अखबारों में ही होता है। बाकी लिखकर अपने यहाँ रख लिया तो उसे चापना ही कह सकते हैं।
         कुछ लोग पूछें कि मतदाताओं पर भला क्या लिखा जा सकता है? वह तो निरीह प्राणी है। हम नहीं मानते कि एक आम मतदाता के रूप में निरीह प्राणी है। कहते हैं कि गीदड़ कि तरह बरसों जीने से अच्छा है कि शेर कि तरह एक दिन जिया जाए। बाकी लोगों के क्या कहें हम स्वयं ही कभी मतदान के दिन शेरदिली का परिचय नहीं दे पाये। हम नहीं दे पाये तो बाकी लोग तो दे ही सकते थे, यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं। हाँ ! इस तरह दूसरों पर दोष देकर अपने आपको बारी कर देने में भी जिंदगी का सुख अनुभव होता है।
           इधर पाँच राज्यों में चुनाव समाप्त हुए तो संभावित परिणामों के विश्लेषण भी आ गए। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसमें हमारी दिलचस्पी नहीं है। कोय नृप हो हमें क्या हानि की तर्ज पर चलकर अनेक लोगों ने सुख पाया हम भी ले रहे हैं। नेताओं पर हास्य व्यंग्य करना हमें आता नहीं है। इधर यह भी लगता है कि एक आम मतदाता के रूप में हम स्वयं भी कम हास्यास्पद काम कम नहीं करते हैं।
             जब टीवी चैनलों पर इन चुनावों के संभावित परिणामों पर विश्लेषण सुने तो लगा कि आम मतदाता के मानस का विश्लेषण इस तरह हो रहा है जैसे वह जड़ हो। वह जाति के आधार पर मत डालेगा। अपने पूरे दिन में आने वाली समस्याओं से दूर होकर अपने धर्म को बचाने के लिए दूसरों के बहकावे पर वोट डालेगा। लब्बोलुवाब यह कि वह देश राज्य और शहर में परिवर्तन के लिए आम मतदाता स्वयं कोई चमत्कार नहीं करेगा। हाँ, एक विद्वान ने जो कहा उसका आशय यही था।
         वह विद्वान सही था या गलत इस पर हम कुछ नहीं कहेंगे, मगर एक एक बात तय है वाकई हमने आम मतदाताओं को कभी ऐसा चमत्कार करते नहीं देखा कि प्रायोजित प्रवाहित धाराओं से अलग कोई अप्रायोजित धारा बही हो। केवल एक दिन शेर की तरह जीने का अवसर मिलता है पर क्या बहुमत में उसका कभी प्रभाव दिखा है। लोग चार पाँच बुरों में एक कम बुरा चुनता है। यहाँ तक कि उसका निर्णय अपने आत्मविवेक से नहीं बल्कि प्रचलित संगठित प्रचार माध्यमों के प्रभाव में करता है। यही कारण है कि कभी ऐसा नहीं सुना गया कि कोई कम प्रचारित असंगठित उम्मीदवार जीतने का चमत्कार कर सका हो। मतलब यह कि जो लोग पाँच बरस तक यह उम्मीद करते हैं कि उनके हित के लिए कोई चमत्कार करे वह एक दिन का अवसर आने पर स्वयं कुछ नहीं करते। बस, संगठित प्रचारित धाराओं में बहते हुए चमत्कार कि सोचता है। कौन समझाये कि आधुनिक लोकतंत्र में चमत्कार बहुमत करता है न कि कोई एक व्यक्ति। भ्रष्टाचार को एक लोकपाल हटा देगा, यह भ्रम अपने यहाँ खूब चल रहा है। यह भ्रम फैलाने वाले भी नेताओं पर बरसते हैं पर मतदाता से चमत्कार को नहीं कहते क्योंकि वह एक आम आदमी है जिसका भीड़ में भेड़ की तरह करना है। अगर वाकई मतदाता चमत्कार करने लगे तो फिर यहाँ किसी भी आंदोलन से कोई महापुरुष नहीं बनेगा। भावावेश में आम इंसान आकर उनके पीछे भी चल पड़ता है। इस आशा के साथ कि शायद कोई चमत्कार हो जाएगा।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/9/12

फेसबुक पर वार्तालाप में भाषा का तोतलापन अखरता है-हिन्दी लेख (fecebook par vartalap mein bhasha ka totlapan akharta hai-hindi lkeh)

        फेसबुक पर आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि पुराने लोग भी सक्रिय हैं पर उनमें अधिकतर लेखक नहीं है इसलिये हिन्दी साहित्य की परंपराओं के ज्ञान का उनमें अभाव है। ऐसे में नयी पीढ़ी के लोगों से यह अपेक्षा तो करना कठिन है कि वह उन्हें समझ सकें खासतौर से जब वह स्वरचनाकर्म से अधिक कट पेस्ट यानि किसी का पाठ उठाकर अपने पृष्ठ पर रखने के आदी हों। हमारे प्रचार माध्यमों ने तो नयी पीढ़ी में यह बात स्थापित कर दी है कि ब्लॉग, ट्विटर या फेसबुक पर केवल आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, फिल्म, टीवी तथा कला क्षेत्र के शिखर पुरुष ही लिखते हैं और उनकी ही परवाह करना चाहिए। आम लेखक तो फोकटिया हैं और उनकी कोई बात सम्मानीय या पठनीय नहीं है।
       यही कारण कि फेसबुक तथा ब्लॉग पर जब हमने अपनी रचनायें बिना नाम के देखीं तो वहां प्रतिकूल टिप्पणियां लिखीं। ऐसा लगता है कि बजाय प्रतिकूल टिप्पणियां करने के साथ उनको यह बात समझाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में साभार रचनायें लेने की परंपरा है। उसमें लेखक का नाम अवश्य दिया जाता है। जिन टीवी चैनलों के पास किसी खास समाचार का दृश्यव्य प्रसारण नहीं है वह दूसरे से साभार लेते हैं। हालांकि यह उदाहरण समझाने के लिये पर्याप्त या उचित नहीं है। हिन्दी टीवी चैनल साभार प्रसारण लेते हैं पर वह या तो विदेशी चैनल का या फिर देश का अंग्रेजी चैनल हो। मतलब यह कि हिन्दी वाले की हिन्दी से सोतिया डाह तो रहती ही है। यह बात इंटरनेट पर भी दिखाई देती है जब चोरी के पाठ प्रकाशित होते दिखते हैं।
         बहरहाल फेसबुक पर एक वेबसाईट संचालिका ने हमसे अपने पाठ प्रकाशित करने की अनुमति मांगी तो हमने उसे सहर्ष नाम प्रकाशित करने की शर्त पर दी। उसने ऐसा किया भी! उसकी इस क्रिया पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। दरअसल उसने भ्रष्टाचार पर उस कविता को ही लिया जो कि हमारी इस विषय पर लिखी गयी सबसे हिट कविता है। इसी कविता ने एक नहीं दो ब्लॉग को हिट बना रखा है। हमें यह देखकर हैरानी हो रही है कि केवल ब्लॉग को नियमित या अपडेट बनाये रखने के लिये लिखी गयीं कविताओं ने अधिक पाठक जुटायें हैं बनिस्बत उन बड़े लेखों के जो बड़े मनोयोग से लिखे गये। इसका कारण यह भी है कि नयी पीढ़ी के युवा ज्यादा समय खराब करने के थोड़े समय में अधिक पढ़ना चाहता है। वह कहानी भी कविता में पढ़ना चाहता है। अगर विषय गंभीर हो तो एक लघु कथा लिखने से काम चल सकता है पर हास्य हो तो कविता ही ठीक जमती है।
          हमें इंटरनेट पर सक्रियता से जहां खुशी मिली वहीं इस बात का दुःख भी होने लगा है कि नयी पीढ़ी भाषा के लिहाज से तोतली हो रही है। रोमन लिपि में अंग्रेजी और हिन्दी का मिश्रण प्रसन्नता नहीं दे सकता। हैरानी की बात है कि हिन्दी टूलों की उपलब्धता के चलते यह हो रहा है। खासतौर से जब यह जीमेल पर ही उपलब्ध हो और प्रयोक्ता उसके उपयोग में असमर्थ हों। लड़के लड़कियां अगर यह सोच रहे हैं कि वह अभिव्यक्त होकर कोई बड़ा नाम करेंगे तो वह गलतफहमी में हैं। फेसबुक पर लिखने के बाद प्रतिक्रियायें मिल जाती हैं पर कालांतर में वह भी बोरियत लगने लगेगी। फेसबुक पर तो यह आशा करना ही बेकार है कि कोई अपने अभिव्यक्त होने की लंबी पारी खेल सकता है। इससे अच्छा तो यह है कि ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर ब्लॉग लिखकर प्रयास करना श्रेयस्कर है। फेसबुक में केवल अपने समूहों से जुड़े हुए लोग ही साथी होते हैं जबकि ब्लॉग एक सार्वजनिक पत्रिका की तरह उपयोग में लाये जा सकते हैं। जिन युवक युवतियों में मन में हिन्दी लिखने का आनंद प्राप्त करने की इच्छा है वह फेसबुक के साथ ही ब्लॉग जरूर बनायें। कुछ समय तक उनको टिप्पणियां मिलेंगी पर बाद में बंद हो जायेंगी मगर सर्च इंजिनों में वह हमेशा जीवंत बना रहेगा। ऐसे में अगर केवल अपने अंदर बैठे लेखक को जिंदा रखने के लिये एकांत यात्रा करनी होगी। हालांकि ब्लॉग पर फेसबुक की तरह लिखना अधिक परिणामदायक नहीं रहेगा ऐसे में हिन्दी टूलों के साथ प्रभावी हिन्दी का भी ज्ञान रखना होगा। वह केवल पुराने लेखकों की रचनाओं से मिल सकता है। नये लेखकों ने तो अंग्रेजी का मिश्रण करना प्रारंभ कर दिया है।      
              फेसबुक पर पिछले एक दो महीने से हम अधिक सक्रिय रहे हैं। वहां अपने ब्लॉग के लिंक देखने अक्सर जाना होता है। अनेक महानुभावों ने संपर्क किया है। उनसे चैट में भाषा का तोतलापन अखरता है। हम आपसी संवाद पर अपने साथियों पर कोई आक्षेप नहीं कर रहे पर इतना तय है कि यह रोमन लिपि में लिखना या पढ़ना हमको तोतलापन लगता है। चूंकि लेखक हमेशा भावुक होता है इसलिये हमारे लिये वार्तालाप के समय टिप्पणियां करना ठीक नहीं लगता। यह सही है कि ऐसे संवाद के समय शीघ्रता होती है इसलिये कही दूसरी जगह से कट पेस्ट करने में देरी करना अच्छा नहीं लगता है पर अभ्यास हो जाये तो कुछ भी असहज नहीं है। हिन्दी तो फिर भी सरलता से लिखी जाती है पर चीनी लिखने में कठिन है मगर फिर भी चीन के नागरिक उसमें लिखते हुए संकोच नहीं करते। हमारा उद्देश्य आक्षेप करना नहीं बल्कि नयी पीढ़ी के लोगों को यह समझाना है कि भाषा की कमी उनकी अभिव्यक्ति को कमजोर बनाने के साथ विचार को क्षणिक आवेग के रूप में प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात आत्मीयता का वैसा संबंध वह कभी नहीं बना सकती जैसे कि हमारे अपने साथ ब्लॉग लेखकों के साथ प्रभावी हिन्दी के कारण बने।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
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9/30/11

बीमारी, इलाज और परहेज की चर्चा का फैशन-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (bimari, alaj aur parhej ki charcha ka fashan-hindi vyangya kavitaen or satire poem)

अपनी बीमारियां साथ लेकर
शहर में घूम रहे लोग
दवाईयों के साथ परहेज के
नुस्खे मिलने वालों में बांट रहे हैं,
दिल और दिमाग से बीमार समाज में
हमारे चारों तरफ भीड़ है
मगर हम ख्यालों से तंदुरस्त
लोगों को दोस्ती के लिये छांट रहे है।
--------
वह चारों लोग आपस में
बात कर रहे थे
हम उनके पास जाते जाते
चर्चा के विषय के अनुमान कर रहे थे।
शायद वह राजनीति पर बोलते होंगे,
किसी फिल्म की कहानी को तोलते होंगे,
क्रिकेट के स्कोर पर चर्चा होती होगी,
सुना रहा होगा अपने खाने का स्वाद
सभी लग रहे थे भोगी,
जब पास जाकर सुना और देखा
तब पाया
वह तो बीमारी, इलाज और
परहेज पर बात कर रहे थे।
-------------
बीमारियां अब फैशन गयी हैं
लोग बीमारी, इलाज और फैशन
पर सरेआम चर्चा करते हैं,
अपनी बीमारी को अपनी काबलियत
इलाज और परहेज सभी को बताना
शान समझते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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9/1/11

क्रिकेट मैच में गधे कब से आ गये-हिन्दी व्यंग्य (gadha or donkey when playing cricket match-hindi vyangya

             इंग्लैंड के पूर्व कप्तान ने नासिर हुसैन ने टीवी पर भारत तथा इंग्लैंड के आंखों देखा हाल (रनिंग कमेंट्री) प्रसारित करते समय अपने श्रीमुख से कह डाला कि ‘भारतीय टीम में अच्छे क्षेत्ररक्षक हैं पर उसमें एक दो गधे हैं।’’ यह बात उन्होंने एक अंग्रेज बल्लेबाज का कैच बीसीसीआई की टीम के एक क्षेत्ररक्षक के हाथ से छूटने पर कही। दरअसल अगर उन्होंने पूरी टीम को गधा कहा होता तो शायद विरोधात्मक होकर अपनी कहते पर उन्होंने एक मासूम खिलाड़ी के कैच छोड़ने पर यह बात कही जो कि कथित रूप से एक महान खिलाड़ी को शोभा नहीं देता। एक नये खिलाड़ी के अपमान से दुःख हुआ है। हम यह दावा करते हैं कि ऐसा कतई नहीं हुआ होगा कि नासिर हुसैन ने अपने जीवन में कम से कम तीन बार कैच न छोड़ा हो। दक्षिण अफ्रीका के जोंटी रोड्स को अब तक दुनियां का सर्वश्रंष्ठ क्षेत्ररक्षक माना जाता है और हमने उनको कम से दो हाथ में आते हुए आते कैच छोड़ते देखा है तब यह नासिर हुसैन क्या चीज है। दरअसल पकड़े गये कैच आंकड़ों मेें जुड़ते हैं मगर छूटे कैचों की चर्चा कहंी नहीं होती। इसलिये किसी एक खिलाड़ी से एक दो बार ऐसी गलती होने पर इस तरह बोलना गलत है।
          बहरहाल इस पर हायतौब्बा मच गया है। अपना इसमें साफ मानना है कि क्रिकेट बाज़ार का खेल है जिसमें सब पैसे का काम है। आंखों देखा हाल का प्रसारण कमाई के लिये है तो उससे जुड़े पुराने क्रिकेट खिलाड़ी भी पैसा कमाने ही आते हैं। वह भी उसी विश्व समुदाय का हिस्सा है जो सनसनी चाहते हैं। इसलिये जिसे अवसर मिलता है वह सनसनी फैलाता है और बाज़ार के सौदागरों के विज्ञापन चलते रहें इस हेतु सक्रिय प्रचार माध्यमों को ऐसी सामग्री प्रदान करता है जो समाचार के साथ ही बहस के लिये भी उपयुक्त हो। बल्ला, बॉल और बकवास मिलकर बाज़ार के लिये कमाई का काम करते हैं। मैच का प्रयोजक बाज़ार, खिलाड़ियों का रहनुमा बाज़ार, और नासिर हुसैन भी बाज़ार का ही पुराना मॉडल खिलाड़ी-जो पहले खेलता था अब आंखों देखा हाल में अपने श्रीवचन प्रस्तुत करने लगा है। इसी श्रीवचन में एक शब्द शामिल हो गया गधा। बहस होगी पर हम बोलेंगे नहीं क्योंकि यह बाज़ार का मामला है। यहां फिक्सिंग मिक्सिंग सब चलता है।
        हम जैसे लोग तो अब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों को तो खेल मानते ही नहीं बल्कि उससे बाज़ार का मनोरंजन व्यवसाय मानते है। क्रिकेट संगठनों की अपनी सल्तनत है। यह सल्तनत पैसे से बनी है। पैसा जनता है का है पर उसकी ताकत इतनी बड़ी है कि जनसंगठन भी खरीदे जा सकते हैं। स्थिति यह है कि क्रिकेट को देश का धर्म बताया जाने लगा है जिसके भगवान क्रिकेट खिलाड़ी है। पूरे विश्व के क्रिकेट संगठनों के अधिकारी इस तरह     कहते दिखते हैं कि अगर तुम्हें मनोरंजन करना है तो तुम उनको तुम पूजो वह हमें पूजेंगे। वह पूजेंगे तो तुम्हारा बाप भी हमें पूजेगा। जाओगे कहां, हमारे पास पास है इसलिये सभी जगह पर हमारा कब्जा है। सुबह अखबार के प्रथम पृष्ठ पर किसी क्रिकेट खिलाड़ी का फोटो देखोगे। समाचारों में पचास फीसदी का समय हमारा है। रैम्प पर हमारे खिलाड़ी चलते हैं। टीवी के मनोरंजन धारावाहिकों में मेहमान के रूप में भी उनको लायेंगे। तुम्हारी लाचारी है कि अगर मनोरंजन चाहते हो तो बस हमारी राह पर आओ।
      भारत देश की कोई क्रिकेट टीम है। कौन बनाता है? बीसीसीआई! बीसीसीआई पर किसका अंकुश है? बाज़ार का! बाज़ार पूरी दुनियां का बाप है तो फिर किसकी मजाल कि दुनियां में कोई खेल संगठन किसी देश के कानूनी संगठनों की इज्जत करे। अभी बीसीसीआई की क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीता। अपने यहां तो स्थिति यह हो गयी कि प्रसिद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे इतने उत्साहित हुए कि इस अवसर पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रारंभ कर बैठे। सात दिन तक चला। क्रिकेट की क्लब स्तरीय प्रतियोगिता आई पी एल प्रारंभ होने से एक दिन पहले ही वह खत्म हो गया। हमें शक हुआ कि कहीं अन्ना हजारे साहेब को ब्रेकिंग टाईम के लिये बाज़ार के प्रचार प्रबंधकों ने तो नहीं चुना।
             अन्ना साहेब फिर दोबारा अनशन पर लौटे। इसी दौरान बीसीसीआई की टीम ने जो विश्व कप में इज्जत कमाई थी वह इंग्लैंड में लगातार पांच मैच हारकर गंवा दी। उसे गंवाना ही था क्योंकि इससे पहले भी 1983 के विश्व कप क्रिकेट कप के बाद ऐसा ही हुआ था जब वेस्ट इंडीज ने उसे रंगड़ दिया था। कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि विश्व कप जीतने के बाद अपने यहां लोग ज्यादा दीवाने हो जाते हैं कि वह ज्यादा आशा करते हैं तो खिलाड़ी कमाकर सुस्ताने लग जाते हैं। फिर सट्टेबाज भी कमाने लग जाते है क्योंकि टीम की जीत से ज्यादा हारने पर उनको कमाई होती है। इधर अन्ना साहेब अनशन के दौरान अपना स्वास्थ्य खोकर अपने गांव में एकांत साधना कर रहे हैं। वह जल्दी स्वस्थ हों यह हमार कामना है। जिस तरह वह अपने अनशन के दूसरे दौर में व्यस्त उसे देखकर नहीं लगता था कि जिस टीम की जीत पर उत्साहित होकर उन्होंने अपना पहले दौर का अनशन शुरु किया था वह दूसरे दौर से पहले ही बुरी तरह अपनी इज्जत बर्बाद कर रही थी। भारत में दिखने वाला रत्न लंदन में कांच का टुकड़ा भर साबित हुआ। संभव है समय नहीं मिल पाया हो वरना वह दूसरे दौर का अनशन शुरु होने से पहले ही समाप्त करने की सोचते। उनका पुराना उत्साह समाप्त हो जाता।
        बहरहाल हम जैसे फोकटिया लेखकों के लिये इस समय शून्यकाल की स्थिति है क्योंकि अन्ना साहेब के अनशन पर टीवी देखते देखते थक गये। वैसे भी अनशन समाप्त होते ही अन्ना हजारे के अस्पताल जाने के बाद पूरे भारत में टीवी चैनलों की स्थिति दो दिन तक इस तरह रही जैसे कि बारात वापस होते ही जनवासे की होती है। देश के लोगों की स्थिति भी कई दिन की बारात से लौटने वाले बाराती की होती है। देश में दूसरी आज़ादी का जश्न मन गया तो अब यह सवाल भी उठने लगा है कि पहली आजादी भी क्या इसी तरह की रही थी। यहां ऐसी कौनसी ऐसी जनक्रांति हुई या उसकी संभावना बलवती हो उठी है जो हमें नहीं दिखाई देती। शायद फोकटिया लेखक है इसलिये प्रायोजित बुद्धिजीवियों से गहरा चिंतन और अंतदृष्टि हमारे अंदर न हो पर नासिर हुसैन के शब्द पर बहस में एक आदमी ने सवाल पूछा था कि ‘‘क्या किसी अंग्रेज खिलाड़ी पर किसी भारतीय उद्घोषक ने ऐसी टिप्पणी की होती तो! यकीन मानिए पहले तो ऐसा होना नहीं था। ऐसी दबंगी दिखाने का साहस वर्तमान में भारत के ही सक्रिय क्रिकेट उद्घोषकों में से किसी में है नहीं क्योंकि अंग्रेजियत की गुलामी जारी है पर ऐसा होता तो इंग्लैंड में तो दो तीन बार शोर मचता भारत में पहले ही दिन उसे लानतमलानत मिलना शुरु हो जाती। कहा जाता ‘‘क्यों रे तू गुलाम होकर साहबों को आंख दिखा रहा है।’
            वैसे क्रिकेट खेलना ही हमारी गुलामी का प्रमाण है। मतलब हमने अंग्रेजियत को जिंदा रखा और इसलिये अंग्रेज आज भी हमारे साहब हैं। सीधी बात कहें तो दूसरी आज़ादी के दावे ने पहली आजादी का सच उन लोगों को बता दिया जो उस समय पैदा नहीं हुए थे। जिस तरह अंग्रेज बीसीसीआई की टीम को कभी कायर कुत्ता तो कभी गधा कर रहे हैं और कोई प्रतिवाद नहीं है। अन्ना साहेब और क्रिकेट दोनों पर इस तरह लिखना अजीब लगा पर कि अपने जेहन में दोनों बातें जिस तरह चल रही हैं उसे बिना किसी योजना के लिखकर फिलहाल तो अपने मन को उबारने के अलावा कोई मार्ग नहीं था। हमें पहली बार पता लगा कि गधे क्रिकेट भी खेलते हैं तब इस तरह व्यंग्य लिखना ही था खासतौर से तब गधा कैच नहीं पकड़ता बोझा ढोता है और अधिक होने पर उसे कभी गिराता नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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8/26/11

भ्रष्टाचार पर निबंध-हिन्दी हास्य कविता (essay on corruption or bhrashtachar par nibandh-hindi hasya kavita)

पोते ने दादा से कहा
‘‘कक्षा की हिन्दी शिक्षिका ने
सभी विद्यार्थियों  घर से
भ्रष्टाचार पर निबंध लिखने को कहा है,
आप जरा मदद करो
कुछ जोरदार तर्क भरो
ताकि मेरी श्रेणी सुधर जाये
वरना मैंने फिसड्डी होने का दर्द बहुत सहा है,
पहले तो मेरे यही समझ में नहीं आता कि
भ्रष्टाचार होता किस तरह है,
सभी चेहरे ईमानदार दिखते
फिर बेईमानी होने की क्या वजह है,
आप तो अनेक बार आंदोलन कर चुके हैं,
कई बार अनशन तो हड़ताल कर
इतिहास में अपना नाम भर चुके हैं,
इसलिये भ्रष्टाचार पर निबंध जोरदार लिखायें,
पहले मुझे बाद में समाज के मार्ग दिखायें।’’
सुनकर बोले दादाजी
‘‘बेटा,
कल चलना मेरे साथ स्कूल,
तुम्हारी शिक्षिका को समझाऊंगा
भ्रष्टाचार पर निबंध लिखवाने की बात जायेगी भूल,
तुम चाहे तो अब भी अनशन करा लो,
नौकरी अब करता नहीं
इसलिये सुबह दूध सब्जी लाने के काम से
चाहे हड़ताल धरा लो,
मगर यह भंष्टाचार पर निबंध लिखने में
मदद की बात सोचना भी नहीं,
इस पर पूरा पुराण लिखना पड़ेगा
अपने सिर के बाल नौचना न पड़ें कहीं,
वैसे तुम्हारी शिक्षिका को समझाऊंगा
इस बालपन में भला
हमारे बच्चों को भ्रष्टाचार के विषय से
अवगत क्यों करा रही हो,
सीख जायेंगे सब कुछ
जब बड़े ओहदे पर पहुंच जायेंगे,
नहीं पहुंचे तो भी
इसके परिणाम जरूर समझ पायेंगे,
बड़े बड़े लोग माथापच्ची कर भी
भ्रष्टाचार के आगे हार जाते हैं,
जेब सबसे अधिक वही भरते

जो बहसों में ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं,
हिन्दी में ईमानदारी और नैतिकता पाठ
कभी न पढ़ायें,
भ्रष्टाचार जैसे विषय पर
हमारे बच्चों का खून अभी से न जलाये
बड़े होकर वैसे भी भ्रष्टाचार पर बहस करेंगे,
कहीं देखेंगे फिल्म, कहीं  कविता कहेंगे,
इससे अच्छा तो शीला की जवानी को इंगित करती,
बदनाम मुन्नी के नाम में प्रतिष्ठा भरती,
कविता इनको लिखना सिखायें,
संभव है कुछ बालक
भविष्य में हास्य कवि होकर आपका नाम
गुरु के रूप में रौशन कर दिखायें।’’
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