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10/21/09

अनोखे पुरस्कार-हिंदी हास्य व्यंग्य (anokhe purskar-hindi hasya vyangya)

समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की उपस्थिति देखकर गिनती की। आठवां सदस्य सचिव लेखपालक गायब था। उन्होंने कहा‘-यह सचिव लेखपालक हमेशा ही देर से आता है। सारा हिसाब किताब उसके पास है और उसके बिना यहां चर्चा नहीं हो सकती।’
सामने बैठे सभी सातों सदस्य एकटक उनकी तरफ देख रहे थे। समाज सेवाध्यक्ष जी उठे और बैठक कक्ष में ही टहलने लगे। फिर कुछ कहने लगे। मौजूद सदस्य यह नहीं समझ पा रहे थे कि वह अपने से बात कर रहे हैं या उनसे। अलबत्ता उनके शब्द सभी को साफ सुनाई दे रहे थे।
वह कह रहे थे कि ‘इस बार हमने सूखा राहत और बाढ़ बचाव में अपना काम कर यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी इस संस्था की भूमिका समाज सेवा के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है...............’’
इससे पहले वह कुछ आगे बोलें एक सदस्य ने यह सिद्ध करने के लिये कि वह भी बोलना जानते हैं, उनकी बात पूरी होने से पहले ही अपनी बात कही-’पर साहब, यह तो पुरस्कार समिति की बैठक है!’
इससे पहले कि समाज सेवाध्यक्ष कुछ कहते एक दूसरे सदस्य ने भी यह सिद्ध करने के लिये कि वह बहस भी कर सकता है, उस सदस्य को फटकारा-‘अरे, कैसी बेवकूफी वाली बात करते हो। चाहे बाढ़ हो या अकाल, काम तो अपनी समिति ही करती है जिसके सदस्य तो हम आठ और नौवें साहब हैं। हमारा काम क्या है, केवल चंदा उगाहना और अपनी समाज सेवा के रूप में उसे बांटने में कलाकारी दिखाना। साहब को बोलने दो, बीच में बोलकर उनकी चिंतन प्रक्रिया को भंग मत करो।’
समाज सेवाध्यक्ष ने दूसरे को डांटा-‘यह बांटने में कलाकारी वाली बात इतनी जोर से मत कहो। दीवारों के भी कान होते हैं।
बैठक में सन्नाटा छा गया। थोड़ी देर बाद समाज सेवाध्यक्ष कुर्सी पर विराजे और बोले-‘‘इस बार हमनें खास ढंग के पुरस्कार बांटने की घोषणा की थी ताकि उसके लिये स्वप्रायोजक मिलें या फिर कोई प्रायोजक पकड़ कर इनाम लेने आयें। लगता है कि बाढ़ और अकाल में काम का प्रचार ढंग से नहीं हुआ। वैसे अखबारों में धन और अन्न लेने वाले पीड़ितों के हमने इधर उधर से फोटो जुगाड़ने में बहुत मेहनत की। उनके प्रचार पर कुछ पैसा भी खर्च हुआ लगता है उसका परिणाम नहीं निकला।’
तीसरा सदस्य बोला-‘आजकल लोगों में दया धर्म कम हो गया है। ढंग से चंदा भी नहीं देते। हिसाब मांगते हैं। हम तो कह देते हैं कि हम तो चंदा लेकर तुम्हें दान का पुण्य दे रहे हैं वरना खुद कर देख लो हमारे जैसी समाज सेवा।’
एक अन्य सदस्य ने उसे फटकारा-‘कमबख्त, तुम कहां चंदा मांगने जाते हो? बस, प्रचार सचिव के नाम पर इधर उधर पर्चे बांटते हो। तुम्हारा काम इतना खराब है जिसकी वजह से लोगों को हमारी कार्य प्र्रगति की जानकारी नहीं मिल पाती।’
एक अन्य सदस्य को उसकी बात समझ में नहीं आयी तो बोल पड़ा-‘हम काम कौनसा करते हैं जिसकी जानकारी लोगों को मिले। बस काम का प्रचार है, वह भी यह ढंग से नहीं करता।’
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘खामोश हो जाओ, अपनी असलियत यहां क्यों बखान कर रहे हो। कोई सुन लेगा तो! फिर आजकल स्टिंग आपरेशन भी हो जाते हैं। हमारी संस्था की कमाई देखकर बहुत से लोग हमारे पीछे पड़े हैं। इसलिये अब सोच समझकर बोला करो। यहां ही नहीं बाहर भी ऐसी आदत डाल दो।’
इतने में सचिव लेखपालक आ गया। उसे देखते ही समाज सेवाध्यक्ष बोले-‘यह आने का समय है? कहां चले गये थे?’
सचिव लेखपालक बोला-‘सारा काम तो मुझे ही करना पड़ता है, आप तो सभी केवल देखते हो। इस साल पुरस्कार देने के लिये जुगाड़ लगाना था। इसके लिये दो तीन लोगों से बात कर ली है। कार्यक्रम का खर्च, उनको दिये जाने वाला उपहार और अपने लिये कमीशन का जुगाड़ लगाना था। फिर पुरस्कार के नाम पर चंदा भी लेना है। इसके लिये कुछ लोगों को ‘समाज सेवा’ के लिये सम्मान देना था।’
एक सदस्य चिल्लाया-‘नहीं! समाज सेवा का पुरस्कार हम देंगे तो फिर हमारी समाज सेवा की क्या इज्जत रह जायेगी।’
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘हम यहां समाज सेवा की बात नहीं कर रहे पुरस्कार देकर प्रोत्साहन देने वाला काम रहे हैं। समाज सेवा के लिये एक पुरस्कार अपने सचिव और प्रचार सचिव को भी देंगे। कौन रोकड़ा देना है? देंगे तो आयेगा तो अपने पास ही। आगे बोलो।’
सचिव ने कहा-‘इस बार हथेली पर सरसों जमाने और बबूल बोकर आम उगाने के लिये अनोखे पुरस्कार दिये जायेंगे।’
एक सदस्य के मूंह से चीख निकल गयी-‘पर यह तो कभी हो ही नहीं सकता। बरसों पुरानी कहावत है।’
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? वह लोग बड़ी संस्थाओं का प्रमाणपत्र ले आयेंगे जो यहां उपस्थित सभी दर्शकों को दिखाये जायेंगे।’
एक अन्य सदस्य ने कहा-‘पर वह संस्थायें कौनसी होंगी। पता करना असली है कि नकली।’
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? अरे, जब हम किसी से हाथ में हजार का नोट लेते हैं तो क्या पहचान पाते हैं कि वह असली है या नकली! यहां किसको फुर्सत रखी है कि यह जानने का प्रयास करे कि ऐसा प्रमाण पत्र देने वाली संस्थायें असली हैं या नकली। बस, इतना पता है कि जिन लोगों ने इसके लिये पुरस्कार मांगे हैं उनमें एक स्व प्रयोजक है और दूसरे का प्रायोजन एक ऐसा आदमी कर रहा है जिसे पुरस्कार लेने वाले से भारी राशि कर्जे के रूप में लेनी है जिसे वह कभी चुकायेगा नहीं। समझे! बाकी पुरस्कार तो समाज सेवियों के हैं जो बिचारे अपने घर से बाहर कभी सोच भी नहीं पाते पर उनको अपने घर की महिलाओं पर रौब गालिब करना है।’
सभी सोच में पड़ गये तक समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘तुम सभी को संाप क्यों सूंघ गया। सचिव लेखपालक ने जो प्रस्ताव रखा है वह भी कम अनोखा नहीं है। बजाओ तालियां।’
सभी लोगों ने सहमति में अपनी तालियां बजायीं।


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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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3/23/08

अमेरिका विरोध का तार्किक आधार क्या है?

भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग हमेशा अमेरिका का विरोध करता है और उसके तर्क हमेशा ही खोखले होते हैं। अमेरिका ने अमुक देश पर हमला किया और अमुक देश में वह दखल दे रहा है। वह एक पूंजीवादी देश है अपनी दादागीरी दिखाता है आदि-आदि तमाम तरह के तर्क देकर लोग उसका विरोध करते हैं। आजकल मध्य एशिया में उसकी उपस्थिति को मुद्दा बनाकर उसका विरोध हो रहा है।

मैं कोई अमेरिका का समर्थक नहीं हूँ और न ही उसका साथ भारत के राजनीतिक संबंधों का विश्लेषण कर रहा हूँ। मेरा इरादा तो अमेरिका के साथ सामाजिक, साँस्कृतिक और आर्थिक संबधों पर दृष्टिपात करना है जिसके कारण आज भी अनेक बुद्धिजीवियों के दुष्प्रचार के बावजूद इस देश के आम नागरिकों में अमेरिका की खराब छवि नहीं बन पायी है। अधिकतर उच्च शिक्षा प्राप्त लोग वहाँ जाकर रोजगार प्राप्त करने का सपना संजोये हुए रहते हैं।
अमेरिकी समाज खुलेपन का समर्थक है। वहाँ धर्म, जाति और भाषा के नाम पर कोई बन्धन नागरिकों पर जबरन थोपा नहीं जाता। वहाँ की व्यवस्था उदारीकरण की पोषक है। वह अपने यहाँ किसी संस्कृति और धर्म की आगमन पर विचलित नहीं होते। सबसे बड़ी बात भारत से गए लोगों को वहाँ आर्थिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और साँस्कृतिक क्षेत्र में अपना मुकाम बनाने में जो सफलता मिली वह कहीं और नहीं मिली। अमेरिका का विरोध करने वाले किसी और देश का नाम बताएं तो जाने-हाँ ब्रिटेन और पश्चिमी रास्त्रों में कुछ लोगों को सफलता मिली है पर वह भी एक पश्चिमी राष्ट्र है और अमेरिका से उसका गठबंधन है। इसका अलावा अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्र कभी किसी पर अपनी संस्कृति थोपते नहीं है जबकि मध्य एशिया के राष्ट्र अपने राज्य की ताकत का उपयोग इसके लिए करते हैं। किसी दूसरे की संस्कृति न पनप सके इसलिए लिए कानून बना रखे हैं। आज हम अपने देश में जो पाश्चात्य सभ्यता फैलती देख रहे हैं वह लोगों की स्वेच्छा से फ़ैल रही है न कि कोई उन पर दबाव डाल रहा है।

कहने को मध्य एशिया में भारतीय भी बहुत हैं पर क्या वह अमेरिका की तरह खुली हवा में साँस ले पा रहे हैं? उस दिन मैं एक अख़बार में एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इजरायल के साथ मध्य एशिया के अन्य राष्ट्रों पर धर्म के आधार पर आतंकवाद बढाने का आरोप लगाया गया था। अमेरिका अपने यहाँ हमले के बाद आतंकवाद से लड़ रहा है। उसमें शक्ति है और वह अपने दुश्मनों को निपटा रहा है-अपने दुश्मन को निपटाने के लिए किसी को कहीं भी हमला करने का अधिकार है।
हमारे दर्शन के अनुसार राजनीति में अपने देश के प्रजा की रक्षा के लिए सजग रहते हुए साम,दाम, दंड और भेद चारों नीतियों को अपनाना चाहिए।हमारे दर्शन में व्यक्ति को अहिंसा की मार्ग पर चलने के लिए कहा जाता है पर राज्य को अपने शत्रु पर हमला कर उससे प्रजा और उसके धर्म की रक्षा का सन्देश भी उसमें है। कहने से सब अहिंसक और मानवतावादी नहीं हो जाते इसलिए राज्य और राजा को अपनी प्रजा की रक्षा के लिए हिंसा करनी ही पड़ती है। जिन विद्वानों ने लोगों को अहिंसक रहने का उपदेश दिया है उन्होने ही अपने देश की गुप्तचर व्यवस्था और सेना को मजबूत रखने का विचार दिया है। अपने गुप्तचरों के द्वारा शत्रु राष्ट्र की निगरानी करने का भी विचार दिया है।

अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और उसे अहंकार है-यह मान लिया पर कहीं मानवाधिकारों का उल्लंघन का जिस ताकत से वह मामला उठाता है कोई अन्य नहीं उठता। वह जिन राष्ट्रों के खिलाफ लड़ रहा है मानवाधिकारों के मामले में उनका रिकार्ड बहुत खराब है।कहने को अमेरिका हमारे से दूर है पर हमारे आसपास पडोसी देश अपने यहाँ मानवाधिकारों का जिस तरह उल्लंघन कर रहे हैं उस पर भी वह उन देशों को धमकाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप किसी व्यक्ति को अहिंसा के मार्ग पर चलने और साधू की तरह रहने के लिया प्रेरित किया जा सकता है पर किसी देश के राज्य प्रमुख को ऐसा सन्देश नहीं दिया जा सकता है। अमेरिका भारत का मित्र देश इसलिए है क्योंकि भारत उसके हितों को हानि नहीं पहुंचता जो उसका हानि पहुँचाते हैं उनको वह छोड़ता नहीं है। वह किसी का मित्र नहीं है उसके मित्र है अपने हित और जब उनको हानि नहीं पहुंचा सकते और ऐसा करने से हमारे देश को कोई लाभ नहीं है तो उसके साथ संबंधों में दूरी क्यों बनायी जाये? इसके साथ वह जिन देशों से लड़ रहा है क्या वह हमारे वास्तव में मित्र हैं या दिखावा करते हैं-यह देखकर ही अमेरिका का विरोध किया जा सकता है। अमेरिका के विरोध का कोई ठोस तार्किक आधार यहाँ के लोगों को समझ में नहीं आता। वैसे भी कौटिल्य के अर्थशास्त्र कि अनुसार अपने से संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र से संधि कर लेना चाहिऐ - क्या यह अमेरिका से मित्रता करने में लागू नहीं होता? अगर नहीं तो उसके ठोस विरोध का आधार क्या है? उसमें यह भी बताना चाहिए कि वह भारत को आगे किस तरह से हानि पहुंचा सकता है?

9/1/07

कौटिल्य अर्थशास्त्र:राजा को विनम्र होना चाहिए

  1. राज्य प्रमुख अगर विधान के अनुसार अपराधियों को दण्ड और संमार्गियों को सम्मान देता है और शत्रुओं से प्रजा के रक्षा करता है तो प्रजा भी धन-धान्य और प्रान प्रण से राज्य की संपत्ति बढाती है। जो ऐसा नहीं करता उस राज्य प्रमुख का भला नहीं होता।
  2. जब राज्य प्रमुख न्याय परायण होता है तभी वह अपने प्रजा को त्रिवर्ग अर्थ, धर्म काम का साधन करा सकता है, अन्यथा अवश्य ही वह त्रिवर्ग का नाशक होता है।
  3. धर्म की सहायता से विधर्मी राज्य प्रमुख ने भी चिरकाल तक पृथ्वी को भोगा है और अधर्म करने वाला राज्य प्रमुख शीघ्र नष्ट हो जाता है।
  4. विनय (विनम्रता) से ही इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की जाती है। विनय से युक्त पुरुष ही शास्त्र को प्राप्त होता है। इसमें निष्ठा करने के उपरांत ही संपूर्ण शास्त्रों के अर्थ प्रकट हुए हैं
  5. राज्य प्रमुख के लिए यही उचित है प्रथम तो स्वंय के अन्दर विनय का भाव स्थापित करे, फिर अपने मंत्री, भृत्य , अपने परिवार और उसके पश्चात प्रजा में उसे स्थापित करे।
  6. बडे जटिल, विषयरूपी अरण्य में दौड़ते हुए मन को मथने वाले इन्द्रियरुप हाथी को ज्ञानरूपी अंकुश से वशीभूत करना चाहिए।
  7. अपने प्रयत्न से ही मन अर्थों से रहित होकर व्यक्ति अचल होता है। आत्मा और मन के संयोग से ही कार्य की संपूर्ण प्रवृत्ति प्रगट होती है।

मनु स्मृति:आग और पानी की पवित्रता बनाए रखें

  1. आग को मुहँ से नहीं फूंकना चाहिए। आग में मल-मूत्र नहीं फैंकना चाहिए तथा आग के सामने पैर रखकर तापना नहीं चाहिए।
  2. आग को किसी तरह के सामान (जैसे-मेज, कुर्सी, पलंग आदि) के नीचे नहीं रखना चाहिए, न आग को लांघना चाहिए और न ही कोइ ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे जीव हिंसा का भय हो।
  3. जो आग सूरज, चांद ,पानी मनुष्य, गाय और हवा के सामने मल-मूत्र का त्याग करता है उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है।
  4. संध्याकाळ में भोजन भक्षण, यात्रा और विश्राम नहीं करना चाहिए और अपने गले में पहने हुई माला को नहीं उतरना चाहिऐ।
  5. जल में मल -मूत्र, कूडा,रक्त तथा विष आदि नहीं बहाना चाहिए, इससे पानी प्रदूषित हो जाता है, पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
  6. बद्धिमान व्यक्ति पानी पीती गाय को न तो स्वयं हांकते हैं न किसी को हांकने के लिए कहते हैं।
  7. चिकनाई निकाले गए पदार्थों का भोजन नहीं करना चाहिऐ, कई बार पेट भरकर भोजन नहीं करना चाहिए, बहुत सवेरे अथवा शाम हो जाने पर भोजन नहीं करना चाहिए। प्रात:काल भर पेट भोजन से तृप्त होने के बाद पुन: शाम को भोजन नहीं करना चाहिऐ।

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