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9/17/13

जिंदगी सस्ती जीना महंगा-हिन्दी व्यंग्य कविता (zinagi sasti zeena mahanga-hindi vyangya kavita)




जरूरत की चीजें महंगी हो गयी
जिंदगी सस्ती होती जा रही है,
तरक्की का पैमाना है महंगाई
क्या उन्होंने खूब कहीं है,
बैठकर वातानुकूलित कक्षों में
आम इंसानों की रोज की जिंदगी का हिसाब
लिख रहे हैं वह लोग
जिन्होंने कभी तकलीफ नहीं सही है।
कहें दीपक बापू
पढ़ते हैं रोज अखबार,
बेगाना लगता है अपना ही घरबार,
कोई बना रहा है योजना
कोई बेच रहा है सपना
कोई वादे बांट रहा है,
आम इंसानों को बहलाने के
नये नये तरीके छांट रहा है,
हम भी मानते हैं
रोटी का भूख से
पानी का प्यास से
गरीब का दौलत की आस से
कोई रिश्ता नहंी है,
सच यह भी है कि इनके बिना
आदमी जिंदगी की चक्की में पिसता यहीं है,
मुश्किल यह है कि
जीना हो रहा है महंगा
जिंदगी सस्ती हो रही है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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9/10/13

आओ, हिन्दी दिवस मनायें-हिन्दी दिवस पर विशेष हास्य व्यंग्य(aao hindi diwas manayen-hindi divas par vishesh hasya vyangya rachna)



        दीपक बापू ने जब सुबह देखा कि आज 14 सितंबर हिन्दी दिवस है तब एक नये सफेद कपड़े-धोती, कुर्ता और टोपी-पहनकर घर से बाहर निकले। जेब में एक लघु साहित्यक पत्रिका  में अपनी रचनायें प्रकाशित करने के लिये अपनी दो कवितायें जेब में डालीं और चौड़ी सड़क पर फुटपाथ अपने पांव बढ़ाने लगे।  मन ही मन सोच रहे थे कि चलो बड़ी पत्रिकाओं में छप नहीं सकते क्यों न एक लघु साहित्यक पत्रिका को अपनी कविताओं का दान कर हिन्दी दिवस मनायें।  वहां का संपादक छापे या नहीं उसकी मर्जी, अपना तो कर्तव्य करना ही चाहिये।
        वह मस्ती से फुटपाथ पर चले जा रहे थे। रास्ते में एक काईयों का सभागार पड़ता था। उन्होंने तय किया था कि उसकी तरफ देखेंगे भी नहीं। जब उस काईयां सभागार का दरवाजा आया तो उन्होंने अपना मुंह फेर लिया-अपनी नाकामी का सबसे यही श्रेष्ठ तरीका भी है कि जो पंसद न हो उसकी उपेक्षा कर दो।  अचानक अंदर से आवाज आई-‘‘ओए, फ्लाप कवि! तू यहां कैसे आ गया?
                        दीपक बापू को काटो तो खून नहीं। उन्होंने अपना मुंह गेट की तरफ किया तो देखा आलोचक महाराज खड़े थे।  एक दम सफेद चिकना चूड़ीदार पायजामा और कुर्ता पहने थे। गले में सोने की चेन और मुंह में पान था।  दीपक बापू हैरान रह गये। एक तो काईयों के  सभागार से चिढ़ तिस पर पुराने बैरी का मिलना उनके लिये हिन्दी दिवस के अवसर भारी अपशकुन जैसा था।
                        उन्होंने आलोचक महाराज से कहा-‘‘महाराज, हम यहां आ नहीं रहे। गुजर कर जा रहे हैं। आप यहां कैसे?
                        आलोचक महाराज ने पास जाकर एक जगह पान की पीक को थूका और फिर वापस आकर बोले-दिख नहीं रहा। यह इतना बड़ा बैनर टंगा है हिन्दी दिवस पर महासम्मेलन  अब यह बताओ इस शहर में हमारे बिना कोई हिन्दी का कार्यक्रम हो सकता है। कोई वरिष्ठ लेखक या कवि ऐसा नहंी है जो हमारे बिना यहां किसी बड़े अखबार में अपना कविता छोड़िये क्षणिका  तक छपवा सके। फिर यह कैसे संभव है कि हिन्दी दिवस पर कोई हमारे बिना कार्यक्रम हो जाये।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘आपका कहना सही है। आपकी कृपा नहीं हुई तो हम यहां फ्लाप कवि माने जाते हैं।  बहुत प्रयास किया कि आप हमारी कवितायें को बड़े पत्र पत्रिकाओं में  प्रकाशित करने के लिये सिफारिश करें।  कितनी बार चाय पिलाई, पान खिलाया और कितनी बार तो ठंडा पेय भी आपकी सेवा में प्रस्तुत किया। छोटे मोटे पत्र और पत्रिकाओं में छपवाने के अलावा कोई अन्य सहायता नहीं दी।  बड़े प्रकाशन तो हमसे मुंहफेरे ही रहे।
                        आलोचक महाराज बोले-सस्ती सेवा की वैसा ही मेवा मिला।  अगर दारु, मांस तथा खाने का इंतजाम किया होता तो तुम्हें कवि बना देते। अभी तुमने कहा कि तुम फ्लॉप कवि हो। किसी दूसरे से न कहना। हमारी रचनत्मक दृष्टि से तुम तो कवि ही नहीं हो।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज आप हिन्दी के बहुत बड़े ठेकेदार हैं। चलिये मान लेते हैं! वैसे आपका एक चेला आपको बदनाम कर रहा है कि आपने उसकी अनेक कवितायें चुराकर अपने नाम से छपवाईं।  उस दिन मिला था। हमने  उसे समझाया कि पानी में रहकर मगर से बैर नहीं किया जाता।
                        आलोचक महाराज आंखें फाड़कर गुस्से में बोले-‘‘अच्छा! तू हमें ठेकदार और मगर बोलकर एक ही पंक्ति में दो झटके दे रहा है।  समझ ले आज से हमने तुझे बैन कर दिया। अब तो तू छोटे पत्र पत्रिकाओं में  भीअपनी कवितायें नहीं छपवा सकता। वैसे तू जा कहां रहा है?
                        दीपक बापू बोले-‘‘में अमुक त्रैमासिक के लिये दो कवितायें लेकर  जा रहा हूं।
                      आलोचक महाराज बोले-‘‘यहा कौनसी पत्रिका है। जरा पता देना! देखता हूं कैसे छापता है?’’
                        दीपक बापू ने जेब से दो कविताओं के साथ बीस का नोट निकाला और बोले-‘‘महाराज, आप नहीं रोक पायेंगे। देखों यह चाय के लिये बीस का नोट भी साथ ले जा रहा हूं।’’
                        आलोचक महाराज-‘‘अमुक पत्रिका का संपादक इतना सस्ता है? मैं उसकी खबर लेता हूं। इतने सस्ते में कवितायें छापेगा तो क्या खाक इज्जत कमायेंगा,’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘नहीं महाराज! उस पत्रिका के बाहर एक होटल वाला है। उसके यहां दो चाय पीऊंगा। वह खुश होकर दोनो कवितायें छपवा देगा। एक चाय पी तो एक छपवायेगा।  इसलिये उसकी दुकान  दो तीन घंटे बैठना पड़ेगा। अच्छा, हम चलते हैं।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘सुनो! तुम बीस रुपये का खर्च क्यों करते हो? यहां कार्यक्रम में बैठकर हमारी संख्या बढ़ाओ। में तुम्हें आधा कप चाय भी पिलाऊगा और एक उबाऊ नाम की एक नयी पत्रिका है उसमें एक या दो नहीं बल्कि तीन कवितायें छपवा दूंगा।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, हम अंदर आने को तैयार हैं मगर  आप हमसे मंच पर एक कविता सुनाने का मौका दें।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘यह संभव नहीं है! तुम निकल लो यहां से।  पता लगा कि तुम्हारी कविता कहीं लोगों को पंसद आ गयी और धोखे से कहीं तुम्हें महाकवि मान  बैठे तो मेरी साहित्यक दुकान ही बदं हो जायेगी। मेरे बहुत से मशहूर कवि चेले मुझसे नाराज हो जायेंगे। तुमने ही कहा था कि हम हिन्दी के ठेकेदार हैं। बरसों से यह काम कर रहे हैं। हम किसी ऐसे कवि या लेखक को पनपने का मौका नहीं दे सकते जो हमारे नियंत्रण से बाहर हो। तुम इसी तरह के आदमी हो।’’
                        दीपक बापू हंसकर बोले-‘‘ठीक है। चलता हूं।’’
                  आलोचक महाराज बोले-‘‘ऐसा करो। तुम दस श्रोंता ढूंढकर लाओ। मै तुम्हें एक क्षणिका सुनाने का अवसर दूंगा।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, आपके पास श्रोताओं की क्या कमी है? हमं देख रहे हैं, उधर आठ दस लोग खड़े हैं।  अंदर दूसरे लोग  भी कार्यक्रम प्रांरभ होने की प्रतीक्षा कर रहे होंगे।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘इनमें कोई श्रोता या दर्शक नहीं है।  इनमें कुछ कवि, लेखक और संपादक हैं तो एक विशिष्ट माननीय अतिथि हैं। श्रोता और दर्शकों का इंतजार हो रहा है। तुम ऐसा करो किसी भीड़ एकत्रित करने वाले आदमी को जानते हो तो  उससे सौ पचास श्रोता और दर्शक किराये पर ले आओ। हम सभी के लिये एक एक बिस्किट और आधी कप चाय का भी इंतजाम करेंगे।  तुम अगर यह काम कर सको तो तुम्हारे लिये एक नहीं दो क्षणिकायें सुनाने के अवसर का इंतजाम कर दूंगा। पूरी कविता का समय किसी हालत में नहीं दे सकता।’’
                        दीपक बापू ने कुछ सोचा और बोले-‘‘अच्छा अभी आता हूं।’’
                       दीपक बापू सोच रहे थे कि उन्होंने जो निश्चय किया है वह शायद आलोचक महाराज नहीं जानते। यह उनकी गलतफहमी थी।  दोनों जानते थे कि उस दिन अब उनकी मुलाकात नहीं होने वाली  थी।
                        दीपक बापू थोड़ा आगे बढ़े तो फंदेबाज मिल गया।  दीपक बापू उसे देखते ही बोले-‘‘पता नहीं, आज हिन्दी दिवस पर किसका मुंह देखकर हम घर से निकले थे। पहले आलोचक महाराज मिले।  उनसे पीछा छुड़कार अभी सांस भी नहीं ली कि  अब तुम मिल गये। यह दोनों अपशकुन हुए हैं और अब मुझे दूसरे मार्ग से घर वापस जाना चाहिये।’’
                        फंदेबाज बोला-‘‘आपने मेरी तुलना आलोचक महाराज जैसे आदमी से की हिन्दी दिवस के दिन आपकी इस टिप्पणी पर मुझे बहुत दुःख है।  उसने आपकी रचनाओं को कई जगह छपने नहीं दिया और मैं आपकी हाथ से रची गयी अनेक हास्य कविताओं का जन्मदाता हूं।  क्या मुझे पता नहीं है आप सड़ी गली पत्रिकाओं में मेरा नाम लेकर हास्य कवितायें लिखते हो। मैं तो इज्जत से आपको फ्लाप कवि कहता हूं जबकि दूसरे लोग फूहड़ कवि कहते हैं।  अच्छा आप जा कहां रहें हैं़?’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘अमुक पत्रिका के दफ्तर जा रहा हूं। वहां दो कवितायें देनी हैं।’’
                        फंदेबाज बोला-चलो मैं भी साथ चलता हूं। मैं अभी’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘चलो! एक से भले दो। वैसे भी वहां होटल में मुझे दो चाय अकेले पीनी पड़ती। अब तुम  मेरे साथ एक चाय पी लेना तो दूसरी पीने की झंझट से मैं बच जाऊंगा। उस होटल वाले ने चाय पीने की संख्या के हिसाब से कवितायें छपवाने का वादा किया है।’’
                        फंदेबाज बोला-ःवह होटल वाला तो बंद है।  मैं भी उसकी दुकान पर चाय पीने गया था पर पता लगा कि आज उसके पास दूध नहीं आया तो बंद करके चला गया।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘यही होना था! मैंने पहले आलोचक महाराज और फिर तुम्हें देखा तो मुझे शक हो गया  था कि आज कुछ अच्छा नहीं होने वाला।  चलो दूसरे मार्ग से घर चलते हैं।  अब वहां चलकर तुम्हें चाय पिलाते हैं। तुमसे बातचीत में हो सकता है कि कोई ऐसी हास्य कविता हाथ लग जाये जो हमें राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कर सके। उम्मीद पर आसमान टिका है और उसके नीचे खड़े हैं।  वह हम पर नहीं गिरेगा यह तय है।
                        दोनों वहां से चल पड़े।  दीपक बापू के हिन्दी दिवस की चिंदी चिंदी हो चुकी थी।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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7/25/13

कोई कोई होता है योगी-हिन्दी कविता (koyee koyee hota hia yogi-hindi poem or kavita)




भूखे हो तो रोटी
खुद तुम्हें जुटानी होगी,
बीमार हो तो तुम्हें अपनी दवा
खुद जुटानी होगी,
अगर घर से निकले बाहर
अपनी जरूरत पूरी करने के वास्ते,
ख्वाबों का बाज़ार सजा मिलेगा पूरे रास्ते,
सौदागरों को पैसा दो या बेचो पसीना
कोई तुम्हारा मालिक नहीं है
सभी हैं खून के भोगी।
कहें दीपक बापू
कोई नारे लगा रहा है,
कोई कागज पर शब्द नचा रहा है,
ज़माने का भला करने के लिये
जुलूस रोज निकल रहे हैं,
जिन्होंने कभी झंडे उठाकर
शिखरों पर सजा दिये बुत
खाली हाथ रहे उनके
दिल अभी तक जल रहे हैं,
न लूटे पैसा,
न मांगे पसीना,
न कभी खून चूसे
दर्द दूर करे सभी का
ऐसा होता है सदियों में कोई योगी।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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8/13/12

इंसान और अफसोस-हिन्दी कविता (insan ka fasos-hindi poem or kavita)


मिट्टी से बना इंसान
रात और दिन में चलता बुत की तरह
कोई उनमें शाह नहीं होता,
समंदर जैसी लहरें उठती हैं मन में
पर पिंजरे में बंद है, वह अथाह नहीं होता,
कहें दीपक बापू
भलाई बेच रहे लोग
अपना घर भरने के लिये
महफिलों में गरीबी पर  अफसोस के सुर
गाये जाते मजे के लिये
मगर गरीब का कोई हमराह नहीं होता।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ग्वालियर


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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9/1/11

क्रिकेट मैच में गधे कब से आ गये-हिन्दी व्यंग्य (gadha or donkey when playing cricket match-hindi vyangya

             इंग्लैंड के पूर्व कप्तान ने नासिर हुसैन ने टीवी पर भारत तथा इंग्लैंड के आंखों देखा हाल (रनिंग कमेंट्री) प्रसारित करते समय अपने श्रीमुख से कह डाला कि ‘भारतीय टीम में अच्छे क्षेत्ररक्षक हैं पर उसमें एक दो गधे हैं।’’ यह बात उन्होंने एक अंग्रेज बल्लेबाज का कैच बीसीसीआई की टीम के एक क्षेत्ररक्षक के हाथ से छूटने पर कही। दरअसल अगर उन्होंने पूरी टीम को गधा कहा होता तो शायद विरोधात्मक होकर अपनी कहते पर उन्होंने एक मासूम खिलाड़ी के कैच छोड़ने पर यह बात कही जो कि कथित रूप से एक महान खिलाड़ी को शोभा नहीं देता। एक नये खिलाड़ी के अपमान से दुःख हुआ है। हम यह दावा करते हैं कि ऐसा कतई नहीं हुआ होगा कि नासिर हुसैन ने अपने जीवन में कम से कम तीन बार कैच न छोड़ा हो। दक्षिण अफ्रीका के जोंटी रोड्स को अब तक दुनियां का सर्वश्रंष्ठ क्षेत्ररक्षक माना जाता है और हमने उनको कम से दो हाथ में आते हुए आते कैच छोड़ते देखा है तब यह नासिर हुसैन क्या चीज है। दरअसल पकड़े गये कैच आंकड़ों मेें जुड़ते हैं मगर छूटे कैचों की चर्चा कहंी नहीं होती। इसलिये किसी एक खिलाड़ी से एक दो बार ऐसी गलती होने पर इस तरह बोलना गलत है।
          बहरहाल इस पर हायतौब्बा मच गया है। अपना इसमें साफ मानना है कि क्रिकेट बाज़ार का खेल है जिसमें सब पैसे का काम है। आंखों देखा हाल का प्रसारण कमाई के लिये है तो उससे जुड़े पुराने क्रिकेट खिलाड़ी भी पैसा कमाने ही आते हैं। वह भी उसी विश्व समुदाय का हिस्सा है जो सनसनी चाहते हैं। इसलिये जिसे अवसर मिलता है वह सनसनी फैलाता है और बाज़ार के सौदागरों के विज्ञापन चलते रहें इस हेतु सक्रिय प्रचार माध्यमों को ऐसी सामग्री प्रदान करता है जो समाचार के साथ ही बहस के लिये भी उपयुक्त हो। बल्ला, बॉल और बकवास मिलकर बाज़ार के लिये कमाई का काम करते हैं। मैच का प्रयोजक बाज़ार, खिलाड़ियों का रहनुमा बाज़ार, और नासिर हुसैन भी बाज़ार का ही पुराना मॉडल खिलाड़ी-जो पहले खेलता था अब आंखों देखा हाल में अपने श्रीवचन प्रस्तुत करने लगा है। इसी श्रीवचन में एक शब्द शामिल हो गया गधा। बहस होगी पर हम बोलेंगे नहीं क्योंकि यह बाज़ार का मामला है। यहां फिक्सिंग मिक्सिंग सब चलता है।
        हम जैसे लोग तो अब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों को तो खेल मानते ही नहीं बल्कि उससे बाज़ार का मनोरंजन व्यवसाय मानते है। क्रिकेट संगठनों की अपनी सल्तनत है। यह सल्तनत पैसे से बनी है। पैसा जनता है का है पर उसकी ताकत इतनी बड़ी है कि जनसंगठन भी खरीदे जा सकते हैं। स्थिति यह है कि क्रिकेट को देश का धर्म बताया जाने लगा है जिसके भगवान क्रिकेट खिलाड़ी है। पूरे विश्व के क्रिकेट संगठनों के अधिकारी इस तरह     कहते दिखते हैं कि अगर तुम्हें मनोरंजन करना है तो तुम उनको तुम पूजो वह हमें पूजेंगे। वह पूजेंगे तो तुम्हारा बाप भी हमें पूजेगा। जाओगे कहां, हमारे पास पास है इसलिये सभी जगह पर हमारा कब्जा है। सुबह अखबार के प्रथम पृष्ठ पर किसी क्रिकेट खिलाड़ी का फोटो देखोगे। समाचारों में पचास फीसदी का समय हमारा है। रैम्प पर हमारे खिलाड़ी चलते हैं। टीवी के मनोरंजन धारावाहिकों में मेहमान के रूप में भी उनको लायेंगे। तुम्हारी लाचारी है कि अगर मनोरंजन चाहते हो तो बस हमारी राह पर आओ।
      भारत देश की कोई क्रिकेट टीम है। कौन बनाता है? बीसीसीआई! बीसीसीआई पर किसका अंकुश है? बाज़ार का! बाज़ार पूरी दुनियां का बाप है तो फिर किसकी मजाल कि दुनियां में कोई खेल संगठन किसी देश के कानूनी संगठनों की इज्जत करे। अभी बीसीसीआई की क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीता। अपने यहां तो स्थिति यह हो गयी कि प्रसिद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे इतने उत्साहित हुए कि इस अवसर पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रारंभ कर बैठे। सात दिन तक चला। क्रिकेट की क्लब स्तरीय प्रतियोगिता आई पी एल प्रारंभ होने से एक दिन पहले ही वह खत्म हो गया। हमें शक हुआ कि कहीं अन्ना हजारे साहेब को ब्रेकिंग टाईम के लिये बाज़ार के प्रचार प्रबंधकों ने तो नहीं चुना।
             अन्ना साहेब फिर दोबारा अनशन पर लौटे। इसी दौरान बीसीसीआई की टीम ने जो विश्व कप में इज्जत कमाई थी वह इंग्लैंड में लगातार पांच मैच हारकर गंवा दी। उसे गंवाना ही था क्योंकि इससे पहले भी 1983 के विश्व कप क्रिकेट कप के बाद ऐसा ही हुआ था जब वेस्ट इंडीज ने उसे रंगड़ दिया था। कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि विश्व कप जीतने के बाद अपने यहां लोग ज्यादा दीवाने हो जाते हैं कि वह ज्यादा आशा करते हैं तो खिलाड़ी कमाकर सुस्ताने लग जाते हैं। फिर सट्टेबाज भी कमाने लग जाते है क्योंकि टीम की जीत से ज्यादा हारने पर उनको कमाई होती है। इधर अन्ना साहेब अनशन के दौरान अपना स्वास्थ्य खोकर अपने गांव में एकांत साधना कर रहे हैं। वह जल्दी स्वस्थ हों यह हमार कामना है। जिस तरह वह अपने अनशन के दूसरे दौर में व्यस्त उसे देखकर नहीं लगता था कि जिस टीम की जीत पर उत्साहित होकर उन्होंने अपना पहले दौर का अनशन शुरु किया था वह दूसरे दौर से पहले ही बुरी तरह अपनी इज्जत बर्बाद कर रही थी। भारत में दिखने वाला रत्न लंदन में कांच का टुकड़ा भर साबित हुआ। संभव है समय नहीं मिल पाया हो वरना वह दूसरे दौर का अनशन शुरु होने से पहले ही समाप्त करने की सोचते। उनका पुराना उत्साह समाप्त हो जाता।
        बहरहाल हम जैसे फोकटिया लेखकों के लिये इस समय शून्यकाल की स्थिति है क्योंकि अन्ना साहेब के अनशन पर टीवी देखते देखते थक गये। वैसे भी अनशन समाप्त होते ही अन्ना हजारे के अस्पताल जाने के बाद पूरे भारत में टीवी चैनलों की स्थिति दो दिन तक इस तरह रही जैसे कि बारात वापस होते ही जनवासे की होती है। देश के लोगों की स्थिति भी कई दिन की बारात से लौटने वाले बाराती की होती है। देश में दूसरी आज़ादी का जश्न मन गया तो अब यह सवाल भी उठने लगा है कि पहली आजादी भी क्या इसी तरह की रही थी। यहां ऐसी कौनसी ऐसी जनक्रांति हुई या उसकी संभावना बलवती हो उठी है जो हमें नहीं दिखाई देती। शायद फोकटिया लेखक है इसलिये प्रायोजित बुद्धिजीवियों से गहरा चिंतन और अंतदृष्टि हमारे अंदर न हो पर नासिर हुसैन के शब्द पर बहस में एक आदमी ने सवाल पूछा था कि ‘‘क्या किसी अंग्रेज खिलाड़ी पर किसी भारतीय उद्घोषक ने ऐसी टिप्पणी की होती तो! यकीन मानिए पहले तो ऐसा होना नहीं था। ऐसी दबंगी दिखाने का साहस वर्तमान में भारत के ही सक्रिय क्रिकेट उद्घोषकों में से किसी में है नहीं क्योंकि अंग्रेजियत की गुलामी जारी है पर ऐसा होता तो इंग्लैंड में तो दो तीन बार शोर मचता भारत में पहले ही दिन उसे लानतमलानत मिलना शुरु हो जाती। कहा जाता ‘‘क्यों रे तू गुलाम होकर साहबों को आंख दिखा रहा है।’
            वैसे क्रिकेट खेलना ही हमारी गुलामी का प्रमाण है। मतलब हमने अंग्रेजियत को जिंदा रखा और इसलिये अंग्रेज आज भी हमारे साहब हैं। सीधी बात कहें तो दूसरी आज़ादी के दावे ने पहली आजादी का सच उन लोगों को बता दिया जो उस समय पैदा नहीं हुए थे। जिस तरह अंग्रेज बीसीसीआई की टीम को कभी कायर कुत्ता तो कभी गधा कर रहे हैं और कोई प्रतिवाद नहीं है। अन्ना साहेब और क्रिकेट दोनों पर इस तरह लिखना अजीब लगा पर कि अपने जेहन में दोनों बातें जिस तरह चल रही हैं उसे बिना किसी योजना के लिखकर फिलहाल तो अपने मन को उबारने के अलावा कोई मार्ग नहीं था। हमें पहली बार पता लगा कि गधे क्रिकेट भी खेलते हैं तब इस तरह व्यंग्य लिखना ही था खासतौर से तब गधा कैच नहीं पकड़ता बोझा ढोता है और अधिक होने पर उसे कभी गिराता नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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8/26/11

भ्रष्टाचार पर निबंध-हिन्दी हास्य कविता (essay on corruption or bhrashtachar par nibandh-hindi hasya kavita)

पोते ने दादा से कहा
‘‘कक्षा की हिन्दी शिक्षिका ने
सभी विद्यार्थियों  घर से
भ्रष्टाचार पर निबंध लिखने को कहा है,
आप जरा मदद करो
कुछ जोरदार तर्क भरो
ताकि मेरी श्रेणी सुधर जाये
वरना मैंने फिसड्डी होने का दर्द बहुत सहा है,
पहले तो मेरे यही समझ में नहीं आता कि
भ्रष्टाचार होता किस तरह है,
सभी चेहरे ईमानदार दिखते
फिर बेईमानी होने की क्या वजह है,
आप तो अनेक बार आंदोलन कर चुके हैं,
कई बार अनशन तो हड़ताल कर
इतिहास में अपना नाम भर चुके हैं,
इसलिये भ्रष्टाचार पर निबंध जोरदार लिखायें,
पहले मुझे बाद में समाज के मार्ग दिखायें।’’
सुनकर बोले दादाजी
‘‘बेटा,
कल चलना मेरे साथ स्कूल,
तुम्हारी शिक्षिका को समझाऊंगा
भ्रष्टाचार पर निबंध लिखवाने की बात जायेगी भूल,
तुम चाहे तो अब भी अनशन करा लो,
नौकरी अब करता नहीं
इसलिये सुबह दूध सब्जी लाने के काम से
चाहे हड़ताल धरा लो,
मगर यह भंष्टाचार पर निबंध लिखने में
मदद की बात सोचना भी नहीं,
इस पर पूरा पुराण लिखना पड़ेगा
अपने सिर के बाल नौचना न पड़ें कहीं,
वैसे तुम्हारी शिक्षिका को समझाऊंगा
इस बालपन में भला
हमारे बच्चों को भ्रष्टाचार के विषय से
अवगत क्यों करा रही हो,
सीख जायेंगे सब कुछ
जब बड़े ओहदे पर पहुंच जायेंगे,
नहीं पहुंचे तो भी
इसके परिणाम जरूर समझ पायेंगे,
बड़े बड़े लोग माथापच्ची कर भी
भ्रष्टाचार के आगे हार जाते हैं,
जेब सबसे अधिक वही भरते

जो बहसों में ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं,
हिन्दी में ईमानदारी और नैतिकता पाठ
कभी न पढ़ायें,
भ्रष्टाचार जैसे विषय पर
हमारे बच्चों का खून अभी से न जलाये
बड़े होकर वैसे भी भ्रष्टाचार पर बहस करेंगे,
कहीं देखेंगे फिल्म, कहीं  कविता कहेंगे,
इससे अच्छा तो शीला की जवानी को इंगित करती,
बदनाम मुन्नी के नाम में प्रतिष्ठा भरती,
कविता इनको लिखना सिखायें,
संभव है कुछ बालक
भविष्य में हास्य कवि होकर आपका नाम
गुरु के रूप में रौशन कर दिखायें।’’
------------
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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8/15/11

भ्रष्टाचार और चंदा-हास्य कविता (bharshtachar or corruption-hasya kavita or comic poem)

समाज सेवक को धनपति ने
अपनी शराब पार्टी में बुलाकर
अकेले में कहा
‘‘यार, अपनी कमाई बहुत हो रही है,
पर मजा नहीं आ रहा है,
लोगों के कल्याण के नाम पर
तुम्हें चंदा देते हैं
गरीबों की भीड़ कम नहीं हुई
कभी लोग भड़क न उठें
यह डर सता रहा है,
इसलिये तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाओ,
यहां जिंदा कौम रहती है यह
संदेश विदेशों में फैलाओ,
बस इतना ख्यान रखना
भ्रष्टाचार के खिलाफनारे लगाना,
किसी पर आरोप लगाकर
उसकी पहचान मत बताना,
तुम तो जानते हो
हमारा काम बिना रिश्वत
दिये बिना चलता नहीं,
टेबल के नीचे से न दो पैसे
तो किसी का पेन काम के लिये मचलता नहीं,
फिर कई बड़े लोग
तुम्हें जानते हैं,
उनका भी ख्याल रखना
तुमको वह अपना सबसे बड़ा दलाल मानते हैं
इसलिये
हवा में भाषणबाजी कर
अपना अभियान चलाना,
हमें भी है विदेश में
अपने देश की जिंदा पहचान बताना,
अब तुम रकम बताओ,
अपना चेक ले जाओ।

समाज सेवक ने चेक की रकम देखी
फिर वापस करते हुए कहा
‘यह क्या रकम भरते हो,
लड़ा रहे हो उस भ्रष्टाचार नाम के शेर से
जिसका पालन तुम ही करते हो,
पहले से कम से कम पांच गुना
रकम वाला चेक लिखो,
कम से कम हमारे सामने तो
ईमानदार दिखो,
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए
जब मैदान में आयेंगे,
भले किसी का नाम लें
पर हमारे कई प्रायोजक
डरकर साथ छोड़ जायेंगे,
बाल कल्याण और स्त्री उद्धार वाले हमारे धंधे
सब बंद हो जायेंगे,
भ्रष्टाचार विरोधी होकर
हमारी कमाई के दायरे तंग हो जायेंगे,
बंद हो जायेगा
शराब और जुआ खानों पर जाना,
बंद हो जायेगा वहां का नजराना,
जब चारों तरफ मचेगा कोहराम,
तुम्हारा बढ़ जायेगा दो नंबर का काम,
इसलिये हमारा चंदा बढ़ाओ,
वरना भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
हम कतई न उलझाओ।’’
------------
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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7/19/11

मनुष्य की स्मृतियां-हिन्दी लेख और कविता (manushya ki smrityan-hindi article and poem)

               स्मृति मनुष्य का गुण है तो दोष भी है। हम स्मृतियां तो चयन करके अपने मस्तिष्क में नहीं रख सकते। अगर किसी ने प्यार किया है तो वह भी स्मृति बनेगा तो किसी ने गाली दी है वह भी स्मृति में अपना स्तंभ बनायेगी। जितनी स्मृतियां मानस पटल पर होंगी उतना ही अधिक ंिचंतन होगा। कालांतर में यह चिंताओं का पिता बन जाता है।
               हमारा मस्तिष्क स्मृतियों का भंडार है। वही उसमें चिंतन और चिंताओं की संवाहक हैं। कुछ विद्वासन मनुष्य में स्मृति का गुण होना अच्छी बात मानते हैं पर कुछ दार्शनिक इस विशेषता को दुर्गुण भी मानते हैं। जिन स्मृतियों से देह में रोमांच पैदा होता है वह अच्छी लगती हैं पर जिनसे निराशा और अवसाद की धारा बहती हैं उनको भुलाना भी कठिन लगता है। मुश्किल यह है कि मनुष्य यह तय नहीं करता कि वह कौनसी स्मृति भुलाये और किसे याद रखे। स्मृतियों पर उसका नियंत्रण नहीं है।
             वैसे कष्टकारक तो वह भी स्मृतियां हैं जिनमें हमें मिली प्रसन्नता का इतिहास दर्ज है। उन खुशी के पलों का दोहराव न होना भी बुरा लगता है। कुल मिलाकर स्मृति मनुष्य की पहचान है पर वह उसकी शक्ति और कमजोरी भी है।
स्मृति पर प्रस्तुत है यह कविता
-----------
हृदय में स्थित स्मृतियां
कभी कभी आंखों के सामने
घूमती लगती हैं,
जिनमें मिलन है तो विरह भी है,
प्रेम भी है, घृणा भी है,
आशा है तो निराशा भी है,
मान है तो अपमान भी है
व्यथित पलों को भुलाना आसान नहीं है
फिर खुशनुमा अहसासों के
पुनः आगमन की प्रतीक्षा में
आंखों भी थकने लगती हैं।
यूं ही स्मृतियां हमेशा ही
मन को विचलित करती हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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6/30/11

पुरानी कहानी-हिन्दी क्षणिकायें (purani kahani-hindi kshaniaen)

विकास की इमारत में
किसी मजदूर का खून
पसीना बनकर बह रहा है,
वह फिर भी गरीब है
उसका अभाव
पुराने शोषण की पुरानी कहानी कह रहा है।
------------
दौलतमंदों की तिजोरी में
जैसे जैसे रकम बढ़ती जायेगी,
कागजों पर पर गरीबी की रेखा
उससे ज्यादा चढ़ती नज़र आयेगी।
------------
यकीनन विकास बहुत हुआ है
पर हम वहीं खड़े हैं,
सभी कह रहे हैं
देश विकास की राह पर
दौड़ता जा रहा है
हम यकीन कर लेते है
देश बड़ा है
हम थोड़े ही बड़े हैं।
----------
विकास में अमीर
जमीन से आकाश पर चढ़ते हैं,
मगर गरीब हमेशा
अपनी पुरानी रोटी की
लड़ाई पुराने ढंग से ही लड़ते हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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6/24/11

राजनीति शास्त्र के ज्ञान से परे आंदोलक पुरुषों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक-हिन्दी आलेख (agitation, politics and nowledge-hindi article)

           जिस तरह भारत के धार्मिक आंदोलनों, अभियानों तथा संगठनों की स्थिति रही है कि उनके शिखर पुरुष श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अल्प होने के बावजूद समाज का नेतृत्त करने लगते हैं। वही स्थिति सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों की भी है। वही अगर आप पिछले पचास साठ वर्षों से देश की स्थिति का अवलोकन करें तो पता चलेगा कि हमारे देश के अनेक संत माया मोह से परे रहने का उपदेश देते हुए अपने आश्रमों को महलनुमा तो अपने संगठन को लगभग कंपनी में बदल दिया है। दोनों हाथों  से माया बटोरी है। उन्होंने भारतीय अध्यात्म के ग्रंथों से अनेक पाठ रट लिये हैं उनको संस्कृत के श्लोक याद हैं। बड़े बड़े ग्रंथों का अध्ययन उन्होंने किया है। स्पष्टतः वह धर्म के वह व्यवसायी हैं जिनका अध्यात्मिक ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में अनेक महानायकों की कहानियां हैं उनका वह सरसपूर्ण ढंग से सुनाकर वाहवाही लूटते हैं पर तत्वज्ञान तथा ध्यान के प्रेरणा न देने का प्रयास करते हैं न ही ऐसा चाहते हैं क्योकि इससे उनके अनुयायी उनसे बड़े सिद्ध बन सकते है।। वह विफल रहते हैं। उनके ढेर सारे शिष्य अपने गुरुओं का बखान करते करते थकते नहीं है पर उनसे क्या सीख और कितना उस पर अमल कर रहे हैं यह कोई नहीं बता पाता। इनमें अनेक तो सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी बोलने का लोभ नहीं छोड़ पाते क्योंकि इससे प्रचार माध्यमों मे बने रहने का अवसर भी मिलता है।
        ऐसा लगता है कि भारतीय समाज पूर्वकाल में श्रमशील रहा होगा। अपने मानसिक तनाव की मुक्ति के लिये वह सांसरिक विषयों से इतर गतिविधियों में संलग्न रहने के लिये बौद्धिक विशेषज्ञों की शरण लेता होगा। ऐसे में मनोरंजन से उकताने के बाद उसे अध्यात्मिक विषय अत्यंत रुचिकर लगे होंगे क्योंकि न वह केवल मनोंरजन बल्कि ज्ञानबर्द्धक होने के साथ ही लंबे समय तक आत्मिक शांति के लिये उनका ज्ञान अत्यंत उपयेागी है। इसी कारण ही हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान सर्वाधिक संपन्न बन गया क्योकि तपस्वियों, ऋषियों तथा ज्ञानियों ने जहां अनेक खोजें की तो समाज ने उनको स्वीकार भी किया। समाज अध्यात्मिक का मुरीद बना तो अल्पज्ञानियों के लिये यह व्यवसाय चुनने का एक महत्वपूर्ण साधन भी बना। प्राचीन तपस्पियों, ऋषियों और मुनियों ने जहां अपने सत्य ज्ञान से प्रसिद्धि प्राप्त करने के साथ ही अपना शिष्य समाज बनाकर अध्यात्मिक ग्रंथेां में देवत्व का दर्जा हासिल किया तो वहां समाज भी उनका गुणगायक बन गया।
           सर्वशक्तिमान का बनाया यह संसार अत्यंत अद्भुत है। इसमें सारी भौतिकता उसके संकल्प के आधार पर ही स्थित है पर वह सर्वशक्तिमान किसी को दिखता नहीं है। यह संसार अपने रूप बदलता है। बनता है और नष्ट होता है। विकास और विनाश के इस चक्र को कोई समझ नहंी पाया। संसार नश्वर है पर चमकदार है इसलिये कुछ लोग यहां अपनी देह, नाम तथा व्यवसाय की चमक बनाये रखने के लिये समाज से परे होकर उसका शीर्ष बनना चाहते हैं। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के ग्रंथों की विषय सामग्री सरस तथा मनोरंजक होने के साथ ही ज्ञानवर्द्धक होन के पेशेवर धार्मिक लोगों के लिये बहुत सहायक होती है। जिसे ज्ञान चुनना है वह ज्ञान चुने जिसे मनोरंजन करना है वह मनोरंजन करे।
        इनमें कुछ लोग लोग तो समाज पर आर्थिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक शासन करना चाहते हैं और तब पैसे, पद और प्रतिष्ठा का उनका मोह अनंत हो जाता है। इसकी भूख शांत नहीं होती। जिस तरह सामान्य आदमी की भूख रोटी से मिट जाती है विशिष्टता की छवि रखने वाले आदमी की भूख उससे नहीं मिटती बल्कि पैसा, प्रतिष्ठा और पद का मोह उसे हमेशा पागल बनाये रहता है। इसमें भी कुछ आदमी ऐसे होते हैं जो समाज को पागल बनाये रखते हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य समाज से परे बने अपने शिखर की रक्षा करना होता है। इसलिये वह दूसरे के सृजन को अपने नाम करना चाहते हैं। यहीं से शुरु होता है उनका अभियान जो अंततः निष्काम बौद्धिक लोगों लिये के अनुसंधान का विषय बन जाता है।
धार्मिक आंदोलनों की तरह सामाजिक और राजनीतिक विषयों के अनेक आंदोलन ऐसे हैं जिनको उनके शीर्ष पुरुष कथित रूप से जनप्रिय बताकर भ्रमित करते हैं। आज के बाज़ार और प्रचार से प्रायोजित अनेक ऐसे आंदोलन हैं जो प्रचारित हैं पर उनसे जनहित कितना हुआ या होगा यह अभी भी विचार का विषय है। हम यहां राजनीतिज्ञों के आंदोलनों की बात न कर उन लोगों के राजनीिितक आंदोलनों की बात करेंगे जिनको गैर राजनीतिक लोग प्रारंभ करते है। वह एक तरफ कहते हैं कि उनका आंदोलन गैर राजनीतिक है पर उसकी कोई दूसरी संज्ञा नहीं बताते-जैसे कि सामाजिक आंदोलन, नैतिक आंदोलन या शैक्षणिक आंदोलन। मजे की बात यह है कि उनकी मांगे सरकार से होती हैं जिनका नेतृत्व राजनीतिक लोग करते हैं। ऐसे में आंदोलनों के शीर्ष पुरुषों के बौद्धिक चिंत्तन पर ध्यान जाना जरूरी है। वह कहें या न कहें उनके आंदोलनों में कहीं न कहीं राजनीतिक तत्व रहता है-चाहे उनकी मांगों में हो या उनके पूरे होने में। दूसरी बात यह कि समाज में सर्वजन हित के लिये केाई भी कार्य राजनीतिक परिधि में आता है। मनुष्य नाम की ईकाई का समाज के रूप में परिवर्तन इसलिये ही होता है कि कम से कम वह अन्य जीवों की तरह हिंसक या अनुशासनहीनता का बर्ताव न करे। अगर कोई व्यक्ति अध्यात्मिक विषयों  में महारती है तो वह समाज के भले के लिये न काम कर मनुष्य के हित के लिये काम करता है। वह स्वयं पर अनुसंधान करता है फिर उसकी जानकारी दूसरे को देकर अपने मनुष्य के दायित्व का निर्वाह करता हे। वह मनुष्य को समाज मानकर नहीं बल्कि इकाई दर इकाई संपर्क बनाता है। जहां समाज मानकर मनुष्य को ईकाई दर इकाई मानकर काम किया जाता है वहां राजनीतिक क्षमतायें होना आवश्यक है।
हम कौटिल्य का अर्थशास्त्र या मनु स्मृति को देखें तो वहां मनुष्य को इकाई मानकर संबोधित किया गया है न कि समाज मानकर। उसमें मनुष्य निर्माण के लिये संदेश दिये गये हैं। यह मानकर कि अगर मनुष्य के व्यक्त्तिव का निर्माण होगा तो समाज स्वयं ही अपनी राह चलेगा। कहीं न कहीं यह स्वीकार किया गया है कि समूचा मनुष्य समुदाय एक जैसा नहीं हो सकता। इसलिये उसमें जितने बेहतर लोग होंगे  उतना ही वह चमकदार भी होगा । इसके विपरीत भारतीय आंदोलक पुरुष समाज को संबोधित करते हुए अपनी बात करते हैं। वह यह नहीं बताते कि मनुष्य क्या करे? वह कहते हैं कि समाज यह करे तो सरकार वह करे। यह हवा में तीर चलाने जैसा है। वह समाज में व्यक्ति निर्माण के लिये अपनी भूमिका निभाने से कतराते हैं। भले ही वह सामाजिक नेता होने का दावा करें पर अपनी भूमिका को राजपुरुष की तरह देखना चाहते हैं। यह उनके राजनीतिक अल्पज्ञान का प्रमाण है। अध्यात्मिक पुरुष की छवि सौम्य और शांत होती है। उसकी सक्रियता में आकर्षण नहीं होता जबकि राजपुरुष की छवि में आक्रामकता, सुंदरता तथा प्रभावी छवि है और इसलिये हर कोई उसी तरह दिखना चाहता है।
        हम यहां कुछ आंदोलनों की चर्चा करना चाहेंगे जो जनमानस के लिये महत्वपूर्ण रहे हैं। सबसे पहले सामाजिक कार्यकर्ता श्री अन्ना हजारे और विश्व प्रसिद्ध  योग  शिक्षक बाबा रामदेव के आंदोलन की बात करना अच्छा रहेगा। मूलतः दोनों  ही राजनीतिक क्षेत्र के नहीं है। दोनों ही अपनी छवि महात्मा गांधी की तरह बनाना चाहते हैं। दोनों ही यह कहते हैं कि वह कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं करेंगे और न ही चुनाव लड़ेंगे। गैर राजनीतिक दिखने वाले उनके आंदोलनों के विषय बिना राजनीतिक दावपैंचों के सिद्ध नहीं हो सकते यह उनको कोई न समझा पा रहा है। वजह दोनेां ही राजनीति के पश्चिमी सिद्धांतों का अनुकरण कर रहे हैं जिसमें आंदोलन एक विषय और सरकार चलाना दूसरा विषय माना जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि राजधर्म का मतलब वह क्या समझते हैं जो दूसरों को बता रहे हैं। चलिये वह जानते भी होंगे फिर कोई बड़ा पद लेने की बात से इंकार क्यों करते हैं? क्या सरकारी पद केवल उपभोग के लिये होता है। विश्व भर की लोकतंत्रिक सरकारों में बैठे उच्च पदासीन लोग क्या राजसुख भोगने आते हैंे। क्या पद लेना केवल प्रतिष्ठा का प्रतीक है और दायित्व निभाकर दूसरों के सामने प्रस्तुत करने का कोई सिद्धांत वहां नहीं है।
       हैरानी की बात है कि भारतीय जनमानस उनके पद ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की वैसे ही प्रशंसा करता है जैसे भीष्म पितामह की। यह सभी लोग क्या भीष्मपितामह बनना चाहते है पर याद रखना चाहिए कि उन्होंने इस प्रंतिज्ञा को निभाया तो उसकी वजह से अंततः महाभारत युद्ध हुआ। अगर वह स्वयं राजा के पद पर बैठते तो न पांडु राजा बनते और न ही धृतराष्ट के पुत्र पांडवों के साथ युद्ध करते। भीष्म पितामह अपने राज्य की रक्षा करने के वचन से बंधे रहे पर अंततः उनको युद्ध में प्राण गंवाने पड़े। इस एक घटना को भारतीय इतिहास मंें हमेशा मिसाल नहीं माना जाता क्योंकि राजकाज का जिम्मा निभाने में तो हमारे आदर्श भगवान श्रीराम माने जाते हैं। राज्य का त्याग उन्होंने किया पर वापस लौटकर फिर वापस सिंहासन पर विराजे और प्रजा हित के लिये काम किया।
        श्री अन्ना हजारे ने कहा था कि वह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे हैं तब यह विचार सभी लोगों के मन में आया होगा कि महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम भारत को पूर्णता नहीं दिला सका शायद तभी वह ऐसी बात कही हैं। बात निकली है तो श्री महात्मा गांधी जैसे पुण्यात्मा के विचार पर प्रतिविचार आयेगा और हम उसे व्यक्त करने से पीछे नहीं हटेंगे। महात्मा गांधी ने अंग्र्रेजों से आजादी दिलाने का बीड़ा उठाया यह स्वीकार्य है पर उसके बाद राज्य कौन संभालेगा इसकी जिम्मेदारी कौन तय करने वाला था? महात्मा गांधी ने क्या ऐसी गांरटी ली थी कि अंग्रेजों के बाद राज्य चलाने वाले अपने काम में दक्ष होंगे! भारत एक विशाल देश था और उसे दो टुकड़ों में बांटा गया। इसके बावजूद आज का भारत बहुत विशाल था? उसका राजकाज कैसे चलेगा और कौन चलायेगा इसकी भूमिका क्या महात्मा गांधी ने तय की थी? उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान सुखद भारत की कल्पना व्यक्त की पर उसमें अपनी सक्रिय भूमिका निभाना क्या सत्ता का सुख भोगना समझा? यह पलायन माना जाये कि त्याग?
         वह परिवार, समाज, और राष्ट चलाने के सिद्धांतों पर खूब बोले होंगे पर आजादी के बाद के भारत में उन्होंने सक्रिय भागीदारी न देकर क्या जनता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया था? सरकार और राजकाज कोई स्वचालित मशीन नहीं है जिसके साथ खिलवाड़ किया जाये। उसके लिये कुशल लोग होना चाहिऐं। मूल बात यह है कि महात्मा गाीधी अंग्रेजों के हाथ से राजकाज लेकर जिन स्वदेशी लोगों को दे रहे थे उनके ज्ञान पर उनको केवल विश्वास था या उन्होंने उसे प्रमाणिक रूप देखाय भी था? आज अन्ना कहते हैं कि हम काले अंग्रेजों के राज्य को झेल रहे हैं तो सीधे महात्मा गांधी के आंदोलन का विचार आता है। जब उनको कोई राज्य का पद लेना नहंी था तो फिर वह स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के नेता क्यों बने? क्या वह मानते थे कि अं्रग्रेजों ने जिस व्यवस्था को बनाया है उसमें सरकार तो स्वतः चलेगी और उच्च पद तो केवल भोगने के लिये हैं उनमें कोई जिम्मेदारी नहीं होगी?
          हम तो यह मानते हैं सरकार या राजकाज चलाना अंततः राजनीति ज्ञान के बिना संभव नहीं है। आप अगर उसमें कोई पद लेना नहीं चाहते तो इसका मतलब यह है कि आप में कुशलता की कमी है। उसके बाद आप राज्य में परिवर्तन के लिये कोई आंदोलन  चलाना चाहते हैं और पद भी लेना नहीं चाहते तो इसके तीन मतलब यह हैं। एक तो यह कि अप्रत्यक्ष रूप से राजकाज आपका ही रहेगा पर उसमें कमीपेशी होने पर अपनी जिम्मेदारी से भाग सकते हैं। दूसरा यह कि आपका मानना है कि राज्य तो भगवान भरोसे चलता है हम जिसे बिठायेंगे वह सुख भोगने के साथ हमें भी पूजता रहेगा। तीसरी स्थिति यह है कि आपमें आत्मविश्वास नहीं है कि आप सरकार या राज चला पायेंगे।
          ऐसे में कुछ निष्कर्ष भी निकल सकते हैं जो त्यागी आंदोलक पुरुषों और उनके समर्थकों को शायद अच्छे न लगें। एक तो यह कि गैरराजनतिक लोगों दो कारणों से ही राज्य पद त्यागते हैं। एक तो वह बहुत चालाक हैं क्योंकि इससे बिना जिम्मेदारी के वह राजसुख या सम्मान पाते हैंे या उनके पास राजनीतिक शास्त्र के ज्ञान का अभाव है। पहली स्थिति में तो उनको आंदोलक पुरुष होने का हक है क्योंकि राजनीतिक सिद्धांत इस कुटिलता की अनुमति देते हैं कि अगर कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी न लेकर अप्रत्यक्ष रूप से राजहित करता है तो कोई बात नहीं है पर दूसरी स्थिति में उनको इसका अधिकार नहीं है कि वह कथित रूप से एक अकुशल प्रशासक को हटाकर दूसरा स्थापित करें। अगर उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है और न ढूंढने की क्षमता से भी परे हैं तो उनके कथित गैरराजनीतिक आंदोलन संशय के घेरे में आयेंगै। इससे अच्छा है तो वह आंदोलन ही न चलायें और अगर चलायें तो समय आने पर राज्य चलाने के लिये व्यवस्था से जुड़कर उनको आदर्श स्थापित करें।
           अर्थशास्त्र में हमने भारतीय अर्थव्यवस्था के समस्याओं के बारे में पढ़ा है कि अकुशल प्रबंध का यहंा अभाव है। मतलब यह कि हमें कुशल प्रबंधक चाहिये जो व्यवस्था चला सकें। जो आदर्श की बात करें तो उसे व्यवस्था में आकर काम करते हुए साबित करे। अगर हम भ्रष्टाचार की बात करें तो वह अकुशल प्रबंध का एक हिस्सा होने के साथ ही परिणाम है। हम परिणाम बदलना चाहते हैं यानि भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं पर कुशल प्रबंध के बिना यह संभव नहीं है। बीमारी हटाने के लिये दवा चाहिये न कि हम नारे लगाते रहें कि बीमारी भाग जाओ नहीं तो हम आते हैं। मैं पद नहीं लूंगा मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा मेरा किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं रहेगा जैसी बातें कहते हुए राजनीतिक आंदोलक पुरुष वैसे ही हैं जैसे कोई डाक्टर तमाम तरह के शारीरिक परीक्षण कराकर मरीज को बीमारी का नाम बताकर पर दवा देने की बात आने पर कहीं दूसरे डाक्टर के पास भेज देता है। हम ऐसे आंदोलक पुरुषों की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाते क्योंकि वह प्रमाणिक है पर राजनीति शास्त्र के ज्ञान का अभाव उनमें साफ दिखाई देता है। इसलिये वह राजनीतिक खेल में ऐसे दर्शक की भूमिका निभाना चाहते हैं जो खिलाड़ी को सलाह देता रहे और जीतने पर अपनी वाह वाही स्वयं करे और हार हो तो दोष खिलाड़ी को दे। ऐसा आम तौर से हम गांवों में चौपालों और शहरों में बाजा़ारों में शतरंज और ताश खेलने वाली महफिलों में देखते हैं।

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5/27/11

स्वामी शब्द नाम के साथ जोड़ना ढकोसले से कम नहीं-हिन्दी लेख (swami shabd ka dhakosla-hindi lekh)

    अगर इस संसार में किसी भी धर्म के ढकोसलों की बात की जाये तो वह कम नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि सभी धर्मों के ठेकेदार निर्धारित रंगों के कपड़े ही पहनकर अनुयायिायों में अपनी पहचान दिखाते हैं। उनके वस्त्रों का रंग इस कदर चिन्हित होता है कि उसे देखते ही पता चल जाता है कि वह किस धर्म का ठेकेदार है। वैसे अपने यहां गेहूंए रंग पहनने वाले अनेक साधु संत हैं उनमें से कितने सात्विक कितने राजसी और कितने तामसिक हैं यह अल्रग से विचार का विषय है पर एक बात तय है कि ज्ञान से अधिक उनकी पहचान वस्त्रों से होती है। कुछ लोग धवल वस्त्र भी पहनते हैं पर वह भी उनके पंथ और समुदाय की पहचान होती है।
           इन धर्म के ठेकेदारों में से कई तो सत्ता के लिये इतने लालायित रहते हैं कि वह सन्यासी होने के बावजूद सांसरिक छलकपट में लग जाते हैं। वैसे गेरुए और धवल वस्त्रधारी अपने धर्म के प्रशंसक होते हैं पर एक कथित स्वामी गेरुए वस्त्र पहनते हैं और अग्नि का वेश होने का दावा करते हैं। उन्होंने अपने वेश को ही नाम लिया। होना तो यह चाहिए कि वह भी अन्य धर्म के ठेकेदारों की तरह अपने धर्म की प्रशंसा करें-न करें तो कम से कम आस्था रखने वालों का मजाक तो न बनायें। वह अभी कश्मीर गये थे वहां उन्होंने एक उग्रवादी नेता से मिलकर एक सभा की और उसमें कह दिया कि ‘अमरनाथ यात्रा हिन्दुओं का एक बड़ा ढकोसला है।
         हम यहां किसी प्रकार से उनका विरोध नहीं करने जा रहे क्योंकि ज्ञानियों का काम उत्तेजित होना नहीं है मगर यह भी सच है कि वह हर विषय में बिना अध्ययन या मनन के नहीं बोलते न लिखते हैं। बहरहाल वह कह रहे हैं कि अमरनाथ यात्रा ढकोसला है तो हम उनके ही अनेक ढकोसलों की बात तो करेंगे।
        पहली बात तो नाम और वस्त्रों को लेकर ही करेंगे। आम तौर से अनेक माता पिता अपने बच्चे का नाम स्वामी रख देते हैं पर देखा यह गया है कि उनमें से कोई स्वामी नहीं बनता। जितने भी स्वामी नामधारी हैं वह धर्म के क्षेत्र में आने के बाद ही यह पदवी स्वयं धारण करते हैं। फिर गेरुए वस्त्र पहन लेते हैं। यहां यह भी याद रखने वाली है कि गेरुए वस्त्र भी नियमित रूप से आम लोग नहीं पहनते पर स्वामी और संत की पदवी धारण करने वालों की पहचान इसी से बनती है। नाम में माता पिता कभी अग्नि शब्द नहीं लगाते। कम से कम वह यह प्रचारित होते नहीं देखना चाहते कि उनका पुत्र अग्निवेश धारी है। उन्होंने यह सब किया। काम वह करते हैं नक्सलियों की तरफ से सरकार के पास जाकर मध्यस्थता का। वह कथित रूप से आदिवासियों के हितचिंतक हैं और उनको हिंसा में ही उनका कल्याण नज़र आता है। कश्मीर में प्रथकतावादियों में उनको विश्वकल्याण का भाव दिखता है।
           वह विशुद्ध रूप से व्यवसायिक अभियान संचालक हैं। भारतीय समाज में अस्थिरता तथा तनाव पैदा करने के लिये यकीनन कोई उनको आर्थिक सहायता करता होगा। एक बात यहां यह भी बता दें कि गेरुए वस्त्र सामने वाले व्यक्ति पर प्रभाव छोड़ते हैं यह एक वैज्ञानिक अनुसंधान से निकला निष्कर्ष है। उन्होंने गेरुए वस्त्र इसलिये ही पहने होंगे ताकि उनकी बातें प्रभावी हों। दूसरी बात यह कि भारतीय समाज पर प्रतिकूल टिप्पणियों से उनको प्रचार भी इसलिये मिलता है क्योंकि विश्व समुदाय कहता होगा कि ‘आखिर यह बात एक धर्मगुरु कह रहा है?’
         भारत के महान लोकसंत बाबा रामदेव ने योग की शिक्षा का प्रचार पूरे विश्व में किया है। योग एक विज्ञान है उसकी पुष्टि तो सारी दुनियां के स्वास्थ्य और मनोविज्ञान विशेषज्ञ कर रहे हैं। उन्होुंने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिला्फ अभियान प्रारंभ किया। भारत के स्वाभिमान की वापस के उनके अभियान की समस्त चर्चा हुई। समस्या यह थी कि चाहे भले ही वह समस्त धर्मों के लोगों को प्रिय हों पर उनके प्रयासों में कहीं न कहीं हिन्दुत्व का प्रभाव दिखता है जो अनेक लोगों को पसंद नहीं। इससे अन्य धर्म के ठेकेदारों को भारी असुविधा होती दिख रही थी।
          बाबा रामदेव की छवि को खराब करने का बाकायदा अभियान चला। मुश्किल यह थी कि इस अभियान में कोई गेरुए वस्त्र पहनने वाला कोई साधु संत नहीं था। इसके लिये स्वामी अग्नि नाम धारी इन महाशय को चुना गया लगता है। पहले तो इन्होंने अपने एक साक्षात्कार में योग की शक्ति को ही चुनौती देते हुए बताया कि ‘अमुक संत योग साधना करते थे पर अंततः उनको अपने इलाज के लिये अमेरिका जाना पड़ा।’
              तब हैरानी हुई और उनके तथ्य की सच्चाई पर संदेह हुआ। एक बात तय रही कि जो नियमित योग  साधना करेगा वह कभी अमेरिका इलाज के लिये नहीं जायेगा। इधर जब बाबा रामदेव का प्रभाव और प्रचार इतना बढ़ गया तो शायद कुछ लोग डर गये। इसी बीच समाजसेवी अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करने पर यही कथित स्वामी उनके पास पहुंच गये। उस समय ऐसा नहीं लगा कि यह बाबा रामदेव के अभियान को प्रचार से बाहर करने की कोशिश है पर बात की घटनाओं से ऐसा लगा कि यह इन्हीं स्वामी के प्रायोजकों की कोई योजना रही होगी।
       फिर उनके नक्सल प्रभावित इलाकों में सक्रियता देखकर लगा कि वह कहीं  न कहीं  भारतीय दर्शन और संस्कृति  के विरोधियों के मित्र हैं। यकीनन इसके प्रायोजक वह धनपति होंगे जिनको ऐसा करने से संतोष या लाभ मिलता है।
          अगर यह स्वामी अग्नि के वेश नाम धारी सज्जन वाकई ढकोसलेबाज नहीं  हैं तो उनको पहले तो गेरुए वस्त्र त्यागना चाहिए। यह स्वामी नाम धारण करना ही अपने आपमें सबसे बड़ा ढकोसला है। संस्कृत निष्ठ नाम रखने से ऐसा लगता है कि पहले इनको अपने संत के रूप में प्रसिद्ध होने का शौक चर्राया होगा पर नाकाम रहने पर भारतीय दर्शन के विरोध का मार्ग अपनाया होगा। दूसरी संभावना है कि उनका चयन ही सतत भारतीय दर्शन का विरोध करने के लिये किया गया हो फिर गेरुए वस्त्र पहनने के लिये कहा गया हो ताकि लगे कि यह कोई सुधारवादी संत है। 
       इधर अब अन्ना हजारे और यह कथित स्वामी देश भर में जनजागरण का प्रयास कर रहे हैं। अभी तक अन्ना हजारे को साफ सुथरा व्यक्ति बताया गया पर उनकी कोई सहकारी संस्था है जिस पर आक्षेप लग चुके हैं यह अब जाकर पता लगा है। फिर उनके निकटतम सहयोगी  भी कम विवादास्पद नहीं है जिनके बारे में स्वयं अन्ना हजारे साहब ने यह कहा कि ‘मैं उनको जानता नहीं।’
       ऐसे में यह कैसा आंदोलन है जिसके कप्तान अपनी टीम को नहीं जानता। फिर अन्ना हजारे जिस तरह लोकपाल के पद को सर्वशक्तिमान की मूर्ति बताया है वह सच कम ढकोसला ज्यादा लग रहा है। उनके प्रस्तावित लोकपाल के स्वरूप में अनेक बातें आपत्तिजनक हैं खासतौर से उसके चयन में नोबल और मैगसासे पुरस्कार विजेता की भूमिका अस्वीकार्य है। उससे लगता है कि यह पूरा आंदोलन ही प्रचार का ढकोसला और प्रायोजित है। एक तो बाबा रामदेव के अभियान को प्रचार में कमतर बताना दूसरा विश्व में यह संदेश भेजना कि भारत में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नहीं बल्कि दो आंदोलन हो रहे हैं। यह आंदोलन उन्हीं लोगों ने प्रायोजित किया है जो जनता का ध्यान अपने व्यापार से हटाना चाहते हैं। यही कारण है कि बाबा रामदेव के अभियान में जहां हिन्दुत्व की बदबू आने तथा अन्ना हजारे के आंदोलन में सर्वधर्मभाव की खुशबू दिखाने का प्रयास हुआ है।
जहां तक अमरनाथ की यात्रा और वहां पर श्रद्धालुओं की भक्ति को ढकोसला कहने का प्रश्न है। उसका जवाब यह है कि ऐसी भक्ति विरलों को ही नसीब होती है। आखिर वहां जाने वाले भक्त को कौनसा इनाम मिल जाता है। बल्कि जेब से पैसे खर्च होते हैं और शरीर भी कष्ट झेलता है। यह निष्काम भक्ति का सर्वोत्तम रूप है। मूर्ति पूजा के जो लाभ है उसका वर्णन तो चाणक्य ने किया है। यह हमारे अध्यात्मिक ज्ञान का प्रभाव ही है कि ऐसी बातों पर उत्तेजित नहीं होते और न ही दूसरे धर्मों के ढकोसलों की चर्चा करते हैं।
         एक सभा में इन्हीं कथित स्वामी को उनके बयान की वजह से उनको जूता मारने वाले की हम  निंदा करते हैं।    वैसे यह जूते मारने की घटना भी हमें ढकोसला और प्रायोजित लगती है वह भी एक साधु वेश धारी के हस्त कमल से होने पर सहज नहीं लगती। ज्ञानियों के पास ऐसी तर्कशक्ति ऐसी होती है कि अच्छा खास पानी मांग जाये। फिर एक साधु ने ऐसा किया उससे यह लगता है कि वह भी स्वामी जैसा ही रहा होगा। अगर कोई ज्ञानी हो तो वह इन स्वामी को अपने तर्कशक्ति से ऐसा हरा दे कि फिर कुछ बोल ही न सके।
        यह स्वामी बाज़ार के सौदागरों से प्रायोजित है जिसे प्रचार माध्यम बहस के लिये बुलाते हैं। जवाब देने वाले भी वैसे ही हैं। ज्ञानी और विचारवान वर्ग के आम लोगों के लिये बाज़ार और प्रचार के मार्ग बंद हैं और इसलिये ज्ञान का रट्टा लगाने और भारतीय अध्यात्म के ग्रंथ रटने वालों के बीच एक प्रायोजित द्वंद्व चलता है जिसे देखकर हंसी आती है।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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4/16/11

पहली बैठक में ही खोदे पहाड़ से निकला चूहा-अन्ना हज़ारे अन्ना हज़ारे के आंदोलन पर विशेष लेख (pahli baithk mein khode pahad se nikla chuha-special article on anna hazare moovment against corruption)

          अन्ना हजारे का अनशन बहुत चर्चित हुआ था। उनका जनलोकपाल बनाने के लिये कानून बनाने की मांग पर जोरदार चर्चा हुई थी। वैसे सरकारी तौर से लोकपाल विधेयक बनाने की तैयारी चल रही थी तो साथ ही दो नंबर के धनपतियों के विरुद्ध जांच एजेंसियों की कार्यवाही के समाचार भी जमकर आ रहे थे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक स्वयंसेवी संस्था का आंदोलन बाबा रामदेव का नाम लेकर जोरदार प्रचार पा रहा था। स्थिति यह हो गयी थी कि प्रचार माध्यम भ्रष्टाचार और दो नंबर के धन पर शोर मचा रहे थे।
          ऐसे में अवसर पाकर बीसीसीआई की टीम की कथित विश्व विजय से प्रेरित होकर महाराष्ट्र के समाजसेवी  अन्नाहजारे दिल्ली अनशन के लिये पधारे। उनका नाम भले ही भारत के बौद्धिक क्षेत्र में जाना जाता रहा है पर महाराष्ट्र के बाहर का आम आदमी उनको अधिक नहीं जानता था। इस अनशन से पूरे भारत में उनका प्रचार हुआ। वह दूसरे गांधी कहलाने लगे। उनकी मांग मानी गयी तो पूरे देश में जश्न मनाया गया।
लोकपाल बनाने के लिये पांच सदस्य जनता की तरफ से लिये गये जिनको अन्ना साहब ने मनोनीत किया। स्वयं अन्ना हजारे भी इसके सदस्य बने। अन्ना जी के पास कोई स्वयं का संगठन नहीं है इसलिये दिल्ली में सक्रिय ही स्वयंसेवी संगठन के चार लोग उन्होंने अपने साथ जनप्रतिनिधि के रूप में लिये। तय बात है कि इन चार सदस्यों की प्रतिबद्धताऐं अन्ना हजारे की तरह प्रमाणिक नहीं थी। कथित जनलोकपाल का प्रारूप भी इन लोगों ने ही बनाया था और शायद प्रचार की ताकत पाने के लिये उन्होंने अन्ना हजारे का उपयोग किया या वह ही एक बनी बनायी रणनीति का लाभ उठाने के लिये स्वयं ही प्रेरित हुए कहना कठिन हैं। इस तरह पांच सरकारी तथा पांच अन्ना साहेब के सदस्यों को मिलाकर कानून बनाने के लिये बनी दस सदस्यीय की पहली बैठक संपन्न हो गयी है।
           हमने शुरु में ही लिखा था कि अन्ना हजारे जी के आंदोलन को बहुत लंबी दूरी तय करनी है। अगर हम पहली बैठक का प्रचार देखें तो कहना पड़ता है कि पहली बैठक में खोदा पहाड़ निकली चुहिया। प्रचार माध्यामों ने अन्ना हजारे की तरफ से प्रचारित जनलोकपाल के लिये जो प्रारूप बताया था उसमें से ‘कुछ’ हटाया गया है। वही ‘कुछ’ हटाया गया है जिस पर यथास्थितिवादियों को आपत्ति थी।
         महत्वपूर्ण बात यह है कि हम देख रहे हैं सरकार भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जूझती दिख रही है। इधर न्यायालय भी भ्रष्टाचार पर भारी टिप्पणियां कर रहे हैं। सरकार लोकपाल कानून बनाने वाली थी तो अन्न हजारे जन लोकपाल बनाने की मांग लेकर सामने आ गये। ऐसा लगता है कि कथित स्वयंसेवी आंदोलनकारी संस्था अपनी भ्रष्टाचार विरोधी छवि बचाये रखने के लिये अन्ना जी को ले आयी। लोकपाल का नामकरण ‘जनलोकपाल’ कर ही वह अपनी इज्जत बचा रही है। अभी तक यह नहीं पता चला कि सरकार के लोकपाल कानून तथा अन्ना हजारे के कल्पित जनलोकपाल के बीच अंतर क्या रहने वाला है?
         हम यहां सरकार के प्रस्तावित लोकपाल कानून से अधिक अन्ना हजारे के जनलोकपाल पर जानना चाहते हैं। बैठक के बाद अन्ना साहेब ने कहा-‘सब ठीक चल रहा है।’
उनके ही एक प्रवक्ता कानून विद का कहना है कि ‘हमारे प्रस्तावित मसौदे वह ‘कुछ’ शामिल नहीं था जो हटाने की बात हो रही है।’
अगर यह सच है तो जब अन्ना हजारे के आंदोलन का प्रचार हो रहा था तब यह बात उन्होंने क्यों नहीं कही? हमने पहले भी लिखा था कि अन्ना साहेब के साथ जो चार लोग हैं उन पर नज़र रखी जायेगी। सरकारी प्रतिनिधियों का रवैया इतना चर्चा का विषय नहीं बनेगा जितना कथित रूप से जनप्रतिनिधियों के विचार जाने जायेंगे।
        ऐसा लगता है कि अन्ना साहेब अपनी राष्ट्रीय छवि बनाने दिल्ली आये थे। उनको यह अनुमान नहीं था कि वह अनचाहे ही विशाल भारत की जनता को आंदोलित कर रहे हैं। सरकार निरंतर भ्रष्टाचार के विरुद्ध कुछ न कुछ करती रही है। वह लोकपाल कानून भी बनाने जा रही थी। ऐसे में कथित आंदोलन से निकल देश के महान कानून विद जनप्रतिनिधि बनकर पहुंच गये। हालांकि उस समय किसी ने यह उल्लेख नहीं किया कि सरकार के प्रतिनिधि भी जनप्रतिनिधि पहले हैं बाद में उनका राजकीय पद आता है। तब अन्ना हजारे क्यों आये? आये तो फिर उनके आंदोलन का क्या प्रभाव हुआ?
             जब अन्नाजी ने विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता जीतने की बधाई देते हुए भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन में जीत के लिये वैसा ही संघर्ष करने का आव्हान किया तभी लगने लगा था वह स्वयं या उनके अनुयायी कोई खेल खेलने आ गये हैं। अन्ना के कथित जनप्रतिनिधियों में दो ऐसे लोग हैं जो अनुभवी हैं और वर्तमान व्यवस्था से संबद्ध रहे हैं इसलिये बड़े बदलाव के लिये उनके तैयार होने पर पहले भी संदेह था और अब तो पुष्टि हो गयी है।
अन्ना ने इन लोगों को चुनने पर कहा था कि ‘उन्होंने जनलोकपाल कानून का प्रारूप बनाया है, इसलिये वह अधिक जानकारी है। अतः उनको रखा जा रहा है।’
            जनलोकपाल के लिये संघर्षरत आंदोलनकारियों के प्रचारित और प्रस्तावित प्रारूप में अंतर आना इस बात को दर्शाता है कि यहां नारों और घोषणाओं पर चलने की आदत का अनुकरण जारी है। समस्या अब अन्ना हजारे जी के सामने आने वाली है। अगर प्रचार माध्यमों में सक्रिय सभी बड़े आंदोलनकारियों की सूची देखी जाये तो उनमें कई ऐसे हैं जो अब सीधे अन्ना हजारे पर सवाल उठायेंगे। उससे भी ज्यादा बुरी बात यह होगी कि उनके प्रचार के बाद देश के आमआदमी भी अन्ना हजारे की तरफ देखेगा। आम आंदोलनकारी के सामने अब दोबारा मुखातिब होना अन्ना हजारे के लिये मुश्किल है क्योंकि वह उनके प्रस्तावित और प्रचारित प्रारूप पर सवाल उठायेगा। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे का आंदोलन भी उसी बाज़ार से प्रायोजित था जो किसी बहाने भी जनता को व्यस्त रखना चाहता है। सुनने में आया है कि अन्ना हजारे जी के आंदोलन से भ्रष्टाचार शब्द लोकप्रिय हो गया है अब उसपर इंटरनेट पर गेम बन गये हैं जिसमें भ्रष्टाचार के लिये बदनाम लोगों को सजा देने के खेल का निर्माण किया गया है। अब देश के अप्प टप्पू अपनी उंगलियों से भ्रष्टाचारियों को सजा देंगे। उनका अच्छा समय पास होगा और बाज़ार पैसा भी कमायेगा।
           आखिरी बात अन्ना हजारे देश के राजनीतिक नेताओं पर फब्तियां कस रहे थे पर ऐसा लगता है कि उनकी स्थिति को देखते हुए सभी चुप थे वरना तो अनेक नेताओं की भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की इच्छा दिखती है और अंततः उनको ही उसे रोकने के लिये कानून बनाने हैं। जन इच्छा को पूरा करने के लिये उनसे आशा की भी जानी चाहिए। हम उनकी मंशा पर शक नहीं कर सकते खासतौर से जब कथित आंदोलनकारियों के प्रस्तावित और प्रचारित प्रारूप में अंतर हो। वैसे हमने जो लिखा है वह प्रचार माध्यमों में देख सुनकर ही लिख रहे हैं। आंदोलनकारियों के कानूनविद प्रवक्ता की स्वीरोक्ति देखने के बाद ही हमने यह लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा कि ‘वह कुछ तो पहले ही हमारे प्रारूप में नहीं था।’
जबकि हमने देखा कि वह कुछ था जो हटाया गया। बहरहाल आगे देखें क्या होता है। बहरहाल जिन पर कानून बनाने का जिम्मा है वह तो बनायेंगे ही यह अलग बात है कि कुछ लोग उसका श्रेय स्वयं लेने का प्रयास करेंगे। संभव है कि सरकार अपने ही प्रस्तावित कानून में चर्चा कर कुछ कठोर नियम भी बनाती पर लगता है कि इसमें श्रेय लेने के लिये आंदोलन को जनाभिमुख बनाने का प्रयास कुछ पुराने बुद्धिजीवियों ने किया। जबकि यह न कर सरकार से मांग कर भी वह देश का काम चला सकते थे। यह अलग बात है कि उनको तब कोई नहीं पूछता। हमने जो लिखा है वह टीवी चैनलों में दिख रहे समाचारों के आधार पर बने विचारों से लिखा है। अगर कोई अन्ना हजारे के विरुद्ध दुष्प्रचार का यह हिस्सा हो तो हमें नहीं मालुम। अलबत्ता प्रचारित और प्रस्तावित प्रारूप में अंतर उनकी छवि खराब कर सकता है। 
इस संबंध में पूर्व में लिखा आलेख यहां पढें।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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