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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

8/26/07

धर्मशास्त्रों से: मन में निर्मलता लाने के उपाय

इस बात को सभी जानते और मानते हैं कि जीवन को ऊपर उठाने के लिए हृदय, चित्त और मन को शुद्ध करना जरूरी है। मन का मैल निकाले बिना न लोक सुधरता है न परलोक सुधरता है।

मन का मेल निकाले बिना न साधना होगी न भक्ति। मन का मैल निकले बिना न कर्म पवित्र होगा न ज्ञान की ही प्राप्ति होगी। साधू, संत, फकीर और माहात्मा चित्त को निर्मल करने पर इसीलिये जोर देते हैं।

मन का मैल कैसे निकले? चित्त की मलिनता कैसे मिटे इसके लिए महर्षि पंतजलि ने ऐक बढ़िया साधन बताया है-मैत्री, करुणा, मुदिता (हर्ष का भाव) और उपेक्षा के भाव का विकास। योग सूत्र में उन्होने कहा है कि-

सुखी व्यक्ति के लिए मैत्री की भावना अपने अन्दर पैदा करो।
दुःखी व्यक्ति के लिए करुणा का भाव अपने अन्दर स्थापित करो।
पुण्यात्मा के लिए मुदिता(हर्ष का भाव) की भावना रखो।
पापात्मा के प्रति उपेक्षा का भाव रखो;

ऐसा करने से चित्त प्रसन्न और निर्मल बनता है।

3 comments:

Mired Mirage said...

बात तो सही लग रही है ।
घुघूती बासूती

परमजीत बाली said...

सत्य है दीपक जी।

रवीन्द्र प्रभात said...

बेहद सुंदर और सरगर्भीत , अच्छी रचना और अच्छी सोच यदि अच्छी भावनाओं के साथ
परोसी जाए तो होठों से वाह निकलना लाज़मी है. इस क्रम को बनाएँ रखें....../

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