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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/2/10

बड़ी बेवकूफी से कम वाली ठीक है-हिन्दी व्यंग्य ( Birth day of tom and jarry-hindi vyangya)

टॉम और जैरी का जन्म दिन मनाना भी कोई बुरा नहीं है। टॉम यानि बिल्ली और जैरी यानि चूहा। असल में नहीं बल्कि कार्टून फिल्मों के रेखाचित्र नायक हैं टॉम और जैरी। पहले इन पर किताबें प्रकाशित होती थीं और अब टीवी पर इन दोनों के कार्यक्रमों को लोकप्रियता प्राप्त है। कहने को तो कहा जाता है कि यह बच्चों को बहुत प्रिय है पर हकीकत यह है कि जिनको हल्का फुल्का हास्य मनोरंजन चाहिये उनके लिये वह चाहे किसी भी उम्र के हों इसे देखते हैं।
एक बात तय रही है कि भारत में ऐसे टीवी कार्यक्रम नहीं बनते। संभवतः कोई इनको बना भी नहीं सकता। इसके लिये जो कल्पना शक्ति चाहिए वह भारत में शायद ही किसी को हो। वैसे ही टीवी चैनल, फिल्म, समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा प्रकाशन उद्योग भारत में किसी कल्पनाशील रचनाकार को प्रोत्साहन नहीं दे पाता। यह उसके अहंकारी स्वभाव में ही नहीं है कि वह अपने आदमी को आगे लाये। यही कारण है कि पहले फैंटम हो या बेताल अब टॉम और जैरी, विदेशों में बने रेखाचित्र पात्रों का भारतीय कमाऊ संस्थानों ने उपयोग किया। भारत में इस तरह के व्यवसायिक कार्यक्रम बनाने वालों को प्रोत्साहन नहीं दिया वरना अपने देश में जोरदार कार्टूनिस्टों की कोई कमी नहीं है।
टॉम और जैरी का जन्म ही नहीं हुआ पर मनाया जा रहा है। ऐसी मूर्खतायें भी विदेशों से रेखाचित्रों के पात्रों की तरह आयात की गयी हैं फिर भी बुरा नहीं लगा। जिस तरह भारतीय टीवी चैनल देश के कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं उससे इतनी बोरियत पैदा होती है-इसका अहसास तभी होता है जब थोड़ी बहुत चिंतन क्षमता अपने अंदर हो, वरना तो देखते रहिये, आखें काम कर रही हो पर मस्तिष्क सुप्त रहे तो सभी चल जाता है। सारे टीवी चैनल, रेडियो और पत्र पत्रिकाओं फिल्मी, खेल तथा समाजसेवा के अभिनेता अभिनेत्रियो या कहें कि नये देवी देवताओं के जन्म दिन तथा दैनिक गतिविधियों को समर्पित है। समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में इन नये देवताओं के वक्तव्य तथा गतिविधियां तो रहते ही हैं फिर उनकी आलेख और अन्य सामग्री भी पढ़ने और सुनने को बाध्य होना पढ़ता है। इनमेें से कुछ तो स्वयं भी लिखने का काम करते हैं तो उनको लेखक होने का दर्जा भी मिल जाता है। एक आम आदमी को एकत्रित कर उसे तो भीड़ बना लिया जाता है।
हर दिन किसी नये देवता का जन्म दिन है। कोई शादी कर रहा है। हालत यह हो गयी है कि नये देवताओं की शादियों का सीधा प्रसारण तक किया जाता है। फिर इधर जनसामान्य को जोड़े रखने के लिये टीवी चैनलों पर संगीत प्रतियोगितायें या हास्य कार्यक्रम चलाये जाते हैं जिनके बारे में दावा किया जाता है कि यह तो वास्तविक हैं पर दरअसल वह पहले से तय होते हैं। तलाकशुदा और अनेक प्रेम कर चुके लोगों के स्वयंवर रचाये जाते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि अनेक नये देवी देवता पता नहीं कितने प्यार कर चुके हैं पर संगठित प्रचार माध्यम उनके हर प्यार में सुकोमलता ढूंढ कर लाते है।
उस दिन हमारे कंप्यूटर कक्ष में ही रख टीवी खराब हो गया। हम अब उसे बनवाने या नया लाने को तैयार नहंी थे। सोचा दूसरे कमरे में जब मन होगा देख लेंगे। मगर मित्र लोग नहीं माने। कहने लगे ‘अरे, यार आज कल एक टीवी से काम नहीं चलता। दूसरा भी पुराना है। इसलिये एल.सी.डी. खरीद लो।’
खरीद लिया। मगर खोलकर देखते कितना हैं? अब तो समाचार चैनलों पर जाना ही कम कर दिया है। बिना देखे ही पता चलता है कि किस विषय पर बहस चल रही होगी। बोरियत पैदा और कभी चिढ़ाने वाली बहसों से तो उनको न देखना ही अच्छा लगता है।
कहते हैं कि जहां धुआं होता है वहां आग जरूर होती है, मगर हमारे संगठित प्रचार माध्यमों को देखें तो बिना आग के धुआं दिखा देेते हैं। चाहे कोई व्यक्तित्व सनसनी का स्वामी हो न हो पर उसका नाम बेच जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रबंध कौशल का अभाव इस देश की रग में है। भारत के फिल्म और खेल जगत के अनेक अभिनेता और अभिनेत्रियां खूब पैसा कमा रहे हैं पर पश्चिमी प्रचार माध्यम उनमें ‘व्यवसायिक प्रवृत्तियों को अभाव बताते हैं। यह अभाव देश के संगठित प्रचार माध्यमों में भी दिखाई देता है। यही कारण है कि इतने सारे चैनल हैं पर लोग किसी एक के नाम पर लोकप्रियता की मोहर नहीं लगाते।
ऐसे में मनोंरजन के लिये एक तरीका यह है कि इंटरनेट पर अपनी अभिव्यक्ति की सुविधाओं का लाभ उठायें या फिर बाहर किसी पार्क में तफरी कर आयें। हास्य मनोरंजक चैनल देखें तो पता लगता है कि वहां भी हर त्यौहार और जन्म दिन के अवसरों पर तोहफों देने और लेने वाले दृश्य बड़ी चालाकी से जोड़े जाते हैं। ऐसे में अगर कार्टून फिल्में ही मजेदार लगने लगती हैं। जिनमें टॉम और जैरी का एक दूसरे का पीछा करना अच्छा लगता है। वैसे यह चूहे बिल्ली का खेल है पर मानना पड़ेगा कि यह विश्वव्यापी है। अपने यहां चूहे बिल्ली का खेल कभी प्रत्यक्ष देखा नहीं जाता पर अक्सर बातचीत में यह वाक्य कहा जाता है कि ‘चूहे बिल्ली की तरह मत खेलो।’ इसे रेखचित्रों के द्वारा जिस तरह पाश्चात्य चित्रकारों ने बनाया उससे लगता है कि हास्य प्रकार का मनोरंजन देखने की प्रवृत्ति सारे विश्व में एक जैसी है।
अब लोग इस कार्यक्रम बनने के दिन को टॉम जैरी के जन्म दिन की तरह मना रहे हैं तो उन पर क्या आपत्ति की जा सकती है। यही कहा जा सकता है कि नकली देवताओं के जन्म दिनों को मनाने की बहुत बड़ी बेवकूफी से तो कम वाली ठीक है-इस मायने में कि इस लेखक को यह कार्यक्रम अच्छा लगता है।
दीपक बापू कहिन ब्लाग/पत्रिका के एक लाख पाठक संख्या पर करने पर लिखा गया एक लेख भी यहां पढ़ सकते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1 comment:

Jandunia said...

बहुत सुंदर रचना।

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