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9/1/12

हिन्दी दिवस पर लेख-हिंदी का महत्व बस इतना है यह दिन अंग्रेजी माता पर ग्रहण लगने जैसा है (article on hindi diwas-hindi ka mahatva angreji par grahan lagane jais-hindi divas par lekh)

    सितम्बर महीना प्रारंभ हो गया है।  अंतर्जाल पर सक्रिय  अपने बीस हिन्दी ब्लॉग पत्रिकाओं  की स्थिति का अवलोकन करने पर पता चला कि पाठक संख्या दो गुना से अधिक बढ़ी है। 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के आसपास अधिकतर ब्लाग अपने निर्माणकाल से अब तक की सर्वाधिक संख्या का पिछला कीर्तिमान ध्वस्त कर देंगे। अभी इस लेखक के बीस ब्लॉग के नियमित पाठक दो हजारे से पच्चीस सौ के आसपास है।  14 सितम्बर के आसपास यह संख्या प्रदंह से बीस हजार के आसपास पहुंच सकती है।  पिछली बार यह संख्या दस हजार के आसपास थी। कुछ ब्लाग तो अकेले ही दो हजार के पास पहुंचे थे पार नहीं हुए यह अलग बात है। इस बार लगता है कि वह दो हजारे की संख्या पार करेंगे।
       हिन्दी दिवस के तत्काल बाद उनका जो हाल होगा वह दर्दनाक दिखेगा।  14 सितंबर के आसपस ऐसा लगेगा कि पूरा देश हिन्दी मय हो रहा है तो तत्काल बाद यह अनुभव होगा  कि अंग्रेजी माता ने अपना वर्चस्व प्राप्त कर लिया है।  एक तरह से 14 सितंबर का दिन अंग्रेजी के लिये ऐसा ही होता है जैसे कि सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण। उस दौरान अंग्रेजी और भारतीय समाज के बीच हिन्दी नाम का ग्रह ऐसे ही आता है जैसे ग्रहण लग रहा हो।  धीरे धीरे जैसे ग्रहण हटता वैसे ही कम होती पाठक संख्या अं्रग्रेजी को अपने पूर्ण रूप में आने की सुविधा प्रदान करती है।
      यह ब्लॉग लेखक अंतर्जाल पर छह साल से सक्रिय है।  प्रारंभ में हिन्दी दिवस पर अनेक लेख लिखे।  यह लेख आजकल अंतर्जाल पर छाये हुए हैं। इसमें एक लेख हिन्दी के महत्व पर लिखा था।  उस पर कुछ बुद्धिमान पाठक अक्सर नाराजगी जताते हैं कि उसमे हिन्दी का महत्व नहीं बताया गया। कुछ तो इतनी बदतमीजी से टिप्पणियां इस तरह लिखते हैं जैसे कि लेखक उनके बाप का वेतनभोगी नौकर हो।  तब मस्तिष्क के क्रोध की ज्वाला प्रज्जवलित होती है जिसे अपने अध्यातिमक ज्ञान साधना से पैदा  जल डालकर शांत करना पड़ता है। अंतर्जाल पर अब हमारा सफर अकेलेपन के साथ है। पहले इस आभासी दुनियां के एक दो मित्र अलग अलग नामों से जुड़े थे पर फेसबुक के प्रचलन में आते ही वह नदारत हो गये।  यह मित्र व्यवसायिक लेखक हैं यह अनुमान हमने लगा लिया था इसलिये उनकी आलोचना या प्रशंसा से प्रभावित नहीं हुए।  अलबत्ता उनके बारे में हमारी धारणा यह थी कि वह सात्विक प्रवृत्ति के होंगे।  इनमें से कुछ मित्र अभी भी ब्लाग वगैरह पर सम्मेलन करते हैं पर हमारी याद उनको याद नहीं आती।  इससे यह बात साफ हो जाती है कि अंतर्जाल पर लेखन से किसी प्रकार की आशा रखना व्यर्थ है।  सवाल यह पूछा जायेगा कि फिर यह लेख लिखा क्यों जा रहा है?
           हिन्दी लेखन केवल स्वांतसुखाय ही हो सकता है और जिन लोगों को यह बुरी आदत बचपन से लग जाती है वह किसी की परवाह भी नहीं करते। लिखना एकांत संाधना है जिसमें सिद्ध लेखन हो सकता है।  शोर शराबा कर लिखी गयी रचना  कभी सार्थक विंषय को छू नहीं सकती।  जिस विषय पर भीड़ में या उसे लक्ष्य कर लिखा जायेगा वह कभी गहराई तक नहीं पहुंच सकता। ऐसे शब्द सतह पर ही अपना प्रभाव खो बैठते हैं। इसलिये भीड़ में जाकर जो अपनी रचनाओं  प्रचार करते हैं वह लेखक प्रसिद्ध जरूर हो जाते हैं पर उनका विषय कभी जनमानस का हिस्सा नहंीं बनता।  यही कारण है कि हिन्दी में कबीर, तुलसीदास, मीरा, सूरदास, रहीम तथा भक्ति काल के गणमान्य कवियों के बाद उन जैसा कोई नहीं हुआ। प्रसिद्ध बहुत हैं पर उनकी तुलना करने किसी से नहीं की जा सकती।  वजह जानना चाहेंगे तो समझ लीजिये संस्कृत के पेट से निकली हिन्दी अध्यात्म की भाषा है। सांसरिक विषयों -शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य तथा विज्ञान- पर इसमें बहुत सारे अनुवाद हुए पर उनका लक्ष्य व्यवसायिक था।  इससे हिन्दी भाषियों को पठन पाठन की सुविधा हुई पर भाषा तो मौलिक लेखन से समृद्ध होती है।  जिन लोगों ने मौलिक साहित्य लेखन किया वह सांसरिक विषयों तक ही सीमित रहे इस कारण उनकी रचनायें सर्वकालीन नहीं बन सकीं।  भारतीय जनमानस का यह मूल भाव है कि वह अध्यात्म ज्ञान से परे भले ही हो पर जब तक किसी रचना में वह तत्व नहीं उसे स्वीकार नहीं करेगा। यही कारण है कि जिन लेखकों या कवियों से अध्यात्म का तत्व मिला वह भारतीय जनमानस में पूज्यनीय हो गया।
       हिन्दी भाषा को रोटी की भाषा बनाने के प्रयास भी हुए। उसमें भी सफलता नहीं मिली।  कुछ लोगों ने तो यह तक माना कि हिन्दी अनुवाद की भाषा है।  यह सच भी है।  भारत विश्व में जिस प्राचीनकालीन अध्यात्मिक ज्ञान के कारण गुरु माना जाता है वह संस्कृत में है।  यह तो भारत के कुछ धाार्मिक प्रकाशन संगठनो की मेहरबानी है कि वह ज्ञान हिन्दी में उपलब्ध है । इतना ही नहीं हिन्दी के जिस भक्तिकाल को स्वर्णकाल भी कहा जाता है वह भी कवियों की स्थानीय भाषा में है जिसे हिन्दी में जोड़ा गया।  सीधी बात है कि हिन्दी भाषा संस्कृत और भारतीय भाषाओं की नयी पीढ़ी है।  व्यापक होने के कारण इसने राष्ट्रभाषा का दर्जा पा लिया है।  अब यही भाषा आगे बढ़ रही है।  यह अलग बात है कि हिन्दी भाषा की चिंता करने वाले कुछ बुद्धिजीवी अफलातूनी निर्णयों और प्रयासों से हिन्दी भाषियों को भटकाव के रास्ते पर ले चल पड़े हैं।  उनके निर्णय और प्रयास  हिन्दी भाषा के विकास से अधिक हिन्दी भाषियों को गुलाम बनाये रखने के लिये अधिक हैं।  पहला निर्णय तो हिन्दी में अंग्र्रेजी भाषा के शब्द जबरन शामिल करने वाला है।  अगर यह निर्णय सर्वमान्य हो जाये तो हिन्दी में केवल हो गया, आ गया, आ रहा है, है, हो रहा है और था यानि केवल क्रियात्मक शब्द ही रह जायेंगे।  आखिर वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? अक्सर हम लोग सुनते हैं कि मानव तस्करी होती है। इसे तस्करी इसलिये कहा जाता है क्योंकि वह गैर कानूनी है मगर कागजों पर कानूनी रूप से मनुष्य की कबूतरबाजी भी होती है जिसे हम मानव निर्यात कह सकते हैं। यहां का आदमी विकसित देशों में जाकर नौकरी करे इसी कारण उसे हिन्दी भाषा के सहारे अंग्रेजी का ज्ञान कराया जा रहा है। इसका प्रमाण यह है कि अमेरिका में किसी उच्च पद पर पहुंचने वाले आदमी का यहां गुणगान किया जाता है।  इस तरह यह संदेश यहां नयी पीढ़ी को दिया जाता है कि अगर तुम्हारे अंदर प्रतिभा है तो बाहर जाओ यहां तुम्हारे लिये कुछ भी नहीं।  अमेरिका में सफल होकर ही तुम हमारा नाम रौशन कर सकते हैं।  यह गुलाम संस्कृति का  साम्राज्यवादी स्वरूप है। विकसित देश अपना राज्य कायम करने के लिये लड़ते हैं तो यहां के बुद्धिमान गुलामी पाने के लिये वैसा ही संघर्ष करते दिखते है।
             एक दूसरा प्रयास भी हो रहा है। हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने का।  इतना घटिया प्रयास देखकर यह लगता है कि जैसे देश से गुलाम बाहर भेजने की कुछ लोगों को बहुत जल्दी है। अध्यात्म ज्ञान से पैदल लोगों को श्रीमद्भागवत गीता का कोई सिद्धांत समझाना कठिन है। ऐसे में उनको सांसरिक विषय का यह सिद्धांत बताना भी मूर्खता है कि भाषा और भाव का संबंध भूमि से होता है। भारत भूमि के लिये न तो अंग्रेजी की गुंजायश है न अरबी की।  यहां से वहां लोग जा सकते है पर भाषा भाव और भूमि तो यहीं रहनी है।  हिन्दी दिवस के मौके पर नयी पीढ़ी के लोगों को सलाह है कि वह खूब अंग्रेजी पढ़ें। खूब लिखें पर वह शुद्ध हो।  उसी तरह हिन्दी में पढ़ें और लिखें पर उसका मौलिक स्वरूप भूलें नही। उनको  हिन्दी कभी कमाकर नहीं देगी पर अंग्रेजी कभी उनको शांति नहीं देगी।  अगर वह दोनों का मिश्रण करेंगे तो रोटी और शांति दोनों से जायेंगे।  भारत में गरीब और निम्म मध्यम वर्ग के लोगों के बीच हिन्दी हमेशा रहेगी और उनको उनको सम्मान नहीं मिलेगा तो अंग्रेजी में हिन्दी मिक्चर से उनको विदेश में भी नौकरी नहीं मिलेगी।
     आखिर में एक मजेदार बात। कहा जाता है कि संस्कृत में बाहरी भाषाओं के शब्द शामिल करने की गुंजायश न होने के कारण लुप्त हो गयी।  इसके बावजूद यह सच्चाई है कि संस्कृत को जानने वाले विद्वानों को आज भी  अत्यंत सात्विक माना जाता है।  जिनको संस्कृत का ज्ञान है उनको लो सम्मानीय मानते हैं।  जिस तरह हिन्दी के कर्णधार हिन्दी को हिंग्लिश बना रहे हैं उससे हिन्दी जानने वालों को भी आगे चलकर ऐसे ही अध्यात्मिक पुरुष माना जायेगा।  महत्वपूर्ण बात यह है कि कमाने के लिये भाषा महत्वपूर्ण नहीं है।  विभाजन पूर्व भारत से बाहर गये भारतीयों ने बिना अंग्रेजी के वहां अपने धंधे कायम किये।  उसी तरह विभाजन बाद वर्तमान भारत में आये लोगों को हिन्दी नहीं आती पर वह यहां जम गये।  मूल बात है अपना व्यवहार और योग्यता। इन दोनों के लिये अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली होना आवश्यक है। हिन्दी भाषा के ज्ञान से ऐसी शक्ति आती है। यह बात हमने इसलिये लिखी क्योंकि अब हमने हिन्दी भाषा से अलग होती एक हिंग्लिश भाषा का अभ्युदय भी देख लिया है जिसे बोलने वाले रोजी रोटी पाने के लिये जुगाड़ कर रहे हैं।   ऐसे में अध्यात्मिक रूप से बलशाली बने रहने के लिये हमारी वाणी, विचार तथा व्यवहार में शुद्ध हिन्दी का होना अनिवार्य है। 
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप",
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja  ‘‘Bharatdeep"
Gwalior, Madhya pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.कॉम

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Text Box:      गर्मी का समय था। स्कूल की इमारत के बाहर फूलों का पेड़ सूख रहा था। माली पास से गुजरा तो उसने उसे पुकार कर कहा‘-‘‘माली सर, आजकल आप मेरे पर पानी का छिड़काव नहीं करते हो। देखो, मैं गर्मी में  सूख रहा हूं।’’
माली ने कहा-‘‘तेरे पर पानी डालने का पैसा आजकल नहीं मिल रहा।  फाईल चालू है। जब पैसा मंजूर हो जायेगा। तेरा उद्धार अवश्य करूंगा।’’
     माली चला गया।  बहुत दिन बात आया तो उसके हाथ में पानी का बाल्टी थी। वह जब उस पर डालने के लिये उद्यत हुआ तो पेड़ ने कहा‘‘माली सर, अब छिड़काव की जरूरत नहीं है।  इतनी बरसात हो गयी है कि मैं पानी में आकंठ डूबा  हुआ हूं। लगता है सड़ न जाऊं। ऐसा करो पानी कहीं दूसरी जगह डालकर लोटे से मेरा यह पानी निकालो।’’
माली ने कहा-‘‘नहीं, मुझे पानी डालने का पैसा मिला है।  अब महीने भर तक यही कंरूगा। अगर तू मना करता है तो ठीक है कहीं  दूसरी जगह डाल दूंगा  पर  यह पानी की बाढ़ कम नहीं कर सकता क्योंकि इसका पैसा मुझे नहीं मिला।  अब जाकर तेरी दूसरी फाइल बनवाऊंगा। जब पैसा मंजूर होगा तब अगर तेरी मदद करूंगा।
      पेड़ ने कहा-‘‘जल्दी जाओ, पानी डालने का जो पैसा मिला  उसे बाढ़ राहत में बदलवाओ।‘‘
    माली ने कहा-‘‘नहीं, वह तो अब मेरे पास रहेगा। हां, तू यह शिकायत किसी से न करना कि मैं तुझ पर पानी नहीं डाल रहा वरना इस बाढ़ में तू सड़ जायेगा।’’ 
     वह माली दोबारा दिवाली पर आया तो देखा वह पेड़ मृतप्राय अवस्था में था।  माली के हाथ में खाली लोटा था।  उसने पेड़ से कहा-‘‘अरे, तेरा तो अब पानी उतर गया है।  तू तो यहां गिरी पड़ी अंतिम सांस ले रहा है।’’
   उस पेड़ ने कहा-‘‘ यह तेरी मेरी अंतिम मुलाकात है। बाढ़ ने इस बार इतना सताया कि अब मेरा अंतिम दिना आ गया है। अब तू यहां दूसरा पेड़ लगाने की तैयारी कर। हो सकता है कि दूसरा जन्म लेकर वापस आऊं’’
  माली ने कहा-‘‘वह तो ठीक है ! पर एक बात कह देता हूं  कि मरने के बाद मेरी यह शिकायत किसी से न करना कि मैने तेरा पानी नहीं निकाला वरना यहां दूसरा पेड़ नहीं लगाउंगा। वरना तू पुनर्जन्म को तरस जायेगा।’’
      पेड़ मर गया और माली दूसरी फाईल बनाने चला गया। 


11/30/11

उपभोक्ता और किसान तो शोषण के लिये बना है-हिन्दी लेख (consumar and formers for earning-hindi article)

        किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर चल रही बहस में कई बातें दिलचस्प हैं। यकीनन अगर हम उनको सुने तो अपनी बात प्रभावी ढंग से न रख सकते हैं न सोच सकते हैं। जहां तक हमारी इस विषय पर अपनी सोच यह है कि अभी तक इससे देश के लाभ या हानियों पर किये गये अनुमान उस रूप में प्रकट नहीं होंगे जिस तरह व्यक्त किये जा रहे हैं।
            हम लाभ हानियों से अलग हटकर एक बात जरूर मानते हैं कि इस देश की समस्याओं का हल अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों के अनुरूप करने की बात तो यह कभी दिखाई नहीं दी। हम एक अर्थशास्त्री होने के नाते-अर्थशास्त्र हमारे अध्ययन के दौरान एक विषय रहा है इसलिये यह पदवी हमने स्वयंभू रूप से स्वयं धारण की है-मानते हैं कि अगर इस देश में राज्य प्रबंध अगर प्रत्येक गांव में स्वच्छ पानी, पक्की सड़क तथा बिजली की व्यवस्था कर ले तो इस देश में आर्थिक समस्यायें नगण्य रह जायेंगी। यह अलग बात है कि आज़ादी   के बाद इस पर भारी पैसा खर्च हुआ पर भ्रष्टाचार के कारण परिणाम शून्य ही रहा। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा तथा भुखमरी जैसी समस्यायें पूरी तरह से खत्म भले न हों पर वह गंभीर चिंता का विषय नहीं रहेगी। मूल बात कहें तो सरकार कल्याण के नाम पर दूसरे काम न भी करे तो चल जायेगा।
          यह कोई  अनिवार्य  शर्त नहीं हो सकती है कि गांव के विषय पर लिखने के लिये वहां पैदा होना जरूरी है। हम शहर में जन्मे हैं पर अनेक बार गांवों में जाने का अवसर मिला। उससे यह लगता है कि वहां मूलभूत सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है। बरसात के दिनों में जब गांवों में सब्जी, गेंहु, चावल तथा दूध अधिक मात्रा में होता है तब वहां से उसे निकालकर शहर पहुंचाने के लिये कितनी मुश्किल होती है यह हमने स्वयं देखा है। उस समय अशुद्ध जल की वजह से बीमारी अपना रौद्र रूप दिखाती है तब यह गांव के मार्ग इस कदर नाले में बदल जाते हैं कि रात को किसी मरीज को गांव से बाहर पास के बड़े गांव या शहर ले जाना लगभग असंभव होता है। इसी कारण छोटी बीमारी में लोग वहां मर जाते हैं। गांव में अगर अस्पताल भी हो तो वहां चिकित्सक पहुंच नहीं सकता। वैसे सामान्य हालत में भी स्वास्थ्य कमी वहां पहुचंने से कतराते हैं। अगर आजादी के बाद हम देश के पूरे गांवों में शुद्ध जल, बिजली और पक्की सड़क जैसी सुविधायें नहीं पहुंच पाये तो यह संकट हमारी प्रबंध व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। शहरों के पास जो गांव हैं उनमें शायद ऐसा आधारभूत ढांचा मिल जाये पर जो दूर हैं उनकी समस्याओं पर कितना सोचा गया यह अलग से विचार का विषय है।
     विदेशी कंपनिंयां अगर भारत आ रही हैं तो वह कोई आधारभूत ढांचा नहीं बनायेंगी बल्कि उनका अपनी सुविधानुसार दोहन ही करेंगी। जहां आधारभूत ढांचा नहंी है वहां उनको उन्हीं बिचौलियों पर निर्भर रहना होगा जिनको हटाने की बात हो रही है। इधर हम सुन रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप गंभीर रूप से आर्थिक संकट में हैं और अब वहां विकासशील देशों के निचले स्तर पर जाकर कमाने की बात हो रही है। हमने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को यह कहते हुए पढ़ा था कि हमें विदेशों में जाकर छोटे स्तर पर काम करना होगा। अमेरिका की विदेशमंत्राणी हेनरी क्लिंटन ने भी कहा था कि काम के बारे में भारतीयों से सीखना चाहिए।
          बहरहाल इस बहस में एक महत्वपूर्ण समाचार पर चर्चा किसी ने नहीं की कि अमेरिका ने पाकिस्तान के 28 सैनिकों को मार दिया जिससे दोनों देशों के बीच गंभीर तनाव है। पाकिस्तान ने अपना एक हवाई अड्डा अमेरिकी सेना से खाली करने को कहा है। इतना ही नही उसने संयुक्त राष्ट्र में भी यह मामला उठाया है। भारतीय प्रचार माध्यम इस पर खबर देकर चुप हो गये हैं। उनको शायद इसका अंदाजा नहीं है कि अंततः यह तनाव युद्ध में बदल सकता है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के हाथ से निकल गया तो उसका राजनीतिक प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप से करीब करीब खत्म होने जैसा ही है। हमारा मानना है कि अमेरिका से अधिक मित्रता से अब कोई लाभ नहीं है। वह सामरिक रूप से शक्तिशाली है पर उसका आर्थिक ढांचा करीब करीब गड़बड़ाने लगा है। ऐसे में पाकिस्तान की राजनीतिक बगावत उसके सम्राज्य में आखिरी कील की तरह लग सकती है। देखा जाये तो पाकिस्तान अपने सहधर्मी देशों का एक तरह से प्रवेश द्वार है। भले ही वह एक सार्वभौमिक राष्ट्र की तरह दिखता है पर संक्रमण काल में उसकी सरकार की बैठक सऊदी अरब में होती है तो क्रमवार होने वाले क्रिकेट मैच दुबई या आबुधाबी में होते हैं। जिन दूसरे देशों की क्रिकेट टीमों का क्रम में पाकिस्तान का दौरा होता है वह दुबई या आबुधाबी में उसके साथ मैच खेलती हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ अमेेरिका का तनाव मध्यएशियाई देशों तक विस्तृत हो सकता है। यह देश एक तरह से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं।
         बहरहाल अब बड़े विषयों पर बड़े विद्वानों की चर्चा सुनकर ऐसा लगता है कि निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रेक्षकों की बातें दमदार होती हैं पर महत्व केवल संगठित विद्वानों को ही दिया जा रहा है। अनेक स्वतंत्र विद्वानों ने किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर अपनी राय बेबाकी रूप से रखी। वह इससे चिंतित नहीं है पर खुश भी नहीं है। जहां तक किसानों और उपभोक्ताओं के हित का प्रश्न है तो सवाल यह है कि इन दोनों रूपों में हर मनुष्य शोषित होता है और अगर उसे प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाये तो पूरी दुनियां का व्यापार ही ठप्प हो जाये। वाल मार्ट आये या नहीं यह समस्या शोषितों के आपसी द्वंद्व का विषय है। यह अलग बात है कि समय के अनुसार बाज़ार और प्रचार के अनुसार समाज का स्वरूप बदलता रहता है और उसे रोकना कठिन है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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11/5/11

एक पाठ ने ही अन्ना हजारे के ब्लॉग को उखाड़ दिया-हिन्दी लेख (one post destroyd anna hazare's blog-hindi lekh article)

                अन्ना हजारे ने अपना ब्लॉग बंद करने का निर्णय लिया है। वैसे तो इस देश में बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने उनका ब्लॉग देखा होगा क्योंकि उस पर पाठ प्रकाशित होता ही था कि प्रचार माध्यम उसे अपने मंच पर मुख्य समाचार की तरह उपयोग करते रहे जिसकी वजह से उसको देखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। ऐसे में ब्लॉग होने का प्रभाव बाजार समर्थित प्रचार माध्यमों पर ही पड़ेगा जिनके लिये सनसनी फैलाने वाला एक स्त्रोत कम हो जायेगा। वैसे यहां भी स्पष्ट कर दें कि इस देश में गहरा चिंत्तन करने वाले पहले अन्ना हजारे की टीम के सदस्यों पर वर्तमान बाज़ार से समर्थित होने का आरोप लगाते थे तो अब उनको अन्ना का संपूर्ण आंदोलन ही प्रायोजित दिख रहा है। श्री अन्ना हजारे का ब्लॉग बंद होने का फैसला उनकी दृढ़ मानसिक शक्ति पर प्रश्न खड़े करेगा इसमें संशय नहीं है।
         आखिर वह कौनसा पाठ है जिसमें ऐसा कुछ आ गया कि उनको लगा कि यह ब्लॉग बंद करना ही श्रेयस्कर है? अन्ना को अपने प्रचार के लिये वैसे ही किसी ब्लॉग की आवश्यकता नहीं थी तब क्या बाज़ार के प्रायोजन की वजह से उन्होंने इसे बनाया। दरअसल वर्तमान बाज़ार जिसे भी नायक बनाता है उसका ब्लॉग अवश्य फैशन के तौर पर जरूर बनवाता है। इससे वह एक तीर से दो शिकार करता है। एक तो नई पीढ़ी को अपने नायक की अंतर्जालीय छवि से घेरता है दूसरा यह कि टेलीफोन कंपनियों के कनेक्शन कम होने की संभावना बच जाते हैं जिनका खतरा उनको हमेशा बना रहता है। सीधी बात कहें तो अन्ना हजारे के पीछे कहीं न कहीं बाज़ार का प्रायोजन है और इसी कारण उनके यह ब्लॉग बना भी होगा। इसका लेखक भी उनका सहयोगी था जिसको वह अपनी बात लिख कर देते और वह उसे चिट्ठी के साथ टंकित कर प्रकाशित करता था। अनेक पाठ चर्चित हुए। जब अन्ना मौन थे तब ब्लॉग के माध्यम से वह जनता से जुड़े रहे। अब उनके ब्लॉगर सहयोगी ने उनकी एक अहस्ताक्षरित चिट्ठी के साथ एक पाठ प्रकाशित किया जिसमें अन्ना टीम के सदस्यों को अलोकतांत्रिक बताते हुए टीम में सदस्यों में बदलाव की बात कही है। अन्ना ने अपने ब्लॉगर से सहमत होने की बात से अब इंकार करते हुए बताया कि वह अपने विचार कहीं लिख लेते थे। एक समय उन्हें अपनी टीम के बारे में ऐसा विचार आया था तो लिख लिया पर उसे प्रेषित करने के लिये ब्लॉगर को नहीं दिया। उस ब्लॉगर को केवल हस्ताक्षरित पत्र प्रकाशित करने का अधिकार दिया था। अगर उनका यह स्पष्टीकरण सही माना जाये तो लगता है चूंकि वह ब्लॉगर उनका निकटस्थ है इसलिये ऐसा कागज उसके पास रह सकता है भले ही उसे प्रकाशन का अधिकार न मिला हो। अन्ना का यह विचार उसने अनाधिकार छापा है-यही स्पष्टीकरण अन्ना हजारे साहिब ने दिया है।
              गंभीर चिंतकों की नज़र में अन्ना ने पहली ऐसी रणनीतिक गलती की है जो उनके व्यक्तित्व में गिरावट दर्ज करेगी। जब देश में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात आती है तब अन्ना हजारे को एक महानायकत्व का दर्जा देने का प्रयास प्रचार माध्यम करते हैं। जब तक आंदोलन किनारे पर था तब लोगों ने उसका अधिक अध्ययन नहीं किया और उस समय अन्ना सारे निर्णय स्वयं करते हुए एक चतुर व्यक्ति लगे। जब यह लोगों की समंदरनुमा भीड़ में आया तब धीरे धीरे लगा कि अन्ना हजारे एक ऐसा शीर्षक है जिसमें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अनेक उपशीर्षकों के साथ एक बड़ा पाठ होगा। मतलब अन्ना हजारे एक नाम भर है। बाज़ार से प्रायोजित होने के प्रत्यक्ष प्रमाण भले न हो पर अन्ना टीम के सभी वरिष्ठ सदस्य ऐसे स्वयंसेवी संगठनों के कर्ताधर्ता हैं जो अपने कथित सामाजिक लक्ष्यों के लिये राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार से दान या चंदे के रूप में धन प्राप्त करते हैं। तय बात है कि बाज़ार का सामाजिक उद्देश्य लोगों को अपने हित में साधे रहना होता है। कम से कम आज के आधुनिक युग में कोई भी व्यवसायिक परिवार, संगठन या समूह धर्म के नाम दान या चंदा नहीं देता जब तब उसका कोई आर्थिक हित न पूरा होता हो। ऐसे में अन्ना की टीम के सहयोगी पेशेवर समाज सेवक हैं और उनसे यह अपेक्षा करना कि वह अपने चंदादाताओं का ध्यान नहीं रखेंगे यह सोचना गलत होगा।
          बहरहाल अन्ना के सहयोगी ब्लॉगर ने अन्ना टीम के उन्हीं सहयोगियों के बारे अन्ना के ही ऐसे विचार प्रकट किये जो प्रचार माध्यमों में समाचारों के दौरान उनकी मानसिक हलचल को बयान करते थे। हस्ताक्षर नहंी है इससे यह तो माना जा सकता है कि उनमें निर्णायक तत्व नहीं है पर इतना तय है कि उनके सहयोगियों की स्थिति अब डांवाडोल हो रही है। यह सच है कि मानसिक हलचल के समय विचारों का उतारचढ़ाव आता है। उनको स्थिर मानकर उन पर प्रतिक्रिया देना तब तक ठीक नहीं है जब उनमें व्यक्ति का निर्णायक तत्व प्रमाणित नहीं है। हम अन्ना साहब की सफाई को स्वीकार करते हैं पर ब्लॉग बंद करने का निर्णय इस बात को दर्शाता है कि वह डर गये हैं। जिन सहयोगियों की आलोचना ब्लॉग में है वह अगर तत्काल स्वयं ही अन्ना टीम से हट जायें तो उनका आंदोलन हाल ही टॉय टॉय फिस्स हो जायेगा। बाजार से पैसा जुटाने वाले उनके वर्तमान सहयोगियों को संगठित प्रचार समूह का समर्थन भी इसलिये मिला है क्योंकि कहीं न कहीं से उनको आपने धनदाताओं से ऐसे निर्देश मिले हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जनमानस में बना रहना चाहिए। इसके अलावा अन्य ने महानायकत्व की ऐसी छवि बना ली है जिसके निकट अन्य व्यक्तित्व पनप नहीं सकता। उन्होंने करीब करीब देश के सारे बड़े संगठनों से दूरी बना ली है। ऐसे में उनकी टीम के चार बलशाली सदस्य अगर उनका साथ छोड़ दें तो फिर अन्ना के लिये रालेगण सिद्धि से दिल्ली आना भी कठिन हो जायेगा। देश में सक्रिय बौद्धिक वर्ग तथा स्थापित सामाजिक संगठन अब अन्ना हजारे के आंदोलन को सक्रिय सहयोग  शायद ही दें।
         ऐसे में अपनी टीम के इन सदस्यों को प्रसन्न करने के लिये अन्ना हजारे ने ब्लॉग बंद करने का फैसला सुनाया पर इससे रूप से यह अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भी हमारे सामने आ गया है कि अन्ना अपने आंदोलन की स्थिति को जानते हैं। अपनी गांधी जैसी छवि बनते देखकर वह खुश हो रहे हैं और उनको लगता है कि उनकी वर्तमान टीम ही इसमें सबसे अधिक मददगार है। जहां तक आंदोलन के नतीजों का सवाल है इस पर हम पहले भी बहुत कुछ लिख चुके हैं। गांधीजी ने हिंसा होने पर अपना एक आंदोलन वापस ले लिया था पर इससे उनकी छवि एक अहिंसक रूप में बढ़ी थी जबकि अन्ना साहेब ने अपना ब्लॉग लेकर यह साबित किया कि एक पाठ ने ही उनके ब्लॉग को उखाड़ दिया जो कि उनकी मानसिक हलचल का परिणाम रहा।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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10/22/11

लीबिया के तानाशाह गद्दाफी की मौत, राजसी वृत्ति और कर्म करने वाले लोगों के लिये सबक-हिन्दी लेख

                लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को आज से 42 वर्ष पूर्व अगर कोई अपनी उस प्रकार की मृत्यु की तस्वीर खींचकर बता देता तो वह कतई राजनीति में नहीं आता। लीबिया के सर्वोच्च पद पर रहते हुए उसने ढेर सारे सुख भोगे होंगे। उन सुखों की कल्पना तक उसने बचपन में नही की होगी। वह बेखटके अपने राज्य सुख भोगता रहा। इस दौरान अपनी शक्ति में मदांध होकर उसने अनेक ऐसे भी काम किये होंगे जो कि राजस पुरुष के हाथ से अहंकारवश हो ही जाते हैं। अगर उसे कोई भविष्यवाणी कर यह बता देता कि राज्य प्रमुख पद पर प्रतिष्ठित होने से उसको इस तरह की मौत मिलेगी तो वह हर हाल में रहना मंजूर करता पर राजनीति में नहीं आता। मिठाई खाने वाले को अगर यह बताया जाये कि उसकी मिठाई में जहर है तो वह उसे नहीं खायेगा। इंसान कितना भी भूखा हो पर पर उसमें जहर होने की सूचना उसे विरक्त कर देती है।
         ऐसा हमेशा होता नहीं है कि आदमी अपने कर्म फल का अनुमान करे। विश्व भर में अनेक ज्योतिषवेता हैं पर वह ऐसी भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि किसी की मौत दर्दनाक होगी या सहज। अनुमान से किसी की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो जाये पर उसके लिये संयोग जिम्मेदार होता है। इसके बावजूद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि अंततः राजस कर्म का परिणाम अहंकार, लोभ तथा काम के कारण दुःख के रूप में प्रकट होता है। पहले तो सात्विक लोग राजस कर्म करते नहीं पर अगर करें तो वह सात्विक मार्ग पर नहीं चल सकते। अक्सर लोगों को लगता है कि राजकाज में संलग्न रहना ही राजस कर्म है पर ज्ञानी जानते हैं कि राजस भाव अधिकतर सभी लोगों में रहता है-यह अलग बात है कि कुछ लोग सहजता से राजसी कर्म करते हैं तो कुछ तामस प्रवृत्ति की सहायत लेते हैं जैसा कि गद्दाफी ने किया।
        मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि वह अपने सांसरिक कर्म से अन्य मनुष्यों पर शासन करना चाहता है। सभी लोग राजा बनकर प्रजा पर शासन करे यह जरूरी नहीं है पर अपने आसपास के लोगों से प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहना भी इसी प्रवृत्ति का प्रतीक है। यही राजस भाव है जो कि अंततः सुख के बाद दुःख का कारण बनता है।
गद्दाफी को एकदम बेरहमी से मारा गया। इतनी बेरहमी से कोई आवारा कुत्ते को भी नहीं मारता। उसके शरीर में गोलियां लग चुकी थीं। वह खून से सराबोर था। उसे जब अस्पताल ले जाने की आवश्यकता थी तब लोग उसे पीट रहे थे। अगर इस तरह कोई व्यक्ति राह पर दुर्घटना के बाद मिले तो अनजान लोग भी उसकी सहायता के लिये आयेंगे जबकि गद्दाफी पिट रहा था। उसीे घायल तस्वीरें टीवी चैनलों पर दिखाकर बताया गया कि उसका खून गोलियां लगने के कारण निकल रहा था। देखा जाये तो गोलियां ताजा लगी थीं और जिस तरह उसकी स्थिति थी उसे देखकर प्रतीत होता था कि अगर उस समय भी वह अस्पताल ले जाया जाता तो बचता नहीं क्योंकि कालांतर में गोलियों की पीड़ा बढ़ने और रक्त स्त्राव से उसका जीवन नष्ट होना था। गद्दाफी के 42 वर्ष के सौभाग्य ने साथ छोड़ा तो पलभर का दुर्भाग्य उसके लिये मौत का संदेश ले आया।
        गद्दाफी की यह मौत अच्छे खासे आदमी को राजकाज के कर्म में लिप्त होने से रोक सकती है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि अमेरिका से मित्रता रखने वाले देशों के राज्यप्रमुखों को भी डरा सकती है। यह सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका पूरे विश्व का खैरख्वाह बन गया हैं मध्यएशिया के तेल उत्पादक देशों पर उसका नियंत्रण रहा है। जो भी वहां तानाशह है वह अभी तक किसी न किसी रूप में उसके हितचिंतक ही रहे हैं। इराक के सद्दाम हुसैन अमेरिका तो गद्दाफी ब्रिटेन के प्रिय रहे पर अंततः दोनों को बुरी मौत मिली। ऐसे में जिन लोगों को अमेरिका और ब्रिटेन से राजनीतिक या आर्थिक मदद मिलती है उन्हें यह समझना चाहिए कि पश्चिमी देश किसी के सगे नहीं है। उल्टे उनके निकट रहने से सारी कमजोरियां उनकी नज़र में आ जाती हैं और समय आने पर वह पुराने मित्र को निपटाने के लिये नये शत्रु खड़े कर बुरी हालत कर देते हैं। सद्दाम हुसैन और गद्दाफी को निपटाने क्रे लिये उनके ही देश में विरोधी खड़े किये। फिर पश्चिमी देशों ने पहले उनकी सेना को तहस नहस किया जिससे विद्रोहियों ने उनको निपटाया। दूसरी बात यह कि अगर अमेरिका या ब्रिटेन का एक बात पल्लू पकड़ा तो फिर उसे छुड़ाने का प्रयास करने की बजाय नियमित रूप उसे उनके सामने अपनी उपयोगिता साबित करना चाहिए।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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9/15/11

अमेरिकी साम्राज्यवादी और भारत के जनवादी बुद्धिजीवी-हिन्दी लेख (america aur indian indian janvadi buddhijivi-hindi lekh

         अमेरिका के प्रतिवेदनों पर भारतीय प्रचार माध्यम इतना हल्ला क्यों मचाता है? ऐसा लगता है अमेरिका दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस है जो उनका गोपनीय प्रतिवेदन लिखता है। मजे की बात यह है कि जिन लोगों का गोपनीय प्रतिवेदन प्रतिकूल होता है वह कभी उसका विरोध नहीं करते और जिनका प्रशंसनीय है वह उछलने लगते हैैं। कभी कभी तो यह देखकर हैरानी होती है कि शिखर पुरुषों के दिल का हाल उनके देश के लोग तक नहीं जान पाते पर अमेरिका राजनयिक को पता लग जाता है वह भी उनके ही श्रीमुख से! खंडन होना चाहिए पर होता नहीं। कई बार तो निंदा योग्य बयानों की भी निंदा नहीं होती।
          अभी तक वामपंथी बुद्धिजीवियों से अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोध करने का नारा सुनते थे मगर तब यह समझ में नहीं आता था कि आखिर यह है किस प्रकार का! दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवियों ने पूंजीवाद और अमेरिका का विरोध एक साथ किया है इसलिये हमेशा ही उनके बारे में भ्रमपूर्ण स्थिति रही है। चूंकि वामपंथी पूंजी पर राज्य के नियंत्रण की बात करते हैं तो भारतीय समाज उसे स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि राज्य के नियंत्रण से भी देश का कोई भला नहीं हुआ! फिर आज की कंपनी प्रणाली जरूर ब्रिटेन और अमेरिका की देन हो पर समाज में पूंजी और श्रम की अपनी स्वायत्ता तो भारतीय अर्थशास्त्र की ही देन है। राज्य को अनियंत्रित पूंजी के मद से उपजे अपराध तथा श्रम का शोषण रोकने का अधिकार तो भारतीय अर्थशास्त्र मानता है पर वह उनका निंयत्रणकर्ता होना उसमें स्वीकार नहीं है। यहीं आकर भारतीय समाज वामपंथियों से छिटक जाता है क्योंकि उसको लगता है कि उसकी आर्थिक और श्रमशील गतिविधियों पर राज्य का नियत्रंण नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोधक होने का दावा करने वाले वामपंथी कभी भारतीय समाज में स्थान नहीं बना पाये।
           दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी अमेरिकी साम्राज्य के भौतिक स्वरूप का ही बखान करते हैं। उसने जापान पर बम फैंका, उसने जर्मनी को रौंदा तथा वियतनाम पर हमला किया, तथा उसने अफगानिस्तान पर हमला किया तथा इराक पर हमला किया आदि बातें कहकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज को आंदोलित करने का प्रयास किया मगर अभौतिक या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने जो कारगुजारियां की इसकी चर्चा नहीं की।
             वामपंथी अब भी कहते हैं कि अमेरिका साम्राज्यवाद फैला रहा है! इसका मतलब वह केवल इतिहास में जीते हैं। सच बात तो यह है कि अमेरिका सभी जगह राज्य कर रहा है। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने हमेशा ही इतिहास सुनाया है-यह हो गया, वह हो गया, इसलिये अब यह होगा और वह होगा। प्रतिरोध करने के नाम पर चंद नारे लगा लिये और कभी कभार प्रदर्शन कर लिया। यह देखा ही नहीं कि अमेरिका धीरे धीरे अब दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस बनता जा रहा है।
         अपने प्रचार माध्यमों ने हद ही कर दी है। अमेरिका किसी भी देश के शिखर पुरुष का गोपनीय प्रतिवेदन जारी करता है तो अपने यहां के प्रचार माध्यम उसे ऐसे उठाये घूमते हैं जैसे कि इस नये वैश्विक ब्रह्मा ने कोई नयी बात कर दी हो। दरअसल हमारे देश के प्रचार माध्यमों का आधार पूंजी है और जिसका उद्गमा स्थल ऐसा लगता है अमेरिका है। सभी विकासशील देशों के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुष अमेरिका पैसा भेजते हैं पर वह विनिवेश होकर यहां आता है। आर्थिक और सामाजिक शिखर पुरुषों की बात तो छोड़िये हमारे देश के धार्मिक पुरुष भी अमेरिका के अनुयायी लगते हैं। इनमें से कई अपने शिष्यों को दर्शन देने अमेरिका जाते हैं।
        वामपंथी बुद्धिजीवी भारत में बढ़ती महंगाई का राज नहीं जान पाये। क्या उनको नहीं है कि इस देश में पांच सौ और हजार के नोट के लिये आसानी से प्रचलन में रहें इसके लिये महंगाई योजना पूर्वक बढ़ाई जा रही है। देश की कंपनियां आम जनमानस को अपनी जेब में पांच सौ और हजार के नोट जेब में घूमते देखना चाहती हैं। ऐसा लगता है कि भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व के विकासशील देशों में पेट्रोल की आड़ में महंगाई खेल हो रहा है। कम से कम भारत में तो स्थिति अजीब है। इधर सुनने में आ रहा था कि पेट्रोल के दाम गिरेंगे पर भारत कंपनियों ने फिर उसे बढ़ा दिया।
          भारत से रुपया बाहर जाता है तो डालर बन जाता है। अगर मान लीजिये किसी ने आज एक हजार रुपये अमेरिका या अन्य देश की बैंक में जमा किया तो उसके खाते में बीस डॉलर जमा होंगे। काला धन जमा करने वालों ब्याज तो मिलना दूर उनको रखने के पैसे भी देने पड़ते हैं-ऐसा हमने प्रचार माध्यमों में पढ़ा और सुना है। अगर भारतीय रुपया स्थिर रहा तो यह बीस डॉलर देश में आयेंगे एक हजार के रूप में। अगर रुपया गिरा तो विदेश में काला धन जमा करने वाला को ही लाभ होता है। समझ लीजिये साठ रुपये के मुकाबले एक डालर का मूल्य निर्धारित हुआ तो यह बीस डॉलर बारह सौ रुपये हो जायेंगे। इसी तरह भारतीय जमाकर्ता फायदे में रहेगा।
         फिर विदेश रुपया भेजने के लिये मोटी रकम होती होगी। अक्सर कहा जाता है कि हजार पांच सौ रुपये के नोट से मुद्रा का आवागमन सुविधाजनक होता है-यह अलग बात है कि हमारे यहां अभी भी अनेक लोग इसे देख भी नहीं पाते होंगे। अगर भेजी जाने वाली रकम सौ या पचास रुपये की होगी तो ढेर सारे ड्रम भर जायेंगे। इसलिये हजार रुपये का नोट ज्यादा उपयोगी है। मुश्किल दूसरी है कि हजार और पांच सौ के नोट छोटी वस्तुओं के खरीदने में अभी पूरी तरह सहायक नहीं है। इसलिये यह लगता है कि इस देश को हजार और पांच सौ नोट के लायक बनाया जा रहा है।
इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि हर क्षेत्र के शिखर पुरुष का ध्यान भारत पर कम अमेरिका पर अधिक रहता हैं। वहां का राष्ट्रपति क्या कह रहा है? वहां का अखबार क्या लिख रहा है? अमेरिका की भारत के शिखर पुरुषों बारे में क्या सोच है? इस पर भारतीय प्रचार माध्यम उछलते हैं। तय बात है कि प्रचार माध्यमों के मालिकों का कहीं न कहीं झुकाव अमेरिका के प्रति है तभी तो उनके कार्यकर्ता उसका प्रचार करते हैं।
        भारत के विकास का दावा संदेहास्पद भी इसी कारण से हो रहा है क्योंकि यहां सौ रुपये से ऊपर की मुद्रा का प्रचलन बढ़ रहा है। याद रखिये हमारी जानकारी के अनुसार किसी भी विकसित देश की मुद्रा सौ से अधिक की नहीं है।
दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी इतिहास का रोना रोते हुए अमेरिका को कोसते हैं पर नारों से आगे नही जाते। अपने वाद का झंडा उठाये हुए अमेरिका के रणनीतिकारों की चालाकियों को भांप नहीं पाते। वह भारतीय संदर्भों की बजाय विदेशी संदर्भों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। अमेरिका और कंपनी दैत्य किस तरह विश्व के आम जनमानस को त्रस्त कर रहा है इसका आभास नहीं है। अफगानिस्तान और इराक में उसकी सैन्य उपस्थिति पर हल्ला मचाने वाले भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी देश के अंदर ही स्थित अमेरिका के कंपनी दैत्य पर नज़र नहीं रख पाते। देश के आम आदमी को पांच सौ और हजार के नोट के उपयोग लायक बनाने की जो योजना चलती दिख रही है उसका आभास हमें इसलिये भी होता है कि दिन ब दिन महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि आने वाले समय में समाज का निम्न मध्यम वर्ग भरभर्राकर ढहते हुए गरीबी की रेखा के नीचे जाता दिख रहा है। मध्यम वर्ग गरीब होता जा रहा है तो उच्च मध्यम वर्ग तरक्की कर अमीर बन गया है। यह विषम आर्थिक स्तर देश के समाज को किस तरह नष्ट करेगा इसका अनुमान किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने शायद ही किया हो।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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7/4/11

हम प्रबंध योग सीख लें-हिन्दी व्यंग्य (hum prabandhyog seekh len-hindi vyangya)

          देखा जाये तो अपना देश अब गरीबों का देश भले ही है पर गरीब नहीं है। सोने की चिड़िया पहले भी था अब भी है। यह अलग बात है कि अभी तक तो यह चिड़ियायें पैदा होकर विदेशों में घोंसला बना लेती और अपने यहां लोग हाथ मलते। कहने को तो यह भी कहा जाता है कि यहां कभी दूध की नदियां बहती थी अब भी बहती हैं पर उनमें दूघ कितना असली है और कितना नकली यह अन्वेषण का विषय है।
          हम दरअसल स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन और केरल के पद्मनाभ मंदिर में मिले खजाने की बात कर रहे हैं। इस खबर ने हमारे दिलोदिमाग के सारे तार हिला दिये हैं कि पदम्नाभ मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ के हीरे जवाहरात, कीमती सिक्के और सोने के आभूषण मिले हैं। अभी कुछ अन्य कमरे खोले जाने हैं और यकीनन यह राशि बढ़ने वाली है। हम मान लेते हैं कि वहां चार लाख करोड़ से कुछ कम ही होगी। यह आंकड़ा स्विस बैंक में जमा भारतीयों की रकम का भी बताया जाता है। वैसे इस पर विवाद है। कोई कहता है कि दो लाख करोड़ है तो कोई कहता तीन तो कोई कहता है कि चार लाख करोड़। हम मान लेते हैं कि स्विस बैंकों में जमा काला धन और मंदिर में मिला लगभग बराबर की राशि का होगा। न हो तो कम बढ़ भी हो सकता है।
         हमें क्या? हम न स्विस बैंकों की प्रत्यक्ष जानकारी रखते हैं न ही पद्मनाभ मंदिर कभी गये हैं। सब अखबार और टीवी पता लगता है। जब लाख करोड़ की बात आती है तो लगता है कि दो अलग राशियां होंगी। तीन लाख करोड़ यानि तीन लाख और एक करोड़-यह राशियां मिलाकर पढ़ना कठिन लगता है। । अक्ल ज्यादा काम करती नहीं। करना चाहते भी नहीं क्योंकि अगर आंकड़ों में उलझे तो दिमाग काम करना बंद कर देगा।
          इधर खबरों पर खबरें इस तरह आ रही हैं कि पिछली खबर फलाप लगती है। सबसे पहले टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की बात सामने आयी। एक लाख 79 हजार करोड़ का घोटाला बताया गया। फिर स्विस बैंक के धन पर टीवी और अखबार में चले सार्वजनिक विवाद में चार लाख करोड़ के जमा होने की बात आई। विवाद और आंदोलन के चलते साधु संतों की संपत्ति की बात भी सामने आयी। हालांकि उनकी संपत्तियां हजार करोड़ में थी पर उनकी प्रसिद्धि के कारण राशियां महत्वपूर्ण नहीं थी। फिर पुट्टापर्थी के सत्य सांई बाबा की संपत्ति की चर्चा भी हुई तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गयी। चालीस हजारे करोड़ का अनुमान किया गया। यह रकम बहुत छोटी थी इसलिये स्विस बैंकों की दो से चार लाख करोड़ का मसला लगातार चलता रहा। अब पद्मनाभ मंदिर के खजाने मिलने की खबर से उस पर पानी फिर गया लगता है।
         पिछले कुछ दिनों से अनेक महानुभाव यह कह रहे हैं कि विदेशों में जमा भारत का धन वापस आ जाये तो देश का उद्धार हो जाये। अनेक लोग इस रकम का अर्थव्यवस्था के लिये अत्यंत महत्व बताते हुए अनेक तरह की विवेचना कर रहे हैं। अब पद्मनाभ मंदिर के नये खजाने की राशि के लिये भी यही कहा जा रहा है। ऐसे में हमारा कहना है कि जो महानुभाव विदेशों से काले धन को भारत लाने के लिये जूझ रहे हैं वह अपने प्रयास अब ऐसे उपलब्ध धन के सही उपयोग करने के लिये लगा दें। वैसे भी हमारे देश के सवौच्च न्यायालय ने विदेशों से काला धन लाने के लिये अपने संविधानिक प्रयास तेज कर दिये हैं इसलिये निज प्रयास अब महत्वहीन हो गये हैं। वैसे केरल के पद्मनाभ मंदिर का खजाना भी न्यायालीयन प्रयासों के कारण सामने आया है। यकीनन आगे यह देश के खजाने में जायेगा। उसके बाद न्यायालयीन प्रयासों की सीमा है। धन किस तरह कहां और कब खर्च हो यह तय करना अंततः देश के प्रबंधकों का है। ऐसे में उनकी कुशलता ही उसका सही उपयोग में सहयोग कर सकती है।
            यहीं आकर ऐसी समस्या शुरु होती है जिसे अर्थशास्त्र में भारत में कुशल प्रबंध का अभाव कहा जाता है। अगर आप देश की आर्थिक स्थिति की बात करें तो भूतकाल और वर्तमान काल में धन की बहुतायात के प्रमाण हैं। प्रकृति की कृपा से यहां दुनियां के अन्य स्थानों से जलस्तर बेहतर है इसलिये खेती तथा पशुपालन अधिक होता है। असली सोना तो वह है जो श्रमिक पैदा करता है यह अलग बात है कि उसके शोषक उसे धातु के सोने के बदलकर अपने पास रख लेते हैं। जब तक हिमालाय है तब तब गंगा और यमुना बहेगी और विंध्याचल है तो नर्मदा की कृपा भी रहेगी। मतलब भविष्य में भी यहां सोना उगना है पर हमारे देश के लोगों का प्रेम तो उस धातु के सोने से है जो यहां पैदा ही नहीं होता। मुख्य समस्या यह है कि हमारे देश में सामाजिक सामंजस्य कभी नहीं रहा दावे चाहे हम जितने भी करते रहें। जिसे कहीं धन, पद और बल मिला वह राज्य करना चाहता है। इससे भी वह संतुष्ट नहीं होता। मेरा राज्य है इसके प्रमाण के लिये शोषण और हिंसा करता है। राज्य का पद उपभोग के लिये माना जाता हैं जनहित करने के लिये नहीं। जनहित का काम तो भगवान के भरोसे है। किसी को एक रोटी की जगह दो देने की बजाय जिसके पास एक उसकी आधी भी छीनने का प्रयास किया जाता है यह सोचकर कि पेट भरना तो भगवान का काम है हमें तो अपना संसार निभाना है इसलिये किसी की रोटी छीने।
              भारतीय अध्यात्म में त्याग और दान की अत्यंत महिमा इसलिये ही बतायी गयी है कि धनिक, राजपदवान, तथा बाहबली आपने से कमजोर की रक्षा करें। भारतीय मनीषियों से पूर्वकाल में यह देखा होगा कि प्रकृति की कृपा के चलते यह देश संपन्न है पर यहां के लोग इसका महत्व न समझकर अपने अहंकार में डूबे हैं इसलिये उन्होंने समाज क सहज भाव से संचालन के सूत्र दिये। हुआ यह कि उनके इन्हीं सूत्रों को रटकर सुनाने वाले इसका व्यापार करते हैं। कहीं धर्म भाव तो कहीं कर्मकांड के नाम पर आम लोगों को भावनात्मक रूप से भ्रमित कर उसके पसीने से पैदा असली सोने को दलाल धातु के सोने में बदलकर अपनी तिजोरी भरने लगते हैं। वह अपने घर भरने में कुशल हैं पर प्रबंधन के नाम पर पैदल हैं। अलबत्ता समाज चलाने का प्रबंधन हथिया जरूर लेते हैं। जाति, भाषा, धर्म, व्यापार, समाज सेवा और जनस्वास्थ्य के लिये बने अनेक संगठन और समूह है पर प्रबंधन के नाम पर बस सभी लूटना जानते हैं। जिम्मेदारी की बात सभी करते हैं पर जिम्मेदार कहीं नहीं मिलतां
    हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि देश गरीब इसलिये नहीं है यहां धन नहीं है बल्कि उसका उपयेाग करना लोगों को नहीं आता। भ्रष्टाचार आदत नहीं शौक है। मजबूरी नहीं जिम्मेदारी है। जिसके पास राजपद है अगर वह उपरी कमाई न करे तो उसका सम्मान कहंीं नहीं रहता।
         स्विस बैंक हो या पद्मनाभ का मंदिर हमारे देश के खजाने की रकम बहुत बड़ी है। कुछ लोग तो कहते हैं कि ऐसे खजाने देश में अनेक जगह मिल सकते हैं। उनकी रकम इतनी होगी कि पूरे विश्व को पाल सकते हैं। यही कारण है कि विदेशों के अनेक राजा लुटेरे बनकर यहां आये। मुख्य सवाल यह है कि हमें पैसे का इस्तेमाल करना सीखना और सिखाना है। इसे हम प्रबंध योग भी कह सकते हैं। पतंजलि येाग में कहीं प्रबंध योग नहीं बताया जाता है पर अगर उसे कोई पढ़े और समझे तो वह अच्छा प्रबंध बन सकता है। मुख्य विषय संकल्प का है और वह यह कि पहले हम अपनी जिम्मेदारी निभाना सीखें। त्याग करना सीधें। संपत्ति संचय न करें। जब हम कोई आंदेालन और अभियान चलाते हैं तो स्पष्टतः यह बात हमारे मन में रहती है कि कोई दूसरा हमारा उद्देश्य पूरा करे। जबकि होना यह चाहिए कि हम आत्मनियंत्रित होकर काम करें।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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3/27/11

मनोरंजन में साम्राज्यवाद-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (manoranjan mein samrajyawad-hindi vyangya chittan)

प्रचार माध्यम लगातर बता रहे हैं कि मोहाली में भारत पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का महामुकाबला हो रहा है। कुछ लोग तो उसे फायनल तक कह रहे हैं। बाज़ार के सौदागर और उनके अनुचर प्रचार माध्यम इस मुकाबले के नकदीकरण के लिये जीजान से जुट गये हैं। दरअसल यह क्रिकेट पीसीबी  (pakistan cricket board) और बीसीसीआई (bhartiya cricket control  board) नामक दो क्लबों की टीमों का मैच है। पीसीबी पाकिस्तान तथा बीसीसीआई भारत की स्वयंभू क्रिकेट नियंत्रक संस्थाऐं जिनको अंतर्राष्ट्रीय क्र्रिकेट परिषद नामक एक अन्य संस्था लंदन से नियंत्रित करती है। यह सभी संस्थायें किसी सरकार ने बनाई जिनको देश का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है। यह सरकारें इन संस्थाओं पर अपना कोई विचार लाद नहीं सकती क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय खेल नियमों पर चलती हैं।
कहते हैं कि ‘झूठ के पांव नहीं होते हैं’। साथ ही यह भी कहा जाता है कि एक ही झूठ सौ बार बोला जाये तो वह सच लगने लगता है। पुराने कथनों कें ऐसे विरोधाभास ही उनके सतत चर्चा का कारण बनते हैं। जहां जैसा देखो पुराना कथन दोहरा दो। अब हम कहते हैं कि एक झूठ हजार बार बोलो तो वह महान सत्य और लाख बार बोलो तो शाश्वत सत्य हो जाता है। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों का समाज पर ऐसा जबरदस्त प्रभाव है कि उनकी बात की काट करना लगभग असंभव है और उनके फैलाये जा रहे भ्रम देखकर तो यही लगता है कि पुरानी ढेर सारी कहानियां भी शायद ऐसे ही कल्पना के आधार पर लिखी गयीं और उनके सतत प्रचार ने उनको ऐसा बना दिया कि लोग उसमें वर्णित नायकों तथा नायिकाओं को काल्पनिक कहने पर ही आपत्ति करने लगते हैं।
अब तो हद हो गयी है कि प्रचार माध्यमों ने एक खिलाड़ी को क्रिकेट का भगवान बना दिया जिसका प्रतीक बल्ला है। हमें इस पर भी आपत्ति नहीं है। वैसे कुछ मित्र समूहों में जब इस पर आपत्ति की तो मित्रगण नाराज हो गये तब तय किया कि यह आपत्ति बंद करना चाहिए। दूसरे की आस्था पर चोट पहुंचाने की क्रिया को हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तामस बुद्धि का प्रमाण मानता हैै। हमने बंद किया पर क्रिकेट के भगवान के भक्तों ने हद ही पार कर दी। उसके चलते हुए बल्ले की तुलना भगवान श्रीराम के टंकारते हुए धनुष तथा भगवान श्रीकृष्ण के घूमते हुए चक्र से कर डाली। हमें इस पर गुस्सा नहीं आया पर आपत्ति तो हुई। हमारा कहना है कि जब तुम्हारे क्रिकेट भगवान क पास बल्ला है तो उसके साथ धनुष तथा चक्र क्यों जोड़ रहे हो? भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण का नाम क्यों जोड़ रहे हो?
यह प्रयास ऐसा ही है जैसे कि एक झूठ को लाख बार बोलकर शाश्वत सत्य बनाया जाये। यह झूठ को पांव लगाने का यह एक व्यर्थ प्रयास है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का नाम एक कृत्रिम भगवान को पांव लगाने की कोशिश से अधिक कुछ नहीं है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने न तो अपने कर्म की फीस ली और न ही विज्ञापनों में अभिनय किया। सांसरिक रूप से दोनों त्यागी रहे। उनके भगवान तो फीस लेकर खेलते हैं, विज्ञापन में बताते है कि अमुक वस्तु या सेवा उपयोगी है उस पर पैसा खर्च करें। क्रिकेट के भगवान की छवि भोग, अहंकार तथा मोह को बढ़ाने वाली है और जिन भगवान श्रीराम तथा कृष्ण का वह नाम लेकर उसे चमका रहे हैं वह त्याग का प्रतीक हैं।
हैरानी की बात है कि किसी ने इस आपत्ति नहीं की। किसी वस्तु पर भगवान की तस्वीर देखकर लोग अपनी आस्था का रोना लेकर बैठ जाते हैं। किसी भारतीय भगवान का चेहरा लगाकर कोई नृत्य करता है तो उस पर भी आवाजें उठने लगती हैं। तब ऐसा लगता है कि हम भारतीय धर्म को लेकर कितना सजग हैं। जब किसी की क्रिकेट खिलाड़ी या फिल्म अभिनेता के साथ भगवान का नाम जोड़ा या कामेडी शो मे अध्यात्मिक के भगवान का नाम आता है तब सभी की जुबान तालु से क्यों चिपक जाती है? सीधा जवाब है कि धार्मिक उन्माद बढ़ाने वाला भी यह बाज़ार है जो ऐसे अवसरों पर पैसा खर्च करता है तो उनका उपयोग करने वाला भी यही बाज़ार है। बाज़ार और उसके प्रचारतंत्र के जाल में आम आदमी अपनी बुद्धि सहित कैद है भले ही अपने अंदर चेतना होने का वह कितना दावा करे। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में आंदोलन, अभियान तथा आंतक का आधार ही अर्थ है। यह अलग बात है कि अज्ञानी लोग उसमें धर्म, जाति, भाषा तथा क्षेत्रीय आधार पर उनका विश्लेषण करते हैं। वैचारिक समंदर में लोग उथले जल में ही तार्किक उछलकूद करते नज़र आते हैं।
पाकिस्तान के नाम से खेलने वाली पीसीबी तथा भारत के नाम से खेलने वाली बीसीसीआई की टीमों के मैच में देशभक्ति का दांव लगता है। अपने अध्यात्मिक दर्शन से दूर लोग इस मैच के प्रति ऐसे मोहित हो रहे हैं जैसे कि इससे कोई बहुत बड़ा चमत्कार सामने आने वाला है। मैच को जंग बताकर दोनों तरफ से बोले जा रहे वाक्यों को तीर या तलवार की तरह चलता दिखाया जा रहा है। भविष्यवक्ता अपने अपने हिसाब से भविष्यवाणी बता रहे हैं। मतलब प्रयास यही है कि क्रिकेट के नाम पर अधिक से अधिक पैसा लोगों की जेब से निकलवाया जाये। हैरानी की बात है कि एक तरफ कुछ खिलाड़ियों पर क्रिकेट मैचों में सट्टेबाजों से मिलकर खेल तथा परिणाम प्रभावित करने के आरोप लगते हैं। एक चैनल ने तो यह भी कहा है कि मोहाली का भारत पाकिस्तान मैच भी फिक्स हो सकता है। इसके बावजूद लोग मनोरंजन के लिये यह मैच देखना चाहते हैं। भारतीय दर्शक पीसीबी की टीम को अपनी टीम से हारते देखना चाहते हैं। यह मनोरंजन है यह मन में मौजूद अहंकार के भाव से उपजी साम्राज्यवादी प्रवत्ति है। हां, अपने कुल, शहर, प्रदेश तथा देश को विजेता देखने की इच्छा साम्राज्यवादी की प्रवृत्ति नहीं तो और क्या कही जा सकती है। कुछ लोग इसे देशभक्ति कहते हैं पर तब यह सवाल उठता है कि जिन भारतीयों को फिक्सिंग का दोषी पाया गया उनका क्या किया? देश के नाम से खेले जा रहे मैच में हार की फिक्सिंग करना आखिर क्या कहा जाना चाहिए? हम यहां देशद्रोह जैसा शब्द उपयोग नहीं कर सकते क्योंकि हमारा मानना है कि यह एक मनोरंजन का व्यापार है और उसमें देश, जाति, भाषा या धार्मिक समूहों के सिद्धांत लागू नहीं होते।
हमने इसे मनोरंजन का व्यापार भी इसलिये कहा क्योंकि जब मैचों के इनाम बंटते हैं तब उद्घोषक बताते हैं कि इसमें अमुक खिलाड़ी ने दर्शकों का ढेर सारा मनोरंजन किया। तब मनोरंजन में देशप्रेम जैसा शब्द ठीक नहीं लगता। एक चैनल तो बता रहा था कि ‘26/11 के बाद पहली बार पाकिस्तानी टीम भारत पहुंची है।’
हम अक्सर देखते हैं कि कोई आदमी कोई उपलब्धि पाकर घर लौटता है तो शहर के लोग उसका स्वागत करने पहुंचते हैं और कहते हैं कि ‘वह कामयाबी के बाद पहली बार घर आ रहा है।’
तब क्या यह माने कि 26/11 को मुंबई में हुई हिंसा ऐसा वाक्या है जिसका श्रेय पाकिस्तानी यानि पीसीबी की टीम को जाता है और मोहली पहुंचने पर उनका अभिनंदन किया गया। देश में क्रिकेट जुनून नहीं जुआ और सट्टा की गंदी आदत है जिससे क्रिकेट खेल के माध्यम से भुनाया जा रहा है मगर इसका मतलब यह नहीं कि जोश में आकर कुछ भी कहा दिया जाये। इसमें कोई संशय नहीं है कि 26/11 का हादसा भयानक था और पीसीबी की क्रिकेट टीम को उससे नहीं जोड़ना चाहिए। हम भी नहीं जोड़ते पर यह काम तो उसी बाज़ार के वही प्रचाकर कर रहे हैं जो आजकल के क्रिकेट से जमकर पैसा कमा रहे हैं।
यकीनन साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति मनोरंजन करते हुए भी मन में रहती है यह बात अब समझ में आने लगी है। लोग पाकिस्तानी या पीसीबी की क्रिकेट टीम को हारते देखना चाहते हैं कि उसके प्रति दुश्मनी का भाव रखते है, मगर फिल्मों में पाकिस्तानी गायकों को सुनते हैं। टीवी चैनलों पर पाकिस्तानी अभिनेता और अभिनेत्रियां आकर छा जाते हैं तब देशप्रेम कहां चला जाता है। उस यही बाज़ार और प्रचारक मित्रता का गाना गाने लगते हैं। आम आदमी में चिंतन क्षमता की कमी है और वह वही जाता है जहां प्रचारक उसे ले जाते हैं। मनोरंजन में साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति उसे इस बाज़ार का गुलाम बनाती है जो कभी दुश्मन तो कभी दोस्त बनने को मज़बूर करती है।
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2/1/11

साइकिल में स्वदेशी भाव-हिन्दी लेख (cycle and swadeshi aandolan-hindi lekh)

करीब दो वर्ष तीन माह से अब लीटर की नाप की जगह दाम बताकर पेट्रोल भरवाना प्रारंभ कर दिया है। उसमें तेल नहीं डलता। दाम बताकर पेट्रोल भरवाते हैं इसलिये उसका सही दाम नहीं मालुम। दरअसल हमने आलोच्य अवधि में ही स्कूटर छोड़कर नया दुपहिया वाहन लिया। जिसमें मीटर बताता है कि गाड़ी में पेट्रोल कितना है। जैसे ही मीटर के लाल संकेत की ऊपर वाली लाईन के पास कांटा आता है हम पेट्रोल भरवा लेते हैं। हमेशा ही सौ रुपये का भरवाते हैं और देख रहे हैं कि भाव बढ़ते बढ़ते पेट्रोल भरने के बाद कांटा अब पूर्णता के संकेत से नीचे आता जा रहा है। मतलब पेट्रोल के भाव बढ़ रहे हैं।
कल एटीएम से पैसे निकालने से पहले पेट्रोल भरवाया। जेब मे एक सौ क और एक पचास का नोट था। इसलिये पचास का ही भरवाया। कांटा कुछ ही ऊपर गया पर आज शाम घर आये तो लगा कि तेल संकेतक कांटा फिर अपनी जगह पेट्रोल भरवाने से पहले वाली लाईन पर आ गया है। मतलब एक दिन में पचास रुपये का पेट्रोल फूंक दिया। यह दाम जेब की लाल रेखा से ऊपर जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले पुरानी साइकिल बेचकर नई ली थी। वह भी लाल है पर जेब की की हरियाली बनाये रखने का काम करती है। बरसों से काम पर साइकिल से गये पर अब स्कूटर की आदत हो गयी है, मगर साइकिल चलाना जारी है। मुश्किल यह है कि वह नियमित आदत नहीं रही। नई साइकिल को हम रोज निहारते हैं क्योंकि मालुम है कि संकट की सच्ची साथी है। फिर टांगों को भी निहारते हैं जिन पर अब पहले से कम यकीन रहा है। इसलिये कभी कभी चार से पांच किलोमीटर साइकिल चला लेते हैं। चार पांच दिन के अंतराल से चलाने पर घुटने कुछ नाराजगी जताते हैं पर दम नहीं तोड़ते। लगातार तीन चार दिन चलाओ तो लगता है कि आदत बन रही है मगर छोड़ दें तो फिर मुश्किल आती है।
यह साइकिल करीब तीन हजार रुपये की छह माह पूर्व खरीदी थी पर उसका पैसा वसूलने के लिये समय चाहिए। हमारा अंदाजा है कि पिछले छह माह में सात सौ किलोमीटर से अधिक नहीं चलायी होगी-यह दूरी कम भी हो सकती है।
हमारा मानना है कि उसे तीन हजार किलोमीटर चलाकर ही कीमत की वसूली हो सकती है। अगर वह साइकिल हम काम पर भी ले जायें तो कम से कम पांच माह नियमित रूप से चलानी होगी तभी कीमत की वसूली मानी जा सकती है।
जिस दिन खरीदी थी उस दिन दुकानदार ने बताया था कि साइकिल किसी भी कंपनी की हो मगर वह बनती पंजाब में ही है। बताते हैं कि पंजाब में बनी साइकिलें विदेशों में निर्यात भी होती हैं। मतलब स्वदेशी हैं इसलिये इसमें संदेह नहीं है कि देश का भविष्य वही संभाले रहेंगी। पेट्रोल विदेशी उत्पाद है और कभी भी साथ छोड़ सकता है। आज सोच रहे हैं कि अब साइकिल पर अपनी आदत बढ़ाई जाये।
प्रसंगवश आज एक मित्र ने अपनी कार दिखाई जो उन्होंने एक वर्ष पूर्व खरीदी थी। अभी उन्होंने चलाना सीखा है और रास्ते में मिलने पर उन्होंने बताया कि उनकी गाड़ी डीजल से चलती है और एक किलोमीटर में बीस लीटर! डीजल 42 रुपयेे लीटर है और उनके अनुसार कहीं किराये से आने जाने पर लगने वाले पैसे से कम इस पर खर्च होता है।
सद्भावना से उन्होंने कहा कि-‘तुम भी कार खरीद क्यों नहीं लेते!’
हमने मित्र से कहा कि-‘आपके घर के मार्ग की सड़के सही और चौड़ी हैं और हम दूर रहते हैं। हमारा पेट्रोल तो सड़क जाम में ही खत्म हो जायेगा।’’
वह बोले-‘हां, यह तो ठीक है।’
हमने हंसते हुए कहा कि-‘हमने तो नई साइकिल खरीदी है। सड़क जाम में पेट्रोल फूंकते फूंकते तो लगता है कि वही चलाया करें!’
वह बोले-‘हां, आपके घर का मार्ग वाकई बहुत खराब है।’
बातचीत खत्म घर आये। समाचार चैनल खोले। कहीं क्रिकेट तो कहीं फिल्म तो कहीं कोई दूसरी बकवास चल रही थी। हर बार हम समाचार सुनने के लिये खोलते हैं। मालुम है कि देखाने सुनने को नहीं मिलेंगे पर आदत तो आदत है। वहीं एक जगह ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी कि मिस्र के जनआंदोलन की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर भारत में जल्दी महसूस किया जायेगा। यह सुनते ही मित्र से हुए वार्तालाप का स्मरण हुआ और हम गैलरी में खड़ी साइकिल के पास गये। उसे परसों ही चलाया था। उस पर हाथ फेरा जैसे निर्देश दे रहे हों कि तैयार हो जाओ स्वदेशी चाल पर चलने के लिये।
अब तो यह लगने लगा है कि जैसे सुविधाओं का गुलाम होना ही विदेशी गुलाम होने जैसा है। गांधी जी के स्वेदशी वस्तुओं के उपभोग करने के विचार की पूरा देश खिल्ली उड़ा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है पर कृत्रिम रूप से पेट्रोल प्रधान बना दिया गया है। पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो हर चीज़ के दाम बढ़ जाते हैं। ऐसी चीजों के दाम भी बढ़ने लगते हैं जिनका पेट्रोल से रिश्ता नहीं है पर मुश्किल यह है कि उसके उत्पादक और विक्रेता मोटर साइकिलों पर घूमते हैं और उनका निजी खर्च बढ़ता है। सो महंगाई बढ़नी है।
ऐसा लगता है कि देश के बाज़ार विशेषज्ञ देश के पांच सौ तथा हजार के नोट लायक बना रहे हैं। यह तभी हो पायेगा जब प्याज एक किलो और पेट्रोल एक लीटर आठ सौ रुपये हो जायेगा।
इसी प्रसंग पर अंतिम बात! लिखते लिखते टीवी पर आ रहे समाचार पर हमारी नज़र गयी। यह समाचार सुबह अखबार में पढ़ा था। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक कृत्रिम पेट्रोल का सृजन किया है जिसका प्रयोग सफल रहा तो वह तीन साल बाद बाज़ार में आ जायेगा। कीमत 15 रुपये लीटर होगी। मगर क्या तीन साल बाद इसकी कीमत इतनी रह पायेगी। भारत के बाज़ार नियंत्रकों के लिये यह खबर नींद उड़ाने वाली होगी क्योंकि तब देश के सभी लोगों को हजार और पांच सौ के उपयोग लायक बनाने के उनके प्रयास संकट में पड़ जायेंगे। यकीनन इस पेट्रोल का भारत में उपयोग रोकने की कोशिश होगी या फिर उसकी कीमत किसी भी तरह तमाक कर तथा अन्य प्रयास पेट्रोल जितनी बना दी जायेगी। इस तेल के खेल को भला कौन समझ पाया? साइकिल पर चले तो फिर समझने की जरूरत भी क्या रह जायेगी?
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11/30/10

विकिलीक्स के मनोरंजक खुलासे-हिन्दी लेख (wikileeks ke manoranjak khulase-hindi lekh)

हमारे देश में ऐसी बहुत बड़ी आबादी है जिसकी दिलचस्पी अमेरिका में इतनी नहीं है जितनी प्रचार माध्यम या विशिष्ट वर्ग के लोग लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जनसामान्य जागरुक नहीं है या समाचार पढ़ने या सुनने के उसके पास समय नहीं है। दरअसल देश के प्रचार माध्यम से जुड़े लोग यह मानकर चलते हैं कि गरीब, ठेले वाले, खोमचे वाले या तंागे वाले उनके प्रयोक्ता नहीं है और इसलिये वह पढ़े लिखे नौकरी या व्यवसाय करने वालों को ही लक्ष्य कर अपनी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यह उनका अज्ञान तथा अव्यवसायिक प्रवृत्ति का परिणाम है। शायद कुछ बुद्धिमान लोग बुरा मान जायें पर सच यह है कि समाचार पढ़ना तथा राजनीतिक ज्ञान रखना गरीबीया अमीरी से नहीं जुड़ा-यह तो ऐसा शौक है जिसको लग जाये तो वह छूटता नहीं है। चिंतन क्षमता केवल शिक्षित या शहरी लोगों के पास होने का उनका विचार खोखला है। कई बार तो ऐसा लगता है कि ग्रामीण और शिक्षित वर्ग का ज्ञान कहीं  अधिक है। सीधी बात कहें तो अमेरिका ने 1971 में भारत पाक युद्ध के समय अपना सातवां बेड़ा भारत के खिलाफ उतारने की घोषणा की थी और यह बात आज भी आम भारतीय के जेहन में है और वह उस पर यकीन नहीं करता। विकिलीक्स से बड़े शहरों के बुद्धिजीवी चौंक गये हैं पर उनमें कुछ ऐसा नहीं है कि आम भारतीय जनमानस प्रभावित या चिंतित हो।
विकिलीक्स ने अमेरिकी सरकार के गोपनीय दस्तावेजों का खुलासा किया है। यह एक बहुदेशीय वेबसाईट है। अनेक पत्रकार इसमें अपने पाठ या पोस्ट रखते हैं और उनकी जांच के बाद उनको प्रकाशित किया जाता है। अपनी भद्द पिटते देखकर अमेरिकी सरकार इसके विरुद्ध कार्यवाही करने में लगी है। वह अन्य देशों से इसे अनदेखा करने का आग्रह कर रही है। दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रचार की जिम्मेदारी लेने वाले अमेरिकी रणनीतिकार अब ठीक उलट बर्ताव कर रहे हैं।
अमेरिका की विदेश मंत्री हेनरी क्लिंटन ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारत के दावे का मखौल उड़ाने के साथ ही हमारे देश के विशिष्ट वर्ग की जासूसी करने को कहा है। बात तो यह है कि अमेरिका अपनी आर्थिक विवशताओं के चलते ही भारत को पुचकार रहा है वरना उसकी आत्मा तो खाड़ी देश और उनके मानस पुत्र पाकिस्तान में ही बसती है। इसलिए अपनी साम्राज्यवादी भूख मिटाने तथा हथियार बिकवाने के लिये पाकिस्तान को भी साथ रख रहा है। अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटने में भारतीय हितों की उसे परवाह नहीं है। उसका दोगलापन कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर चौंका जाये। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भी अब कितनी प्रासंगिक है यह भी हमारे लिये विचार का विषय है। ब्राजील, जापान, जर्मनी के साथ भारत को इसमें स्थाई सदस्यता दी भी गयी तो उसमें वीटो पॉवर का अधिकार मिलेगा इसमें संदेह है-कुछ प्रचार माध्यमों में इस आशय का समाचार बहुत पहले पढ़ने को मिला था कि अब नये स्थाई सदस्यों को इस तरह का अधिकार नहीं मिलेगा। बिना वीटो पॉवर की स्थाई सदस्यता को कोई मतलब नहीं है। यह अलग बात है कि अमेरिकी मोह में अंधे हो रहे प्रचार कर्मी उसकी हर बात को ब्रह्म वाक्य की तरह उछालते हैं। तब ऐसा भी लगता है कि वह अपने देश के जनमानस की बजाय पश्चिमी अप्रवासी भारतीयों को लिये अपने प्रसारण कर रहे हैं। अभी हाल ही में भारत के सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता पर भी जिस तरह खुश होकर यह प्रचार माध्यम चीख रहे थे वह हास्यप्रद था क्योंकि यह क्रमवार आधार पर नियम से मिलनी ही थी। समाचारों पर बहुत समय से रुचि लेने वाले आम पाठक यह जानते हैं कि अनेक अवसरों पर भारत को यह सदस्यता मिली पर उसकी बात सुनी नहीं गयी।
इस चर्चा में विकीलीक्स के खुलासे चिंतन से अधिक मनोरंजन के लिये है। जिस तरह विदेशी राष्ट्रों के लिये संबोधन चुने गये हैं उससे भारतीय टीवी चैनलों के हास्य कलाकारों की याद आती है। यह अलग बात है कि यह कलाकार पेशेवर होने के कारण अमेरिकी रणनीतिकारों से अधिक शालीन और प्रभावी शब्द इस्तेमाल करते हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रणनीतिकारों के दोहरेपन को प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है जो कि एक असामान्य घटना है। अमेरिकी जो कहते हैं और सोचते हैं इस पर अधिक माथा पच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। सच तो यह है कि विकिलीक्स के खुलासे देखकर कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अमेरिका एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बल्कि पूंजीवाद का उपनिवेश है जो व्यापार या बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। चाहे किसी भी देश के पूंजीपति या विशिष्ट वर्ग के लोग हैं अपने क्षेत्र में उसे कितनी भी गालियां देते हों पर अपनी संतान या संपत्ति वहां स्थापित करने में उनको अपनी तथा भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा नज़र आती है। तय बात है कि वह कभी वहां के रणनीतिकारों के निर्देश पर चलते हैं तो कभी उनको चलाते हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों की भी क्या कहने? एक ग्राहक कुछ मांगता है दूसरे से उसकी आपूर्ति करवाते हैं। दूसरा कहे तो तीसरे से करवाते हैं। खुलासों से पता लगता है कि खाड़ी देश दूसरे के परमाणु संयत्र पर अमेरिका को हमले के लिये उकसा रहा है। मतलब यह कि अमेरिका अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है या पूंजीतंत्र के शिखर पुरुष अपने क्षेत्र में उसे घसीट रहे हैं, यह अब चर्चा का विषय हो सकता है। ऐसे में अमेरिकी रणनीतिकारों के औपचारिक या अनौपचारिक बयानों, कमरे में या बाहर की गयी टिप्पणियों तथा कहने या करने में अंतर की चर्चा करना भी समय खराब करना लगती है।
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11/10/10

हिंदी पत्रिका ब्लाग ने पाठक/पाठ पठन संख्या दो लाख पार की-हिन्दी संपादकीय

इस लेखक का दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका नामक ब्लाग दो लाख की पाठक/पाठ पाठन संख्या पार कर गया। यह ब्लाग गूगल की पैज रैंक में 4 तथा शाईनी स्टेटस में 15 की रैंक में है। जब हम अंतर्जाल पर हिन्दी लेखन की बात करते हैं तो अपना स्तर भी देखना होता है। जब स्तर देखते हैं तो अनेक बार ऐसा लगता है कि अनेक रचनाऐं स्तर से कमतर हो गयी हैं तो कुछ रचनायें ऐसी भी हैं जो उत्कृष्ट बन जाती हैं। इसके पीछे कारण यह है कि जब कोई विषय मस्तिष्क में सामने आता है तब उस समय लिखते समय अपनी मनस्थिति जो होती है वही रचना का स्तर निर्माण करती है। यहां कोई आर्थिक लाभ नहीं है और स्वप्रेरणा की शक्ति से ही लिखना पड़ता है। न ही कोई प्रोत्साहन है न ही कोई पीछे प्रायोजित समह है ऐसे में स्वांत सुखाय लिखने का आनंद उठाना ही एक मात्र ध्येय है। अपने प्रयोजक लेखक, संपादक तथा प्रकाशक स्वयं बन जाते हैं या कहें कि स्वयंभू हैं। हालांकि यह स्थिति आत्मुग्धता की है पर इसके बिना लिखना भी मुश्किल है।
एक बात निश्चित रूप से अनुभव की है कि आधुनिकता से ऊबा समाज हास्य व्यंग्य तथा कविताओं में बहुत रुचि ले रहा है। दूसरा यह भी कि अध्यात्म के प्रति लोगों का रुझान भी बढ़ रहा है। ऐसे में निराशा से भरे पात्रों वाली कहानियां, उबा देने वाली कवितायें तथा विवादास्पद विषयों पर लेख लिखने से अधिक पाठक नहीं मिलते। हैरानी की बात यह है कि बड़े लेख बिना पढ़े रह जाते हैं और चार पंक्तियों की क्षणिकायें टिप्पणियां, पाठक तथा प्रशंसा जुटा लेती हैं। कई बार तो ऐसा होता है कि दिमाग मेें कोई क्षणिका आने के बाद ब्लाग पर लिख लेते हैं तब लगता है कि इस छोटी रचना को देखकर आदमी टालू लेखक या कवि न समझ लें इसलिये दूसरी बड़ी कविता भी लिख देते हैं। इस लेखक ने कभी हास्य कविता नहीं लिखी थी न एक रचनाकार के रूप में लोगों के बीच छबि है। आश्चर्यजनक यह कि अध्यात्मिक लेखों के बाद उनकी वजह से ही अंतर्जाल पर लोकप्रियता मिल रही है।
बहरहाल अभी भी अंतर्जाल पर हिन्दी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। हम चार साल में एक ब्लाग पर दो लाख पाठक आने को बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं मान सकते पर दूसरा इसका यह भी एक पहलू है कि निजी ब्लाग लेखकों को पाठक जुटाने के लिये कोई प्रायोजन नहीं मिलता। अनेक समाचार पत्र पत्रिकाओं ने इंटरनेट पर अपने प्रकाशन की बेवसाईटें बना ली हैं और उनका नाम होने की वजह से पाठक भी उनको मिल जाते हैं। एक ब्लाग लेखक वह भी हिन्दी का हो तो उसके लिये अपना मार्ग स्वयं ही बनाना अनिवार्य है किसी अन्य से अपेक्षा करना बेकार है।
एक पाठक ने एक कविता पर गंभीर टिप्पणी की थी। कविता बेकार थी और ऐसा लग रहा था कि वह नाराज है। पढ़ते पढ़ते जब आखिर में पहुंचे तो उसने यह भी लिख दिया है कि साधुवाद, आप हिन्दी की सेवा कर रहे हैं।’
सच कहें तो अपनी वह कविता स्वयं को ही कोई उत्कृष्ट नहीं लग रही थी। निकृष्ट भी कहें तो शर्म नहीं आती क्योंकि इस मामले में अपना तो यहां सिद्धांत है कि हम बुरा लिखते हैं पर फिर भी कई लोगों की रचनाओं से कम बुरा होत है। मतलब यह कि हमारी दस पंक्तियों में एक दो पंक्ति तो बढ़िया हो ही जाती है मगर कई तो ऐसे हैं जो पचास लिखकर भी प्रभावित नहीं कर पाते। मतलब यह कि अंतर्जाल पर एकांत यात्रा में आत्ममुग्ध हुए बिना नहीं लिखा जा सकता। लिखते रहेंगे तो कुछ अच्छा भी आ ही जाता है और इस ब्लाग के मित्र ब्लाग लेखकों और प्रशंसक पाठकों को इस बात को याद रखना चाहिए कि हमारे ब्लागों में ऐसे कई गज़ब के लेख हैं कि यकीन नहीं होता कि हम लिख गये। कोई माने या माने धारा से अलग हटकर लिखने से अपना एक अलग पाठक वर्ग बन रहा है। लाखों में पाठक रोज नहीं आते पर जो आते हैं उससे यह सोचकर संतोष होता है कि हम अपनी बात समाज के सामने रख रहे हैं और कुछ लोग हैं जो हमारी बात सुनकर समझ रहे हैं। वरना चौराहे पर आकर चिल्लाने या छपने से फायदा भी क्या कि लोग पढ़े पर न समझें न प्रभावित हों। यह पाठ आत्ममुग्ध होकर नहीं लिखा गया बल्कि अपने ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों को यह जानकारी बांटने के लिये लिखा गया है। आखिर उनकी प्रेरणा के बिना यह छोटा सफर भी कैसे पूरा होता?
लेखक एवं संपादक
दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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8/18/10

सामाजिक सद्भाव को कम करती हुई महंगाई-हिन्दी लेख (samajik sadbhav aur mahangai-hindi aticle)

महंगाई कोई समस्या नहीं बल्कि समस्याओं का परिणाम है। भले ही कुछ कवि या व्यंग्यकार इस पर कवितायें और व्यंग्य लिखते हों पर सच यह है कि बढ़ती महंगाई समाज में एक खतरनाक विभाजन करती आ रही है जिसे बड़े शहरों के निवासी बुद्धिजीवी वातानुकूलित कमरों नहीं देख रहे। ऐसा लगता है कि इस देश में चिंतकों का अकाल पड़ गया है यह अलग बात है कि अंग्र्रेजी मे लिखने वाले केवल औपचारिकता ही निभा रहे हैं और हिन्दी के चिंतक की तो वैसे भी कोई पूछ नहीं है और जिनकी पूछ है वह सोचते अंग्रेजी वालों की तरह है।
कार्ल मार्क्स ने कहा था कि ‘इस संसार में दो ही प्रकार के लोग हैं एक अमीर और दूसरा गरीब!’
उनकी विचाराधारा का अनुसरण करने वाले अनेक नीति निर्माता इस नारे को गाते बहुत हैं पर जब नीतियां बनाने की बात आती है तो उनके सामने केवल अमीरों का विकास ही लक्ष्य बनकर आता है। कुछ लोगों की बातें तो बहुत हास्यास्पद हैं जब वह विकास को महंगाई का पर्याय बताते हैं। दरअसल महंगाई यकीनन विकास का की प्रतीक है पर वह स्वाभाविक होना चाहिए पर हम देश की स्थिति पर नज़र डालते हैं तो पता लगता है कि पूरा देश ही कृत्रिम विकास नीति पर चल रहा है और महंगाई की गति अस्वाभाविक और असंतुलित ढंग से बढ़ रही है जो कि अंततः समाज ही नहीं बल्कि परिवारों का भी विभाजन करती है।
हम अगर दृष्टिपात करें तो पहले परिवार और रिश्तेदारी में अमीर ओर गरीब होते थे पर उनमें अंतर इतना अधिक नहीं होता था कि विभाजन बाहर प्रकट हो। पहले एक अमीर के पास होता था अपना बड़ा मकान, भारी वाहन तथा अन्य महंगे सामान! जबकि गरीब के पास छोटा अपना या किराये का मकान, पूराना या हल्कातथा सस्ते सामान होते थे। एक शादी विवाह के अवसर पर भी होता यही था कि एक आदमी अपनी शादी में अधिक प्रकार के व्यंजन परोसता था तो दूसरा कम। दो भाईयों में अंतर होता था तो एक भाई अपनी जेब से थोड़ा व्यय कर दूसरे के बच्चे में उसकी शान बढ़ाता था। पड़ौसियों में भी यही स्थिति थी। एक के घर में रेडियो है तो दूसरे के पास नहीं! पर दूसरा सुनकर ही आनंद लेता था। सामाजिक सामूहिक अवसरों पर एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव था। परिवार, रिश्तेदारी और पड़ौस में रहने वाले लोगों में धन का अस्वाभाविक अंतर नहीं दिखाई देता था और जिस समाज पर हम गर्व करते हैं वह इसी का ही स्वभाविक अर्थव्यवस्था का परिणाम था। मगर अब हालत यह है धन का असमान वितरण विकराल रूप लेता जा रहा है। इससे आपस में ही लोगों के कुंठायें और वैमनस्य का भाव बढ़ता जा रहा है। हम जब देश की एकता या अखंडता की बात करते हैं तो एक बात भूल जाते हैं कि अंततः यह एक भौतिक विषय है और इसे अध्यात्मिक आधारों पर नियंत्रित नहीं किया जा सकता। हम भले ही जाति, भाषा, तथा धर्म के आधार पर बने समूहों की मजबूती में देश की एकता या अखंडता का भाव देखना चाहते हैं महंगाई के बढ़ते धन के असमान वितरण के भावनात्मक परिणामों को समझे बिना यह कठिन होगा क्योंकि अल्प धन वाला अधिक धनवान में प्रति कलुषिता का भाव रखने लगता है जो अंततः सामाजिक वैमनस्य में बदल जाता है।
अक्सर हम देश के दो हजार साल के गुलाम होने की बात करते हुए देश के सामाजिक अनुदारवाद को जिम्मेदार बताते हैं पर सच यह है कि इसके मूल में यही धन का असमान वितरण रहा है। जिन लोगों को यह बात अज़ीब लगे उन्हें यह देखना चाहिए कि हजार और पांच सौ नोट प्रचलन में आ गये हैं पर अभी भी कितने लोग हैं जो उसके इस्तेमाल करने योग्य बन गये हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि इस तरह के नोटों को केवल अवैध छिपाने वालों की सुविधा के लिये बनाया गया है क्योंकि जिस तरह कुछ भ्रष्ट लोगों के यहां उनकी बरामदगी हुई उससे तो यही लगता है। दूसरा यह भी कि साइकिल तथा स्कूटर में हवा भरने के लिये आज भी दरें वही हैं। सब्जियों तथा अन्य खाद्य पदार्थों की दरें बढ़ी हैं पर उनके उत्पादकों की आय का स्तर में धनात्मक वृद्धि हुई जबकि महंगाई में गुणात्मक दर से बढ़ोतरी होती दिख रही है।
कभी कभी तो इस बात पर गुस्सा आता है कि देश की संस्कृति, धर्म और अध्यात्म को लेकर कुछ लोग आत्ममुग्धता का शिकार हैं। कहीं किसी ने भारतीय धर्म अपनाया तो चर्चा होने लगती है तो कहींे भारतीय पद्धति से विवाह किया तो वाह वाह की आवाजें सुनायी देती हैं। यह भ्रम कि धर्म या अध्यात्म के आधार पर देश को एक रखा जा सकता है अब निकाल देना चाहिये। हमारे कथित कर्मकांड तो केवल अर्थ पर ही आधारित हैं। उसमें भी विवाह में दहेज प्रथा का तो विकट बोलबाला है। अमीर और दो नंबर की कमाई वाले पिताओं के लिये अपनी लड़की का विवाह करना कठिन नहीं है पर उनकी देखा देखी महंगी राह पर चलने वाले मध्यम वर्ग के लिये यह एक समस्या है।
कहने का अभिप्राय यह है कि महंगाई की धनात्मक वृद्धि तो स्वीकार्य है पर गुणात्मक वृद्धि अंततः पूरे समाज के आधार को कमजोर कर सकती है और ऐसे में देश की एकता, अखंडता तथा सम्मान बचाये रखना एक ऐसा सपना बन सकता है जिसे कभी नहीं पाया जा सकता।
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7/17/10

अपराधों में वर्गीकरण करना ठीक नहीं-हिन्दी लेख (apradh aur kanoon-hindi lekh)

पिछले कई दिनों से देखा गया है कि जब भी कोई नया सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक विवाद प्रचार माध्यमों में चर्चा क्रे लिये लगातार आता है तो उस पर नियंत्रण करने के लिये कानून बनाने की मांग उठत्ी और कई विषय पर कानून बना भी दिया जाता है। ऐसा लगता है कि कानून बनाने की मांग करना या बनाना भी लोकप्रियता का माध्यम बन गया है। मुख्य बात यह है कि कानून का लागू करने वाली संस्थाओं को मजबूत बनाने की बात पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
भारत में कानून लागू करने वाली सबसे बड़ी संस्थाओं में स्थानीय पुलिस को माना जाता है और अगर समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपे समाचारों पर यकीन करें तो अनेक जगह पुलिस बल की कमी के अलावा उसके पास आधुनिक साधनों की कमी की शिकायतें मिलती हैं। हम यहां भूल जाते हैंे कि अगर पुलिस बल और उसके अधिकारी अपने ऊपर काम का अधिक बोझ तथा साधनों की कमी अनुभव करेंगे तो अपराधों से निपटने की उनकी क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा। समस्या यही नहीं है कि पुलिस अपनी ढांचागत समस्याओं के चलते मामलों से निपट नहीं पा रही बल्कि देश की कागजी कार्यवाही पर आधारित कार्यप्रणाली भी पुराने ढर्रे पर चल रही है और उससे कानून को असरकार ढंग से लागू करना मुश्किल हो रहा है यह बात समझनी होगी।
इधर सम्मान के लिये हत्या तथा कन्याओं के साथ घर में अन्याय को लेकर कानून बनाने की मांग के साथ विचार भी चल रहा है। समझ में नहीं आता कि आखिर इस देश में सोच का अकाल क्यों पड़ गया है? देश की व्यवस्था चलाना मजाक नहीं है पर लगता है कि इसे गंभीरता से भी नहीं लिया जा रहा। हर जरा से विवाद पर कानून बनाने का फैशन देश के संविधान के प्रति नयी पीढ़ी में विश्वास कम कर सकता है।
जहां तक चर्चित विवादों के चलते उससे संबंधित विषय पर कानून बनाने की मांग करना या बनाना लोकप्रियता प्राप्त करने का साधन लगता है पर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, आतंकवाद तथा आर्थिक विषमतओं के कारण अपनी निजी समस्याओं से जूझ रहे लोग इससे अधिक खुश होते। उनके निजी जीवन के संघर्ष इतने दुरूह हो गये हैं कि इनकी तरफ उनका ध्यान नहीं जाता। इसके अलावा जो जागरुक लोग हैं वह देश की हालत देखते हुए इस बात को समझते हैं कि यह कानून होने या न होने से अधिक उसे लागू करने का विषय है।
सम्मान के लिये हत्या या कन्याओं को घर में परेशान करने जैसे विषय गंभीर है। देश में स्त्रियों की दशा सदियों से ही खराब है और उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। यह कानून से अधिक समाज सुधारकों के लिये शर्म की बात है और देश में सक्रिय धर्म प्रचारकों के लिये तो डूब मरने वाली बात है जो यहां महापुरुष होने का दावा करते हैं।
कहने का आशय यह है कि समाज की समस्याओं के लिये कानून कम उसके शिखर पुरुष अधिक दोषी है जो समय समय पर अपने अपने सामाजिक समूहों को अपने लाभ के लिये एकत्रित करते हैं और मतलब निकलते ही उसे अपने हाल में छोड़ देते हैं।
हमारे देश में दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा जैसे कानून बने और समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा अन्य प्रचार माध्यमों में अक्सर इस तरह की चर्चा होती है कि इसका दुरुपयोग हुआ है। इतना ही इसमें निर्दोष पुरुष परेशान हुए और दोषियों का बाल बांका भी न हुआ है। आतंकवाद के लिये यह कानून तो देर से बना कि अपराधी अपने को निर्दोष साबित करे दहेज एक्ट में इसका प्रावधान पहले ही कर दिया गया था। निर्दोष लोग परेशान हुए क्योंकि वह सामान्य वर्ग के थे जो बचे वह ऊंचे वर्ग के थे पर यह बात केवल इसी कानून को लागू करने के बारे में नहीं बल्कि हर अपराध में ऐसा ही देखने में आता है।
इधर कुछ घटनायें ऐसी हुई है कि अपने परिवार या समाज की मर्जी के खिलाफ विवाह करने वाली युवतियों की उनके अपने लोगों ने ही हत्या कर दी। आजकल ऐसे समाचार खूब छाये हुए हैं और इस पर कानून बनाने की मांग हो रही है। सवाल यह है कि क्या वर्तमान कानून के चलते इससे निपटना कठिन है?
शायद नहीं! किसी की हत्या करना अपराध है, और इसके लिये अलग से कानून बनाने की कहना ही अपनी सोच के संकीर्ण होने का प्रमाण है। हत्या के प्रकरण में जमानत बड़ी कठिनाई से होती है। हत्या चाहे किसी की भी हुई हो और किसी ने भी की हो उससे निपटने के लिये अलग से कानून बनाने की आवश्यकता इतनी नहीं लगती जितनी प्रकरण से सक्षमता से निपटने की।
महिलाओं के लिये दहेज एक्ट जैसा कानून किसलिये बना? दहेज लेना देना दोनों ही जुर्म है और अनेक प्रकरणों में लड़कियों के माता पिता स्वीकार करते हैं कि उन्होंने दहेज दिया? क्या वह कानून से परे हैं जो उन पर कार्यवाही नहीं की गयी। कन्या भ्रुण हत्या का कानून बना पर उसकी धज्जियां उड़ते हुए सभी ने देखी हैं। सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीना वर्जित कानून में किया गया पर क्या उसे रोका जा सका।
एक बात निश्चित है कि कानून में हत्या, बेईमानी, डकैती तथा ठगी जैसे अपराध रोकने के लिये पर्याप्त प्रावधान है। इसलिये अपराधों में वर्गीकरण करने की बात समझ में नहीं आती। यह अलग बात है कि हमारे देश के प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी वर्ग अपराधों में जाति, भाषा, धर्म, तथा क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों से सोचते हैं पर उनके कहने पर व्यवस्था चलाने को मतलब है कि अंधेरे कुंऐ में देश को ढकेलना। सच तो यह है कि दौलत, शौहरत और बाहुबलियों के बंधुआ बुद्धिजीवी केवल रुदन कीर्तन के अलावा कुछ नहीं करते क्योंकि उनके पास अपनी सोच नहीं है। इसलिये कानून बनाने और उसे लागू करने के विषय में व्यवहारिक ज्ञान के साथ काम करना चाहिए।
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4/9/10

राष्ट्रनिरपेक्ष दिखने का प्रयास-हिंन्दी लेख (national intrest-hindi article

प्रकाशन तथा अन्य संचार माध्यमों में विदेशी विनिवेश का अक्सर यह कहकर विरोध किया जाता है कि उनका इस देश के हितों से कोई सरोकार नहीं रहेगा। विदेशी पूंजीपति से सुजज्जित प्रचार और प्रकाशन संगठन देश के प्रति वफादारी नहीं दिखायेंगे? उस समय कुछ भोलेभाले बुद्धिजीवी देशभक्ति के भाव के कारण यह सुनकर चुप हो जाते हैं। मगर नक्सनवाद पर जिस तरह संगठित प्रचार माध्यमों का कथित निष्पक्ष रवैया है वह उनके देशभक्ति के भाव में निरपेक्षता दिखा रहा है और तब उनका यह तर्क खोखला दिखाई देता है कि विदेशी विनिवेशकों को देश के हितों से कोई सरोकार नहीं रहेगा अतः उनका आगमन प्रतिबंधित रखना चाहिये।
एक किस्सा है जिसे अधिकतर लोगों ने सुना होगा। एक लड़के द्वारा बार बार ‘शेर आया’ ‘शेर आया’ कहकर गांव के लोगों को  अनावश्यक रूप से पुकार कर एकत्रित किया जाता था। एक बार सच में शेर आया पर गांव वाले नहीं आये और वह उसे मारकर खा गया। इसे ध्यान रखना चाहिये। संगठित प्रचार माध्यमों जिस तरह कथित रूप से निष्पक्षता दिखाते हुए समाज और देश हित के प्रति निरपेक्षता दिखा रहे है उसके बाद उनको यह आशा नहीं करना चाहिये कि उनके द्वारा कभी किसी प्रसंग में सहानुभूति प्राप्त करने का अभियाना चलाया गया तो आम दर्शक या पाठक वैसे ही उपेक्षा कर सकता है जैसे कि गांव वालों ने लड़के के प्रति दिखाई थी। संगठित प्रचार माध्यम कुछ संस्थान लोगों के जज़्बातों से खेल रहे हैं और इसे हर आदमी जान चुका है। नक्सली हिंसा में सुरक्षाबल के जवानों की मौत पर जिस तरह की बातें की जाती हैं उससे लोगों में जो गुस्सा भरता है उसका अंदाजा संगठित प्रचार माध्यमों में सक्रिय कुछ लोगों को नहंी है। वह आम आदमी तक खबर और दृष्टिकोण पहुंचाने की होड़ में इस बात को भूल जाते हैं कि उनके उपभोक्ता दर्शक और पाठकों के जज़्बात व्यवसायिक नहीं भावनात्मक होते हैं। ऐसे में किसी हिंसा के पक्ष या विपक्ष में तर्क कराने की बजाय आम आदमी की इकतरफा उग्र अभिव्यक्ति का प्रदर्शन करना चाहिये-आवश्यक हो तो व्यवस्था की नाकामी का प्रश्न उठाया जाये पर कम से कम हिंसक तत्वों के ऐजेंडे को इस तरह न  प्रस्तुत  किया जाये कि जैसे कि वह नायक हों।
विश्व भर में आतंकवाद एक व्यवसाय बन चुका है। जिस संगठित प्रचार माध्यम को इस पर असहमति हो वह अपने ही समाचारों का विश्लेषण कर ले क्योंकि इस लेखक का आधार भी वही हैं। कथित रूप से जो महान बुद्धिजीवी हैं उनको यह समझायें कि वह कल्पित जन कल्याण के नाम होने वाली हिंसा का समर्थन कर रहे हैं। यह सच है कि जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के नाम पर बने समूहों मे आपसी हिंसा होती है पर इसके लिये उनके स्वरूप नहीं बल्कि शिखर पुरुषों की आपसी रंजिशें जिम्मेदार होती हैं यह अलग बात है कि वह समाज हित की आड़ में अपने आपको निर्दोष साबित करने का प्रयास करते हैं।
आतंकवादियों को बड़े पैमाने पर धन मिलता है जिससे वह स्वयं ऐश करते हैं। अनेक स्थानों पर वह महिलाओं की देह से खिलवाड़ करने की खबरे छपती हैं। वह आधुनिक हथियार खरीदते है। उनके पास महंगी गाड़ियां हैं। भारत में अपराध कर विदेश भाग जाने की उनको सुविधा मिल जाती है। ऐसे हिंसक तत्वों के स्थानों पर जब शराब और जुआ के दौर चलने की खबरें इन्ही संगठित प्रचार माध्यमों द्वारा दी जाती है। तब गरीबों, आदिवासियों, मजदूरों तथा शोषकों के लिये उनके लड़ाई के दावे पर यकीन कैसे किया जा सकता है। आप किसी विषय पर चर्चा करते हुए निष्पक्ष रहें पर इस तरह नहीं कि देश के प्रति निरपेक्षता दिखाई दे।

इस संबठित प्रचार माध्यमों का एक तय प्रारूप है। उनहोंने आर्थिक, सामाजिक,राजनीतिक तथा सामरिक विषयों पर कुछ ऐसे विशेषज्ञों का पैनल बना रखा है जो एक निश्चित सीमा के बाहर ही अपने विषय से बाहर नहीं देख पाते। उनके पूरे विश्व में आ रहे परिवर्तनों का आभास तक नहीं है। इसलिये वह रटी रटाई बातें करते हैं। घटनाओं के स्थान तथा तारीख बदल जाती है पर उनके बयान नहीं बदलते। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आजकल इन संगठित प्रचार माध्यमों की ताकत बहुत अधिक है।
कुछ माह पहले भारत तथा पाकिस्तान के दो प्रकाशन संस्थाओं ने दोनों देशों के बीच मैत्री भाव स्थापित करने का अभियान छेड़ा था। उस समय अंतर्जाल लेखको ने संदेह व्यक्त किया था कि अब यहां पाकिस्तान के लिये प्रायोजित मैत्री अभियान शुरु होगा। कुछ समय बाद वह दिखने लगा। भले ही वह दो संस्थान हैं पर यकीनन वह इस तरह दोनों देशों के-खासतौर से भारत के-बौद्धिक वर्ग के लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से एक संदेश दे रहे थे। उसके बाद तो यहां एक तरह से पाकिस्तान के लिये सद्भाव के प्रचार का जो दौर शुरु हुआ उसमें 26/11 को मुंबई पर हुए हमले की यादें लोगों से विस्मृत करने की योजना के रूप में देखा गया। एक तो अभी शादी और तलाक का नाटक चला गया जिसमें यह बताने का प्रयास हुआ कि यह सब तो दोनों देशों के बदमाश करते हैं और आम आदमी को इससे कोई मतलब नहीं है। पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत में आयोजित एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में नहीं बुलाया गया तो उस पर इन्हीं संगठित प्रचार माध्यमों ें कुछ ने तो शोक जैसा माहौल दिया। तय बात है कि इसके पीछे आर्थिक लाभ तथा सुरक्षा का कोई स्वार्थ है जिसे छिपाया जाता है, या फिर मन में यह भय है कि पाकिस्तान में रह रहे अपराधी कहीं उनकी पोल न खोल कर रख दें।
यह बातें इतना परेशान नहीं  करती अगर निरंतर जारी नक्सली हिंसा में देश के सुरक्षा कर्मियों की मौत के बाद भी देश के ही अंदर के इलाकों पर उनकी उपस्थिति पर आपत्ति नहीं दिखाई जाती। उन पर कल्पित आरोप लगाकर यही साबित करने से तो यही साबित  होता है कि कुछ लोगों की यह मजबूरी है कि वह देश निरपेक्ष दिखकर बाहर के लोगों को खुश रखें। भारत में अधिकतर समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा टीवी चैनलों में काम करने वाले व्यक्तित्व समझदार हैं और उनकी देशभक्ति पर शक नहीं किया जा सकता पर उनमें कुछ ऐसे हैं जिनको आत्ममंथन करना ही होगा कि कहीं  वह अनजाने में तो अपने ही देश के शत्रुओं के हाथ में नहीं खेल रहे। उनको किसी लाचारी या लालच में काम न करता हुआ दिखना है ताकि देश की आम पाठक तथा दर्शक उनकी तरफ सवाल न उछाले। सबसे बड़ी बात यह है कि उनको अपनी शक्ति का अहसास होना चाहिये कि वह अपने प्रयासों से देश को एक दिशा दे सकते हैं। उसी तरह उनके कुछ प्रसारणों तथा प्रकाशनों से देश का मनोबल गिरता हे। इसलिये वह इस बात का ध्यान रखें कि देश की रक्षा करने वाले तथा समाज का सच में हित चाहने वालें लोग उनके अनजाने में किये गये प्रयासों से आहत न हों। अपनी व्यवसायिक प्रतिष्ठा बनाने के लिये निष्पक्ष रहना आवश्यक है पर अगर वह राष्ट्रनिरपेक्ष रहने का प्रयास करेंगे तो उससे उनके उपभोक्ता दर्शक तथा    पाठक उनसे निंराश हो जायेंगे। जिसका कालांतर में उनके व्यवसायिक हितों पर ही प्रभाव पड़ेगा।
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4/2/10

बड़ी बेवकूफी से कम वाली ठीक है-हिन्दी व्यंग्य ( Birth day of tom and jarry-hindi vyangya)

टॉम और जैरी का जन्म दिन मनाना भी कोई बुरा नहीं है। टॉम यानि बिल्ली और जैरी यानि चूहा। असल में नहीं बल्कि कार्टून फिल्मों के रेखाचित्र नायक हैं टॉम और जैरी। पहले इन पर किताबें प्रकाशित होती थीं और अब टीवी पर इन दोनों के कार्यक्रमों को लोकप्रियता प्राप्त है। कहने को तो कहा जाता है कि यह बच्चों को बहुत प्रिय है पर हकीकत यह है कि जिनको हल्का फुल्का हास्य मनोरंजन चाहिये उनके लिये वह चाहे किसी भी उम्र के हों इसे देखते हैं।
एक बात तय रही है कि भारत में ऐसे टीवी कार्यक्रम नहीं बनते। संभवतः कोई इनको बना भी नहीं सकता। इसके लिये जो कल्पना शक्ति चाहिए वह भारत में शायद ही किसी को हो। वैसे ही टीवी चैनल, फिल्म, समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा प्रकाशन उद्योग भारत में किसी कल्पनाशील रचनाकार को प्रोत्साहन नहीं दे पाता। यह उसके अहंकारी स्वभाव में ही नहीं है कि वह अपने आदमी को आगे लाये। यही कारण है कि पहले फैंटम हो या बेताल अब टॉम और जैरी, विदेशों में बने रेखाचित्र पात्रों का भारतीय कमाऊ संस्थानों ने उपयोग किया। भारत में इस तरह के व्यवसायिक कार्यक्रम बनाने वालों को प्रोत्साहन नहीं दिया वरना अपने देश में जोरदार कार्टूनिस्टों की कोई कमी नहीं है।
टॉम और जैरी का जन्म ही नहीं हुआ पर मनाया जा रहा है। ऐसी मूर्खतायें भी विदेशों से रेखाचित्रों के पात्रों की तरह आयात की गयी हैं फिर भी बुरा नहीं लगा। जिस तरह भारतीय टीवी चैनल देश के कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं उससे इतनी बोरियत पैदा होती है-इसका अहसास तभी होता है जब थोड़ी बहुत चिंतन क्षमता अपने अंदर हो, वरना तो देखते रहिये, आखें काम कर रही हो पर मस्तिष्क सुप्त रहे तो सभी चल जाता है। सारे टीवी चैनल, रेडियो और पत्र पत्रिकाओं फिल्मी, खेल तथा समाजसेवा के अभिनेता अभिनेत्रियो या कहें कि नये देवी देवताओं के जन्म दिन तथा दैनिक गतिविधियों को समर्पित है। समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में इन नये देवताओं के वक्तव्य तथा गतिविधियां तो रहते ही हैं फिर उनकी आलेख और अन्य सामग्री भी पढ़ने और सुनने को बाध्य होना पढ़ता है। इनमेें से कुछ तो स्वयं भी लिखने का काम करते हैं तो उनको लेखक होने का दर्जा भी मिल जाता है। एक आम आदमी को एकत्रित कर उसे तो भीड़ बना लिया जाता है।
हर दिन किसी नये देवता का जन्म दिन है। कोई शादी कर रहा है। हालत यह हो गयी है कि नये देवताओं की शादियों का सीधा प्रसारण तक किया जाता है। फिर इधर जनसामान्य को जोड़े रखने के लिये टीवी चैनलों पर संगीत प्रतियोगितायें या हास्य कार्यक्रम चलाये जाते हैं जिनके बारे में दावा किया जाता है कि यह तो वास्तविक हैं पर दरअसल वह पहले से तय होते हैं। तलाकशुदा और अनेक प्रेम कर चुके लोगों के स्वयंवर रचाये जाते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि अनेक नये देवी देवता पता नहीं कितने प्यार कर चुके हैं पर संगठित प्रचार माध्यम उनके हर प्यार में सुकोमलता ढूंढ कर लाते है।
उस दिन हमारे कंप्यूटर कक्ष में ही रख टीवी खराब हो गया। हम अब उसे बनवाने या नया लाने को तैयार नहंी थे। सोचा दूसरे कमरे में जब मन होगा देख लेंगे। मगर मित्र लोग नहीं माने। कहने लगे ‘अरे, यार आज कल एक टीवी से काम नहीं चलता। दूसरा भी पुराना है। इसलिये एल.सी.डी. खरीद लो।’
खरीद लिया। मगर खोलकर देखते कितना हैं? अब तो समाचार चैनलों पर जाना ही कम कर दिया है। बिना देखे ही पता चलता है कि किस विषय पर बहस चल रही होगी। बोरियत पैदा और कभी चिढ़ाने वाली बहसों से तो उनको न देखना ही अच्छा लगता है।
कहते हैं कि जहां धुआं होता है वहां आग जरूर होती है, मगर हमारे संगठित प्रचार माध्यमों को देखें तो बिना आग के धुआं दिखा देेते हैं। चाहे कोई व्यक्तित्व सनसनी का स्वामी हो न हो पर उसका नाम बेच जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रबंध कौशल का अभाव इस देश की रग में है। भारत के फिल्म और खेल जगत के अनेक अभिनेता और अभिनेत्रियां खूब पैसा कमा रहे हैं पर पश्चिमी प्रचार माध्यम उनमें ‘व्यवसायिक प्रवृत्तियों को अभाव बताते हैं। यह अभाव देश के संगठित प्रचार माध्यमों में भी दिखाई देता है। यही कारण है कि इतने सारे चैनल हैं पर लोग किसी एक के नाम पर लोकप्रियता की मोहर नहीं लगाते।
ऐसे में मनोंरजन के लिये एक तरीका यह है कि इंटरनेट पर अपनी अभिव्यक्ति की सुविधाओं का लाभ उठायें या फिर बाहर किसी पार्क में तफरी कर आयें। हास्य मनोरंजक चैनल देखें तो पता लगता है कि वहां भी हर त्यौहार और जन्म दिन के अवसरों पर तोहफों देने और लेने वाले दृश्य बड़ी चालाकी से जोड़े जाते हैं। ऐसे में अगर कार्टून फिल्में ही मजेदार लगने लगती हैं। जिनमें टॉम और जैरी का एक दूसरे का पीछा करना अच्छा लगता है। वैसे यह चूहे बिल्ली का खेल है पर मानना पड़ेगा कि यह विश्वव्यापी है। अपने यहां चूहे बिल्ली का खेल कभी प्रत्यक्ष देखा नहीं जाता पर अक्सर बातचीत में यह वाक्य कहा जाता है कि ‘चूहे बिल्ली की तरह मत खेलो।’ इसे रेखचित्रों के द्वारा जिस तरह पाश्चात्य चित्रकारों ने बनाया उससे लगता है कि हास्य प्रकार का मनोरंजन देखने की प्रवृत्ति सारे विश्व में एक जैसी है।
अब लोग इस कार्यक्रम बनने के दिन को टॉम जैरी के जन्म दिन की तरह मना रहे हैं तो उन पर क्या आपत्ति की जा सकती है। यही कहा जा सकता है कि नकली देवताओं के जन्म दिनों को मनाने की बहुत बड़ी बेवकूफी से तो कम वाली ठीक है-इस मायने में कि इस लेखक को यह कार्यक्रम अच्छा लगता है।
दीपक बापू कहिन ब्लाग/पत्रिका के एक लाख पाठक संख्या पर करने पर लिखा गया एक लेख भी यहां पढ़ सकते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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12/28/09

नया वर्ष आ रहा है-हिन्दी व्यंग्य (happy new year coming-hindi satire article)

छोटे शहर के आदमी के लिये यही एक उलझन है कि उसके घरेलू और सामाजिक संस्कार कुछ दूसरे हैं जबकि बाह्य रूप से अनेक बार औपचारिक होकर दूसरे संस्कारों को निभाना पड़ता है। जिनमें अपने यहां ईसवी संवत् तो हमारे जैसे लोगों के लिये हमेशा अजूबा रहा है।
जब नया साल आयेगा तो जो भी मिलेगा उससे कहना पड़ता है कि ‘नव वर्ष मुबारक’। हम नहीं बोलेंगे तो वह बोलेगा तो हमें भी कहना पड़ेगा कि ‘आपको भी।’
सच बात तो यह है कि हृदय में स्पंदन बिल्कुल नहीं है। अपने यहां गुड़ी पड़वा पर ही नया संवत् प्रारंभ होता है। इससे हिन्दू धर्म का हर समाज मनाता है। ऐसे में अगर आपका जातीय, भाषाई या क्षेत्रीय समुदाय अलग भी है तो भी दूसरे से अपनी खुशी बांट सकते हैं। फिर बात मौसम की भी है। उस समय मौसम समशीतोष्ण रहता है और एक तरह देह में खुशी की तरंगे स्वाभाविक रूप से उठती हैं।
बचपन से ही इन संस्कारों के साथ बड़े हुए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी कोई ऐसा शोरगुल नहीं होता था अलबत्ता कुछ लोग एक दूसरे को बधाई देते थे।
जैसे जैसे विद्युतीय तरंगों से युक्त प्रचार माध्यमों को प्रभाव बढ़ा, ऐसे अनेक त्यौहार हैं जो हमारी संस्कृति का भाग नहीं है पर उनका नाम अधिक सुनने को मिलने लगा। दरअसल इसका कारण यह है कि इन प्रचार माध्यमों को बाजार से विज्ञापन मिलते हैं और उसे इन्हीं त्यौहारों से उपभोक्ता चाहिए, वह भी आज की पीढ़ी के नवयुवाओं से जिनके हृदय से अपनी संस्कृति और संस्कार करीब करीब विस्मृत हो रहे हैं।
वैसे तो हर धर्म में अनेक त्यौहार है और हमें किसी पर कोई आपत्ति नहीं है। यहां तक कि अगर दूसरे धर्म का आदमी हो तो हम उसे हृदय से बधाई भी देते है, उस समय हमारे मन में औपचारिक भाव नहीं होता।
हमारा उद्देश्य किसी पर आपत्ति करना नहीं है बल्कि अपने संस्कारों और संस्कृति से अलग हटकर चलने पर मन में होने वाली उथल पुथल पर दृष्टिपात करना है। साथ ही बाजार जिस तरह इन पर्वों पर अपनी कमाई के लिये आक्रामक प्रचार के लिये तैयार होता है उसे भी देखना है। अगर हम देखें तो अब हर त्यौहार दो भागों में बंट गया है। एक तो जो समाज स्वयं मनाता है दूसरा वह जिससे बाजार कमाता है। एक तरफ धर्म का पर्व दूसरी तरफ धन का गर्व।
समस्या अनेक त्यौहारों की नहीं बल्कि बाजार और प्रचार उनको जिस तरह भुनाने का प्रयास करता है उस हंसी आती है। ऐसा करते हुए बाजार तो ठीक पर उसके समर्थक प्रचार माध्यम अपनी सीमायें पार करते लगते हैं जैसे कि वह भारत की मिलीजुली संस्कृति को खिचड़ी संस्कृति समझते हैं।
अभी नया पांच दिन दूर है पर टीवी, एफ.एम. रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकायें उस पर शोर पर शोर मचाये जा रहे हैं। आ रहा है, आ रहा है नया साल आ रहा है। नववर्ष के पहले ही दिन चंद्रग्रहण क्या पूरे वर्ष बुरा प्रभाव डालेगा? या अच्छा होगा-ऐसे सवाल बेतुके हैं। अगर हम भारतीय दृष्टिकोण से बात करें तो यह चंद्रग्रहण वर्ष के बीच में आ रहा है और अगर पाश्चात्य दृष्टिकोण से देखें तो ऐसी चीजें महा बेवकूफी की मानी जाती हैं-याद रहे मायावी विकास में पश्चिम हम से बहुत आगे हैं और जिसे हम जन्नत समझते हैं वह उसे रोज भोगते हैं-अरे, जोरदार ऊंची इमारतें, मक्खन जैसी सड़कें, चमचमाती गाड़ियां और रात को आदमी द्वारा निर्मित ऐसी रौशनी जिसके आगे सूरज की रौशनी बोझिल लगती है, यही तो जन्नत की कल्पना है। हम जो टीवी पर बाहरी दृश्य देखते हैं उसके आधार पर यही कहते हैं कि स्वर्ग इसी धरती पर वह भी पश्चिम में कई जगह है। कहने का तात्पर्य यह है कि बिना किसी धार्मिक कर्मकांड के वह यहीं स्वर्ग भोग रहे हैं तब काहे वह चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के प्रभाव पर वह लोग विचार करेंगे।
एक बात जो सबसे अधिक अखरती है। कोई त्यौहार आया नहीं कि समाचार चैनल और रेडियो वाले उसको बाजार के लिये उपभोक्ता जुटाने का काम शुरु करते हैं। यहां तक तो ठीक! हर चैनल के मनोरंजक कार्यक्रम भी अपनी कहानियों में जबरन उनको ठूंस लेते हैं। यह आपत्ति केवल पाश्चात्य संस्कृति के त्यौहारों पर ही नहीं वरन् भारतीय त्यौहारों पर भी है। दिवाली, होली और राखी अपने देश के लोग मनाते हैं। ऐसे में अवकाश के दिन अगर सामान्य मनोरंजन के कार्यक्रम प्रस्तुत हों तो भी ठीक! वहां भी जबरन उन त्यौहारों को जोड़ जाता है। यह सभी देखकर तो लगता है कि अपने देश में व्यवसायिक प्रवृत्ति का अभाव है। अक्सर आपने भारतीय खिलाड़ियों के बारे में सुना होगा कि वह पैसा खूब कमाते हैं पर उनकी व्यवसायिक सोच नहीं दिखती। यही कारण है कि क्रिकेट में आज भी आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी टीमों जैसा सामथ्र्य भारतीय खिलाड़ियों में नजर नहीं आता जो हाथ से जाता मैच अपनी तरफ खींच लें। दूसरी बात यह है कि आर्थिक क्षेत्र में भारतीयों की सबसे बड़ी समस्या ‘प्रबंध कौशल’ माना जाता है। पहले तो यह सरकारी क्षेत्र में देखा जाता था पर अब तो निजी क्षेत्र में भी यही देखा जा रहा है। समाचार चैनलों की बात करें तो आज भी दूरदर्शन ही ऐसा है जो वास्तव में सही ढंग से काम कर रहा है। बाकी समाचार चैनल तो मनोरंजक चैनलों के विज्ञापन जैसा काम कर रहे हैं। फिर उन पर फिल्मों के अभिनेताओं को भी बिना किसी फिल्म के लोकप्रिय बनाये रखने का जिम्मा है जिस कारण रोज एक कलाकार का जन्म समाचारों के केंद्र में छा जाता है। पहले फिल्म का गासिप छापने वाली पत्रिकायें अलग होती थी। बिकती खूब थी पर फिर भी समाचार और साहित्य का स्तरीय बुद्धि का पाठक उसे देखता तक नहीं था पर आज वही समाचार टीवी चैनलों को रौशन कर यह साबित करने का प्रयास होता दिखता है कि इस देश के आम आदमी की बौद्धिकता का दिवालिया निकल गया है।
उस दिन हमारे एक मित्र के लड़के ने भी यही बात कही थी कि ‘जब हम बाहर जाते हैं तो ऐसा लगता है कि हमारे माता पिता पुरानी संस्कृति के हैं क्योंकि वह नववर्ष और क्रिसमस नहीं मनाते। वह वैलंटाईन डे का मतलब नहीं समझते।’
उसके जाने के बाद उसके पिता ने मेरे से कहा था-‘देखो यह टीवी चैनल किस तरह हमारी संस्कृति का नष्ट कर रहे हैं। वह पश्चिमी त्यौहारों को इस देश में इस तरह प्रचारित कर अपनी संस्कृति को घटिया साबित करने का प्रयास करते हैं।’
हमने कहा-‘नहीं, ऐसी बात नहीं! उनमें तो तो भारतीय त्यौहारों पर भी कार्यक्रम आते हैं यह अलग बात है कि वह हास्याप्रद लगते हैं। सच तो यह है कि हमारे देश में संस्कृति तैयार की जा रही है जिससे बाजार कभी बीमार न हो। हो तो इसी खिचड़ी से काम चलाये।’
हम कोई बाजार या प्रचार की नहीं कर रहे है बल्कि उस असमंजस को बयान कर रहे हैं जो अक्सर हमारे सामने आते हैं। वैसे संभव है कि देश के नवयुवक नवयुवतियां भले ही कुछ देर बाजार के प्रचार में इन त्यौहारों पर खर्च करते हैं पर बाद में वह फिर अपनी दुनियां में लौट आते हैं इसलिये सांस्कृतिक खतरे की बात जमती नहीं। भारतीय त्यौहारों पर विभिन्न मंदिरों में जब हम भीड़ देखते हैं यह भय समाप्त हो जाता है। प्रसंगवश याद आया कि हमारे साथ एक योगी मित्र से उसके अन्य मित्र ने मंदिर में देखकर कहा-‘तुम तो योग साधना करते हो फिर यहां क्यों आते हो?’
उसने जवाब दिया कि ‘यह एक अच्छी आदत है। मूर्तियों में भगवान नहीं है हमें पता है पर फिर भी उसके होने का अहसास मुझे एक आत्मविश्वास देता है। इसलिये यहां ध्यान लगाने जरूर आता हूं। पुरानी आदत है न! छूटती नहीं है। एक बार मूर्ति पूजना शुरु करने के बाद उसे छोड़ना भी नहीं चाहिये, ऐसा मेरे योग गुरु ने बताया था क्योंकि वह भी तनाव का कारण बनता है।’
तब वह अन्य मित्र बोला‘-सच बात तो यह है कि शनिवार या मंगलवार को मैं यहां न आंऊ तो बाकी दिन परेशान रहता हूं।’
कहने का तात्पर्य यह है कि मन ऐसी शय है जब उस पर नियंत्रण स्वयं नहीं करते तो कोई बहाना ले सकते हैं-यह बुरा नहीं है कम से कम उससे तो कतई नहीं कि आपके मन को बांधकर कोई दूसरा ले जाये जिसके पीछे आपको भी जाना है। अपने मन को स्वतंत्र रखने के लिये जरूरी है कि उस पर हमारा नियंत्रण हो।
बाजार और प्रचार का हाल तो सभी देख रहे हैं। अभी चार दिन पड़े हैं पर इधर नये वर्ष को ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे कि आज आ रहा हो। अनेक टीवी चैनल पिछले वर्ष के कार्यक्रमों को प्रस्तुत कर रहे हैं। समाचार चैनल यह कैसे दावा कर सकते हैं कि इन चार दिनों में कोई ऐसी बड़ी घटना नहीं होगी जो इस वर्ष की पहचान बन जाये-या वह तय कर चुके हैं कि वह इन पांच दिनों में कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं प्रस्तुत करेंगे जो इस वर्ष का सबसे अच्छा हो क्योंकि कुछ तो अपने इस वर्ष के हिट कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे हैं। बहरहाल चार दिन तक सुनते रहो कि नया वर्ष आ रहा है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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