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6/24/11

राजनीति शास्त्र के ज्ञान से परे आंदोलक पुरुषों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक-हिन्दी आलेख (agitation, politics and nowledge-hindi article)

           जिस तरह भारत के धार्मिक आंदोलनों, अभियानों तथा संगठनों की स्थिति रही है कि उनके शिखर पुरुष श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अल्प होने के बावजूद समाज का नेतृत्त करने लगते हैं। वही स्थिति सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों की भी है। वही अगर आप पिछले पचास साठ वर्षों से देश की स्थिति का अवलोकन करें तो पता चलेगा कि हमारे देश के अनेक संत माया मोह से परे रहने का उपदेश देते हुए अपने आश्रमों को महलनुमा तो अपने संगठन को लगभग कंपनी में बदल दिया है। दोनों हाथों  से माया बटोरी है। उन्होंने भारतीय अध्यात्म के ग्रंथों से अनेक पाठ रट लिये हैं उनको संस्कृत के श्लोक याद हैं। बड़े बड़े ग्रंथों का अध्ययन उन्होंने किया है। स्पष्टतः वह धर्म के वह व्यवसायी हैं जिनका अध्यात्मिक ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में अनेक महानायकों की कहानियां हैं उनका वह सरसपूर्ण ढंग से सुनाकर वाहवाही लूटते हैं पर तत्वज्ञान तथा ध्यान के प्रेरणा न देने का प्रयास करते हैं न ही ऐसा चाहते हैं क्योकि इससे उनके अनुयायी उनसे बड़े सिद्ध बन सकते है।। वह विफल रहते हैं। उनके ढेर सारे शिष्य अपने गुरुओं का बखान करते करते थकते नहीं है पर उनसे क्या सीख और कितना उस पर अमल कर रहे हैं यह कोई नहीं बता पाता। इनमें अनेक तो सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी बोलने का लोभ नहीं छोड़ पाते क्योंकि इससे प्रचार माध्यमों मे बने रहने का अवसर भी मिलता है।
        ऐसा लगता है कि भारतीय समाज पूर्वकाल में श्रमशील रहा होगा। अपने मानसिक तनाव की मुक्ति के लिये वह सांसरिक विषयों से इतर गतिविधियों में संलग्न रहने के लिये बौद्धिक विशेषज्ञों की शरण लेता होगा। ऐसे में मनोरंजन से उकताने के बाद उसे अध्यात्मिक विषय अत्यंत रुचिकर लगे होंगे क्योंकि न वह केवल मनोंरजन बल्कि ज्ञानबर्द्धक होने के साथ ही लंबे समय तक आत्मिक शांति के लिये उनका ज्ञान अत्यंत उपयेागी है। इसी कारण ही हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान सर्वाधिक संपन्न बन गया क्योकि तपस्वियों, ऋषियों तथा ज्ञानियों ने जहां अनेक खोजें की तो समाज ने उनको स्वीकार भी किया। समाज अध्यात्मिक का मुरीद बना तो अल्पज्ञानियों के लिये यह व्यवसाय चुनने का एक महत्वपूर्ण साधन भी बना। प्राचीन तपस्पियों, ऋषियों और मुनियों ने जहां अपने सत्य ज्ञान से प्रसिद्धि प्राप्त करने के साथ ही अपना शिष्य समाज बनाकर अध्यात्मिक ग्रंथेां में देवत्व का दर्जा हासिल किया तो वहां समाज भी उनका गुणगायक बन गया।
           सर्वशक्तिमान का बनाया यह संसार अत्यंत अद्भुत है। इसमें सारी भौतिकता उसके संकल्प के आधार पर ही स्थित है पर वह सर्वशक्तिमान किसी को दिखता नहीं है। यह संसार अपने रूप बदलता है। बनता है और नष्ट होता है। विकास और विनाश के इस चक्र को कोई समझ नहंी पाया। संसार नश्वर है पर चमकदार है इसलिये कुछ लोग यहां अपनी देह, नाम तथा व्यवसाय की चमक बनाये रखने के लिये समाज से परे होकर उसका शीर्ष बनना चाहते हैं। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के ग्रंथों की विषय सामग्री सरस तथा मनोरंजक होने के साथ ही ज्ञानवर्द्धक होन के पेशेवर धार्मिक लोगों के लिये बहुत सहायक होती है। जिसे ज्ञान चुनना है वह ज्ञान चुने जिसे मनोरंजन करना है वह मनोरंजन करे।
        इनमें कुछ लोग लोग तो समाज पर आर्थिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक शासन करना चाहते हैं और तब पैसे, पद और प्रतिष्ठा का उनका मोह अनंत हो जाता है। इसकी भूख शांत नहीं होती। जिस तरह सामान्य आदमी की भूख रोटी से मिट जाती है विशिष्टता की छवि रखने वाले आदमी की भूख उससे नहीं मिटती बल्कि पैसा, प्रतिष्ठा और पद का मोह उसे हमेशा पागल बनाये रहता है। इसमें भी कुछ आदमी ऐसे होते हैं जो समाज को पागल बनाये रखते हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य समाज से परे बने अपने शिखर की रक्षा करना होता है। इसलिये वह दूसरे के सृजन को अपने नाम करना चाहते हैं। यहीं से शुरु होता है उनका अभियान जो अंततः निष्काम बौद्धिक लोगों लिये के अनुसंधान का विषय बन जाता है।
धार्मिक आंदोलनों की तरह सामाजिक और राजनीतिक विषयों के अनेक आंदोलन ऐसे हैं जिनको उनके शीर्ष पुरुष कथित रूप से जनप्रिय बताकर भ्रमित करते हैं। आज के बाज़ार और प्रचार से प्रायोजित अनेक ऐसे आंदोलन हैं जो प्रचारित हैं पर उनसे जनहित कितना हुआ या होगा यह अभी भी विचार का विषय है। हम यहां राजनीतिज्ञों के आंदोलनों की बात न कर उन लोगों के राजनीिितक आंदोलनों की बात करेंगे जिनको गैर राजनीतिक लोग प्रारंभ करते है। वह एक तरफ कहते हैं कि उनका आंदोलन गैर राजनीतिक है पर उसकी कोई दूसरी संज्ञा नहीं बताते-जैसे कि सामाजिक आंदोलन, नैतिक आंदोलन या शैक्षणिक आंदोलन। मजे की बात यह है कि उनकी मांगे सरकार से होती हैं जिनका नेतृत्व राजनीतिक लोग करते हैं। ऐसे में आंदोलनों के शीर्ष पुरुषों के बौद्धिक चिंत्तन पर ध्यान जाना जरूरी है। वह कहें या न कहें उनके आंदोलनों में कहीं न कहीं राजनीतिक तत्व रहता है-चाहे उनकी मांगों में हो या उनके पूरे होने में। दूसरी बात यह कि समाज में सर्वजन हित के लिये केाई भी कार्य राजनीतिक परिधि में आता है। मनुष्य नाम की ईकाई का समाज के रूप में परिवर्तन इसलिये ही होता है कि कम से कम वह अन्य जीवों की तरह हिंसक या अनुशासनहीनता का बर्ताव न करे। अगर कोई व्यक्ति अध्यात्मिक विषयों  में महारती है तो वह समाज के भले के लिये न काम कर मनुष्य के हित के लिये काम करता है। वह स्वयं पर अनुसंधान करता है फिर उसकी जानकारी दूसरे को देकर अपने मनुष्य के दायित्व का निर्वाह करता हे। वह मनुष्य को समाज मानकर नहीं बल्कि इकाई दर इकाई संपर्क बनाता है। जहां समाज मानकर मनुष्य को ईकाई दर इकाई मानकर काम किया जाता है वहां राजनीतिक क्षमतायें होना आवश्यक है।
हम कौटिल्य का अर्थशास्त्र या मनु स्मृति को देखें तो वहां मनुष्य को इकाई मानकर संबोधित किया गया है न कि समाज मानकर। उसमें मनुष्य निर्माण के लिये संदेश दिये गये हैं। यह मानकर कि अगर मनुष्य के व्यक्त्तिव का निर्माण होगा तो समाज स्वयं ही अपनी राह चलेगा। कहीं न कहीं यह स्वीकार किया गया है कि समूचा मनुष्य समुदाय एक जैसा नहीं हो सकता। इसलिये उसमें जितने बेहतर लोग होंगे  उतना ही वह चमकदार भी होगा । इसके विपरीत भारतीय आंदोलक पुरुष समाज को संबोधित करते हुए अपनी बात करते हैं। वह यह नहीं बताते कि मनुष्य क्या करे? वह कहते हैं कि समाज यह करे तो सरकार वह करे। यह हवा में तीर चलाने जैसा है। वह समाज में व्यक्ति निर्माण के लिये अपनी भूमिका निभाने से कतराते हैं। भले ही वह सामाजिक नेता होने का दावा करें पर अपनी भूमिका को राजपुरुष की तरह देखना चाहते हैं। यह उनके राजनीतिक अल्पज्ञान का प्रमाण है। अध्यात्मिक पुरुष की छवि सौम्य और शांत होती है। उसकी सक्रियता में आकर्षण नहीं होता जबकि राजपुरुष की छवि में आक्रामकता, सुंदरता तथा प्रभावी छवि है और इसलिये हर कोई उसी तरह दिखना चाहता है।
        हम यहां कुछ आंदोलनों की चर्चा करना चाहेंगे जो जनमानस के लिये महत्वपूर्ण रहे हैं। सबसे पहले सामाजिक कार्यकर्ता श्री अन्ना हजारे और विश्व प्रसिद्ध  योग  शिक्षक बाबा रामदेव के आंदोलन की बात करना अच्छा रहेगा। मूलतः दोनों  ही राजनीतिक क्षेत्र के नहीं है। दोनों ही अपनी छवि महात्मा गांधी की तरह बनाना चाहते हैं। दोनों ही यह कहते हैं कि वह कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं करेंगे और न ही चुनाव लड़ेंगे। गैर राजनीतिक दिखने वाले उनके आंदोलनों के विषय बिना राजनीतिक दावपैंचों के सिद्ध नहीं हो सकते यह उनको कोई न समझा पा रहा है। वजह दोनेां ही राजनीति के पश्चिमी सिद्धांतों का अनुकरण कर रहे हैं जिसमें आंदोलन एक विषय और सरकार चलाना दूसरा विषय माना जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि राजधर्म का मतलब वह क्या समझते हैं जो दूसरों को बता रहे हैं। चलिये वह जानते भी होंगे फिर कोई बड़ा पद लेने की बात से इंकार क्यों करते हैं? क्या सरकारी पद केवल उपभोग के लिये होता है। विश्व भर की लोकतंत्रिक सरकारों में बैठे उच्च पदासीन लोग क्या राजसुख भोगने आते हैंे। क्या पद लेना केवल प्रतिष्ठा का प्रतीक है और दायित्व निभाकर दूसरों के सामने प्रस्तुत करने का कोई सिद्धांत वहां नहीं है।
       हैरानी की बात है कि भारतीय जनमानस उनके पद ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की वैसे ही प्रशंसा करता है जैसे भीष्म पितामह की। यह सभी लोग क्या भीष्मपितामह बनना चाहते है पर याद रखना चाहिए कि उन्होंने इस प्रंतिज्ञा को निभाया तो उसकी वजह से अंततः महाभारत युद्ध हुआ। अगर वह स्वयं राजा के पद पर बैठते तो न पांडु राजा बनते और न ही धृतराष्ट के पुत्र पांडवों के साथ युद्ध करते। भीष्म पितामह अपने राज्य की रक्षा करने के वचन से बंधे रहे पर अंततः उनको युद्ध में प्राण गंवाने पड़े। इस एक घटना को भारतीय इतिहास मंें हमेशा मिसाल नहीं माना जाता क्योंकि राजकाज का जिम्मा निभाने में तो हमारे आदर्श भगवान श्रीराम माने जाते हैं। राज्य का त्याग उन्होंने किया पर वापस लौटकर फिर वापस सिंहासन पर विराजे और प्रजा हित के लिये काम किया।
        श्री अन्ना हजारे ने कहा था कि वह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे हैं तब यह विचार सभी लोगों के मन में आया होगा कि महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम भारत को पूर्णता नहीं दिला सका शायद तभी वह ऐसी बात कही हैं। बात निकली है तो श्री महात्मा गांधी जैसे पुण्यात्मा के विचार पर प्रतिविचार आयेगा और हम उसे व्यक्त करने से पीछे नहीं हटेंगे। महात्मा गांधी ने अंग्र्रेजों से आजादी दिलाने का बीड़ा उठाया यह स्वीकार्य है पर उसके बाद राज्य कौन संभालेगा इसकी जिम्मेदारी कौन तय करने वाला था? महात्मा गांधी ने क्या ऐसी गांरटी ली थी कि अंग्रेजों के बाद राज्य चलाने वाले अपने काम में दक्ष होंगे! भारत एक विशाल देश था और उसे दो टुकड़ों में बांटा गया। इसके बावजूद आज का भारत बहुत विशाल था? उसका राजकाज कैसे चलेगा और कौन चलायेगा इसकी भूमिका क्या महात्मा गांधी ने तय की थी? उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान सुखद भारत की कल्पना व्यक्त की पर उसमें अपनी सक्रिय भूमिका निभाना क्या सत्ता का सुख भोगना समझा? यह पलायन माना जाये कि त्याग?
         वह परिवार, समाज, और राष्ट चलाने के सिद्धांतों पर खूब बोले होंगे पर आजादी के बाद के भारत में उन्होंने सक्रिय भागीदारी न देकर क्या जनता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया था? सरकार और राजकाज कोई स्वचालित मशीन नहीं है जिसके साथ खिलवाड़ किया जाये। उसके लिये कुशल लोग होना चाहिऐं। मूल बात यह है कि महात्मा गाीधी अंग्रेजों के हाथ से राजकाज लेकर जिन स्वदेशी लोगों को दे रहे थे उनके ज्ञान पर उनको केवल विश्वास था या उन्होंने उसे प्रमाणिक रूप देखाय भी था? आज अन्ना कहते हैं कि हम काले अंग्रेजों के राज्य को झेल रहे हैं तो सीधे महात्मा गांधी के आंदोलन का विचार आता है। जब उनको कोई राज्य का पद लेना नहंी था तो फिर वह स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के नेता क्यों बने? क्या वह मानते थे कि अं्रग्रेजों ने जिस व्यवस्था को बनाया है उसमें सरकार तो स्वतः चलेगी और उच्च पद तो केवल भोगने के लिये हैं उनमें कोई जिम्मेदारी नहीं होगी?
          हम तो यह मानते हैं सरकार या राजकाज चलाना अंततः राजनीति ज्ञान के बिना संभव नहीं है। आप अगर उसमें कोई पद लेना नहीं चाहते तो इसका मतलब यह है कि आप में कुशलता की कमी है। उसके बाद आप राज्य में परिवर्तन के लिये कोई आंदोलन  चलाना चाहते हैं और पद भी लेना नहीं चाहते तो इसके तीन मतलब यह हैं। एक तो यह कि अप्रत्यक्ष रूप से राजकाज आपका ही रहेगा पर उसमें कमीपेशी होने पर अपनी जिम्मेदारी से भाग सकते हैं। दूसरा यह कि आपका मानना है कि राज्य तो भगवान भरोसे चलता है हम जिसे बिठायेंगे वह सुख भोगने के साथ हमें भी पूजता रहेगा। तीसरी स्थिति यह है कि आपमें आत्मविश्वास नहीं है कि आप सरकार या राज चला पायेंगे।
          ऐसे में कुछ निष्कर्ष भी निकल सकते हैं जो त्यागी आंदोलक पुरुषों और उनके समर्थकों को शायद अच्छे न लगें। एक तो यह कि गैरराजनतिक लोगों दो कारणों से ही राज्य पद त्यागते हैं। एक तो वह बहुत चालाक हैं क्योंकि इससे बिना जिम्मेदारी के वह राजसुख या सम्मान पाते हैंे या उनके पास राजनीतिक शास्त्र के ज्ञान का अभाव है। पहली स्थिति में तो उनको आंदोलक पुरुष होने का हक है क्योंकि राजनीतिक सिद्धांत इस कुटिलता की अनुमति देते हैं कि अगर कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी न लेकर अप्रत्यक्ष रूप से राजहित करता है तो कोई बात नहीं है पर दूसरी स्थिति में उनको इसका अधिकार नहीं है कि वह कथित रूप से एक अकुशल प्रशासक को हटाकर दूसरा स्थापित करें। अगर उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है और न ढूंढने की क्षमता से भी परे हैं तो उनके कथित गैरराजनीतिक आंदोलन संशय के घेरे में आयेंगै। इससे अच्छा है तो वह आंदोलन ही न चलायें और अगर चलायें तो समय आने पर राज्य चलाने के लिये व्यवस्था से जुड़कर उनको आदर्श स्थापित करें।
           अर्थशास्त्र में हमने भारतीय अर्थव्यवस्था के समस्याओं के बारे में पढ़ा है कि अकुशल प्रबंध का यहंा अभाव है। मतलब यह कि हमें कुशल प्रबंधक चाहिये जो व्यवस्था चला सकें। जो आदर्श की बात करें तो उसे व्यवस्था में आकर काम करते हुए साबित करे। अगर हम भ्रष्टाचार की बात करें तो वह अकुशल प्रबंध का एक हिस्सा होने के साथ ही परिणाम है। हम परिणाम बदलना चाहते हैं यानि भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं पर कुशल प्रबंध के बिना यह संभव नहीं है। बीमारी हटाने के लिये दवा चाहिये न कि हम नारे लगाते रहें कि बीमारी भाग जाओ नहीं तो हम आते हैं। मैं पद नहीं लूंगा मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा मेरा किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं रहेगा जैसी बातें कहते हुए राजनीतिक आंदोलक पुरुष वैसे ही हैं जैसे कोई डाक्टर तमाम तरह के शारीरिक परीक्षण कराकर मरीज को बीमारी का नाम बताकर पर दवा देने की बात आने पर कहीं दूसरे डाक्टर के पास भेज देता है। हम ऐसे आंदोलक पुरुषों की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाते क्योंकि वह प्रमाणिक है पर राजनीति शास्त्र के ज्ञान का अभाव उनमें साफ दिखाई देता है। इसलिये वह राजनीतिक खेल में ऐसे दर्शक की भूमिका निभाना चाहते हैं जो खिलाड़ी को सलाह देता रहे और जीतने पर अपनी वाह वाही स्वयं करे और हार हो तो दोष खिलाड़ी को दे। ऐसा आम तौर से हम गांवों में चौपालों और शहरों में बाजा़ारों में शतरंज और ताश खेलने वाली महफिलों में देखते हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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12/23/10

अमीर की नैतिकता और गरीब की अनैतिकता-हिन्दी लेख (amir ke star plus garib ke minus-hindi lekh)

बड़ी खबर या ब्रेकिंग न्यूज का सही स्तर तय करना मुश्किल हो गया है क्योंकि टीवी न्यूज चैनल हर सैकंड में एक बड़ी खबर लाते हैं। कहना तो यह भी चाहिए कि उनकी हर खबर पहले कहीं न कहीं बड़ी होती है या फिर वह अपनी हर आम खबर को भी खास कर परोसने की वैसी ही कोशिश करते हैं जैसे कोई हलवाई अपने एक घंटा पहले रखे समोसे को भी खस्ता और गर्म कहकर प्रस्तुत करता है। ऐसी ही एक खबर थी कि एक सरकारी दफ्तर में बार बालाओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर अश्लील डांस प्रस्तुत किया।
टीवी ऐंकर चिल्ला रहा था कि ‘उस समय अनेक वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे।’
बाकी सब तो ठीक पर उसका बार बार उस डांस को अश्लील कहना थोड़ा अज़ीब लग रहा था। ऐसा लगता है कि सेठ साहूकारों की-आजकल उनको कंपनियों के मैनेजिंग डाइरेक्टर या चीफ के रूप में जाना जाता है-छत्रछाया में पलने वाले हमारे बौद्धिक समाज की सोच भी अब केवल नीचे ही आंखें किये रहती है क्योंकि ऊपर देखने का मतलब है कि सड़क पर आ जाना। उनके लिये शालीनता और नैतिकता के मायने अब केवल गरीब और मध्यम वर्ग तक ही सिमट गये हैं।
किस्सा यह था कि एक सरकारी कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारियों का चुनाव हुआ जिनके शपथ ग्रहण समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से यह डांस या नृत्य कार्यक्रम हुआ। फिल्मी गीत और नृत्य की नकल पर ऐसे कार्यक्रम अपने यहां आम बात हो गयी है इसलिये उनको असांस्कृतिक कहना ही अपने आप में गलत है। अगर टीवी चैनलों की बात मान ली जाये तो सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों को ऐसे कार्यक्रम आयोजित ही नहीं करना चाहिए। अगर करें तो उनको आधुनिक सेठ साहुकारों की छत्रछाया में पलने वाले कलाकारों को उसमें बुलाना चाहिये क्योंकि वह चाहे जैसे नृत्य करें या गायें वही शालीनता की परिधि में आता है।
सीधी बात कहें कि जो विज्ञापनदाता बनने की औकात नहीं रखते उनको कोई सार्वजनिक मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित नहीं करना चाहिए। पूंजीपतियों, समाज सेवकों, अपराधियों तथा प्रचार माध्यमों के शिखर पुरुषों की छत्रछाया में एक सांस्कृतिक गिरोह बन गया है जो अपने आकाओं से कम ताकतवर या फिर अपने क्षेत्र के बाहर के आदमी की सार्वजनिक सक्रियता को खत्म किये दे रहा है। प्रचार माध्यम उसको हवा देने का एक सशक्त माध्यम बन गया है। यह गिरोह पूंजीपतियों तथा अपराधियों के पैसे पर बनने वाली फिल्मों की अश्लीलता को महान कला बताता है। इतना ही नहीं टीवी चैनलों पर चलने वाले कार्यक्रमों की अश्लीलता को भी उनके सहधर्मी चैनल भुनाते हैं। पहले तो वह अश्लीलता दिखाते हैं फिर उसकी आलोचना करते हैं। इतना ही नहीं फिर अश्लीलता परोसने वाले का साक्षात्कार भी प्रसारित करते हैं। यह सब चलेगा क्योंकि वह शिखर पुरुषों के गिरोह की छत्रछाया में हैं।
ऐसे में कई सवाल उठते हैं। बार बालाओं का डांस अश्लील है तो फिर उन अभिनेत्रियों के बारे में क्या ख्याल है जिनको पर्दे पर देखकर वह उनकी नकल करती हैं। इतना ही नहीं अनेक बार जलकल्याण तथा पुरस्कार वितरण के नाम पर होने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों में बड़ी बड़ी अभिनेत्रियां इससे भी बुरे नृत्य प्रस्तुत करती हैं पर क्या मज़ाल उसे कोई अश्लील कह जाये? इतना ही नहीं ऐसे कार्यक्रमों में समाज के अनेक शिखर पुरुष आंखें फाड़कर देखते हैं पर कोई उन पर उंगली उठाकर तो देखे।
इन प्रचार माध्यमों ने ऐसा आंतक का वातावरण बना दिया है कि श्लीलता और अश्लीलता का आधार कोइ सामाजिक पैमाना नहीं बल्कि सामयिक और स्वार्थ से प्रभावित बन रहा है। यही कारण है कि इनके प्रचार की वजह से तीन अधिकारी तथा चार कर्मचारी निलंबित कर दिये गये। आगे उनका क्या होगा यह पता नहीं पर जब तक ऐसा नहीं होता यह चैनल इस खबर पर चर्चा करते रहते।
हम यह इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं कर रहे। बल्कि यह तो चिंता की बात है कि इस देश में हर छोटा और बड़ा आदमी यह समझ रहा है कि इस तरह के ठुमके लगवाकर लोगों का मनोरंजन कर उनका दिल जीता जा सकता है। बड़े आदमी करें तो ठीक छोटा करे तो अश्लील! यह बात समझ से परे है। बार बालाऐं कोई बड़े धनपति से प्रायोजित नहीं होती। वह गरीब घरों से होती है। गाहे बगाहे उन पर कार्यवाही होती है। जब देश में रोजगार की कमी है तब बार बालाओं को नृत्य कर कमाने का अवसर मिलता है तो बुरा क्या है? उनके नृत्य में अश्लीलता ढूंढने वाले जरा प्रायोजित नृत्यांगनाओं के फिल्मी डांस देखें! अगर उनमें से किसी के पास हिम्मत हो तो उसे अश्लील बताये। चैनल बंद हो जायेगाा या प्रस्तोता फिर दूसरा कार्यक्रम देने लायक नहीं रहेगा। क्या हैरानी है कि बार बालाओं को चरित्रहीन और जिनकी वह नकल कर रही हैं उन महान महिलाओं को चरित्रवान बताया जाता है। यह प्रचारात्मक आतंकवाद समाज में अपनी नैतिकता-अनैतिकता और श्लीलता-अश्लीलता के ऐसे ही पैमाने बना रहा है जैसा कि अन्य धार्मिक आतंकवादी तय करते हैं। यह आतंकवादी स्वयं खूब मनोरंजन और मनमानी करते हैं पर दूसरे पर इसी वजह से हमला करते हैं कि वह वही कर रहा है। मतलब वह आतंकवादी बंदूक के दम पर करते हैं और प्रचार माध्यम अपनी खबरों के दम पर! मुश्किल यह है कि समझाया किसे जाये? धार्मिक आतंकवादी इसलिये नहीं समझते क्योंकि वह स्वयं ही अप्रत्यक्ष रूप से प्रायोजित हैं तो प्रचारात्मक आतंकवाद में लगे लोगों को तो इस बात का आभास ही नहीं कि वह कर क्या रहे है? समझकर करेंगे भी क्या वह तो प्रत्यक्ष रूप से ही विज्ञापनदाताओं से प्रायोजित हैं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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10/13/10

क्रिकेट से तो अच्छा है कॉमनवेल्थ गेम्स-2010 (राष्ट्रमंडल खेल) देखना-हिन्दी लेख ( new delhi coman welth games-2010 (rashstra mandal khel) best more than from cricket test match-hindi article)

सुनने में आया है कि बीसीसीआई की टीम- जिसे भारतीय टीम भी कहा जाता है- ने आस्ट्रेलिया की टीम को दूसरे क्रिकेट टेस्ट मैच में हराकर श्रृंखला ( टेस्ट क्रिकेट सीरीज) जीत ली है। यह हमने टीवी पर सुना, क्योंकि अब क्रिकेट में दिलचस्पी बिल्कुल नहीं रही है या कहा जाये कि इस खेल से अब चिढ़ ही हो गयी है तो गलत नहीं होगा। चूंकि आज निजी टीवी चैनल वालों के पास क्रिकेट का यही मसाला बहुत है इसलिये उनको नहीं देखना ठीक लगा। अलबत्ता दिल्ली दूरदर्शन पर कॉमनवेल्थ खेलों का प्रसारण देखना अब अच्छा लगने लगा है।
सच तो यह है कि क्रिकेट देखना ही समय खराब करना है। इससे अच्छा तो तरह तरह के खेल कॉमनवेल्थ गेम्स-2010 (राष्ट्रमंडल खेलों) में देखना अच्छा अनुभव रहा है। बैटमिंटन, कुश्ती, तैराकी, हॉकी, तथा अन्य खेलों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन अच्छा चल रहा है। कम से कम एक बात तय रही कि भारत खेलों के मामले में आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के करीब पहुंच रहा है हालांकि अभी भी बहुत दूरी है। हॉकी में इंग्लैंड के खिलाफ सेमीफायनल में भारत की जीत बहुत अच्छी रही।
आस्ट्रेलिया के विरुद्ध क्रिकेट टेस्ट मैचों में भारत की श्रृंखला जीतने की खुशी हमें इसलिये भी नहीं है क्योंकि नई दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के अंतर्गत कल आस्ट्रेलिया से भारत का मुकाबला है जो इस हॉकी खेल का विश्व चैम्पियन है। एक मजे की बात यह रही है लंबे समय तक हॉकी और क्रिकेट में पाकिस्तान को भारत का चिरप्रतिद्वंद्वी माना जाता रहा जो कि अब केवल प्रचार भर लगने लगा है। इंग्लैंड की गुलामी करते हुए हमारी सोच भी संकीर्ण हो गयी है जबकि वास्तविकता यह है कि इन दोनों खेलों में विश्व के अन्य देश भी कम चुनौती देने वाले नहीं है। हॉकी में आस्ट्रेलिया के टीम भी बहुत शक्तिशाली है और क्रिकेट में उसे भले ही कभी कभी कड़ी चुनौती मिलती हो पर हॉकी खेल में उसका लंबे समय से एकछत्र राज चल रहा है। क्रिकेट खेल में कभी कभी भाग्य खेल करता है पर हॉकी में ऐसी अपेक्षा नहंी करना चाहिए। क्रिकेट टेस्ट या एकदिवसीय मैचों में भारत की जीत का कोई अधिक मायने नहंी है क्योंकि वह द्विपक्षीय आयोजन होते हैं जबकि हॉकी या अन्य खेल बहुपक्षीय आयोजन होते हैं इसलिये उनमें ही किसी देश की काबलियत का पता चलता है।
वैसे आजकल देखा जा रहा है कि लोग अपने बच्चों को क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में देखने के लिये लालायित रहते हैं जबकि पैसा अन्य खेलों में भी बहुत है-भले ही कुछ खेलों में अनाप शनाप पैसा नहीं मिलता पर अच्छा प्रदर्शन किया जाये तो पैसा आता ही है फिर अब देश की केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें भी पुरस्कार देने लगी हैं जो कि ठीकठाक ही है। टेनिस, स्कवैश, फुटबाल, बैडमिन्टन, गोल्फ, कार रेस तथा अन्य खेलों में खिलाड़ी पैसा कमा रहे हैं। टेनिस तो क्रिकेट से अधिक पैसा देने वाला खेल है इसलिये ही उससे संबद्ध खिलाड़ी विज्ञापन वगैरह करते नज़र नहीं आते। मुश्किल यह है कि उनमें भाग्य नहीं चलता जबकि क्रिकेट में वह एक सहारा बनता है। हम भारतीय भाग्यवादी हैं इसलिये ही शायद क्रिकेट पर अधिक भरोसा करते हैं। वैसे भी यह खेल कम मेहनत वाला है जबकि टेनिस, हॉकी और फुटबाल दम लगाने वाले खेल है।
नई दिल्ली के कॉमनवेल्थ खेल-2010 की चर्चा पहले बुरी बातों को लेकर हुई थी पर अब खेल देखकर लग रहा है कि वाकई आयोजन तो जोरदार हुआ है। पहले तो इन खेलों पर खर्च करने को लेकर आपत्ति की जा रही थी पर अगर लोग इन खेलों को ध्यान से देखें तो उनको लगेगा कि अब कोई एक खेल लेकर बैठ जाने की चीज नहीं है। अन्य खेलों के प्रचार में कॉमन वेल्थ गेम्स (राष्ट्रमंडल खेल) महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं इसमें संदेह नहीं है।
अब बात हॉकी की करें। भारतीय हॉकी टीम को अभी तक के प्रदर्शन से पचास फीसदी अधिक अच्छा खेलना होगा तभी वह कॉमन वेल्थ गेम्स के हॉकी फायनल में जीत पायेंगे। ताकत से खेलने में आस्ट्रेलिया का कोई दुनियां में सानी नहीं है। पाकिस्तान तो इस प्रतियोगिता से बाहर हो गया है। सच तो यह है कि क्रिकेट खेल ने पाकिस्तान में हॉकी का सत्यानाश कर दिया है। एक समय उसके खिलाड़ी विदेशी खिलाड़ियों को कंपा देते थे। भारतीय टीम भी अब बुरे दौर से निकली है पर अभी उसका लंबा रास्ता है। यह मैच सभी को देखना चाहिये। यह फायनल मैच अगर भारत जीतता है तो हमें इतनी खुशी होगी जो कभी नहीं हुई।
इस मैच में सतर मिनट में जितनी ताकत लगेगी वह एक दिन के क्रिकेट मैच अधिक होती है-कभी कभी मैच अतिरिक्त समय में चला जाता है तो 15 मिनट अधिक भी लगते हैं। हॉकी में भारत की सबसे बड़ी कमजोरी है पेनल्टी कार्नर को गोल में न बदल पाना है जबकि आस्ट्रेलिया इस मामले में दक्ष है, यही कारण है कि हॉकी का जानकार कट्टर से कट्टर देशप्रेमी भी अपनी टीम को संभावित विजेता सौ फीसदी नहीं मान पा रहे। इस खेल में अगर मगर या किन्तु परंतु नहीं चलते। यहां बड़ा खिलाड़ी वही है जो न केवल स्वयं गोल करता है बल्कि साथी खिलाड़ी को भी ऐसे अवसर मुहैया कराता है। बहरहाल हम भारतीय टीम की जीत की कामना तो कर ही रहे हैं साथ यह भी मान रहे हैं कि क्रिकेट मैच से तो अच्छा रहा है नई दिल्ली में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स (राष्ट्रमंडल खेल) देखना। अगर इन खेलों से भारतीय जनमानस की खेलों में रुचियों तथा विचारों में परिवर्तन आता है तो निश्चित रूप से इस खेला के आयोजकों को बधाई दी जाना चाहिए।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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