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7/4/11

हम प्रबंध योग सीख लें-हिन्दी व्यंग्य (hum prabandhyog seekh len-hindi vyangya)

          देखा जाये तो अपना देश अब गरीबों का देश भले ही है पर गरीब नहीं है। सोने की चिड़िया पहले भी था अब भी है। यह अलग बात है कि अभी तक तो यह चिड़ियायें पैदा होकर विदेशों में घोंसला बना लेती और अपने यहां लोग हाथ मलते। कहने को तो यह भी कहा जाता है कि यहां कभी दूध की नदियां बहती थी अब भी बहती हैं पर उनमें दूघ कितना असली है और कितना नकली यह अन्वेषण का विषय है।
          हम दरअसल स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन और केरल के पद्मनाभ मंदिर में मिले खजाने की बात कर रहे हैं। इस खबर ने हमारे दिलोदिमाग के सारे तार हिला दिये हैं कि पदम्नाभ मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ के हीरे जवाहरात, कीमती सिक्के और सोने के आभूषण मिले हैं। अभी कुछ अन्य कमरे खोले जाने हैं और यकीनन यह राशि बढ़ने वाली है। हम मान लेते हैं कि वहां चार लाख करोड़ से कुछ कम ही होगी। यह आंकड़ा स्विस बैंक में जमा भारतीयों की रकम का भी बताया जाता है। वैसे इस पर विवाद है। कोई कहता है कि दो लाख करोड़ है तो कोई कहता तीन तो कोई कहता है कि चार लाख करोड़। हम मान लेते हैं कि स्विस बैंकों में जमा काला धन और मंदिर में मिला लगभग बराबर की राशि का होगा। न हो तो कम बढ़ भी हो सकता है।
         हमें क्या? हम न स्विस बैंकों की प्रत्यक्ष जानकारी रखते हैं न ही पद्मनाभ मंदिर कभी गये हैं। सब अखबार और टीवी पता लगता है। जब लाख करोड़ की बात आती है तो लगता है कि दो अलग राशियां होंगी। तीन लाख करोड़ यानि तीन लाख और एक करोड़-यह राशियां मिलाकर पढ़ना कठिन लगता है। । अक्ल ज्यादा काम करती नहीं। करना चाहते भी नहीं क्योंकि अगर आंकड़ों में उलझे तो दिमाग काम करना बंद कर देगा।
          इधर खबरों पर खबरें इस तरह आ रही हैं कि पिछली खबर फलाप लगती है। सबसे पहले टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की बात सामने आयी। एक लाख 79 हजार करोड़ का घोटाला बताया गया। फिर स्विस बैंक के धन पर टीवी और अखबार में चले सार्वजनिक विवाद में चार लाख करोड़ के जमा होने की बात आई। विवाद और आंदोलन के चलते साधु संतों की संपत्ति की बात भी सामने आयी। हालांकि उनकी संपत्तियां हजार करोड़ में थी पर उनकी प्रसिद्धि के कारण राशियां महत्वपूर्ण नहीं थी। फिर पुट्टापर्थी के सत्य सांई बाबा की संपत्ति की चर्चा भी हुई तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गयी। चालीस हजारे करोड़ का अनुमान किया गया। यह रकम बहुत छोटी थी इसलिये स्विस बैंकों की दो से चार लाख करोड़ का मसला लगातार चलता रहा। अब पद्मनाभ मंदिर के खजाने मिलने की खबर से उस पर पानी फिर गया लगता है।
         पिछले कुछ दिनों से अनेक महानुभाव यह कह रहे हैं कि विदेशों में जमा भारत का धन वापस आ जाये तो देश का उद्धार हो जाये। अनेक लोग इस रकम का अर्थव्यवस्था के लिये अत्यंत महत्व बताते हुए अनेक तरह की विवेचना कर रहे हैं। अब पद्मनाभ मंदिर के नये खजाने की राशि के लिये भी यही कहा जा रहा है। ऐसे में हमारा कहना है कि जो महानुभाव विदेशों से काले धन को भारत लाने के लिये जूझ रहे हैं वह अपने प्रयास अब ऐसे उपलब्ध धन के सही उपयोग करने के लिये लगा दें। वैसे भी हमारे देश के सवौच्च न्यायालय ने विदेशों से काला धन लाने के लिये अपने संविधानिक प्रयास तेज कर दिये हैं इसलिये निज प्रयास अब महत्वहीन हो गये हैं। वैसे केरल के पद्मनाभ मंदिर का खजाना भी न्यायालीयन प्रयासों के कारण सामने आया है। यकीनन आगे यह देश के खजाने में जायेगा। उसके बाद न्यायालयीन प्रयासों की सीमा है। धन किस तरह कहां और कब खर्च हो यह तय करना अंततः देश के प्रबंधकों का है। ऐसे में उनकी कुशलता ही उसका सही उपयोग में सहयोग कर सकती है।
            यहीं आकर ऐसी समस्या शुरु होती है जिसे अर्थशास्त्र में भारत में कुशल प्रबंध का अभाव कहा जाता है। अगर आप देश की आर्थिक स्थिति की बात करें तो भूतकाल और वर्तमान काल में धन की बहुतायात के प्रमाण हैं। प्रकृति की कृपा से यहां दुनियां के अन्य स्थानों से जलस्तर बेहतर है इसलिये खेती तथा पशुपालन अधिक होता है। असली सोना तो वह है जो श्रमिक पैदा करता है यह अलग बात है कि उसके शोषक उसे धातु के सोने के बदलकर अपने पास रख लेते हैं। जब तक हिमालाय है तब तब गंगा और यमुना बहेगी और विंध्याचल है तो नर्मदा की कृपा भी रहेगी। मतलब भविष्य में भी यहां सोना उगना है पर हमारे देश के लोगों का प्रेम तो उस धातु के सोने से है जो यहां पैदा ही नहीं होता। मुख्य समस्या यह है कि हमारे देश में सामाजिक सामंजस्य कभी नहीं रहा दावे चाहे हम जितने भी करते रहें। जिसे कहीं धन, पद और बल मिला वह राज्य करना चाहता है। इससे भी वह संतुष्ट नहीं होता। मेरा राज्य है इसके प्रमाण के लिये शोषण और हिंसा करता है। राज्य का पद उपभोग के लिये माना जाता हैं जनहित करने के लिये नहीं। जनहित का काम तो भगवान के भरोसे है। किसी को एक रोटी की जगह दो देने की बजाय जिसके पास एक उसकी आधी भी छीनने का प्रयास किया जाता है यह सोचकर कि पेट भरना तो भगवान का काम है हमें तो अपना संसार निभाना है इसलिये किसी की रोटी छीने।
              भारतीय अध्यात्म में त्याग और दान की अत्यंत महिमा इसलिये ही बतायी गयी है कि धनिक, राजपदवान, तथा बाहबली आपने से कमजोर की रक्षा करें। भारतीय मनीषियों से पूर्वकाल में यह देखा होगा कि प्रकृति की कृपा के चलते यह देश संपन्न है पर यहां के लोग इसका महत्व न समझकर अपने अहंकार में डूबे हैं इसलिये उन्होंने समाज क सहज भाव से संचालन के सूत्र दिये। हुआ यह कि उनके इन्हीं सूत्रों को रटकर सुनाने वाले इसका व्यापार करते हैं। कहीं धर्म भाव तो कहीं कर्मकांड के नाम पर आम लोगों को भावनात्मक रूप से भ्रमित कर उसके पसीने से पैदा असली सोने को दलाल धातु के सोने में बदलकर अपनी तिजोरी भरने लगते हैं। वह अपने घर भरने में कुशल हैं पर प्रबंधन के नाम पर पैदल हैं। अलबत्ता समाज चलाने का प्रबंधन हथिया जरूर लेते हैं। जाति, भाषा, धर्म, व्यापार, समाज सेवा और जनस्वास्थ्य के लिये बने अनेक संगठन और समूह है पर प्रबंधन के नाम पर बस सभी लूटना जानते हैं। जिम्मेदारी की बात सभी करते हैं पर जिम्मेदार कहीं नहीं मिलतां
    हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि देश गरीब इसलिये नहीं है यहां धन नहीं है बल्कि उसका उपयेाग करना लोगों को नहीं आता। भ्रष्टाचार आदत नहीं शौक है। मजबूरी नहीं जिम्मेदारी है। जिसके पास राजपद है अगर वह उपरी कमाई न करे तो उसका सम्मान कहंीं नहीं रहता।
         स्विस बैंक हो या पद्मनाभ का मंदिर हमारे देश के खजाने की रकम बहुत बड़ी है। कुछ लोग तो कहते हैं कि ऐसे खजाने देश में अनेक जगह मिल सकते हैं। उनकी रकम इतनी होगी कि पूरे विश्व को पाल सकते हैं। यही कारण है कि विदेशों के अनेक राजा लुटेरे बनकर यहां आये। मुख्य सवाल यह है कि हमें पैसे का इस्तेमाल करना सीखना और सिखाना है। इसे हम प्रबंध योग भी कह सकते हैं। पतंजलि येाग में कहीं प्रबंध योग नहीं बताया जाता है पर अगर उसे कोई पढ़े और समझे तो वह अच्छा प्रबंध बन सकता है। मुख्य विषय संकल्प का है और वह यह कि पहले हम अपनी जिम्मेदारी निभाना सीखें। त्याग करना सीधें। संपत्ति संचय न करें। जब हम कोई आंदेालन और अभियान चलाते हैं तो स्पष्टतः यह बात हमारे मन में रहती है कि कोई दूसरा हमारा उद्देश्य पूरा करे। जबकि होना यह चाहिए कि हम आत्मनियंत्रित होकर काम करें।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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6/24/11

राजनीति शास्त्र के ज्ञान से परे आंदोलक पुरुषों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक-हिन्दी आलेख (agitation, politics and nowledge-hindi article)

           जिस तरह भारत के धार्मिक आंदोलनों, अभियानों तथा संगठनों की स्थिति रही है कि उनके शिखर पुरुष श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अल्प होने के बावजूद समाज का नेतृत्त करने लगते हैं। वही स्थिति सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों की भी है। वही अगर आप पिछले पचास साठ वर्षों से देश की स्थिति का अवलोकन करें तो पता चलेगा कि हमारे देश के अनेक संत माया मोह से परे रहने का उपदेश देते हुए अपने आश्रमों को महलनुमा तो अपने संगठन को लगभग कंपनी में बदल दिया है। दोनों हाथों  से माया बटोरी है। उन्होंने भारतीय अध्यात्म के ग्रंथों से अनेक पाठ रट लिये हैं उनको संस्कृत के श्लोक याद हैं। बड़े बड़े ग्रंथों का अध्ययन उन्होंने किया है। स्पष्टतः वह धर्म के वह व्यवसायी हैं जिनका अध्यात्मिक ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में अनेक महानायकों की कहानियां हैं उनका वह सरसपूर्ण ढंग से सुनाकर वाहवाही लूटते हैं पर तत्वज्ञान तथा ध्यान के प्रेरणा न देने का प्रयास करते हैं न ही ऐसा चाहते हैं क्योकि इससे उनके अनुयायी उनसे बड़े सिद्ध बन सकते है।। वह विफल रहते हैं। उनके ढेर सारे शिष्य अपने गुरुओं का बखान करते करते थकते नहीं है पर उनसे क्या सीख और कितना उस पर अमल कर रहे हैं यह कोई नहीं बता पाता। इनमें अनेक तो सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी बोलने का लोभ नहीं छोड़ पाते क्योंकि इससे प्रचार माध्यमों मे बने रहने का अवसर भी मिलता है।
        ऐसा लगता है कि भारतीय समाज पूर्वकाल में श्रमशील रहा होगा। अपने मानसिक तनाव की मुक्ति के लिये वह सांसरिक विषयों से इतर गतिविधियों में संलग्न रहने के लिये बौद्धिक विशेषज्ञों की शरण लेता होगा। ऐसे में मनोरंजन से उकताने के बाद उसे अध्यात्मिक विषय अत्यंत रुचिकर लगे होंगे क्योंकि न वह केवल मनोंरजन बल्कि ज्ञानबर्द्धक होने के साथ ही लंबे समय तक आत्मिक शांति के लिये उनका ज्ञान अत्यंत उपयेागी है। इसी कारण ही हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान सर्वाधिक संपन्न बन गया क्योकि तपस्वियों, ऋषियों तथा ज्ञानियों ने जहां अनेक खोजें की तो समाज ने उनको स्वीकार भी किया। समाज अध्यात्मिक का मुरीद बना तो अल्पज्ञानियों के लिये यह व्यवसाय चुनने का एक महत्वपूर्ण साधन भी बना। प्राचीन तपस्पियों, ऋषियों और मुनियों ने जहां अपने सत्य ज्ञान से प्रसिद्धि प्राप्त करने के साथ ही अपना शिष्य समाज बनाकर अध्यात्मिक ग्रंथेां में देवत्व का दर्जा हासिल किया तो वहां समाज भी उनका गुणगायक बन गया।
           सर्वशक्तिमान का बनाया यह संसार अत्यंत अद्भुत है। इसमें सारी भौतिकता उसके संकल्प के आधार पर ही स्थित है पर वह सर्वशक्तिमान किसी को दिखता नहीं है। यह संसार अपने रूप बदलता है। बनता है और नष्ट होता है। विकास और विनाश के इस चक्र को कोई समझ नहंी पाया। संसार नश्वर है पर चमकदार है इसलिये कुछ लोग यहां अपनी देह, नाम तथा व्यवसाय की चमक बनाये रखने के लिये समाज से परे होकर उसका शीर्ष बनना चाहते हैं। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के ग्रंथों की विषय सामग्री सरस तथा मनोरंजक होने के साथ ही ज्ञानवर्द्धक होन के पेशेवर धार्मिक लोगों के लिये बहुत सहायक होती है। जिसे ज्ञान चुनना है वह ज्ञान चुने जिसे मनोरंजन करना है वह मनोरंजन करे।
        इनमें कुछ लोग लोग तो समाज पर आर्थिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक शासन करना चाहते हैं और तब पैसे, पद और प्रतिष्ठा का उनका मोह अनंत हो जाता है। इसकी भूख शांत नहीं होती। जिस तरह सामान्य आदमी की भूख रोटी से मिट जाती है विशिष्टता की छवि रखने वाले आदमी की भूख उससे नहीं मिटती बल्कि पैसा, प्रतिष्ठा और पद का मोह उसे हमेशा पागल बनाये रहता है। इसमें भी कुछ आदमी ऐसे होते हैं जो समाज को पागल बनाये रखते हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य समाज से परे बने अपने शिखर की रक्षा करना होता है। इसलिये वह दूसरे के सृजन को अपने नाम करना चाहते हैं। यहीं से शुरु होता है उनका अभियान जो अंततः निष्काम बौद्धिक लोगों लिये के अनुसंधान का विषय बन जाता है।
धार्मिक आंदोलनों की तरह सामाजिक और राजनीतिक विषयों के अनेक आंदोलन ऐसे हैं जिनको उनके शीर्ष पुरुष कथित रूप से जनप्रिय बताकर भ्रमित करते हैं। आज के बाज़ार और प्रचार से प्रायोजित अनेक ऐसे आंदोलन हैं जो प्रचारित हैं पर उनसे जनहित कितना हुआ या होगा यह अभी भी विचार का विषय है। हम यहां राजनीतिज्ञों के आंदोलनों की बात न कर उन लोगों के राजनीिितक आंदोलनों की बात करेंगे जिनको गैर राजनीतिक लोग प्रारंभ करते है। वह एक तरफ कहते हैं कि उनका आंदोलन गैर राजनीतिक है पर उसकी कोई दूसरी संज्ञा नहीं बताते-जैसे कि सामाजिक आंदोलन, नैतिक आंदोलन या शैक्षणिक आंदोलन। मजे की बात यह है कि उनकी मांगे सरकार से होती हैं जिनका नेतृत्व राजनीतिक लोग करते हैं। ऐसे में आंदोलनों के शीर्ष पुरुषों के बौद्धिक चिंत्तन पर ध्यान जाना जरूरी है। वह कहें या न कहें उनके आंदोलनों में कहीं न कहीं राजनीतिक तत्व रहता है-चाहे उनकी मांगों में हो या उनके पूरे होने में। दूसरी बात यह कि समाज में सर्वजन हित के लिये केाई भी कार्य राजनीतिक परिधि में आता है। मनुष्य नाम की ईकाई का समाज के रूप में परिवर्तन इसलिये ही होता है कि कम से कम वह अन्य जीवों की तरह हिंसक या अनुशासनहीनता का बर्ताव न करे। अगर कोई व्यक्ति अध्यात्मिक विषयों  में महारती है तो वह समाज के भले के लिये न काम कर मनुष्य के हित के लिये काम करता है। वह स्वयं पर अनुसंधान करता है फिर उसकी जानकारी दूसरे को देकर अपने मनुष्य के दायित्व का निर्वाह करता हे। वह मनुष्य को समाज मानकर नहीं बल्कि इकाई दर इकाई संपर्क बनाता है। जहां समाज मानकर मनुष्य को ईकाई दर इकाई मानकर काम किया जाता है वहां राजनीतिक क्षमतायें होना आवश्यक है।
हम कौटिल्य का अर्थशास्त्र या मनु स्मृति को देखें तो वहां मनुष्य को इकाई मानकर संबोधित किया गया है न कि समाज मानकर। उसमें मनुष्य निर्माण के लिये संदेश दिये गये हैं। यह मानकर कि अगर मनुष्य के व्यक्त्तिव का निर्माण होगा तो समाज स्वयं ही अपनी राह चलेगा। कहीं न कहीं यह स्वीकार किया गया है कि समूचा मनुष्य समुदाय एक जैसा नहीं हो सकता। इसलिये उसमें जितने बेहतर लोग होंगे  उतना ही वह चमकदार भी होगा । इसके विपरीत भारतीय आंदोलक पुरुष समाज को संबोधित करते हुए अपनी बात करते हैं। वह यह नहीं बताते कि मनुष्य क्या करे? वह कहते हैं कि समाज यह करे तो सरकार वह करे। यह हवा में तीर चलाने जैसा है। वह समाज में व्यक्ति निर्माण के लिये अपनी भूमिका निभाने से कतराते हैं। भले ही वह सामाजिक नेता होने का दावा करें पर अपनी भूमिका को राजपुरुष की तरह देखना चाहते हैं। यह उनके राजनीतिक अल्पज्ञान का प्रमाण है। अध्यात्मिक पुरुष की छवि सौम्य और शांत होती है। उसकी सक्रियता में आकर्षण नहीं होता जबकि राजपुरुष की छवि में आक्रामकता, सुंदरता तथा प्रभावी छवि है और इसलिये हर कोई उसी तरह दिखना चाहता है।
        हम यहां कुछ आंदोलनों की चर्चा करना चाहेंगे जो जनमानस के लिये महत्वपूर्ण रहे हैं। सबसे पहले सामाजिक कार्यकर्ता श्री अन्ना हजारे और विश्व प्रसिद्ध  योग  शिक्षक बाबा रामदेव के आंदोलन की बात करना अच्छा रहेगा। मूलतः दोनों  ही राजनीतिक क्षेत्र के नहीं है। दोनों ही अपनी छवि महात्मा गांधी की तरह बनाना चाहते हैं। दोनों ही यह कहते हैं कि वह कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं करेंगे और न ही चुनाव लड़ेंगे। गैर राजनीतिक दिखने वाले उनके आंदोलनों के विषय बिना राजनीतिक दावपैंचों के सिद्ध नहीं हो सकते यह उनको कोई न समझा पा रहा है। वजह दोनेां ही राजनीति के पश्चिमी सिद्धांतों का अनुकरण कर रहे हैं जिसमें आंदोलन एक विषय और सरकार चलाना दूसरा विषय माना जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि राजधर्म का मतलब वह क्या समझते हैं जो दूसरों को बता रहे हैं। चलिये वह जानते भी होंगे फिर कोई बड़ा पद लेने की बात से इंकार क्यों करते हैं? क्या सरकारी पद केवल उपभोग के लिये होता है। विश्व भर की लोकतंत्रिक सरकारों में बैठे उच्च पदासीन लोग क्या राजसुख भोगने आते हैंे। क्या पद लेना केवल प्रतिष्ठा का प्रतीक है और दायित्व निभाकर दूसरों के सामने प्रस्तुत करने का कोई सिद्धांत वहां नहीं है।
       हैरानी की बात है कि भारतीय जनमानस उनके पद ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की वैसे ही प्रशंसा करता है जैसे भीष्म पितामह की। यह सभी लोग क्या भीष्मपितामह बनना चाहते है पर याद रखना चाहिए कि उन्होंने इस प्रंतिज्ञा को निभाया तो उसकी वजह से अंततः महाभारत युद्ध हुआ। अगर वह स्वयं राजा के पद पर बैठते तो न पांडु राजा बनते और न ही धृतराष्ट के पुत्र पांडवों के साथ युद्ध करते। भीष्म पितामह अपने राज्य की रक्षा करने के वचन से बंधे रहे पर अंततः उनको युद्ध में प्राण गंवाने पड़े। इस एक घटना को भारतीय इतिहास मंें हमेशा मिसाल नहीं माना जाता क्योंकि राजकाज का जिम्मा निभाने में तो हमारे आदर्श भगवान श्रीराम माने जाते हैं। राज्य का त्याग उन्होंने किया पर वापस लौटकर फिर वापस सिंहासन पर विराजे और प्रजा हित के लिये काम किया।
        श्री अन्ना हजारे ने कहा था कि वह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे हैं तब यह विचार सभी लोगों के मन में आया होगा कि महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम भारत को पूर्णता नहीं दिला सका शायद तभी वह ऐसी बात कही हैं। बात निकली है तो श्री महात्मा गांधी जैसे पुण्यात्मा के विचार पर प्रतिविचार आयेगा और हम उसे व्यक्त करने से पीछे नहीं हटेंगे। महात्मा गांधी ने अंग्र्रेजों से आजादी दिलाने का बीड़ा उठाया यह स्वीकार्य है पर उसके बाद राज्य कौन संभालेगा इसकी जिम्मेदारी कौन तय करने वाला था? महात्मा गांधी ने क्या ऐसी गांरटी ली थी कि अंग्रेजों के बाद राज्य चलाने वाले अपने काम में दक्ष होंगे! भारत एक विशाल देश था और उसे दो टुकड़ों में बांटा गया। इसके बावजूद आज का भारत बहुत विशाल था? उसका राजकाज कैसे चलेगा और कौन चलायेगा इसकी भूमिका क्या महात्मा गांधी ने तय की थी? उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान सुखद भारत की कल्पना व्यक्त की पर उसमें अपनी सक्रिय भूमिका निभाना क्या सत्ता का सुख भोगना समझा? यह पलायन माना जाये कि त्याग?
         वह परिवार, समाज, और राष्ट चलाने के सिद्धांतों पर खूब बोले होंगे पर आजादी के बाद के भारत में उन्होंने सक्रिय भागीदारी न देकर क्या जनता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया था? सरकार और राजकाज कोई स्वचालित मशीन नहीं है जिसके साथ खिलवाड़ किया जाये। उसके लिये कुशल लोग होना चाहिऐं। मूल बात यह है कि महात्मा गाीधी अंग्रेजों के हाथ से राजकाज लेकर जिन स्वदेशी लोगों को दे रहे थे उनके ज्ञान पर उनको केवल विश्वास था या उन्होंने उसे प्रमाणिक रूप देखाय भी था? आज अन्ना कहते हैं कि हम काले अंग्रेजों के राज्य को झेल रहे हैं तो सीधे महात्मा गांधी के आंदोलन का विचार आता है। जब उनको कोई राज्य का पद लेना नहंी था तो फिर वह स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के नेता क्यों बने? क्या वह मानते थे कि अं्रग्रेजों ने जिस व्यवस्था को बनाया है उसमें सरकार तो स्वतः चलेगी और उच्च पद तो केवल भोगने के लिये हैं उनमें कोई जिम्मेदारी नहीं होगी?
          हम तो यह मानते हैं सरकार या राजकाज चलाना अंततः राजनीति ज्ञान के बिना संभव नहीं है। आप अगर उसमें कोई पद लेना नहीं चाहते तो इसका मतलब यह है कि आप में कुशलता की कमी है। उसके बाद आप राज्य में परिवर्तन के लिये कोई आंदोलन  चलाना चाहते हैं और पद भी लेना नहीं चाहते तो इसके तीन मतलब यह हैं। एक तो यह कि अप्रत्यक्ष रूप से राजकाज आपका ही रहेगा पर उसमें कमीपेशी होने पर अपनी जिम्मेदारी से भाग सकते हैं। दूसरा यह कि आपका मानना है कि राज्य तो भगवान भरोसे चलता है हम जिसे बिठायेंगे वह सुख भोगने के साथ हमें भी पूजता रहेगा। तीसरी स्थिति यह है कि आपमें आत्मविश्वास नहीं है कि आप सरकार या राज चला पायेंगे।
          ऐसे में कुछ निष्कर्ष भी निकल सकते हैं जो त्यागी आंदोलक पुरुषों और उनके समर्थकों को शायद अच्छे न लगें। एक तो यह कि गैरराजनतिक लोगों दो कारणों से ही राज्य पद त्यागते हैं। एक तो वह बहुत चालाक हैं क्योंकि इससे बिना जिम्मेदारी के वह राजसुख या सम्मान पाते हैंे या उनके पास राजनीतिक शास्त्र के ज्ञान का अभाव है। पहली स्थिति में तो उनको आंदोलक पुरुष होने का हक है क्योंकि राजनीतिक सिद्धांत इस कुटिलता की अनुमति देते हैं कि अगर कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी न लेकर अप्रत्यक्ष रूप से राजहित करता है तो कोई बात नहीं है पर दूसरी स्थिति में उनको इसका अधिकार नहीं है कि वह कथित रूप से एक अकुशल प्रशासक को हटाकर दूसरा स्थापित करें। अगर उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है और न ढूंढने की क्षमता से भी परे हैं तो उनके कथित गैरराजनीतिक आंदोलन संशय के घेरे में आयेंगै। इससे अच्छा है तो वह आंदोलन ही न चलायें और अगर चलायें तो समय आने पर राज्य चलाने के लिये व्यवस्था से जुड़कर उनको आदर्श स्थापित करें।
           अर्थशास्त्र में हमने भारतीय अर्थव्यवस्था के समस्याओं के बारे में पढ़ा है कि अकुशल प्रबंध का यहंा अभाव है। मतलब यह कि हमें कुशल प्रबंधक चाहिये जो व्यवस्था चला सकें। जो आदर्श की बात करें तो उसे व्यवस्था में आकर काम करते हुए साबित करे। अगर हम भ्रष्टाचार की बात करें तो वह अकुशल प्रबंध का एक हिस्सा होने के साथ ही परिणाम है। हम परिणाम बदलना चाहते हैं यानि भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं पर कुशल प्रबंध के बिना यह संभव नहीं है। बीमारी हटाने के लिये दवा चाहिये न कि हम नारे लगाते रहें कि बीमारी भाग जाओ नहीं तो हम आते हैं। मैं पद नहीं लूंगा मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा मेरा किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं रहेगा जैसी बातें कहते हुए राजनीतिक आंदोलक पुरुष वैसे ही हैं जैसे कोई डाक्टर तमाम तरह के शारीरिक परीक्षण कराकर मरीज को बीमारी का नाम बताकर पर दवा देने की बात आने पर कहीं दूसरे डाक्टर के पास भेज देता है। हम ऐसे आंदोलक पुरुषों की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाते क्योंकि वह प्रमाणिक है पर राजनीति शास्त्र के ज्ञान का अभाव उनमें साफ दिखाई देता है। इसलिये वह राजनीतिक खेल में ऐसे दर्शक की भूमिका निभाना चाहते हैं जो खिलाड़ी को सलाह देता रहे और जीतने पर अपनी वाह वाही स्वयं करे और हार हो तो दोष खिलाड़ी को दे। ऐसा आम तौर से हम गांवों में चौपालों और शहरों में बाजा़ारों में शतरंज और ताश खेलने वाली महफिलों में देखते हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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6/15/11

खग्रास चंद्रग्रहण एक सामान्य प्राकृतिक घटना है-हिन्दी महालेख (khagras chandragrahan-hindi mahalekh

    दुनियां में सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण आते रहते हैं। बरसों से हम देख रहे हैं पर इतनी चर्चा कभी नहीं होती थी। बचपन में बुजुर्गों के पहले ही पता चल जाता था कि अमुक तारीख को सूर्य ग्रहण या चंद्रग्रहण है। उस दिन कुछ सावधानी बरतने की बात कही जाती पर वह आज के टीवी चैनलों की तरह महाबहस का विषय नहीं होती थी। सच कहें तो सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण को सामान्य घटना ही माना जाता था। कहीं आतंक या डर का माहौल नहीं देखा। आजकल   टीवी चैनलों ने दोनों ग्रहणों का बाज़ारीकरण कर दिया है।
         कह रहे हैं कि डरो नहीं, खूब देखो। कुछ परेशानी नहीं है। इन चैनलों पर बहस के लिये आने वाले वही लोग होते हैं जो पहले भी आते रहे हैं। खगोलशास्त्र से जुड़ी इन घटनाओं पर चर्चा करने के लिये ज्योतिषी बुलाये जाते हैं। फिर उनका मुकाबला करने के लिये कुछ आधुनिक विज्ञान समर्थक भी होते हैं। प्रचार इस तरह किया जाता है कि जैसे हिन्दू समाज में ही अंधविश्वास हो और पश्चिमी विज्ञान एकदम प्रमाणिक है। यह सब देखकर हम तो यह सोचते हैं कि भारतीय हिन्दू समाज इतना अविकसित ओर पिछड़ा नहीं है जितना आधुनिक ज्ञानी समझते हैं। देखा जाये तो हमारी श्रीमद्भागवत गीता के प्रचलन में आने के बाद भारतीय समाज शायद दुनियां का इकलौता समाज है जो समय के साथ आगे बढ़ता जाता है। यह अलग बात है कि प्रगतिशील और जनवाद से जुड़े विद्वानों का सभी जगह बाहुल्य है जिनकी यह मनोवृत्ति है कि संपूर्ण भारतीय अध्यात्म दर्शन को अवैज्ञानिक तथा समाज को जड़ साबित कर अपनी चेतना की व्यवसायिक धारा प्रवाहित की जाये। फिर उनके साथ बहस करने वाले भारतीय अध्यात्म के ज्ञानी भी कुछ इस तरह पेश आते हैं जैसे कि अंधविश्वास का समर्थन कर रहे हों। पेशेवर ज्योतिषी अपने प्रचार क्रे लिये आते हैं तो उनका मुकाबला करने पेशेवर बहसकर्ता आते हैं। चर्चा कराने वाले उद्घोषक का तो कहना भी क्या? निरपेक्ष दिखने की कोशिश इस तरह करते हैं जैसे कि लग रहा हो कि किसी विषय पर सहमति या असहमति न देना ही उनकी योग्यता का प्रमाण हो।
       भारत के हिन्दी टीवी चैनलों में कार्यरत उद्घोषकों का यह भाग्य है कि भारतीय अध्यात्म की व्यापकता ही उनको इस तरह के कार्यक्रम प्रदान करती है। जिसमें ढेर सारे ग्रंथ हैं और उसमें जीवन के हर पक्ष के साथ -जिसमें मनुष्य तथा अन्य जीव भी शािमल हैं-प्रकृति के रहस्यों पर भी प्रकाश डाला गया है। जबकि अन्य दर्शनों में अन्य जीवों की उपेक्षा कर केवल मानव जीवन पर ही अधिक लिखा और बोला जाता हैं। कुछ बातें मनुष्य समाज के संचालन से संबंधित होती हैं।
        प्रकृति के रहस्यों पर पश्चिम तो अब दृष्टिपात कर रहा है जबकि भारतीय अध्यात्म दर्शन में बहुत पहले ही इस पर लिखा गया है। हमने पंचांगों में सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण की तारीखें देखी हैं जो कि यकीनन पश्चिमी विज्ञान से नहीं ली गयीं। पहले लोग अखबार पढ़े बिना बताते थे कि अमुक दिन चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण है।
बहरहाल भारत के टीवी चैनल अपने व्यवसायिक उद्देश्यों की पूर्ति अपने अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर कर लेते हैं यह अलग बात है कि अपने चश्में से समाज को अधंविश्वासी समझने वाले उद्घोषक अपने को भले ही चालाक समझें पर हम सब जानते हैं कि उनकी अदायें ऐसी न हों तो शायद उनका काम भी न चले।
       पिछली बार के पूर्ण सूर्यग्रहण की याद आती है जब कहा गया है कि उसे देखना ठीक नहीं है और देखना है तो विशेष प्रकार के चश्में से देखें। सामान्य रंगीन चश्में से काम नहीं चलेगा। हम आज भी सामान्य काले चश्में से दोपहर मेें तपते हुए सूर्य को आसानी से देख पाते हैं। तब यह सवाल आता है कि ग्रहण के समय जब सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है तो वह सामान्य से अधिक खतरनाक कैसे हो सकता है। उस समय खूब सूर्यगं्रहण देखने वालेचश्में बिके थे उसमें कुछ तो नकली भी बताये गये थे। तय बात है कि बाज़ार ने ही ऐसा प्रचार करवाया होगा ताकि वह अपने उत्पाद बेच सके। वैसे तो इष्ट दिवस, मित्र दिवस, पितृदिवस, मातृदिवस तथा प्रेम दिवस जैसे पश्चिमी दिवसों को भारतीय प्रचार माध्यम अपने प्रायोजक बाज़ार के लिये विज्ञापन प्रसारित कर उसके लिये ग्राहक जुटाते हैं। वैसे ही भारतीय त्यौहारों के साथ सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण भी उनके लिये विज्ञापन प्रसारण के बीच में कार्यक्रम की सामग्री बन जाते हैं।
      वैसे चर्चाओं में शामिल लोग भारतीय समाज को फालतु समझते हैं पर लोगों को लगते स्वयं फालतू हैं-हम नहंी मानते क्योंकि पता है कि यह सब कमाई करने और प्रचार पाने के लिये बहस करने आते हैं।
हम यह खग्रास चंद्रग्रहण देख पायेंगे कि पता नहीं। यह लेख लिखने के तत्काल बाद ही सोने का प्रयास करेंगे। अगर बीच में नींद टूटी तो छत पर देखने जायेंगे कि कैसा है खग्रास चंद्रग्रहण। जहां हानि लाभ, दुःख सुख, और जीवन मरण का सवाल है तो वह इस संसार का हिस्सा हैं। जब तक देह हैं तो विकार आयेंगें। भूख लगेगी, प्यास लगेगी। कभी जीभ किसी नये स्वाद के लिये चीत्कार करेगी। जिस तरह सत्य अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। सत्य सूक्ष्म है और उसे ध्यान आदि के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है तो माया इतनी व्यापक है कि उसके चक्र में फंसे तो सभी हैं पर समझ नहीं पाते। खेलती माया है और आदमी सोचता है कि मैं खेल रहा हूं।
      जहां तक चर्चाओं का सवाल है तो भारतीय अध्यात्म इतना विशाल है कि जिस विषय पर चाहो बहस कर लो। जहां चार बुजुर्ग मिलते हैं किसी न किसी धर्मग्रंथ पर बहस करने लगते हैं। सभी अपना ज्ञान सुनाते हैं पर सुनता कौन है पता नहीं। सभी बोलते हैं। यही हाल टीवी चैनलों का है पर वहां के उद्घोषक तमाम तरह के तामझाम और आकर्षण मे घिरे होते हैं इसलिये उनको विद्वान माना जाता है। यह अलग बात है कि उनकी महाबहस-यह शब्द आज तक हमारे समझ में नहीं आया-अध्यात्मिक में वास्तविक रुचि रखने वालों के लिये हास्य का विषय होती है।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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3/10/11

मनोरंजन की भूख का परिणाम हैं सट्टा-हिन्दी लेख (result of more entertainemnt-hindi article

संगीत पर आधारित एक टीवी कार्यक्रम अब सट्टेबाजी में संलिप्त होने के आरोप का शिकार हो गया है। इस संगीत कार्यक्रम में अनेक प्रतियोगी शामिल हुए जो फिल्मी गीतों पर नृत्य प्रस्तुत करते थे। इसके निर्णायकों में मुंबईया फिल्मों की एक पूर्व प्रसिद्ध अभिनेत्री और एक गायक भी शामिल थे। इस प्रतियोगिता के निर्णायकों की योग्यता पर सवाल उठाने के साथ ही यह बात भी सामने आयी है कि उन पर किसी निर्णय का उत्तरदायित्व न डालकर एसएमएस करने वालों पर डाल दिया गया है। बताया गया है कि इसमें शामिल दो प्रतियोगियों में एक पर 1.25 रु. तथा दूसरे पर 2.00 रु. था। अंततः जिस पर सट्टेबाजों को लाभ अधिक होना था उस कम दर वाले प्रतियोगी को जितवा दिया गया। कहा गया कि यह जनता का फैसला है। ऐसा ही आरोप बॉस नाम के एक कार्यक्रम पर भल लगाया गया।
दरअसल टीवी चैनलों ने समाचार देकर वाहवाही तो लूटी है पर जिस तरह निर्णायकों को इस निर्णय में एक एकदम निष्क्रिय बताया है क्योंकि उनकी चर्चा बिल्कुल नहीं की। यह प्रयास शक पैदा करता है अंततः प्रचार माध्यम अपने ही प्रायोजकों के नायकों और नायिकाओं को बचाते हैं। वह कहते हैं कि सटोरियों ने फर्जी एसएमएस कर कम दर वाले प्रतियोगी को जितवाया। तब सवाल यह है कि निर्णायक क्या कर रहे थे? इसमें कुछ सवाल हैं।
1. जब पहले निर्णय होतें थे तब निर्णायक मंडली के गायक और अभिनेत्री प्रत्यक्ष जिम्मेदारी लेते हुए अपना फैसला देते थे। अंतिम कार्यक्रम में क्या उनको निष्क्रिय रहने के लिये कहा गया था? इसका मतलब सट्टेबाज जानते होंगे कि भविष्य में यह मामला खुलेगा या वह स्वयं ही उनकी कृपा के आकांक्षी चैनलों को सनसनी फैलाने के लिये समाचार देंगे। ऐसे में स्वच्छ छवि वाले गायक और अभिनेत्री को विवाद से बचाया जाये क्योंकि वह आगे भी काम आयेंगे।
2.यह सट्टेबाजी की खबर लीक कैसे हुई? क्या आम लोगों को यह संदेश भेजा जा रहा है कि अब वह क्रिकेट से उकता गये हों तो ऐसे कार्यक्रमों में भी अपना पैसा खर्च कर दिल बहलायें।
अब यह बताने की जरूरत नहीं है कि धनपति, माफिया तथा प्रचार के शिखर समूहों का कहीं न कहीं आपस गंठबंधन है। पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों पर आरोप लगाने वाली वहां की एक बदनाम अभिनेत्री अगर किसी भारतीय चैनल के कार्यक्रम में क्रिकेट के काले पिताओं की नाराजगी लेकर आती है तब यह बात गले नहीं उतरती। भारतीय मनोरंजन के क्षेत्र में क्रिकेट पर पर्दे से नियंत्रण करने वाली ताकते उसी तरह सक्रिय हैं जैसे प्रचार क्षेत्र में। ऐसे में एक क्षेत्र में नाराजगी लेकर दूसरे क्षेत्र में कोई प्रवेश नहीं कर सकता
एक बात दूसरी भी लग रही है कि क्रिकेट में सट्टा या तो कम लग रहा है या तमाम दबावों के कारण पर्दे के पीछे बैठे काले पिता उस तरह नहीं लगा पा रहे जैसा वह चाहते हैं। या फिर उनको लगता है कि संगीत और हास्य कार्यक्रमों में भी वह अपना हाथ आजमा लें। क्रिकेट अब बदनाम हो चुका है इसलिये संभव है कि आगे भारत का मूर्ख वर्ग करोड़ों के चक्कर में अपने लाखों बरबाद न करे इसलिये संगीत और हास्य प्रतियोगिताओं में भी अपना दखल प्रारंभ कर दें। एक हास्य कार्यक्रम में जिस तरह बाज़ार और प्रचार के तयशुदा एक नायक, एक गायिका और एक नायिका को लाया गया है उसके बाद अनेक संदेह लोगों के मन में उठ ही रहे हैं क्योंकि इन तीनो की पहचान हास्य कलाकार के रूप में नहीं है यह अलग बात है कि उनके खड़े हुए विवाद हास्य का ही बोध कराते रहे हैं।
इससे एक बात सामने आती है कि हम भारतीयों की सबसे बड़ी कमजोरी मनोरंजन है। मनोरंजन में भी अपने धन की भूख शांत करने से मनोरंजन दुगना हो जाता है। यह अलग बात है कि कालांतर में यह बर्बादी का कारण बनता है। अक्सर भारतीयों पर अधिक खाने का आरोप लगता है। कहते हैं कि भारतीय खाने के लोभी हैं। इस पर विवाद होता है। यह सच हो या न हो इतना तय है कि हमारे समाज का एक तबका मनोरंजन का भी लोभी है। यही कारण है कि जहां भारतीय समाज के लिये मनोरंजन है वहीं सट्टा प्रारंभ हो जाता है। 1983 में भारत-जिस हम तो अब केवल बीसीसीआई नामक क्लब की टीम मानते हैं- ने एक दिवसीय विश्व क्रिकेट प्रतियोगिता जीता। उसके बाद देश हर वर्ग, जाति, वर्ण, भाषा तथा आयुवर्ग का आदमी इससे मनोरंजन करने के लिये जुड़ा। उसके बाद बीसीसीाआई की टीम कहें या भारत बुरी तरह से हारता रहा फिर भी लोगों ने इससे आशा नहीं छोड़ी। 2007 में बीसीसीआई की टीम विश्व क्रिकेट प्रतियोगिता में बुरी तरह हारी तो देश के लोगों के मन टूट गये। उस समय यह हालत हो गयी थी कि कंपनियों ने अपने क्रिकेट खिलाड़ियों के अभिनीत विज्ञापन देना ही बंद कद दिया। मगर फिर 2008 में बीस ओवरीय प्रतियोगिता में बीसीसीआई की टीम को जितवा कर भारतीय परचम फहराया गया। लोग फिर लौटे। अब तो कहते हैं कि क्रिकेट में हर बॉल पर सट्टा लगता है। यह सब बातें यही टीवी चैनल वाले कहते हैं जो बाज़ार और प्रचार समूहों के शिखर पुरुषों के नियंत्रण में है। यह अलग बात है कि वह आधी बताते हैं इसलिये कि सनसनी फैलानी हैं। आधी छिपाते हैं कि असली नायक बचे रहें।
बहरहाल मनोरंजन क्षेत्र में अच्छे कार्यक्रम तभी तक आते हैं जब तक उनका लक्ष्य मनोरंजन करना होता है। जब उसमें लोगों की भावनाओं का अपवित्र भावनाओं का दोहन करने का भाव हो जाता है। दूसरी बात यह भी कि देश के विकास की बातें अब मजाक बनकर रह गयी है। सट्टेबाजी का बढ़ता प्रकोप इस बात का प्रमाण है कि देश का पैसा उन लोगों के पास अधिक जा रहा है जिनके पास उसे हजम करने की शक्ति नहीं है। उनके मनोरंजन की भूख इतनी आसानी से शांत   नहीं हो सकती जब तक उनका पैसा बर्बाद न हो जाये।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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11/10/10

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनमानस (भाग-1)-हिन्दी लेख (rashtriy swyan sewak sangh aur janmanas part one-hindi article)

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने 10 नवंबर को अपने ही कुछ मुद्दों को लेकर देश भर में प्रदर्शन किया जो शायद इस किस्म का पहला आयोजन था । हम यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इस प्रदर्शन के मुद्दों पर चर्चा नहीं कर रहे क्योंकि वह तात्कालिक विषयों के साथ ही राजनीतिक रूप से महत्व के हैं। न ही हम यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का समर्थन या विरोध कर रहे हैं। चूंकि उसके सदस्य अपने  संगठन को सामाजिक संगठन मानते हैं इसलिये हम इस संगठन का भारतीय जनमानस में जो छबि उस पर विचार कर रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की छबि एक ऐसे सामाजिक संगठन की रही है जो राजनीति को समाज का ही एक हिस्सा मानकर उसमें भी दखल रखता है पर दिखना नहीं चाहता। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि यह संगठन कभी प्रत्यक्ष किसी सामाजिक या राजनीतिक गतिविधि में सक्रिय रहने के लिये प्रसिद्ध नहीं है। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों में वह अपने सक्रिय स्वयं सेवकं तथा अनुवर्ती  संगठन बनाकर काम करता है जो कि नीति निर्धारण तथा कार्यशैली में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उच्च नेत्त्व के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हैं-सच क्या है पता नहीं पर प्रचार माध्यमों में ऐसा ही दिखता है। इसे हम यूं भी कहें कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मूल में बौद्धकता का प्रभाव है जिसमें सार्वजनिक सक्रियता या एक्शन न के बराबर दृष्टिगोचर होती है बस! उसकी उपस्थिति का आभास किया जाता है। अगर कोई सक्रियता दिखाई देती है तो वह बौद्धिक शिविर या महत्वपूर्ण पर्वों पर पथ संचालन तक ही सीमित है। लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक अदृश्य बौद्धिक संस्था के रूप में सक्रिय है पर समय की मांग है कि सक्रिय भूमिका या एक्शन के माध्यम से भी जनमानस को प्रभावित कर अपना संगठन आगे बढ़ाया जाये-ऐसा विचार उसके कुछ बुद्धिमान लोगों ने किया है। 10 नवंबर को उसके स्वयं सेवक जिस प्रदर्शन में भाग लिया  वह एक तरह का नया व्यवहार है पर इसके प्रभाव दूरगामी होंगे यह तय है और क्योंकि माना जाता है संघ के कर्ताधर्ता कोई भी कार्य या योजना भविष्य के दीर्घकालीन  परिणामों को दृष्टिगत रखते हुए ही प्रारंभ करता है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने अनुवर्ती  संगठनों के माध्यम से कार्य करने में इतना कुशल है कि अगर उसके आलोचक विरोध न करें तो शायद भारतीय जनमानस और युवा वर्ग में उसका वह स्थान न रहे जो कि नैपथ्य की बौद्धिकता से अधिक सार्वजनिक सक्रियता या एक्शन से प्रभावित होता है। राष्ट्रीय स्वयं संघ को इसका लाभ यह मिलता है कि किसी अभियान या आंदोलन में सक्रियता से अगर सब ठीक है तो उसे श्रेय मिलता है पर अगर कुछ नाकामी है तो वह अपने  अनुवर्ती  सगंठनों के पदाधिकारियों को जवाबदेही के लिये आगे कर देता है। इससे संघ को यह लाभ तो हुआ कि उसकी छबि हमेशा धवल रही पर इसका नुक्सान यह हुआ कि प्रचार के इस युग में सक्रियता या एक्शन न होने की वजह से वह नयी पीढ़ी की दृष्टि से ओझल होता जा रहा है। यह तो उसके आलोचक गाहेबगाहे उसका विरोध कर उसका नाम जनमानस में बनाये हुए हैं वरना अपने स्वयं सेवकों के सहारे उसका प्रचार नगण्य है हालांकि वह समाज में चेतना लाने का काम करते हैं।
संघ के कर्णधार अपनी गिरती सदस्य संख्या से चिंतित हैं और उसे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। यह स्थिति तब है जब आज भी भारतीय जनमानस और पुराने प्रबुद्ध वर्ग में उसकी छबि धवल और बौद्धिकता से संपन्न मानी जाती है। आज भी पुरानी पीढ़ी के अनेक प्रबुद्ध लोग हैं जो संघ  का नाम सम्मान से लेते हैं। तब ऐसा क्या हो गया कि संघ अपनी घटती साख तथा सदस्य संख्या जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।
यह कहना तो ठीक नहीं है कि संघ के बुद्धिमान लोग उन सच्चाईयों से अवगत नहीं है जिनसे यह समस्यायें पैदा हुई हैं पर प्रचार से दूर रहने वाले इस संगठन के मंचों से ऐसा होने का प्रमाण नहीं मिलता। समूचे भारत में आधुनिक समाज का सपना देखने वाले संघ के बुद्धिमान नियंत्रणकर्ता यह तय नहीं कर पा रहे कि संघ को अनुवर्ती  संगठनों के माध्यम से आगे बढ़ायें या स्वयं यह काम करें। जब वह आज अपनी शाखाओं में युवा सदस्यों की कम संख्या देखते हैं तो निराशा उनको होती होगी पर यह भूल जाते हैं कि उसके अनुवर्ती  संगठन ही उसके प्रतिद्वंद्वी हैं क्योंकि वह नेपथ्य में नहीं वरन् लोगों की आंखों के सामने सक्रिय या एक्शन करते नज़र आते हैं। धर्म, शिक्षा, राजनीति, श्रम संगठन तथा साहित्य संस्थाओं में सक्रिय संघ के नाम लेकर ही चल रहे हैं जिसकी धवल छबि से उनको समाज  सहानुभूति के साथ युवा वर्ग के  सदस्य  मिल भी जाते हैं। संघ ने जो 10 नवंबर को प्रदर्शन किया उसमें भी इन्ही अनुवर्ती  संगठनों के कर्ताधर्ताओं ने ही कार्यकर्ता जुटाये होंगे इसमें संदेह नहीं है क्योंकि उनके मंचों पर धर्म से जुड़ी संस्थाओं के लोग भी बैठे थे। इस देश में प्रबुद्ध वर्ग के अनेक ऐसे लोग हैं जो संघ के अस्तित्व बने रहने की आवश्यकता इस देश के प्रबुद्ध वर्ग के अनेक लेखक, बुद्धिजीवी और जागरुक नागरिक अनुभव करते हैं पर उससे पूरे होने वाले लक्ष्य वह नहीं जानते। अगर जानते हैं तो कहते नहीं है क्योंकि संघ में दोतरफा संवाद का अभाव है और उच्च स्तर से निर्णय लेकर नीचे नियमित सदस्यों तथा अनुवर्ती  संगठनों का संचालन किया जाता है-ऐसा इससे जुड़े लोग कहते हैं। यह तब तक ही ठीक था जब राजनीति और शिक्षा में सक्रिय उसके अनुवर्ती   संगठन सीमित लक्ष्य और साधनों से काम रहे थे। अब वह सभी आर्थिक, सामाजिक, राजनीति तथा सदस्य की दृष्टि से इतने शक्तिशाली हो गये हैं कि संघ का आकर्षण उनके फीका पड़ जाता है। रामजन्मभूमि आंदोलन के चलते उसके धार्मिक संगठनों ने बहुत प्रचार पाया और यही संघ के लिये परेशानी का सबब बना। उसके बाद तो संघ के अनुवांषिक संगठनों ने भारत में राजनीति, धर्म, व्यापार तथा समाज के क्षेत्र में अपनी छबि बनायी और उसका भौतिक लाभ भी लेकर शक्ति अर्जित की। मगर याद रखने लायक बात यह है कि केवल संघ के नियमित सदस्यों की बौद्धिकता या उसके अनुवर्ती  संगठनों की आक्रमकता की वजह से यह रथ नहीं चला बल्कि देश के अनेक स्वंतत्र, मौलिक तथा निष्कामी बुद्धिजीवियों ने संघ और उसके  अनुवर्ती   संगठनों को निस्वार्थ सहानुभूति दी। संघ के आलोचक खुलकर यह बात कहते हैं कि उसने कोई ऐजेंडा नहीं बनाया बल्कि जो प्रचार में आया उसे जब्त कर लिया। मतलब यह कि देश के अनेक स्वतंत्र बुद्धिजीवियों का ऐजेंडा स्वाभाविक रूप से संघ से मिल गया। देखते देखते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सत्ता के गलियारों में एक ताकत बन गया मगर नेपथ्य में रहने की उसकी परंपरा ने उसे यहीं घोखा दिया। भारत ही नहीं विश्व जनमानस  का यह स्वभाव है कि वह नेपथ्य की बजाय पर्दे पर सक्रिय या एक्शन करने वाले पात्र को ही मान्यता देता है। राष्ट्रीय स्वयं संघ के बुद्धिमान लोग कह सकते हैं कि हमारा सत्ता से क्या लेना देना? मगर क्या इसे सभी मान लेंगे, यह नहीं माना  जा सकता है।
मगर जब आप समाज को सुधारने की बात कहते हैं तो सत्ता उसका एक साधन हुआ करती है और अध्यात्म तथा समाज पर दृष्टि रखने वाले प्रबुद्ध वर्ग को आप भरमा नहीं सकते। फिर भारत जैसे देश में जहां अनेक राजा भगवान का दर्जा प्राप्त कर गये वहां इस तरह की बात जमती नहीं। दूसरी बात यह कि जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने सदस्यों को समाज पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं में जाने के लिये उतार रहा है तब वह इस बात को भूल रहा था कि लोग उसकी साख के कारण  उसके   अनुवर्ती  संगठनों को समर्थन दे रहे हैं। भले ही संघ के कर्ताधर्ता यह दावा करते हैं कि उसके  अनुवर्ती  संगठन स्वतंत्र रूप से काम करते हैं पर स्वतंत्र और मौलिक प्रबुद्ध वर्ग के लिये यह कथन अधिक महत्व नहीं रखता था क्योंकि वह मानकर चल रहा था कि संघ अपने अनुवर्ती  संगठनों पर नियंत्रण करेगा दिखाने के लिये कुछ भी कहा जा रहा हो-दूसरे शब्दों में कहें तो यह उसके प्रति ही यह एक बहुत बड़ा विश्वास था। बाद में दखल न देने के दावे ने उसकी दृढ़ छबि को हानि पहुंचाई क्योंकि निष्पक्ष तथा स्वतंत्र प्रबुद्ध वर्ग उसे अप्रत्यक्ष से दखल देता हुए देखना चाहते थे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कर्ताधर्ता इस बात का अनुमान करते नहीं दिखते कि उनके सदस्यों से अधिक संख्या तो उनके ऐसे समर्थकों की रही है जो उसके कार्यक्रमों या शाखाओं में आते ही नहीं बल्कि आम आदमी के बीच आम आदमी की तरह अपनी दिनचर्या निभाते हैं। उन्हें लाभ की कोई चाहत नहीं थी बल्कि देश में एक मज़बूत समाज देखना की इच्छा ने उनके अंदर संघ के प्रति सहानुभूति पैदा की। यही वर्ग उसके प्रति उदासीन हो गया है। एक तरह से कहें तो आम आदमी और संघ के कार्यकर्ता का अंतर भी अनेक जगह खत्म हो गया था।
ऐसे ही संघ को आज जब भारतीय जनमानस की उदासीनता का सामना करना पड़ रहा है तो कहना पड़ता है कि समय बलवान है। यहां संघ की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते हैं। जब संघ और उसके अनुवर्ती संगठन शिखर पर थे तब उनके आकर्षण की वजह से युवा पीढ़ी उनकी तरफ गयी और यकीनन इसका प्रभाव उसकी शाखाओं में जाने वाले सदस्यों की कमी के रूप में प्रकट हुआ होगा। दूसरा यह भी राज्य और समाज पर नियंत्रण के दौरान ऊंच नीच होता है और उसका परिणाम उनमें काम करने वालों को भोगना होता है पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मामले में अपने ही अनुवर्ती  संगठनों के असंतोष दुष्प्रभाव उसे ही झेलना पड़ा। मतलब संघ के कर्ताधर्ता भले ही राजनीति की काज़ल काली कोठरी से दूर रहने का दावा करते रहे हों पर उनके समर्थक इसे मानने को राजी नहीं थे। देश के स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा मौलिक विचारों के प्रबुद्ध लोगों का मानना था कि न केवल इस संगठनों पर काबू रखे बल्कि वह दिखे भी। वह चाहते थे कि संघ से बड़ा उसका  अनुवर्ती संगठन नहीं होना चाहिए। मगर कहते हैं कि राजकाज तो काज़ल की कोठरी है वहां से कोई सफेद नहीं निकल सकता। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के  अनुवर्ती संगठनों को न केवल अपने सदस्यों बल्कि स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा मौलिक विचारों वाले बुद्धिजीवियों का समर्थन मिला पर उन्होंने इस बात की परवाह नहीं की न संघ इसके लिये उनको बाध्य कर सका।
देखते देखते क्या हो गया? संघ के कार्यकर्ता सम्मानीय होते थे। उनसे मित्रता होना अच्छी बात समझी जाती थी। मगर इधर  अनुवर्ती  संगठनों में ऐसे लोग आ गये तो बौद्धिकता से अधिक शक्ति  के पूजक हैं। अगर हम घटनाओं का विस्तार करेंगे तो अंबार लग जायेगा पर संक्षेप में इतना कह सकते हैं कि देश के प्रबुद्ध वर्ग ने देखा कि अब राष्ट्रीय स्वयं संघ संघ के पुराने और बौद्धिक कार्यकर्ताओं से समाज को कोई मदद नहीं मिल सकती और उसके आनुवांषिक संगठनों की ताकत इतनी बढ़ गयी है जिसकी मस्ती में उनकी कार्यशैली वैसी हो गयी जिनकी आलोचना संघ का बौद्धिक वर्ग करता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कर्ताधर्ता भूल गये कि वह अपने अनुवर्ती  संगठनों को दिखावे की स्वतंत्रता देना देश के स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रबुद्ध वर्ग को स्वीकार्य है पर वास्तविकता में वह न है और न होना चाहिए। मतलब यह कि  अनुवर्ती  संगठनों की शक्ति बढ़ी तो संघ की भी बढ़ती दिखना चाहिये। संघ प्रत्यक्ष रूप से कहीं दखल न दे पर अप्रत्यक्ष रूप से दिखना चाहिए। ऐसा हुआ कि नहीं पर यह तय है कि संघ की साख पर ही उसके संगठन आगे बढ़े थे और अगर उन पर कुछ दाग लगे तो संघ उससे बच नहीं सकता। जब संघ अपने अनुवर्ती  संगठनों को आगे बढ़ा रहा था तब प्रबुद्ध वर्ग उसे आगे बढ़ता देख रहा था। उसकी इस कार्यशैली पर कोई आपत्ति नहीं थी पर इसका मतलब यह नहीं कि संघ का यह दावा कि उसके अनुवर्ती  संगठन स्वतंत्र है मान ली जाये-प्रबुद्ध वर्ग यह स्वीकार कर भी नहीं सकता क्योंकि वह संघ की साख पर ही उनको अपनी सहानुभूति दे रहे था। सीधी बात कहें कि संघ कितना भी कहे वह अनुवर्ती  संगठनों को स्वतंत्र दे पर उसका नियंत्रक वही दिखना चाहिये।
स्थिति आज भी यही है कि संघ के अनुवर्ती  संगठनों के आलोचक संघ को निशाना बनाते हैं तब उसके समर्थक खामोश बैठ जाते हैं। पुराना प्रबुद्ध वर्ग तो यह सोचकर निराश हो जाता है कि संघ भले ही प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय नहीं दिख रहा था पर अप्रत्यक्ष रूप से उसे दृढ़तापूर्वक अपनी भूमिका निभानी थी तो नया वर्ग तो वैसे भी सक्रियता या एक्शन देखकर प्रभावित होता है ऐसे में संघ की सदस्य संख्या और साख में कमी दर्ज हुई तो कोई आश्चर्य नहीं है। ऐसे में संघ के  अनुवर्ती  संगठनों के कुछ सदस्यों के हिंसा में लिप्त होने के आरोप उसके लिये चिंता की बात है क्योंकि जो लक्ष्य राजनीतिक शक्ति होने पर प्राप्त किये जा सकते हैं उसके लिये हिंसा की आवश्यकता नहीं है-भारतीय जनमानस इतना मूर्ख नहीं है कि वह यह बात नहीं जानता। संघ के कर्ताधर्ता जानते हैं कि यह समाज ऐसी हिंसा को मान्यता नहीं देता। यही कारण है कि संघ के कार्यधर्ता इस बात को मान रहे हैं कि उनका हिंसा में विश्वास नहीं है। हालांकि जनमानस में विश्वास बढ़ाने के लिये उनको अभी बहुत कुछ करना है। अभी इस विषय पर इतना ही लिख रहे हैं। अगली कड़ी भी लिखी जा सकती है अगर इसका कोई सख्त विरोध नहीं हुआ। यहां संघ समर्थक इस बात का ध्यान रखें कि यह एक स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा मौलिक लेखक का पाठ है जो संघ का कार्यकर्ता नहीं रहा पर उसके कार्यक्रमों के समाचारों में बाहर बैठकर रुचि लेता रहा है। इस लेखक का संघ को सिखाने या समझाने का कोई इरादा भी नहीं है। यह एक चर्चा है तो मन में आयी लिख दी। ऐसा लगता है कि कुछ छूट रहा है और उसे अगली कड़ी में लिखने का प्रयास करेंगे। कब मालुम नहीं।
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11/26/09

किसी समूह की पहचान स्थाई नहीं रह सकती-काव्य चिंतन (samaj ki pahchan-hindi chittan aur kavita)

प्राकृतिक का नियम है परिवर्तन! दिन हुआ है तो रात भी होगी। सूरज उगा है तो जरूर डूबेगा। धूप है तो अंधेरा भी होगा। यह तो प्रतिदिन होने वाले नियम हैं इसलिये दिखाई देते हैं और इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करने की शक्ति हमें अपने अंदर अनुभव नहीं करते इसलिये कोई दावा नहीं करते। मगर परिवर्तनशील प्रकृत्ति के अन्य भी बहुत सारे नियम हैं जो हमें दिखाई नहीं देते। कई जगह छहः महीने का दिन और रात तो कई जगह दशकों का दिन और रात होता है। केवल समय और दिन ही परिवर्तन शील नहीं है बल्कि प्रकृत्ति का स्वरूप भी परिवर्तनशील है। अनेक प्रकार के जीव यहां बने और मिट गये। डायनासोर की चर्चा तो हमने सुनी होगी जिनके बारे में कहा जाता है कि आसमान से टपके किसी कहर की वजह से वह नष्ट हो गये।
इस पृथ्वी का सच कोई नहीं जानता। सभी अनुमान से कहते हैंे कि इस तरह है या उस तरह है। कहने का तात्पर्य यह है कि यहां किसी वस्तु, व्यक्ति, खनिज, अन्न का जो स्वरूप आज है वह कल कुछ दूसरा हो सकता है और आज से पहले कुछ दूसरा रहा होगा। अलबत्ता जीवन निर्माण की प्रक्रिया में कोई परिवर्तन नहीं आता दिखता पर उसके दृश्यव्य बाह्य रूप में परिवर्तन होता है और होता रहेगा।
भाषा, समाज, जाति, तथा अन्य आधारों पर बने व्यक्ति समूहों की यही हश्र होना है इसे कोई रोक नहीं सकता। मनुष्य प्रकृत्ति का दोहन अपनी शक्ति के अनुसार अधिक से अधिक कर सकता है पर उस पर नियंत्रण कभी नही कर सकता। ऐसे में कुछ लोगा यह दावा करते हैं कि वह भाषा, जाति, धर्म, और वर्ण के आधार पर बने अपने समूहों की पहचान बरकरार रखेंगे।
अगर उनसे पूछे कि‘क्यों?’
इसके बिना इस धरा का जीवन नष्ट हो जायेगा। अगर अपनी पहचान नहीं बचाकर रखी तो दूसरी पहचान वाले हमें नष्ट कर देंगे। यह पहचान हमारी अस्मिता है? आदि आदि प्रकार के जवाब।
भला यह कैसे संभव है जो समाज प्राकृतिक परिवर्तनों से बने हैं वह उन्हीं की वजह से नष्ट होने से बच जायें? मगर दावा करने वाले करते हैं। मनुष्य के मन में भावनायें होती हैं और वही उसका संचालन करती हैं। उनका दोहन अपने लाभ के लिये करने वाले व्यापारी उसमें भय, आशंकायें और स्वप्नों का एक जाल रचते हैं। वह ऐसे असंभव काम को अपने हाथों से करने का दावा करते हैं जो उनके बस का है ही नहीं। परिवर्तन को रोकना कठिन है। सौ बरस में मनुष्य का और दो सौ बरस में परिवार का अस्त्तिव मिटने के साथ अपनी पहचान खोता है तो हजार साल में समूह भी अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते हैं। जाति, भाषा, धर्म तथा अन्य आधारों पर बने समूह कोई स्थाई पिंजरा नहीं है जिसमें आकर भगवान का हर जीवन हमेशा फंसता रहे। फिर सवाल यह है कि अपनी पहचान किसलिये बनाये रखना चाहिये? अरे, अपना जीवन आदमी शांति और भक्ति के साथ जिये तो उसे फिर पहचान की क्या जरूरत है? ऐसे में पहचान का ढोंग न करें चाहिये न उसमें फंसे।इस पर प्रस्तुत हैं काव्यात्मक अभिव्यक्ति-

धरती पर उगे हैं इंसान
पर वह उसमें गड़े मुर्दों में
अपनी पहचान खोजते हैं।
अपने लहू से सींचे चमन का
मजा लेने की भला कैसे सोचें
पूरी जिंदगी अपनी पहचान के
संकट से जूझते
उनके पसीने का मजा
जिंदगी के दलाल भोगते हैं।।
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उसने नारा लगाया कि
‘आओ मेरे पीछे
मैं तुम्हें अपनी पहचान बताता हूं
कैसे बचाओ उसे
इसका रास्ता भी बताऊंगा।’
लोग बिना सोचे समझे
चल पड़े उसके पीछे
पर पहचान नहीं मिली
रास्ते पर रखे पत्थरों का
इतिहास सुनाते हुए वह चलता रहा
भीड़ का कारवां भी उसके पीछे था
उसने सौदागरों के इतिहास में
अपना नाम दर्ज कर लिया
पर पहचान का पता किसी को न दिया
कभी जाति की
तो कभी धर्म की
कभी भाषा की चादर बिछाता रहा
पहचान का प्रमाण दिखाता रहा
बस कहता रहा जिंदगी भर
समूह की एकता की बात
जब थक गया तो कहने लगा कि
‘चलते रहो मेरे साथ
आने वाली पीढ़ियों को भी
इसी पहचान की राह चलना है
इसी में जीना और मरना है
मेरी बात मानना बंद किया तो
फिर भूत की तरह सताऊंगा।’

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com

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9/21/09

मौलिक चिंतन के साथ लिखें तो अच्छा रहेगा-आलेख(Write with original thinking it would be nice - Articles)

इस लेखक के पास दो लेख ब्लाग पर डालने के लिये पड़े हैं पर उनको केवल इसलिये रोका गया है क्योंकि लगता है कि वह अंतर्जाल पर वेबसाईट/ब्लाग लेखकों को अपनी तरफ संकेत करते हुए दिखेंगे। चूंकि हिंदी के ब्लाग एक ही जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर उनकी सक्रियता अधिक है इसलिये उनको ऐसे ब्लाग पर डालने का भी विचार है जहां मित्र ब्लाग लेखकों का आवागमन नहीं होता। दरअसल मुश्किल यह है कि पुरानी घिसीपिटी विचारधारायें जिनके जनक नये महापुरुष हैं और उनके ढोने वाले कुछ यहां भी सक्रिय हैं। यह लेखक हमेशा भारतीय अध्यात्म से पैदा हुई सहज धारा का समर्थक है और यह स्पष्ट मान्यता है कि उसके अलावा इस विश्व में शांति, अमन और भाईचारा पैदा करने वाली अन्य कोई विचारधारा नहीं है। मगर उसमें भी एक समस्या है कि भारतीय विचारधारा को नये ढंग से कुछ विचारकों ने प्रस्तुत किया और इसी प्रयास में भारतीय अध्यात्म के मूल तत्वों को प्रचार दबा रह गया।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि अंतर्जाल पर अपनी भारतीय अध्यात्म से पैदा सहज विचाराधारा को प्रमाणित करने का जो अवसर मिला वह पहले नहीं मिल सका था और इसका कारण यही है कि सारा समाज ही इन दो तीन विचाराधाराओं में बह रहा है और उसने एक वैचारिक रूप बना लिया है जिससे बाहर वह सोच भी नहीं पाता। सहां सहज धारा को मौलिकता के साथ देखने वाले के लिये एक लेखक और विचारक के रूप में कोई मान्यता नहीं है। उसमें भी एक पैंच यह है कि एक धारा का आदमी दूसरे का समर्थक समझता है तो दूसरा यह कहकर भाव नहीं देता कि यह तो केवल प्रदर्शन के लिये ठीक है कि हां, भारतीय अध्यात्म पर लिख रहा है बाकी फसाद में किसी काम का नहीं है। देश में विचारधाराओं की धारा बहाई इसलिये गयी है कि उन पर द्वंद्व कर जनता का ध्यान अन्य मुद्दों से हटाया जाये। हालांकि इन विचाराधाराओं के पोषकों की नयी पीढ़ी में विद्रोह है और उसका प्रमाण अंतर्जाल पर ही देखा जा सकता है बाकी टीवी और समाचार पत्रों में यह प्रतिबिंबित नहीं होता। यही कारण है कि यह लेखक मानता है कि आने वाले समय में ब्लाग लेखन उसी विद्रोह को बृहद रूप देगा।
विद्रोह के बावजूद ब्लाग लेखकों पर विचाराधाराओं के लेखकों की लेखनी रक्षात्मक है। यह अलग बात है कि कभी वह नाराजगी के साथ प्रकट होते हैं। इन दोनों तीनों विचारधारा के लेखकों की जागरुकता, लिखने की क्षमता और दृढ़ता बहुत प्रशंसनीय लगती है पर उनका लेखन वैसे ही सतही स्तर का है जैसे कि उनके पूर्वज बता गये- यह देखकर निराशा होती है।
आखिर इन विचाराधाराओं में कमी क्या है? इसका जवाब है कि केवल नारे लगाने या वाद गढ़ने से क्या होगा? शक्ति आने पर उसके उपयोग की भी क्षमता और योजना भी होना चाहिये और सभी विचाराधाराओं के नयी पीढ़ी के रचनाकार यह देखकर निराश हैं कि जिन लोगों ने उनके सहारे शक्ति प्राप्त की वह केवल उसकी रक्षा में जुट गये और विचाराधारा को एक तरफ हटाकर रख दिया। इस पीढ़ी की यह निराशा विद्रोह का कारण है पर ठीक नहीं है क्योंकि याद रखिये आंदोलन चलाना अलग बात है और समाज या देश चलाना अलग। ऐसे में हाथ पांव पटकना बेकार है कि उसने यह किया या उसने वह किया।
मुख्य बात यह नहीं कि विचाराधारायें या संगठन नाकाम हो रहे हैं बल्कि कार्यप्रणाली की नाकामी है और उसका कारण यह है कि कोई भी विचारधारा केवल नारे या वाद पर सिमटी हुई है और कार्यशैली के बारे में खामोश है।
एक सवाल यह है कि प्रगतिशील, जनवादी या परंपरावादी विचाराधाराओं की बात करें तो उनमें नारों की भरमार है। वाद गढ़े गये है और उनका कोई तार्किक आधार नहीं है।
मुख्य बात चिंतन की है। उसमें मौलिकता का सर्वथा अभाव है। हमने अनेक महापुरुष देखें हैं पर उनमें से अधिकतर स्वाधीनताकाल से पहले के हैं और उनकी आंदोलनों में बेहतर भूमिका होने के बावजूद यह नहीं कह सकते कि उनमें समाज या देश को चलाने की क्षमता या योग्यता थी। कहने को तो राजकाज पर कोई बैठ सकता है पर मुख्य बात यह है कि जनहित कौन कर सकता है इस पर कभी नहीं सोचा गया। पूरे देश के आर्थिक, साहित्यक तथा सामाजिक संस्थान इस देश को एक निश्चित योजना के तहत चला रहे हैं जिसमें नयी शक्तियां, व्यक्ति या विचार के उभरने की क्षमता न के बराबर है। ऐसे में अंतर्जाल पर हम उन संभावनाओं को तलाश रहे हैं जिनको बाहरी जगत पूरा नहीं कर सकता। इसके लिये यह जरूरी है कि ब्लाग/वेबसाईट लेखक पुरानी घिसीपिटी विचाराधाराओं से हटकर जरा मौलिक सोचें। इस लेखक का तो सीधा मानना है कि जब तक सहजभाव से मौलिक चिंतन नहीं होगा तब तक समाज में शांति, भाईचारा या विकास की धारा बहना कठिन है।
यह सब बातें केवल हिंदी ब्लाग जगत को देखकर नहीं लिखी जा रही है बल्कि अंतर्जाल पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय की हिंदी सहित अन्य भाषाओं की वेबसाईट और ब्लागों की सामग्री और उन पर लगी घृणा भरी टिप्पणियां देखकर लिखी जा रही है। यहां न केवल विचाराधारायें विदेश से आयी हैं बल्कि कार्यप्रणाली भी उन जैसी हो गयी है। सच कहें तो जो समस्यायें हमें राष्ट्रीय लगती हैं पर अंतर्जाल देखकर यह कहना पड़ रहा है कि उनका अंतर्राष्ट्रीयकरण हो गया है। कहने का आशय यह है कि हमें अब बृहद दृष्टिकोण अपनाना है क्योंकि अपने देश के उग्र तत्वों के साथ विदेश में मौजूद उग्र और नकरा तत्वों से भी जूझना है। यही समस्या विदेशियों के साथ भी आ सकती है क्योंकि हम यह नहीं कह सकते कि हमारे यहां उग्र या नकारा तत्व नहीं है। इंटरनेट के सहारे होने वाले अपराध का एक सिरा यहां है तो दूसरा बाहर तब यह जरूरी है कि उसके लिये बाहर की सहायता ली जाये। ऐसे में यह भाव भी रखना होगा कि बाहर वालों की हम सहायता करें।
यहां यह साफ करना इस लेखक के लिये जरूरी है कि जो भी विचार ब्लाग पर लिखता है वह बरसों से अपने जीवन और लेखन से उपजे अनुभाव का परिणाम है। सच तो यह है कि कुछ भी बदलते नहीं देखा। समय, पहनावा, जीवन शैली के साथ लिखने पढ़ने का तरीका बदला पर मौलिक रूप से सब वही है जैसा पहले था। गरीब के प्रति उपेक्षा का भाव और अमीर की चमचागिरी बरसों पुरानी है। हिंदी लेखक को बंधुआ बनाने की प्रवृत्ति नई नहीं है पर अंतर्जाल पर ब्लाग लेखन उससे बचने का एक उपाय है जिसका हम उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में कुछ लेख ऐसे आ सकते हैं जो मित्र ब्लाग लेखकों को लगे कि उनको संकेत कर लिखे गये हैं तो वह उससे बचें क्योंकि वह जाने अनजाने गुलामी के कचड़े को यहां ढो रहे हैं अब यह गुलामी अपनों की भी हो सकती है और परायों की भी। आज वह पुराने दो लेख डालने का मन था पर उनमें अभी कुछ ऐसा जोड़ना है जिनमें अंतर्जाल पर पढ़ी गयी सामग्री का भी उल्लेख करना है क्योंकि वह भी बाहर से लायी गयी है। एक पुरानी योजना को नये ढंग से लाया गया है। हां, एक नये अवतार की अवधारणा है जिसे इस देश पर लादने का प्रयास बरसों पहले हुआ था अब अंतर्जाल भी हो रहा है। हम तो मौलिक चिंतन वाले हैं और यही चाहते हैं कि भले ही पुरानी विचारधाराओं के लेखक लिखें पर उस पर उनका मौलिक सोच होना चाहिये जो कि दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है कि पुरानी लकीरें पीटते हुए लोग यहां चले आ रहे हैं। यह हमने इसलिये लिखा कि कुछ टिप्पणियां ऐसी मिल रही हैं कि ‘आप कबीर और मनुस्मृति के विवादास्पद विषय पर लिखने से बच रहे हैं।’
हमने उनका यही जवाब दिया कि ‘हम तो मौलिक विचार वाले हैं लकीर के फकीर नहीं। अगर तुम्हारे पास किताबें हैं तो उनको पढ़ो पर हम यहां वही रखेंगे जिसे वर्तमान संदर्भ में सही समझेंगे।’
हमारे अध्यात्मिक दर्शन में समय समय पर बदलाव की अनुमति है पर मूल तत्वों में बदलाव की आवश्यकता नहीं है। हमारा मौलिक चिंतन स्पष्ट है कि सहज भाव अपने अंदर लाओ तो सब सहज हो जायेगा। यह सहज भाव कैसे आये? इस पर इसी ब्लाग पर फिर कभी।
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