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10/2/14

कचरा निष्पादन के लिये आधुनिक यंत्रों का उपयोग जरूरी-भारत स्वच्छ अभियान पर हिन्दी चिंत्तन लेख(kachda nishpadan ke liye adhunik yanton ka upyog jaroori-bharat swachcha abhiyan par hindi lekh,hindi thought article on clean india green india)



            भारत स्वच्छ अभियान प्रारंभ हो गया है।  प्रचार माध्यमों ने इस पर जमकर चर्चा और बहसें कर अपने विज्ञापन प्रसारण का समय बहुत अच्छे ढंग से पास किया।  अगर हम बहस में भाग लेने वाले विद्वान तथा संयोजकों के विचारों को देखें तो ऐसा लगता है कि जैसे यह पांच वर्षीय अभियान का प्रतीकात्मक प्रारंभ न होकर कोई एक दिवसीय  कार्यक्रम हो।  गांधी जयंती पर प्रारंभ इस अभियान पर स्वच्छता रखने की शपथ तो ली गयी पर आजकल कचड़ा किस प्रकृत्ति का है यह किसी ने न बताया न सुना।  जिस तरह विज्ञान ने मनुष्य जीवन के रहन सहन का रूप बदला है वैसे ही कचड़े ने भी अपना रूप बदला है। पहले कचड़ा प्राकृतिक पदार्थों से ही-पेड़ के पत्ते, पुट्ठा और कागज तथा खाने पीने के फैंके गये अवशेष-का ही होता था जबकि अब प्लास्टिक ने कचड़े को एकदम क्रूरतम रूप प्रदान कर दिया है।  मार्ग में आवारा घूमने वाले पशु खाद्य पदार्थों के अवशेषों के साथ उसमें पडी प्लस्टिक भी थैलियां भी खा जाते हैं जो अंततः उनका जीवन ही संकटमय हो जाता है।
            बहसों में कुछ लोगों महत्वपूर्ण बातें बतायीं। उनमें तो एक यह थी  जिन देशों मे ंकचड़ा उठाने और नष्ट करने के लिये आधुनिक यंत्रो का प्रयोग किया जाता है उनके शहर और गांव स्वच्छ दिखते हैं।  इन विदेशी शहरों के चित्रों या चलचित्रों में उनकी चकाचौंध देखकर हमारे देश का सामान्य नागरिक आहें भरने लगता है।  यह आरोप तो हम सभी पर है कि कचरा फैलाने में उस्ताद हैं इसलिये अगर हमें स्वच्छ भारत रखना है तो कचरा उचित जगह पर फैंके, यही शर्त पूरी कर अपनी शपथ निभा सकते हैं।  आजकल खाने पीने का सामान प्लास्टिक में बंद मिलता है।  उपयोग करो और फैंकों पर चल रही हमारी उपभोग नीति के चलते हमारी बुद्धि ऐसे मार्ग पर चल रही है जिसमें स्चच्छता के लिये हमें शपथ लेनी पड़ी है।  सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने से हमें बचना चाहिये। यह विचार करना चाहिये कि हम तो गंदगी फैंककर चले जायेंगे पर दूसरे की आंखों और नाक को इससे परेशानी होगी।
            यह तो नागरिकों की जिम्मेदारी वाली बात हुई।  अब आती है कचरा निष्पादन करने वाली सरकारी, अर्द्धसरकारी या फिर उन निजी कंपनियों की जिन्होंने सार्वजनिक स्थानों की सफाई का ठेका लिया है क्या वह इसके लिये तैयार हैं?  भारत में गंदगी दिखने का यह भी एक कारण है कि कचरा का निष्पादन करने के लिये मशीनों के उपयोग के अधिक उपयोग की जानकारी नहीं है। खासतौर से प्लास्टिक वाले कचरे के बढ़ते उपयोग की वजह से कचरा निष्पादन के लिये आधुनिक यंत्रों का उपयोग अत्यंत जरूरी माना जाने लगा है।  नागरिकों पर इसका जिम्मा डालना गलत होगा।  कहने का अभिप्राय यह है कि कहीं न कहीं अंततः जिम्मा राज्य कर्मियों पर आयेगा।  इसके लिये युद्धस्तर पर प्रयास करने होंगे।  वैसे प्लास्टिक का कचरा कई बार दर्दनाकर दृश्य भी पैदा करता है। अनेक बार चार पांच बच्चों के झुंड इस तरह के कचड़े को अपने कंधे पर रखे थैले में भरते देखे जा सकते हैं।  यह लोग इतने मैले कपड़े पहने रहते हैं कि आवारा कुत्ते उन पर भौंकने लगते हैं।  कुछ वीरता पूर्वक उनके बीच से निकलते हैं तो कुछ रास्ता बदल जाते हैं। रेल्वे स्टेशनों पर पानी की फैंकी गयी प्लास्टिक बोतलों को समेटकर कर उनमें फिर पानी भरने के समाचार भी आते हैं।
            कचरा उचित स्थान पर फैंकना नागरिक की जिम्मेदारी है-यह बात हम दोहराते हैं। लोग इसे अपनी आदत बना लें।  बाहर ही नहीं घर में भी किसी सामान का अवशेष फैंकना हो तो अपने घर में कचरे के डिब्बे में ही फैंकें। हमारा तो अनुभव यह है कि हम सोने, बैठने और काम करने के दौरान अगर अस्वच्छ जगह पर होते हैं तो वह उससे मानसिक कष्ट होता है पर इसे पहचान नहीं पाते।  साफ सुथरे स्थान पर सोने, बैठने और काम करने का सुख भी पता नहीं चलता।  यह भी संभव है जब ध्यान आदि जैसी  अध्यात्मिक विधा का अभ्यास के साथ ही  एकांत में आत्ममंथन करें।  बाहरी आंखों से देखें तो अंतर्मन में विचार भी करें।  एक बात तय रही है कि स्वच्छता ही स्वर्ग का पर्याय है। अपनी संवेदनशील इंद्रियों से साक्षात्कार करें तो इसका आभास सहजता से हो सकता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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6/24/11

राजनीति शास्त्र के ज्ञान से परे आंदोलक पुरुषों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक-हिन्दी आलेख (agitation, politics and nowledge-hindi article)

           जिस तरह भारत के धार्मिक आंदोलनों, अभियानों तथा संगठनों की स्थिति रही है कि उनके शिखर पुरुष श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अल्प होने के बावजूद समाज का नेतृत्त करने लगते हैं। वही स्थिति सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों की भी है। वही अगर आप पिछले पचास साठ वर्षों से देश की स्थिति का अवलोकन करें तो पता चलेगा कि हमारे देश के अनेक संत माया मोह से परे रहने का उपदेश देते हुए अपने आश्रमों को महलनुमा तो अपने संगठन को लगभग कंपनी में बदल दिया है। दोनों हाथों  से माया बटोरी है। उन्होंने भारतीय अध्यात्म के ग्रंथों से अनेक पाठ रट लिये हैं उनको संस्कृत के श्लोक याद हैं। बड़े बड़े ग्रंथों का अध्ययन उन्होंने किया है। स्पष्टतः वह धर्म के वह व्यवसायी हैं जिनका अध्यात्मिक ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में अनेक महानायकों की कहानियां हैं उनका वह सरसपूर्ण ढंग से सुनाकर वाहवाही लूटते हैं पर तत्वज्ञान तथा ध्यान के प्रेरणा न देने का प्रयास करते हैं न ही ऐसा चाहते हैं क्योकि इससे उनके अनुयायी उनसे बड़े सिद्ध बन सकते है।। वह विफल रहते हैं। उनके ढेर सारे शिष्य अपने गुरुओं का बखान करते करते थकते नहीं है पर उनसे क्या सीख और कितना उस पर अमल कर रहे हैं यह कोई नहीं बता पाता। इनमें अनेक तो सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी बोलने का लोभ नहीं छोड़ पाते क्योंकि इससे प्रचार माध्यमों मे बने रहने का अवसर भी मिलता है।
        ऐसा लगता है कि भारतीय समाज पूर्वकाल में श्रमशील रहा होगा। अपने मानसिक तनाव की मुक्ति के लिये वह सांसरिक विषयों से इतर गतिविधियों में संलग्न रहने के लिये बौद्धिक विशेषज्ञों की शरण लेता होगा। ऐसे में मनोरंजन से उकताने के बाद उसे अध्यात्मिक विषय अत्यंत रुचिकर लगे होंगे क्योंकि न वह केवल मनोंरजन बल्कि ज्ञानबर्द्धक होने के साथ ही लंबे समय तक आत्मिक शांति के लिये उनका ज्ञान अत्यंत उपयेागी है। इसी कारण ही हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान सर्वाधिक संपन्न बन गया क्योकि तपस्वियों, ऋषियों तथा ज्ञानियों ने जहां अनेक खोजें की तो समाज ने उनको स्वीकार भी किया। समाज अध्यात्मिक का मुरीद बना तो अल्पज्ञानियों के लिये यह व्यवसाय चुनने का एक महत्वपूर्ण साधन भी बना। प्राचीन तपस्पियों, ऋषियों और मुनियों ने जहां अपने सत्य ज्ञान से प्रसिद्धि प्राप्त करने के साथ ही अपना शिष्य समाज बनाकर अध्यात्मिक ग्रंथेां में देवत्व का दर्जा हासिल किया तो वहां समाज भी उनका गुणगायक बन गया।
           सर्वशक्तिमान का बनाया यह संसार अत्यंत अद्भुत है। इसमें सारी भौतिकता उसके संकल्प के आधार पर ही स्थित है पर वह सर्वशक्तिमान किसी को दिखता नहीं है। यह संसार अपने रूप बदलता है। बनता है और नष्ट होता है। विकास और विनाश के इस चक्र को कोई समझ नहंी पाया। संसार नश्वर है पर चमकदार है इसलिये कुछ लोग यहां अपनी देह, नाम तथा व्यवसाय की चमक बनाये रखने के लिये समाज से परे होकर उसका शीर्ष बनना चाहते हैं। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के ग्रंथों की विषय सामग्री सरस तथा मनोरंजक होने के साथ ही ज्ञानवर्द्धक होन के पेशेवर धार्मिक लोगों के लिये बहुत सहायक होती है। जिसे ज्ञान चुनना है वह ज्ञान चुने जिसे मनोरंजन करना है वह मनोरंजन करे।
        इनमें कुछ लोग लोग तो समाज पर आर्थिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक शासन करना चाहते हैं और तब पैसे, पद और प्रतिष्ठा का उनका मोह अनंत हो जाता है। इसकी भूख शांत नहीं होती। जिस तरह सामान्य आदमी की भूख रोटी से मिट जाती है विशिष्टता की छवि रखने वाले आदमी की भूख उससे नहीं मिटती बल्कि पैसा, प्रतिष्ठा और पद का मोह उसे हमेशा पागल बनाये रहता है। इसमें भी कुछ आदमी ऐसे होते हैं जो समाज को पागल बनाये रखते हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य समाज से परे बने अपने शिखर की रक्षा करना होता है। इसलिये वह दूसरे के सृजन को अपने नाम करना चाहते हैं। यहीं से शुरु होता है उनका अभियान जो अंततः निष्काम बौद्धिक लोगों लिये के अनुसंधान का विषय बन जाता है।
धार्मिक आंदोलनों की तरह सामाजिक और राजनीतिक विषयों के अनेक आंदोलन ऐसे हैं जिनको उनके शीर्ष पुरुष कथित रूप से जनप्रिय बताकर भ्रमित करते हैं। आज के बाज़ार और प्रचार से प्रायोजित अनेक ऐसे आंदोलन हैं जो प्रचारित हैं पर उनसे जनहित कितना हुआ या होगा यह अभी भी विचार का विषय है। हम यहां राजनीतिज्ञों के आंदोलनों की बात न कर उन लोगों के राजनीिितक आंदोलनों की बात करेंगे जिनको गैर राजनीतिक लोग प्रारंभ करते है। वह एक तरफ कहते हैं कि उनका आंदोलन गैर राजनीतिक है पर उसकी कोई दूसरी संज्ञा नहीं बताते-जैसे कि सामाजिक आंदोलन, नैतिक आंदोलन या शैक्षणिक आंदोलन। मजे की बात यह है कि उनकी मांगे सरकार से होती हैं जिनका नेतृत्व राजनीतिक लोग करते हैं। ऐसे में आंदोलनों के शीर्ष पुरुषों के बौद्धिक चिंत्तन पर ध्यान जाना जरूरी है। वह कहें या न कहें उनके आंदोलनों में कहीं न कहीं राजनीतिक तत्व रहता है-चाहे उनकी मांगों में हो या उनके पूरे होने में। दूसरी बात यह कि समाज में सर्वजन हित के लिये केाई भी कार्य राजनीतिक परिधि में आता है। मनुष्य नाम की ईकाई का समाज के रूप में परिवर्तन इसलिये ही होता है कि कम से कम वह अन्य जीवों की तरह हिंसक या अनुशासनहीनता का बर्ताव न करे। अगर कोई व्यक्ति अध्यात्मिक विषयों  में महारती है तो वह समाज के भले के लिये न काम कर मनुष्य के हित के लिये काम करता है। वह स्वयं पर अनुसंधान करता है फिर उसकी जानकारी दूसरे को देकर अपने मनुष्य के दायित्व का निर्वाह करता हे। वह मनुष्य को समाज मानकर नहीं बल्कि इकाई दर इकाई संपर्क बनाता है। जहां समाज मानकर मनुष्य को ईकाई दर इकाई मानकर काम किया जाता है वहां राजनीतिक क्षमतायें होना आवश्यक है।
हम कौटिल्य का अर्थशास्त्र या मनु स्मृति को देखें तो वहां मनुष्य को इकाई मानकर संबोधित किया गया है न कि समाज मानकर। उसमें मनुष्य निर्माण के लिये संदेश दिये गये हैं। यह मानकर कि अगर मनुष्य के व्यक्त्तिव का निर्माण होगा तो समाज स्वयं ही अपनी राह चलेगा। कहीं न कहीं यह स्वीकार किया गया है कि समूचा मनुष्य समुदाय एक जैसा नहीं हो सकता। इसलिये उसमें जितने बेहतर लोग होंगे  उतना ही वह चमकदार भी होगा । इसके विपरीत भारतीय आंदोलक पुरुष समाज को संबोधित करते हुए अपनी बात करते हैं। वह यह नहीं बताते कि मनुष्य क्या करे? वह कहते हैं कि समाज यह करे तो सरकार वह करे। यह हवा में तीर चलाने जैसा है। वह समाज में व्यक्ति निर्माण के लिये अपनी भूमिका निभाने से कतराते हैं। भले ही वह सामाजिक नेता होने का दावा करें पर अपनी भूमिका को राजपुरुष की तरह देखना चाहते हैं। यह उनके राजनीतिक अल्पज्ञान का प्रमाण है। अध्यात्मिक पुरुष की छवि सौम्य और शांत होती है। उसकी सक्रियता में आकर्षण नहीं होता जबकि राजपुरुष की छवि में आक्रामकता, सुंदरता तथा प्रभावी छवि है और इसलिये हर कोई उसी तरह दिखना चाहता है।
        हम यहां कुछ आंदोलनों की चर्चा करना चाहेंगे जो जनमानस के लिये महत्वपूर्ण रहे हैं। सबसे पहले सामाजिक कार्यकर्ता श्री अन्ना हजारे और विश्व प्रसिद्ध  योग  शिक्षक बाबा रामदेव के आंदोलन की बात करना अच्छा रहेगा। मूलतः दोनों  ही राजनीतिक क्षेत्र के नहीं है। दोनों ही अपनी छवि महात्मा गांधी की तरह बनाना चाहते हैं। दोनों ही यह कहते हैं कि वह कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं करेंगे और न ही चुनाव लड़ेंगे। गैर राजनीतिक दिखने वाले उनके आंदोलनों के विषय बिना राजनीतिक दावपैंचों के सिद्ध नहीं हो सकते यह उनको कोई न समझा पा रहा है। वजह दोनेां ही राजनीति के पश्चिमी सिद्धांतों का अनुकरण कर रहे हैं जिसमें आंदोलन एक विषय और सरकार चलाना दूसरा विषय माना जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि राजधर्म का मतलब वह क्या समझते हैं जो दूसरों को बता रहे हैं। चलिये वह जानते भी होंगे फिर कोई बड़ा पद लेने की बात से इंकार क्यों करते हैं? क्या सरकारी पद केवल उपभोग के लिये होता है। विश्व भर की लोकतंत्रिक सरकारों में बैठे उच्च पदासीन लोग क्या राजसुख भोगने आते हैंे। क्या पद लेना केवल प्रतिष्ठा का प्रतीक है और दायित्व निभाकर दूसरों के सामने प्रस्तुत करने का कोई सिद्धांत वहां नहीं है।
       हैरानी की बात है कि भारतीय जनमानस उनके पद ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की वैसे ही प्रशंसा करता है जैसे भीष्म पितामह की। यह सभी लोग क्या भीष्मपितामह बनना चाहते है पर याद रखना चाहिए कि उन्होंने इस प्रंतिज्ञा को निभाया तो उसकी वजह से अंततः महाभारत युद्ध हुआ। अगर वह स्वयं राजा के पद पर बैठते तो न पांडु राजा बनते और न ही धृतराष्ट के पुत्र पांडवों के साथ युद्ध करते। भीष्म पितामह अपने राज्य की रक्षा करने के वचन से बंधे रहे पर अंततः उनको युद्ध में प्राण गंवाने पड़े। इस एक घटना को भारतीय इतिहास मंें हमेशा मिसाल नहीं माना जाता क्योंकि राजकाज का जिम्मा निभाने में तो हमारे आदर्श भगवान श्रीराम माने जाते हैं। राज्य का त्याग उन्होंने किया पर वापस लौटकर फिर वापस सिंहासन पर विराजे और प्रजा हित के लिये काम किया।
        श्री अन्ना हजारे ने कहा था कि वह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे हैं तब यह विचार सभी लोगों के मन में आया होगा कि महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम भारत को पूर्णता नहीं दिला सका शायद तभी वह ऐसी बात कही हैं। बात निकली है तो श्री महात्मा गांधी जैसे पुण्यात्मा के विचार पर प्रतिविचार आयेगा और हम उसे व्यक्त करने से पीछे नहीं हटेंगे। महात्मा गांधी ने अंग्र्रेजों से आजादी दिलाने का बीड़ा उठाया यह स्वीकार्य है पर उसके बाद राज्य कौन संभालेगा इसकी जिम्मेदारी कौन तय करने वाला था? महात्मा गांधी ने क्या ऐसी गांरटी ली थी कि अंग्रेजों के बाद राज्य चलाने वाले अपने काम में दक्ष होंगे! भारत एक विशाल देश था और उसे दो टुकड़ों में बांटा गया। इसके बावजूद आज का भारत बहुत विशाल था? उसका राजकाज कैसे चलेगा और कौन चलायेगा इसकी भूमिका क्या महात्मा गांधी ने तय की थी? उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान सुखद भारत की कल्पना व्यक्त की पर उसमें अपनी सक्रिय भूमिका निभाना क्या सत्ता का सुख भोगना समझा? यह पलायन माना जाये कि त्याग?
         वह परिवार, समाज, और राष्ट चलाने के सिद्धांतों पर खूब बोले होंगे पर आजादी के बाद के भारत में उन्होंने सक्रिय भागीदारी न देकर क्या जनता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया था? सरकार और राजकाज कोई स्वचालित मशीन नहीं है जिसके साथ खिलवाड़ किया जाये। उसके लिये कुशल लोग होना चाहिऐं। मूल बात यह है कि महात्मा गाीधी अंग्रेजों के हाथ से राजकाज लेकर जिन स्वदेशी लोगों को दे रहे थे उनके ज्ञान पर उनको केवल विश्वास था या उन्होंने उसे प्रमाणिक रूप देखाय भी था? आज अन्ना कहते हैं कि हम काले अंग्रेजों के राज्य को झेल रहे हैं तो सीधे महात्मा गांधी के आंदोलन का विचार आता है। जब उनको कोई राज्य का पद लेना नहंी था तो फिर वह स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के नेता क्यों बने? क्या वह मानते थे कि अं्रग्रेजों ने जिस व्यवस्था को बनाया है उसमें सरकार तो स्वतः चलेगी और उच्च पद तो केवल भोगने के लिये हैं उनमें कोई जिम्मेदारी नहीं होगी?
          हम तो यह मानते हैं सरकार या राजकाज चलाना अंततः राजनीति ज्ञान के बिना संभव नहीं है। आप अगर उसमें कोई पद लेना नहीं चाहते तो इसका मतलब यह है कि आप में कुशलता की कमी है। उसके बाद आप राज्य में परिवर्तन के लिये कोई आंदोलन  चलाना चाहते हैं और पद भी लेना नहीं चाहते तो इसके तीन मतलब यह हैं। एक तो यह कि अप्रत्यक्ष रूप से राजकाज आपका ही रहेगा पर उसमें कमीपेशी होने पर अपनी जिम्मेदारी से भाग सकते हैं। दूसरा यह कि आपका मानना है कि राज्य तो भगवान भरोसे चलता है हम जिसे बिठायेंगे वह सुख भोगने के साथ हमें भी पूजता रहेगा। तीसरी स्थिति यह है कि आपमें आत्मविश्वास नहीं है कि आप सरकार या राज चला पायेंगे।
          ऐसे में कुछ निष्कर्ष भी निकल सकते हैं जो त्यागी आंदोलक पुरुषों और उनके समर्थकों को शायद अच्छे न लगें। एक तो यह कि गैरराजनतिक लोगों दो कारणों से ही राज्य पद त्यागते हैं। एक तो वह बहुत चालाक हैं क्योंकि इससे बिना जिम्मेदारी के वह राजसुख या सम्मान पाते हैंे या उनके पास राजनीतिक शास्त्र के ज्ञान का अभाव है। पहली स्थिति में तो उनको आंदोलक पुरुष होने का हक है क्योंकि राजनीतिक सिद्धांत इस कुटिलता की अनुमति देते हैं कि अगर कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी न लेकर अप्रत्यक्ष रूप से राजहित करता है तो कोई बात नहीं है पर दूसरी स्थिति में उनको इसका अधिकार नहीं है कि वह कथित रूप से एक अकुशल प्रशासक को हटाकर दूसरा स्थापित करें। अगर उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है और न ढूंढने की क्षमता से भी परे हैं तो उनके कथित गैरराजनीतिक आंदोलन संशय के घेरे में आयेंगै। इससे अच्छा है तो वह आंदोलन ही न चलायें और अगर चलायें तो समय आने पर राज्य चलाने के लिये व्यवस्था से जुड़कर उनको आदर्श स्थापित करें।
           अर्थशास्त्र में हमने भारतीय अर्थव्यवस्था के समस्याओं के बारे में पढ़ा है कि अकुशल प्रबंध का यहंा अभाव है। मतलब यह कि हमें कुशल प्रबंधक चाहिये जो व्यवस्था चला सकें। जो आदर्श की बात करें तो उसे व्यवस्था में आकर काम करते हुए साबित करे। अगर हम भ्रष्टाचार की बात करें तो वह अकुशल प्रबंध का एक हिस्सा होने के साथ ही परिणाम है। हम परिणाम बदलना चाहते हैं यानि भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं पर कुशल प्रबंध के बिना यह संभव नहीं है। बीमारी हटाने के लिये दवा चाहिये न कि हम नारे लगाते रहें कि बीमारी भाग जाओ नहीं तो हम आते हैं। मैं पद नहीं लूंगा मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा मेरा किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं रहेगा जैसी बातें कहते हुए राजनीतिक आंदोलक पुरुष वैसे ही हैं जैसे कोई डाक्टर तमाम तरह के शारीरिक परीक्षण कराकर मरीज को बीमारी का नाम बताकर पर दवा देने की बात आने पर कहीं दूसरे डाक्टर के पास भेज देता है। हम ऐसे आंदोलक पुरुषों की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाते क्योंकि वह प्रमाणिक है पर राजनीति शास्त्र के ज्ञान का अभाव उनमें साफ दिखाई देता है। इसलिये वह राजनीतिक खेल में ऐसे दर्शक की भूमिका निभाना चाहते हैं जो खिलाड़ी को सलाह देता रहे और जीतने पर अपनी वाह वाही स्वयं करे और हार हो तो दोष खिलाड़ी को दे। ऐसा आम तौर से हम गांवों में चौपालों और शहरों में बाजा़ारों में शतरंज और ताश खेलने वाली महफिलों में देखते हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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