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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/14/07

जल बिन सब सून-भाई मेरे सुन और गुन

जळ बिन सब सून -यह सबने सुना है पर शायद हमारे लोग सुनते हैं तो बस सुनने के लिए है और फिर भूल जाते हैं। अब गर्मी बढने लगी है और जल संकट कयी इलाकों में अपनी दस्तक दे चूका है और कयी जगह वह आने की तैयारी में है। अभी गर्मी की शुरूआत है जैसे-जैसे बढती जायेगी वैसे ही भू-जलस्तर कम होगा और साथ यह भी कि लोगों की खपत भी बढती जायेगी । जब मैं अपने देश में पाने की खपत का आंकलन करता हूँ तो लगता है कि पीने, कपडे धोने या नहाने से अधिक अन्य चीजों को धोने में ज्यादा खर्च किया जाता है। लोगों ने अपने घरों और दुकानों के बाहर पेड-पौधे को काटकर सीमेंट और लोहे के बुत खडे कर दिए हैं और सुबह शाम उन पर छिड़काव करते हैं। दम्ब्रीक्रत सड़क पर पानी डालते हैं, इतना नहीं जानते कि पानी उसे हानि पहुँचाता है।
एक सज्जन सड़क पर पानी फैंक रहे थे मैंने उनसे कहा -"जनाब आप इस जल संकट के दिन है आप इसे सड़क पर क्यों फैला रहे हैं?"
वह बाले_"क्या करे सड़क पर धुल जमा है, और फिर थोडा ठंडक हो जायेगी । पानी का क्या है? हमारी तो अपनी बोरिंग है।
मैंने कहा -" आपकी बोरिंग है पर पानी तो आपके हाथ में नहीं है। वह तो नीचे बह रहा है। अगर स्टॉक खत्म हो गया तो आपको भी परेशानी होगी। और यह पानी दंबर की सड़क को काटता है। वैसे ही सड़कें बड़ी मुशिकल से बन पाती हैं।
वह बोले-"क्या करना ? सड़क भी बन जायेगी ।
मतलब यह कि हम नहीं सुधरेंगे । जब पानी नहीं मिलता तो रोने लगते हैं- कराहते हैं। घर में बोरिंग है पर बाकी पूरा इलाका सीमेंट और पत्थर से ढका है अन्दर कहीं पानी और हवा जाने का रास्ता नहीं है। पानी का मनमाना उपयोग करने की ऎसी आदत हो गयी है कि न गर्मी दिखती है न सर्दी । अब जल संकट का भी यह हाल है कि अब केई जगह सर्दी में भी अपना उग्र रुप दिखाता है। जल जीवन है पर सुनकर अनसुना करने की प्रवृति ने इस देश को पानी के लिए तरसाना शुरू कर दिया है जिसके बारे में पूरी दुनिया में कहा जाता था कि भारत में दूध की नदियाँ बहती हैं। हां, इतना जरूर है दूध में पानी की मात्रा अच्छी मिल जाती ही। इलेक्ट्रोनिक सामानों के उपयोग ने पानी के दोहन और उपभोग को बढावा दिया है तो प्रकर्ति का भी भारी शोषण हुआ है, और संकट की भनक सबको है पर जिनके पास पानी नहीं है वह सरकार को कोसकर अपना मन हल्का कर लेते हैं और जिनके पास है वह मदांध हो रहे हैं। अपनी कारों और स्कूटरों को वह भी सडकों पर धोते हैं , पानी का नाजायज उपयोग और सड़क की क्षति दोनों अपराध एक साथ करने में किसे संकोच हो रहा है। हम नहीं सुधरेंगे पर हमारा दर्शन कहता है जब जब इस धरती पर बोझ बढता है तो भगवान उसे हल्का करते हैं। प्रसिध्द अर्थशास्त्री मोल्थ्स का भी यही कहना है जब इन्सान अपने पर नियंत्रण नहीं करता है तो प्रकृति उस पर नियंत्रण करती है। यह जल संकट इसी तरह हमारे ही लापरवाही और अज्ञान का परिणाम है।

3 comments:

Sanjeeva Tiwari said...

सार्थक सोच है, पानी को अभी से नहीं बचाया गया तो अगला विश्व युद्ध पानी के लिये ही होगा और वो दिन दूर नहीं हैं ।

Udan Tashtari said...

चिंतन का विषय.

Raag said...

बढ़िया लेखन। समस्या फिर वहीं हर एक आदमी को जगाने की हो जाती है।

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