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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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9/10/13

आओ, हिन्दी दिवस मनायें-हिन्दी दिवस पर विशेष हास्य व्यंग्य(aao hindi diwas manayen-hindi divas par vishesh hasya vyangya rachna)



        दीपक बापू ने जब सुबह देखा कि आज 14 सितंबर हिन्दी दिवस है तब एक नये सफेद कपड़े-धोती, कुर्ता और टोपी-पहनकर घर से बाहर निकले। जेब में एक लघु साहित्यक पत्रिका  में अपनी रचनायें प्रकाशित करने के लिये अपनी दो कवितायें जेब में डालीं और चौड़ी सड़क पर फुटपाथ अपने पांव बढ़ाने लगे।  मन ही मन सोच रहे थे कि चलो बड़ी पत्रिकाओं में छप नहीं सकते क्यों न एक लघु साहित्यक पत्रिका को अपनी कविताओं का दान कर हिन्दी दिवस मनायें।  वहां का संपादक छापे या नहीं उसकी मर्जी, अपना तो कर्तव्य करना ही चाहिये।
        वह मस्ती से फुटपाथ पर चले जा रहे थे। रास्ते में एक काईयों का सभागार पड़ता था। उन्होंने तय किया था कि उसकी तरफ देखेंगे भी नहीं। जब उस काईयां सभागार का दरवाजा आया तो उन्होंने अपना मुंह फेर लिया-अपनी नाकामी का सबसे यही श्रेष्ठ तरीका भी है कि जो पंसद न हो उसकी उपेक्षा कर दो।  अचानक अंदर से आवाज आई-‘‘ओए, फ्लाप कवि! तू यहां कैसे आ गया?
                        दीपक बापू को काटो तो खून नहीं। उन्होंने अपना मुंह गेट की तरफ किया तो देखा आलोचक महाराज खड़े थे।  एक दम सफेद चिकना चूड़ीदार पायजामा और कुर्ता पहने थे। गले में सोने की चेन और मुंह में पान था।  दीपक बापू हैरान रह गये। एक तो काईयों के  सभागार से चिढ़ तिस पर पुराने बैरी का मिलना उनके लिये हिन्दी दिवस के अवसर भारी अपशकुन जैसा था।
                        उन्होंने आलोचक महाराज से कहा-‘‘महाराज, हम यहां आ नहीं रहे। गुजर कर जा रहे हैं। आप यहां कैसे?
                        आलोचक महाराज ने पास जाकर एक जगह पान की पीक को थूका और फिर वापस आकर बोले-‘दिख नहीं रहा। यह इतना बड़ा बैनर टंगा है ‘हिन्दी दिवस पर महासम्मेलन’।  अब यह बताओ इस शहर में हमारे बिना कोई हिन्दी का कार्यक्रम हो सकता है। कोई वरिष्ठ लेखक या कवि ऐसा नहंी है जो हमारे बिना यहां किसी बड़े अखबार में अपना कविता छोड़िये क्षणिका  तक छपवा सके। फिर यह कैसे संभव है कि हिन्दी दिवस पर कोई हमारे बिना कार्यक्रम हो जाये।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘आपका कहना सही है। आपकी कृपा नहीं हुई तो हम यहां फ्लाप कवि माने जाते हैं।  बहुत प्रयास किया कि आप हमारी कवितायें को बड़े पत्र पत्रिकाओं में  प्रकाशित करने के लिये सिफारिश करें।  कितनी बार चाय पिलाई, पान खिलाया और कितनी बार तो ठंडा पेय भी आपकी सेवा में प्रस्तुत किया। छोटे मोटे पत्र और पत्रिकाओं में छपवाने के अलावा कोई अन्य सहायता नहीं दी।  बड़े प्रकाशन तो हमसे मुंहफेरे ही रहे।’
                        आलोचक महाराज बोले-‘सस्ती सेवा की वैसा ही मेवा मिला।  अगर दारु, मांस तथा खाने का इंतजाम किया होता तो तुम्हें कवि बना देते। अभी तुमने कहा कि तुम फ्लॉप कवि हो। किसी दूसरे से न कहना। हमारी रचनत्मक दृष्टि से तुम तो कवि ही नहीं हो।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज आप हिन्दी के बहुत बड़े ठेकेदार हैं। चलिये मान लेते हैं! वैसे आपका एक चेला आपको बदनाम कर रहा है कि आपने उसकी अनेक कवितायें चुराकर अपने नाम से छपवाईं।  उस दिन मिला था। हमने  उसे समझाया कि पानी में रहकर मगर से बैर नहीं किया जाता।’
                        आलोचक महाराज आंखें फाड़कर गुस्से में बोले-‘‘अच्छा! तू हमें ठेकदार और मगर बोलकर एक ही पंक्ति में दो झटके दे रहा है।  समझ ले आज से हमने तुझे बैन कर दिया। अब तो तू छोटे पत्र पत्रिकाओं में  भीअपनी कवितायें नहीं छपवा सकता। वैसे तू जा कहां रहा है?
                        दीपक बापू बोले-‘‘में अमुक त्रैमासिक के लिये दो कवितायें लेकर  जा रहा हूं।
                      आलोचक महाराज बोले-‘‘यहा कौनसी पत्रिका है। जरा पता देना! देखता हूं कैसे छापता है?’’
                        दीपक बापू ने जेब से दो कविताओं के साथ बीस का नोट निकाला और बोले-‘‘महाराज, आप नहीं रोक पायेंगे। देखों यह चाय के लिये बीस का नोट भी साथ ले जा रहा हूं।’’
                        आलोचक महाराज-‘‘अमुक पत्रिका का संपादक इतना सस्ता है? मैं उसकी खबर लेता हूं। इतने सस्ते में कवितायें छापेगा तो क्या खाक इज्जत कमायेंगा,’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘नहीं महाराज! उस पत्रिका के बाहर एक होटल वाला है। उसके यहां दो चाय पीऊंगा। वह खुश होकर दोनो कवितायें छपवा देगा। एक चाय पी तो एक छपवायेगा।  इसलिये उसकी दुकान  दो तीन घंटे बैठना पड़ेगा। अच्छा, हम चलते हैं।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘सुनो! तुम बीस रुपये का खर्च क्यों करते हो? यहां कार्यक्रम में बैठकर हमारी संख्या बढ़ाओ। में तुम्हें आधा कप चाय भी पिलाऊगा और एक उबाऊ नाम की एक नयी पत्रिका है उसमें एक या दो नहीं बल्कि तीन कवितायें छपवा दूंगा।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, हम अंदर आने को तैयार हैं मगर  आप हमसे मंच पर एक कविता सुनाने का मौका दें।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘यह संभव नहीं है! तुम निकल लो यहां से।  पता लगा कि तुम्हारी कविता कहीं लोगों को पंसद आ गयी और धोखे से कहीं तुम्हें महाकवि मान  बैठे तो मेरी साहित्यक दुकान ही बदं हो जायेगी। मेरे बहुत से मशहूर कवि चेले मुझसे नाराज हो जायेंगे। तुमने ही कहा था कि हम हिन्दी के ठेकेदार हैं। बरसों से यह काम कर रहे हैं। हम किसी ऐसे कवि या लेखक को पनपने का मौका नहीं दे सकते जो हमारे नियंत्रण से बाहर हो। तुम इसी तरह के आदमी हो।’’
                        दीपक बापू हंसकर बोले-‘‘ठीक है। चलता हूं।’’
                  आलोचक महाराज बोले-‘‘ऐसा करो। तुम दस श्रोंता ढूंढकर लाओ। मै तुम्हें एक क्षणिका सुनाने का अवसर दूंगा।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, आपके पास श्रोताओं की क्या कमी है? हमं देख रहे हैं, उधर आठ दस लोग खड़े हैं।  अंदर दूसरे लोग  भी कार्यक्रम प्रांरभ होने की प्रतीक्षा कर रहे होंगे।’’
                        आलोचक महाराज बोले-‘‘इनमें कोई श्रोता या दर्शक नहीं है।  इनमें कुछ कवि, लेखक और संपादक हैं तो एक विशिष्ट माननीय अतिथि हैं। श्रोता और दर्शकों का इंतजार हो रहा है। तुम ऐसा करो किसी भीड़ एकत्रित करने वाले आदमी को जानते हो तो  उससे सौ पचास श्रोता और दर्शक किराये पर ले आओ। हम सभी के लिये एक एक बिस्किट और आधी कप चाय का भी इंतजाम करेंगे।  तुम अगर यह काम कर सको तो तुम्हारे लिये एक नहीं दो क्षणिकायें सुनाने के अवसर का इंतजाम कर दूंगा। पूरी कविता का समय किसी हालत में नहीं दे सकता।’’
                        दीपक बापू ने कुछ सोचा और बोले-‘‘अच्छा अभी आता हूं।’’
                       दीपक बापू सोच रहे थे कि उन्होंने जो निश्चय किया है वह शायद आलोचक महाराज नहीं जानते। यह उनकी गलतफहमी थी।  दोनों जानते थे कि उस दिन अब उनकी मुलाकात नहीं होने वाली  थी।
                        दीपक बापू थोड़ा आगे बढ़े तो फंदेबाज मिल गया।  दीपक बापू उसे देखते ही बोले-‘‘पता नहीं, आज हिन्दी दिवस पर किसका मुंह देखकर हम घर से निकले थे। पहले आलोचक महाराज मिले।  उनसे पीछा छुड़कार अभी सांस भी नहीं ली कि  अब तुम मिल गये। यह दोनों अपशकुन हुए हैं और अब मुझे दूसरे मार्ग से घर वापस जाना चाहिये।’’
                        फंदेबाज बोला-‘‘आपने मेरी तुलना आलोचक महाराज जैसे आदमी से की हिन्दी दिवस के दिन आपकी इस टिप्पणी पर मुझे बहुत दुःख है।  उसने आपकी रचनाओं को कई जगह छपने नहीं दिया और मैं आपकी हाथ से रची गयी अनेक हास्य कविताओं का जन्मदाता हूं।  क्या मुझे पता नहीं है आप सड़ी गली पत्रिकाओं में मेरा नाम लेकर हास्य कवितायें लिखते हो। मैं तो इज्जत से आपको फ्लाप कवि कहता हूं जबकि दूसरे लोग फूहड़ कवि कहते हैं।  अच्छा आप जा कहां रहें हैं़?’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘अमुक पत्रिका के दफ्तर जा रहा हूं। वहां दो कवितायें देनी हैं।’’
                        फंदेबाज बोला-‘चलो मैं भी साथ चलता हूं। मैं अभी’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘चलो! एक से भले दो। वैसे भी वहां होटल में मुझे दो चाय अकेले पीनी पड़ती। अब तुम  मेरे साथ एक चाय पी लेना तो दूसरी पीने की झंझट से मैं बच जाऊंगा। उस होटल वाले ने चाय पीने की संख्या के हिसाब से कवितायें छपवाने का वादा किया है।’’
                        फंदेबाज बोला-‘ःवह होटल वाला तो बंद है।  मैं भी उसकी दुकान पर चाय पीने गया था पर पता लगा कि आज उसके पास दूध नहीं आया तो बंद करके चला गया।’’
                        दीपक बापू बोले-‘‘यही होना था! मैंने पहले आलोचक महाराज और फिर तुम्हें देखा तो मुझे शक हो गया  था कि आज कुछ अच्छा नहीं होने वाला।  चलो दूसरे मार्ग से घर चलते हैं।  अब वहां चलकर तुम्हें चाय पिलाते हैं। तुमसे बातचीत में हो सकता है कि कोई ऐसी हास्य कविता हाथ लग जाये जो हमें राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कर सके। उम्मीद पर आसमान टिका है और उसके नीचे खड़े हैं।  वह हम पर नहीं गिरेगा यह तय है।
                        दोनों वहां से चल पड़े।  दीपक बापू के हिन्दी दिवस की चिंदी चिंदी हो चुकी थी।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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2/22/08

वह रोकना चाहते बाहर से आगमन-साहित्यक कविता

अपने स्वाभिमान की रक्षा की बात
चाहते अपने लिए आजाद रात
ऊंचे दिखाते अरमान
अपने आप को समझें महान
पर खौफ के साए में ही जीते वह लोग
अपने इलाकों में आते पंछियों पर करते घात
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

अपने घर से बाहर जाते लोगों पर बस नहीं
जाकर तरक्की करेंगे कहीं
उनके नाम पर अपने घर में जश्न मनाएंगे
सबको अपने सामने चमकाएंगे
अपने घर का पलायन उन्हें सुहाता
पर घर पर किसी पंछी का चहचहाना उनको नहीं भाता
आदमी को पहचानने का दावा
देख नहीं पाते उसका मन
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

सच से परे जीते वह लोग
दिमाग में हैं लड़ने का रोग
जिस सर्वशक्तिमान ने बनायी
यह धरती और इंसान
वह भी नहीं कर पाता
अपने कब्जे में इंसान का मन
नहीं रोक सकता
इधर से पलायन और उधर से आगमन
सजाये बैठे हैं अपने लिए लोहे के महल
करते हैं भ्रम फैलाने की पहल
दुनिया के इस सच से परे
आदमी नहीं चलाता है उसे उसका मन
घूमती दुनिया और घड़ी कभी नहीं रुकती
कहीं उजड़ता तो कहीं बसता है चमन
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

1/10/08

समाज को साथ लिए बिना भारतीय धनपतियों का सम्मान विदेश में नहीं हो सकता

विश्व में भारतीय लोगों की आर्थिक शक्ति बढ़ रही है पर उनकी प्रतिष्ठा उस तरह नहीं बढ़ रही जैसी की पश्चिमी देशों के संपन्न लोगों की है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संगठनों पर उनका वैसा वर्चस्व नहीं है क्योंकि इसके लिए जिस प्रकार की शक्ति चाहिए वह उसे अर्जित नहीं कर पाए। वह अपने समाज पर नियंत्रण करने से प्राप्त होती है और ऐसा तभी संभव है जब आप अपनी धन-संपदा से कुछ हिस्सा उस पर बिना आर्थिक लाभ के चुकाएँ। अपने समाज के कुछ लोगों के साथ उसके संगठनों को भी शक्तिशाली बनाकर उन पर नियंत्रण करें।
जिन भारतीयों के विदेश में संपन्न होने की इस देश में कुछ लोग अक्सर चर्चा करते रहे हैं उन्होने वहाँ किसी नये स्त्रोतों का निर्माण नहीं किया है बल्कि वहीं मौजूद स्त्रोतों का इस्तेमाल कर आर्थिक शिखर पर पहुँचे हैं। कुछ ऐसे भी संपन्न लोग हैं जो देश में ही हैं पर उन्होने विदेश में भी आर्थिक शक्ति अर्जित की है। टीवी चैनलों और अन्य प्रचार माध्यमों मे उनकी चर्चा होती है पर सामान्य लोगों में उनकी कोई चर्चा नहीं होती। वजह! समाज के लिए वह ऐसे धनपति हैं जिनका समाज को उनके संपन्न ढाँचे से कोई आर्थिक और सामाजिक लाभ नहीं है क्योंकि उन्होने अपने समाज को विकसित करने के लिए कुछ करना तो दूर उसे सतत संचालन में भी कोई भूमिका नहीं दिखाई देती।
भारतीय आध्यात्म को समृद्ध करने वाले सभी महापुरुषों ने धन और वस्तुओं के दान की बहुत सरल व्याख्या की है। जिन महापुरुषों ने दान के महत्व को प्रतिपादित किया है उनके मन में यही बात रही है कि समाज में धनी लोग ग़रीबो और असहायों को सहायता प्रदान करें ताकि उसका सुचारू संचालन होता र्हे। यह अलग बात है कि कुछ लोगों ने अगले जन्म में लाभ मिलने के अंधविशवासों को जोड़कर लोगों को भ्रमित किया और लोग अब यह दान कर्मकांडों पर अपना धन कुपात्र लोगों को देकर नरक जाने से बचना चाहते हैं। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान बघारने वाले भी दान को इस तरह प्रचारित करते हैं कि जैसे उनको दिया गया दान ही असली पुण्य है जबकि श्रीगीता में सुपात्र को दिया गया दान भी फलीभूत बताया गया है और उसमें जन्म आदि की कोई शर्त नहीं है । आज के सन्दर्भ में इस दान को मैं निष्प्रयोजन विनियोजन के रूप में कहता हूँ। भारतीय पूंजीपति अगर कुछ क्षेत्रों में निष्प्रयोजन विनियोजन करते तो उनका नाम होता। कैसे?
१.वह ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ्ने के लिए आर्थिक सहायता दें जिनसे उसका नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करने की संभावना हो।
२।वह ऐसे संगठन और संस्थाओं को योगदान दें जो उनकी विश्व स्तर पर सामाजिक साख बनाने में मदद कर सकें।
३.वह अंतर्जाल पर अपने सर्च इंजन और वेब साईटों का निर्माण करें और उनको इतना व्यापक बनाने के लिए धन का विनिवेश करें ताकि उसमें उनेक समाज की भागीदारी बढ़े। इसके साथ अंतर्जाल पर सक्रिय पत्रिकाओं को मदद दें ताकि इसमें उनके योगदान की चर्चा यहाँ और बाहर दोनों जगह हो।


भारतीय धनपति इस बात से संतुष्ट हैं की उनके पास फिल्मी अभिनेताओं, सामाजिक और धार्मिक संगठनों के लोगों का जमाबडा है, टीवी चैनलों और अख़बारों में उनका प्रचार हो रहा है और यही सामाजिक प्रतिष्ठा का परिचायक तो ग़लतफहमी में हैं। समाज में इज़्ज़त तभी है जब कोई ग़रीब आदमी जिसे आपने धन नहीं दिया वह भी उनको याद करे। इस मामले मने कुछ ऐसे धनाढ्य लोगों के नाम लिए जा सकते हूँ जिन्हें सामान्य लोग आज भी सम्मान से देखते हैं। माननीय जे. आर. डी टाटा, घनश्याम दास बिरला और कैसेट किंग गुलशन कमार को आज भी लोग सम्मान से याद करते हैं टाटा ने जहाँ अस्पताल बनवाए और खेलों में भी अपना योगदान दिया, स्व. घनश्यादाम दास बिरला ने कई जगह धार्मिक तीर्थों पर धमर्शालाएँ और मंदिर बनवाए स्व. गुलशन कुमार ने कटरा में वैष्णोदेवी पर लंगर चलवाए। ऐसे कई लोग हैं जो वैष्णो देवी गये पर उनके लंगर में कुछ भी नहीं खाया फिर भी आज उनको याद करते हैं। हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बात से सहमत न हों पर यह एक वास्तविकता है कि साहूकार वही है जो समाज के लिए किसी न किसी तरह के लिए व्यय करता है।

हमारे आध्यात्म में दान को जो महत्व दिया गया है उसकी कुछ लोगों ने भिखारियों और कर्मकांडों तक ही सीमित रख कर जो व्याखाया की है उससे समाज को तो कोई फायदा नहीं हुआ उल्टे समाज और धर्म बदनाम हुआ सो अलग.
आप इन विदेशियों पर टिप्पणी तो कर सकते हैं पर बताईये किसी नयी आधुनिक चीज़ के निर्माण पर भारत के इन धनपतियों के नाम कोई सृजन किया हुआ कोई कार्य कहीं लिखा हुआ है? आज अंतर्जाल पर जितनी भी सुविधाएँ हैं वह अंग्रेजी वेब साईटों की वजह से हैं। जिस इंडिक या एनी टूल से हम लोग हिन्दी लिख रहे हैं उसको लाने वाली तो एक विदेशी वेब साईट गूगल ही है-अगर देश में कोई टूल बना होगा तो वह भी किसी उत्साही व्यक्ति ने अपना श्रम और समय खर्च कर बनाया होगा। ब्लॉग भी भी विदेशी वेब साईटों के द्वारा दिए गये हैं और अगर हम बात करते हैं कि हिन्दी के विकास की तो इसमें देश के धनपतियों का योगदान आज भी नगण्य है। वह हिन्दी फिल्मों में विनिवेश करते हुए अपने आसपास अभिनेता और अभिनेत्रियों का जमघट लगा सकते हैं जिनको परदे के बाहर हिन्दी बोलना भी नहीं आता हैं पर किसी ने भी अंतर्जाल पर भारतीय भाषाओं के लेखकों को लिखने के लिए क्या कोई सहायता दी हैं? आज जो लेखक इस पर लिख रहे हैं वह इंटरनेट पर अपने कनेक्शन पर पैसा खर्च कर रहे हैं और क्या कोई ऐसी टेलीफ़ोन कंपनी आगे नहीं आई जो इसके लिए उन्हें सुविधा दे। लिखना कोई आसान काम नहीं है पर जो अपने शौक की वजह से लिख रहे हैं तो एक उपभोक्ता की तरह ही न! अंतरजाल पर जो पत्रिकाएँ निकल रहीं है उसके संपादक निष्काम भाव से अकेले जूझ रहे हैं पर क्या किसी धनपति के दिमाग़ में यह आया की इन लोगों को सहायता दें। हाँ, बड़े अख़बार अपने तामझाम लेकर यहाँ आए हैं पर अंतर्जाल पर जो स्वतन्त्र रूप से लिख रहे हैं उसको देखकर मुझे नहीं लगता की वह किसी अख़बार से काम है, कई बार तो यहाँ ऐसे विचार पढ़ने को मिल जाते हैं लो अखबारों में नहीं मिलते।
आप क्रिकेट में ही देख लें। भारत की आर्थिक शक्ति पर ही पूरा विश्व का क्रिकेट चल रहा है और आईसीसीआआई के अंपायर पैनल में भारत के अंपायर ही नहीं हैं। कहते हैं की भारत के अंपायर स्तरीय नहीं हैं? देश के चयनकर्ता कहते हैं की देश में प्रतिभा नहीं है? क्या ऐसी बातों से देश का सम्मान विश्व में बढ़ सकता है: अगर भारत का आम आदमी पूरे विश्व के लिए एक आर्थिक दोहन किए जाने वाला उपभोक्ता है तो यहाँ के जो ख़ास लोग हैं-जिन पर देश के प्रचार माध्यम गर्व करते हुए थकते नहीं है- वह भी वहाँ कोई साहूकार नहीं माने जाते-उनके हैसियत वहाँ एक कुशल प्रबंधक से अधिक नहीं है। यहाँ उनके विज्ञापनों पर चलने वाले टीवी चैनल और अख़बार उनका कितना भी गुणगान कर लें पर समाज को साथ लेकर न चलने की वजह से विश्व की मीडिया में उन्हें कोई सम्मान नहीं है। भारत के कितने भी धनपति बाहर जाकर भले ही संपन्न हो जाये पर सम्मानीय हों पर पर वे अमेरिका के फ़ोर्ड और बिल गैट्स नहीं हो क्योंकि उनको अपने समाज का वैसा समर्थन प्राप्त नहीं है।

1/9/08

निष्काम और सहज भाव से लिखते जाओ, इंकलाब आते रहेंगे

लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर बिना लिखे भी कौनसा आ जाता है। इन्कलाब लाने वाले नारे तो ख़ूब लगाते हैं पर उसका स्वरूप क्या है और उसको लाने के लिए क्या योजना है कोई नहीं बता सकता। बस नारे लगते हैं 'इन्कलाब लाओ', 'इन्कलाब लाना है' और इन्कलाब लाकर रहेंगे। गरीबों,शोषितों और मज़दूरों के संरक्षकों के लिए यह एक पसंदीदा नारा रहा है। जहाँ तक ब्लोग से इंकलाब आने का सवाल है तो इन पर लोग लिख रहे हैं यही क्या इंकलाब है कि उनके पास एक स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के लिए एक साधन है. विदेशों में अगर कोई चीज बनाई जाती है तो उसका भारतीय अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं और ब्लोग का भी यही होने वाला है।

इन्कलाब का सीधा अर्थ लें तो उसे कह सकते हैं कि बदलाव, यह बदलाव दो प्रकार का होता है एक तो प्रकृति स्वाभाविक रुप से मानवीय स्वभाव के साथ-साथ समाज की आर्थिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रवृतियों में बदलाव लाती है-और उसकी एक सतत प्रक्रिया है जो अनवरत चलती है पर हमें पता भी नहीं लगती है। दूसरा लोग स्वयं अपने प्रयासों से परिवर्तन लाते हैं और इसके लिए कहीं सामूहिक आंदोलन तो कहीं इसके लिए चरणबद्ध अभियान चलाये जाते हैं। इनमें इन्कलाब या क्रान्ति शब्द सामूहिक राजनीतिक आंदोलन से ही जोडा जाता है और इनमें सोवियत संघ की लाल क्रान्ति और चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति सबसे ज्यादा मशहूर है और हमारे देश के कुछ लोग लंबे समय तक इस देश में ऐसा ही करने का सपना संजोये रहे भारतीय समाज की स्थितियाँ ऎसी रहीं कि उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। अब सोवियत संघ और चीन भी खुलेपन के तरफ बढ़ गये हैं। वहाँ इंकलाब लाया गया और अब वह उससे पीछे हट रहे हैं क्योंकि जोर जबरदस्ती लाया गया इंकलाब कभी भी सफल नहें होता और प्राकृति स्वयं परिवर्तन लाती हैं इसलिए अगर कहा जाता है कि ब्लोग इंकलाब नहीं ला सकते तो उसमें एक निराशाजनक अभिव्यक्ति लगती है.
लिखने से बदलाव नहीं आते यह एक सत्य बात है पर बिना लिखे भी बदलाव नहीं आते यह भी उतना ही सत्य है। यह जो लोग इस समय निज पत्रक (ब्लोग) लिखे रहे हैं उनकी विषय वस्तू से कोई बदलाव नही आएगा पर उनके लिखने की जो प्रक्रिया है और उसमें लोग जैसे-जैसे जुड़ते जायेंगे लोगों की प्रवृति में भी बदलाव आ सकता है इस संभावना को नकारना गलत होगा।हमारे देश में लिखना लोग पेशे की तरह बहुत कम लोग अपनाते हैं यह अलग विचारणीय बात है पर जो लोग लिखते हैं वह अपने भावों में सामजिक संदर्भों को व्यक्त जरूर करते हैं। निज पत्रक (ब्लोग)लेखकों की बढती संख्या इस बात का प्रमाण है को लोग अपनी अभिव्यक्ति के लिए इसे एक साधन के रुप में देख रहे हैं ।
महर्षि बाल्मीकि और वेदव्यास ने जब अपनी रचनायें प्रस्तुत की होंगीं उस समय समाज में किसी बदलाव के लिए प्रस्तुत नहीं की होंगीं पर उनकी रचनाओं का जो समाज पर प्रभाव है उसे हम आज भी देख सकते हैं , उन लोगों ने अपने कार्य और दायित्व को निष्काम और सहज भाव से निभाया तो उसका प्रभाव यह हुआ कि भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण आज भी हमारे ह्रदय के नायक हैं। हिंदी भाषा में भक्ति काल को स्वर्णकाल भी कहा जाता है क्योंकि उस समय कबीर, तुलसी,सूरदास, मीरा, रहीम और रसखान तथा अन्य कवियों ने जो रचनाएं इस देश को दीं वह केवल भक्ति से संबंधित नहीं है बल्कि जीवन के सत्यों को उदघाटित भी करती हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। आज जो आध्यात्म के मनीषी हैं वह अपने प्रवचनों में उनको सुनाकर लोगों पर प्रभाव डालते हैं। कुछ लोग उस काल को भक्ति आंदोलन भी कहते है । उस समय कोई इन मनीषियों ने एक झंडे तले इस आंदोलन को नहीं चलाया था पर उनकी रचनाओं ने ही उस काल को एक आंदोलन के रुप में स्थापित किया। इनके लिखने या कहने का उद्देश्य समाज में बदलाव लाना नहीं था पर वह आया और आज समाज में इनकी रचनाओं की चर्चा होती है।
भारत के इन मनीषियों जैसा कोई बन ही नहीं सकता, कम से कम पैसा लेकर लिखने वाला तो कतई नहीं। हाँ, इनकी रचनाओं को दुहराकर या उनके क्रम में अपनी रचना कर इस समाज में निरंतर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल हो सकता है, वैसे भी भारतीय समाज बहुत उदार माना जाता है जो परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए चलता है बशर्ते वह उसके अनुरूप हौं और उस पर थौपे न जाएँ । निज पत्रक (ब्लोग) वैसे ही हैं जैसे समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ ,टीवी चैनल और अन्य मध्यम । इसके लेखक भी वैसे ही हैं-इनके लिए कोई अलग से संज्ञा ढूँढने की आवश्यकता नहीं है ।कहने वाले तो यह भी कहते हैं संचार माध्यम भी कोई इन्कलाब या बदलाव नहीं ला सकते, और यकीनन निज पत्रक (ब्लोग) लेखकों पर भी यह विचार लागू होता है।
समाज में बदलाव की प्रक्रिया चलती रहती है और लिखना भी। किसी के लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर इसीलिये लिखना बंद भी तो नहीं किया जा सकता-आख़िर आत्म अभिव्यक्ति के लिए इससे बेहतर कौनसा साधन है। निष्काम और सहज भाव से लिखते रहो तो इन्कलाब या बदलाव भी आयेगा नहीं आया तो इस बात का अफ़सोस तो नहीं होगा कि हमने कोई प्रयास नहीं किया। अगर हमारे लिखे बग़ैर बदलाव आया तो हमें भी यह अफ़सोस होगा कि हमने लिखा क्यों नहीं । समाज में बदलाव के प्रक्रिया के साथ लिखना भी जारी रहना चाहिए। हमारे लिखने से समाज में इन्कलाब या बदलाव आये या नहीं हमारे अन्दर तो आ ही सकता है।

1/6/08

बाबा रामदेव को चुनौती देने से अच्छा है उनसे इलाज करवाएं

इंडियन मेडिकल एसोसियेशन I.M.A. ने योग गुरु रामदेव के इस बयान का विरोध किया है जिसमें उन्होने कहा था की डाक्टर लोगों की बीमारियों को बढाचढा का बताते हैं। ई।M।आ। ने बाबा को चुनौती भी दी है कि वह अस्पतालों में जाकर केंसर पीडितों का इलाज करके बताएं।

यहाँ पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं प्रतिदिन योग साधना करता हूँ पर बाबा रामदेव का मैं शिष्य नहीं हूँ पर वह जिस तरह लोगों में योग साधना और अन्य विषयों पर चेनता जागृत कर कर रहे हैं उसका समर्थक हूँ और कुछ ऐसे विषय भी हैं जिनसे मेरी सहमति नहीं होती पर इसके बावजूद मानता हूँ कि वह इस भारतीय समाज के लिए जो कर रहे हैं वह बहुत आवश्यक है। इसलिए जब मैंने I.M.A.आ।द्वारा उनकी आलोचना पढी तो मुझे लगा कि शायद वह उनकी bat समझ नहीं पाए। बाबा ने जो कहा है वही आम लोग भी कहते हैं और उन्होने तो केवल दोहराया भर है।

ऐसा नहीं है कि पहले लोग बीमार नहीं पड़ते थे पर अपने गली मोहल्लों में ही इलाज कराकर सही होते और आज भी लोग उनके पास जाते हैं। वजह यह है कि छोटी-मोटी बीमारी वही ठीक हो जाती है। अगर अधिक पढे-लिखे डाक्टर होते हैं तो तमाम तरह के टेस्ट कराने में लोगों का समय और पैसे बर्बाद कर देते हैं। हर बार बीमारी बड़ी होने का अंदेशा डाल देते हैं और आदमी उनके पास जाने से घबडाता है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह तो वैसे भी दिमागी तनाव से होते हैं और अगर किसी को अपनी इन बीमारियों के बारे में पता चले तो वैसे ही उसका मनोबल गिर जाता है। इधर डाक्टर दवाएं लिखते जाते और कहते भी जाते-''आप चिंता मत करो'।

मधुमेह के मरीज जो मरीज खाने के पहले और बाद गोली लेने के चिंता करते हैं और चिंता तो वैसे भी शरीर की दुश्मन मानी जाती है-ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि गोली क्या काम करेगी। चिकित्सा विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर बहुत लोचदार है और कई तरह के समायोजन स्वयं ही करता है अगर गोली लेने के बाद किसी को खाना पचा तो वह गोली लेने के कारण पचा या 'अब खाना पच जायेगा' इस चिता से मुक्त होने के कारण पचा कोई नहीं बता सकता।

यह सब दिमागी खेल है यह तो सभी मानते हैं। फिर I.M.A. के पास इस बात की क्या गारंटी है कि देश के सभी डाक्टर दूध के धुले हैं और अपने व्यवसाय के लिए बीमारी को बढाचढा कर नही बताते। इसलिए उन्हें बाबा रामदेव की आलोचना से पहले देश में जो डाक्टरों के बारे में धारणा व्याप्त है उस पर विचार करना चाहिए।
बाबा रामदेव को कैसर अस्पतालों में जाकर मरीजो को इलाज करने की चुनौती देने से पहले तो उनको इस बात का जवाब देना चाहिए कि क्या वह अपने अस्पतालों में आये मरीजों के अलावा कहीं किसी का इलाज करने जाते हैं?क्या उनको जब पता लगता है कि दूर-दराज के गावों में कोई कैसर का मरीज है तो वहाँ जाते हैं? वैसे भी जिसको डाक्टरों ने कैंसर बता दिया तो उसका मनोबल तो वैसे ही टूट जाता है और बिना मनोबल के योग साधना शुरू कोई नहीं कर सकता। अगर वह बाबा को यह कहकर चुनौती देते हैं कि 'वह तो योगी हैं और उन्हें जाना चाहिए' तो मैं उनको बता तूं जिस भारतीय दर्शन की ईजाद योग है वह यह भी कहता है कि अगर 'कमल जल से दूर है तो सूर्य भी उसको जीवन प्रदान नहीं कर सकता'। आदमी के जीवन के लिए यह मनोबल भी जल की तरह है और बाबा को चुनौती देने वाले अपने यहाँ से ही ऐसे मरीज जिनके बारे में डाक्टरों को पता लगता है कि उसे कैंसर है तो उसे बिना बताये ही बाबा रामदेव के शिविर में ले जाएं और अपनी दवाईयां देकर वहाँ योगासन के साथ उसका इलाज करें तब उनकी विश्वसनीयता बढेगी-जैसा कि खुद I.M.A.ने कहा भी है कि वह योग के प्रभाव को स्वीकार करती हैं।

1/4/08

मध्यम वर्ग अपने तनाव से मुक्त होना ही नहीं चाहता

समाज में जो अंदरूनी तनाव है उसे कोई सीधे व्यक्त नहीं कर रहा है। जिन लोगों के पास धन-संपदा वह उसकी रक्षा के लिए जूझ रहा है और जिसके पास नहीं है वह अपने अभावों को जीते हुए जैसे-तैसे जीवन निर्वाह करते हुए अपने सामाजिक दायित्यों पूरे कर लेता है। मुख्य समस्या तो सबसे अधिक मुखर मध्यम वर्ग के साथ है। वह अपने को गरीब कहलाना नहीं चाहता और अमीरों की जमात में बैठने की उसकी औकात नहीं है।अपमान वह झेलना नहीं चाहता और सम्मान उसे मिलता नहीं है। इस समस्या का हल यह है की मध्यम वर्ग के लोग एक-दूसरे के साथ जुडे और यह स्वीकार कर लें कि उनको एक दूसरे का सम्मान और सहयोग करने का अलावा और कोई चारा नहीं है।

यह कहना आसान है पर जब जमीन पर देखते हैं तो कई ऐसे धार्मिक, सामाजिक, भाषाई और जातीय विभाजन है जिसकी सीमाओं को तोड़ने का साहस इस वर्ग में नहीं है-सत्य तो यह है कि वह इनकी पहचान का आरोप है। हमारे देश का आध्यात्म कहता है की देह नश्वर है पर इसी देह का सबसे अधिक अभिमान माध्यम वर्ग में ही है। हमारे देश में जन्म, मृत्यु और विवाह के कर्मकांड इतने कठिन बना दिए गए हैं कि उनके निर्वहन में मध्यम वर्ग अपना पूरा जीवन दे देता है पर उससे मुक्त नहीं होना चाहता-अपने पास आर्थिक सामर्थ्य होने के बावजूद वह इन पर खर्च करता है।

मिटटी की इस देह के मिटने के बाद भी जो चला गया उसके सम्मान में तेरहवीं और श्राद्ध की परंपरा किस तर्क पर आधारित है यह पता नहीं। शादी के लायक बेटा है तो उस पर इतना अहंकार कि उसका वर्णन करना कठिन है और बेटी है तो मध्यम वर्ग का आदमी गरीब ही हो जाता है। पहले उसे पढाये-लिखाये और गृह कार्य में दक्ष बनाये और फिर उसके दहेज़ के लिए पैसा एकत्रित करे। दो देह में मौजूद आत्माओं के मिलन के लिए कितने गीत होते हैं पर उससे पहले जो सौदेबाजी होती हैं वह व्यापार से कम नहीं होती। उस समय लगता है कि काहे की संस्कृति और काहे के संस्कार? सब ढकोसला है।

जो परिवार मध्यम वर्ग का है और उसका लड़का रोजगारशुदा है तो वह दहेज़ के लिए किसी धनी परिवार के रिश्ते का इन्तजार करता है। मध्यम वर्गीय पिता के लिए अपने वर्ग के ही किसी लडकी के पिता का बोझ हल्का करने के इरादे से दहेज़ की दर काम करने का उसका इरादा नहीं होता। इस तरह जिस मध्यम वर्ग को समाज का मजबूत आधार माना जाता है वही अपनी हालतों से जूझ रहा है।

यह आश्चर्य समाज में जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र तथा अन्य आधारों पर विभाजन हुआ है उनका नेतृत्व भले ही उसके उच्च वर्ग के लोगों के पास रहता है पर उसका अस्तित्व बनाए रखने में माध्यम वर्ग की भूमिका बहुत होती है, पर अब परंपराओं और रूढियों को बोझ वह जबरन ढो रहा है, इस आशा में कि वह इसकी आड़ में अपनी प्रतिष्ठा बढे और उसका उसे आर्थिक लाभ हो-और वह भी पुत्र का विवाह में धनी परिवार में हो यही संभावना होती है। कुछ लोगों को शायद होता भी हो पर उसका कोई स्थाई नहीं होता, पर इसके बावजूद माध्यम वर्ग अपने दिमागी तनाव से मुक्त नहीं होना चाहता।

12/31/07

ब्लोग पर लिखते एक वर्ष हो गया

आज ईसवी संवत २००७ समाप्त हो रहा है और कल से २००८ प्रारंभ हो रहा है। इस अवसर मैंने लोगों को औपचारिक रूप से बधाई देने का सिलसिला कब शुरू किया मुझे याद नहीं पर इतना जरूर है कि कोई अगर मुझे इस अवसर पर बधाई देता है तो उसे अवश्य देता हूँ पर अपनी तरफ से कभी पहल नहीं करता। वजह मुझे अजीब लगता है और आज भी जिन लोगों से मेरे संपर्क हैं वह उनमें बहुत कम ऐसे हैं जिनसे इस तरह की औपचारिकता पूरी करता हूँ।

वैसे आज मुझे एक वर्ष पूरा हो गया जो मैंने अपना ब्लोग बनाने के प्रयास शुरू किये थे। मुझे कुछ पता नहीं था कि क्या करना है? कोई तकनीकी जानकारी देने वाला नहीं था, और अभिव्यक्ति पत्रिका पर जाकर जब नारद पर देखता हो सोचता था कि कैसे इसे बनाया जाये। बहुत समय तक तो मैं यही समझता था कि अभिव्यक्ति वाले ही इस पर अपनी रचना रखते होंगे। मैंने उनको अपनी एक रचना "पेन मांगने में शर्म नहीं आती" भेजी और सोचा वह छाप देंगे। इधर अक्षरधाम से ब्लोग बनाने का प्रयास किया तो भी समझ में नहीं आया। वहाँ से होता वर्डप्रेस पर गया। फिर ब्लागस्पाट।कॉम पर आया। दोनों पर पहला ब्लोग एक ही दिन यानी ३१ दिसंबर २००६ को बनाया। और उस पर अपने कृतिदेव फॉण्ट में लिख कर रख दी। फिर पलट कर नहीं देखा। वर्डप्रेस पर अपना ब्लोग रेटिंग में न देखकर निराशा होती थी, फिर पता नहीं उसे कैसे हिन्दी में ले गया। तब थोडा चलता दिखा, पर काम से काम दो माह बाद।
नारद पर जाने के प्रयास सफल नहीं हो रहे थे सो अपनी अलख बैठकर जगह रहे थे। वहाँ की पोस्टें देखते रहते फिर वर्डप्रेस। पर भी उनको देखते। कोई परवाह नहीं थी पर रेटिंग में जब वह ऊंचे जातीं तो सोचता था कि आगे हम भी इस स्थिति में आयेंगे पर समय लगेगा।

४ अप्रैल २००७ पर नारद पर ब्लोग पंजीकृत हुआ तो फिर चल पड़े इस राह पर। पिछले एक वर्ष में मैंने बहुत कुछ परिवर्तन देखे हैं। अपने प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि मैं अपनी मूल स्वरूप में नहीं हूँ। मैंने बहुत कम हाथ से लिखकर यहाँ टाईप किया है अधिकतर सीधे ही इस पर लिखा है। अगर सादा हिन्दी फॉण्ट में लिखूं तो शायद प्रभावी हो सकता हूँ पर अभी उसकी सुविधा नहीं है इसलिए खुद को कामचलाऊ मानता हूँ। मैं आक्रामक लिखने वाला लेखक हूँ और इस पर लगता है कि अपनी पोस्ट टाल रहा हूँ। इतना जरूर है कि उसके कुछ फायदे भी हुए हैं। अगर कोई मुझसे कोई कहे कि हाथ से कविता लिखो तो मैं लिख नहीं पाऊंगा जितना मुझे इस पर आता है। खासतौर से हास्य कवितायेँ। अगर मुझसे सादा हिन्दी फॉण्ट में कहें तो नहीं लिखूंगा-जितना मजा मुझे इस पर आता है। जब मैं कंप्यूटर पर आता हूँ तो बस यही सोचता हूँ कि इस पर गद्य रचनाएं तो लिखने में बहुत समय लगता है और प्रभावी भी नहीं होतीं तो क्यों न हास्य कविता लिखी जाये।

बहरहाल ब्लोग पर आये आज एक वर्ष हो गया और अब मेरे लिए यह विश्लेषण करने का वक्त आ गया है कि कहाँ खडा हूँ। मेरी उपलब्धि अगर है तो वह यह मुझसे यहाँ बहुत अच्छे दोस्त मिले हैं और अब उनका प्यार मुझसे लिखवा रहा है। मेरे सामने श्रीश शर्मा और अफलातून जी के नववर्ष के बधाई सन्देश रखे हुए हैं और मुझे अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है पर इन दोनों महानुभावों ने किस तरह मुझे प्रेरित किया यह बताना जरूरी है। श्रीश जी का फोटों मैंने अभिव्यक्ति पर कंप्यूटर पर बैठे देखा था और उसमें ब्लोग बनाने से संबंधित जानकारी थी और मैंने उसे पढा था पर मेरे समझ में कुछ नहीं आया पर मैंने तय किया कि इस शख्स को चुनौती देनी है। मैं चल पड़ा जब इस राह पर तो ऐसा लगा रहा था कि कुछ जम नहीं रहा है। उसके बाद अफलातून जी की एक पोस्ट देखी उनकी बातों से से सहमत नहीं हुआ और जोरदार पोस्ट लिख डाली। उसके बाद अफलातून जी की ही एक पोस्ट ने हास्य कविता लिखने को प्रेरित किया। उनकी पोस्टों से तीन चार बार प्रेरित होकर हास्य कविता लिखी-और इस तरह हास्य कविता लिखना शुरू किया तो वह एक आदत बन गया।उन पर समीक्षा लिखने का कई बार मन आता है पर लिख नहीं पाता। उसका शीर्षक लिखने का दिमाग में रहता है ''लिखते हैं संजीदा नाम अफलातून'। बहरहाल अब सोचता हूँ कि अब कुछ स्वयं भी संजीदा होकर लिखें।

12/29/07

मनुस्मृति:भोजन के समय दाहिना हाथ ऊपर उठाएं

मनु स्मृति के अनुसार

  • आग को किसी तरह के सामान के नीचे नहीं रखना चाहिए और न उसे लांघना चाहिए, पैरों को आग पर नहीं रखना चाहिऐ और न ही कोई ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे जीव हिंसा का भय हो।
  • संध्याकाळ में भोजन भक्षण, यात्रा और विश्राम नहीं करना चाहिऐ, धरती पर लकीर नहीं खींचनी चाहिए और अपने गले से पहनी हुई माला को नहीं उतारना चाहिए।
  • जल में मल-मूत्र, रक्त तथा विष आदि नहीं बहाना चाहिए, इससे पानी प्रदूषित हो जाता है, पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
  • जिस घर में कोई न हो वहाँ अकेले नहीं सोना चाहिऐ, सोये व्यक्ति को जगाना नहीं चाहिऐ रजस्वला स्त्री से बातचीत नहीं करना चाहिऐ। बिना आमंत्रण के किसी के यज्ञ में शामिल नहीं होना चाहिऐ।
  • अग्निहोत्र में, गायों के निवास स्थान में, विद्वानों के समीप, वेद-शास्त्र आदि पड़ते समय और भोजन के समय अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाएं(खाते समय बीच में उठाते रहें)।

12/27/07

बेनजीर की हत्या कर दी गयी

टीवी चैनल आज तक पर प्रसारित खबर में बताया गया है कि पाकिस्तान की भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गयी है। बताया जाता है वह जब एक जलसे को संबोधित कर रहीं थी तब एक आत्मघाती हमलावर ने वहाँ विस्फोट किया उसमें लोग मारे गए। उसके बाद जब बेनजीर वहाँ से जा रही थी तब उन पर गोलिया चलाईं गयीं। उन्हें अस्पताल पहुचाया गया। अभी जो खबर दिखाई जा रही है उसमें उनकी मौत की पुष्टि की गयी है।

12/26/07

पोस्ट भले फटीचर लगे पर शीर्षक फड़कता लगाएं

किसी भी रचना की मुख्य पहचान उसका शीर्षक होता है। अगर कभी कोई शीर्षक आकर्षक होता है तो लोग उसे बडे चाव से पढ़ते हैं और कही वह प्रभावपूर्ण नहीं है तो लोग उसे नजरंदाज कर जाते हैं। हालांकि इसमें पढ़ने वाले का दोष नहीं होता क्योंकि हो सकता है उसे वह विषय ही पसंद न हो दूसरा विषय पसंद हो पर शीर्षक से उस पर प्रभाव न डाला हो. वैसे भी हम जब अखबार या पत्रिका देखते हैं तो शीर्षक से ही तय करते हैं कि उसे पढ़ें या नहीं।

मैने एक ब्लोग पर एक नाराजगी भरी पोस्ट देखी थी जिसमें चार ब्लोगरों के नाम शीर्षक में लिखकर नीचे इस बात पर नाराजगी व्यक्त की गयी थी कि लोग शीर्षक देखकर कोई पोस्ट पढ़ते हैं। इसलिए प्रसिद्ध ब्लोगरों के नाम दिये गये हैं ताकि ब्लोगर लोग अपनी गलती महसूस करें। जैसा की अनुमान था और कई ब्लोगरों ने उसे खोला और वहां कुछ न देखकर अपना बहुत गुस्सा कमेंट के रूप में दिखाया। उत्सुक्तवश मैने भी वह पोस्ट खोली और उससे उपजी निराशा को पी गया। इस तरह पाठकों की परीक्षा लेना मुझे भी बहुत खला क्योंकि उस ब्लोगर ने यह नहीं सोचा ही ब्लोग पर कोई ऐसा पाठक भी हो सकता है और जो ब्लोगर नहीं है और उसे कुछ समझ नहीं आयेगा। जो ब्लोगर मशहूर हैं उसे केवल ब्लोग लिखने वाले ही जानते हैं न कि आम पाठक।

जो लोग इस तरह की शिकायतें करते हैं वह मानव मन की कमजोरियों को नहीं जानते जबकि उसके गुण और दुर्गुण दोनों का शिकार खुद भी रहते हैं। ब्लोग, पत्रिका, या समाचार पत्र जहां भी कोई आदमी पढता है शीर्षक देखकर ही पढता है। एक अच्छे लेखक को यह पता होता है इसलिए अपने शीर्षकों में जो आकर्षण का भाव भरते हैं वही हिट हो पाते हैं। शीर्षक देखकर ही लोग समझ पाते हैं। अपने संक्षिप्त पत्रकारिता अनुभव से मैंने यही सखा है कि शीर्षक किसी भी गद्य या पद्य की वास्तविक पहचान होता है, उस काम को छोडे बरसों होने के बावजूद मेरा उस समय का अभ्यास अब ब्लोग पर काम आता है। इसलिए शीर्षक देखकर आदमी पढ़ते हैं तो उसमें उनका दोष मुझे नहीं दिखाई देता-क्योंकि यह मानवीय स्वभाव है, अगर पाठक नहीं पढ़ रहे हैं तो इसका मतलब दोष तो मैं लेखक का ही मानता हूं। वैसे भी शीर्षक तो पोस्ट की पहचान है और उसे यह पता लगता है की उसका विषय क्या है? और हो सकता है की वह विषय किसी को पसंद आता हो किसी को नहीं.

हालांकि मैं कई बार ऐसी रचनाएँ- जो की कवितायेँ होतीं है- अनाकर्षक शीर्षक से डाल जाता हूं जिनके बारे में मेरा विचार यह होता है कि इसे आकर्षक शीर्षक डालकर अधिक लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना ठीक नहीं होगा, यह अलग बात है कि मुझे जो नियमित रूप से पढ़ते हैं वह मुझे जानने लगे हैं और वह मेरी कोई पोस्ट नहीं छोड़ते। एक मित्र ने लिखा भी था कि आप कभी-कभी ऐसा हल्का शीर्षक क्यों लगाते हैं कि अधिक लोग न पढ़ें।

मैं बहुत लिखता हूं इसलिए कुछ हल्की रचनाएँ भी निकल जाती हैं-ऐसा मुझे लगता है और नहीं चाह्ता कि पाठकों से अन्याय करूं पर जो कम लिखते हैं उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं रखना चाहिये कि पोस्ट कैसी है और उन्हें फड़कते शीर्षक ही लगाने का प्रयास करना चाहिऐ ताकि लोग उसे अधिक से अधिक पढ़ें, इसमें कोई बुराई नहीं है पर कुछ न कुछ पढ़ने योग्य होना चाहिये न कि केवल परीक्षा लेना चाहिये।

अभी दो भारत में ही रहने वाले ब्लोगरों से शीर्षक में ही पूछा गया था कि क्या अफगानिस्तान में रहते हैं। उस ब्लोगर ने लिखा था कि लोगों का ध्यान आकर्षित हो इसलिए ऐसा लिखा है ताकि दूसरे ब्लोगर भी अपनी गलती सुधार लें। मैं उस ब्लोगर की तारीफ करूंगा कि उसने सही शीर्षक लगाया था ताकि उसे अधिक ब्लोगर पढ़ें। उसकी पूरी जानकारी काम की थी। उसके बाद मैने अपने एक ब्लोग को देखा तो वह भी अफगानिस्तान में बसा दिख रहा था और उसे सही किया। पोस्ट छोटी थी पर काम की थी-और जैसा कि मैं हमेशा कह्ता हूं कि अच्छी या बुरी रचना का निर्णय पाठक पर ही छोड़ देना चाहिये। इसलिए अपनी पोस्ट भले ही फटीचर लगे पर शीर्षक तो फड़कता लगाना चाहिये पर पाठकों की परीक्षा लेने का प्रयास नहीं करना चाहिये। एक बार अगर किसी के मन में यह बात आ गयी कि उसे मूर्ख बनाया गया है तो वह फिर आपकी पोस्ट की तरफ देखेगा भी नहीं।

12/23/07

शांति लाने का दावा

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा

12/21/07

उदासी का साया

मन से मनुष्य कहलाया
चलता है उसी के इशारों पर
अन्दर बैठे अहंकार ने
स्वयं ही चलने का अहसास कराया
कह गए बडे-बडे सिद्ध
अपने मन को पहचानो
कभी नाचता है
कभी भागता है
कभी भक्ति भी चाहता है
स्वयं मनस्वी होकर चलो
यही सभी ने समझाया

पर आदमी नहीं समझता
अपनी बुद्धि और अंहकारवश
दूसरों में तलाशता अपने लिए अक्ल
माया के सिंहासन पर बैठे
बुतों के इर्दगिर्द देकर परिक्रमा देकर
बहुत सुकून अनुभव करता
तन की खुशी को ही मन की समझता
इसलिए हांक कर ले जाते है
इस ज़माने के उसे नये खैरख्वाह
रुपहले परदे पर देखे दृश्य को
असली समझता
नाम के मनुष्य बहुत हैं पर
सबका मन मुरझाया
जब तक चलते हैं दृश्य
गूंजता हैं कानों में भयानक शोर
तब तक चलता है
अकेले में छा जाता है उस पर उदासी का साया
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12/20/07

सुबह-चलते चलते

कड़कडाती सर्दी की सुबह में
सोने की तरह धूप बिखेरता सूर्य
दृदय को शीतलता देता है
तेज चलती पवन से काँपने लगता है बदन
उससे बचने के लिए करते जतन
प्रात:काल में
जब करते हैं कपाल भारती प्राणायाम
और सूर्य नमस्कार के आसन
तब उगने से पहले सूर्य भेज देता अपनी किरण

जब बिस्तर में ही सर्दी से काँप रहा हो बदन
उठने का नहीं करता मन
योग साधना है वह हथियार जब
हम लड़ सकते हैं आलस्य से
वरना तो कहीं नरक नहीं है
वहीं है जहाँ हम रह रहे हैं
सुख कोई पेड पर लटकी वस्तु नहीं
जो हमारे हाथ में आ जाये
मन की अनुभूति है
हम तब तक नहीं खुश रह
सकते जब तन स्वयं न करें जतन

चाणक्य ने कहा है-अपने निरंतर अभ्यास से मनुष्य अनेक गुण प्राप्त कर लेता है पर कुछ गुण अभ्यास से नहीं प्राप्त होते हैं क्योंकि वह स्वाभाविक होते हैं-जैसे दानशीलता, मधुर बोलना, वीरता और विद्वता।

12/19/07

अंतर्जाल पर भी मनोरंजन की खोज

आज एक अख़बार में गूगल सर्च इंजन पर भारतीय यूजर्स द्वारा की गयी खोजबीन की जानकारी छपी है और इसमें राजनेता, खिलाडी, फिल्मी सितारे तथा फिल्मों की खोज अधिक की गयी हैं। इसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम सबसे ऊपर है यह एक संतोष का विषय है। हालांकि केवल इन्हीं विषयों को खोजा गया है यह तो कहीं नहीं लिखा पर इतना तय है कि इन्हें अधिक खोजा गया होगा-ऐसा लगता है।

अगर आंकडों के अलावा धरातल पर वास्तविकता को देखा जाये तो कंप्यूटर पर अंतर्जाल पर शौक से काम करने वालों के संख्या अधिक है और उन्हें चाहिए केवल मनोरंजन। हालांकि इसके लिए टीवी है पर उसमें सब अपनी इच्छा नहीं चल सकती और इंटरनेट पर अपनी मर्जी से अपना विषय देखा जा सकता है, यही कारण है कि मनोरंजन के शौकीन अब इसका इस्तेमाल करना चाहते हैं। मैं अनुमान से कह सकता हूँ कि अधिकतर यूजर्स फिल्मों और अभिनेताओं में अधिक रूचि ले रहे हैं। उसके बाद कुछ लोग ऐसे-वैसे सीन देखने के लिए लालायित रहते हैं। चेट करने वालों की संख्या भी है शायद वह उतनी नहीं है कि गूगल के आंकडों में प्रचार योग्य हो ।

कल ही मैं एक ब्लोग देख रहा था जिसमें टीवी चैनलों के दर्शकों की संख्या कम होते जाने का जिक्र भी था। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि वह जिस पेटर्न पर चल रहे उसमें उनका खुद के रचनात्मक योगदान का अभाव है और इसी कारण उसके दर्शक अब इंटरनेट यूजर्स बनते जा रहे हैं। जब यहाँ अपने मन के अनुसार मनोरंजन उपलब्ध है तो फिर क्यों जानकार दर्शक उनके कार्यक्रम का इन्तजार करेगा।

अख़बार में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर यह तो कतई नहीं कहा जा सकता कि छात्र या नवयुवक इसका इस्तेमाल अपने ज्ञान और विज्ञान के विषयों से संबधित सामग्री देखने के लिए कर रहे हैं। साहित्य का स्थान तो बहुत बाद में आता है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि शिक्षा और तकनीकी भले ही आधुनिक हो पर अपना समाज विवेक के आधार पर वहीं खडा है जहाँ उसके आने से पहले था। आधुनिकता पहनावे और साधनों में तो आयी है पर मूल प्रवृति में सुधार नहीं है। वही फिल्में, अभिनेता और म्यूजिक कंप्यूटर भी लोगों के प्रिय विषय हैं जैसे पहले था। सही कहते हैं कि साक्षर होने सब शिक्षित नहीं हो जाते।

12/14/07

अपने बुलाए दर्द को झेलते हैं

जब दिल में प्यार नहीं होगा
तब जुबान से निकले शब्दों में
कैसे झलकेगा
जब खून में नहीं हैं हमदर्दी तो
सुर में दर्द कैसे लगेगा
यूं ही हवा में बाते करते हुए
बीत गए बरसों
अब क्या उम्मीदों का
आसरा लगेगा
अपने जजबातों से ही जो खेलते हैं

आंखों से खूबसूरत नजारे देखने की बजाय
खून से रंगे स्याह पन्नों को
पढ़ने में उनको ठेलते हैं

हादसों को देखने-सुनाने की चाह में
आदमी भूल गया है यह बात
जैसे देखेंगे ख्वाब
वैसे ही नजारे सामने आयेंगे
फिर भी दूसरों के दर्द को देखकर
हमदर्दी की बजाय
यही होती है ख्वाहिश कि
किसी को दर्द पैदा हो
तो उसे हम सहलाएं
लोग इस जहाँ में अपने दिल से
बुलाए दर्द को ही झेलते हैं

12/12/07

जो ब्लोगर थक रहें हों वह योग साधना शुरू करें

अगर विश्व के वर्तमान हालातों पर दृष्टि डालें तो देखेंगे कई मामलों के हल शांति से हो सकते हैं और लोग आपस में सदभाव के साथ रह सकते हैं पर ऐसा हो नहीं क्योंकि अंहकार के कारण लोग के नहीं हो पाते और उनकी फ़ुट का लाभ स्वार्थी तत्व उठाते हैं। कई बार लगता है कि इतनी अशांति बेवजह है और लोग उसमें लिप्त होकर सुख का अनुभव करते हैं। अगर लोगों की रूचि आध्यात्म में हो तो शायद इससे बचा जा सकता है यही कारण है भारतीय योग सब जगह लोकप्रिय हो रहा है।

विश्व में भारतीय योग विद्या के निरंतर लोकप्रिय होने का ऐक कारण यह भी है कि मानव जीवन धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होता जा रहा है और ऎसी वस्तुओं का उपयोग बढ़ता जा रहा है जो हमारे शरीर के लिए तकलीफ देह होतीं है। मैं यहाँ किसी अन्य की बात न करते हुए सीधे कंप्यूटर की बात करूंगा, क्योंकि इसकी वजह से जो भारी शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचती है उसकी चर्चा विशेषज्ञ अक्सर करते हैं। इधर मैं कुछ दिनों से ब्लोग लेखकों की निराशाजनक अभिव्यक्ति को भी देख रहा हू। इसलिये मैंने सोचा कि आज यह बात स्पष्ट कर दूं कि अच्छा या बुरा जैसे भी लिख पा रहा हू उसका कारण मेरे द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली योग साधना से मिलने वाली शारीरिक और मानसिक ऊर्जा ही है। हालांकि ब्लोग लेखन की वजह से मेरे कुछ आसन और अवधि कम जरूर हुई है पर ऐक बात साफ देखता हूँ कि इस कम अवधि में भी प्रतिदिन अपने उत्पन्न होने वाले विकारों को निकालने में सफल हो जाता हूँ। जब कंप्यूटर पर आता हूँ तो ऐसा लगता ही नहीं है कि कल मैंने इस पर कुछ काम किया था। ऐसा नहीं है कि मुझे कोई स्मृति दोष है जो भूल जाता हूँ ।
मेरा आशय यह है कि जो थकावट मुझे कल प्राप्त हुई थी उसे भूल चुका होता हूँ और आप में कई लोग होंगे जिन्हे याद होगा कि कल कितना थक गए होंगे, इसका मतलब है कि अब आपको योग साधना शुरू कर देना चाहिऐ। मनुष्य को प्रतिदिन मानसिक और शारीरिक रुप से ताजगी देने के लिए इसके अलावा और भी कोई उपाय है इस पर मैं यकीन नहीं करता। पहले मैं यहाँ स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई योग शिक्षक नहीं हूँ और यह योग साधना पिछले साढ़े चार वर्षों से कर रहा हूँ और मेरे गुरू ऐक सरकारी कर्मचारी हैं और बाकायदा पेंट शर्ट पहनकर घूमने वाले आदमी हैं। मतलब यह जरूरी नहीं है कि धार्मिक भगवा धारी संत ही योग साधना सिखाते हैं बल्कि कुछ लोग ऐसे हैं भी हैं जो सामान्य जीवन में रहते हुए भी योग साधना सिखा रहे हैं।

हमारे देश में इस समय बाबा रामदेव ने इसका बहुत प्रचार किया है और उनकी वजह से भारतीय योग को विश्व में बहुत प्रसिद्धि भी मिली है। उनके अलावा भी कई संत हैं जो इसमे अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं, इनमे श्री लाल जीं महाराज भी हैं। इसके अलावा भारतीय योग संस्थान भी इसमे बहुत सक्रिय है और मैंने उनके शिविर में ही योग साधना करना सीखा था। इसकी शाखाए देश में कई स्थानों पर लगतीं है और जो इस लेख को पढ़कर योग साधना करने के इच्छुक हौं वह अगर पता करेंगे तो उन्हें अपने आसपास इससे संबंधित शिविर जरूर मिल जायेंगे। हम टीवी पर संत बाबा रामदेव और श्री लाल महाराज को बहुत समय तक योग साधना कराते हुए देखते हैं तो यह वहम हो जाता है कि सारे आसन कर ही हम अपनी शारीरिक व्याधियों से छुटकारा पा सकते हैं, और दो घंटे का कार्यक्रम करना हमें मुशिकल लगता है। दूसरा यह भी लगता है कि योग केवल व्याधियों से छुटकारा पाने के लिए है और हम तो ठीकठाक हैं फिर क्यों करें। यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि ऐक तो हम सुबह ज्यादा नहीं तो पन्द्रह मिनट ही प्राणायाम करें तो भी हमें बहुत राहत मिलती है। दूसरा यह कि यह कि योग साधना से शरीर की व्याधिया दूर होती हैं यह ऐक छोटी बात है। वास्तविकता तो यह है जीवन में प्रसन्न रहने का इसके अलावा अन्य कोइ उपाय मैं तो नहीं देखता। यह तो जीवन जीने की कला है। इस ब्लोग पर मैं इसी विषय पर आगे लिखूंगा पर अभी यहाँ बताना जरूरी हैं योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार दूर होते हैं।
सुबह उठकर खुली जगह पर कुछ बिछाकर उस पर बैठ जाना चाहिऐ और धीरे-धीरे पेट को पिचकना चाहिऐ और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करना चाहिऐ। जिन लोगों को उच्च रक्तचाप या अन्य कोई बिमारी न हो तो इसी दौरान अन्दर और बाहर कुछ क्षणों के लिए सांस रोक सकते हैं तो यही नाडी शोधन प्राणायाम कहलाता है। जब हम थोडा पेट पिच्कयायेंगे तो ऐसा लगेगा कि हमारे शरीर में रक्तप्रवाह तेज हो रहा है और कुछ देर में आंखों को सुख की अनुभूति होने लगेगी । कंप्यूटर में काम करते हुए हमारे मस्तिष्क और आंखों बहुत कष्ट उठाना पडता है, और केवल निद्रा से उसे राहत नहीं मिल सकती और ना ही सुबह घूमने से कोइ अधिक लाभ हो पाता है। इसके अलावा कम करते हुए कुछ देर ध्यान लगाएं तो भी थकावट दूर हो जाएगी। इस ब्लोग पर मैं आगे भी लिखने का प्रयास करूंगा। इस समय तो बस यही कहना चाहूँगा कि अगर आप कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो खुश रहने के लिए योग साधना और ध्यान अवश्य करो -इससे ज्यादा और जल्द लाभ होगा। जो ब्लोगर अपने को थका हुआ अनुभव कर रहे है वह इसे अपनाएं-अधिक नहीं तो सुबह १५ मिनट से आधा घंटे अनुलोम-विलोम प्राणायाम अवश्य करें । इस पर एक लेख कल इसी ब्लोग पर लिखूंगा।
नोट-भारतीय योग संस्थान द्वारा प्रकशित पत्रिका 'योग मंजरी' के ताजा अंक में इस विषय पर मेरा एक लेख 'दीपक राज के नाम से प्रकाशित हुआ है जिन सज्जनों को उपलब्ध हो वह इसे अवश्य पढें।

12/9/07

चीनी अपने देश के विकास के दावे खुद क्यों नहीं करते

चीन के विकास के दावे विश्व के बाहर के लोग अधिक करते हैं पर कभी चीन के लोगों को इस संबंध में कुछ अधिक दावे नहीं करते देखा गया। सवाल है क्या उसके यहाँ भी विकास के दावे वैसे ही हैं जैसे यहाँ किये जाते हैं। उसके चंद शहरों के कुछ चुनींदा इलाकों के फोटो भारतीय मीडिया में दिखते हैं तो उसके यहाँ उपभोक्ता वस्तुओं के प्रयोग की संख्या बताकर कहा जाता है भारत में अभी बहुत कम है जैसे-कंप्यूटर,टीवी, मोटर कार,फ्रिज,टीवी और अन्य प्रकार की उपभोक्ता वस्तुएं।

चीन के बारे में मैंने एक पश्चिमी विशेषज्ञ की टिप्पणी पढी थी कि वह एक अंधेरी गुफा की तरह हैं वहाँ अन्दर क्या है किसी को नहीं पता। भारत के कुछ आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन का विकास भारत के लिए कभी एक माडल नहीं हो सकता क्योंकि वहाँ बोलने की आजादी नहीं है। उनके इस तर्क में दम है क्योंकि कई मामलों में हमसे आगे है वह है छल कपट और दूसरों की जमीन हड़पने के मामले में। एक बार मैं तिब्बतियों के यहाँ स्वेटर लेने गया था वहाँ वह अपने देश का नक्शा लगाकर रखते हैं ताकि लोगों को पता लगे कि वह अपने साथ एक आंदोलन चला रहे हैं। मैंने उसमें नक्शा देखा तो दंग रह गया-अगर चीन से पूरा तिब्बत हटा लिया जाये तो उसका क्षेत्रफल भारत से भी छोटा रह जायेगा। चलिए मान लें कि उसमें कुछ अतिशयोक्ति हो सकती है पर फिर भी यह सच है कि हिमालय से लगा तिब्बत उपजाऊ और खनिज संपदा से सुसज्जित चीन का हिस्सा नहीं है और मैंने कुछ ऐसे पुराने नक्शे भी देखे हैं जिसमें किसी समय में भारत के राजाओं का वहाँ पर राज्य चलता था, पर भारत ने कभी नहीं कहा कि वह हमें दें, जबकि चीन अभी भी अरुणाचल पर दावा करता हैं। चीन की सरकार ताइवान पर भी अपना दावा जताती है। मतलब अपने पडोसियों को चैन से नहीं चलने देना उसकी रणनीति है फिर भी भारत के कुछ लोग उसे अपना माडल बताते हुए थकते नहीं।
पश्चिम के कुछ पश्चिम विशेषज्ञ चीन की आर्थिक विकास स्त्रोतों को हमेशा संदेहास्पद दृष्टि से देखते हैं। 'द चाइना कमिंग वार' के लेखक पीटर नवारी का कहना है कि चीन अनुचित व्यापार से संबधित उपायों का सहारा लेता है-एक अंडर वर्ल्ड मुद्रा और दूसरा निर्यात को सब्सिडी देना। यह दोनों ही तात्कालिक रूप से उसे फायदा देते हैं पर भारत के लिए ऐसा करना संभव नहीं है क्योंकि यहाँ लोकतंत्र है और यहाँ का मीडिया इसे उछाल देगा। गलत आदमी से पैसा लेंगे तो वह केवल आर्थिक फायदा लेने से संतुष्ट नहीं होगा वह देश की अस्मिता से भी खिलवाड़ करेगा पर चीन में यह संभव नहीं है क्योंकि वह सैनिक शासन है और उसे दूसरों से खिलवाड़ करने की आदत है करने देने की नहीं। अभी तक विश्व यही नहीं जान पा रहा है कि आखिर आतंकवादियों की आर्थिक स्त्रोत कहाँ है कुछ लोगों को शक है कि आतंकवादियों को वहाँ अपने व्यापार से बहुत आर्थिक लाभ होता है। सच क्या है कोई नहीं जान पाता क्योंकि वहाँ देश और विदेश के पत्रकारों को विशेष क्षेत्रों में जाने की अनुमति है। फिर भी जिन्होंने दूरदराज के इलाकों से खबरें निकालीं हैं वह उसके दावों पर यकीन नहीं करते।
हमारे देश ने किसी देश की जमीन नहीं हड़पी और न आधिकारिक रूप से कभी किसी आपराधिक और आतंकवादी संगठन को समर्थन दिया है। इसे देश के गरीब और शोषितों ने अपने दम पर ही संघर्ष किया किसी के सामने न तो भीख मांगी न किसी को लूटा और फिर भी मुस्कराता रहा है और फिर भी उससे कहा जाता है कि तुम विकास करो देखो चीन ने विकास कर लिया है-और यह सन्देश भी ऐसा है कि जो चीनी खुद नहीं देते।

12/8/07

गूगल दुनिया के लिए एक ख़तरा!

ऑस्ट्रिया के ग्रेज विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट सर्च इंजन ‘गूगल’ को दुनिया के लिए एक खतरा बताया है। विश्वविद्यालय की संचार और कंप्यूटर संस्थान के अध्यक्ष प्रो.हरमैन माउरर के नेतृत्व वाले एक शोध दल के मुताबिक गूगल अब एक नया स्वरूप लेने जा रहा है जो इंटरनेट की दुनिया में पूर्ण एकाधिकार की कोशिश है। शोध में गूगल के एकाधिकार और इसके ‘खुफिया एजेंसी’ में बदलते जाने की आशंका पर चिंता व्यक्त की गई है।

यह खबर सिफी कॉम पर हैं और गूगल अपने मुख पृष्ठ पर यह दिखा रहा है। वैसे भारत में गूगल ने जिस तरह अपने पाँव फैलाये हैं उसे देखते हुए उसको अभी चुनौती मिलना कठिन है। भारत में गूगल के निरंतर मजबूत होने का कारण उसके हिन्दी, तमिल तेलगु, कन्नड़ और मलयालम भाषा के टूल तो हैं ही उसका सर्च इंजन भी बहुत शक्तिशाली है-यही कारण है की गूगल में इतना आत्मविश्वास है कि वह अपने को खतरा बताने वाली खबर भी स्वयं दिखा रहा है। अगर हम आज अपने हिन्दी चिट्ठों को देखें तो उसमें गूगल की भूमिका को नकारना कठिन है, क्योंकि उसके बिना शायद हिन्दी में चिटठा लिखना इतना आसान नहीं है। ऐसा नहीं है कि अन्य वेब साईटें भी इसके लिए तैयार नहीं हो रहीं होंगी और आज के व्यवसायिक युग में प्रतिस्पर्धा कभी भी हो सकती है।

भारत में याहू भी बहुत विस्तार लिए हुए हैं पर उसके साथ अभी हिन्दी में काम उस रूप में नहीं किया जा सकता जिस तरह गूगल के साथ किया जा सकता है। मैंने शुरू में याहू में ही ईमेल बनाया था और गूगल में बनाने की सोची भी नहीं थी पर जब एक बार नारद पर ब्लोग देखे तो उनको ढूंढते गूगल पर ईमेल बना लिया। फिर तो उसके ब्लोग में घुसा तो आज तक बना हुआ हूँ। उसका एकाधिकार अगर बना हुआ है तो उसकी वजह यही है कि इसने जो सुविधाएं लिखने के उपलब्ध कराईं है उससे सहजता की अनुभूति होती है। जहाँ तक इसके खुफिया एजेंसी में बदलने की बात है वह चिंता की बात है और इसके लिए तो भारत के सरकारी तकनीकी विशेषज्ञों को चौकस रहना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह अपनी खुफिया जानकारी का उपयोग किस रूप में कर सकता है।
इसके दो रूप हो सकते हैं एक तो अपने समर्थन वाली सरकारों को अपनी विरोधी सरकारों की जानकारी उपलब्ध करना और अपनी जानकारी के आधार पर अपना साम्राज्य बनाए रखना या निजी क्षेत्रों में एक संगठन या व्यक्ति की जानकारी दूसरे संगठन या व्यक्ति को देना-ऐसे में उन लोगों को चौकस रहना होगा जो इस पर काम करते हैं पर उनका इस्तेमाल अगर इससे जुडे किसी व्यक्ति ने असामाजिक गतिविधियों के लिए करने का प्रयास किया तो संकट हो सकता है, आजकल इंटरनेट पर आपराधिक गतिविधियों देखकर लगता है कि उनकी घुसपैठ इसके संगठन ने हो सकती हैं क्योंकि आतंकवादी और अपराधिक संगठन हर संस्था में अपनी घुसपैठ करते हैं-ऐसे में इसके प्रशासनिक और तकनीकी प्रमुखों को अपनी साख बचने के लिए सतर्क रहना होगा-क्योंकि आप कितनी भी अच्छी सुविधाएं दीजिये पर राष्ट्र और समाज के हित नहीं सोचते तो किसी भी काम के नहीं है।
बहरहाल इस रंग बदलती दुनिया में कभी इस गूगल से पाला पडेगा यह सोचा भी नहीं था। इसका प्रभाव जहाँ फलदायी लगता है वहीं डराता भी है। इसके हिन्दी ब्लोग तकलीफ दे रहे हैं और प्रकाशित भी हो राहे हैं। मैं कभी कभी सोचता हूँ कहीं गूगल वाले मुझसे चिढे तो नहीं हुए हैं। जब मैं ऐसे लेख लिखता हूँ तो मेरे पास और भी जानकारी आतीं हैं, और उसमें किसी गूगल के नये टूल का पता लगता है और वह टूल बहुत चमत्कारी होते हैं। पर यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है और हो सकता है गूगल को चुतौती मिलने लगे। अगर गूगल समर्थकों को मेरी कोई बात बुरी लगे तो इसमें मैं जिम्मेदार नहीं हूँ क्योंकि उनके बारे में खबर वह अपने मुख पृष्ठ पर दिखा रहे है और इसके लिए वही जिम्मेदार होंगे। ऊपर की खबर मैं वहीं से कापी कर ले आया हूँ।

4/17/07

अपने धर्म पर अटल रहना

दोस्त हम ऐसा चाहें
जो वक्त पर काम आये
पर कितना सोचते हैं कि
हम दोस्तो के काम आयें
ऊपर से लेकर नीचे तक
खुदगर्जी भरी है खुद में
फिर क्यों दुसरे से वफ़ा की
उम्मीद हम लगाएं
वक्त पर काम आने का वादा
हर समय वफादारी करने की
क़समें उठाना आसान है
किस्मत ही समझो अपनी
जो कौई और हम से
या हम ही किसी से निभाएं
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प्यार से धोखे का
दोस्ती से गद्दारी का
ईमान से बैईमानी का
अगर रिश्ता न होता
तो कौन निभाने की क़समें खाता
विश्वास, वफ़ा और नेकनीयती का
मोल क्या रह जाता
फिर भी तुम प्यार, दोस्ती और ईमान का
दामन कभी नहीं छोड़ना
और इन्सान चाहे शैतान बन जाएँ
चाहें कितने भी ठोकरें लगाएं
सारी उम्मीदें छोड़कर अपनी
शख्सियत पर इंसानियत ओढ़े रहना
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उसने नहीं निभाया
मैं भी नहीं निभाऊंगा
यह सोचकर दगा कभी नहीं करना
हालात आदमी को वफादार और
गद्दार बनाती है
भूख आदमी को बैईमान और
मिटटी से बने शरीर की
कई मजबूरियों को समझ लो
अपने धर्म पर अटल रहना सीख लो
रंग बदलती इस दुनियां में
नीयत हर पल बदल जाती है
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4/14/07

जल बिन सब सून-भाई मेरे सुन और गुन

जळ बिन सब सून -यह सबने सुना है पर शायद हमारे लोग सुनते हैं तो बस सुनने के लिए है और फिर भूल जाते हैं। अब गर्मी बढने लगी है और जल संकट कयी इलाकों में अपनी दस्तक दे चूका है और कयी जगह वह आने की तैयारी में है। अभी गर्मी की शुरूआत है जैसे-जैसे बढती जायेगी वैसे ही भू-जलस्तर कम होगा और साथ यह भी कि लोगों की खपत भी बढती जायेगी । जब मैं अपने देश में पाने की खपत का आंकलन करता हूँ तो लगता है कि पीने, कपडे धोने या नहाने से अधिक अन्य चीजों को धोने में ज्यादा खर्च किया जाता है। लोगों ने अपने घरों और दुकानों के बाहर पेड-पौधे को काटकर सीमेंट और लोहे के बुत खडे कर दिए हैं और सुबह शाम उन पर छिड़काव करते हैं। दम्ब्रीक्रत सड़क पर पानी डालते हैं, इतना नहीं जानते कि पानी उसे हानि पहुँचाता है।
एक सज्जन सड़क पर पानी फैंक रहे थे मैंने उनसे कहा -"जनाब आप इस जल संकट के दिन है आप इसे सड़क पर क्यों फैला रहे हैं?"
वह बाले_"क्या करे सड़क पर धुल जमा है, और फिर थोडा ठंडक हो जायेगी । पानी का क्या है? हमारी तो अपनी बोरिंग है।
मैंने कहा -" आपकी बोरिंग है पर पानी तो आपके हाथ में नहीं है। वह तो नीचे बह रहा है। अगर स्टॉक खत्म हो गया तो आपको भी परेशानी होगी। और यह पानी दंबर की सड़क को काटता है। वैसे ही सड़कें बड़ी मुशिकल से बन पाती हैं।
वह बोले-"क्या करना ? सड़क भी बन जायेगी ।
मतलब यह कि हम नहीं सुधरेंगे । जब पानी नहीं मिलता तो रोने लगते हैं- कराहते हैं। घर में बोरिंग है पर बाकी पूरा इलाका सीमेंट और पत्थर से ढका है अन्दर कहीं पानी और हवा जाने का रास्ता नहीं है। पानी का मनमाना उपयोग करने की ऎसी आदत हो गयी है कि न गर्मी दिखती है न सर्दी । अब जल संकट का भी यह हाल है कि अब केई जगह सर्दी में भी अपना उग्र रुप दिखाता है। जल जीवन है पर सुनकर अनसुना करने की प्रवृति ने इस देश को पानी के लिए तरसाना शुरू कर दिया है जिसके बारे में पूरी दुनिया में कहा जाता था कि भारत में दूध की नदियाँ बहती हैं। हां, इतना जरूर है दूध में पानी की मात्रा अच्छी मिल जाती ही। इलेक्ट्रोनिक सामानों के उपयोग ने पानी के दोहन और उपभोग को बढावा दिया है तो प्रकर्ति का भी भारी शोषण हुआ है, और संकट की भनक सबको है पर जिनके पास पानी नहीं है वह सरकार को कोसकर अपना मन हल्का कर लेते हैं और जिनके पास है वह मदांध हो रहे हैं। अपनी कारों और स्कूटरों को वह भी सडकों पर धोते हैं , पानी का नाजायज उपयोग और सड़क की क्षति दोनों अपराध एक साथ करने में किसे संकोच हो रहा है। हम नहीं सुधरेंगे पर हमारा दर्शन कहता है जब जब इस धरती पर बोझ बढता है तो भगवान उसे हल्का करते हैं। प्रसिध्द अर्थशास्त्री मोल्थ्स का भी यही कहना है जब इन्सान अपने पर नियंत्रण नहीं करता है तो प्रकृति उस पर नियंत्रण करती है। यह जल संकट इसी तरह हमारे ही लापरवाही और अज्ञान का परिणाम है।

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