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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/18/07

मानव भेष में पशुता दिखाने वालों को पाशविक सजा दें

मैं पिछले कई दिनों से टीवी पर जब किसी लडकी पर किसी युवक द्वारा तेज़ाब फैंकने की घटना का समाचार देखता हूँ तब मेरा ख़ून खोल उठता है। भारत एक सभ्य देश है हमारी संस्कृति दुनियां की सबसे सभ्य संस्कृति है- ऐसे नारे लगाकर कब तक छोटी बच्चियों और नवयुवतियों पर ऐसे अनाचार होते देखे रहेंगे। क्या हम यह मानकर चलेंगे कि भगवान् राम हमारे देश कि हृदय नायक हैं तो यहां कोई रावण नहीं हो सकता, या हम मानकर चल रहें कि हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अहिंसा का जो पाठ पढाया है वह सबने ऐसा कंठस्थ कर लिया है कि आदमी में राक्षसत्व हो ही नहीं सकता। हम अपने संविधान को केवल सभ्य दिखने के लिए लचीला बनाए रखना चाहकर उसमे कड़े दण्ड शामिल नही करना चाहते तो अब समय आ गया है कि उस पर विचार करना चाहिऐ। हम एक तरफ लड़कियों की भ्रूण ह्त्या रोकने की बात करते हैं पर जो इस तरह की भयानक घटनाएं हो रही हैं वह इसे प्रेरित करती हैं कि कुछ लोग अपने यहां लडकी का जन्म केवल इसीलिये रोकना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है लडकी जब तक छोटी है तब तक कोई समस्या नहीं है पर बड़ी होने पर केवल उसकी शिक्षा और विवाह ही समस्या नही है वर्ना उसकी सुरक्षा भी आजकल एक समस्या होती जा रही है। हम दावा कितना भी करें पर आज भी हमारे समाज में स्त्री का दर्जा वह नहीं है जिसकी वह अधिकारिणी है। आजकल के समय में जब ऎसी घटनाएं होती हैं तो उनको प्रचार ज्यादा मिलता हैं और यह लोगों में चेतना कम भय ज्यादा लाता है। आज भी लड़के अपने सामने लडकी को हेय दृष्टि से देखते हैं -और यह शिक्षित हो या अशिक्षित दोनों में समान रुप से होता है। जो अशिक्षित हैं उनकी बात छोडें जो शिक्षित हैं वह भी अपने सामने शिक्षित लडकी को वही उतना सम्मान देते हैं जो एक अशिक्षित देता है। कई जगह तो यह हालत यह है अशिक्षित या कम शिक्षित लड़का भी शिक्षित या अपने से ज्यादा शिक्षित लडकी को सम्मान लायक नहीं समझता। हम अगर इस बहस में पडा जायेंगे तो बात लम्बी खिंच जायेगी । कुल मिलाकर लडकी होना माता-पिता के लिए आज भी उतनी ही बड़ी समस्या है जितना पहले थी, इसका कारण सदियों से समाज का जो रवैया है वह जिम्मेदार है, इसमें बदलाव नही आया है। अत: हमें सदियों पुराने उन कानूनों को अपने संविधान में जोड़ना चाहिऐ जिन्हे हम जंगली कानून कहते हैं। खासतौर से उन कानूनों की महिलाओं पर अत्याचार रोकने के लिए जरूरत महसूस होने लगी है- जैसे सरेआम फासी देना अंग भंग करना और मुहँ काला कर सरेआम घुमाना। लड़कियों के प्रति अपराध हमेशा जघन्य माना जाता है। इसके लिए म्रत्त्यु दण्ड के अलावा पहले सार्वजनिक रुप से अपमानित करने की सजा भी देना चाहिऐ- यह जरूरी नहीं है कि अपराध के बाद लडकी या महिला की मौत हो गयी हो। तेज़ाब फैंकने वालों को तो सरे आम हाथ काटने की सजा देना चाहिऐ - अगर लडकी की मौत हो गयी हो तो फासी से पहले दोनों हाथ काटकर दस साल जेल में रहने की सजा भी देना चाहिऐ । यह विचार मैं इसीलिये व्यक्त कर रहा हूँ क्योंकि मेरे मन में तब भारी पीड़ा उठती है जब मैं किसी लडकी पर तेजाब डालने की खबर सुनता हूँ । आख़िर एक सुन्दर लडकी पर तेजाब डालना एक पाशविक काम है और इसे लिए सजा भी उतनी ही पाशविक होना चाहिऐ ऎसी मान्यता है।

3 comments:

अभय तिवारी said...

आपकी संवेदना उचित है मित्र.. आपको पढ़कर आपसे सहमत होने का जी करता है.. बावजूद इसके कि सजा वजा के बारे में लोग आजकल प्रगतिशील तरीके से सोचते हैं.. पर आपने जिस नज़रिये से बात को रखा है.. सही लगती है.

Udan Tashtari said...

सही कह रह हैं कि पाशविक काम की सजा भी उतनी ही पाशविक होना चाहिऐ.

Shrish said...

एकदम सही, आपसे सहमत हूँ।

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