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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/21/07

अपने ब्लोग के साथ बने रहिए:अपनों से अपनी बात

जब मैंने ब्लोग बनाने का प्रयास शुरू किया तो मेरे दिमाग में यह बात कतई नहीं थी कि इतनी जल्दी लोगों से संपर्क होता जाएगा। मैं बहुत समय से लिख रहा हूँ और आज के युग में कंप्यूटर का ज्ञान होना और उससे लेखन के जरिये अपनी बात लोगों तक पहुंचाना मेरे जैसे नौसिखिये के लिए एक उपलब्धि है। मुझे पक्का याद नहीं आ रहा है पर कंप्यूटर पर मैंने तब कार्य किया जब विंडो नहीं आया था। जब विंडो आया तो मैं कंप्यूटर से दूर हो चूका था। फिर कंप्यूटर पर काम करना पडा तो उसका विंडो से कोई संबंध नहीं था। इधर रचनाएं लिखने का काम भी ज्यादा नहीं कर रहा था, क्योंकि लेखनी खराब थी, और फिर समाचार पत्र-और पत्रिकाओं को टाईप कर भेजो तो उनका कोई उत्तर नहीं आता था। फिर जब काम से फुर्सत मिलती तो अपने दोस्तो के यहां जाकर विंडो पर सीखने का प्रयास करता था। चूंकि मैंने गोदरेज के की बोर्ड पर काम किया था और जहाँ मैं कार्य करता था वहां मुझे बिना देखे हिंदी टाईप करने में आसानी हो रही थी तो मैंने कंप्यूटर खरीदने का फैसला किया । शुरू में मैंने इसपर टाईप कर रचनाएँ भेजने का काम शुरू किया पर लगने लगा कि देश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं को मेरी रचनाओं को छापकर मुझे प्रसिध्द करने की बजाय प्रसिध्द लोगों को रचनाकार बनाने में ज्यादा रूचि है। मुझे याद है जब मैं नारद पर रचनाएँ देखता था तो सोचता था कि पता नहीं यह क्या बला है जो ब्लोग कहलाती है। एक दिन मुझे एक ब्लोग के विषय ने मुझे बहुत प्रभावित किया । बस मेरे दिमाग में कीडा कुलबुलाने लगा था। पर मुझे अगर उस समय किसी ने युनिकोड में लिखने के लिए कहा होता तो मेरे यह काम उसी दिन स्थगित होना था, पर कभी आप अपने लिए रास्ता चुनते है और कभी रास्ता ही आपको खींच लेता है।मुझे लगा कि चलो एक ब्लोग बना लेते हैं -इसे मैं अपना अखबार भी कहता हूँ। ब्लोग बनाकर रख दिया और रविवार का दिन था तो सोचा कि शायद छुट्टी होने के कारण वर्डप्रैस वालों ने मेरी हिन्दी का अभी हिन्दी करण नहीं किया क्योंकि मैंने एकदम वर्ड से अपनी रचना पेस्ट कर दीं थी और सोचा कि बचा काम वर्ड प्रेस वाले करेंगे , आख़िर ब्लोग भी तो उन्होने ही बनाने का प्रस्ताव रख छोडा है। फिर मैंने जैसे तैसे अपनी रचनाओं को पढने लायक बनाया और चुपचाप बैठ गया कि यार अब जो होगा सो होगा-अपना तो अखबार छप गया-अब जिसे पढ़ना है पढेगा।। फिर एक दिन नारद पर एक ब्लोग में टैग के बारे में पढा पर समझना कुछ था और समझ में कुछ और आया तब वर्ड प्रेस के कैटेगरी में जाकर अंगरेजी में हिन्दी शब्द लिखा और ब्लोग पर जाकर देखा तो वही लिख कर आ गया , इधर मैं नारद और अक्षरग्राम से जुड़ने का प्रयास कर रहा था पर मुझे सफलता नहीं मिल रही थी। जब बैन करने के धमकी मिली तो सोचा एक न एक दिन संपर्क तो होगा हे फिर जल्दी क्या है? और मैं वर्डप्रैस और ब्लागस्पाट के अपने ब्लोगों में लिखता भी गया और सीखता भी गया मैं सोच रहा था कौन चिता की क्या बात है कौन अपना ब्लोग पढ़ रहा है।। और एक दिन एक चिट्ठाकार जिनके चिट्ठे को मैं लगातार देखता आ रहा था का संदेश मेरे नाम आ गया तो मैं चौंक गया। मैं नाम किसी भी मित्र के इसीलिये नहीं लिख रहा हूँ कि अभी यह तय नही कर पा रहा हूँ कि ऐसा करना अमर्यादित तो नहीं होगा, इन मित्र ने उन्मुक्त भाव से लिख दिया कि आपकी रचना का कुछ ही हिस्सा समझ में आ रहा है बाकी कूड़ा दिखाई दे रही है । मुझे लगा कि जैसे किसी ऐसे मित्र कि यह टिपण्णी है जो मेरे से रोज मिलता है। अगले दिन ही एक अन्य ब्लॉगर ने भी मेरा ब्लोग न पढने की शिक़ायत की । उनके संदेश में प्रेम था और शब्दों में उतनी गहराई सागर में ही हो सकती है। एक ऐसे भी मित्र हैं जिनसे हम सीखे और वह भी हमारे पाथ प्रदर्शक बन गये । इधर क्रिकेट के बारे में मेरे लेख नारद पर चमक रहे थे तो मैंने उनपर ध्यान नहीं दिया पर मित्रों की संख्या थी कि बढती जा रही थी और शिकायतें भी , इससे मैं विचलित हो गया और सोचा कहॉ चक्कर में फंस रहे हो कहीं सब तरफ बैन न हो जाओ और फिर लिखना ही न बंद हो जाये। ठान लिया कि मित्रों को खोना नहीं चाहिऐ । और वह रास्ता पकड लिया जिसके लिए तैयार नहीं था । अगर मैं ऐसा था तो मित्र भी वैसे ही थे-मैं अपने नये मित्रों को अपनी रचनाएं पढ़ते देख प्रसन्न था पर वह मुझे थोडा और प्रसिध्द देखना चाहते थे । पढने में आने लगा तो कहने लगे नारद पर पजीकरण कराओ। यह संदेश मेरे लिए झटके जैसा था । एक दिन में ऐसे तीन संदेश मिले। अब संकट यहा था कि कहीं चूके तो बैन होना ही था। इधर लिखा हकलाते लिख रहा था और उधर नारद पर जाने का अन्तिम प्रयास शुरू कर दिया। मान लिया कि नारद से एक बार और प्रयास कर लेते हैं और बता देते हैं कि भाई हमें पंजीकरण नहीं कराना आता खुद ही कर लो। जब पंजीकरण कराने गये तो वह भी उस समय अपने आप ही आ गया । यकीनन यह मेरे मित्रों के प्रेम का ही परिणाम था। अब नारद पर जब अपने ब्लोग को देखता हूँ तो मुझे अपने आप को यह विश्वास दिलाना कठिन हो जाता है कि वह मेरा है । इसमें कोई संशय नहीं है कि नारद कि जो भुमिका है उसका आंकलन केवल एक पोस्ट में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। मुझे इतने सारे रचनाकारों को देखकर प्रसन्नता होती है। फुर्सत के क्षणों में मेरा यह लेख आत्मप्रवंचना के लिए नहीं है बल्कि अपने मित्रों का बताने के लिए हैं कि मेरे जैसे और भी लोग होंगे जो उनके सहयोग पाने के लिए जूझ रहेंगे और जो प्रयास कर रहे हैं उन्हें यह बताने के लिए है कि आप प्रयास करते रहेंगे तो सफल होंगे ही । नारद से मुझे एक संदेश मिला था "आप अपने ब्लोग के साथ बने रहिए", हालांकि यह मेरा ब्लोग पंजीयन अस्वीकृत करने के संबंध में था पर यह विश्वास दिलाने के लिए काफी था कि मुझे अपने रास्ते से हटना नहीं चाहिए। भला इतने अच्छे मित्रों का मंच कहीं और मिल सकता है ? कभी कभी ऐसे विचार व्यक्त करना मुझे अच्छा लगता है। मैं हकलाते लिख रहा हूँ के बारे में कुछ आगामी अंकों में ।

4 comments:

उन्मुक्त said...

आपकी चिट्ठियां तो कभी कूड़ा नहीं थी यह बस पढ़ाई न आ पाने के कारण था। माफी चहूंगा, यदि उस शब्द से बुरा लगा हो। आपकी यह चिट्ठी पढ़ कर बहुत अच्छा लगा।

Divine India said...

बड़ी पवित्र भावना के साथ लिखा है यह लेख…लिखते रहे बहुत गहरे और शांत विचार हैं आपके।

Shrish said...

दीपक जी आप दरअसल उस समय नॉन-यूनिकोड फॉन्टों का प्रयोग कर रहे थे जिस कारण वे किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे। बाद में सहायता के लिए चिट्ठाकार ग्रुप पर आपकी मेल पढ़ने के बाद मैंने बहुत बार आपसे संपर्क करने की कोशिश की, ईमेल पता देने को कहा लेकिन आपने दिया ही नहीं। खैर फिर आपके एक ब्लॉग पर कमेंट किया साथी ब्लॉगर प्रोफाइल से आपका ईमेल पता मिला और तब जाकर आपको मेल कर पाया।

यद्यपि उसके बाद बात नहीं हो पाई पर इतना जानता हूँ कि आपने शुरुआत में फोनेटिक टूल की मदद से पोस्टें लिखी। अब आपने रेमिंगटन से शुरु कर दिया है या नही?

भईया आप रेमिंगटन वालों को यूनिकोड का कॉन्सेप्ट और सही टूल समझाने में बहुत दिक्कत आती है। आपको बस अपने हिन्दी फॉन्ट बदलकर टाइप करने की आदत होती है। IME का चक्कर समझाना मुश्किल हो जाता है। इसी सब को देखते हुए मैंने सर्वज्ञ पर रेमिंगटन वाला तथा दूसरे लेख लिखे। उसे अवश्य देखें। अब जिसे भी जरुरत होती है वो लिंक्स पकड़ा देता हूँ।

और हाँ सभी मित्रों से साक्षात बात करने के लिए गूगल टॉक डाउनलोड और इंस्टाल करें। दिन में और श्याम को ज्यादातर लोग उधर मिलते हैं।

Reetesh Gupta said...

अच्छा लगा पढ़कर ..धन्यवाद

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