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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/22/07

लिखता है तो बिकना सीख, नही तो भूखा रहना सीख-चिंतन

हिंदी में लिखने वालों को सम्मान उनके द्वारा लिखी गयी रचनाओं के स्तर और संख्याओं के आधार पर नहीं वरन उनके द्वारा अर्जित धन के अनुसार दिया जाता है। जब मैंने लिखना शुरू किया तब मुझे पता था कि इससे होने जाने वाला कुछ नहीं है- यह मेरी रोजी रोटी का आधार नहीं बन सकती । फिर भी मैंने लिखने का इरादा नहीं छोडा वजह!मुझे अपनी कलम एक सच्चे मित्र के रुप में अकेलेपन के साथी के रुप में दिखी। मैं इस समाज में रहूँगा पर इसका हिस्सा नहीं बनूंगा यह तय कर लिया तो तय कर लिया। साथ ही तय किया कि अपनी लेखनी की चर्चा केवल लेखकों से ही करूंगा। मैंने अपने मन की बात अपने घर पर भी किसी को नहीं बतायी। क्योंकि मैं जानता था इस समाज में जितनी आध्यात्म की प्रधानता बाहर से दिखाती है अन्दर उससे ज्यादा धन की प्रधानता है। आध्यात्म में भी मेरा सदैव मेरा झुकाव था पर उसमें भी मैं एकांतप्रिय था। लोग यहाँ अपने विश्वास को ज्यादा श्रेष्ठ बताते हैं पर इसके लिए उनके पास कोइ प्रामाणिकता नहीं है। हाँ, अगर किसी के विश्वास पर बहस करो तो वह लड़ने को तैयार हो जाता। जिस पर जैसे मैं विश्वास करता हूँ वैसे ही दूसरा भी उस पर करे -यह भाव लोगों में रहता है। भक्ती में भी जो अंहकार है उसकी यहां व्याख्या करने की जरूरत नहीं है। कुल मिलाकर हर जगह धन का बोलबाला है। ऐसे में लेखक की इज्जत होना संभव नहीं है। इसका कारण और भी है कि हमारे धर्म ग्रंथों मैं ही इतनी कहानियाँ हैं कि आदमी उन्हें पढे तो पोर्री ज़िन्दगी निकल जाये-पर कोई पढ़ नही सकता । मैं आज भी जब अपने धर्म ग्रंथों को पढता हूँ तो उनकी विषय सामग्री मेरे को नयी लगती हैं । फिर भी लिखने की आदत से बाज नहीं आता हूँ क्योंकि जो भी हिन्दी का लेखक लिख रहा है वह उन्हीं कहानियो और विचारों को अपने ढंग से नवीनता प्रदान करता है। पर अन्य लोगों की बात तो छोड़ दें घर के लोग तक इस बारे में सहमत नहीं होते। उस दिन एक सज्जन मुझसे मिलने आये, उस समय मैं ब्लोग में लिख रहा था । वह सीधे मेरे कमरे में आये और बोले क्या कर रहे हो ? मैंने कह-"कुछ नहीं खेल रहा हूँ । तुमने मुझे ताश खेलना खेलना सिखाया है वही काम् कर रहा हूँ। वह खुश हो गये, और बोले -"अच्छा कर रहे हो, इससे समय पास होता है और मनोरंजन भी होता है।" इतने में हमारी श्रीमतीजी पीछे से आकर बोलीं-"नहीं भायी साहब यह खेल नहीं रहे थे बल्कि अपना ब्लोग लिख रहे हैं ।" वह भोंच्क्क रह गए और बोले-"यार तुम्हें इससे कुछ मिलता है?" मैंने मना किया तो बोले-"फिर क्या फायदा ? कुछ पैसा मिले तो लिखो, नहीं तो बेकार है मेहनत । मैंने उन्हें बिठाया और बातचीत का विषय बदल दिया। उनके जाने के बाद मैंने पत्नी से कहा -" क्या जरूरत थी उसे यह बताने की कि मैं ब्लोग लिख रहा हूँ। पत्नी ने कहा-"तो क्या हुआ वह कोई गलत थोड़े ही कह रहे थे। भला इससे तुम्हें मिलता क्या है?" मैंने पत्नी से कहा -"ताश खेलने से क्या मिलता था ?मनोरंजन ! वह इससे भी मिल रहा है। हमारे पत्नी इससे सहमत हो गयीं पर मित्र द्वारा की गयी टिप्पणी से सोच में पढ गया।उनके जाने का बाद मैं सोचने लगा कि' ताश खेलने में समय खराब करने से बुरा ब्लोग लिखना जो लोग मानते हैं उनसे बहस करना बेकार है। इस समाज में एक ताश खेलना मनोरंजन माना जा सकता है पर साहित्य लेखन को नहीं। हाँ, बाहर जरूर सम्मान मिल जाये अपने लोगों से इसकी आशा करना बेकार है। फिर अपने एक साहित्यक मित्र के शब्द हमेशा याद रहे हैं जो उन्होने अपनी कविता में कहे थे।"लिखना है तो बिकना सीख नहीं तो भूखा रहना सीख।" मेरा वह मित्र अपने पुत्र के निधन के बाद भी जीवटता के साथ जीं रहा है और इस ब्लोग के लिए उसने ही प्रेरित किया था। बहुत दिनों से वह मुझे मिला नहीं है और मैं सोच रहा हूँ कि या तो उसका भी ब्लोग बनवाकर उसकी कवितायेँ प्रकाशित की जाएं या अपने ब्लोग में उनको स्थान दिया जाये। मेरा वह मित्र केवल लेखक होने के कारण ही है वरन हम कभी एक दुसरे के घर नहीं गए । उसने मेरे अन्दर के लेखक को जिंदा रखने में जो योगदान दिया है उसे मैं कभी भूल नहीं सकता। उनकी मित्रता से ही मेरे अन्दर यह बात रही है कि में अपने साथी लेखकों को ही अपना मित्र कहता हूँ। मैंने उनकी प्रेरणा से ही कभी भी लेखन कार्य में कभी भी पैसा पाने की उम्मीद नहीं की ।

2 comments:

Mired Mirage said...

सही कह रहें हैं आप । हममें से अधिकतर अोने लिए ह लिख रहे हैं । कोई पढ़े व सराहे तो लगता है कोई और भी हम सी संवेदनाएँ रखता है । लिखते रहिए ।
घुघूती बासूती

विकास कुमार said...

बचपन से पढ़्ता आया हूँ कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. परंतु दर्पण निर्माताओं की दुर्दशा भी जगजाहिर है. आपने एक कटु सत्य को परोसा है. एक व्यक्ति भी अगर आपके चिन्तन से चिंतित हो सका, तो आपकी कोशिश सफ़ल है.

सत्ता गहने की बजाय लहरों में बहने वाले आप जैसे लोगों की ही बदौलत तो हिन्दी साँस ले पा रही है. :)

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