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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/6/07

ब्लोग लेखक अपनी ताकत स्वयं बने

मैंने दिल्ली में संपन्न ब्लोगर मीट के बारे में पढा , एक लेखक के रुप में मेरी दिलचस्पी इसमें थी और मैं जानना चाहता था कि कौन लोग इसमें शामिल हो रहे हैं और उनके क्या विचार हैं ? जिन लोगों ने इस बारे में रिपोर्ट छापी उनको धन्यवाद देते हुए मैं अपनी बात यहां कहना चाहता हूँ और यह साफ कर दूं कि यहां मेरा उद्देश्य किसी अन्य ब्लोग लेखक पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी करना नहीं है और न ही स्वयं को कोई विद्वान् साबित करना है ।
ब्लोग या चिट्ठा लेखन आगे चलकर न एक विधा बल्कि एक आंदोलन के रुप में बनने जा रहा है । यहां आन्दोलन को कोई राजनीतिक रुप में न लें क्योंकि यह एक प्रवृति है जो मनुष्य के राजनीतिक,सामजिक ,शैक्षिक तथा धार्मिक क्षेत्र में प्रकट होती है और बदलाव करती है-यह अलग बात है हम इसे केवल राजनीतिक रुप में ही देख पाते हैं। एक आन्दोलन तो होते है जो लोग शुरू करते है और दुसरे वह होते हैं जो मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृतियों से प्रकट होकर उसे बदलाव के रास्ते पर ले जाते हैं, और ब्लोग को विधा कहें या आन्दोलन यह नई तकनीकी से प्रकट हुआ है आम लेखक इसे बहुत दूर तक ले जायेंगे ऐसा मेरा अनुमान है।
हम अपने ब्लोग को जमीन पर देखना चाहते हैं-एक लेखक के रुप में यह प्रवृति स्वाभाविक रुप से होती है कि वह अपनी रचना दूसरों को पढ़ाना चाहता है- और उसके लिए समाचार पत्र-पत्रिकाएँ और टीवी चेनलों का रास्ता देख रहे हैं तो गलती करेंगे । वहां ऐसे पूंजीपतियों का नियंत्रण है जो किसी व्यक्ति का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार नहीं करते । ब्लोग या चिट्ठे का सीधा आशय मैं अखबार के रुप में ही लेता हूँ। मैं अखबारों से संबध्द रहा हूँ और जानता हूँ कि कहॉ कौन क्या है? वहां आप बेहतर वेतन और पारिश्रमिक प्राप्त कर सकते हैं स्वतंत्र रुप से लिख नहीं सकते जबकि आपका ब्लोग अपको यह अवसर देता है ।
जब से मैंने ब्लोग लिखना शुरू किया है एक भी रचना बाहर नहीं भेजी ,वहां भी नहीं जहां से मुझे पैसा मिलता है । सब यह करे मेरा आशय यह नहीं है पर मैं जानता हूँ कि एक ब्लोग लेखक को कोई भी इतनी आसानी से सम्मान नहीं देगा जब तक वह अपनी शक्ति नहीं दिखाएगा-और वह तभी मिल पायेगी जब सार्थक ,गंभीर,वैचारिक और खोज्परक लेखन शुरू होगा । एक या दो दिन किसी अख़बार में ब्लोग पर लिखी आपकी रचना या नाम जरूर किसी अख़बार में छप जाये पर आपके ब्लोग का वह पता कभी भी नहीं छपेगा जिससे आपका ब्लोग लोग आसानी से इन्टरनेट पर खोल सकें । मैंने देखा है कुछ ब्लोग लेखकों की अखबार में छपी है और उनका ईमेल पता भी छपा है पर ब्लोग का पता नहीं छपा है । कुल मिलाकर कोई अन्य साधन नहीं है जो अपने ब्लोग को जमीन पर उतार सके और जिनकी तरफ हम देख रहे हैं उनके लिए यह प्रतिद्वंद्वी विधा साबित होने वाली है क्योंकि लोग जब अपने ब्लोग खुद लिखेंगे तो वह अभिव्यक्ति के लिए अन्य साधन नहीं ढूंढेंगे ।मेरी यह बात कई लोगों अतिशयोक्ति लगे पर ज्ञानी,लेखक और जुझारू व्यक्ति से सब डरते हैं , वह लोग सबसे ज्यादा जो प्रतिकूल प्रचार होने से जिनके काम पर कुप्रभाव पड़ता हैं जिनका काम ही प्रचार पर टिका है, उन्हें स्वतंत्र लेखक से ही भय लगता है किसी वेतनभोगी से नहीं ।
लिखने और लड़ने वाले से बड़ी से बड़ी सता भयभीत हो जाती है भले ही बाह्य रुप से निडरता का कितना भी नाटक करे, और आजकल तो इन्टरनेट ऎसी चीज हो गयी है कि लोग भले कम देखते और पढ़ते हैं पर उसका प्रभाव उससे ज्यादा है जितना दिखता है-कहते हैं न दूर के ढोल सुहावने इसमें आप जोड़ सकते हैं डरावने भी । यह तो मैं ही जानता हूँ कि मेरे ब्लोग के कितने पाठक हैं ? आप कमेन्ट देखकर कहेंगे कि कम है पर यह भी आप जानते हैं कि सभी पढने वाले कमेन्ट नहीं देते और कुछ ऐसे आम पाठक भी हैं जो देना जानते नहीं है ।
मेरे ब्लोग की पाठक संख्या के बारे में अगर आप सब जानते भी हैं तो आप मेरे इलाक़े में कौन कहने के लिए आ रहे हो वहाँ तो मेरे लिए इतना ही बहुत है कि मैं इन्टरनेट पर लिख रहा हूँ । अगर मेरे ब्लोग को केवल दस लोग भी पढ़ रहे हैं तो भी क्या? ऐसे कई अखबार मालिक हैं जिनके अख़बार का नाम भर है और शहर में कहीं कहीं दिखता है फिर भी उनका रुत्वा किसी बडे अखबार मालिक से कम नहीं होता। मैं यह अंहकारवश नहीं कह रहा हूँ, न ही आपको अतिआत्मविश्वास में आने को कह रहा हूँ क्योंकि दोनों ही स्थितियाँ घातक होती हैं। मेरा कहना है कि सब ब्लोग लेखक अपने अन्दर विश्वास स्थापित करें और अपने लक्ष्य के रास्ते पर दृढ़ता पूर्वक चलते रहें । अखबारों के आन्तरिक संगठन बाहर से जितने आकर्षक लगते हैं अन्दर से उतने ही साधारण हैं जिंतने अन्य व्यवसायिक संगठन । आप अगर सोच रहें कि आप अच्छा लिखेंगे तो कोइ अख़बार या टीवी चैनल सम्मान देगा तो गलती पर हैं । हाँ कुछ अच्छे ब्लोग लेखकों को इनमें काम करने का अवसर मिल सकता है पर ब्लोग लेखन फिर भी एक अलग विधा रहने वाली है। अभी तो यह आरंभिक अवस्था में है और इसमें कई नये लोग आएंगे।
प्रश्न यह है कि हम शक्ति कैसे बने ? एक ही जवाब है कि संगठन बनाए और एक दुसरे की आवाज बने। अगर कोई ब्लोग लेखक अपने ब्लोग की वजह के संकट में आता है तो उसके सहायक बने , अपने ब्लोग की जानकारी दूसरों को दें , हो सके तो अपनी नेम प्लेट में उसका नाम भी जोड़ दें । मैं चाहता हूँ कि दिल्ली के बाहर कहीं ऐसे स्थान पर ब्लोग लेखकों का सम्मेलन आयोजित हो जहाँ वह अपने खर्च पर रह सकें और सम्मेलन का स्थान भी सहजता से मिल सके-हालांकि कहना सरल है करना कठिन है पर कराने वाले कभी न कभी यह भी करेंगे ।इसके लिए किसी बडे तामझाम की जरूरत नहीं है-सब अपने जिम्मेदार पर आये और सम्मेलन में भाग लें ।
मैं तो हैरान हो जाता हूँ जब मुझे इतनी दूर-दूर से संदेश मिलते हैं जहाँ तक मैं जाने की सोच भी नहीं सकता। मुझे ऐसे मित्र भी मिले हैं जिससे देख कर लगता है कि मैं देर से आया पर दुरस्त आया । मुझे अखबारों में छपने में अब कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि बहुत छप चुका ,अब कोई अखबार मेरे ब्लोग की रचनाओं को छापे तो ठीक नहीं तो भी मैं अपने इस ब्लोग से ही सन्तुष्ट हूँ ,अगर आप छपना चाहते हो तो अपने लिखने पर ही ज्यादा ध्यान दो-वह आपके पास आये इसके लिए उन्हें अपने लेखन और संगठन की ताकत से मजबूर करना होगा। वैसे और भी ख्याल है पर अभी बस इतना ही। आप कहेंगे तो और भी लिखकर बताऊंगा कि क्या रणनीति बनायें। अभी आगे और परिवर्तन आने वाले हैं और नए-नए लोग इस आंदोलन और विधा को आगे ले जायेंगे इसमें कोई शक मुझे तो नहीं है।

6 comments:

Manish said...

दीपक जी अखिल भारतीय सम्मेलन और अपने लेखन पर आत्मविश्वास पैदा करने के आपके विचारों से काफी हद तक सहमत हूँ। बाकी आप कितने पाठक पा कर संतुष्ट हैं ये आप के निजी संतोष पे निर्भर करता है।
हाँ एक बात ओर, सारे रिपोर्टर या समाचारपत्र एक जैसे नहीं होते।
टेलीग्राफ की शुचि आर्या जी का जिक्र करना चाहूँगा जिन्होंने झारखंड के सारे चिट्ठाकारों को खोज खोज कर उनके चिट्ठों के बारे में जाल पृष्ठ सहित लिखा था। लेख का उद्देश्य ब्लागिंग को प्रोत्साहित करना था।

अनूप शुक्ला said...

आपके विचार अच्छे लगे। ब्लाग अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसका आम जन तमाम तरह से उपयोग कर सकते हैं।

Arvind said...

विचारोँ का आदान प्रदान तो होगा ही,मुझे लगता है आने वाले समय मेँ ब्लॉग से समूह भी बनने लगेंगे.हँ ,शायद कही न कही अभिव्यक्ति को नये आयाम मिलेंगे.

'आन्दोलन" शब्द जरा भारी सा लगता है. कम से अभी .

अरविन्द चतुर्वेदी, भारतीयम

Udan Tashtari said...

उत्तम विचार.यह सही मायने में स्वतंत्र अभिव्यक्तिक का साधन है. आप ठीक कह रहे हैं.

Shrish said...

आपकी बात सही है। लेकिन ब्लॉग अपनी जगह है और अखबार आदि माध्यम अपनी जगह। दोनों में से कोई दूसरे की जगह नहीं ले सकता। मेरी सलाह है कि आप दोनों जगह लिखते रहें इससे यह फायदा होता है कि आपके एक माध्यम के पाठक दूसरे में भी जुड़ेंगे।

दीपक भारतदीप said...

इस लेख में मैंने अपनी बात स्पष्ट कर दीं है, और मेरा मुख्य उद्देश्य उन ब्लोग लेखको का हौंसला बढाना है जिन्हें अपनी अभिव्यक्ति के लिए अखबारों में जगह नहीं मिलती, और वह निराश हो जाते हैं। अखबार और ब्लोग में अब मैं ज्यादा अन्तर नहीं करता क्योंकि यह भी अभिव्यक्ति का एक सशक्त मध्यम बनेगा ऐसा मेरा यकीन है ।
अखबारों में सबको छपने के लिए जगह मिलना मुश्किल है, उनके पास ढ़ेर सारी रचनाएं आती हैं और संपादकों के लिए यह मुश्किल हो जाता है कि किसे छापे और किसे नहीं।
दीपक भारतदीप

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