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12/16/07

नये और फ्लॉप लेखक स्वाध्याय के लिए लिखें (hindi ke lekhak aur kavi-hindi lekh)

अंतर्जाल पर हिन्दी के लेखकों के साथ पाठकों की संख्या बढ़ रही है और जैसे-जैसे लोगों को यहाँ हिन्दी में लिखने की जानकारी मिलेगी इस्मने उतरोत्तर बढोतरी होगी। मैं हमेशा कहता आया हूँ की हिन्दी के लिए पाठक इसी देश में मिलेंगे और जिन्हें अपने ब्लोग से रोजगार अर्जित करना हैं उनके लिए इस देश के पाठकों से उम्मीद करना ठीक रहेगा। जब हिन्दी विदेशियों को यहाँ रोजगार दिला रही है तो अपने देश के लोगों के लिए यह संभव क्यों नहीं है?

जब से मैंने ब्लागस्पाट.कॉम के ब्लोगों पर लगाए काउंटरों का अवलोकन शुरू किया है यह साफ लग रहा है कि इस देश के पाठकों की संख्या अधिक है। इसमें संशय नहीं है कि भारत के बाहर लोग भी बहुत है और नियमित रूप से इन ब्लोग को देख रहे है और उसी के कारण कुछ ब्लोग लिखने वाले कभी रोमन लिपि तो कभी वर्गीकरण के विषयों पर अपने विचार इस तरह व्यक्त करते हैं कि केवल विदेशी पाठक ही इनके लिए उपलब्ध हैं और देश के पाठकों से कोई अधिक आशा नहीं है। मेरा मानना इससे अलग रहा है कि अगर दुनिया के हर क्षेत्र के लोग अर्थार्जन के लिए भारत की तरफ देख रहे हैं तो फिर हिन्दी ब्लोग में आय के अर्जन का जरिया केवल अपना देश ही हो सकता है, हाँ विदेश में रहने वाले भारतीय इसे अभी तक जिस तरह इसे ऊर्जा देते रहे हैं वह प्रशंसनीय है। पहले मेरे को भी लगता था कि इतने सारी किताबें और अखबार होते हुए भला हिन्दी का पाठक अंतर्जाल पर क्यों आयेगा? पर मैंने जिन लोगों को अपनी वेब साईटों के पते दिए हैं वह इनको न बल्कि दिलचस्पी से पढ़ रहे हैं बल्कि मेरे ब्लोग पर कमेन्ट देने वालों और लिंकित ब्लोग को भी पढ़कर मुझसे इस बारे में पूछते हैं। वह लोग ब्लोग नहीं लिखते पर पढ़ने का मजा लेने में पीछे नहीं है।
मेरे कुछ मित्र जो मुझे अंतर्जाल के बाहर भी मुझे पढ़ चुके हैं वह अब इस बात से संतुष्ट हैं कि इस पर बहुत अधिक लंबा न लिखा जा सकता है और न पढा जा सकता है इसलिए मुझे अपनी रचनाओं की लंबाई यहाँ छोटी रखने पड़ेगी-साथ में यह शर्त भी रखते हैं कि उसमें मुझे गागर में सागर भरने की नीति अपनानी चाहिए। अपने अनुभव से मैंने सीखा है कि अब अपने ब्लोग पर पठनीय सामग्री लिखने वाले ब्लोगर बहुत प्रसिद्ध होते जायेंगे और उनके विषय रुचिकर होंगे तो आखिर उनको निजी क्षेत्रों से मदद भी मिलेगी-वह किस रूप में होगी यह अभी तय नहीं है पर वह विज्ञापन के रूप में भी हो सकती है या अपने पक्ष में पोस्ट लिखवाने के लिए प्रचार कराने के रूप में भी हो सकती है।

इसलिए मैं नये और फ्लॉप ब्लोगरों को यह साफ कहना चाहता हूँ कि वह लगातार लिखते रहें, और लिखते समय अपनी अभिव्यक्ति को बेखौफ बाहर आने दें और इस बात की परवाह न करें कि उस पर कोई क्या सोचेगा। हाँ, भाषा में सभ्यता और आकर्षण के साथ विषय के महत्त्व का भी ध्यान रखें ।

अब तो बहुत सारे ब्लोगर बहुत अच्छा लिखने लगे हैं और उनसे लोगों को सीखना चाहिए। अब मैं ऐसे ब्लोगरों पर समय मिलने पर समीक्षा लिखता हूँ और इसे नियमित करने का विचार भी है। हाँ, अपनी अभिव्यक्ति के साथ यह भी देखना चाहिऐ कि उस विषय से सामाजिक सरोकार को भी जोड़ना चाहिए। हम जब लिखे तो यह न समझें कि कोई बडे भारी लेखक या ज्ञानी हैं बल्कि स्वाध्याय के रूप में लिखें और लिखते हुए सीखें भी क्योंकि जब वह अपने को सिखाने लायक लिखेंगे तभी तो दूसरा उससे सीखा और समझ सकेगा ।कभी किसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया न मिले तो निराश नहीं होना चाहिए पर अगर आप दमदारी से लिखेंगे तो आपको कमेन्ट भी मिलेगी।

चौपालों के बाहर भी दुनिया है और आम पाठक वहीं आते हैं। मैं अपने ब्लोग पर भारत के महापुरुषों के सन्देश अपने स्वाध्याय की दृष्टि से रखता हूँ और चौपालों पर उनके पाठक इतने नहीं होते पर जब व्युज देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि केवल मैं वही लिख रहा हूँ,अन्य विषयों पर इतना नहीं। भारतीय आध्यात्म की जड़ें कितनी गहरी हैं मुझे अंतर्जाल पर लिखने से ही पता लगा है। खुले विचार से जिस विषय में लिखना है लिखो। अपनी श्रेणी को लेकर अधिक मत सोचो। यह अंग्रेजी की परंपरा है अपने देश में तो मेडिकल में पढे डाक्टर जो स्वास्थ्य पर लिखते हैं वह भी कविता लिखते हैं। आपको किसी वेब साईट पर किसी श्रेणी में रखा जायेगा तो किसी और में अन्य श्रेणी में रखा जायेगा। मेरे ब्लोग कई वेब साईटों पर दिखाए जाते हैं और कुछ तो पूरी तरह अंग्रेजी में हैं।

चौपालों पर एक दोस्ताना माहौल है, आप को कमेन्ट भी तभी मिलेगी जब आप दूसरों को देंगे। सब कमेन्ट देने वाले आपको दें या सबको आप दें पाए यह जरूरी नहीं पर यह क्रम चलता ही रहेगा। एक बाट है कि कमेन्ट देने के लिए मत पढो बल्कि पढ़कर कमेन्ट दो क्योंकि कई ब्लोग ऐसे हैं जिनको पढ़कर हम सीख सकते हैं दूसरा यह कि लिखने के तरीक भी हमारे समझ में आता है-मैंने यहाँ इन ब्लोगों को देखकर ही बहुत कुछ सीखा है। मेरी तो एक और मान्यता है कि इन चौपालों पर आये बिना कोई भी अच्छा ब्लोगर नहीं बन सकता, अन्य कारणों से प्रसिद्ध होने पर किसी ब्लोगर को सफलता मिल जाये पर लिखने की वजह से वही सफल होंगे तो यहाँ पढेंगे और लिखेंगे।

मुख्य चीज है लिखना और उसमें आपको अपने विचारों और दृष्टिकोण व्यापक रखना होगा केवल चौपालों तक सीमित रहने से आपके विषय संकुचित होंगे-यह चौपालें हिन्दी के लेखकों को आपस में संपर्क रखने तथा उन्हें लिखने के लिए प्रेरित करने में ही बहुत सहायक हैं-जिस तरह बाहर चलते हुए लेखक मित्र मिलते है तो यहाँ भी आपको मित्र मिलेंगे पर अगर आप चाहते हैं कि आपको और अधिक पाठक देखे तो आपको अपनी सीमा से बाहर निकलना होगा। हालांकि व्यापक दृष्टिकोण वाले विषय चौपालों पर तभी कमेन्ट दिलवाते हैं जब आप स्वयं भी देते हैं वरना अधिक कमेन्ट नहीं दिलवाते पर बाहर अधिक संख्या में पाठक उन्हें पढ़ते हैं। यहाँ आप दूसरों का मनोबल बढाने के लिए कमेन्ट दें तो आपको भी मिलेंगे। इस प्रक्रिया में लिप्त होने से मनोबल और मित्रता बढ़ती है। मैंने यहाँ इतने सारे मित्र पाए हैं कि यकीन नहीं होता पर आखिर मेरा लक्ष्य अपनी बात अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचाना है और इसी प्रयास में भी रहता हूँ।
आखरी बात अपना ब्लोग अपने अंतर्जाल पर पढ़ने वाले मित्रों को अवश्य पढाये और इतना ही नहीं अपने उन मित्रों को उस हिन्दी टूल से अपने मित्रों को अपने ईमेल पर हिन्दी लिखने के लिए प्रेरित करें। अभी इसलिए लोग हिन्दी पढ़ने में नाक भौं सिकोड़ते हैं क्योंकि इस पर लिख नहीं सकते-इसलिए अंग्रेजी का ठुमका लगते हैं कि हमारी कहीं सामने वाले को हेठी न लगे। अगर बेहतर विषय होंगे तो हिन्दी के पाठक बढेंगे। यह मैंने अपने जैसे नये और फ्लॉप ब्लोगरों को अपने संक्षिप्त अनुभव से जो जानकारी दे रहा हूँ। कुछ कमी पेशी रह गई हो तो अनदेखा कर देना। अभी रास्ता बहुत लंबा है और इसके लिए हम सबको प्रयास करने होंगे।
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10/27/07

समाज सेवा यानि आत्म प्रचार और विज्ञापन

आखिर समाज सेवा है क्या? उसका स्वरूप क्या है? यह आज तक कोई नहीं समझ पाया। हमें तो अपने धर्म ग्रंथों से यही सन्देश पाया है की सहृदय, दयालु, परोपकारी और दानशील बनो-अब यह पता नहीं है की इससे समाजसेवा होती है की नहीं।

आए दिन कहीं न कहीं सुंदरी प्रतियोगिता होती है तो कहीं नाच-गाने के कार्यक्रमों को ही प्रतियोगिता के रूप में पेश किया जाता है जिसके विजेता अपना अगला कार्यक्रम 'समाज सेवा" बताते हैं। कई बडे लोग अपने नाम के आगे समाज सेवी का परिचय लगवाते हैं तो कुछ बुद्धिजीवी भी और कुछ नहीं तो अपने नाम के आगे 'सामाजिक कार्यकर्ता' कहलाते हैं। कहा जाता है जो कुछ नहीं कर सकता वह राजनीति में चला जाता है और वह भी नहीं कर सकता वह समाज सेवा में चला जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह हो गई है की अब समाज सेवा के लिए धन जुटाने हेतु प्रतिष्ठित खेलों के मैच और नाच-गाने के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाने लगे हैं-उनसे कितनी सेवा होती है कभी पता ही नहीं चलता।


वैसे किसी गरीब की आर्थिक सहायता करना, असहाय बीमार की सेवा सुश्रुपा करना और जिन्हें विद्या की आवश्यकता है पर वह प्राप्त करने में असमर्थ हैं उनका मार्ग प्रशस्त करना ऐसे कार्य हैं जो हर समर्थ व्यक्ति को करना चाहिए। इसे दान की श्रेणी में रखा जाता है और यह समर्थ व्यक्ति का दायित्व है कि वह करे। इतना ही नहीं करने के बाद उसका प्रचार न करे क्योंकि यह अहंकार की श्रेणी में आ जायेगा और उस दान का महत्व समाप्त हो जायेगा। कहते भी हैं कि नेकी कर और दरिया में डाल। अगर हम अपनी बात को साफ ढंग से कहें तो उसका आशय यही है कि व्यक्ति की सेवा तो समझ में आती है पर समाज सेवा एक ऐसा शब्द है जो कतिपय उन कार्यों से जोडा जाता है वह किये तो दूसरों के जाते हैं पर उसमें कार्यकर्ता की अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढाने में सहायक होते है- और कहीं न कहीं तो इसके लिए उनको आर्थिक फायदा भी होता है।

आजकल टीवी और अखबारों में तथाकथित समाज सेवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम आते रहते हैं। अगर उनकी कुल गणना की जाये तो शायद हमारे समाज को विश्व का सबसे ताक़तवर समाज होना चाहिऐ पर ऐसा है नहीं क्योंकि उनसे कोई व्यक्ति लाभान्वित नहीं होता जो समाज की एक भौतिक और वास्तविक इकाई होता है। समाज सेवा बिना पैसे के तो संभव नहीं है और समाज सेवा के नाम पर कई लोगों ने इसलिए अपनी दुकाने खोल रखीं है ताकि धनाढ्य वर्ग के लोगों की धार्मिक और दान की प्रवृति का दोहन किया जा सके। कई लोग समाज सेवा को राजनीति की सीढियां चढ़ने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। आजकल समाज सेवा की नाम पर जो चल था है उसे देखते हुए तो अब लोग अपने आपको समाज सेवक कहलाने में भी झिझकने लगे हैं। समाज सेवा एक फैशन हो गया है।

एक आदमी उस दिन बता रहा था कि सर्दी के दिनों में एक दिन वह एक जगह से गुजर रहा था तो देखा एक कार से औरत आयी और उसने सड़क के किनारे सो रहे गरीब लोगों में कंबल बांटे और फुर्र से चली गयी। वहाँ कंबल ले रहे एक गरीब ने पूछा'आप कौन हैं, जो इतनी दया कर रहीं है?'

उसने हंसकर कहा-'मैं कोई दया नहीं कर रहीं हूँ। ईश्वर ने जो दिया है उसे ही बाँट रही हूँ। मैं तो कुछ भी नहीं हूँ। यह सब भगवान की रची हुई माया है।'

उस आदमी ने वहाँ खडे होकर यह घटना देखी थी। उसका कहना था कि 'कंबल भी कोई हलके नहीं रहे होंगे।'

कुछ धनी लोग दान करना चाहते हैं पर नाम नहीं देना चाहते इसलिए वह बिचोलियों का इस्तेमाल करते हैं जो समाजसेवा की आड़ में उनके पास पहुच जाते हैं, और चूंकि उनका मन साफ होता है इसलिए कोई सवाल जवाब नहीं करते-पर इससे तथाकथित समाज सेवियों की बन आती है।

आज के ही अखबार में पढा कि एक गरीब लड़की के इलाज के लिए पैसे देने की पेशकश लेकर एक आदमी उनके दफ्तर में पहुंच गया पर उसने शर्त रखी कि वह उसका नाम नहीं बताएँगे। उस अखबार ने भी उसकी बताई राशि तो छाप दी पर नाम नहीं लिखा। अब चूंकि वह एक प्रतिष्ठित अखबार है तो वह रकम वहाँ तक पहुंच जायेगी पर कोई तथाकथित समाज सेवी संस्था होती तो हो सकता है उसके लोग उसमें अपनी भी जुगाड़ लगाते। मैंने पहले ही यह बात साफ कर दी थी की व्यक्ति की सेवा तो समझ में आती है समाज सेवा थोडा भ्रम पैदा करती है। व्यक्ति की अपनी जरूरतें होती हैं और उसको समाज से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता।

अब तो कई बार समाज सेवा शब्द भी मजाक लगने लगता है जब उसके नाम पर संगठन बनाए जाते हैं और कहीं तो आन्दोलन भी चलते हैं. आन्दोलन शब्द ही राजनीति से जुडा है पर उसमें विवाद होते हैं उसकी वजह से सामाजिक आन्दोलन के नेता अपने को सामाजिक कार्यकर्ता ही कहते हैं. यह अलग बात है की सुविधानुसार वह करते तो किसी न किसी तरह वह सुर्खियों में बने रहते हैं. सच तो यह है समाज सेवा अभी तक साफ सुथरा शब्द है इसलिए कई लोग इसकी आड़ में अपनी छबि चमकाते हैं. ऐसा नहीं है की देश में गरीबों और निराश्रितों की सेवा करने वाले संगठन नहीं है पर वह इस प्रचार से दूर रहते हुए अपने काम करते हैं और जो प्रचार करते हैं वह व्यक्ति की सेवा कम अपने नाम के लिए ज्यादा काम करते हैं. उनका लक्ष्य समाज सेवा यानि आत्म प्रचार और विज्ञापन है.

9/11/07

शाश्वत प्रेम के कितने रुप

'प्रेम' शब्द मूलरूप से संस्कृत के 'प्रेमन' शब्द से उत्पन्न हुआ है। प्रेम का शाब्दिक अर्थ है-'प्रिय का भाव'। ऐक अन्य प्रकार की व्युत्पत्ति दिखाई देती है, जहाँ प्रेम को 'प्रीञ' धातु से मनिन' प्रत्यय करके सिद्ध किया गया है (प्रीञ+मनिन=प्रेमन)। इस द्वितीय व्युत्पत्ति के अनुसार प्रेम का अर्थ है-प्रेम होना, तृप्त होना, आनन्दित होना या प्रेम, तृप्त और आनंदित करना।
निर्गुण-निराकार ब्रह्म को अद्वैत मतावलंबियों 'सच्चिदानंद' कहा है। वह सत है क्योंकि उसका विनाश नही होता, वह चित है क्योंकि स्वयं प्रकाशमान और ज्ञानमय है तथा आनंद रुप है इसलिये कि वह प्रेममय है। यदि वह आनंदात्मक न हो तो उसके अस्तित्त्व और और चैतन्य की क्या सार्थकता रह जायेगी। सत-चित का भी प्रयोजन यह आनंद या प्रेम ही है। इसी प्रेम लक्षण के वशीभूत होकर वह परिपूर्ण, अखंड ब्रह्म सृष्टि के लिए विवश हो गया। वह न अकेले प्रेम कर सका , न तृप्त हो सका और न आनंद मना सका। तब उसके मन में एक से अनेक बन जाने की इच्छा हुई और वह सृष्टि कर्म में प्रवृत्त हुआ।
आनंद स्वरूप प्रेम से ही सभी भूतों की उत्पत्ति होती है, उसमें ही लोग जीते हैं और उसमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यही तथ्य तैत्तिरीयोपनिषद (३.६) की पंक्तियों में प्रतिपादित किया गया है।
प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड और उससे परे जो कुछ है- सब इसकी परिधि में आ जाते हैं। प्रेम संज्ञा भी है और क्रिया वाचक भी है। संज्ञा इसलिये कि सब में अंत:स्थ भाव रुप (मन का स्थायी भाव) है और यह भाव व्यक्त भी होता है अव्यक्त भी। क्रियात्मक इसलिये कि समस्त चराचर के व्यापारों का प्रेरक भी है व्यापारात्मक भी है। किन्तु मूल है अंत:स्थ का अव्यक्त भाव, जो अनादि और अनंत है, जो सर्वत्र और सब में व्याप्त है। यही अव्यक्त भाव रुप प्रेम सात्विक, राजस और तामस इन तीन गुणों के प्रभाव से विविध विकारों के रुप में बुद्धि में प्रतिबिंबित होता है और व्यवहार में व्यक्त होता है ।
यही प्रेम बडों के प्रति आदर, छोटों के लिए स्नेह, समान उम्र वालों के लिए प्यार, बच्चों के लिए वात्सल्य, भगवान् के प्रति भक्ति , आदरणीय लोगों के लिए श्रद्धा, जरूरतमंदों के प्रति दया एवं उदारता से युक्त होकर सेवा, विषय-सुखों के संबध में राग और उससे उदासीनता के कारण विराग, स्व से (अपने से) जुडे रहने से मोह और प्रदर्शन से युक्त होकर अहंकार, यथार्थ में आग्रह के कारण सत्य, जीव मात्र के अहित से विरत होने में अहिंसा, अप्रिय के प्रति अनुचित प्रतिक्रिया के कारण घृणा और न जाने किन-किन नामों से संबोधित होता है। प्रेम तो वह भाव है जो ईश्वर और सामान्य जीव के अंतर तक को मिटा देता है। जब अपने में और विश्व में ऐक-जैसा ही भाव आ जाय, और बना रहे तो वह तीनों गुणों से परे शुद्ध प्रेम है।
यह प्रेम साध्य भी है प्रेम पाने का साधन भी है। साधारण प्राणी सर्वत्र ऐक साथ प्रेम नहीं कर सकता-इस तथ्य को देखते हुए ही हमारे देश के पूज्य महर्षियों ने भक्ति का मार्ग दिखाया जिससे मनुष्य अदृश्य ईश्वर से प्रेम कर सके। इन्द्रियों के वशीभूत दुर्बल प्राणियों के लिए ईश्वर से प्रेम की साधना निरापद है जबकि लौकिक प्रेम में भटकाव का भय पग-पग पर बना रहता है। ईश्वरीय प्रेम को सर्वोच्च प्रतिपादित करने के पीछे यही रहस्य छिपा है और ईश्वरीय प्रेम का अभ्यास सिद्ध होने के पश्चात प्राणी 'तादात्म्य भाव' की स्थिति में आरूढ़ हो जाता है और तब शुद्ध प्रेम की स्थिति उसे स्वयंसिद्ध हो जाती है। प्रेम की इस दशा में पहुंचकर साधक को अपने ही अन्दर सारा विश्व दृष्टिगोचर होने लगता है और संपूर्ण विश्व में उसे अपने ही स्वरूप के दर्शन होने लगते है। समस्त चराचर जगत में जब अपने प्रियतम इष्ट के दर्शन होने लगें तो समझ लेना चाहिऐ कि हमें अनन्य और शाश्वत प्रेम की प्राप्ति हो गयी।
(कल्याण से साभार)
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9/8/07

भगवान् की कृपा के स्वरूप

बहुत से लोगों की एसी धारणा होती है कि जब भगवान् की कृपा होती है तब ही धन-ऐश्वर्य, स्त्री-पुत्र, कीर्ति तथा अनेकानेक भौतिक एवं दैहिक भोगों की प्राप्ति होती है। वह मानते हैं कि जिन लोगों के पास भौतिक साधनों और भोग की प्रचुरता है बस उन्हीं पर भगवान् की कृपा है। लोग यह भी मानते हैं कि भगवान विपत्ति को टाल देते हैं। भगवत कृपा का इतना छोटा अर्थ समझने वाले लोग वाकई दया की पात्र है, उन्हें भगवान की कृपा का वास्तविक अर्थ ही नहीं मालुम है।
अगर देखा जाये तो संपत्ति या विपत्ति से भगवान की कृपा का पता नहीं लगा सकता है क्योंकि वह तो नित्य दिन हम पर होती है और उसका स्वरूप अपार है और संसार के समस्त प्राणियों पर उस परमात्मा कृपा-सुधा की वर्षा हो रही है! जो लोग उसका यथार्थ अनुभव न कर केवल विषयों की प्राप्ति समझते हैं वे ही लोग विषयों के नाश या अभाव में भगवान् प्र पक्षपात तथा अन्याय और कृपालु न होने का आरोप लगा देते हैं। सच्ची बात तो यह है कि भगवान का कोई भी विधान कृपा से शून्य नहीं होता, कृपा करना तो उनका स्वभाव है। उनके विधान में पापी को दण्ड देना भी शामिल है।
इसमें संशय नहीं है कि कृपा का आन्तरिक स्वरूप तो सदा ही सरस, मनोहर और मधुर होता है, परंतु बाहर कभी वह सुन्दर से सुन्दर और कभी भीषण से भीषण रुप में प्रकट होती है। किसी समय उसका स्वरूप फूल से भी कोमल लगता है तो कभी वज्र से भी अधिक कठोर होता है।
जिन विवेकी और कल्याणकामी पुरुषों ने विषयों की प्राप्ति के लिए भगवान कृपा को साधन नहीं माना वही सच्चे त्यागी और भगवत प्रेमी है। वह इन दोनों रूपों में भगवत कृपा का अनुभव कर कृतार्थ होते हैं, परंतु जो अल्पबुद्धि प्राणी केवल आपात-रमणीय विषयों को ही ऐक मात्र सुख का साधन मानते है, वे अदूरदर्शी और अविवेकी मनुष्य भगवत कृपा के मनोहर रूपों के देखकर तो अत्यंत आह्लादित होते हैं और उस भीषण रुप को देखकर भय से काँप उठते हैं।
(कल्याण से साभार)

8/25/07

कौटिल्य अर्थशास्त्र:दुष्ट के साथ संधि न करें

  1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।
  2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
  3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
  4. सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
  5. डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम मैं वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
  6. धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
  7. संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
  8. समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।

8/4/07

दूर के ढोल सुहावने

"द फाल ऑफ़ ए डायनेस्टी, दिल्ली १८५७" किताब के लेखक जाने-माने इतिहासकार विलियम डेरिम्पल के अनुसार पश्चिमी मीडिया के यह सोच ही गलत है कि भारत की तरक्की अपने आप में कोई 'चमत्कार' है। उनकी राय में तो यह एक बार फिर दुनिया भर के कारोबार की पुरानी परंपराओं पर लौटना मात्र है।

भारत में कुछ लोग अपने देश में भौतिक साधनों की बहुलता के चलते इतने भ्रमित हो गये हैं कि उन्हें विश्व के विकसित देशों की मुक़ाबले अपने देश का विकास अत्यंत नगण्य लगता है और कभी पहले सोवियत सोवियत संघ, जर्मनी और जापान जैसा अपने देश को बनाने का विचार आता था तो अब भारत को चीन और अमेरिका जैसा बनाने की बात चल रही है। सबसे बड़ी बात यह है जिन लोगों ने अंग्रेजी पढी है और लिखना भी सीख लिया है उन्हें अपना देश हमेशा अविकसित और पिछडा ही दिखाई देता है- उनके लिए विकास का अर्थ है केवल आर्थिक और भौतिक विकास ही है। भारत की प्राचीन परंपराएं और संस्कार उनके लिए भोंदूपन का परिचायक है-ऐसे लोग यह जानने का प्रयास ही नहीं करते कि विश्व में भारत का सम्मान उसकी उन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं की वजह से है जिससे भौतिकता से उपजे तनाव में शांति की स्थापना होती है। भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण के चरित्र पर आज भी विकसित राष्ट्रों में शोध चल रहे हैं और उनके संदेशों को नये संदर्भों में भी उतना उपयुक्त पाया गया है जितना प्राचीन समय में देखा जाता था। भगवान महावीर, बुद्ध और गुरूनानक जीं के संदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक है, यह बात विदेश के विद्वान कह रहे है और हमारे देश के कुछ विद्वान लोगों को यहाँ अंधविश्वास, कुरीतिया और पिछडापन ही दिखाई देता है।

विकास!बस विकास! देश में भौतिक साधनों के कबाडे को एकत्रित करना ही विकास का परिचायक नहीं हो सकता। कबाडा मैंने इसलिये कहा क्योंकि हर वस्तु का मोडल तीन माह में पुराना हो जाता है। एक साल में नयी तकनीकी आ जाती है और अपने घर में रखी चीज ही कबाड़ दिखाई देती है। लोग कहते हैं कि चीन ने बहुत विकास किया है और उसकी चीजें बहुत सस्ती हैं। मैं उस दिन अपने घर की सफाई कर रहा था तो मैंने देखा के अनेक चीनी वस्तुओं का कबाड़ उनमें भरा पडा था। उसकी कई चीजे जो मैं सस्ती और उपयोगी समझ कर ले आया था वह एक या दो दिन और अधिक से अधिक एक सप्ताह चलीं थीं। उससे आठ गुना महंगी भारतीय वस्तुएं आज भी अपनी काम दे रहीं है। तब मुझे लगता है कि वास्तव में विश्वसनीयता ही भारत की पहचान है और मुझे इस पर गर्व होता है।
आज जो भारत का स्वरूप है वह हमारी पुरानी पीढ़ियों के परिश्रम, तपस्या और मनोबल के कारण है न कि किसी विदेशी राष्ट्र की कृपा से है। यहाँ के लोगों ने शिक्षा प्राप्त कर विदेश में नाम कमाया है और उन देशों की सेवा की है पर क्या किसी देश ने हमें परमाणु, अन्तरिक्ष या किसी अन्य क्षेत्र में हमें तकनीकी ज्ञान दिया है? कतई नहीं। अनेक भारतीय वैज्ञानिक अमेरिका की सेवा कर रहे है यहाँ उनकी इस बात पर गर्व करते हैं पर क्या अमेरिका ने कभी हमें संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता दिलवाने का वादा किया है ? नहीं, वह ऐसा नहीं करेगा। अभी भी भारत का नाम इस मामले में प्रस्तावित नहीं है । अगर सदस्यता मिली भी तो बिना वीटो पॉवर के मिलेगी जो कि अभी भी बहुत दूर है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी महत्ता खो चूका है और वह अमेरिका की जेबी संस्था बन कर रह गया है।

विकास केवल भौतिक ही नहीं होता वरन मानसिक शांति और और आध्यात्मिक ज्ञान होना भी उसका एक भाग है-और इस विषय में भारत का एकाधिकार है यही वजह है कि भारत को विश्व में आध्यात्म गुरू कहा जाता है। अनेक भारतीयों ने पश्चिम में जाकर आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में भारी-भरकम उपलब्धि प्राप्त की है पर फिर भी इस देश की छबि उनके कारण नहीं वरन महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद , रामकृष्ण परमहंस और महर्षि अरविंद जैसे मनीषियों और विद्वानों के संदेशों से है-पूरा विश्व उनके संदेशों को मान्यता देता है।
भौतिक विकास एक सामयिक आवश्यकता होता है पर आध्यात्मिक गया और गया और मानसिक शांति के बिना उसका कोई लाभ नहीं होता। जो लोग इस देश को पश्चिम की अवधारणाओं पर चलाना चाहते हैं उन्हें यह बात समझ लेना चाहिए कि गरीबी , अशिक्षा, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी वहां भी हैं और इसी कारण कुछ पश्चिमी देशों में विदेशियों पर हमले भी होते हैं क्योंकि वहाँ के मूल निवासियों को लगता है कि उन लोगों ने उनके अधिकारों का हनन किया है। वैसे भी अपने देश में कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने-इस उक्ति को ध्यान में रखते हुए अपने देश को किसी पश्चिमी देश की स्वरूप में ढाँचे देखने की इच्छा करने की बजाये अपने ही आध्यात्मिक ज्ञान और संस्कारों के साथ प्राचीन विज्ञान को नये संदर्भों में व्याख्या करना चाहिऐ।

7/24/07

असहजता से मिलती है असफलता

क्रोध, निराशा और कष्ट के दौर में हम असहज हो जाते हैं जबकि हमें उसी समय इस गुण की जरूरत होती है। सहज भाव से काम करते हुए हम आसानी से अपना लक्ष्य पा सकते हैं पर मन में आयी व्यग्रता के कारण हम त्रुटिपूर्ण विचार, शीघ्रता और शिथिलता के कारण उचित निर्णय वह भी समय पर नहीं ले पाते और आख़िर हमारे हाथ लगती है असफलता।

हमारी देह शाश्वत नहीं है पर जीवन का स्वरूप शाश्वत है। कोई न कोई तो रहेगा जिसे मिटना है उसे तो मिटना ही है। समय परिवर्तनशील है । आज हमारे साथ नहीं है कल हमारे साथ होगा-और हम अपने दुःख और असफलता से मुक्ति पा लेंगे यह विचार ही हमें सहजता प्रदान कर सकता है।

हम दुसरे की संपन्नता, ऊंचा पद और भौतिक साधनों की उपलब्धता देखकर विचलित हो जाते हैं कि हमारे पास नहीं है वह हमारे विचारों की गरीबी का प्रमाण है और यही बात अन्दर विकट असहज भाव का संचालन करती है, और ऐसे में हमारी दिमागी सूझबूझ काम नही करती और हाथ में लिए काम में ऎसी गलतिया करते जाते हैं कि जो कि हमारा उत्थान तो छोडिये पतन का कारण बनती हैं -हम आगे जाने की बजाय पीछे आ गिरते हैं और हंसी का पात्र बनते हैं ।

जीवन में सहजता का भाव न होने के वजह से अधिकतर लोग हमेशा ही असफल होते हैं। सहज भाव लाने ले लिए हमें एक तो नियमित रुप से योगासन, प्राणायाम और ध्यान करने के साथ ईश्वर का स्मरण अवश्य करना चाहिए। इससे हमारे तन, मन और विचारों के विकार बाहर निकलते हैं और तभी हम सहजता के भाव का अनुभव कर सकते हैं। याद रखने की बात है कि हमारे विकार ही अन्दर बैठकर असहजता का भाव उत्पन्न करते हैं। ईर्ष्या, द्वेष और परनिंदा जैसे गुण हम अनजाने में ही अपना लेते हैं और अंतत: जीवन में हर पल असहज होते हैं और उससे बचने के लिए आवश्यक है कि हम आध्यात्म के प्रति अपने मन और विचारों का रुझान रखें।

7/23/07

विश्वास के साथ ही जीना

अगर कभी आपके साथ विश्वासघात हुआ हो तो उसे भूल जाओ। नहीं भूलोगे तो अपने मस्तिष्क की नसों में अनावश्यक खिचाव पैदा करोगे और अंतत: उससे परेशानी तुम्हें ही होना है। जो हुआ है उसे अब तुम मिटा नहीं सकते, और जिसने विश्वासघात किया है वह तो तुम्हें भुलाकर बडे आनन्द से जीं रहा होगा फिर तुम अपने लिए अनावश्यक रुप से संकट क्यों बढ़ा रहे हो।


चाहे एक नहीं अनेक बार तुम्हारे साथ विश्वासघात हुआ हो फिर भी तुम विश्वास का साथ मत छोड़ना-अपने कर्तव्य से कभी नहीं डिगना। अपने कर्तव्य का निर्वहन करना हमारा धर्म है। फल देना नियति ने तय कर रखा है इसलिये उस पर छोड़ दो। विश्वास का प्रतिफल और विश्वासघात का दण्ड दोनों ही नियति ने तय कर रखे हैं। नियति के अपने नियम हैं और उसी के अनुसार वह चलती है, तुम अपने नियम पर चलो वह यह कि अपने कर्तव्य के अनुसार अपनी भूमिका निभाते जाओ ।

इस प्रथ्वी को देखो जो हम सबको पाल रही है और उसने हमारे जीवन निर्वाह के सारे साधन अपनी गोद में एकत्रित कर रखे हैं। केवल इसलिये कि हम यहाँ बहने वाली जीवन धारा के सतत प्रवाह में उसके सहयोगी हो सकें । क्या हमने कभी उसके लिए कुछ किया है अपना जीवन केवल स्वार्थों में ही बिता देते हैं। अगर कोई हमारे साथ विश्वास घात करता है तो उसमें उसका कोई स्वार्थ होता है और वह भी जीवन की धारा को प्रवाहित ही करता है। उसका हित साधन नियति ने तय किया है तो उसने यह भी तय किया कि जैसे जिसकी नीयत होगी वैसे ही उसके नतीजे भी होंगें।

क्या बबूल पर विश्वास किया जा सकता है। हाँ, अगर आप अपने घर के बाहर किसी पेड का पौधा लगाए तो उसके रक्षा के लिए बबूल के कांटे चारों और से लगा दें तो गाय , भैंस या बकरी जैसे पशु उसे नही खा पाएंगे। अगर आप ऐसे ही पौधे बो देंगे तो उन्हें वह सब खा जायेंगे। मतलब कि बबूल भी पाना विश्वास निभाता है।


इस विश्व में जीवन का आधार ही विश्वास है और वह है जीवन के प्रति निष्ठा! अगर अविश्वास के साथ चलेंगे तो वह प्रकृति के विरुद्ध होगा और उससे हमारा शरीर ही रुग्ण होगा और साथ ही बढेगा मानसिक संताप और हम अपने आपको ही एक तरह से दण्ड देंगे । अत: न केवल अपने जीवन में विश्वास को अपनाएं बल्कि स्वयं भी विश्वस्त बनने का प्रयास करें। कितना भी विश्वासघात हो हमें विश्वास का साथ नहीं छोड़ना चाहिऐ। हाँ सतर्क होना चाहिए पर अविश्वास के साथ नहीं बल्कि विश्वास के साथ। कोई धोकिहा न दे इसके लिए सतर्क रहना चाहिऐ पर कोई दे जाये तो सारी दुनियां को अविश्वसनीय नहीं बताना चाहिए ।

बिना परहित के प्रशंसा नहीं मिलती

आत्म प्रवंचना मनुष्य का स्वाभाविक दोष है जो उसकी मानसिक कुंठाओं, असफलताओं और निराशाओं से प्रकट होता है। यह मनुष्य की प्रवृति है कि वह चाहता है कि लोग उसकी और उसके कर्मों की प्रशंसा करे। इसलिये वह कुछ काम ऐसे चालाकी से करता है कि उसमें स्वार्थ तो उसका सिद्ध हो पर वह दूसरों के लिए हितकर लगे। उसके मन में परमार्थ का भाव बिल्कुल नहीं होता पर वह चाहता है कि उसकी छबि लोगों में एक परमार्थी की बने। यह संभव नहीं हो पाता। क्योंकि सभी लोग तो ऎसी ही चालाकी कर रहे हैं और इस कारण सब एक दुसरे की पोल जानते हैं और कोई एक दुसरे की प्रशंसा तब तक नहीं करता जब तक उससे स्वार्थ सिद्ध न हो और करते हैं भी हैं तो वह झूठी प्रशंसा। समाज में वास्तविक प्रशंसा उसी को मिलती है जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का वाकई कोई ऐसा काम करता है जिससे उसको लाभ होता है या प्रतिष्ठा बढती है तो उसे सच्ची प्रशंसा मिलती है। सबके लिए यह संभव नही है और सब करते भी कुछ नहीं पर लोगों कि मुख से प्रश्नासा सभी चाहते हैं और नहीं मिल पाती तो वह अपने मुहँ से अपनी प्रशंसा कर लोगों को बोर करते हैं।


जब लोग अपने मुहँ मियाँ मिट्ठू बनते हैं तो कोई सामने कहता कुछ भले ही न हो पर मन में या पीठ पीछे उससे अपने बोरियत का अहसास अवश्य व्यक्त करते हैं। अपने सामान्य दायित्व पूरा कर भी लोग समाज से प्रशंसा चाहते हैं। दुसरे के लिए करने का भाव विरलों में ही होता है पर दुसरे के श्रीमुख से प्रशंसा सुनने का लोभ पूरा न होते देख आत्मप्रवंचना में जूट रहते हैं, भला क्या यह संभव है। आप अपने घर के लिए शक्कर लाए और पडौसी उसकी मिठास को अनुभव करे। आप गाडी खरीद कर चलाये और उसका आनन्द दूसरा अनुभव करे। आप अपने कार्यालय में अपना नियमित दायित्व पूरा करें और आपके अधिकारी और सहकर्मी उसकी प्रशंसा करें।


ऎसी बातें संभव नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि आप अनचाहे ही सही थोडा बहुत ही सही परहित का कार्य अवश्य करें और खाली-पीली आत्म-प्रवंचना करेंगे तो मजाक का पात्र बनेंगे ही। प्रशंसा तभी मिल सकती है जब आप अपने कार्य से दुसरे का हित सिद्ध करें ।

7/22/07

तुम भूत से क्यों डरते हो

तुम भूत से क्यों इतना डरते हो


जीते जागते आदमी को


अपने क्रूर इच्छाओं, कामनाओं,


वासनाओं और स्वार्थों की वजह


रौंदते चले जाते हो


कीड़े- मकौडे के तरह


पर भूत के भय से


तुम्हारी आँखें पथरा जाती हैं


पेड के पत्ते की तरह कांपते हो


जब किसी कमजोर को अपने


अरमानों तले कुचल जाते हो


और निरीह पर कभी शब्दों के


तो कभी लकड़ी के डंडे बरसाते



तब तुम्हारी रूह मृत होती है


जो तुम्हारे पापों का बोझ नहीं


उठा पाती और इसलिये तुम्हें


वही डराती है


जब रात में तुम अकेले होते हो

प्रतिमाओं के आंसू निकलना और हैरी पॉटर का जिंदा रहना

हनुमान जी की मूर्ती से आंसू या पानी निकलने और हैरी पॉटर के जिन्दा रहने की ख़बर के बीच आख़िर क्या सामंजस्य हो सकता है ?

हेरी पॉटर सीरीज की सातवीं एवं अंतिम किश्त में उसे जिन्दा रखा गया है और इससे उसके चहेतों में ख़ुशी हुई और ब्रिटेन और अमेरिका के साथ भारत एवं चीन में भी किताब की दुकानों के सामने भी जश्न का माहौल रहा। दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में कई बच्चे रातभर जागें और सुबह चार बजे ही किताब खरीदने दुकानों पर पहुंच गये। मुझे इन सब बातों से बहुत आश्चर्य हुआ है।

इधर कहीं हनुमान जीं की मूर्ती से आंसू या पानी बहने की ख़बर पर मंदिर में लोगों की भीड़ जमा हो गयी। लोग इसे चमत्कार बता रहे थे। ऐसा पहले भी हो चुका है जब गणेश जी कि प्रतिमा के दूध पीने का चमत्कार हुआ था। लोगों के झुंड के झुंड उन्हें दूध पिलाने के लिए चले जा रहे थे- तमाशा देखने वालों में हम भी थे- और यह हमारा दुर्भाग्य था कि जब हम पहुंचे तब तक चमत्कार बंद हो चुका था।

हमारे लिए दोनों घटनाओं में समानता आदमी के मन को लेकर है जो देह का संचालन करता है। अगर प्रतिमा की आंख से आंसू निकलना या उसका दूध पीना अंधविश्वास है तो हैरी पॉटर पश्चिम से आयातित एक बहुत बड़ा भ्रमजाल और मनोरंजक दोनों ही हैं। बस अन्तर है समाचार माध्यमों द्वारा उसके प्रस्तुतिकरण को लेकर है। हैरी पॉटर से व्यावसायिकता जुडी हुई है तो विश्लेषक उसे अपनी मजबूरियों के चलते दिलचस्प बताते हैं और प्रतिमाओं के साथ कोई विज्ञापन नहीं आता उसे अंधविश्वास बताते हैं। पश्चिम वाले भारत को अंधविश्वासों का देश कहते हैं और मैं उनकी बात मान भी लेता हूँ पर हैरी पॉटर के व्यवसाय में जो उन्होने करतब दिखाए हैं उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि पश्चिम वाले भ्रमजाल में जीते हैं और जेम्स बांड और हेरी पॉटर जैसे कल्पित पात्रो की सहारे अपने लोगों के मन पर नियन्त्रण रखते हैं- फिर हमारे बाबा लोग अगर प्रतिमाओं को दूध पिलाकर लोगों का मन खुश कर देते हैं तो उसमें बुराई क्या है?

उनके भ्रमजाल से तो अपने देश का अंधविश्वास ही ठीक है-हालांकि यहाँ के लोग अंधविश्वासी हैं यह मैं नहीं मानता। कई लोग तो केवल मनोरंजन और प्रयोग के लिए इसमें शामिल हो जाते हैं अन्दर से जानते हैं कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है। खबर आती है लोग पहुंच जाते हैं फिर अपने घर चले जाते हैं और भूल भी जाते हैं क्या हुआ था। वापस लोटकर ईश्वर में अपने विश्वास और आस्था के साथ अपने काम में लग जाते हैं पर दुनिया के लोग कहते हैं कि यह देश अंधविश्वास का देश है तो कहते रहें । इस देश के समाचार माध्यम ऎसी खबरों को अंधविश्वास साबित करने के लिए विशेषज्ञ बुला लेते हैं और फिर टिप्पणियों का दौर। इसे सीधे अंधविश्वास करार देने के लिए तमाम तरह के वैज्ञानिक तर्क किये जाते हैं ।

मगर जनाब! यह हेरी पॉटर कौन है? जिसके मरने को लेकर लोग चिंतित थे और उसके जिन्दा रहने पर जश्न मना रहे हैं? कोई पता ठिकाना है ? कमाल है कि कोई भी नही लिख रहा कि यह भ्रमजाल है। वाह री व्यवसायिकता! बड़ी दिलचस्पी से आकर्षक शब्द और चित्रो के साथ इसे इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे कोई इसमें वास्तविकता हो। और कौन लोग हैं ऐसा करने वाले? जो प्रतिमाओं के दूध पीने या आंसू निकलने पर अंधविश्वास का शोर मचाते हैं । मगर जनाब ! एक कल्पित पात्र के लिए लोगों के मन में झूठे जज्बात पैदा करना एक भ्रमजाल रचना नहीं तो और क्या है?

आप यह कतई नहीं समझें कि मैं हेरी पॉटर की किताब पढने का विरोध कर रहा हूँ। अगर आपको किताब पढ़ना है और मिल जाती है तो बडे चाव से पढो। मैं तो इससे भी आगे बढकर इसके लेखक की भी प्रशंसा करूंगा कि आज के इस इलेक्ट्रोनिक युग में किताबों के प्रति लोगों का रुझान पढने के लिए बनाए रख सके। मैं तो उस भ्रमजाल के बात कर रहा हूँ जो व्यवसाय में रचे जाते हैं । मैं जेम्स हेडली की किताबें ख़ूब पढता था और वह इस तरह बाजार में पेश की जाती थी जैसे एकदम नईं हौं। एक बार मैंने उनके बारे में एक जगह पढा तो पता चला कि उनका तो मेरे पढ़ना शुरू करने से पहले ही देहावसान हो चूका था। कुछ लोग तो कहते हैं इस नाम का कोई लेखक ही नहीं था। सत्य क्या है मैं आज तक नहीं जानता। उनकी किताबें पढने में मेरी रूचि थी उनमें नहीं ।

पढना अच्छी बात है फिर इस तरह के भ्रमजाल में लोगों को डालना अजीब सा लगता है। अगर यह ठीक है तो फिर वह भी ठीक है। प्रतिमाओं में आस्था रखने वाले लोग बहुत हैं पर ऐसे अंधविश्वासों में यकीन करने वाले लोगों की संख्या नगण्य है। जितना प्रचार किया जाता है उतना अंधविश्वास मुझे कहीं जमीन पर दिखाई नहीं देता- यह अलग बात है कि किसी के विश्वास को ठेस न लगे इसीलिए कोई किसी को टोकता नहीं है। मैं स्वयं निरंकार ईश्वर का उपासक हूँ पर फिर भी मंदिरों में जाता हूँ क्योंकि वहाँ शांति पूर्ण वातावरण रहता है जहाँ ध्यान लगाने में आसानी होती है। मैं किसी भी प्रकार के अंधविश्वास में यकीन नहीं करता और किताबें भी ख़ूब पढता हूँ और मौका मिला तो हेरी पॉटर भी पढूंगा पर यह भ्रमजाल मुझे अजीब लगता है कि एक कल्पित पात्र के मर जाने पर चिंता और जिन्दा रहने का इस तरह प्रचार किया जाये ।

7/15/07

पूर्वाग्रह से नहीं सदाशयता से लिखें

लेखक को हमेशा सदाशयी होना चाहिए, उसे किसी भी घटना या विचार में अपने पूर्वाग्रहों के साथ नहीं सोचना चाहिए। अगर वह आशय को नहीं समझा तो अपनी रचना के साथ न्याय नही कर पायेगा। अभी मैंने ताज को सरताज बनाने के प्रयासों पर लेख लिखे थे। मैं न तो समर्थन में था न विरोध में। वजह! एक तरफ मैं जानता था कि आजकल प्रचार माध्यम प्रचुर मात्रा में हैं और उन्हें कोई विषय चाहिए लोगों में अपनी सक्रियता बनाए रखने के लिए। दूसरी तरफ मुझे देश के लोगों में-खासतौर से युवा वर्ग में-बौद्धिक और चिन्तन क्षमता की कमी महसूस हो रहे थी। आजकल खुले व्यापार के ज़माने में ऐसे कई और अभियान आएंगे और वाणिज्य का विधार्थी रह चुकने के कारण मुझे पता है प्रचार से किस तरह पैसा कमाया जाता है।


वैचारिक धरातल पर तटस्थ रहने के बावजूद एक लेखक के रुप में मैंने अपनी बात रखी। कुछ लोगों ने असहमति दीं और कुछ ने समर्थन, पर यह मेरे लिए नहीं उस रचना के लिए था जो मैंने लिखी थी। ऐसा भी प्रतीत हुआ कि लोगों ने अपने विचारों के साथ ही उसे पढा, क्योंकि वह निरपेक्ष भाव से लिखी गयी थी। मैंने उसमें यह कहीं भी नहीं लिखा था कि ऐसा करना गलत है या सही, पर लोगों ने अपने ढंग से इस पर विचार रखे। अगर मैं अपने पूर्वाग्रहों-जो कि वैसे भी मुझमें नहीं थे-के साथ इसे लिखता तो विरोध या समर्थन मेरे लिए होता और रचना कम मुझे अधिक जाना जाता और यही मुझे पसन्द नहीं है। एक लेखक को यह सोचना चाहिए जो भी कोई घटना होती है या विषय चर्चा के लिए प्रकट होता है वह कई तत्वों और तथ्यों से प्रभावित होता है , और अगर वह उन पर सदाशयतापूर्ण दृष्टिकोण रखेगा तो उनकी वास्तविकता और गहराई को समझ पायेगा तभी उसकी रचना प्रभावपूर्ण बन पायेगी।


मैंने कई लेखकों की रचनाएं देखीं हैं और वह पहले से ही तय कर देते हैं उन्हें लिखना क्या है? कोई घटना या विषय सम्मुख आने पर उसकी विवेचना करने की बजाय वह अपनी रचना का स्वरूप तय कर लेते है और होता यह है कि विषय के प्रति अधिक ज्ञान न होने की वजह से वह उस रुप में भी नहीं प्रस्तुत कर पाते जिसमें सोचा होता है। क्योंकि उनके विचारों की सोच सतही स्तर पर होती है और जिस तरह तालाब की सतह का पानी हवा के झोंके से अपनी जगह बदल देता है वैसे रचना लिखते समय शब्द और व्याकरण के चयन में लेखक के दिमाग में जो झोंके आते हैं वह रचना के स्वरूप को बिगाड़ देते हैं। जिस तरह तालाब की गहराई में स्थित जल हवा के झोंकों में ज्यादा देर तक स्थिर रहता है वैसे ही जिस लेखक के मन में अगर विचारों की गहरायी है तो उसकी रचना भी वैसे ही लोगों के सामने आयेगी जैसे उसक हृदय पटल पर अंकित है।


यह तभी संभव है जब लेखक अपने सामने किसी घटना या विषय के सम्मुख आने पर उसके प्रति सदाशयी दृष्टिकोण रखे और अगर वह अपने पूर्वाग्रहों से देखेगा तो कभी भी पाठकों को आंदोलित करने वाली रचना प्रस्तुत नहीं कर पायेगा। यह अलग बात है कि अन्य कारणों की वजह से उसे प्रकाशित होने के अवसर ज्यादा मिलें और उसे तमाम के तरह पुरूस्कार भी मिल जाएँ पर उसके नाम पर कोई ऎसी रचना नहीं होगी जिसकी याद कुछ समय बाद में भी की जाये। आजकल हमारे देश में यही प्रचलन में हो गया है कि नाम और नामा कमाने वाले लेखक बहुत हैं पर पाठक हैं कि अच्छी रचनाओं के लिए तरस रहे हैं। (शेष अगले अंकों में -दीपक भारतदीप )

6/26/07

भयभीत पर उसका भय ही करता है शासन-चिन्तन

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है'भय'! सभी व्यक्ति किसी न किसी से डरते हैं। मनुष्य पर कोई शासन करता है तो उसके अन्दर मौजूद 'भय का भाव'!इसीलिये शासन करने वाले उसे हथियार की तरह उपयोग में लाते हैं।
सब जीवों में बौद्धिक रुप से सबसे शक्तिशाली जीव है और इसीलिये शासक म्रत्युदंड का , सेठ-साहूकार भूख का , और धर्म प्रचारक ईश्वर और नरक का भय दिखाकर पूरे समुदाय पर अपना नियंत्रण रखते हैं। अपमान,मृत्यु, भूख और बीमारी के भय से ग्रसित आदमी अपने उद्धार के लिए कहीं भी अपनी बुद्धि गिरवी रखने को तैयार हो जाता है। इस संसार में मनुष्य ही ऐसा एक जीव है जिसकी देह की मृत्यु के पश्चात कोई जरूरत नहीं रह जाती-पर जीवित रहते उसके देह की बहुत उपयोगिता होती है और उसका उपयोग तभी संभव है जब उसकी बुद्धि पर नियन्त्रण कर लिया जाये इसीलिये चालाक लोग उसकी बुद्धि को गिरवी रखने के लिए तमाम तरह की योजनाओं और उपायों का आविष्कार कर गये हैं जिनका उपयोग आज तक हो रहा है-रुढियों,रीतियों,और मान्यताओं के नाम पर फुसलाने का काम सदियों से चल रहा है।
मनुष्य में बौद्धिक तत्व की प्रधानता के कारण उसमें ज्ञानार्जन के साथ उसका उपयोग करने की असीम क्षमता है।फिर भी इसके साथ उसमें अकेलेपन का भय विद्यमान रहता है और समूह में रहने की प्रवृति के चलते वह एक समूह बनाकर रहना चाहता है। इस तरह अनेक समूह होते हैं आदमी को लगता है कहीं उस पर आक्रमण न हो जाये इसीलिये वह अपने समूह को मजबूत देखना चाहता है। आजकल हम जति, भाषा, धर्म और क्षेत्रों के नाम पर जो समूह बने देखते हैं, वह इसीका परिणाम है। हम इन्हें आजकल समाज भी कहते हैं।
जब समूह बनता है तो फिर उसके लिए नियम और नेतृत्व होना जरूरी है। नियम के अनुसार समूहों को चलाने का दायित्व और अधिकार शीर्ष नेतृत्व को सौंपा जाता है। फिर शुरू होता है नेतृत्व या कहें समूह प्रमुख का खेल। एक बार शासन और सम्मान मिल गया तो फिर उसे बनाए रखने के लिए दांव-पेंच और जोड़-तोड़ के लिए अपनी सारी शारीरिक और बौद्धिक ताकत के उपयोग का प्रयास केवल इसीलिये होता है ताकि लोगों पर उनका प्रभाव निरन्तर बना रहे। उनकी इस सक्रियता को राजनीति भी कह सकते हैं ।
व्यक्ति में बुद्धि है तो सोच होगी और वह तमाम तरह के प्रश्न उठाएगा और जवाब मांगेगा इसीलिये समूह प्रमुख दुसरे समूह के भय को बनाए रखना चाहते हैं , इतना ही नहीं वह उसके अन्दर भी तमाम तरह के तनाव बनाए रहते हैं ताकि समूह या समाज के लोग एक दुसरे से डरें और कभी भी उसके नेतृत्व की क्षमता और योग्यता पर कोई उंगली न उठा सके-अगर कोई एक उठाएँ तो दूसरा उसका विरोध करे ऐसे व्यूह रचना की जाती है। दुसरे समूह प्रमुख से कभी दोस्ती और कभी दुश्मनी का खेल खेलते रहो ताकि लोग अपने समूह प्रमुख पर अपनी दृष्टि लगाए रहें । यह खेल आज का नहीं है सदियों से चल रहा है । संदर्भ, विषय , नाम और व्यवस्थाओं के स्वरूप बदले पर मूल भाव वही रहा कि आदमी की मन में मौजूद भय की भावना से ही उस पर शासन करो।
आदमी के अन्दर एक और भय कि उसके मरने का बाद क्या होगा। उसके लिए एक और ठेकेदार बने जो उसे नरक से बचाकर स्वर्ग का टिकट दिलाने की सौ फ़ीसदी गारंटी देते हैं । इन लोगों का वर्ग इतना अधिक ताकतवर बन गया कि शासक और सेठ-साहूकार वर्ग के लोग तक इनके पास अपनी बुद्धि गिरवी रखें लगे। इसका सीधा अर्थ यही है कि आदमी चाहे अपने जीवन में जो भी हो पर स्वाभाविक कमियाँ सब में एक समान होती हैं-जिससे सामान्य आदमी डरता है खास पर भी वह अपना प्रभाव बनाए रहता है।
इस वर्ग ने बिना अस्त्र-शस्त्र के हर जति, धर्म ,भाषा, प्रदेश, और राष्ट्र पर राज किया और वह भी केवल अपनी बुद्धि से दूसरों में भ्रम पैदा कर- ऎसी अज्ञात शक्ति का भय जो वास्तव में कभी हमारी शत्रु हो ही नहीं सकती। हम सत्कर्म करें , अच्छे बुरे की पहचान समझें, अक्षम को सक्षम बनाएं और अपनी वाणी पर नियन्त्रण करें तो किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है, पर डर है कि लगता है और हम उससे बचने के लिए ऐसे लोगों की शरण में जाते हैं जो डर भगाने का व्यापार करते हैं-और वह इसका ख़ूब लाभ उठाता है ।
सेठ-साहूकार हमेशा लोगों के भूख का भय दिखाकर उन्हें अपने नियंत्रण में रखते हैं। हर आदमी धनिक की खुशामद करता है भले ही कोई तात्कालिक रुप से आर्थिक फायदा हो या न हो, पर यह भय बना रहता है कि कब उनके पास जाकर पैसे मांगने की जरूरत पड़ जाये। धनिकों की जीं हजुरी करने वालों की संख्या उनसे लाभ लेने वालों से कहीं ज्यादा इसीलिये दिखती है क्योंकि अनेक लोग तो केवल भावी लाभ की आशा में उनके साथ लग जाते हैं।
यह भय एक हथियार के रुप में अब ज्यादा ही इस्तेमाल होता है कि लोग अपने मुहँ से ही अपने बाहुबल और ऊंची पहुंच होने के दावे करते मिल जायेंगे ताकि लोग उनसे डरें। अब लोगों में सीधा, सरल और सात्विक दिखने की बजाय स्वयं को शक्तिशाली दिखने की होड़ लगी रहती, और कुछ तो भयावह दिखने का भी प्रयास करते हैं।
कुल मिलाकर भय वह भाव या हथियार है जो एक चालाक और शक्तिशाली आदमी को दुसरे पर शासन कराने की सुविधा प्रदान करता है। जो भयमुक्त होकर जीते हैं वही असली जीवन जीं पाते हैं। मजे की बात यह है कि हम जिनसे डरते हैं वह भी किसी से डरते हैं तब क्यों न मुक्त भाव से जियें।एक बात याद रहे दुसरे को वही भय दिखाते हैं जो स्वयं अन्दर से डरे रहते हैं। अपने इष्ट का नित -प्रतिदिन स्मरण, ध्यान और योग के द्वारा हम अपने भय पर काबू पा सकते हैं।( इस विषय पर शेष चर्चा अगले अंक में )

6/15/07

नारद- अपनों से अपनी बात

इस समय मैं नारद पर चल रहे विवाद को देख रहा हूँ , मैंने पहले इस विषय से परे रहने का निर्णय लिया पर फिर लगा कि उन बातों की तरफ अपने मित्रों,साथियों और पाठको को ध्यान दिलाऊँ जिन पर किसी ने अपनी दृष्टि नहीं डाली-और डाली भी होगी तो मेरे ध्यान में नहीं आयी।

आपको अपने निज-पत्रकों (ब्लोग)में शीर्षकों में बल्कि दुसरे के यहाँ पर जाकर कमेन्ट लिखने में भी भाषा का ध्यान तो रखना ही होगा-भले भी उसका लेखक आपका बहुत अच्छा मित्र हो। आप उस पर जाने वाले अकेले व्यक्ति नहीं होते और उस पर अन्य लोग भी जाते हैं और पर उस कमेन्ट का भी प्रभाव होता है । स्वभाव और विचार की दृष्टि से सब लोग अलग-अलग होते हैं -अगर इस क्षेत्र में आकर किन्हीं लोगों का आपस में दोस्ताना हो गया तो अच्छी बात है पर टिप्पणी के वक्त उसे भूल जाये तो आप अपना और अपने उस मित्र का भला ही करेंगे । अगर उस पर किसी कमेन्ट का किसी भद्र पुरुष या महिला के दिमाग पर विपरीत प्रभाव पडा तो आप और उस मित्र का ब्लोग उनके लिए अगम्य और अपठनीय हो जाएगा । खासतौर से अगर इस बात का ख़्याल रखें कि इस क्षेत्र में महिलाये भी हैं और जो शिष्ट और सहज भाषा के उपयोग को अधिक पसंद करती हैं -हम पुरुषों से कहीं ज्यादा । आप अपना आलेख, काव्य या कमेन्ट लिख रहे हैं तो इस बात को ध्यान में रखें कि वह महिलाओं के दृष्टि भी उन पर पडेगी । किसी के निज-पत्रक (ब्लोग ) पर मजाक की बात लिखना भी मुझे गलत लगता है -क्योंकि यह उन पढने वालों के साथ अन्याय है जो इस पसंद नहीं करते। कोई अपने ब्लोग पर मजाक लिखता है -वह भी शालीनता की परिधि में-तो वह चलेगा पर आप भी उस पर शालीनता के साथ ही कमेन्ट करें। तो सही रहेगा ।

कुछ लोगों को मेरी यह बात अनर्गल लग सकती है ,पर मैं व्यवाहारिक बात कर रहा हूँ।कुछ लोग मजाक पर खामोश रह जाते हैं तो लगता है कि उसने हमारी बात को पसंद किया-यह बात समझ लेना चाहिऐ कि और मजाक न बने इसीलिये वह लोग विरोध नहीं करते।अपना मजाक उडवाना भला किसे पसंद आता है ।

निज पत्रकों के शीर्षकों में भी कुछ लोग विवाद उठा रहे हैं । मैं किसी विवाद में न पड़कर अपने मित्रों से कहना चाहूंगा कि हिंदी दुनिया की एक मात्र ऎसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है। हम जैसा लिख रहे हैं वैसा ही बोल रहे हैं-आपके निज पत्रक (ब्लोग)का शीर्षक आपके व्यक्तित्व की पहचान होता है। ऐसे कई लोग हैं जो उन्हें देखते हैं और प्रभावित होते हैं। अब किस पर क्या प्रभाव होता है वही बता सकता है, पर आप उनके बारे में सोचते हुए शीर्षक रखें तो अच्छा रहेगा-नारद के लोग भी बाद में आपत्ति उठाने की बजाय पहले ही उसमें सुधार करवाये तो ठीक रहेगा। तीखे शब्द अपना प्रभाव तीव्र रुप से डालते हैं पर अपनी आभा खोते भी जल्दी हैं । शब्द सहज हौं और भाव तीखा तो लोग उसकी वाह-वाह करते हैं क्योंकि वह हृदयंगम होते हैं ।

मैंने कुछ निज पत्रकों (ब्लोग)को देखा है, उन्हें सजाने में इतने मेहनत की गयी हैं कि दिल देखकर खुश हो जाता है, पर उनके शीर्षक देखकर लगता है कि उन्हें भी सहज और आकर्षक होना चाहिए था। लिखने में उन लोगों के प्रयास भी सराहनीय नहीं होते और भाषा सौन्दर्य भी इतना कि मन खुश जाये पर कभी-कभी उनके विषय निजी और संकुचित दायरे में देखकर निराशा होती है । मुझे लगता है के वह इससे बेहतर कर सकते हैं और पाठक के रुप में मुझे और भी मजा आ सकता है ।

"नारद" जब स्थापित हुआ होगा और आज जो उसका स्वरूप है इसे बीच में बहुत से परिवर्तन आये होंगे और भी आएंगे-हो सकता है इस जैसे और भी मंच बने ,पर इसका महत्त्व ख़त्म नहीं होने वाला । नारद के कर्णधारों में एक सज्जन मेरे लिए मित्र बन गये हैं-उनके सहयोग से मैं इस सीखते-सीखते इस मंच पर आया, हम कभी मिले नही है और वह कभी-कभार मेरे निज-पत्रक पर कमेन्ट देते रहते हैं। इसके बावजूद एक बात मैं स्पष्ट कहूंगा कि नारद की लेखकों को एक मंच पर लाने भले ही बहुत बड़ी भुमिका रही है पर अब वह इसे बिखेर नही सकता, क्योंकि जिन्हे एक दुसरे को पढने की आदत हो गयी है वह कहीं भी एक दुसरे को ढूँढ निकालेंगे, पर केवल हम इसीलिये अतिआत्म्विश्वास में इसकी अनदेखी करें तो वह गलत होगा। हम सब एक-दुसरे से जुडे हैं यह हमारा भाग्य है पर हमें एक दुसरे के जज्बातों पर ध्यान देना चाहिऐ -और खासतौर से वह महिला लेखकों की बढती संख्या देखकर हमे अपने शब्दों के चयन में सतर्कता बरतनी होगी -लिखने और कमेन्ट देने में भी । आप यह कह सकते हैं कि हमारा ब्लोग हैं हम कुछ भी लिखें पर अगर आपसे पूछा जाये कि आप अपने पढने वालों के जज्बातों का ख्याल करेंगे या नहीं ? आप यह सवाल अपने से करके देखे। आप नहीं करेंगे तो नारद के कर्णधारों को करना ही पडेगा ,यह अलग बात है कि ऎसी बातों के लिए कहीं न कहीं उनकी गलतिया को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ।

मैं एक लेखक हू और चाहता हूँ कि और लेखकों का-जो इस विवाद से त्रस्त हुए है -मनोबल बना रहे। इसीलिये यह लेख लिख रहा हूँ । यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि मेरे साथ सब लोगों का व्यवहार शिष्ट रहा है-किसी ने मेरे निज-पत्रक पर मजाक या कमेन्ट नहीं लिखा और मेरे लिए सब मित्र हैं और अगर मैं उन्हें अपने विचारों से अवगत नहीं कराऊँ तो भी तकलीफ होगी।

6/12/07

हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती-एक चिन्तन

क्रिकेट,फिल्म,राजनीति और और पत्रकारिता का क्षेत्र समाज में आकर्षण का केंद्र होते हैं । यही नहीं इन व्यवसायों से जुडे लोग सतत रुप से समाज के दृष्टिपथ में रहते हैं सामान्य आदमी को आकर्षित करते हैं।युवकों के दिलोदिमाग में वह एक आदर्श के रुप में बन जाते हैं।

वैसे तो पूरे विश्व में खेल,फिल्म,राजनीति और पत्रकारिता ही आकर्षण का केंद्र रहते हैं पर भारत में कुछ लोगों के लिए आध्यात्मिक प्रचार भी इसी श्रेणी में आ गया है और वह कहने के लिए ही समाज के हित में रहते है है वरना उनका मुख्य ध्येय धनार्जन ही होता है -इसका उदाहरण वह तथाकथित संत है जिन्हें एक समाचार चैनल ने काले धन को सफ़ेद करने के धंधे में लिप्त बताया था।भारत में खेल के आकर्षण का दायरा केवल क्रिकेट तक ही सीमित रह गया है ।

आकर्षण से जुडे इन क्षेत्रों में जहाँ धन होता है वहीं समाज में भारी प्रतिष्ठा भी मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें धन की जरूरत नहीं पड़ती -दाव चल जाये तो धन,प्रतिष्ठा और सरकार में रुत्वा भी प्राप्त हो जाता है। यही कारण है कि इस देश में जिनके पास अधिक धन नहीं है वह इनमें घुसकर शीघ्रता से हासिल करना चाहते हैं -उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि इन क्षेत्रों में केवल योग्यता से ही सब कुछ हो जाएगा। इन आकर्षक व्यवसायों से जुडे लोगों के बारे में उन्हें यह गलतफहमी हो जाती है कि जिस तरह की अच्छी,लुभावनी और सैध्दांतिक बाते वह करते हैं वैसे ही उनका व्यवहार भी होगा-और वह उनके योग्यता,प्रतिभा और लगन की क़द्र करेंगे । जब वह अपने सुनहरे सपनों के साथ इन क्षेत्रों में आते हैं और उन्हें पता लगता है कि इन प्रदर्शन व्यवसायों के पीछे का यथार्थ अन्य सामान्य क्षेत्रों से अधिक भयावह है तो टूट जाते हैं , कुछ लोग समझोते करते हुए आगे बढते जाते हैं तो कुछ लोग उसके बावजूद सफल नहीं हो पाते, और टूट जाते हैं । फिर शुरू होता हैं उनके जीवन में निराशा का दौर, जिसमें कुछ लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं । हालांकि इनमें सब लोग ढोंगी हैं यह कहना गलत होगा पर इन क्षेत्रों में प्रवेश दिलाने की नाम पर बहुत से ठगी करने वाले लोग भी सक्रिय हो गये हैं अभिनेता ,क्रिकेट खिलाड़ी और पत्रकार बनाने के नाम पर लोगों को झांसा देते हैं और उनका शोषण करते हैं उनसे लोगों का सतर्क होना आवश्यक है।

मैंने अपना जीवन एक पत्रकार के रुप में शुरू किया था, और उस समय मेरे वरिष्ट साथी जिन्हें अब मैं गुरू की तरह मानता हूँ ने मुझसे कहा था कि "कोई अगर तुम्हें अपनी बात कहता हैं तो उसकी सुनो, पर उस पर मनन करो और उस बात पर भी विचार करो जो उसने कही ही नहीं । कोई तुम्हें तस्वीर दिखा रहा है तो उसके पीछे जाकर देखो। चाहे जहां भी कोई तस्वीर हो उसके पीछे क्या होता है यह तुम जानते हो । पत्रकार का काम है खोज करना न कि दुसरे लोगों के कहे या दिखाए को प्रकाशित करना । तुम जीवन भर पत्रकारिता करो या नहीं पर विचार हमेशा एक पत्रकार के रुप में ही करना।

उन्होने मुझे आकर्षण के जाल में फंसने की बजाय उसके सत्य पर दृष्टि रखने और विचार करने की प्रेरणा दीं थी।मैं पत्रकारिता में ज्यादा समय नहीं रहा पर जितना रहा वह कई बातों को सिखाने के लिए पर्याप्त था।अपने गुरू को भी मैंने यह नहीं बताया कि उन्हें मैं क्या मानता हूँ पर उनकी शिक्षाओं को आईना बनाकर इस दुनिया को देखने का इतना आदी हो गया हूँ कि कभी भ्रमित नहीं होता। मैंने एक फिल्म की शूटिंग भी देखी थी तो उसमे इतना मजा नहीं आया जितना फिल्म में था। मतलब यह कि फिल्म के दृश्य परदे देखने में अच्छे लगते है पर जब बनती है तो उनमें वह गति या रोमांच नहीं होता जो परदे पर दिखता है। ऐसा नहीं है कि मैं फिल्म नहीं देखता पर इस सच्चाई के साथ कि जो रोमांच है वह परदे तक ही सीमित है-उसे बाहर देखने की कल्पना और उसे ढूँढना गलत होगा। मगर लोग हैं कि इन क्षेत्रो में जाते है और कहीं जल्दी -जल्दी सफलताएं मिल जाएँ तो सत्य से वास्ता नहीं पड़ता और जब पड़ता है तो उसे झेल नहीं पाते और अपनी इहलीला समाप्त करने पर आमादा हो जाते हैं ।

मैं इस कड़वे सच्चे को जानता हूँ कि हमारे देश के लोग चाहे कितना भी पश्चिमी देशों की नक़ल कर लें पर व्यवसायिक प्रवृति में अभी उनसे कोसों दूर हैं । पश्चिमी देशों का नियम है कि योग्यता दिखाओ, काम करो और पैसे लो पर हमारे यहां पहली शर्त यह है आपके संपर्क बनाओ बाकी बातें तो होती रहेंगी-यहाँ दुसरे के शोषण पर ही अपनी तरक्की का महल खङा किया जाता है । जिनके पास शक्ति है उनमें अहम भी है और वह किसी को बुलाकर या ढूँढकर काम देने की सोच भी नहीं सकते, काम की गुणवता पर प्रभाव पड़ता है तो पड़ता रहे। यहीं के लोग जब विदेशों में जाते हैं तो बेहतर काम करते हैं क्योंकि वहां उन्हें अनचाहे ही सही अपनी मानसिकता बदलनी ही पड़ती है । अगर ई-मेगजीन की कुछ कहानियों पर यकीन किया जाये तो विदेश में भी शक्ति संपन्न लोग अपने देश के लोगों के साथ देशी व्यवहार करने में नही चूकते। मतलब शोषण की प्रवृति सब जगह है और आप अगर एक कर्मयोध्दा है तो उसका सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहें ,अपने देश में और अपने लोगों से ही नहीं विदेशों में भी ऎसी स्थिति के लिए तैयार रहें।

याद रखें हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होतीं और गुलाब के साथ कांटे और कमल के साथ कीचड़ भी होता इसीलिये हमें अपने परखने और चयन करने के लिए अपनी बुध्दी और विवेक का इस्तेमाल करना चाहिऐ। दुनिया में सब लोग बुरे नहीं होते इस विश्वास को कायम रखना चाहिए पर अपने मस्तिष्क में चिन्तन,मनन और वैचारिक प्रक्रिया में सुस्ती नहीं आने देना चाहिऐ । जिन क्षेत्रों में आकर्षण है उनमें काम करते हुए यह बात याद रखना चाहिए कि वहां के सफलता से जितना आकर्षण पैदा होता है उतनी ही असफलता की त्रासदी भी होती है-दोनों ही स्थितियों में हमें सहज होना चाहिऐ ।

6/6/07

ब्लोग लेखक अपनी ताकत स्वयं बने

मैंने दिल्ली में संपन्न ब्लोगर मीट के बारे में पढा , एक लेखक के रुप में मेरी दिलचस्पी इसमें थी और मैं जानना चाहता था कि कौन लोग इसमें शामिल हो रहे हैं और उनके क्या विचार हैं ? जिन लोगों ने इस बारे में रिपोर्ट छापी उनको धन्यवाद देते हुए मैं अपनी बात यहां कहना चाहता हूँ और यह साफ कर दूं कि यहां मेरा उद्देश्य किसी अन्य ब्लोग लेखक पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी करना नहीं है और न ही स्वयं को कोई विद्वान् साबित करना है ।
ब्लोग या चिट्ठा लेखन आगे चलकर न एक विधा बल्कि एक आंदोलन के रुप में बनने जा रहा है । यहां आन्दोलन को कोई राजनीतिक रुप में न लें क्योंकि यह एक प्रवृति है जो मनुष्य के राजनीतिक,सामजिक ,शैक्षिक तथा धार्मिक क्षेत्र में प्रकट होती है और बदलाव करती है-यह अलग बात है हम इसे केवल राजनीतिक रुप में ही देख पाते हैं। एक आन्दोलन तो होते है जो लोग शुरू करते है और दुसरे वह होते हैं जो मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृतियों से प्रकट होकर उसे बदलाव के रास्ते पर ले जाते हैं, और ब्लोग को विधा कहें या आन्दोलन यह नई तकनीकी से प्रकट हुआ है आम लेखक इसे बहुत दूर तक ले जायेंगे ऐसा मेरा अनुमान है।
हम अपने ब्लोग को जमीन पर देखना चाहते हैं-एक लेखक के रुप में यह प्रवृति स्वाभाविक रुप से होती है कि वह अपनी रचना दूसरों को पढ़ाना चाहता है- और उसके लिए समाचार पत्र-पत्रिकाएँ और टीवी चेनलों का रास्ता देख रहे हैं तो गलती करेंगे । वहां ऐसे पूंजीपतियों का नियंत्रण है जो किसी व्यक्ति का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार नहीं करते । ब्लोग या चिट्ठे का सीधा आशय मैं अखबार के रुप में ही लेता हूँ। मैं अखबारों से संबध्द रहा हूँ और जानता हूँ कि कहॉ कौन क्या है? वहां आप बेहतर वेतन और पारिश्रमिक प्राप्त कर सकते हैं स्वतंत्र रुप से लिख नहीं सकते जबकि आपका ब्लोग अपको यह अवसर देता है ।
जब से मैंने ब्लोग लिखना शुरू किया है एक भी रचना बाहर नहीं भेजी ,वहां भी नहीं जहां से मुझे पैसा मिलता है । सब यह करे मेरा आशय यह नहीं है पर मैं जानता हूँ कि एक ब्लोग लेखक को कोई भी इतनी आसानी से सम्मान नहीं देगा जब तक वह अपनी शक्ति नहीं दिखाएगा-और वह तभी मिल पायेगी जब सार्थक ,गंभीर,वैचारिक और खोज्परक लेखन शुरू होगा । एक या दो दिन किसी अख़बार में ब्लोग पर लिखी आपकी रचना या नाम जरूर किसी अख़बार में छप जाये पर आपके ब्लोग का वह पता कभी भी नहीं छपेगा जिससे आपका ब्लोग लोग आसानी से इन्टरनेट पर खोल सकें । मैंने देखा है कुछ ब्लोग लेखकों की अखबार में छपी है और उनका ईमेल पता भी छपा है पर ब्लोग का पता नहीं छपा है । कुल मिलाकर कोई अन्य साधन नहीं है जो अपने ब्लोग को जमीन पर उतार सके और जिनकी तरफ हम देख रहे हैं उनके लिए यह प्रतिद्वंद्वी विधा साबित होने वाली है क्योंकि लोग जब अपने ब्लोग खुद लिखेंगे तो वह अभिव्यक्ति के लिए अन्य साधन नहीं ढूंढेंगे ।मेरी यह बात कई लोगों अतिशयोक्ति लगे पर ज्ञानी,लेखक और जुझारू व्यक्ति से सब डरते हैं , वह लोग सबसे ज्यादा जो प्रतिकूल प्रचार होने से जिनके काम पर कुप्रभाव पड़ता हैं जिनका काम ही प्रचार पर टिका है, उन्हें स्वतंत्र लेखक से ही भय लगता है किसी वेतनभोगी से नहीं ।
लिखने और लड़ने वाले से बड़ी से बड़ी सता भयभीत हो जाती है भले ही बाह्य रुप से निडरता का कितना भी नाटक करे, और आजकल तो इन्टरनेट ऎसी चीज हो गयी है कि लोग भले कम देखते और पढ़ते हैं पर उसका प्रभाव उससे ज्यादा है जितना दिखता है-कहते हैं न दूर के ढोल सुहावने इसमें आप जोड़ सकते हैं डरावने भी । यह तो मैं ही जानता हूँ कि मेरे ब्लोग के कितने पाठक हैं ? आप कमेन्ट देखकर कहेंगे कि कम है पर यह भी आप जानते हैं कि सभी पढने वाले कमेन्ट नहीं देते और कुछ ऐसे आम पाठक भी हैं जो देना जानते नहीं है ।
मेरे ब्लोग की पाठक संख्या के बारे में अगर आप सब जानते भी हैं तो आप मेरे इलाक़े में कौन कहने के लिए आ रहे हो वहाँ तो मेरे लिए इतना ही बहुत है कि मैं इन्टरनेट पर लिख रहा हूँ । अगर मेरे ब्लोग को केवल दस लोग भी पढ़ रहे हैं तो भी क्या? ऐसे कई अखबार मालिक हैं जिनके अख़बार का नाम भर है और शहर में कहीं कहीं दिखता है फिर भी उनका रुत्वा किसी बडे अखबार मालिक से कम नहीं होता। मैं यह अंहकारवश नहीं कह रहा हूँ, न ही आपको अतिआत्मविश्वास में आने को कह रहा हूँ क्योंकि दोनों ही स्थितियाँ घातक होती हैं। मेरा कहना है कि सब ब्लोग लेखक अपने अन्दर विश्वास स्थापित करें और अपने लक्ष्य के रास्ते पर दृढ़ता पूर्वक चलते रहें । अखबारों के आन्तरिक संगठन बाहर से जितने आकर्षक लगते हैं अन्दर से उतने ही साधारण हैं जिंतने अन्य व्यवसायिक संगठन । आप अगर सोच रहें कि आप अच्छा लिखेंगे तो कोइ अख़बार या टीवी चैनल सम्मान देगा तो गलती पर हैं । हाँ कुछ अच्छे ब्लोग लेखकों को इनमें काम करने का अवसर मिल सकता है पर ब्लोग लेखन फिर भी एक अलग विधा रहने वाली है। अभी तो यह आरंभिक अवस्था में है और इसमें कई नये लोग आएंगे।
प्रश्न यह है कि हम शक्ति कैसे बने ? एक ही जवाब है कि संगठन बनाए और एक दुसरे की आवाज बने। अगर कोई ब्लोग लेखक अपने ब्लोग की वजह के संकट में आता है तो उसके सहायक बने , अपने ब्लोग की जानकारी दूसरों को दें , हो सके तो अपनी नेम प्लेट में उसका नाम भी जोड़ दें । मैं चाहता हूँ कि दिल्ली के बाहर कहीं ऐसे स्थान पर ब्लोग लेखकों का सम्मेलन आयोजित हो जहाँ वह अपने खर्च पर रह सकें और सम्मेलन का स्थान भी सहजता से मिल सके-हालांकि कहना सरल है करना कठिन है पर कराने वाले कभी न कभी यह भी करेंगे ।इसके लिए किसी बडे तामझाम की जरूरत नहीं है-सब अपने जिम्मेदार पर आये और सम्मेलन में भाग लें ।
मैं तो हैरान हो जाता हूँ जब मुझे इतनी दूर-दूर से संदेश मिलते हैं जहाँ तक मैं जाने की सोच भी नहीं सकता। मुझे ऐसे मित्र भी मिले हैं जिससे देख कर लगता है कि मैं देर से आया पर दुरस्त आया । मुझे अखबारों में छपने में अब कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि बहुत छप चुका ,अब कोई अखबार मेरे ब्लोग की रचनाओं को छापे तो ठीक नहीं तो भी मैं अपने इस ब्लोग से ही सन्तुष्ट हूँ ,अगर आप छपना चाहते हो तो अपने लिखने पर ही ज्यादा ध्यान दो-वह आपके पास आये इसके लिए उन्हें अपने लेखन और संगठन की ताकत से मजबूर करना होगा। वैसे और भी ख्याल है पर अभी बस इतना ही। आप कहेंगे तो और भी लिखकर बताऊंगा कि क्या रणनीति बनायें। अभी आगे और परिवर्तन आने वाले हैं और नए-नए लोग इस आंदोलन और विधा को आगे ले जायेंगे इसमें कोई शक मुझे तो नहीं है।

5/19/07

एक भक्त की कलम से

NARAD:Hindi Blog Aggregatorहर व्यक्ति के मन में उसके इष्ट का वास होता है, यह अलग बात है कि कोई उसे जानता है और कोई नही । जब आदमी बच्चा होता है तब उसके माता पिता जिस इष्ट की आराधना करते हैं, धीरे धीरे वह उसके मन में दाखिल होकर उसका स्वामी हो जाता है। हां, अपने कामकाज और अन्य कारणों से आदमी उसके प्रति उदासीन हो जाता है पर जब उसकी कोई उसकी चर्चा करता है तो उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है-और अगर कोई उसकी निंदा करे तो उसे गुस्सा आ जाता है। चूंकि अधिकांश लोग इस संसार में ही ज्यादा मन लगाते हैं तो अपने इष्ट की तरफ से ध्यान हटा लेते हैं और उनकी मन स्थिति कमजोर हो जाती है और अगर उसे कोई यह कहे के अमुक आदमी ने तुम्हारे इष्ट का अपमान किया है तू वह उत्तेजित हो जाते है । अब कुछ नाराज होकर तथाकथित रुप से शाब्दिक रुप से अपने क्रोध का प्रदर्शन कर रह जाते हैं तो कुछ अपनी शार्रीरिक शक्ति का उपयोग करने लग जाते हैं। भारत का आदमी धर्म के बारे में बहुत संवेदनशील है और यहां इसी वजह से धर्म के ठेकेदार ज्यादा ही है जो गाहे-बगाहे अपने स्वार्थों के लिए ऐसे फसाद कराते रहते हैं जिससे उनका प्रभाव न केवल अपने समाज में बल्कि दुसरे समाजों में भी बना रहे । यही कारण है कि विश्व में आध्यात्मिक गुरू कहलाने के बावजूद हमारे देश के लोगों की छबि रूढ़ वादी और अंधविश्वास के कारण अच्छी नहीं बनी है।

जो मेरा इष्ट है वही तुम्हारा भी इष्ट है यह हम सब मानते हैं, फिर आख़िर यह झगडा क्यों होता है? केवल इसीलिये हे न कि उसके स्वरूप हम अलग देखते हैं। हम दावा करते हैं कि हम अपने इष्ट को मानते है पर हम उस इष्ट को अपने हृदय में धारण कितना करते हैं यह कभी सोचा ही नहीं । नाम लेकर नामा बटोरने चल पड़ते है और सोचते हैं कि हो गया हमारा जीवन धन्य ! हमारे देश में अनेक महापुरुष हुए हैं कुछ को अवतार कहा जाता है तो कुछ को संत । यहां बता दें के हमारे समाज में संत और अवतार का दर्जा समान माना जाता है। क्योंकि संतों को गुरुओं के रुप में मान्यता मिलती है और कहा जता है कि गुरू ही गोविन्द के दर्शन कराते हैं इसीलिये वह बडे हैं। अवतारी पुरुष भी गुरू का सम्मान करना ही धर्म और भक्ती का एक हिस्सा मानते हैं-और यह बातें वही समझ पा ता है जो अपने इष्ट और गुरू को धारण करे। हमारे देश में कई गुरूओं के कई चेले मिल जाएंगे और अपने गुरुओं और इष्ट का बखान करेंगे जैसे आध्यात्म की बात न करके वाक्युध्दु कर रहे हौं । अपनी भक्ती अपने मन में रखने की बात होती है लोग चिल्लाकर उसका बखान करते है और होता यह कि कई जगह तो इस बात पर बात-बात में सामुहिक झगडा हो जाता है किसका इष्ट बड़ा है।

मैं अपने इष्ट और गुरू के बारे में मानता हूँ कि कोई उनके अपमान करने की ताकत ही नहीं रखता ! वजह साफ है कि मैं जानता हूँ कि मेरे इष्ट और गुरू मेरे मन में है कोई उन्हें देख ही नहीं सकता तो अपमान क्या खाक करेगा। अगर कोई व्यक्ति मुझसे आकर कहे कि अमुक व्यक्ति ने तुम्हारे गुरू और इष्ट का अपमान किया है तो मेरे अन्दर कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी -क्योंकि मैं समझता हूँ कि उस व्यक्ति के मन में कुछ ऐसा है जो वह अपना स्वार्थ सिध्द करना चाहता है-अगर सच्चा भक्त होता तो वहाँ से उठकर चल देता जहाँ निंदा रह रही थी। वह मुझसे अगर यह कहेगा कि तुम्हारा और मेरा इष्ट और गुरू है एक है और चलकर उस निंदक से लड़ते हैं तो भी मैं उसकी बात पर ध्यान नही दूंगा क्योंकि जिस इष्ट को मैंने धारण किया है उसके चरित्र से सीखा है कि आदमी को सहज भाव का त्याग नहीं करना चाहिए और युध्द अस्त्र-शस्त्र से नहीं बल्कि कुशलता से जीते जाते है और कभी कभी तो एसी कुशलता दिखानी चाहिए कि बिना हिंसा के ही युध्द जीत लिया जाये। मेरे गुरू ने मुझे सिखाया है कि दुष्ट लोग ही संतों और दुसरे के इष्ट पर आक्षेप करते हैं और वह लोग अपने पापों का बोझ इतना बड़ा लेते हैं कि एक दिन खुद उसके तले दबकर भारी तकलीफ में आ जाते हैं।

कुल मिलाकर भक्ती बाहर दिखने की चीज नहीं है वह तो अपने मन में धारण करने के लिए है क्योंकि उससे हमारे विचार और भाव शुध्द रहते है। हमारे इष्ट और गुरू का कोई अपमान भी कर सकता है यह मानने का मतलब ही यही है कि हमारे भक्ति-भाव में कहीं कोई कमी है जो हम उत्तेजित हो जाते हैं। अपमान एक खराब शब्द है तो उससे हम सुने ही क्यों ? जितने भी गुरू हुए हैं वह यही कहते हैं कि बुरा मत कहों, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो -क्या हमें अपने इष्ट और गुरुओं की बात नहीं माननी चाहिए । मैं अपने जैसे भक्तों से मुखातिब हूँ जो बडे भावुक होते हैं और उम्मीद हैं वह मेरी बात समझ ही गये होंगें - भले ही उनके गुरू और इष्ट का स्वरूप अलग हो पर हैं तो भक्त ही न ! जो भक्ती के अलावा और किसी बात पर ध्यान नहीं देते और कुछ लोग उनकी इस तल्लीनता में भंग डालने के लिए ऐसे मसले लाते है जिससे उनकी भक्ती और समाज की शांति में खलल पडे। ऐसे भक्तो को मेरा प्रणाम इस सलाह के साथ कि वह अपने भक्ती में तल्लीन रहें किसी की बातों में न आयें ।

5/18/07

व्यसनों से तनाव कम नहीं होता

NARAD:Hindi Blog Aggregator
हम सारा दिन किसी न किसी काम में लगे रहने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अपने जीवनयापन के लिए ऐसा करना जरूरी है । इसके आलावा अपने मन को भी कहीं न कहीं लगाना होता है और इसके विकल्प के रुप में काम करते रहना आवश्यक लगता है । इस प्रयास में हम कई ऐसे काम करते हैं जो आख़िर स्वयं के लिए तकलीफदेह साबित होते हैं-जैसे किसी की अनावश्यक निंदा करना या किसी और व्यक्ति का धन, वैभव और प्रतिष्ठा देखकर उसके बारे में चिन्तन करना। यह सब नहीं करते तो कोई व्यसन पाल लेते हैं जैसे तंबाकू खाना और सिगरेट पीना । कुछ लोग तो शाम को थकावट मिटाने के नाम पर अपने बीबी-बच्चों के सामने ही शराब पीने लगते हैं , इस बात की चिन्ता किये बिना कि इससे उन पर क्या दुष्प्रभाव पडेगा?
ऐसा नहीं है कि यह आदतें केवल पुरुष ही पालते हैं -कई महिलाओं में भी ऎसी आदतें होती हैं - अंतर बस इतना होता है कि महिलाएं छिपकर ऐसे व्यसन करती है ताकि समाज में उनकी बदनामी ना हो पर अपने बच्चों से वह भी छिप पातीं-और अंतत: उन पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है । हम यह सोचते हैं कि इन व्यसनों से मानसिक तनाव कम होता है पर यह हमारा भ्रम होता है , चिकित्सा वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सुख क्षणिक है और कालांतर में यह आदमी की मानसिक शक्ति को हानि पहुँचाता है और वह डरपोक, शक्की और भुलक्कड़ होता जाता है। कुछ तो इतने भयकर रुप से मनोरोगी हो जाते हैं न तो उन्हें स्वयं और न ही परिवार वाले इसे समझ पते है और कहीं इसे उम्र का तकाजा और कहीं इसे स्वभाव तो इसे तात्कालिक स्थिति मानकर टाल दिया जाता है। इस उपेक्षा का यह नतीजा यह होता है लोग धीरे धीरे संपर्क या तो कम करने लगते है या फिर समाप्त ही कर देते हैं। पराए लोग तो छोड़ें अपने ही लोग कन्नी काटने लगते है और कहते हैं उसे तो कोई काम नहीं वह तो केवल शराब पीता है चर्सी है , सारा दिन तंबाकू खाता है या सिगरेट पीता है,उससे बात करने का कोई फायदा नहीं है।इस तरह समाज में हमारा रुत्वा कम होता जाता है और हमारी मनोदशा और खराब होने लगती है और ऐसा लगता है कि हमने जिनके लिए इतना किया या कर रहे हैं वह हमारा सम्मान नही कर रहे हैं और हम क्रोध के वशीभूत होते जाते है यानी अपनी बीमारी और मानसिक तनाव बढाते हैं , पर न कोई हमें समझता है और न हम समझते है यह हो क्या रहा है , यह सब हमारे व्यसन की वजह से होता है।व्यसनों के उपयोग में फंसा आदमी जब भी तनाव में होता है उसके सहारे अपने को बचाना चाहता है क्षणिक रुप से यह अच्छा लगता है पर बाद में फिर वैसी हालत ही हो जाती है है कभी कभी उससे भी बदतर। व्यसन के उपयोग से जितनी जल्दी तनाव खत्म होता है उसका प्रभाव घटते ही उससे ज्यादा तेजी से बढने लगता है । मैं अपने आसपास जब युवकों को व्यसनों में फंसा देखता हूँ तो सोचता हूँ कि वह अपना जीवन आगे कैसे तय करेंगे। एक बार मेरी पहचान का एक युवक सिगरेट पी रहा था , तब बातचीत करते हुए उससे पूछा -" तुम सिगरेट क्यों पीते हो ?"

उसका जवाब था कि -"इससे टेंशन कम होता है ।"
मैंने पूछा-"तुम्हें कैसा टेंशन है , और अभी तो तुम्हारी शादी को केवल एक महीना हुआ है ।"
वह हंसकर बोला-" अपना टेंशन किसी को नहीं बताना इसीलिये तो सिगरेट पी रहा हूँ।
मैंने पूछा-"तुम्हारे पापा भी सिगरेट पीते हैं?"
वह बोला-"हाँ, मैंने तो उनके पैकेट से ही तो सिगरेट निकालकर पीना सीखा है।
फिर थोडी देर चुप रहने के बाद वह बोला -" पर साहब, कहते हैं कि सिगरेट पीने से टेंशन कम होता है पर शुरू में लगता था पर अब नहीं लगता।फिर पीते क्यों हो?"मैंने पूछावह बोला-" अब तो यह मेरी आदत बन गयी है और नहीं पीता हूँ तो दिमाग ही काम नहीं करता। बहुत सोचता हूँ कि यह आदत छोड़ दूं पर मुश्किल लगता है।

मुझे उसकी बेबसी पर दुःख हो रहा था तो उसके पिताजी पर गुस्सा भी आ रहा था जिनकी वजह से उसे यह आदत पडी। इस तरह एक नही कई लोग है जो अपने बच्चों में भी ऎसी आदतें भर देते है जो उनके जीवन के लिए तकलीफदेह होती हैं। शेष अगले अनके में

5/9/07

हिंदू धर्म में ज्ञान के साथ विज्ञान भी मौजूद है

NARAD:Hindi Blog Aggregator पिछले कयी दिनों से देश में धर्म को लेकर अनेक तरह के विचार व्यक्त किये जा रहे हैं। एक खास बात जो सामने आ रही है युवा वर्ग में धर्म के प्रति रुझान बढ रहा है । इसका मुख्य कारण यह है कि आजकल घरों में उनको ऐसा धार्मिक माहौल नहीं मिल रहा जैसे पहले वाली पीढ़ी को मिलता था, इसके अलावा उन्हें बाल्यावस्था में ही ऐसे भौतिक साधन मिल रहे हैं जिनसे अमेरिकी अब अपने यहां बोरियत अनुभव करने लगे हैं , उनसे उकताने के बाद जब युवक और युवतियां कहीं अध्यात्म पर चर्चा सुनते है तो उन्हें नवीन भाव का अनुभव होता है ।हालांकि आज के अनेक धर्म गुरू केवल अपनी स्वार्थ सिध्दी के कारण ही इस क्षेत्र मैं हैं , उनका उद्देश्य केवल अर्थोपाजन करना ही है न कि धार्मिक परंपराओं को बढ़ाने के लिए प्रयास करना -यही कारण है कि जितने भी धर्म गुरू हैं वह करोड़ों में खेल रहे हैं , फिर भी किया क्या जाये ? युवक-युवतियों को अपनी उकताहट दूर करने तथा मन में शांति के लिए उनके पास इन संतों के प्रवचन सुनने का अलावा कोई चारा भी तो नहीं है।
मैं देश में चल रहे माहौल को जब देखता हूँ जिसमें हिदू धर्म के प्रति लोगों के मन में तमाम विचार आते हैं पर उनका कोई निराकरण करने वाला कोई नहीं है। धर्म के नाम पर भ्रम और भक्ती के नाम पर अंधविश्वास को जिस तरह बेचा जा रहा है, वह चिंता का विषय है । विरोध करने पर आदमी को नास्तिक और तर्क देने पर कडी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। हिंदू धर्म की को पूरी दुनिया सम्मान की दृष्टि से देखती है पर अपने ही देश में धर्म के ठेकेदोरों ने लोगों की बुध्दी का दोहन केवल अपने तुच्छ स्वार्थों की खातिर कर इसको बदनाम कर दिया। हिंदू धर्म के तमाम ग्रंथ हैं और उनमें कुछ ऎसी तमाम बातें है जो उस समय ठीक थीं जिस समय वह कहीं और लिखी गयी थीं, समय के साथ लोग उनसे बिना कहे दूर होते गये। पर जीवन के आर्थिक, सामाजिक , स्वास्थ्य और विज्ञान की दृष्टि से जितना हमारे ग्रंथों में हैं उतना किसी अन्य धर्म में नहीं है। हाँ, इस धर्म को बदनाम करने के लिए इसके विरोधी केवल उन बातों को ही दोहराते हैं जो किन्हीं खास घटनाओं या हालतों में लिखीं गयी थीं और आज अप्रासंगिक हो गयी हैं और लोग उन्हें अब दोहराते ही नहीं है। अब आप लोग कहेंगे कि इतनी सारी पुस्तकों के कारण ही हिंदु धर्म के प्रति भ्रांति फैली है तो मैं आपको बता दूं कि सारे ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवत गीता में है। जिसने गीता पढ़ ली और उससे ज्यादा समझ ली उसे कुछ और पढने की जरूरत ही नहीं है। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई संत या सन्यासी नहीं हूँ न बनूंगा क्योंकि गीता पढने वाला कभी सन्यास नही लेता । वैसे भी आजकल केवल धर्म का ज्ञान होना इतना जरूरी नहीं जितना धर्म के व्यापार के लिए अच्छे प्रबंधक साथ में न रखना । इस पर ज्यादा प्रकाश विस्तार से मैं बाद में डालूँगा , आज मैं ज्ञान सहित विज्ञान वाले इस ग्रंथ में जो भृकुटी पर ध्यान रखने की बात कही गयी है वह कितनी महत्वपूर्ण है-उसे बताना चाहूंगा । शायद भारत में भी कभी इस बात की चर्चा नही हुई कि हिंदु धर्म की सबसे बड़ी ताकत क्या है जो इतने सारे आक्रमणों के बावजूद यह बचा रहा है। अगर लोगों को यह लगता है कि हिंदू कर्म कान्ड भी धर्म का हिस्सा हैं तो मैं आपको बता दूं कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहीं भी कर्मकांड के महत्व की स्थापना नहीं की । उन्होने गीता में ध्यान के सिध्दांत की जो स्थापना की वह आज के युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ध्यान वह शक्ति है जो हमें मानसिक और शारीरिक रुप से मजबूत करती है जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है। मैं अपने हिसाब से ध्यान की व्याख्या करता हूँ ।
अब तो अनेक पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं हिंदूं की असली शक्ति उनके ध्यान में है, और ज्ञान का केंद्र श्रीमदभागवत गीता में है ।
ध्यान क्या है पहले इस बात को समझ लें । हम सोते हैं और नींद लग जाती है तो लगता है आराम मिल गया पर आजकल की व्यस्त जिन्दगी में तमाम तरह के ऐसे तनाव हैं जो पहले नहीं थे । पहले आदमी सीमित दायरे में रहते हुए शुध्द चीजों का सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे और उनकी चिताएँ भी सीमित थीं इसीलिये उनका ध्यान नींद में भी लग जाता था । शुध्द वातावरण का सेवन करने के कारण उन्हें न तो ध्यान की जरूरत महसूस हुई और न गीता के ज्ञान को समझने की। हालांकि मैं अपने देश के पूर्वजों का आभारी हूँ कि उन्होने धार्मिक भावनाओं से सुनते-सुनाते इसे अपनी आगे आने वाली पीढी को विरासत में सौंपते रहे । आज हमारे कार्य के स्वरूप और क्षेत्र में व्यापक रुप से विस्तार हुआ है और हम अपने मस्तिष्क के नसों को इतनी हानि पहुंचा चुके होते हैं कि हमें रात की नींद ही काफी नहीं लगती और हम बराबर तनाव महसूस करते हैं । रात में हम सोते हैं तब भी हमारा मस्तिष्क बराबर कार्य करता है और वह दिन भर की घटनाओं से प्रभावित रहता है। ध्यान हमेशा ही जाग्रत अवस्था में ही लगता है । ध्यान का मतलब है अपने दिमाग की सर्विस या ओवेर्हालिंग । जिस तरह स्कूटर कार मोटर सायकिल फ्रिज पंखा एसी और कूलर की सर्विस कराते हैं वैसे ही हमें खुद अपने दिमाग की भी करनी होगी। एक तरह से हमें अपना मनोचिकित्सक स्वयं ही बनना होगा। जिस बात का जिक्र मैंने शुरू में नहीं किया वह यह कि मुझे याद है जब चार वर्ष पूर्व किसी अखबार में पढा था कि एक अमेरिकी विज्ञानिक का मत है कि हिंदूओं कि सबसे बड़ी ताकत है ध्यान । फिर भी भारत के प्रचार माध्यमों ने इसे वह स्थान नहीं दिया जो देना चाहिए था । यहां मैं ध्यान की विधि बताना ठीक समझता हूँ । सुबह नींद से उठकर कहीं खुले में शांत स्थान पर बैठ जाएँ और पहले थोडा पेट को पिच्काये ताकी हमारे शरीर में से वायू विकार निकल जाएँ और फिर नाक पर दोनों ओर उंगली रखकर एक तरफ से बंद कर सांस लें और दूसरी तरफ से छोड़ें। ऐसा कम से कम बीस बार करें और दोनों तरफ से सांस लेने और छोड़ने का प्रयास करें । उसके बाद बीस बार अपने श्री मुख से ॐ शब्द का जाप करे और फिर बीस बार ही मन में जाप करें और धीरे अपने ध्यान को भृकुटी पर स्थापित करें। जो विचार आते हैं उन्हें आने दीजिए क्योंकि वह मस्तिष्क में मौजूद विकार हीं हैं जो उस समय भस्म हो रहे होते हैं। यह आप समझ लीजिये । धीरे धीरे अपने ध्यान को शून्य में जाने दीजिए-न जा रहा है तो बांसुरी वाले के स्वरूप को वहन स्थापित करिये -धीरे स्वयं ही आपको ताजगी का अहसास होने लगेगा । अपने ध्यान पर जमें रहें उसे भृकुटी पर जमे रहने दीजिए । ऐसा नहीं है कि केवल सुबह ही ध्यान किया जाता है आप जब भी तनाव और थकान अनुभव करे कहीं भी बैठकर यह करें। शुरूआत में यह सब थोडा कठिन और महत्वहीन लगेगा पर आप तय कर लीजिये कि मैं अपने को खुश रखने के लिए यह सब करूंगा ।कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर यह मेरा किया हुआ अनुभव है। अगर मैं यह ध्यान न करूं तो इस तरह कंप्यूटर पर काम नहीं कर सकता जिस तरह कर रहा हूँ। कम्प्युटर, टीवी और मोबाइल से जिस तरह की किरणें उठती है उससे हमारे दिमाग को हानि पहूंचती है यह भी वही वैज्ञानिक बताते हैं जिन्होंने इसे बनाया है। शरीर को होने वाली हानि तो दिखती है पर दिमाग को होने वाली का पता नहीं लगता। ध्यान वह दवा है जो इसका इलाज करने की ताक़त की रखता है। ध्यान पर ऐसे अनेक प्रयोग किये गये हैं जिनसे पता लगता है वह आदमी के मन में एक स्फूर्ति पैदा करता है। शेष अगले अंकों में।

5/6/07

अपने अन्दर है आध्यात्म शक्ति का केंद्र

अक्सर लोग यह कहते हैं कि हमें धर्म की जरूरत क्यों है? हम अपना काम अच्छी तरह करें तो क्या जरूरत है कि भगवान के किसी स्वरूप की आराधना करें -हम किसी को दुःख न दें, अवसर पडे तो किसी की मदद करें, और न कर सकें तो किसी की हानि न करे और कुछ न करें तो केवल अपना कर्म मेहनत, लगन तथा निष्ठा से करते रहें। अपने आप में यह विचार बहुत अच्छा है ,पर ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि हमारे इस देह में एक मन है जो बहुत चंचल है और वह हमारे विचारो के साथ देह को भी घुमाने की भी क्षमता रखता है और उस पर बिना आध्यत्मिक शक्ति के नियंत्रण नहीं किया जा सकता है-जिसका केंद्र हमारे अन्दर ही स्थित है । मन से ज्यादा शक्तिशाली है हमारी आत्मा जिसे जानना जरूर है हम उस जानने कि विधा को आध्यात्मिकता कहते हैं। हम अपने मन और देह को सदैव सांसरिक कार्यों में लगाए रहते हैं, इसमें कोई दोष नहीं है पर जो एकरसता की वजह से उब होती है उसे हम समझ नहीं पाते। हम जो मनोरंजन के लिए साधन लाते हैं- जैसे टीवी देखना, क्रिकेट मैच देखना, कोई मनोरंजन किताब पढ़ते है और कभी कहीं पर्यटन करने चले जाते हैं-इससे कुछ देर तक हमारे मन को राहत मिलती है पर फिर जैसे ही नियमित कार्यों में लग जाते हैं पर हमें जल्द ही यह लगने लगता है कि हमारे मन में अभी खालीपन है । फिर तनाव धीरे धीरे हम पर छाने लगता है। इस तनाव को कभी "मूड खराब होने" या "थकावट है" कहकर व्यक्त करते है और यह समझ नहीं पाते कि हम कह क्या रहे हैं और सोच क्या रहे हैं -यह तनाव हमारी आत्म का होता है जो हम समझ नहीं पाते । यह आत्मा इस देह और मन में अपने अस्तित्व के अहसास के लिए तरसती है। वह चाहता हैं कि कुछ देर वह उस निरंकार, निर्गुण और शाश्वत सत्य स्वरूप परमपिता परमात्मा का इस देह में स्मरण इस देह और मन से करे जो उसने धारण कर रखी है। इसीलिये सांसरिक कार्य लगन, मेहनत, और निष्ठा से करते हुए भी अपने अध्यात्म से जुडना चाहिए। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अध्यात्म का अर्थ है धार्मिक कर्मकांड , और दिखने और दिखाने के लिए धार्मिक जगहों पर जाना और अपनी रीती से आराधना करना । यह धर्म नहीं भ्रम है। इसका आध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। यह एक तरह की सांसारिकता है। जब हम इस रास्ते पर चलते हैं तो फिर हमें देहधारी तथाकथित भगवानों की शरण में जाना पड़ता है और वह अपने लिए हमारे देह, धन और मन को शौषण करने लगते हैं , चूंकि हम मानकर चलते हैं यही धर्म है तो बुध्दी अपना काम करना बंद कर देती है। जब हमें सत्य का पता लगता है तो भारी दु:ख पहुँचता है ।अध्यात्मिक ज्ञान कोई बहुत विस्तृत नहीं है। प्रात: योगासन , प्राणायाम और ध्यान करने के बाद गायत्री मन्त्र,महा म्रत्युन्जय मंत्र और शांति पाठ करना चाहिऐ और उस समय अपना ध्यान इस संसार से हटाकर ॐ की तरफ लगाना चाहिए और धीरे धीरे उसे निरंकार और निर्गुण परमात्मा में लगाना चाहिऐ । हो सके तो श्रीमद्भागवत गीता का पाठ श्रध्दा के साथ ज्ञान प्राप्त करने के लिए करना चाहिए। इसके बाद भी दिन में कभी अवसर मिले तो बैठकर आँखें बंदकर ध्यान लगाना चाहिए। ध्यान में अपने मन की दृष्टि नाक के ऊपर भृकुटी पर रखना चाहिए। आप कहेंगे जिस ज्ञान को इतने बडे ज्ञान को बरसों से बडे बडे ज्ञानी लंबे चौड़े प्रवचनों में भी नहीं समझा पाए वह इतना छोटा कैसे हो सकता है तो यह बात साफ बता दूं कि वह लोग प्रवचनों को सत्संग की दृष्टि से करते है जिसमें तमाम की तरह कथाएं भी आती हैं और मैं कोई संत नहीं हू एक सामान्य इन्सान हूँ। अपनों से इस तरह की चर्चा करते रहने से आनन्द आता है और किसी अन्य के यहां अपने मन की बात कहने के लिए जाने की जरूरत नहीं पड़ती। शेष अगले अंकों में।

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