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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

7/10/07

वह पंगेबाज तुम फंदेबाज


(यह व्यंग्य रचना काल्पनिक है तथा किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है)

मैं बरसात में भीगता हुआ दफ्तर पहुंचा और अपने कपडे सुखाने के लिए अपनी टेबल के पास पंखे के नीचे खङा हो गया तो मेरे पास बैठी सहकर्मी बोली-" बॉस ने बोला था कि तुम लेट आओगे पर तुम तो जल्दी आ गये, चाहते तो लंच बाद भी आ सकते थे।"

" मैंने कहा-"मुझे बिजली का बिल जमा करना था इसलिये बॉस से मैंने देर से आने को कहा था, मुझे लग रहा था कि देर हो जायेगी पर भीड़ न होने की वजह से बिल जल्दी जमा हो गया तो फिर मैं यही आ गया......."


मेरी बात पूरी होती उससे पहले ही वह मेरे पास आकर खड़ा हो गया, और बोला-"तुम्हें तो पडी है अपने बिजली के बिल की, यहाँ मुझ पर मुसीबत आन् पडी, बॉस ने यह पत्र लिखने के लिए दिया है जबकि मालुम है कि मुझे पत्र लिखना नहीं आता। अब तुम आ गये तो लिख दो।"

मेरे पास बैठने वाली सहकर्मी बोली -"अभी तो यह बरसात में भीगते हुए आये हैं, उन्हें अपने कपडे तो सुखाने दो। इन्होने सांसभी ली नहीं और तुम अपना काम लेकर आ गये।"


" मैडम!जब तक इसके कपडे सूखेंगे, मेरे प्राण सूख जायेंगे और जब तक यह सांस लेगा मेरी सांस रूक जायेगी। " वह बोलकर जोर से हंस दिया। उसने अपनी फ़ाइल मेरी टेबल पर फैंक दीं।

मैंने उससे कहा-"जब बॉस ने तुम्हें पत्र लिखने को दिया है तो मैं क्यों लिखूं?

वह हां-हां कर बोला-"ए! अपुन से पंगा लेने का नहीं। तुम जानते हो हमने जिन्दगी में कोई काम नहीं किया। चुपचाप कम करने का।"


अपना अभिनय दिखकर वह चला गया और किसी से मोबाइल पर बात करने लगा। मैं अपनी जगह पर बैठ गया और उसकी फ़ाइल उठा ली और उससे पूछा_"बोस ने तुम्हे इसके बारे में क्या निर्देश दिए हैं?"


" बॉस ने कहा है लिख दो कि यह काम नहीं हुआ तो उनके खिलाफ उच्च अधिकारियों से शिकायत कर अनुशासनात्मक कार्यवाही करवायी जायेगी।" वह आंखे नाचते हुए बोला।


मैंने कहा"-आख़िर वह हमारी कंपनी का ही एक भाग है ऐसे कैसे लिखा जा सकता है।"


"तुम्हे अपने बॉस के कहे अनुसार काम करना है या नहीं।"वह आँखें दिखाता हुआ बोला।


मुझे उसकी परवाह नहीं थी पर मैंने तय किया कि आज इसे सबक सिखाना चाहिऐ। मैंने उसके कहे अनुसार लिखने का फैसला किया। बीच-बीच में कुछ अभद्र शब्द भी वह लिखवा गया और वह भी मैंने उस पत्र में लिखे दिए-हालांकि उन्हें गाली तो नहीं कहा जा सकता पर पत्र में उन्हें लिखना वह भी कार्यालयीन पत्र में ठीक नहीं है।


मेरे पास बैठी सहकर्मी बोली-"तुम इसकी भाषा गलती से भी मत लिख देना वरना मुसीबत तुम पर भी आयेगी। यह तो फसेगा तुम भी नही बचोगे।"


वह फिर जोर से ठठाकर हंस पडा और बोला -"लिख भी देगा तो क्या ? अपना कुछ भी नहीं बिगडेगा। अपुन से पंगा लेते हुए सब डरते हैं।"



मैंने पत्र पूरा किया और कहा-"यह लो और कंप्युटर रूम में जाकर इसे टाईप करवा दो। हाँ इससे पहले अपने और टाईप के बाद बॉस के हस्ताक्षर करवा लेना। "



"इस तुम पर अपने हस्ताक्षर नहीं कर सकते?"उसने पूछा।

मैंने उसे घूर कर देखा तो वह बोला-"ठीक है मैं ही कर देता हूँ।"



उसने सचमुच हस्ताक्षर किये और कंप्युटर रूम के तरफ चला गया। मैंने पास बैठी सहकर्मी से कहा-"मैंने वही लिखा जो उसने कहा।"



"क्या?" वह फटी आंखों से मेरी तरफ देख रही थी-"इस समय वहाँ लडकियां हैं, पढ़ेंगी तो क्या कहेंगी?"



वह लोट आया और बोला-"एक बात है गुरू। चुपचाप हमारा कहा मान लिया करो तो मैं तुमसे पंगा नहीं लिया करूंगा।"



मैं अपने काम में लगा रहा। वह अपनी जगह पर जाकर बैठ गया। मैं जानता था कि अब बवाल मचने वाला है और उसमे ज्यादा वक्त नही लगा। एक कंप्युटर ऑपरेटर दनदनाती रूम से बाहर आयी और मेरे सामने रखी कुर्सी पर बैठ गयी और बोली-" यह आपने क्या लिख दिया। पत्र लिखते हैं कि मजाक करते हैं ।"



मैंने उससे कहा-"पत्र पर दस्तखत किसके हैं ? और यह ऑफिस है इस तरह ऊंची आवाज में बात करना ठीक नहीं है।"



" वाह सर! आप हमे सिखा रहे हैं, यह देखिए अपना लिखा पत्र !किसी अधिकारी को लिख रहे हैं या किसी सडक छाप आदमी को? और दस्तखत..."उसने मेरी तरफ देखा फिर दूसरी तरफ देखने लगी जहाँ वह बैठा था।



" मेरे दस्तखत हैं।" वह बीच में बोला-" तुम तो इसे टाईप कर दो, बाकी हम निपट लेंगे। कुछ समझ में नहीं आ रहा तो मुझसे पूछ लो।"



"पर यहाँ ऊंची आवाज में बात करना मना है।"मैंने जानबूझकर कंप्युटर ऑपरेटर का ध्यान बटाने के लिए कहा।



हुआ भी वही उसने मुझे पलटकर देखा तो मैंने मुहँ फेर लिया। वह ग़ुस्से में वहां से चली गयी। वह भी कहीं बाहर चला गया। पास बैठी सहकर्मी बोली-" आज तो तुमने कमाल कर दिया? आज तुम दोनों में से एक फंसेगा। तुम या वह पंगेबाज।"



थोडी देर बाद वह लौटा तो कंप्युटर ऑपरेटर भी पत्र ले आयी और उसे दिया। उस समय भी वह मुझे घूर कर देख रही थी उसे यकीन नहीं था कि मैं ऐसा भी कर सकता हूँ , वह मेरी हैण्ड रायटिंग पहचानती थी और उसे पता था कि वह मैंने ही लिखा था। उसने फ़ाइल उसके हाथ में देते हुए कहा-"बॉस से दस्तखत कराने से पहले इसे पढ़ लेना।"



"मैं क्यों पढूं गा? वह बॉस काहेकी तनख्वाह लेता है?" वह उसके हाथ से फ़ाइल लेकर सीधे बॉस के कक्ष में चला गया और कंप्यूटर ऑपरेटर मेरे सामने ही कुर्सी पर बैठ गयी।

मैंने उससे पूछा -"यहाँ क्यों बैठ गयी? क्या कोई काम नहीं है।"



"नहीं सर!काम तो बहुत पड़ा है पर आज जो होने वाला नाटक हैं वह देखना भी जरूरी है। " वह आँखें फाड़कर मेरी तरफ देख रही थी।" आपने तो आज कमाल का अभिनय किया है? आपको तो राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिऐ।"



उसने क्या किसी ने भी इस तरह मुझसे बात करने का साहस नहीं किया था-सिवाय उस पंगेबाज के - और मैं समझ गया था कि आज कुछ मुझे भी परेशानी होने वाली है और वह बोस के रुप में मेरे सामने आ रही थी। उनको देखकर सब लोग उठ कर खडे हो गये मैं ऐसे बैठा काम कर रहा था जैसे मैंने देखा ही नही हो। उन्होंने वह फ़ाइल मेरे सामने पटक दीं और बोले_"यह पत्र तुमने लिखा है? अब तुम यह मत कहना कि इस पंगेबज के कहने से लिखा है ,तुम नहीं थे इसलिये मैंने इससे पत्र लिखने को कहा था ।"


बॉस से साथ वह भी था और उसका चेहरा फक पड़ चुका था । "पर सर!यह काम तो इसी का है॥"मैंने कहा।



उन्होने मेरी बात पूरी नहीं होने दीं और चीखने के अंदाज में बोले-"इसने कभी जिन्दगी में कोई काम ढंग से किया है। आज तक इसके सारे पत्र मैंने तुमसे लिख्वाये हैं । हम उनसे इस पत्र में क्या कह रहे हैं । वह हमारे जितने बडे अधिकारी हैं और मैं उन्हें धमकी दे रहा हूँ...और यह गालिया...कंपनी की मेनेजिंग बोर्ड में यह चिट्ठी भिजवा दूं, " फिर वह कम्प्यूटर ऑपरेटर से बोले-" और तुमने इसे टाईप कर दिया। मेरे पास नहीं ला सकती थी। तुमने किसके कहने से यह टाईप कर दिया?"



कम्प्यूटर ऑपरेटर घबडा गयी और उसने पहले मेरी तरफ और फिर उसकी तरफ उंगली उठाई और बोली-"इनके... उनके...."



" यह क्या इनके और उनके लगा रखा है क्यों नहीं कहती कि एक पंगेबाज और दूसरा फंदेबाज ।" फिर मेरी तरफ देखकर बोले-"यह तुम्हारा पहला मजाक है, इसलिये कुछ नहीं कह रहा हूँ, अगर यह पंगेबाज होता तो इसकी तो नौकरी गयी होती। अब तुम दूसरा पत्र तैयार करो।" वह चले गये।



मैंने देखा वह ग़ुस्से में मेरी तरफ देख रहा था। मैंने मुहँ फेर लिया तो वह बोला-"आज के बाद तुम पर भरोसा नहीं किया करूंगा। कम्प्यूटर ऑपरेटर और वह सहकर्मी दोनों बैठकर उसे सांत्वना दे रही थी। सहकर्मी मेरी तरफ देखकर बोली-"कुछ भी हो तुम्हें यह नहीं करना चाहिऐ।



मैंने ग़ुस्से से कहा-किसे क्या नहीं करना चाहिए था?"



कम्प्यूटर ऑपरेटर मेरी तरफ उंगली कर बोली-फंदेबज सर! आपको यह पत्र इस तरफ तैयार नहीं करना चाहिऐ था।"

मैंने उससे कहा-"तुम फंदेबाज कहने की भी हिम्मत कर रही हो?"

वह ग़ुस्से में बोली-"अब सामने तो नहीं पर आपके पीठ पीछे सभी इसी नाम से बुलाएँगे।"

वह चली गयी तो मैं सोच रहा था इस लडाई में जीता कौन था वह या मैं। फिर सोचा ऎसी लडाई में जीत और हार भी कभी होती है क्या?



मेरे पास बैठने वाली सहकर्मी धीरे-धीरे बोली-"वह पंगेबाज और तुम फंदेबाज। आज की घटना में कभी भूल ही नहीं सकती।

3 comments:

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब। अब आगे से ऐसा मत करना।

Udan Tashtari said...

:) सही रहा-फंदेबाजी तो थोड़ा बच कर ही करना चाहिये. :)

परमजीत बाली said...

जीवन मे कई बार ऎसे मौके आते हैं।यही तो जीवन के रंग हैं।इन्सान समयानुसार कई बार इस तरह के कार्य कर बैठता है। प्रसंग अच्छा लगा।

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