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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/1/08

समाज का भ्रामक विभाजन स्वीकार्य नहीं-आलेख

विश्व में आतंकवाद एक ऐसे भ्रम की उपज है जिस पर बहुत बड़ी बहस करने के बाद भी कोई निर्णय नहीं निकल सकता। मैं दूसरे धर्मों के बारे में जानता हूं पर उस लिखता नहीं। वजह मैंने अपने ऊपर ही एक अघोषित सेंसरशिप लगा रखी। मुझे यह भी लगता है कि इस तरह विवाद खड़े कर हम अपने समाज को किसी नयी दिशा में नहीं ले जा सकते। मैं अक्सर अपने धर्म में व्याप्त अंधविश्वास, और रूढि़वादिता के प्रतिवाद में लिखता हूं। मेरे कुछ साथी और मित्र ब्लाग लेखक भी इस पर समय समय पर कड़ी टिप्पणियां करते हैं। मैं जब अपने धर्म में व्याप्त कुरीतियां पर लिखता हूं तो कोई उस पर उंगली नहीं उठाता क्योंकि सभी जानते हैं कि मैं अपने ही भारतीय अध्यात्म के सकारात्मक पक्ष पर भी नियमित रूप से लिखता हूं। हां, सभी ब्लाग लेखक स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म में व्याप्त बुराईयों और पाखंडों को उजागर करते हुए खूब लिखते हैं पर उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति जो निष्ठा है वह भी बता देते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वह मेरी तरह ही उसके सकारात्मक पक्ष पर भी नियमित रूप से लिखें पर उनके लिखे से मेरे अंदर यह विश्वास पैदा होता है कि मेरे जैसे विचार रखने वाले अन्य लोग भी है।
यहां इस देश में हिंदू धर्म को लेकर आलोचना करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है तो सकारात्मक पक्ष पर भी हर कोई लिख सकता है। यह अलग बात है कि भारतीय अध्यात्म को हिंदू धर्म के नाम पर अनदेखा किया जाता है पर सत्य के निकट जितना यह है उसे वही समझ सकता है जो इसका अध्ययन करता है। आधुनिक हिंदी साहित्य में भक्ति काल तो संपूर्ण रूप से इसी अध्यात्म के रहस्यों को उजागर करने के साथ ही जीवन के लिऐ ऐसे संदेश देता है जो अन्यत्र किसी अन्य भाषा में हों यह संभव है ही नहीं। संत कबीर और कविवर रहीम के बारे मेंे अधिक लिखना सूरज को दीपक दिखाना है। अपनी अल्प बुद्धि और मासूम विवेक के साथ जब मैं वर्तमान संदर्भ में व्याख्या रखता हूं तो टिप्पणी करने वाले लिख जाते है कि ‘ताज्जुब है आप वर्तमान संदर्भों में भी इसकी व्याख्या ऐसी करते हैं कि जब यह लिखे गये होंगे तब लिखने और कहने वालों ने सोचा भी नहीं होगा कि आगे कभी ऐसी व्याख्या होगी।‘

यह लेख मैं अपनी आत्म प्रंवचना में नहीं लिख रहा हूं। मेरा आशय यह है कि हम अपने हिंदू धर्म में तमाम तर्क वितर्कों की गुंजायश रखते हैं। इसका लाभ उठाकर कई लोग केवल इसके नकारात्मक स्परूप को सामने दिखाकर दूसरे लोगों के सामने अपने उदार होने का प्रमाण प्रस्तुत करते है। कई लोग अपने समाज में सुधार की दृष्टि से निष्काम भाव से कार्य करते हुए अपने ही अंधविश्वासों और रूढि़वादियों को उजाकर करते हुए उनसे लोगों को दूर रखने के लिये आग्रह के साथ लिखते और बोलते हैं। यानि हम अपने धर्म में जो आडम्बर है उसको उजागर करने में कोताही नहीं करते। इतना ही नही मैं तो यह भी कहता हूं कि हमारे धर्मग्रंथों में कुछ ऐसे वाक्य हैं जो अब अप्रासंगिक हो गये हैं तो समाज भी अब उसे स्वतः नहीं अपनाता पर इसका आशय यह नहीं कि उन धर्मग्रंथों के सारे वाक्य ही गलत हैं। मनृस्मृति में और कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर तमाम लोग आक्षेप करते हैं पर मैंने उनके सार्थक वाक्य यहां रखे हैं और किसी ने उनको चुनौती नहीं दी है। हमारे देश के अध्यात्म के समय के साथ सकारात्मक परिवर्तन स्वीकार करने की गुंजायश है। श्रीगीता में ज्ञान और विज्ञान दोनों में मनुष्य को पारंगत होने का संदेश दिया गया है। सत्य के ज्ञान के कोई बदलाव हो नहीं सकता पर माया के विज्ञान का स्वरूप परिवर्तन शील है और उनको स्वीकार करते हुए आगे हमार समाज बढ़ता जाता है।

मैंने कहा था कि मुझे सिर्फ अपने धर्म पर ही विचार करने का अधिकार है-यह मैं स्वतः मानता हूं। उनकी अच्छाईयों और बुराईयों पर बहस से भी नहीं डरता। एक सवाल जो मुझे परेशान करता है कि अन्य धर्मों में क्या कोई बात विवादास्पद नहीं हैं? क्या उनमें अंधविश्वास, रूढि़वादिता और पाखंड नहीं हैं। क्या उनके सभी धार्मिक गुरू निर्विवाद हैं? क्या उनमें लिखे गये सभी वाक्य सिद्ध वाक्य हैं जो उनके प्रतिवाद के रूप में उनके मतावलंबी लेखक कुछ लिखते ही नहीं?
जहां तक मैंने अनेक धर्मों का अध्ययन किया है उसके बारे में मेरी राय है पर अन्य धर्मों पर टिप्पणी करने का अर्थ है कि अनावश्यक विवादों में फंसना। अगर कुछ कहूंगा तो वह धर्मग्रंथों से दो चार विवादस्पद श्लोक या आधुनिक हिंदी साहित्य से एक-दो दोहा उठाकर सुनायेंगे जिनको हम कई वर्षों से सुनते आ रहे है। मैंने आज तक किसी भी अन्य धर्म पर उस समुदाय के लेखकों द्वारा लिखी गयी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं पढ़ी। संभव है कि दूसरे धर्मों में ऐसी बहस की गुंजायश नहीं हो या फिर उसके लेखकों के मन में अपने धर्म के प्रति वैसी ही संवेदनशीलता न हो जैसी कि हिंदी समुदाय के लेखक के मन में होती है। इसलिये अधिकतर हिंदू लेखक लिखते हुए कभी न कभी अपने धर्म पर लिख जरूर जाते हैं भले ही वह उसमें आडम्बर और रूढि़यों के प्रतिवाद करते हों। यहां हिंदू लेखक कहते हुए मेरे मन में जो वितृष्णा आई उसे मैं बयान नहीं कर सकता पर विषय के प्रवर्तन में अस्पष्टता न रहे इसलिये मुझे ऐसा करना पड़ा। इसके पीछे मेरे मन में एक विचार आता है और मुझे लगता है कि थोड़ी देर के लिये यह विभाजन कर मैं यह बताना चाहता हूं कि भारत में अन्य धर्मों को मानने वाले लोग आपस में ही एकमत नहीं हैं कि वह हिंदू कहलाने में हिचक महसूस करें या नहीं। एक विवादास्पद गैर हिंदू विद्वान को मैंने कहते हुए सुना है कि अगर आप इस देश को हिंदुस्तान कहते हैं तो हम भी हिंदू हैं और हमें संकोच नहीं है पर अगर आप धर्म की बात करते हैं तो हम हिंदू नहीं है। उनका आशय यह है कि इस जमीन पर पैदा होने और किसी मत को मानने के विषय अलग-अलग है।

यहां अब मैं सभी लेखकों एक ही स्थान पर खड़ा करता हूं। भारत की अपने एक संस्कृति है और भारतीय अध्यात्म केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं है। भारतीय संस्कृति और अध्यात्म उत्तरोतर समृद्धि होते जाते हैं। यहां तक कि भगवान के अवतारों के समक्ष कुछ संतो ने अपनी ख्याति अर्जित की है। धर्मग्रंथों में भगवान के अनुसार‘मेरे भक्त मेरे से भी बडे+ हैं’-यही कारण है कि तुलसी दास, सूरदास, मीरा, कबीर, रविदास, रहीम, रसखान तथा अन्य अनेक विद्वानों को भी भारतीय अध्यात्म का भाग माना गया है-अन्य धर्मों के अनेक संतों और मनीषियांे को भी भारतीय अध्यात्म से संबंधित विषयों पर प्रकाशित पत्रिकाओं में स्थान दिया जाता है।
वर्तमान समय में आधुनिक हिंदी में रचे बसे सभी धर्म के लेखकों के लिए यह संभव नहीं है कि वह भारतीय अध्यात्म से अलग हटकर कुछ देख पाते-जिन्होंने इन महान रचनाकारों को पढ़ा वह भला और क्या पढ़ पाते? यहां हम कई ऐसे लेखकों को देख सकते हैं जो हिंदू परिवार से न होने के बावजूद भारतीय अध्यात्म में अटूट निष्ठा रखते हैं। क्या दिलचस्प बात नहीं है कि भारतीय अध्यात्म के प्रमुख आधार श्रीगीता ग्रंथ को तो अन्य धर्मों के मतावलंबी भी चुनौती नहीं दे पाते। भारतीय अध्यात्म से सराबोर सभी हैं चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़े हैं और इसलिये इस देश में किसी भी दूसरे धर्म की आलोचना सुनने को नहीं मिलती। और दूसरे देशों में धर्म के प्रति इतनी संवदेनाएं नहीं है कि इस पर लिखकर लेखक अपना समय नष्ट करना चाहें। इसी संवदेनशीलता का यह परिणाम भी होता है यहां कुछ तत्व लोगों को बांटकर अपना हित साधते हैं। मुश्किल यह है कि अन्य धर्मों के लोग भी कहीं न कहीं भारतीय अध्यात्म में सराबोर है इसलिये अपने धर्म के दोषों पर दृष्टिपात नहीं कर पाते।

एक दिलचस्प वाक्या है। मैं सुबह अध्यात्म रूप से अपनी बात कह देता हूं पर शाम को अपनी हास्य कविताओं में बिना किसी धर्म का नाम लिये आक्षेप करता हूं। शूरूआती दौर मे एक सज्जन ने मुझे लिखा कि आप अपने धर्म पर व्यंग्यात्मक प्रहार करने वाली बात लिख रहे है किसी अन्य के मत पर लिखकर बताईये। मुझे उस पर हंसी आर्यी। तब मैंने सभी धर्मों को एक ही मानने वाले शब्द अपने पाठों में अपनाना शूरू किये सर्वशक्तिमान, दरबार, सेवक, पवित्र पुस्तक और भक्त। इसका आशय यह है कि मैं सभी को एक ही पलड़े में रखता हूं। फिर हमारे देश में अच्छा लेखक वही माना जाता है जो व्यंजना विधा में रखता है।

मेरे मन में कभी भेद नहीं आता। भेदात्मक बुद्धि तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है। अंतर्जाल पर तो जो ब्लाग लेखक ऐसे भेद करता है उसे मैं मूर्ख ही कहूंगा। एक तो यहां छद्म नाम की संभावना भी लगती है। दूसरे करीब-करीब सभी धर्मों के टिप्पणीकार मेरे ब्लाग पर आ चुके हैं। उनकी टिप्पणियों से निष्कर्ष यह है कि उनके शब्द किसी धर्म के परिचायक नहीं होते और प्रेम, मित्रता और सदभावना में इतनी गहराई होती है कि...................मुझे कोई शब्द नहीं मिलता कि मैं उसके लिए कोई पैमाना लिख सकूं।

मैं यहां पांच नाम लिखना चाहता था जो अपनी टिप्पणियां इतने प्रेम से रखते हैं कि मेरा मन पुलकित हो जाता है और तब होता है मेरे मन में ऐसा भाव जो मुझे धर्म, जात, भाषा और क्षेत्रीय भावना से दूर ले जाता है, परंतु उनके नाम लिखने से मुझे ही अपनी बुद्धि में भेद दिखाई देता। मैं समाज को विभाजित करने वाले शब्दों से हालांकि दूर रहता ही हूं और खुलकर कहता हूं कि यह विभाजन भ्रामक है। हां, लिखने के लिये अपना विषय स्पष्ट करने के लिये इस विभाजन का नक्शा पाठकों के सामने रखना पड़ता है पर मैं अपने पाठ का वाहन कभी इस नक्शे पर नहीं चलाता। मैं अकेला ब्लाग लेखक हूं जो कहता हूं कि सभी ब्लाग लेखक और पाठक एक जैसे ही मुझे लगते हैं और समाज के भ्रामक विभाजन वाले शब्दों की संज्ञा उन पर लागू नहीं होती। वह स्वयं मुझसे कहें तब भी उनको बता सकता हूं कि वह गलत है। शेष फिर कभी।

1 comment:

बाल किशन said...

अद्भुत और विचारोत्तेजक विश्लेषण.
मैं पुरी तरह से सहमत हूँ.
बधाई.

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