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7/30/08

आतंकवाद से लड़ने के लिये सामाजिक ढांचा मजबूत होना जरूरी-आलेख

पिछले चार दिन से अखबार, टीवी चैनल और अंतर्जाल पर देश में हुई ताजा आतंकवादी घटनाओं के बारे में समाचार पढ़ने को खूब मिले और लेखकों और संपादकों ने अपने अपने दृष्टिकोण से विचार भी व्यक्त किये। कुछ लोगों ने गहरा क्षोभ जताते हुए कड़े कदम उठाने की मांग की तो कुछ ने गहरा दुःख जताया और कुछ ने आर्त भाव से विभिन्न समुदायों में एकता की अपील की। ऐसे अवसर पहले भी अनेक आये और उस समय भी करीब करीब ऐसे ही विचार व्यक्त किये गये इन सबको देखकर यह कहना अतिश्याक्ति नहीं होगी कि लार्ड मैकाले ने जिस उद्देश्य से भारत के लोगों की मानसिकता को ही गुलाम बनाने की जो योजना बनाई थी वह फलीभूत हो गयी है। लोग अपने वैचारिक आधारो (पूर्वाग्रहों) से एक कदम भी आगे बढ़कर सोचने को तैयार नहीं है। आतंकवादी घटनाओं से क्रोध, निराशा और दुःख की सीमा में सिमट कर विचार करते हुए जिसके दिमाग में जैसा विचार आ रहा है व्यक्त कर रहा है। जबकि सबसे पहली समस्या तो आतंकवाद सही रूप समझने की है और तभी उस पर कोई विचार हो सकता है।

भारत में आतंकवाद न एक दिन में आया है और न एक दिन में जाने वाला है। जिन्हें उपलब्ध हो सकें वह आज से पच्चीस से सत्ताईस वर्ष पूर्व के अखबार उठाकर देख लें या टीवी के दृश्य फिर देखें। यह आतंकवाद एक दिन में जायेगा भी नहीं। इसके लिये पहले तो अपने विचारों को व्यापक दृष्टि लानी होगी। इसका उपाय सभी समाजों को ढूंढना क्योंकि वह उसके कमजोर होने के साथ ही आतंकवाद बढ़ता जा रहा है। जिस आतंकवाद को हम देख रहे हैं उसमें दो तरह के लोग लिप्त हैं। एक तो वह जिनके लिये यह व्यापार है और कहीं न कहीं उनको इसके आर्थिक फायदे हैं और दूसरे लोग वह हैं जो निराशा के कारण उपजे क्रोध के कारण इसमें शामिल हो जाते हैं और थोड़े से आर्थिक लाभ की लालच उन्हें ऐसा करने के लिये प्रेरित कर देती है।

इस आतंकवाद के चेहरे को धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र की दृष्टि से देखने का प्रयास निरर्थक है। हालांकि इस बारे में भी हर कोई अपनी सुविधा से ही विचार करता हैं कुछ लोग धर्म और जाति के नाम इसकी पहचान करते हैं तो कुछ लोग इसका विरोध करते हैं-पर तर्क दोनों के सतही है। इस दुनियां में जाति, धर्म, भाषा, और धर्म के नाम अनेक समूह स्वतः बन गये जिनको समाज भी कहा जाता है। हर मनुष्य अपनी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा के लिये इनका सदस्य बना रहना चाहता है। इसका लाभ इन समूहों या समाजों के शीर्ष पर बैठे लोग अपने लिये लेते हुए ऐसे काम करते हैं जिससे कि उसके अंतर्गत सांस लेने वाले सभी प्राणी उसके अनुगामी बने रहें और वह मर जाये तो उसकी पीढि़यां भी उस पर शासन करें। इसके लिये एक ही तरीका है कि दूसरे समूह या समाज का खौफ अपने लोगों में बनाये रहो। सदियों से चले आ रहे यह समाज इतने रूढ़ हो जाते हैं कि थोड़े से बदलाव की हवा भी उनको कंपा देती है। बदलाव इस सृष्टि का नियम है और उससे ही सभी समाज और समूह बचने का प्रयास करते हैं। यहीं से शुरू होता है आपसी वैमनस्य का भाव। इसमें एक तरफ होते हैं वह लोग जो बदलाव की तरफ जाते हैं और दूसरे जो यथास्थितिवादी होते हैं। यह संघर्ष अनेक बाद हिंसा का रूप लेता है-इतिहास इस बात का प्रमाण है।

हम आतंकवाद के बारे में हमेशा यही सुन पाये हैं कि इसमें विदेशी ताकतों का हाथ है, पर उंगलियां इस देश की हैं इससे हमेशा ही मूंह फेरने का प्रयास किया और यही कारण यह है कि नित प्रतिदिन आतंक बढ़ता ही जा रहा है। एक बार ठंडे दिमाग से सोचे आखिर वह कौन लोग हैं जो विदेशी हाथ में उंगलियों की तरह नाच रहे हैं। हमें इसके लिये देश के संपूर्ण ढांचे पर दृष्टिपात करना होगा। सच तो यह है कि सभी समाज या समूह अंदरूनी द्वंद्वों का शिकार है। अक्सर जब कहीं कोई बड़ी आतंकवादी घटना होती है तब धर्म, भाषा, जाति, और क्षेत्र के नाम पर बने समाजों में आपसी एकता की बात की जाती है जबकि यह संकट उनके अंदरूनी द्वंद्वों और निराशाओं का परिणाम है। पिछले 62 वर्ष से अलग अलग समाजों के बीच लगाये जा रहे एकता के नारे से इसका हल तब तक नहीं निकलेगा जब तक कि सभी समाजों के लोग अपने शीर्षस्थ लोगों की चालों का शिकार हुए बगैर इस पर चिंतन और मनन करेंगे। इसके लिये अधिक नहीं केवल एक कदम आगे बढ़कर विचार करना है।
सारे समाज अंदर से खोखले हैं क्योंकि उनके कर्मकांड अर्थ पर आधारित है। जिनके पास धन है उसका प्रदर्शन वह निर्धन लोगों के सामने अपने जन्मजात श्रेष्ठ होने के प्रमाण के रूप में करते हैं। निर्धन लोगों के मन में यह निराशा अंततः क्रोध का जन्म देती हैं। ऐसे में थोडे आर्थिक लाभ की खातिर वह ऐसी घटनाओं में लिप्त हो जाते हैं जिसमें बाद में उनको भारी संकटों का सामना करना पड़ता है। याद रखें भारत से बाहर गये अप्रवासियों को मानव श्रम निर्यात का ही भाग माना जाता है। इसका आशय यह है कि हमारे यहां मानव श्रम अधिक मात्रा में है और इसी कारण अगर विदेशी अगर दक्ष और कुशल लोगों का जहां अपने यहां आयात कर रहे हें तो अकुशल लोगों को यहां उपयोग कर देश को अस्थिर कर रहे हैं, और उनको अगर इसमें सफलता मिल रही है तो उसके पीछे हमारे देश में अस्थिर हो रहा सामाजिक ढांचा ही है।

यहां समाज की बात छोड़कर व्यक्ति के रूप में व्यक्तियों का ही सोचें। देश में गरीब तो पहले भी थे पर आतंकवाद नहीं था। दरअसल समाज में धन का असमान वितरण इतना नहीं था जितना अब होता जा रहा है। फिर धन से अर्जित शक्ति को शक्तिशाली लोग संभाल कर रखें तो भी ठीक पर वह तो उसका उपयोग कमजोर को दबाने के लिये कर रहे हैं। ऐसे में हर समाज में असंतोष है और कमजोर सदस्य उससे असंतुष्ट हैं। ऐसे आतंकवाद के व्यापारी अपनी सुविधानुसार चाहे जिस समाज या समूह से अपने लिये मानवश्रम जुटा लेते हैं और अगर हम उन्हीं जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर इस आतंकवाद की पहचान करेंगे तो कभी नहीं जीत पायेंगे।
इसके लिये यह आवश्यक है कि एक नये समाज के निर्माण के साथ अपने ऊपर एक आर्थिक और सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब ठंडे दिमाग से विचार करें। स्वयं पर आर्थिक नियंत्रण और अपने पद के साथ प्रतिष्ठा के अहंकार का भाव अब लोगों को छोड़ना ही होगा क्योंकि इस कारण लोग अपने समाज के सामान्य लोगों की सहानुभूति खोते जा रहे हैं
भारत को अध्यात्मिक रूप से विश्व का गुरु कहा जाता है पर यहां का हर आदमी भौतिक परिलब्धियों के पीछे भाग रहा है। आम आदमी की क्या करें यहां सके सभी समाजों के धर्मगुरू भी सर्वशक्तिमान का स्मरण करने का संदेशा देकर माया एकत्रित करने में लगे हैं। समाज के नाम पर तो उसका दायरा केवल बच्चों की शादी करने तक ही रह गया है। इसके अलावा भी अन्य रूढि़यों को निभाने के चक्कर में आदमी घर से बाहर की हालतों पर तो सोच ही नहीं पाता यही कारण है लोग जागरुक नहीं है और इसका लाभ इस देश को अस्थिर करने वाले लोग उठा लेते हैं। यहां मैनें किसी समाज या समूह का नाम नहीं लिया और न ही किसी घटना का उल्लेख इसलिये किया कि कोई डर है बल्कि इसका कारण यह है कि इनकी संख्या इतनी है कि किस किस का नाम लें और किस किस को रोयें। सच तो यह है कि हमें अपने समाजों के अंदर ही सद्भाव और सहयोग का भाव लाने का प्रयास अपने स्तर पर ही करना चाहिए क्योंकि इस समय सबसे बड़ी समस्या अपने अंतद्र्वद्वों से उभरने की है। आखिर सभी समाजों के शीर्षस्थ लोग अपने समूहों का प्रतिनिधित्व करते हुए शांति की अपीलें करते हैं पर उसके बावजूद यह क्रम थम नहीं रहा । क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि समाज अंदर से खोखले हो गये हैं? ऐसे में समाजों के मध्य एकता के नारे से इसका मुकाबला नहीं किया जा सकता। इसके लिये यह जरूरी है कि सभी समाज स्वयं मजबूत हों। क्रमशः
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

7/16/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (2)

अध्यात्मिक ज्ञान जिस व्यक्ति को होता है उसका मानसिक तथा बौद्धिक शोषण कतई नहीं किया जा सकता है। अध्यात्म ज्ञान कोई अधिक व्यापक नहीं है पर उसका अर्थ समझकर उसे धारण करना बहुत कठिन है। वैसे एक बात स्पष्ट है कि समस्त धार्मिक विचाराधाराऐं अध्यात्मिक ज्ञान के आधार को ही मजबूत करने का दावा करती हैं पर वह उसमें अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषय इस तरह जोड़ दिये गये हैं कि सामान्य मनुष्य भ्रमित हो जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान जो कि सत्य का साक्षी है उसकी चर्चा तो पूरे विश्व में होती है पर उसका अध्ययन, चिंतन और मनन कितने लोग करते हैं और उसमें भी कितने उसे धारण कर पाते हैं? यह अलग चर्चा का विषय है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार करने वाले कथित संतों ने अनेक प्रकार की चमत्करिक कहानियां तथा सांसरिक विषय उसमें इस तरह जोड़े हैं कि उसका मूल स्वरूप ही किसी की समझ में नहीं आता।

भारत में अध्यात्मिक ज्ञान का दावा रखने वाले तो बहुत मिल जायेंगे पर उसके सूक्ष्म रूप का किसी को पता नहीं है। अपने व्यवसाय, नौकरी तथा खेती से निराश होने पर अक्सर लोग कहते हैं कि ‘हमारा काम हैं कर्म करना और फल देना तो परमात्मा का का है।’ सुनने में यह कितना अच्छा लगता है। कहने वाले तो यही कहेंगे कि यह श्रीगीता में ऐसा ही कहा गया है।
श्रीगीता में केवल कर्म की बात नहीं कही गयी बल्कि निष्काम कर्म की बात कही गयी है। जब कोई कहता है कि ‘हमने अपना काम किया और फल देना तो परमात्मा का काम है’ तो यह उसके निष्काम होने का प्रमाण नहीं है क्योंकि अपने कर्म के साथ कहीं न कहीं उसके फल पाने की इच्छा प्रकट होती है।’

पहले तो कर्म का फल का स्वरूप ही समझ में आना चाहिये तभी तो आदमी निष्काम भाव से कार्य कर सकता है। दरअसल निष्काम भाव से कर्म करना ही जीवन से विषादों से मुक्ति दिलाने का उपाय है और लोग निष्काम भाव से काम न करें इसलिये उनको उसका उपदेश दिया जाता है पर प्रेरित तो उस सांसरिक फल के लिये ही किया जाता है जो उनके जीवन और विचारों को सीमित दायरों में बांध देता है। वह सांसरिक पदार्थों की फल समझते हैं जिनका उपयोग भी वह यही करते हैं। अगर कोई मनुष्य नौकरी कर रहा है तो उसका वेतन, व्यवसायी है तो उसका लाभ और मजदूर है तो उसकी मजदूरी क्या फल है? नहीं अगर यह फल है तो फिर वह इसका उपयोग वह अकेला कहां करता है? मनुष्य द्वारा भौतिक मुद्रा अर्जित करना फल नहीं है क्योंकि वह उसे भी तो अपने तथा परिवार के ऊपर ही व्यय करता है। कोई अपने बच्चे की फीस भर रहा है तो कोई अपनी पत्नी का इलाज करा रहा है तो कोई मकान बनवा रहा है। कोई अपने पिता को दे रहा है तो कोई माता को दे रहा है। कभी भाई की मदद कर रहा है। भला इस धनोपब्धि को फल कैसे कहा जाता है। जब वह अपने हाथ से कहीं से धन लेता है तो वह फल नहीं बल्कि अपने कर्तव्यों और दायित्वों के निर्वाह के लिये लेता है। यह धन लेना उसका कर्तव्य है न कि फल! धन प्राप्त करना आपका कर्म है और व्यय करना भी-उसे फल कैसे कहा जा सकता है।

दूसरी बात तो छोडिये जो दुनियां भर का ज्ञान बघार रहे हैं वह भी इसमें से अपने लिये दान मांगते हैं और बताते हैं कि यह आपकी धार्मिक जिम्मेदारी है। सीधा आशय यह है कि आपने जो धन कमाया वह तो आपके कर्म का दायित्व बढ़ाता है और आप उसे कहीं अन्य व्यय कर अपना कर्तव्य निबाहते हैं। जब तक देह है उसे बनाये रखने के लिये व्यय करते हैं पर यह तो हमारा कर्म है। यह फल कहां से कहा जा सकता है?

सवाल यह है कि फिर फल क्या है? फल है हम अपने जीवन में शांति से रह पायें और जब देह त्याग करने का समय आये तो शांति और संतोष के साथ मोक्ष प्राप्त करें। यही असली फल है जिसकी तरफ ले जाने की ताकत केवल भारतीय अध्यात्म के ज्ञान में ही हैं। पहले उस सांसरिक फल का स्वरूप भी समझ लें। अगर हमने किसी से माह भर कार्य करने, अथवा वस्तु बेचने या मजदूरी करने पर किसी से धन मांगा तो क्या वह फल मांगना है। नहीं! यह तो उसे अपने सांसरिक कर्तव्य का निर्वाह करने के लिये प्रेरित करने का प्रयास है जिससे हम अपने आगे के कर्तव्य का निर्वाह कर सकें। मतलब यह कि अगर कोई अध्यात्म का ज्ञान रखता है तो वह अपने कर्तव्य निर्वाह के लिये धन प्राप्त करना फल नहीं बल्कि कर्तव्य ही हैै। यह अलग बात है कि जिन लोगों को पैसा देना नहीं होता वह कह देते हैं-‘क्या, तुम ज्ञानी होकर पैसा मांगते हो।’ याद रखना अध्यात्म का ज्ञान होने का आशय यह कदापि नहीं कि आदमी सांसरिक विषयों को त्याग कर भागने की तैयारी कर ले। एक सामान्य व्यक्ति और अध्यात्मिक ज्ञानी व्यक्ति के बस दृष्टिकोण में अंतर होता है। सामान्य व्यक्ति अपनी धनोपब्धि पर ही प्रसन्न होकर रह जाता है तो उसके जाने पर उसे भारी कष्ट होता है। इसके विपरीत अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला धन मिलने पर उसे फल मानते हुए उसमें लिप्त नहीं होता। सामान्य व्यक्ति एक के बाद दूसरी और दूसरी उपलब्धि के पीछे भागता है और अपने पूरे जीवन में शांति से नहीं बैठ पाता और न मनुष्य देह का सुख उठा पाता है जबकि ज्ञानी अपने लिये शांति से जीने के पल जुटा लेता है और फिर दृष्टा की तरह इस संसार में मानव देह होने का वह आनंद भी उठाता है।

अगर आप देखें तो सारे धर्म तमाम तरह के कर्मकांड प्रतिपादित करते हैं जिनका निर्वाह उसी धनोपलब्धि से किया जा सकता है जो हमने प्राप्त की है। सभी धर्मों के गुरू उसी धन पर अपनी नजरें गड़ाये हुए स्वर्ग में टिकिट रिजर्वेशन करने की गारंटी अपने भक्तो को देते हैं। उनका संदेश तो यही होता है कि ‘ला! माल ला! और ले जा स्वर्ग का टिकिट!

सभी आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि ‘देने वाला तो वही है’, ‘उसकी इच्छा के बिना यहां कुछ भी नहीं हो सकता’ और सभी के मन की इच्छा वही पूरी करता है’। ऐसा कहकर वह सांसरिक उपलब्धियोें को ही फल बताते हैं। कुल मिलाकर सभी धर्मों के कर्मकांड पैसा खर्च कर फल दिलाने के सिद्धांत पर आधारित हैं। जबकि भारतीय अध्यात्म बिना किसी सांसरिक फल के योग साधना और प्राणायम कर देह और मन के विकार दूर करने तथा ध्यान और प्रार्थना के आधार शांति का वह फल दिलाने वह ज्ञान है जो देह रहते और बाद में भी आदमी को संतोष प्रदान करता है। समस्या है गुरू की। श्रीगीता में भी गुरू का गुणगान है जिसका सबसे अधिक प्रचार वह कथित संत करते हैं जिन्होंने गीता के ज्ञान को समझा नहीं पर स्वयं गुरू बनने की लालसा में वह अपने भक्तों को वह अवश्य बताते हैं। अपने भक्तों का अध्यात्म का ज्ञान वह कभी नहीं देते। हां, अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषयों में उलझा कर अपनी भक्त का हृदय फिर उसी सांसरिक दलदल में फंसा देते हैं जहां वह कमल की तरह खिलने की इच्छा रहकर आता है। यह केवल भारतीय धर्मगुरूओं का ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में यही हाल है। धर्म के नाम शोषण केवल इसलिये हो रहा है क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान को सभी दबाये रखना चाहते है ताकि उसके मूल स्वरूप से लोग अवगत न हों।
श्रीगीता में अध्यात्म का जो ज्ञान है वह अनुपम है पर उसे कथित साधु संत अपने हिसाब से व्याख्या इस तरह करते हैं कि वह स्वयं ही अपने भक्तों में भगवान के रूप में स्थापित रहें। अब यह उनकी चालाकी भी हो सकती है या ऐसा भी कि वह स्वयं ही उस ज्ञान को धारण नहीं कर पाते और अपनी यही कमी छिपाने के लिये तमाम तरह के चुटकुले, कहानियां तथा सांसरिक विषयों की प्रधानता पर ही अधिक प्रवचन करते हैं। शेष अगले अंक में

7/3/08

अपनी किस्मत भी गरीब नहीं होती-कविता


कुछ पल की खुशी भी
जिंदगी में नसीब नहीं होती
उसकी तलाश में भटके दर दर
मिलते हैं कई पल मुस्कराने के
खुश होते दिखाने के
पर जो दिल को छू जाये
वह तस्वीर कभी करीब नहीं होती

पसीने में नहाया अपना जस्म
मेहनत की लगी हो जैसे भस्म
देख उसे अपना ही जी भर आता है
कोई चाहत फिर भी पूरी नहीं होती
चाहे जमाने की खुशी कदमों में पड़ी हो
पर भी अपनी किस्मत जैसे रूठी लगती है
जिन चेहरों को देखकर दिल खुश होता है
उनकी करीबी नसीब नहीं होती

अपना रास्ता बदल कर कहीं
और चले जाने का मन करता है
पर हर राही अपनी मंजिल से
भटका लगता है
तब देखकर ख्याल आता है
सभी बेहाल हैं
अपनी हालातों से
अपनी ख्वाहिशों के बोझ तले
चले जा रहे हैं
चेहरे पर हंसी है
पर दिल में मलाल लिये जा रहे हैं
तब लगता है कि
कुछ चाहतें पूरी नहीं होती तो क्या
कुछ ख्वाहिशें जमीन पर नहीं उतरती तो क्या
कुछ तस्वीरें सच में नहीं सामने आती तो क्या
चलते हैं अपने पांव
हिलते हैं अपने हाथ
अपनी अक्ल हो जब साथ
तब अपनी किस्मत भी गरीब नहीं होती
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दीपक भारतदीप

6/8/08

जीन चलते हैं पर गुण तो गुण में ही बरतते हैं-आलेख (1)

पश्चिमी विज्ञान मानव शरीर में स्थित जीन के आधार पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत करता है जबकि यही विश्लेषण भारतीय दर्शन ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं‘ के आधार पर करता है। पश्चिमी विश्लेषण मनुष्य के स्वभाव में उन जीनों के प्रभाव का वर्णन करते हैं जबकि भारतीय दर्शन उनको गुणों का परिणाम कहकर प्रतिपादित करता है।
मनुष्य की पहचान उसका मन है और देह में स्थित होने के कारण उसमें विद्यमान गुण या जीन से प्रभावित होता है इसमें संशय नहीं हैं। जब शरीर में कोई भीषण विकार या पीड़ा उत्पन्न होती है तब मन कहीं नहीं भाग पाता। उस समय केवल उससे मुक्ति की अपेक्षा के अलावा वह कोई विचार नहीं। करता। मन में विचार आते हैं कि ‘अमुक पीड़ा दूर हो जाये तो फिर मैं एसा कुछ नहीं करूंगा जिससे यह रोग फिर मुझे घेरे।’
कभी अपने आप तो कभी दवा से वह ठीक हो जाता है पर फिर उसका मन सब भूल जाता है। व्यसन करने वाले लोग इस बात को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। जब अपने व्यसन की वजह से भारी तकलीफ में होते हैं तब सोचते हैं कि अब इसका प्रभाव कम हो तो फिर नहीं करेंगे।’

ऐसा होता नहीं है। व्यसन कर प्रभाव कम हाते े ही वह फिर उसी राह पर चलते हैं। अपने ज्ञान के आधार पर मै यह कह सकता हूं कि‘शुरूआत में व्यसन आदमी किसी संगत के प्रभाव में आकर करता है फिर वही चीज-शराब और तंबाकू-मनुष्य के शरीर में अपना गुण या जीन स्थापित कर लेती है और आदमी उसका आदी हो जाता है। याद रहे वह गुण व्यसन करने से पहले उस आदमी में नहीं होता।



पश्चिमी विज्ञान कहता है कि आदमी में प्रेम, घृणा, आत्महत्या, चिढ़चिढ़ेपन तथा अन्य क्रियाओं के जीन होते हैं पर वह यह नहीं बताता कि वह जीन बनते कैंसे हैं? भारतीय दर्शन उसको स्पष्ट करता है कि मनुष्य में सारे गुण खाने-पीने के साथ ही दूसरों की संगत से भी आते हैं। मेरा मानना है कि मनुष्य सांसें लेता और छोड़ता है और उससे उसके पास बैठा आदमी प्रभावित होता है। हां, याद आता है कि पश्चिम के विज्ञानी भी कहते हैं कि सिगरेट पीने वाले अपने से अधिक दूसरे का धुंआ छोड़कर हानि पहुंचाते हैं। इसका अर्थ यह है कि विकार वायु के द्वारा भी आदमी में आते हैं। अगर आप किसी शराबी के पास बैठेंगे और चाहे कितनी भी सात्विक प्रवृत्ति के हों और उसकी बातें लगातार सुन रहे हैं तो उसकी कही बेकार की बातें कहीं न कहीं आपके मन पर आती ही है जो आपका मन वितृष्णा से भर देती है। इसके विपरीत अगर आप किसी संत के प्रवचन-भले ही वह रटकर देता हो-सुनते हैं तो आपके मन में एक अजीब शांति हो जाती है। अगर आप नियमित रूप से किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें जिसे आप ठीक नहीं समझते तो ऐसा लगेगा कि वह आपके तनाव का कारण बन रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि पांच तत्वों-प्रथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु- से बनी यह देह इनके साथ सतत संपर्क में रहती है और उनके परिवर्तनों से प्रभावित होती है और इसके साथ ही उसमें मौजूद मन, बुद्धि और अहंकार की प्रकृति भी प्रभावित होती है। इन परिवर्तनों से मनुष्य की देह में जीन या गुणों का निर्माण और विसर्जन होता है और वह उसका प्रदर्शन वह बाहर व्यवहार से कराते हैं।
पश्चिम के विद्वान इन जीन को लेकर विश्लेषण करते हुए उनके उपचार के लिए अनुसंधान करते हैं। अनेक तरह के आकर्षक तर्क और सुसज्तित प्रयोगशालाओं से निकले निष्कर्ष पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनते हैं और भारतीय अध्यात्म को पूरी तरह नकार चुके हमारे देश के विद्वान अखबार, टीवी चैनलो, रेडियो और किताबों उनका प्रचार कर यहां ख्याति अर्जित करते हैं। हां, लोग सवाल करेंगे कि भारतीय अध्यात्म में भला इसका इलाज क्या है?

हमारा अध्यात्म कहता है लोग तीन तरह के होते हैं सात्विक, राजस और तामस। यहां उनके बारे में विस्तार से चर्चा करना ठीक नहीं लगता पर जैसा आदमी होगा वैसा ही उसका भोजन और कर्म होगा। वैसे ही उसके अंदर गुणों का निर्माण होगा।

श्रीगीता के सातवों अध्याय के (श्लोक आठ) अनुसार आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा जो स्वभाव से ही मन को प्रिय हो ऐसा भोजन सात्विक को प्रिय होते हैं।

नौवें श्लोक के अनुसार कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक, दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।


दसवें श्लोक के अनुसार -अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट तथा अपवित्र है वह भोजन तामस को प्रिय होता है।



पश्चिम के स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार देह की अधिकतर बीमारियां पेट के कारण ही होती हैं। यही विज्ञान यह भी कहता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। हमारा अध्यात्म और दर्शन भी यही कहता है कि गुण ही गुण को बरतते है। इसके बावजूद पश्चिमी विज्ञान और भारतीय अध्यात्म में मौलिक अंतर है। पश्चिमी विज्ञान शरीर और मन को प्रथक मानकर अलग अलग विश्लेषण करता है। वह मनुष्य की समस्त क्रियाओं यथा उठना, बैठना, चलना और कामक्रीडा आदि को अलग अलग कर उसकी व्याख्या करता है। इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म या दर्शन मनुष्य को एक इकाई मानता है और उसके अंदर मौजूद गुणों के प्रभाव का अध्ययन करता है। अगर योग की भाषा के कहें तो सारा खेल ‘मस्तिष्क में स्थित ‘आज्ञा चक्र’ का है। पश्चिमी विज्ञान भी यह तो मानता है कि मानसिक तनाव की वजह से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं और वह उनका इलाज भी ढूंढता है पर जिन मानसिक विकारों से वह उत्पन्न होते हैं और मनुष्य की देह में अस्तित्वहीन रहें ऐसा इलाज उसके पास नहीं है।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान केवल धर्म प्रवचन के लिऐ नहीं है वह जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित है। यह मनुष्य के देह और मन में स्थित विकारों को दूर करने के लिए केवल शब्दिक संदेश नहीं देता बल्कि योगासन, प्राणायम और ध्यान के द्वारा उनको दूर करने का उपाय भी बताता है। अध्यात्म यानि हमारी देह में प्राणवान जीव आत्मा और उससे जानने की क्रिया है ज्ञान। अन्य विचाराधारायें आदमी को प्रेम, परोपकार और दया करने के का संदेश देती हैं पर वह देह में आये कैसे यह केवल भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान ही बताता हैं। अगर सुबह उठकर योगासन, प्राणायम, और ध्यान किया जाये तो देह में वह जीन या गुण स्वयं ही आते है जिनसे आदमी प्रेम, परोपकार और दया करने लगता है। देह और मन के विकार को निकाले बिना आदमी को सही राह पर चलने का उपदेश ऐसा ही है जैसे पंचर ट्यूब में हवा भरना।
अगर कोई आदमी बीमार होता है तो डाक्टर कहते हैं कि चिकनाई रहित हल्का भोजन करो जबकि भारतीय दर्शन कहता है कि चिकना, रसयुक्त स्थिर भोजन ही सात्विक है। इसका अर्थ यह है कि डाक्टर जिनको यह भोजन मना कर रहा है उनमें विकार ही इस सात्विक भोजन के कारण है। ऐसा भोजन करने के लिये परिश्रम करना जरूरी है पर आजकल धनी लोग इसे करते नहीं है। श्रीगीता कहती है कि अकुशल श्रम से सात्विक लोग परहेज नहीं करते। आजकल के लोग अकुशल श्रम करने में संकोच करते हैं और यही कारण है कि लोगों में आत्म्विश्वास की कमी होती जा रही है और ऐसे जीन या दुर्गुण उसमें स्वतः आ जाते हैं जो उसे झूठे प्रेम,पुत्यकार की भावना से उपकार और कपटपूर्ण दया में लिप्त कर देते हैं। कुल मिलाकर पश्चिमी विज्ञान की खोज जीन चलते हैं जबकि भारतीय दशैन की खोज ‘गुण ही गुण बरतते हैं। वैसे देखा जाये तो देश में जितनी अधिक पुस्तकें पश्चिमी ज्ञान से संबंधित है भारत के पुरातन ज्ञान उसके अनुपात में कम है पर वह वास्तविकता पर आधारित हैं। संत कबीर दास जी के अनुसार अधिक पुस्तकें पढ़ने से आदमी भ्रमित हो जाता है और शायद यही कारण है कि लोग भ्रमित होकर ही अपना जीवन गुजार रहे हैं। इस विषय पर इसी ब्लाग पर मै फिर कभी लिखूंगा क्योंकि यह आलेख लिखते समय दो बार लाईट जा चुकी है और मेरा क्रम बीच में टूटा हुआ था इसलिये हो सकता है कि विषयांतर हुआ हो पर उस दौरान भी मैं इसी विषय पर सोचता रहा था। बहुत सारे विचार है जो आगे लिखूंगा।

6/1/08

समाज का भ्रामक विभाजन स्वीकार्य नहीं-आलेख

विश्व में आतंकवाद एक ऐसे भ्रम की उपज है जिस पर बहुत बड़ी बहस करने के बाद भी कोई निर्णय नहीं निकल सकता। मैं दूसरे धर्मों के बारे में जानता हूं पर उस लिखता नहीं। वजह मैंने अपने ऊपर ही एक अघोषित सेंसरशिप लगा रखी। मुझे यह भी लगता है कि इस तरह विवाद खड़े कर हम अपने समाज को किसी नयी दिशा में नहीं ले जा सकते। मैं अक्सर अपने धर्म में व्याप्त अंधविश्वास, और रूढि़वादिता के प्रतिवाद में लिखता हूं। मेरे कुछ साथी और मित्र ब्लाग लेखक भी इस पर समय समय पर कड़ी टिप्पणियां करते हैं। मैं जब अपने धर्म में व्याप्त कुरीतियां पर लिखता हूं तो कोई उस पर उंगली नहीं उठाता क्योंकि सभी जानते हैं कि मैं अपने ही भारतीय अध्यात्म के सकारात्मक पक्ष पर भी नियमित रूप से लिखता हूं। हां, सभी ब्लाग लेखक स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म में व्याप्त बुराईयों और पाखंडों को उजागर करते हुए खूब लिखते हैं पर उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति जो निष्ठा है वह भी बता देते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वह मेरी तरह ही उसके सकारात्मक पक्ष पर भी नियमित रूप से लिखें पर उनके लिखे से मेरे अंदर यह विश्वास पैदा होता है कि मेरे जैसे विचार रखने वाले अन्य लोग भी है।
यहां इस देश में हिंदू धर्म को लेकर आलोचना करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है तो सकारात्मक पक्ष पर भी हर कोई लिख सकता है। यह अलग बात है कि भारतीय अध्यात्म को हिंदू धर्म के नाम पर अनदेखा किया जाता है पर सत्य के निकट जितना यह है उसे वही समझ सकता है जो इसका अध्ययन करता है। आधुनिक हिंदी साहित्य में भक्ति काल तो संपूर्ण रूप से इसी अध्यात्म के रहस्यों को उजागर करने के साथ ही जीवन के लिऐ ऐसे संदेश देता है जो अन्यत्र किसी अन्य भाषा में हों यह संभव है ही नहीं। संत कबीर और कविवर रहीम के बारे मेंे अधिक लिखना सूरज को दीपक दिखाना है। अपनी अल्प बुद्धि और मासूम विवेक के साथ जब मैं वर्तमान संदर्भ में व्याख्या रखता हूं तो टिप्पणी करने वाले लिख जाते है कि ‘ताज्जुब है आप वर्तमान संदर्भों में भी इसकी व्याख्या ऐसी करते हैं कि जब यह लिखे गये होंगे तब लिखने और कहने वालों ने सोचा भी नहीं होगा कि आगे कभी ऐसी व्याख्या होगी।‘

यह लेख मैं अपनी आत्म प्रंवचना में नहीं लिख रहा हूं। मेरा आशय यह है कि हम अपने हिंदू धर्म में तमाम तर्क वितर्कों की गुंजायश रखते हैं। इसका लाभ उठाकर कई लोग केवल इसके नकारात्मक स्परूप को सामने दिखाकर दूसरे लोगों के सामने अपने उदार होने का प्रमाण प्रस्तुत करते है। कई लोग अपने समाज में सुधार की दृष्टि से निष्काम भाव से कार्य करते हुए अपने ही अंधविश्वासों और रूढि़वादियों को उजाकर करते हुए उनसे लोगों को दूर रखने के लिये आग्रह के साथ लिखते और बोलते हैं। यानि हम अपने धर्म में जो आडम्बर है उसको उजागर करने में कोताही नहीं करते। इतना ही नही मैं तो यह भी कहता हूं कि हमारे धर्मग्रंथों में कुछ ऐसे वाक्य हैं जो अब अप्रासंगिक हो गये हैं तो समाज भी अब उसे स्वतः नहीं अपनाता पर इसका आशय यह नहीं कि उन धर्मग्रंथों के सारे वाक्य ही गलत हैं। मनृस्मृति में और कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर तमाम लोग आक्षेप करते हैं पर मैंने उनके सार्थक वाक्य यहां रखे हैं और किसी ने उनको चुनौती नहीं दी है। हमारे देश के अध्यात्म के समय के साथ सकारात्मक परिवर्तन स्वीकार करने की गुंजायश है। श्रीगीता में ज्ञान और विज्ञान दोनों में मनुष्य को पारंगत होने का संदेश दिया गया है। सत्य के ज्ञान के कोई बदलाव हो नहीं सकता पर माया के विज्ञान का स्वरूप परिवर्तन शील है और उनको स्वीकार करते हुए आगे हमार समाज बढ़ता जाता है।

मैंने कहा था कि मुझे सिर्फ अपने धर्म पर ही विचार करने का अधिकार है-यह मैं स्वतः मानता हूं। उनकी अच्छाईयों और बुराईयों पर बहस से भी नहीं डरता। एक सवाल जो मुझे परेशान करता है कि अन्य धर्मों में क्या कोई बात विवादास्पद नहीं हैं? क्या उनमें अंधविश्वास, रूढि़वादिता और पाखंड नहीं हैं। क्या उनके सभी धार्मिक गुरू निर्विवाद हैं? क्या उनमें लिखे गये सभी वाक्य सिद्ध वाक्य हैं जो उनके प्रतिवाद के रूप में उनके मतावलंबी लेखक कुछ लिखते ही नहीं?
जहां तक मैंने अनेक धर्मों का अध्ययन किया है उसके बारे में मेरी राय है पर अन्य धर्मों पर टिप्पणी करने का अर्थ है कि अनावश्यक विवादों में फंसना। अगर कुछ कहूंगा तो वह धर्मग्रंथों से दो चार विवादस्पद श्लोक या आधुनिक हिंदी साहित्य से एक-दो दोहा उठाकर सुनायेंगे जिनको हम कई वर्षों से सुनते आ रहे है। मैंने आज तक किसी भी अन्य धर्म पर उस समुदाय के लेखकों द्वारा लिखी गयी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं पढ़ी। संभव है कि दूसरे धर्मों में ऐसी बहस की गुंजायश नहीं हो या फिर उसके लेखकों के मन में अपने धर्म के प्रति वैसी ही संवेदनशीलता न हो जैसी कि हिंदी समुदाय के लेखक के मन में होती है। इसलिये अधिकतर हिंदू लेखक लिखते हुए कभी न कभी अपने धर्म पर लिख जरूर जाते हैं भले ही वह उसमें आडम्बर और रूढि़यों के प्रतिवाद करते हों। यहां हिंदू लेखक कहते हुए मेरे मन में जो वितृष्णा आई उसे मैं बयान नहीं कर सकता पर विषय के प्रवर्तन में अस्पष्टता न रहे इसलिये मुझे ऐसा करना पड़ा। इसके पीछे मेरे मन में एक विचार आता है और मुझे लगता है कि थोड़ी देर के लिये यह विभाजन कर मैं यह बताना चाहता हूं कि भारत में अन्य धर्मों को मानने वाले लोग आपस में ही एकमत नहीं हैं कि वह हिंदू कहलाने में हिचक महसूस करें या नहीं। एक विवादास्पद गैर हिंदू विद्वान को मैंने कहते हुए सुना है कि अगर आप इस देश को हिंदुस्तान कहते हैं तो हम भी हिंदू हैं और हमें संकोच नहीं है पर अगर आप धर्म की बात करते हैं तो हम हिंदू नहीं है। उनका आशय यह है कि इस जमीन पर पैदा होने और किसी मत को मानने के विषय अलग-अलग है।

यहां अब मैं सभी लेखकों एक ही स्थान पर खड़ा करता हूं। भारत की अपने एक संस्कृति है और भारतीय अध्यात्म केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं है। भारतीय संस्कृति और अध्यात्म उत्तरोतर समृद्धि होते जाते हैं। यहां तक कि भगवान के अवतारों के समक्ष कुछ संतो ने अपनी ख्याति अर्जित की है। धर्मग्रंथों में भगवान के अनुसार‘मेरे भक्त मेरे से भी बडे+ हैं’-यही कारण है कि तुलसी दास, सूरदास, मीरा, कबीर, रविदास, रहीम, रसखान तथा अन्य अनेक विद्वानों को भी भारतीय अध्यात्म का भाग माना गया है-अन्य धर्मों के अनेक संतों और मनीषियांे को भी भारतीय अध्यात्म से संबंधित विषयों पर प्रकाशित पत्रिकाओं में स्थान दिया जाता है।
वर्तमान समय में आधुनिक हिंदी में रचे बसे सभी धर्म के लेखकों के लिए यह संभव नहीं है कि वह भारतीय अध्यात्म से अलग हटकर कुछ देख पाते-जिन्होंने इन महान रचनाकारों को पढ़ा वह भला और क्या पढ़ पाते? यहां हम कई ऐसे लेखकों को देख सकते हैं जो हिंदू परिवार से न होने के बावजूद भारतीय अध्यात्म में अटूट निष्ठा रखते हैं। क्या दिलचस्प बात नहीं है कि भारतीय अध्यात्म के प्रमुख आधार श्रीगीता ग्रंथ को तो अन्य धर्मों के मतावलंबी भी चुनौती नहीं दे पाते। भारतीय अध्यात्म से सराबोर सभी हैं चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़े हैं और इसलिये इस देश में किसी भी दूसरे धर्म की आलोचना सुनने को नहीं मिलती। और दूसरे देशों में धर्म के प्रति इतनी संवदेनाएं नहीं है कि इस पर लिखकर लेखक अपना समय नष्ट करना चाहें। इसी संवदेनशीलता का यह परिणाम भी होता है यहां कुछ तत्व लोगों को बांटकर अपना हित साधते हैं। मुश्किल यह है कि अन्य धर्मों के लोग भी कहीं न कहीं भारतीय अध्यात्म में सराबोर है इसलिये अपने धर्म के दोषों पर दृष्टिपात नहीं कर पाते।

एक दिलचस्प वाक्या है। मैं सुबह अध्यात्म रूप से अपनी बात कह देता हूं पर शाम को अपनी हास्य कविताओं में बिना किसी धर्म का नाम लिये आक्षेप करता हूं। शूरूआती दौर मे एक सज्जन ने मुझे लिखा कि आप अपने धर्म पर व्यंग्यात्मक प्रहार करने वाली बात लिख रहे है किसी अन्य के मत पर लिखकर बताईये। मुझे उस पर हंसी आर्यी। तब मैंने सभी धर्मों को एक ही मानने वाले शब्द अपने पाठों में अपनाना शूरू किये सर्वशक्तिमान, दरबार, सेवक, पवित्र पुस्तक और भक्त। इसका आशय यह है कि मैं सभी को एक ही पलड़े में रखता हूं। फिर हमारे देश में अच्छा लेखक वही माना जाता है जो व्यंजना विधा में रखता है।

मेरे मन में कभी भेद नहीं आता। भेदात्मक बुद्धि तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है। अंतर्जाल पर तो जो ब्लाग लेखक ऐसे भेद करता है उसे मैं मूर्ख ही कहूंगा। एक तो यहां छद्म नाम की संभावना भी लगती है। दूसरे करीब-करीब सभी धर्मों के टिप्पणीकार मेरे ब्लाग पर आ चुके हैं। उनकी टिप्पणियों से निष्कर्ष यह है कि उनके शब्द किसी धर्म के परिचायक नहीं होते और प्रेम, मित्रता और सदभावना में इतनी गहराई होती है कि...................मुझे कोई शब्द नहीं मिलता कि मैं उसके लिए कोई पैमाना लिख सकूं।

मैं यहां पांच नाम लिखना चाहता था जो अपनी टिप्पणियां इतने प्रेम से रखते हैं कि मेरा मन पुलकित हो जाता है और तब होता है मेरे मन में ऐसा भाव जो मुझे धर्म, जात, भाषा और क्षेत्रीय भावना से दूर ले जाता है, परंतु उनके नाम लिखने से मुझे ही अपनी बुद्धि में भेद दिखाई देता। मैं समाज को विभाजित करने वाले शब्दों से हालांकि दूर रहता ही हूं और खुलकर कहता हूं कि यह विभाजन भ्रामक है। हां, लिखने के लिये अपना विषय स्पष्ट करने के लिये इस विभाजन का नक्शा पाठकों के सामने रखना पड़ता है पर मैं अपने पाठ का वाहन कभी इस नक्शे पर नहीं चलाता। मैं अकेला ब्लाग लेखक हूं जो कहता हूं कि सभी ब्लाग लेखक और पाठक एक जैसे ही मुझे लगते हैं और समाज के भ्रामक विभाजन वाले शब्दों की संज्ञा उन पर लागू नहीं होती। वह स्वयं मुझसे कहें तब भी उनको बता सकता हूं कि वह गलत है। शेष फिर कभी।

5/10/08

अध्यात्म का ज्ञान और सांसरिक उत्पाद मिलने का एक ही स्थान

भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहले और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।
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3/23/08

अमेरिका विरोध का तार्किक आधार क्या है?

भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग हमेशा अमेरिका का विरोध करता है और उसके तर्क हमेशा ही खोखले होते हैं। अमेरिका ने अमुक देश पर हमला किया और अमुक देश में वह दखल दे रहा है। वह एक पूंजीवादी देश है अपनी दादागीरी दिखाता है आदि-आदि तमाम तरह के तर्क देकर लोग उसका विरोध करते हैं। आजकल मध्य एशिया में उसकी उपस्थिति को मुद्दा बनाकर उसका विरोध हो रहा है।

मैं कोई अमेरिका का समर्थक नहीं हूँ और न ही उसका साथ भारत के राजनीतिक संबंधों का विश्लेषण कर रहा हूँ। मेरा इरादा तो अमेरिका के साथ सामाजिक, साँस्कृतिक और आर्थिक संबधों पर दृष्टिपात करना है जिसके कारण आज भी अनेक बुद्धिजीवियों के दुष्प्रचार के बावजूद इस देश के आम नागरिकों में अमेरिका की खराब छवि नहीं बन पायी है। अधिकतर उच्च शिक्षा प्राप्त लोग वहाँ जाकर रोजगार प्राप्त करने का सपना संजोये हुए रहते हैं।
अमेरिकी समाज खुलेपन का समर्थक है। वहाँ धर्म, जाति और भाषा के नाम पर कोई बन्धन नागरिकों पर जबरन थोपा नहीं जाता। वहाँ की व्यवस्था उदारीकरण की पोषक है। वह अपने यहाँ किसी संस्कृति और धर्म की आगमन पर विचलित नहीं होते। सबसे बड़ी बात भारत से गए लोगों को वहाँ आर्थिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और साँस्कृतिक क्षेत्र में अपना मुकाम बनाने में जो सफलता मिली वह कहीं और नहीं मिली। अमेरिका का विरोध करने वाले किसी और देश का नाम बताएं तो जाने-हाँ ब्रिटेन और पश्चिमी रास्त्रों में कुछ लोगों को सफलता मिली है पर वह भी एक पश्चिमी राष्ट्र है और अमेरिका से उसका गठबंधन है। इसका अलावा अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्र कभी किसी पर अपनी संस्कृति थोपते नहीं है जबकि मध्य एशिया के राष्ट्र अपने राज्य की ताकत का उपयोग इसके लिए करते हैं। किसी दूसरे की संस्कृति न पनप सके इसलिए लिए कानून बना रखे हैं। आज हम अपने देश में जो पाश्चात्य सभ्यता फैलती देख रहे हैं वह लोगों की स्वेच्छा से फ़ैल रही है न कि कोई उन पर दबाव डाल रहा है।

कहने को मध्य एशिया में भारतीय भी बहुत हैं पर क्या वह अमेरिका की तरह खुली हवा में साँस ले पा रहे हैं? उस दिन मैं एक अख़बार में एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इजरायल के साथ मध्य एशिया के अन्य राष्ट्रों पर धर्म के आधार पर आतंकवाद बढाने का आरोप लगाया गया था। अमेरिका अपने यहाँ हमले के बाद आतंकवाद से लड़ रहा है। उसमें शक्ति है और वह अपने दुश्मनों को निपटा रहा है-अपने दुश्मन को निपटाने के लिए किसी को कहीं भी हमला करने का अधिकार है।
हमारे दर्शन के अनुसार राजनीति में अपने देश के प्रजा की रक्षा के लिए सजग रहते हुए साम,दाम, दंड और भेद चारों नीतियों को अपनाना चाहिए।हमारे दर्शन में व्यक्ति को अहिंसा की मार्ग पर चलने के लिए कहा जाता है पर राज्य को अपने शत्रु पर हमला कर उससे प्रजा और उसके धर्म की रक्षा का सन्देश भी उसमें है। कहने से सब अहिंसक और मानवतावादी नहीं हो जाते इसलिए राज्य और राजा को अपनी प्रजा की रक्षा के लिए हिंसा करनी ही पड़ती है। जिन विद्वानों ने लोगों को अहिंसक रहने का उपदेश दिया है उन्होने ही अपने देश की गुप्तचर व्यवस्था और सेना को मजबूत रखने का विचार दिया है। अपने गुप्तचरों के द्वारा शत्रु राष्ट्र की निगरानी करने का भी विचार दिया है।

अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और उसे अहंकार है-यह मान लिया पर कहीं मानवाधिकारों का उल्लंघन का जिस ताकत से वह मामला उठाता है कोई अन्य नहीं उठता। वह जिन राष्ट्रों के खिलाफ लड़ रहा है मानवाधिकारों के मामले में उनका रिकार्ड बहुत खराब है।कहने को अमेरिका हमारे से दूर है पर हमारे आसपास पडोसी देश अपने यहाँ मानवाधिकारों का जिस तरह उल्लंघन कर रहे हैं उस पर भी वह उन देशों को धमकाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप किसी व्यक्ति को अहिंसा के मार्ग पर चलने और साधू की तरह रहने के लिया प्रेरित किया जा सकता है पर किसी देश के राज्य प्रमुख को ऐसा सन्देश नहीं दिया जा सकता है। अमेरिका भारत का मित्र देश इसलिए है क्योंकि भारत उसके हितों को हानि नहीं पहुंचता जो उसका हानि पहुँचाते हैं उनको वह छोड़ता नहीं है। वह किसी का मित्र नहीं है उसके मित्र है अपने हित और जब उनको हानि नहीं पहुंचा सकते और ऐसा करने से हमारे देश को कोई लाभ नहीं है तो उसके साथ संबंधों में दूरी क्यों बनायी जाये? इसके साथ वह जिन देशों से लड़ रहा है क्या वह हमारे वास्तव में मित्र हैं या दिखावा करते हैं-यह देखकर ही अमेरिका का विरोध किया जा सकता है। अमेरिका के विरोध का कोई ठोस तार्किक आधार यहाँ के लोगों को समझ में नहीं आता। वैसे भी कौटिल्य के अर्थशास्त्र कि अनुसार अपने से संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र से संधि कर लेना चाहिऐ - क्या यह अमेरिका से मित्रता करने में लागू नहीं होता? अगर नहीं तो उसके ठोस विरोध का आधार क्या है? उसमें यह भी बताना चाहिए कि वह भारत को आगे किस तरह से हानि पहुंचा सकता है?

2/27/08

आदमी की पहचान का प्रश्न-हिन्दी आलेख

प्रत्येक आदमी की जो पहचान है वह उसकी जाति, धर्मा, भाषा, क्षेत्र से है और हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते। यह पहचान आखिर छिपाई कैसे जा सकती है? कहीं किसी विशेष पहचान के लोगों की बहुतायत है तो वहाँ अल्पसंख्या वाले अपने को कमजोर अनुभव करते हैं और कभी उनको इसके लिए जलील भी होना पड़ता है। इस पर तमाम तरह के बुद्धिजीवी लोग अपने ख्याल रखते हैं-'ऐसा नहीं होना चाहिए' 'यह ग़लत है' और 'इस अन्याय को रोकना चाहिए'। इसके साथ ही बड़ी-बड़ी बहस होती हैं। मगरा नतीजा धाक के तीन पात। ऐसे विवाद कोई किसी एक देश में होते हैं यह बात नहीं बल्कि ऐसे संघर्षों से पूरी दुनिया का इतिहास भरा पडा है।


बहस करना विचार व्यक्त करना अलग बात है और समस्या के हल के लिए ईमानदारी से काम करना अलग बात है। हम हर पहचान के आदमी को सम्मान देने की बात तो करते हैं पर क्या वह पहचान किसी वास्तविक धरातल पर दिखाईं देती हैं? कभी इस पर विचार नहीं करते। आख़िर हम अपनी दूसरों की पहचान को देखते ही क्यों हैं? कोई अमुक, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र का आदमी है-इस बात पर नज़र डालते ही क्यों हैं? हम तय कैसे करते हैं और कोई हमारे बारे में कैसे तय करता है? हम परंपरा से अलग होकर यह क्यों नहीं कहते कि यहाँ किसी को उसकी वर्त्तमान रूप में प्रचलित पहचान से नहीं देखा जाना चाहिए। जब तक अपनी और दूसरों की वर्तमान प्रचलित पहचान के साथ चलेंगे तब तक समाज में विवाद और फ़साद कम नहीं होंगे। विश्व के किसी इलाक़े में बहुसंख्यक पहचान वाले अपने समूहों से कम त्रस्त नहीं होते पर उनका गुस्सा जब सामूहिक रूपसे उतरता है को उसका सबसे अधिक शिकार पृथक पहचान वाले अल्प संख्या वाले लोगों के समूह बनते हैं-पर इसमें आम आदमी नहीं बल्कि उन लोगों के समूह प्रमुख जिम्मेदार होते हैं क्योंकि जब अपने सदस्यों पर नियंत्रण नहीं रख पाते तब वह उनका ध्यान बंटाने के लिए ऐसे विवाद खड़े करते हैं ताकि अपने नेतृत्व की कमी छिपाने के लिए लोगों का ध्यान कहीं ओर लगाया जाये।हम कहते हैं कि लोगों को उसकी प्रचलित पहचान से मत देखो तो सवाल है की जब हम सबके मन में है यानि हमारे खून में है तो उससे अलग कैसे हुआ जा सहकता है।

पहले हम पाश्चात्य विज्ञान की बात कर लें। उसके अनुसार हम जो देखते, सुनते अनुभव करते हैं वह हमारे रक्त मे स्थापित हो जाता है और जब अवसर आता है तब वह स्वत सामने आता है। किसी का चेहरा और शब्द वैसे के वैसे ही नहीं हम आत्मसात करते वरन वह हमारे शरीर में मौजूद रक्त के कणों में वह सब विलीन हो जाता है। इसका आशय यह है यह जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की पहचान हमारे खून में होती है। उसका कोई भौतिक स्वरूप हमारी देह में नहीं होता. जब कान से शब्द सुनते, आँखों से दृश्य देखते और स्पर्श से अनुभव करते हुए वह पहचान हमारी बुद्धि में आती है।

उसी तरह हमारा दर्शन भी कहता है की हमारी इंद्रियाँ रूप, शब्द, स्पर्श, गंध और रस से ग्रहण करती हैं और वही देह में विकार भी पैदा करतीं हैं। हम अनेक बार तमाम तरह की पहचान के लोगों पर अन्याय के मसले पर मुखर होते हुए उनकी संज्ञा अपने आधार पर तय कर देते हैं। क्या वह एक वास्तविकता है? नहीं! यह एक भ्रम है। कम से कम हमारा दर्शन तो यही कहता है। मनुष्य देह में वह विकार हैं जो उसे अन्याय और दूसरे पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करते हैं। हमने कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया किसी और ने किया पर हम कभी नहीं करेंगे इसकी गारंटी कौन दे सकता है। गुण ही गुणों को बरतते हैं और जब हमारा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण ही नहीं है तो हम कैसे कह सकते हैं की 'उसने किया है और हमने किसी पर अन्याय नहीं किया"। कभी हम भी अपने अहंकार में आकर वह सब कर सकते हैं जो किसी और ने किया होता है।

हम बचपन से लेकर बड़े होते हैं-तब अपने माता-पिता और गुरुओं से ही समाज को विभाजित करने वाले शब्द सीखते हैं। कई तरीके की अच्छी और बुरी विचारधाराएँ उनके कथनों को सुनते हुए हमारी स्मृतियों में बस जातीं ऑरा हमा उनसे कभी अलग नहीं हो पाते और उनसे अलग होने के लिए हमें नया अध्ययन करने की आवश्यकता होती है पर उसका ना तो अवसर मिलता है और न आवश्यकता-इच्छा अनुभव होती है। समय अनुसार उस पर चलते जाते हैं। सिद्धांतों की बात बहुत करते हैं पर उससे अलग नहीं हो सकते इसलिए ऐसी बहसों में उलझ जाते हैं जो बाद में निरर्थक साबित होतीं हैं ।

कुल मिलाकर हमारे मन में समाज, व्यक्ति, भाषा, जाति, और भाषा को लेकर हमारे अंदर पूर्वाग्रह इस तरह स्थापित हो जाते हैं कि हम उनको अपनी पहचान समझने लगते हैं। जब तक इनसे मुक्त होने का मन नहीं बनाएँगे तब तक विभिन्न समाजों में द्वंद्व और विवाद बने रहेंगे यह अलग बात है कि कभी हम स्वयं इसका हिस्सा होंगे तो कभी बाहर बैठकर चर्चा करेंगे। (शेष फिर कभी)

1/24/08

हिन्दी के पुरुष लेखकों के सम्मान के लिए महिलाओं का अलग वर्ग रखना जरूरी

इस समय अंतर्जाल पर लिखे जाने वाले हिन्दी ब्लोग के संबंध में जो तथाकथित रूप से जो सम्मान घोषित हुए उनमे महिलाओं का मनोबत बढाने के बात हुई और महिलाओं ने ही इसका विरोध हुआ कि उनके लिए कोई अलग वर्ग बनाया जाये। इसके बावजूद उनके तर्क पर कोई ध्यान नहीं दे रहा क्योंकि वाद और नारों पर चलते इस समाज ने तर्क बहुत काम सुने जाते हैं।

आज यह संयोग ही है कि मैं इस विषय पर लिखने की सोच रहा था कि उससे पहले अपने ब्लोग देखते हुए एक अन्य ईमेल पर गया, जहाँ मैं बहुत कम जाता हूँ । वहाँ अभिव्यक्ति की संपादिका पूर्णियां बर्मन जी का एक सन्देश मिला जिसमें उन्होने मेरा एक व्यंग्य अपनी पत्रिका में छपने की सूचना दी थी। अगर यह सन्देश नहीं भी मिलता तो भी मैं अपनी बात उनसे ही शुरू करता। प्रसंग यही था कि क्या वाकई अंतर्जाल पर महिलाओं के मनोबल को बढाने का काम हो रहा है या इस भय से उनको अलग किया जा रहा है कि उनकी वजह से कुछ तथाकथित बडे ब्लोगर या लेखक सम्मानित होने से रह जायेंगे। सत्य तो यह है कि अंतर्जाल पर हिन्दी सजाने और संवारने के लिए जो काम महिलाओं ने किया है वह पुरुष समुदाय से कई कदम आगे हैं। उनके लेखन के विषय पुरुषो से कहीं अधिक सुरुचिपूर्ण और प्रस्तुतीकरण में परिपक्वता है। कम से कम मुझे तो यही लगता है। हालांकि हिन्दी के व्यापक क्षेत्र को देखते हुए अभी भी महिलाओं की अंतर्जाल पर संख्या नगण्य है पर जितनी है वह महत्वपूर्ण ध्यान देनें योग्य है.

मेरी रचनाएं अभी तक तीन अंतर्जाल पत्रिकाओं पर छप चुकी हैं इनमें 'हिन्दी नेस्ट' और ''अभिव्यक्ति'' का संपादन कार्य महिलाओं के जिम्मे हैं। मेरा अंतर्जाल पर लेखक के रूप में प्रवेश ही महिलाओं द्वारा अपने संपादन का दायित्व अच्छी तरह निभाने के कारण हुआ है। सद्दाम को फांसी देने के संबंध में मेरा आलेख हिन्दी नेस्ट में प्रकाशित हुआ था जो कि अंतर्जाल पर मेरी पहले पोस्ट थी। उसके बाद अभिव्यक्ति-अनुभूति में व्यंग्य और कविता छपी। यहाँ मैं यह भी बता दूं कि आज से डेढ़ वर्ष पूर्व मेरे एक कवि मित्र ने मुझे अभिव्यक्ति का पता दिया था और वहीं नारद को देखते हुए आगे बढ़ जाता था और सोचता कि संपादिका ने इनके लिए अपनी पत्रिका पर कोई ऐसी जगह बना रखी है जहाँ बैठकर यह लोग चर्चा करते हैं। बहरहाल बाद में भी संपादिका पूर्णिया बर्मन जी ने मेरे ब्लोग से रचनाएं लीं। दो पत्रिकाओं का जिस तरह संचालन कर रही हैं उसे देखकर मुझे ताज्जुब होता है और मेरे लिए यह कहना मुशिकल हो जाता है कि महिलाओं का मनोबल बढाने के लिए पुरुषों के किसी खास प्रकार के कार्य करने का दिखावा करने की जरूरत है-केवल खामोशी से उनकी सक्रियता देखने के अलावा उन्हें और कुछ करने की जरूरत नहीं है - क्योंकि इसके उलट महिलाएं ही यहाँ मनोबल बढा रही हैं।

जो ऐसे महिलाओं का मनोबल बढाने की बात कर रहे हैं वह केवल अपने प्रचार के लिए कर रहे हैं ताकि अंतर्जाल के बाहर अपने आपको ब्लोगरों का नेता साबित कर सकें। क्योंकि महिलाएं जिस मनोयोग से अंतर्जाल पर पत्रिकाओं के संपादन और ब्लोग लेखन में जिस तरह अपने प्रयास कर रहीं है उनका मनोबल बढाने का नाटक करने की बजाय अपने आपको समझाने की जरूरत है कि वह वाकई बहुत अच्छा काम कर ही हैं और पुरुष समुदाय को उनसे सीखान चाहिऐ.

ब्लोग पर महिलाओं की उपस्थिति कम है पर जितनी है उनकी पोस्टों की गुणवता और दूसरे ब्लोग लेखकों का मनोबल बढाने के लिए कमेन्ट लगाने की सक्रियता को देख कर तो मुझे लगता है कि वह उसमें भी बहुत आगे हैं। अच्छे ब्लोग लेखक के बारे में मेरा विचार है कि 'अच्छा लिखने वाला और अपने साथियों का कमेन्ट लगाकर उनका मनोबल बढाने वाला ही अच्छा ब्लोगर है। केवल एक चीज से कोई अच्छा ब्लोगर नहीं माना जा सकता है'। अगर आप मुझसे इस समय देश के तीन हिन्दी ब्लोगरों के नाम पूछेंगे तो उसमें सबसे पहले तीन महिलाएं ही हैं। वह केवल न अच्छा लिखतीं है बल्कि दूसरों का हौंसला भी बढ़ाती है। जो वरिष्ठ ब्लोगर हैं और उनके विरुद्ध मैंने ही मोर्चा खोला था पर वह इस बात को महसूस करते हैं-क्योंकि उनकी काबलियत को इस मामले मैं मैं भी मानता हूँ। उन्होने एक कथित सम्मान में अपनी भुमिका निभाई थी और मेरे सहित कुछ लोगों ने उकी कार्यप्रणाली पर आपत्ति उठाई थी. यह अलग बात हैं कि वह खुद अपनी सफाई में किसी वरिष्ठ ब्लोगर को सम्मानित करने की मजबूरी दिखाने की बजाय महिलाओं के मनोबल बढाने की बात कर गए और उसका उलटा प्रभाव पडा।

अब कुछ महिला ब्लोग लेखिकाओं के इस विचार की बात करें जिसमें वह यहाँ अपनी उपेक्षा की बात करतीं है। मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। हो सकता है पुरुष ब्लोगरों की अधिकता और महिलाओं के ब्लोग पर सावधानी से अपनी बात लिखने की उनकी सहज भावना की वजह से ऐसा उनको लगता है। पुरुष ब्लोगर एक दूसरे के ब्लोग पर कभी-कभी मजाक और असहमति में भी कमेन्ट लिखते हैं पर जब महिलाओं के ब्लोग पर होते हैं तो उन्हें कई बार अपने संस्कारों की वजह से सतर्कता रखनी पड़ती है। जहाँ तक पाठक संख्या का सवाल है तो करीब सबका के एक जैसा ही हाल है अत: उन्हें अपने साथ उपेक्षित व्यवहार की शिकायत नहीं करना चाहिऐ। जहाँ तक लिखने के स्तर का सवाल है तो कम- अधिक सभी हैं चाहे महिला हों या पुरुष। इसके अनुपात की दृष्टि से अच्छी ब्लोग लेखिकाओं की संख्या पुरुषो के अनुपात से अधिक है। अगर इस हिन्दी ब्लोग जगत में अच्छे लेखन के मामले मुझे महिलाओं की चुनौती का सामना नहीं करना होता तो शायद मेरा सारा रास्ता आसान हो जाता। मैं एक लेखक हूँ और हमेशा वास्तविक धरातल पर खडा रहता हूँ। मुझे कौन सर्वश्रेष्ट ब्लोग के लिए वोट चाहिए, पर क्योंकि ऐसे सम्मानों पर व्यंग्य और हास्य कविताएँ लिखता हूँ तो सोचता हूँ कि कम से कम उन्हें अपने विचारों से अवगत कराता चलूँ। मैं कई बार महिला ब्लोगरों की पोस्ट पढता हूँ तू मुझे लगता है कि उनसे बेहतर लिखने की चुनौती मेरे सामने हैं।

हाँ एक आग्रह करूंगा कि वह अपने लिए अलग श्रेणी का विरोध न करें। वजह इससे तो कुछ वरिष्ठ ब्लोगरों को सम्मान नहीं मिल पाएगा क्योंकि महिलाओं का लेखन और सक्रियता कहीं पुरुषों से अधिक है। पुरुषों का मनोबल बढाने के लिए उन्हें अलग से पुरस्कार देना आवश्यक है, अगर सब निराश होकर भाग गए तो आप लोगों को पाठक कहाँ से मिलेंगे और अपने शब्द कमेन्ट के रूप में बिखेरने के लिए ब्लोगर कहाँ मिलेंगे। उन्हें पुरस्कार अलग से मिलने से मुझे हास्य कविता लिखने का अवसर मिलता है। अगर आपके ब्लोग उनमें शामिल होंगे तो मुझे असुविधा होगी क्योंकि अपने से अधिक योग्य महिला हो या पुरुष उस पर हास्य लिखना अपनी फिल्म पिटवाना है। कम से कम पुरुष ब्लोगरों के पुरस्कार देखकर मेरे मन में हास्य का भाव तो पैदा होता है क्योंकि वह वाकई महिला ब्लोगरों से बहुत पीछे हैं। मेरे मन में बात थी वह सबके सामने रख दी, मैं कोई ढोंग नहीं करता, इसलिए पुरस्कार या सम्मान पर कोई हास्य कविता लिखूं उसे कदापि अपनी तरफ न लें-ऐसा मेरा आग्रह है। मैं कोइ अतिरिक्त सम्मान का प्रदर्शन नहीं कर सकता क्योंकि अपने घर में भी महिलाओं से ऐसे ही सहज ढंग से बात करता हूँ और किसी महिला के आत्म सम्मान को ठेस पहुचाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगता पर पुरुष समुदाय उनकी आड़ ले रहा है यही उनको बता रहा हूँ। मैं तो वैसे भी अपने स्तर के ब्लोगरों से सम्मान नहीं ले सकता क्योंकि यह मुझे मजाक लगता है. वह दे सकते हैं तो बस अपना प्यार. इसलिए कहता हूँ कि अगर अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने वाले पुरुषों का सम्मान देकर मनोबल बढाना है तो महिलाओं का वर्ग अलग रखना जरूरी है क्योंकि योग्यता के आधार पर सब पुरस्कार तो उनके पास चले जायेंगे.

1/18/08

धर्म बेचने वालों का नारा है "अहंकार छोड़ दो"(सर्वशक्तिमान-२)

धर्म बेचने वालों का नारा है अंहकार छोड़ दो. उनकी बात सुनकर लोग खुश हो जाते हैं. पांच तत्वों से बनी इस देह में मन बुद्धि और अहंकार ही वह तत्व हैं जिनके हर जीव इस धरती पर विचरण करता है.आपने कुछ ऐसे लोग देखने होंगे जो पागल होते हैं. आप उनसे कुछ भी कहें पर वह आपकी बात पर ध्यान नहीं देंगे. मन उनके पास भी है और बुद्धि भी पर नहीं है तो अहंकार. वह खाते-पीते हैं और बात करते हुए मुस्कराते हैं पर फिर खामोश भी हो जाते हैं. उनके पास अपने मनुष्य होने का अहंकार नहीं है और वह निरीह हो जाते हैं और हर कोई उन पर तरस खाता है.

कई बार आपने देखा होगा ऊंचे मंचों पर बैठे साधू-संत अपने भक्तों से कहते हैं''अहंकार छोड़ दो". आर फिर मुस्कराते हुए लोगों की तरफ देखते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा राज उजागर किया है. लोग भी खुश हो जाते हैं कि उन्होने कोई बडे रहस्य से पर्दा उठाया है. उनका धर्म बेचना व्यवसाय है यह बात जानते हुए भी उसे धारण नहीं कर पाते और उनके पास जाते हैं वजह मन हो गया खाली और बुद्धि से काम लेना नहीं है तो अहंकार है कहाँ जो वह आत्ममंथन करे. विचार करे कि इस देह से अहंकार कभी जा नहीं सकता. निरंकार की उपासना करने की जा सकते हैं पर निरंकार रहा नहीं जा सकता.

मंच पर बैठ संत जो बोलते हैं और उसके बाद क्या होते हैं यह कई लोग जानते हैं. अभी जब सात बाबा रंगे हाथों काले धन को सफ़ेद बनाते हुए पकडे गए थे उनमें एक एस बाबा भी थे जो कई बार कृष्ण कथा करते हुए श्रीगीता के बारे में बोलते हैं और एक ही नारा-अंहकार मत करो. उनकी बातों में जो अंहकार था वह देखने योग्य था और में तो उनके तारीफ करूंगा को उन्होने अपने अहंकार को नियंत्रित किया और धर्म के शिखर पर जाकर विराजमान हुए. आखरी व्यवसाय चाहे कोई भी हो उसे चलाने के लिए कई तरह की चालाकी की आवश्यकता होती है उसमें अहंकार पर नियंत्रण रखना जरूरी होता है.
सभी बाबाओं के बडे आश्रम हैं और उनमें फाईव स्टार होटलों जैसी सुविधाएं है आम भक्त उनसे इतनी आसानी से नहीं मिल सकता जितना किसी धनी व्यक्ति कि लिए संभव है. वह कहते है कि' मन को स्वच्छ रखो और बुद्धि को सात्विक क्योंकि इनको देह से अलग नहीं किया जा सकता. फिर अंहकार छोड़ने का नारा वह क्यों लगाते हैं? भगवान् श्री कृष्ण तो कहते हैं कि तीन गुणों से -सात्विक, राजसी और तामस- परे हो जाये वही योगी है. वह इन्द्रियों पर नियंत्रित करने के लिए कहते हैं जिसका आशय यह है कि अंहकार को भी वैसे ही काबू में रखा जाये जैसे बुद्धि और मन को. अहंकार देह का एक हिस्सा है जो उसके नष्ट होते तक रहता है. उस पर नियंत्रण तो किया जा सकता है पर छोडा नहीं जा सकता.

धर्म बेचने वाले तथाकथित संतों को अहंकार पर नियंत्रण की विधि नहीं मालुम इसलिए उसे छोड़ने का नारा लगते हैं-अंहकार पर नियंत्रण की विधियां मालुम होती तो वह धर्म बेचने का व्यवसाय ही नहीं कर पाते. सबसे बड़ी बात यह हैकि भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के ज्ञान का केवल अपने भक्तों में प्रचार की अनुमति दी है और यह चाहे जहाँ उसे सुनाने लगते हैं. इस तरह देश के लोगों की मानसिकता को ही गुलाम बना दिया है . इसी कारण हमारे देश के लोगों को वाद और नारों पर चलने का लिए अभ्यास हो गया है और इसलिए यह देश बरसों तक गुलाम रहा और आज भी गुलामी से रह रहा है. जिनके पास थोडी बहुत चतुराई हैं वह यहाँ शासन उन्हीं लोगों के सहारे करते हैं जो धर्म के नाम पर नारे लगाते हैं. (क्रमश:)

1/16/08

सर्वशक्तिमान ने जीवन बनाया पर नियम नहीं

सर्वशक्तिमान ने इस धरती पर जीवन का निर्माण इस तरह किया है कि उसका संचालन स्वत: होता रहे पर उसने कोई नियम नहीं बनाया. चालाक लोगों ने उसके नाम पर अनेक ऐसी पुस्तकें और उनका ज्ञान प्रकट किया जो उसने नहीं किया. प्रत्येक जीव की देह पांच तत्वों से बनी और उसमें मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे तत्व स्वत: आये और उसका संचालन करते हैं. आदमी की देह में ऐसा लचीलापन है जिससे वह अपने मन, बुद्धि और अहंकार का अपने अनुसार अच्छा उपयोग कर सकता है क्योंकि वह बन्दर के बाद ऐसा जीव है जिसके पास अपने हाथ भी है और अन्य जीवों में ऐसा नहीं है. एक समय आदमी भी पशुओं जैसा जीवन जीता था पर जैसे-जैसे उसे अपने अन्दर स्थित शक्तियों का अहसास होता चला गया वैसे-वैसे वह अन्य जीवों के मुकाबले अपने जीवन के रहन-सहन में परिवर्तन करता गया.

यहीं से शुरू हुआ मनुष्य में विभाजन और वह शासक और शासित दो वर्गों में बंटता गया-मनुष्य लड़ते तो पहले भी थे और अब भी लड़ रहे है एक-दूंसरे से. यह कोई नियम नहीं कि वह आपस में न लडे. सर्वशक्तिमान ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया. उसने तो केवल जीवन और मृत्यु का नियम बनाया है सुख-दु:ख का नहीं. क्योंकि मनुष्य में यह बुद्धि है कि वह तय करे कि उसे सुख के साथ जीना है या दु:ख के साथ. दूसरे को दु:ख देकर तुम सुखी नहीं रह सकते. तुम दूसरे को गाली दोगे वह तुम्हें देगा. तुम दूसरे को अपमानित करोगे वह तुम्हें करेगा वह तुम्हें करेगा. तुम लोगों को मारने का काम करोगे तो तुम्हें भी कोई मारेगा. यह सर्वशक्तिमान का बनाया नियम नहीं है यह तो एक स्वाभाविक जीवन नियम है.

जो लोग कहते हैं कि यह नियम सर्वशक्तिमान ने बनाया है वह डरपोक हैं या आलसी. क्या यह सब जो अच्छी बाते कह रहे हो उसने कभी कही हैं. नहीं तुम डरते हो और तुम में आत्मविश्वास की कमी है. तुम यह खुद क्यों नहीं कहते कि किसी के साथ अच्छा व्यवहार करने से अपने को भी अच्छा व्यवहार मिलेगा. क्या तुम आलसी हों जो अच्छी बातें सोचने की बजाय दूसरे से अच्छी बातें सीखने को कह रहे हो. अगर तुम्हें कोई अच्छी बात कहनी है तो उसे दूसरे के हवाले से क्यों कहते हो अपने हवाले से क्यों नहीं कहते? अगर दूसरे से कुछ तुम सीख कर कोई विचार व्यक्त करते हो तुम आलसी हो अपना आत्ममंथन नहीं करते और अपनी बुद्धि को आराम से रहने देना चाहते. ''मुझे किसी पर दया दिखाना चाहिए" यह ख्याल अपने आप क्यों नहीं करते. तुम्हें कई बार ऐसा लगता है कि अगर मैं अपने हवाले से अच्छी बात कहूंगा तो लोग यकीन नहीं करेंगे या उस प्रभाव नहीं पड़ेगा तो तुम समझ लो कि डरपोक हो क्योंकि तुमने अपने मन, बुद्धि, और अंहकार का सही विश्लेषण नहीं किया.

कहते हैं कि आदमी को अहंकार नहीं करना चाहिए पर देह है तो अहंकार तो रहेगा. हम उसके बिना चल नहीं सकते. हाँ अहंकार रखो कि तुम एक शक्तिशाली व्यक्ति हो तभी तुम किसी की सहायता कर सकते हो तुम अपने लोगों की रक्षा कर सकते हो. जब तुम किसी को अकारण मारते हो, अपमानित करते हो, दुख देते हो वह वह तुम्हारा अहंकार नहीं है बल्कि कायरता है. अगर देह है तो अहंकार भी रहेगा. हम सो रहे होते हैं और मच्छर काटते हैं तो हम उसे अपने हाथ से भगाते हैं और अगर अहंकार नहीं होगा तो हम उसे भगाएंगे कैसे? अगर अंहकार नहीं करोगे तो आत्म-मंथन नहीं कर सकोगे. दरअसल विद्वान लोग अपने पद, धन और सम्मान के नशे में चूर के अपराधों को अहंकार में किया बताते हैं वह दरअसल उनकी कायरता और आत्म विश्वास की कमीं के कारण होते हैं-लोभ और लालच के कारण होते हैं. अगर उनमें मनुष्य होने का अहंकार होता तो वह ऐसे काम करता है. लोगों कहते हैं कि अमुक व्यक्ति अंहकार के कारण हम से बात नहीं करता पर मैं कहता हूँ कि वह कायर आत्महीनता के भाव से ग्रसित है इसलिए तुमसे बात नहीं करता. उसके पास शब्द नहीं है कि तुमसे बात नहीं करता. तुम भी वैसे ही क्योंकि तुम ऐसा सोच रहे हो और अपने मनुष्य देह में स्थित अहंकार की तरह दृष्टिपात करोगे तो तुम्हें लगेगा कि जो उसके पास है और वही तुम्हारे पास है फिर वह तुमसे धनी और बड़ा कैसे हो सकता है? (क्रमश:)

9/1/07

सदैव हंसते रहो

मनुष्य के मुख पर मुसकान सौभाग्य का चिह्न है। हंसना मनुष्य की स्वाभाविक क्रिया है। विधाता के सृष्टि का कोइ दूसरा प्राणी हंसता हुआ नहीं दिखता। प्रसिद्ध चिंत्तक वायर ने ठीक लिखा है-'जब भी संभव हो हंसो, यह ऐक सस्ती दवा है, हंसना मानव-जीवन का ऐक उज्जवल पहलू है।'

पाश्चात्य तत्ववेत्ता स्टर्नने तो यहाँ तक कहा है कि-'मुझे विश्वास है हर बार जब कोई व्यक्ति हंसता या मुसकराता है वह उसके साथ ही अपने जीवन में वृद्धि करता है।'

स्वेट मार्डन प्रसन्नता को धन मानते हुए कहते हैं-'ऐक ऐसा धन है, जिसे सब लोग इकट्ठा कर सकते हैं, वह धन है प्रसन्नता का धन। तुम पर कितनी ही मुसीबतें रहें, तुम कितने कठिनाईयों मैं हो, तुम्हारे सामने अन्धकार ही क्यों न हो, यदि तुम प्रसन्नता को अपनाए रहो तो तुम धनी हो। यह प्रसन्नता तुम्हारे जीवन को उच्च बनाएगी।'

प्रसिद्ध विचारक कार्नेगी का कथन है-'मुसकराहट थके हुए व्यक्ति के लिए विश्राम है, हतोत्साहित के लिए दिन का प्रकाश, सर्दी में ठिठुरते के लिए धुप है और कष्ट के लिए प्रकृति का सर्वोत्तम प्रतिकार है।'

जबकि होमर के शब्दों में-'मुस्कान प्रेम की भाषा है।'

विलियम शेक्सपियर के कथानुसार-'मुसकान के बल पर जो तुम चाहो पा सकते हो। तलवार से इच्छित वस्तु नष्ट हो जाती है।'
प्रसन्नता वास्तव में चन्दन के समान है, उसे दुसरे के मस्तक पर लगाईये, उंगलिया अपने-आप ही सुगन्धित हो जायेंगी। जीन पोल प्रसन्नता को वसंत की तरह हृदय की सबा कलियाँ खिला देने वाली मानते हैं। तभी तो गेट ने प्रसन्नता हो सभी सदगुणों की माँ कहा है।

इसलिये जीवन में सदैव हंसने और प्रसन्न रहने का प्रयास करो, और ऐसे लोगों से संपर्क मत रखो जो तुम्हें दुःख या अप्रसन्नता देकर तुम्हारी हंसी छीनने का प्रयास करते हैं।

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