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9/28/09

आज दशहरा है-आलेख (today dashahara-hindi lekh)

         आज पूरे देश में दशहरे का त्यौहार मनाया जा रहा है। जिस दिन भगवान श्रीराम जी ने रावण का वध किया उसी दिन को ‘दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। पर्व मनाना और उससे निकले संदेश को समझना अलग अलग विषय हैं। ऐसे अवसर पर अपने इष्ट का स्मरण कर उनके चरित्र का स्मरण करने से पर्व मनाने में मजा आता है। देखा यह गया है की धार्मिक चित्तक समाज के सदस्यों को समाज समय पर एकत्रित होकर आध्यात्मिक चित्तन के लिए पर्वों जैसे अवसरों का निर्माण करते हैं बाज़ार उसे उत्सव जैसा बनाकर उपभोग की वस्तुएं बेचने का मार्ग बना लेता है, इस कारण ही चित्तन की बजाय उल्लास मनाने की प्रवृति पैदा होती है।
क्या राम और रावण के बीच केवल सीता की मुक्ति के लिये हुआ था? इस प्रश्न का उत्तर एक प्रतिप्रश्न है कि क्या अगर रावण सीता का अपहरण नहीं करता तो उनके बीच युद्ध नहीं होता?
         अगर तत्कालीन स्थितियों का अध्ययन करें तो यह युद्ध अवश्यंभावी था और रावण ने सीता का अपहरण इसी कारण किया कि भगवान श्रीराम अगर सामान्य मनुष्य हैं तो पहले तो सीता जी को ढूंढ ही न पायेंगे और उनके विरह में अपने प्राण त्याग देंगे। यदि पता लग भी गया और उनको वापस लाने के युद्ध करने लंका तक आये तो उन्हें मार दिया जायेगा। अगर भगवान हैं तो भी उनकी आजमायश हो जायेगी।
         जब भगवान राम लंका तक पहुंच गये तब रावण को आभास हो गया था कि भगवान श्री राम असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं पर तब वह उनसे समझौता करने की स्थिति में वह नहीं रहा था क्योंकि श्री हनुमान जी ने लंका दहन के समय उसके पुत्र अक्षयकुमार का वध कर दिया था। यह पीड़ा उसे शेष जीवन सहजता ने नहीं बिताने देती। ऐसे में युद्ध तो अवश्यंभावी था।
       अगर रावण श्रीसीता का अपहरण नहीं भी करता तो भी अपनी बनवास अवधि बिताने के लियें दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहे श्रीराम जी से उसका युद्ध होना ही था। आखिर यह युद्ध क्यों होना था? इसे जरा आज के संदर्भ में देखें तो पता चलेगा कि अब फिर वैसे ही हालत निमित हो गये हैं हालांकि अब कोई न रावण जैसा ताकतवर दुष्ट है न ही भगवान श्रीराम जैसा शक्तिशाली और पराक्रमी।
          दरअसल रावण भगवान शिव का भक्त था और उसे अनेक प्रकार वरदान मिले जिससे वह अजेय हो गया। अपने अहंकार में न वह केवल भगवान शिव को भूल गया बल्कि अन्य ऋषियों, मुनियों, और तपस्वियों की दिनचर्या में बाधा डालने लगा था। वह उनके यज्ञ और हवन कुंडों को नष्ट कर देता और परमात्मा के किसी अन्य स्वरूप का स्मरण नहीं करने पर मार डालता। इसके लिये उसने बकायदा अपने सेवक नियुक्त कर रखे थे जिनका वध भगवान श्री राम के हाथ से सीता हरण के पूर्व ही हो गया था।
         भगवान श्रीराम को रावण की पूजा पद्धति से कोई बैर नहीं था। वह तो भगवान शिव जी भी आराधना करते थे। वह दूसरे की पूजा पद्धति को हेय और इष्ट को निकृष्ट कहने की रावण प्रवृत्ति के विरुद्ध थे। भगवान श्रीराम की महानता देखिये उन्होंने रावण के शव को उसकी परंपराओं के अनुसार ही अंतिम संस्कार की अनुमति दी। कहने का तात्पर्य यह है कि अपना धर्म-उस समय धर्म का कोई नाम नहीं था इसलिये पूजा पद्धति भी कह सकते हैं-दूसरे पर लादने के विरुद्ध थे और यही कारण है कि उन्होंने अपने संदेशों में किसी खास पूजा पद्धति की बात नहीं कही है। इसके विरुद्ध अहंकारी रावण दूसरों की पूजा पद्धति में न केवल विघ्न डालता वरन् आश्रम और मंदिर भी तोड़ डालता था। श्री विश्वामित्र अपने यज्ञ और हवन में उसके अनुचरों की उद्दंडता को रोकने के लिये श्रीराम को दशरथ जी से मांग लाये थे और उसी दिन ये ही राम रावण का युद्ध शुरु हो गया था।
       रावण लोभ, लालच और दबाव के जरिये दूसरों पर अपना धर्म-पूजा पद्धति-लादना चाहता था। उसने दूसरी मान्यताएं मानने वाले समाजों की स्त्रियों का अपहरण कर उनको अपने राजमहल में जबरन रखा। उन पर लोभ, लालच, डर और मोह का जाल डालकर उनको अपने वश में किया ताकि दूसरा समाज तिरस्कृत हो। उसने श्रीसीता जी को भी साधारण स्त्री समझ लिया जो उसके आकर्षण मेें फंस सकती थी और यही गलती उसे ले डूबी पर इसका यह भी एक पक्ष भी है कि अन्य मान्यताओं के लोगों का वह जिस तरह विरोध कर रहा था अंततः उसे एक दिन श्रीराम जी समक्ष युद्ध करने जाना ही था।
         आज हम देखें तो हालत वैसे ही हैं। हमारे दर्शन के अनुसार अध्यात्मिक दर्शन ही धर्म हैं पर उसका कोई नाम नहीं है जबकि अन्य धर्मों में कर्मकांडों को भी उसके साथ जोड़ा जाता है। धर्म का अर्थ कोई विस्तृत नहीं है। निष्काम भाव से कर्म करना, निष्प्रयोजन दया करना, समस्त जीवों के प्रति समान भाव रखते हुए अपने इष्ट का ही स्मरण करना उसका एक रूप है। अन्य धर्मों में उससे मानने की अनेक शर्तें हैं और यह पहनने, ओढ़ने, नाम रखने और अभिवादन के तरीकों पर भी लागू होती हैं।
         इतिहास में हम देखें तो हमारे देश में किसी धर्म का नाम लेकर युद्ध नहीं हुआ बल्कि उसके तत्वों की स्थापना का प्रयास हुआ। धर्म के अनुसार ही राजनीति होना चाहिये पर राजनीतिक शक्ति सहारे धर्म चलाना गलत है। आज हो यह रहा है कि लालच, लोभ, मोह, और दबाव डालकर लोगों को न केवल अपना इष्ट बल्कि नाम तक बदलवा दिया जाता है। पूजा पद्धति बदलवा दी जाती है। यह सब अज्ञान और मोह के कारण होता है। इस तरह कौन खुश रह पाता है?
       चाणक्य और कबीर भी यही कहते हैं कि अपना इष्ट या वर्ग बदलने से आदमी तनाव में जीता है। हमने भी देखा है कि अनेक लोग अपना नाम, इष्ट और वर्ग बदल जाते हैं पर फिर भी उसकी चर्चा करते है जबकि होना चाहिये कि वह फिर अपने नाम, इष्ट और वर्ग की बात तक न करें। कहने को तो वह यह कहते हैं कि यह सब बदलाव की वजह से उनको धन, सफलता और सम्मान मिला पर भौतिक उपलब्धियों से भला कोई खुश रह सकता है?
       दशहरे के इस पावन पर्व पर हमें अपने इष्ट भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए उनके चरित्र पर भी विचार करना चाहिए तभी पर्व मनाने का मजा है। इस अवसर पर हम अपने पाठकों, ब्लाग मित्रों और सहृदय सज्जनों के बधाई देते हैं।यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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8/1/09

निष्काम भाव से आशय लक्ष्यहीन या सन्यासी जीवन नहीं-हिंदी लेख (shri gita ke nishkam bhav ka ashay-hindi lekh)

श्री गीता में निष्काम भाव को लेकर अधिकतर लोग भ्रमित रहते हैं। उनके लगता है कि यह कैसे संभव है कि हम कोई काम करें और फिर उससे फल की आशा न करें। कुछ विद्वान तो मानवीय स्वभाव की कमजोरियों का बहाना कर यह भी प्रचार करते हैं कि ‘निष्काम भाव’ से काम करना संभव नहीं है। लोग सोचते हैं कि निष्काम भाव से काम करने का मतलब यह है कि
1. अगर कहीं नौकरी या व्यवसाय करें तो वहां वेतन या दाम न भी मिले तो चुप होकर भगवान भरोसे बैठ जायें और किसी प्रकार का संघर्ष न करें।
2. अगर फल की कामना ही न हो तो कर्म शुरु ही क्यों करें?
3.अपने और परिवार का भरण भोषण करन अपनी जिम्मेदारी है और इसका निर्वाह करने के लिये कहीं से धन प्राप्त करने की आशा पर ही काम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर निष्काम होने में वह सन्यासत्व की अनुभूति करते हैं और उनको लगता है कि यह उनका विषय नहीं है। सच बात तो यह है कि हिन्दू धर्म के अधिकतर संत और साधु सकाम भक्ति के पोषक हैं। वह भक्तों से अपनी सेवा सुश्रुपा कराना चाहते हैं इसलिये वह निष्काम भक्ति का संदेश इस ढंग से देेते हैं कि भ्रम पैदा होता है। निष्काम भाव से जीवन गुजााने का मतलब लक्ष्यहीन और त्यागी जीवन बिताना नहीं है-यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये।
दरअसल निष्काम भाव से जीवन व्यतीत करने सुखमय हो जाता है और जब इसकी वजह से कोई सुखपूर्ण जीवन व्यतीत करेगा तो वह क्यों अपनी मानसिक अशांति से मुक्ति प्राप्त करने के लिये इन गुरुओं के पास जायेगा।
निष्काम भाव से तब तक नहीं रहा जा सकता जब तक फल का स्वरूप न जान लिया जाये। जब फल का स्वरूप जान लेते हैं तब स्वतः निष्काम भाव को प्राप्त हो जाते हैं।
निष्काम भाव से काम करना संभव है मगर पहले फल का स्वरूप समझा जाये। कोई भी कहीं नौकरी या व्यवसाय करता है तो उसे भौतिक परिलब्धियां प्राप्त होती हैं पर यह फल नहीं है क्योंकि उसका उपयोग तो हर कोई अपने और परिवार के भरण भोषण करता है। हमने एक जगह से धन लिया और दूसरी जगह खर्च किया तो उसे फल कैसे कहा जा सकता है। फल तो वह है जो हमारे पास रहे। हम जब भौतिक परिलब्धियों को फल मान लेते हैं तो अपना यह बृहद जीवन संकीर्ण दायरों में कैद कर लेते हैं। हमें अपने दैहिक आवश्यकताओं के लिये परिश्रम और व्यवसाय करना ही होता है और उसके लिये वेतन या दाम प्राप्त करना कर्म का हिस्सा है न कि फल का। जब फल है मन की शांति और मोक्ष। वह भक्ति से प्राप्त होता है। उसमें भी आपको निष्कर्म भाव से लगना चाहिये क्योंकि तभी आपका ध्यान अपनी आत्मा से साक्षात्कार पर केंद्रित हो सकेगा। यही ध्यान आपकी देह, मन और विचारों को शुद्ध करता है जिससे आप जीवन में हर पल नवीनता अनुभव कर सकते हैं। जहां आपने कामनायें स्थापित की वहां यह ध्यान नहीं लगेगा और मामला जस का तस।
ऐसे अनेक लोग हैं जो मंदिर नहीं जाते पर फिर भी निष्काम भाव से जीकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। कमाते हैं और अपने धन का उपयोग अपने पर जमकर करते हैं। वह इसलिये धन कमाते हैं क्योंकि उनका खर्च करना होता है। धन को लक्ष्य या फल मानना अपने स्वतंत्र मन को दायरों में कैद करना है और उससे वह विचलित होता है। हम अपने मन की शांति के लिये इधर उधर धन संग्रह के लिये जूझते हैं और फिर उसका खर्च भी करते हैं। यह तो अच्छे भले मनुष्य जीवन का धन के इर्दगिर्द घूमना हो गया। फिर उस पर कुछ विद्वान धार्मिक विद्वानोें ने मोक्ष की बजाय स्वर्ग की प्राप्ति की कामना का अविष्कार कर लिया और उसके लिये अनेक तरह के कर्मकांडों का प्रचार किया जिनमें धन खर्च करना पड़ता है। इसलिये ऐसे गुरु अपने शिष्यों को धन के आसपास ही चक्कर लगवाते हैं। निष्काम भक्ति के संदेश के बीच श्री गीता का गुरु सेवा का संदेश जरूर सुनाते हैं ताकि शिष्य धन के चक्कर से मुक्त न हो। श्री गीता में गुरुजनों की सेवा करने को कहा गया है पर उसका आशय शिक्षा प्राप्ति तक ही सीमित है। श्रीगीता में तो भगवान ध्यान में निरंकार स्वरूप की तरफ जाने की बात कहते हैं तब वह दैहिक गुरु की जीवन भर सेवा का संदेश कैसे दे सकते हैं?
जीवन में निष्काम भाव से रहते हुए निष्प्रयोजन दया करना चाहिये। मोह और माया से परे रहने का तात्पर्य यह कतई नही है कोई वस्तु या व्यक्ति त्यागना है। अपने कर्तव्यों से विमुख होने की भी बात कहीं श्रीगीता में नहीं कही गयी। मूल बात तो भाव से हैं। कोई भौतिक वस्तु या व्यक्ति न पकड़ना है न छोड़ना है। मुख्य विषय है कि किसी में भाव लिप्त नहीं करना।
आप कहेंगे यह संभव नहीं तो कोई जबरदस्ती नहीं है कि आप यह संदेश माने। आप कामनाओं से भरे रहिये। यह जीवन अनवरत धारा से बहता है आप चाहें या न चाहें-हां, आप इस खुशफहमी रहिये कि आप उसका संचालन कर रहे हैं। सबको देने वाला दाता है पर यह समझते रहें कि आप किसी को पाल रहे हैं। मगर यह भी समझ लीजिये हमारे जन्म से पहले भी यह दुनियां चल रही थी और हमारे बाद भी यह चलते रहेगी। यह कटु सत्य ही तत्वज्ञान है और इसी से लोग भागते हैं। वह कामनायें पालते हुए अपने कर्तापन के अहंकार में इसलिये डूबे रहना चाहते हैं क्योंकि उनको लगता है कि जिंदा रहने के लिये कोई बहाना चाहिये।
मुख्य बात हमारी देह नहीं मन का चलना है। हमारे शरीर की इंद्रियां स्वतः काम करती हैं। अगर कोई पत्थर आंख की तरफ उछलता है तो वह स्वतः बंद हो जाती है-हम यह भ्रम पालते हैं तो पालते रहें कि हमने बंद की। कहीं रास्ते में बदबू आती है तो नाक स्वयं ही सांस लेना बंद कर देती है ताकि उससे शरीर विषाक्त न हो-हम भले ही भ्रम पालें कि हमने बंद की। एक मित्र ब्लाग लेखक ने आज इस विषय को उठाया तो लिखने का मन हुआ। उनके पाठ पर हमने यह टिप्पणी भी लिखी जो कि प्रस्तुत है। शेष फिर कभी।
आपने अच्छा विषय उठाया है पर निष्काम भाव से काम करना तभी संभव है जब फल का स्वरूप समझा जाये। कोई भी कहीं नौकरी या व्यवसाय करता है तो उसे भौतिक परिलब्धियां प्राप्त होती हैं पर यह फल नहीं है क्योंकि उसका उपयोग तो हर कोई अपने और परिवार के भरण भोषण करता है। आपने एक जगह से धन लिया और दूसरी जगह खर्च किया तो उसे फल कैसे कहा जा सकता है। फल तो वह है जो आपके पास रहे। हम जब भौतिक परिलब्धियों को फल मान लेते हैं तो अपना यह बृहद जीवन संकीर्ण दायरों में कैद कर लेते हैं। हमें अपने दैहिक आवश्यकताओं के लिये परिश्रम और व्यवसाय करना ही होता है और उसके लिये वेतन या दाम प्राप्त करना कर्म का हिस्सा है न कि फल का। जब फल है मन की शांति और मोक्ष। वह भक्ति से प्राप्त होता है। उसमें भी आपको निष्कर्म भाव से लगना चाहिये क्योंकि तभी आपका ध्यान अपनी आत्मा से साक्षात्कार पर केंद्रित हो सकेगा। यही ध्यान आपकी देह, मन और विचारों को शुद्ध करता है जिससे आप जीवन में हर पल नवीनता अनुभव कर सकते हैं। जहां आपने कामनायें स्थापित की वहां यह ध्यान नहीं लगेगा और मामला जस का तस।
अपनी समझ के अनुसार जो संक्षिप्त व्याख्या थी वह प्रस्तुत की। बाकी कोई सिद्ध तो हूं नहीं कि दावा करूं कि यह सब ब्रह्म वाक्य है।
दीपक भारतदीप

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7/28/09

श्री गुरु ग्रंथ साहिब-नासमझ से मित्रता अधिक नहीं चलती (shri guru granth sahib)

मनसुख सेती दोस्ती थोडड़िआ दिन चारि।
इसु परीति तुटंदी विलमु न होवई,
इतु दोस्ती चलनि विकार।
हिंदी में भावार्थ-
नासमझी और स्वार्थ से हुई मित्रता अधिक दिन नहीं चलता। उसके टूटने में विलंब नहीं होता। ऐसी मित्रता से प्रतिदिन नये विकार पैदा होते हैं।
दुस्टा नालि दोस्ती संता वैरु करंनि।
आपि डूबू कुटंब सिउ सगले कुल डोबंनि।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट व्यक्ति से मित्रता करना अपने लिये बैर स्थापित करना है। दुष्ट व्यक्ति स्वयं तो अपने कुटुंब समेत डूबता है मित्र और उसके परिवार के नाश का कारण बनता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-
सांसरिक मित्रता हमेशा स्वार्थ की वजह से होती है पर अगर मित्र नासमझ हुआ तो एक तरह से बैर की तरह आस्तीन में पलता है। ऐसा नहीं है कि इस संसार में सभी लोग मित्र नहीं बन सकते पर निस्वार्थी और ज्ञानी मित्र ऐसे होते हैं जो विपत्ति में सहायक बनते हैं। उनकी संख्या नगण्य है, अधिकतर तो मित्र केवल स्वार्थ की वजह से मित्र बनते हैं। शराब, जुआ, सट्टा या अपराध करने के लिये मित्र बहुत जल्दी मिल जाते हैं। एक बात कही भी जाती है कि बुरे लोगों का समूह बहुत जल्दी बनता है जबकि सज्जन लोग कभी समूह नहीं बनाते। साधु कभी समूह बनाकर नहीं चलते।
किसी को अपना मित्र बनाने से पहले उसका नैतिक आचरण देख लेना चाहिये। देखा तो यह गया है कि ठगी, धोखा या अन्य संकट का सामना मनुष्य को अपने ही लोगों के कारण करना पड़ता है। महिलाओं के विरुद्ध अभद्र व्यवहार की शिकायत उनके अपने जान पहचान और रिश्तेदारों के कारण ही अधिक होती है। बहुत कम ऐसे अपराध है जिनमें गैर का शामिल होना पाया जाता है। इसलिये स्त्री हो या पुरुष उसे किसी अन्य से संपर्क बढ़ाने के साथ मित्रता तभी कायम करना चाहिये जब उसके आचरण को पहले प्रमाणित कर ले।
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7/26/09

आज नागपंचमी है-आलेख (today nag panchami-hindi article)

आज नागपंचमी है जो कि भारतीय अध्यात्म की दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद इस दिन भी ऐसे कर्मकांड और अंधविश्वास देखने को मिलते हैं जिनको देखकर आश्चर्य और दुःख होता है।
सांप और नाग मनुष्य के ऐसे मित्र मित्र माने जाते हैं जो उसके साथ रहते नहीं है। सांप और नागों की खूबी यह है कि उनका भोजन मनुष्य से अलग है। आज के दिन सांप को दूध पिलाने के लिये अनेक लोग दान करते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि दूध एक तरह से सांप के लिये विष है जो उसकी हत्या कर देता है। सांप को वन्य प्रेमी एक तरह से संपदा मानते हैं तथा पर्यावरण विद् तो सांप प्रजातियां लुप्त होने पर निरंतर चिंता जताते आ रहे हैं। सांप मनुष्य के भोजन के लिये पैदा होने वाली वस्तुओं को नष्ट करने वाले चूहों और कीड़ मकोड़ों को खाकर मनुष्य की रक्षा करता है। इसके बावजूद इंसान सांप से डरता है। यह डर इतना भयानक है कि वह सांप को देखकर ही उसे मार डालता है कहीं वह दोबारा उसे रास्ते में डस न ले।

आधुनिक वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि अधिकतर सांप और नाग जहरीले नहीं होते मगर हमारे देश में इसके बावजूद अनेक निर्दोष सांप और नाग इसलिये जलाकर मार दिये जाते है कि वह इंसान के लिये खतरा है। यह इस देश में हो रहा है जिसमें नाग को देवता का दर्जा हासिल है और यह हमारे विचार, कथन और कर्म के विरोधाभासों को भी दर्शाता है कि हम एक दिन को छोड़कर सांप और नाग के प्रति डर का भाव रखते हैं। कहते हैं कि डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है और सांप के प्रति हम भारतीयों का व्यवहार इसका एक प्रमाण है।
हमारे देश के अध्यात्मिक दर्शन के अनसार शेष नाग ने इस धरती को धारण कर रखा है। महाभारत काल में जब दुर्योधन ने जहर देकर भीम को नदी में फिंकवा दिया था तब सांपों ने ही उनका विष निकाला था और बाद में वह सुरक्षित बाहर आये थे। जब वासुदेव महाराज अपने पुत्र श्रीकृष्ण के जन्म के बाद उनको वृंदावन छोड़ने जा रहे थे तब नाग ने ही उनके सिर पर रखी डलिया पर बरसात से बचाने के लिये छाया की थी। हमारे पौराणिक ग्रंथों में कहीं भी मनुष्य द्वारा सांप को भोजन कराने या दूध पिलवाने का जिक्र नहीं आता। इसका आशय यही है कि उनका भोजन जमीन पर फिरने वाले वह जीव जंतु हैं जो कि मनुष्य के लिये एक तरह शत्रु हैं। शायद यही कारण है कि हमारे ऋषि मुनि मनुष्य को अहिंसा के लिये प्रेरित करते हैं क्योंकि सृष्टि ने उसकी देह और भोजन की रक्षा के लिये अन्य जीवों का सृजन कर दिया है जिनमें प्रमुख रूप से सांप और नाग भी शामिल है।
देश में बढ़ती आबादी के साथ जंगल कम हो रहे हैं और इसलिये वन्य जीवों के लिये रहना दूभर हो गया है। जहां नई कालोनियां बनती हैं वहां शुरुआत में सांप निकलते हैं और लोग डर के बार में उनको मार डालते हैं। अधिकतर सांप और नाग जहरीले नहीं होते हैं पर जो होते भी हैं तो वह किसी को स्वतः डसने जायें यह संभव नहीं है। जहां तक हो सके वह इंसान से बचते हैं पर अनजाने वह उनके पास से निकल जाये तो वह भय के मारे वह डस देते हैं। इसके विपरीत इंसान के अंदर जो वैचारिक विष है उसकी तो किसी भी विषैले जीव से तुलना ही नहीं है। धन-संपदा, प्रतिष्ठा और बाहुबल प्राप्त होने पर वह किसी विषधर से कम नहीं रह जाता। वह उसका प्रमाणीकरण को लिये निरीह और बेबस मनुष्यों को शिकार के रूप में चुनता है। वह धन-संपदा, प्रतिष्ठा और शक्ति के शिखर पर पहुंचकर भी संतुष्ट नहीं होता बल्कि वह चाहता है कि लोग उसके सामने ही उसकी प्रशंसा करेें।
सांप और नाग हमारे ऐसे मित्र हैं जो दाम मांगने हमारे सामने नहीं आते और न ही हम धन्यवाद देने उनके पास जा सकते। वैसे भी उनकी नेकी शहर में बैठकर नहीं जानी जा सकती। वह तो खेतों और खलिहानों में चूहों तथा अन्य कीड़ों का खाकर अप्रत्यक्ष रूप से मित्रता दिखाते हैं। इस नागपंचमी पर सभी ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई। समस्त लोग प्रसन्न रहें इसकी कामना करते हुए हम यह अपेक्षा करते हैं कि वन्य प्राणियों की रक्षा के साथ पर्यावरण संतुलन बनाये रखने का उचित प्रयास करते रहें।
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7/5/09

पूरे समाज को मूर्ख समझने की प्रवृत्ति-आलेख (hindi article)

हम अगर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की बात करें तो उसका सबसे बड़ा सूत्र हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ इसका आशय है कि जो हमारी इंद्रियों का जो कार्य है वही उसका गुण भी है। कान का काम है सुनना तो वह सुनता है। आंख का काम देखना तो वह देखती हैं। अब सवाल यह है कि हम कौनसी वस्तु देखते हैं या कौनसा सुर सुनते हैं यह हालत के अनुसार तो है पर हमारे अंदर मौजूद इच्छायें भी इसके लिये जिम्मेदार हैं। यह इच्छायें मन में पैदा होती हैं जिसका संचालन बुद्धि से होती है और बुद्धि वैसी होती है जैसे हमारा खान पान और रहन सहन होता है।
बहरहाल यह तो केवल एक चर्चा की गयी। हमारा मुख्य उद्देश्य तो यह देखना है कि जिसे तत्वज्ञान हो जाता है वह बहस आदि से दूर रहकर केवल सार्थक चर्चाओं में अपना समय व्यतीत करते हैं और उनमें अहंकार कदापि नहीं रह जाता। कम से कम वह पूरे समाज को अज्ञानी नहीं समझते।
दरअसल समलैंगिक मुद्दे पर जिस तरह भारतीय अध्यात्म ज्ञान के कथित आधुनिक पुरुष बहस में भाग ले रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उन लोगों ने तत्वज्ञान को रट लिया है पर धारण करने से परे हैं।
अगर समलैंगिक को कानूनी मान्यता मिल गयी तो जैसे देश के सारे युवक युवतियां इसी में लग जायेंगे-अगर यह कोई भय व्यक्त करता है तो न वह केवल तत्वज्ञान से अनभिज्ञ है बल्कि नंबर एक का ढोंगी है।
पूरा समाज! क्या बात करते हैं यह लोग? यह सही है कि इस देश के लोग भौतिक उपलब्धियेां के पीछे अधिक लगे हैं पर इसका मतलब नहीं है कि सभी मूर्ख हैं। समलैंगिकता के पक्षधर तो वह लोग हैं जिनके पास अधिक मात्रा में धन और सुविधाऐं हैं और शरीर से कम श्रम के कारण उनका दिमाग आलसी हो जाता है और फिर उसमें उल्टे सीधे विचार आते हैं। 110 करोड़ के इस देश में ऐसे लोगों की संख्या अगर एक लाख भी हो तो बहुत समझो जो समलैंगिक जीवन बिताने को तत्पर होंगे।
हमें अन्य धर्म के ठेकेदारों से कोई मतलब नहीं है पर भारतीय अध्यात्म के ठेकेदार ऐसी बात करें तो उन पर तरस आता है।
श्रीगीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि चार प्रकार के भक्त होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। इसका आशय यह है कि समाज में चार प्रकार के लोग रहेंगे ही चाहे जैसी भी हालत हो।
इधर प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रम जारी रखने के लिये कुछ न कुछ मुद्दा चाहिये। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि इन प्रचार माध्यमों को जीवन बनाये रखने के लिये अनेक प्रकार के मुद्दे बनाये जाते हैं। ऐसे में सामाजिक मुद्दे उठाकर धार्मिक नेताओं को बुलाया जाता है। एक बात यहां याद रखने की है सामाजिक मुद्दों पर धार्मिक ज्ञानियों को बोलना ही नहीं चाहिये क्योंकि अगर समाज गलत रास्ते पर है तो वह अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण है पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह उससे शून्य है। वैसे अगर यह धार्मिक ज्ञानी बोलते हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिये कि क्या उनके शिष्य इस राह पर चले जायेंगे? अगर नहीं तो उसकी इनको चिंता क्यों है? फिर यह भी उनसे पूछा जाना चाहिये कि आप जब बरसों से सक्रिय हैं तो फिर भी यह आशंका बनी हुई है कि समाज समलैंगिक हो जायेगा तो क्या आपकी नाकामी नहीं है? ऐसा लग रहा है कि कुछ धार्मिक और अध्यात्म के शिखर पुरुष कैमरे के सामने आने के आदी हो चुके हैं और उनको ऐसा लगता है कि वह हर विषय पर बोलने के लिये अधिकारी हैं या कहें कि वह अपने आपको ब्रह्मा समझने लगते हैं। उनका अहंकार उनके सिर चढ़कर बोलता नजर आता है जो कि अज्ञान का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।
वह इस तरह बात करते हैं जैसे कि समाज उनके लिये कोई पालतू पशु है जिसे वह चाहे जो चारा खिलायें उसे ही अच्छा समझे। मजे की बात यह है कि वह ऐसे लोगों को ज्ञान दे रहे हैं जो कभी समझेंगे ही नहीं। वह देह भक्तों के समक्ष श्रीगीता के उस ज्ञान को प्रस्तुत करते हैं जिसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि केवल उनके भक्तों को ही दिया जाना चाहिये।
चाहे कोई भी कितना तत्वज्ञानी क्यों न हो अगर वह इस तरह सभी लोगों को अज्ञानी और मूर्ख समझता है तो यह उसकी अज्ञानता का प्रमाण है। बुद्धि सभी में है पर अगर सही ढंग से समझाया जाये तो बात बन जाती है। जिस तरह धर्माचार्य हल्के विषयों पर बहसों में भाग लेते हैं उससे उनकी पोल देश के सामने खुल जाती है और उनके प्रति नकारात्मक संदेश जाता है।
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7/2/09

यह काम तो पशु पक्षी भी नहीं करते-संपादकीय (editorial in hindi)

समलैंगिक मामले पर न्यायालय का निर्णय शिरोधार्य! लोगों के अपने दैहिक संबंधों पर स्वयं ही निर्णय करने का अधिकार होना चाहिये-अगर इससे किसी अन्य व्यक्ति को हानि नहीं पहुचती तो कोई आपत्ति प्रकट करना उचित नहीं है। इसका आशय यह कतई नहीं है कि समलैगिकता का समर्थन किया जाना चाहिये।
समलैंगिकता एक अप्राकृतिक संबंध है जो केवल मनोरोग का परिणाम ही हो सकता है। अगर हम अपने मनुष्य देह के अहंकार को छोड़ दें तो हम इस प्रकृत्ति में अन्य जीवों से अलग नहीं है। हां, शरीर की बनावट और बुद्धि की व्यापकता के कारण हम अन्य जीवों से अधिक सक्रिय और शक्तिशाली बन जाते हैं। हाथी और सिंह न हथियार बनाते हैं न चलाते हैं पर हम अपने द्वारा अविष्कार किये गये अस्त्र शस्त्रों से उन्हें मार डालते हैं पर निहत्थे होने पर हम में से किसी को साहस नहीं हो सकता कि जाकर इनसे लड़े। कहने का तात्पर्य यह है कि हम इस प्रकृत्ति में एक जीव भर हैं और केवल सामान्य कर्म को छोड़कर हमारी आवश्यकतायें अन्य जीवों से अलग नहीं है।
कुत्ता, बिल्ली, शेर, हाथी, चिड़िया या अन्य पशु पक्षी-जिनमें नर मादा का विभाजन किया जाता है-विपरीत लिंगों में ही अपने दैहिक और भावनात्मक संपर्क बनाते हैं। शायद ही कोई ऐसा जीव हो जो समलैंगिक संपर्क बनाता हो पर बौद्धिक रूप से सर्वाधिक शक्तिशाली मनुष्य को पता नहीं कहां से इस तरह का ख्याल भी आता है।
सच है इस सृष्टि को रचने वाले ने आदमी को शरीर की बनावट लोचदार और बुद्धि तीक्ष्ण दी है तो उसके खतरे भी बहुत दिये हैं। कभी कोई पशु पक्षी आत्महत्या नहीं करता और न ही समलैंगिक संबंधों में लिप्त रहता है। कहते है न कि जिस चीज में जितनी अच्छाईयां होती है तो उतनी ही बुराईयां भी होती हैं। धन न होना बुरा तो अधिक होना उससे भी बुरा! यही हाल बुद्धि का है। नहीं है तो भी बुरी और अधिक है तो वह भी बुरी।
आवारा कुत्ते आठ या दस होते हैं पर कुत्तिया एक, पर वह सभी उसी के पीछे लग जाते हैं। आपस में टकराते हैं पर कभी समलैंगिक संबंध बनाते उनको नहीं देखा। एक आश्चर्य की बात है कि जब कुत्तों की यौनक्रीड़ा का जो मौसम होता है उस समय कुत्ते अधिक दिखते हैं कुतिया कम-तब लगता है कि क्या उन्होंने भी इंसानों से मादा भ्रुण को गर्भ में ही निपटाने का कार्यक्रम तो कहीं नहीं चला रखा। खैर यह मजाकिया प्रसंग है जो यह बताने के लिये लिखा कि इस प्रकृत्ति के जीवों के दैहिक और भावनात्मक संबंध हमेशा ही विपरीत लिंग में बनते हैं। इसलिये समलैंगिक संबंध बनाने के लिये आतुर लोगों को चाहिये कि जब उनके दिमाग में ऐसे ख्याल हैं तो वह मनोचिकित्सकों के पास जरूर जायें। एक परिणामहीन दैहिक संबंध किसी भी दृष्टि से उनका हित नहीं कर सकता।
इसके बावजूद ऐसे मनोरोगियों के विरुद्ध कोई सार्वजनिक अभियान छेड़ने पर भी असहमति है। सुनने में आया है कि कुछ सामाजिक और धार्मिक ठेकेदार इसके लिये कमर कस रहे हैं? इससे उन लोगों को अवश्य असहमति होगी जो आदमी को स्वतंत्र रूप से रहने से रोकने के लिये बाध्य करने के विरोधी है। याद रहे, यह भी पश्चिम से आयातित मनोविकार है और यह उन्हीं सुख सुविधाओं की वजह से यहां आया जो अपने देश के आदमी द्वारा उनके उपभोग से शारीरिक परिश्रम कम होने के कारण मानसिक संतुलन बिगाड़ने वाली होती है। यह जरूरी नहीं है कि सभी का बिगड़े पर जिनका बिगड़ गया उन पर आक्रामक कार्यवाही की जाये इस पर अनेक लोग असहमत हैं। इन्हीं सुख सुविधाओं का यही सामाजिक ठेकेदार भी उपयोग करते हैं।
फिर एक दूसरी बात यह है कि इस देश में समलैंगिक संबंध कोई समूचा समाज नहीं बनायेगा। अलबत्ता प्रचार माध्यम जरूर कहीं न कहीं से एकाध घटना लाकर उसे प्रसिद्धि देंगे जैसे कि आपरेशन से स्त्री के पुरुष और पुरुष से स्त्री बनने की घटनाओं को देते हैं। यह समस्या इतनी छोटी है जैसे ऊंट के मूंह में जीरा। देश में ढेर सारी समस्यायें हैं जिनसे शहर के शहर प्रभावित होते हैं पर कोई सामाजिक या धार्मिक संगठन उसके लिये आगे नहीं आता। हां, बरसात नहीं हो रही थी और जब उसके आने समय निकट आ गया तो तमाम तरह की पूजा अर्चना और अनुष्ठान सभी कथित धर्मों और समाज के शीर्षस्थ ज्ञानियों ने किये ताकि उनके समाज को लगे कि वह कितने उनके लिये फिक्रमंद हैं। यह वाक्या भी कुछ ऐसे ही लग रहा है कि समस्त सामजिक और धार्मिक संगठनों के शीर्षस्थ लोग एक हल्की समस्या पर सस्ते में बोलकर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
कहीं किसी अस्पताल में जब हड़ताल होती है तो पूरा शहर त्रस्त होता है। उससे भी अधिक देश में जो भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता की हालत है उसके लिये किसी सामाजिक या धार्मिक ज्ञानी पुरुष को बोलते हुए नहीं देखा गया। किसी ने मिलकर देश की बड़ी समस्याओं के हल के लिये आंदोलन नहीं छेड़ा।
तात्पर्य यह है कि समलैगिक संबंध नहीं होना चाहिये पर होते है तो उनको रोकने जबरन प्रयास करने की बजाय समझाइश का प्रयास करना ही अच्छा है। यह काम सामाजिक तथा धार्मिक ज्ञानियों का है पर वह इससे बचने के लिये कानून बनाने की मांग करते हैं तो सवाल यह है कि आखिर उनका काम क्या है? सामाजिक तथा धार्मिक होने की वजह सुख सुविधायें भोग रहे यह शीर्षस्थ विद्वान और समाज सेवक उनका त्याग कर जमीन पर आकर ऐसे लोगों को समझाने के लिये अपनी देह को कष्ट क्यों नहीं देते। वह जाकर ऐसे मनोरोगियों को समझाते नहीं कि यह काम तो पशु पक्षी भी नहीं करते। उनको यह प्रयास करना चाहिये कि आदमी स्वतंत्र ढंग से सोचते हुए अच्छे मार्ग पर चले न कि उसे लट्ठ से जबरन चलाया जाये।
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6/1/09

सामाजिक गुलामी से मुक्ति के बिना पूर्ण आजादी का अधूरा सपना-आलेख

अगर किसी समुदाय का एक जोड़ा अपने किसी दूसरे समुदाय की रीति के अनुसार विवाह करता है तो क्या उस समुदाय के गुरुओं या शिखर पुरुषों को उसके विरुद्ध बयान देने का अधिकार प्राप्त हो जाता है? क्या यह स्वतंत्र रूप से किसी को अपना जीवन स्वतंत्र रूप व्यतीत करने के अधिकार को चुनौती नहीं देता?
एक छोटी घटना पर बड़ी प्रतिक्रिया होती है तो बड़े सवाल भी उठते हैं। प्रसंग यह है कि एक ही समुदाय के गैर हिंदू जोड़े ने हिंदू रीति से विवाह किया। इस पर उस समुदाय के गुरुओं ने सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया कि उनका विवाह उनकी पवित्र पुस्तक के अनुसार मान्य नहंी है! क्या किसी भी समुदाय के गुरु को यह अधिकार प्राप्त है कि वह उसके हर सदस्य के व्यक्तिगत मामले में सार्वजनिक हस्तक्षेप करने वाले बयान जारी करे?
यह एक सामाजिक प्रश्न है पर मुश्किल यह है कि देश के बुद्धिजीवी वर्ग के साथ ही सामजिक गतिविधियेां के मसीहा भी अपने राजनीतिक विचारों से अपने दृष्टिकोण रखते हैं। अगर कोई घटना धार्मिक या सामाजिक है तो सभी सक्रिय संगठन अपनी प्रतिबद्धता, लोगों की जरूरतों और समस्याओं से अधिक अपने पूर्वनिर्धारित वैचारिक ढांचे में तय करते हैं। अगर हम इस घटना को देखें तो केवल वही संगठन उस जोड़े को समर्थन देंगे जो अपने समुदाय की परंपराओं की प्रशंसा इस घटना में देखते हैं और उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के प्रत्युत्तर में उनके प्रतिद्वंद्वी संगठन खामोश रहेंगे या फिर कोई अपनी नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे जिससे अपने समुदाय में उनकी अहमियत बनी रहे।
सवाल यह है कि कोई हिंदू जोड़ा गैर हिन्दू तरीके से या कोई गैरहिन्दू हिन्दू तरीके से विवाह करता है तो उसे सार्वजनिक रूप से चर्चा का विषय क्यों बनाया जाना चाहिए? क्या यह जरूरी है कि देश के बुद्धिजीवी जब सामाजिक विषयों पर लिखें तो हर घटना को अपने अपने राजनीतिक चश्में से ही देखें? क्या यह जरूरी है कि सामाजिक विषयों पर केवल राजनीतिक विषयों पर ही लिखने वाले अपने विचार रखें। क्या शुद्ध रूप से किसी सामाजिक लेखक को इसका अधिकार नहीं है कि वह ऐसे मसलों पर लिखे जिनका जानबूझकर राजनीतिक करण किया गया हो या लेखकों ने यह अधिकार स्वयं ही छोड़ दिया है।

यह घटना तो इस आलेख में केवल संदर्भ के लिए उपयोग की गयी है पर मुख्य बात यह है कि हर व्यक्ति को-चाहे वह किसी भी समुदाय,जाति,भाषा या क्षेत्र का हो- अपनी दैनिक गतिविधियों के स्वतंत्र संचालन के राज्य का संरक्षण मिलना चाहिये क्योंकि वह देश की एक इकाई है मगर समाजों को संरक्षण देने की बात समझ से परे है। संरक्षण की जरूरत व्यक्ति को है क्योंकि वह उसका अधिकारी है-राज्य द्वारा दिये जाने वाले करों को चुकाने के साथ वह मतदान भी करता है-पर समाजों को आखिर संरक्षण की क्या जरूरत है?
हम एक व्यक्ति को देखें तो उसको समाज की जरूरत केवल शादी और गमी में ही होती है बाकी समय तो वह अकेला ही जीवन यापन करता है। समाज की उसके लिये कोई अधिक भूमिका नहीं है। वैसे भी हम इस देश में जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के आधार पर बने समाजों को देखें तो उनके स्वाभाविक रूप से बने संगठन उनके लिये अपनी भूमिका हमेशा नकारात्मक प्रचार में ढूंढते हैं। संगठन पर बैठते हैं धनी, उच्च पदस्थ या बाहूबली जिनके भय से आम आदमी दिखावे के लिये उनका समर्थन करता है। इसी का लाभ उठाते हुए ही इन संगठनों के माध्यम से समाजों पर नियंत्रण का प्रयास किया जाता है। यह केवल आज की बात नहीं बल्कि सदियों से होता आया है इसलिये ही जिस समाज के लोगों के हाथ में सत्ता रही वह अन्य समाजों को दूसरे दर्जे का मानते रहे। परिणामस्वरूप इस देश में हमेशा संघर्ष रहा।
आजादी के बाद भी समाजों को संरक्षण देने के लिये राज्य द्वारा प्रयास किया गया। यह प्रयास भले ही ईमानदारी से किया गया पर इसका जमकर दुरुपयोग हुआ। समाज को नियंत्रित करने वाले संगठनों के शीर्ष पुरुषों ने कभी यह प्रयास नहीं किया कि वह मिलकर रहें उल्टे वह आपस में लड़ाते रहे। मजे की बात यह है कि आम लोगों को आपस में लड़ाने वाले इन शीर्ष पुरुषों में कभी आपस में सीधे संघर्ष हुआ इसकी जानकारी नहीं मिलती।
कहा जाता है कि बिटिया सांझी होती है। आदमी अपने शत्रु की बेटी का नाम भी कभी सार्वजनिक रूप से नहीं उछालता। इस प्रसंग में देखा गया कि लड़के के साथ लड़की का नाम भी उछाला गया जो कि किसी भी समुदाय की मूल पंरपराओं को विरुद्ध है। नितांत एक निजी विषय को सार्वजनिक रूप से उछालना कोई अच्छी बात नहीं है। जहां तक किसी गैर हिन्दू जोड़ द्वारा हिन्दू रीति से विवाह करने का प्रश्न है तो पाकिस्तान में कुछ समय पूर्व एक ऐसी शादी हुई जिसमें पूरा परिवार शामिल हुआ। तब वहां पर उनके समुदाय की तरफ से ऐसा कोई विरोध नहीं आया पर भारत में तो सभी समुदाय के शीर्ष पुरुषों ने मान लिया है कि उनका हर सदस्य उनकी प्रजा है। यह शीर्ष पुरुष आपस में ऐसे बतियाते हैं जैसे कि वह पूरे समुदाय के राजा हों।
राज्य के समाजों को संरक्षण का यह परिणाम हुआ है कि उनके शीर्ष पुरुष आम आदमी को अपनी संपत्ति समझने लगे हैं।

सच बात तो यह है कि जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर बने कथित संगठन किसी अहम भूमिका में नहीं है पर प्रचार माध्यमों से मिलने वाला उन्हें जीवित रखे हुए है। पुरानी पीढ़ी के साथ नयी पीढ़ी भी कथित सामाजिक नियमों उकताई हुई है। अंतर यह है कि पुरानी पीढ़ी के लिये विद्रोह करने के अधिक अवसर नहीं थे पर नयी पीढ़ी को किसी चीज की परवाह नहीं है। सारे समाज अपना अस्तित्व खोते जा रहे पर उनके खंडहर ढोने का प्रयास भी कम नहीं हो रहा। मुश्किल यह है कि लोगों के निजी मामलों में इस तरह सार्वजनिक दखल रोकने का कोई प्रयास नहीं हो रहा। इसके लिये कानून बने यह जरूरी नहीं पर समाज के निष्पक्ष और मौलिक चिंतन वाले लोगों को चाहिए कि वह दृढ़तापूर्वक सभी समुदायों के शीर्ष पुरुषों पर इस बात के लिये दबाव डालें कि वह लोगों के निजी मामलों में दखल देने से बचें। वह किसी के साथ गुलाम जैसा व्यवहार न करें। यहां किसी विशेष समुदाय को प्रशंसा पत्र नहीं दिया जाना चाहिये कि वह अन्य से बेहतर है क्योंकि ऐसी अनेक घटनायें हैं जिससे हर समाज या समूह पर कलंक लगा है।
इस कथित सामाजिक गुलामी से मुक्ति के लिये निष्पक्ष और मौलिक सोच के लोगों को अहिंसक प्रचारात्मक अभियान छेड़ना चाहिये। जो लोग समाजों को अपनी संपत्ति समझते हैं वह इसलिये ही आक्रामक हो जाते हैं क्योंकि उनको दूसरे समूहों के अपनी तरह के ही शीर्षपुरुषों का समर्थन मिल जाता है। कभी कभी तो लगता है कि वह अपने अपने समाज में वर्चस्व बनाये रखने के लिये ही नकली लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में राज्य से हर व्यक्ति को जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के आधार पर संरक्षण तो मिलना चाहिये पर समाज के संरक्षण से बचना चाहिए। उनके आधार पर बने संगठनों को लोगों के निजी मामलों से रोकने का प्रयास जरूरी है। इस तरह की सामाजिक गुलामी समाप्त किये बगैर देश में पूर्ण आजादी एक ख्वाब लगती है। राज्य या कानून से अधिक वर्तमान समय में युवा और पुरानी पीढ़ी के निष्पक्ष, स्वतंत्र और मौलिक लोगों के प्रयासों द्वारा ही अहिंसक, सकारात्मक और दृढ़ प्रयास कर ऐसे तत्वों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
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2/17/09

श्रीगीता तो ज्ञान सहित विज्ञान से परिपूर्ण ग्रन्थ है-आलेख

धर्म को लेकर अब अधिक चर्चा हो रही है पर उसके मूल तत्वों के बारे में कम उससे मानने वाले लोगों के आचरण पर ही अधिक तथ्य रखे जा रहे हैं। आजकल तो चारों तरफ बहस हो रही है और एकता करने के लिये शोर मचाया जा रहा है। वाद और नारों के जाल में फंसे बुद्धिजीवियों की अपनी सीमायें हैं और भारतीय अध्यात्म ज्ञान से रहित होते हुए भी धर्म पर ऐसे बोलते हैं जैसे कि उनका लिखा या बोला ही अंतिम सत्य है। अभी एक जगह तीन धर्मों की पुस्तकों की चर्चा करते उनको भूल जाने और आपस में भाईचारा लाने की बात एक नारे के रूप में कही गयी-इसमें भारतीय अध्यात्म की मुख्य स्त्रोत गीता का नाम भी था। दो अन्य धर्मों की पुस्तकों का नाम भी था पर यहां हम केवल श्रीगीता के मसले पर ही चर्चा करेंगे क्योंकि आजकल जो वातावरण है कि उसमें किसी दूसरे धर्म की चर्चा करने पर वाद प्रतिवाद का जो दौर शुरु होता है तो वह किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता।
श्रीगीता अन्य धार्मिक ग्रंथों के मुकाबले शब्दों के मामले में कम है पर इस जीवन सृष्टि का सभी तत्वों का संपूर्ण सार केवल उसी में है। यह दुनियां की एकमात्र ऐसा ज्ञान संग्रह है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान की भी चर्चा है। इसे पढ़ने और समझने वाले ज्ञानी ही जानते हैं कि अत्यंत सरल शब्दों में जीवन और सृष्टि के रहस्यों का वर्णन करने वाले इस ग्रंथ में कोई लंबा चैड़ा ज्ञान नहीं है जो किसी के समझ मेें नही आये पर इसके महत्व को प्रतिपादित करने वाले ही इसके असली संदेश गोल कर जाते हैं ताकि वह सुनने वालों की नजरों में ज्ञानी भी कहलायें और दूसरा कोई ज्ञानी बनकर उनको चुनौती भी न दे।

जहां तक श्रीगीता के ज्ञान का प्रश्न है तो उसमें
1.कहीं भी हिंसा का समर्थन नहीं किया गया।
2.उसमें मनुष्य को योग और भक्ति के द्वारा स्वयं ही शक्ति संपन्न होने की प्रेरणा दी गयी है।
3.उसमें विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है ताकि धर्म की रक्षा हो सके। एक तरह से मानव समाज के नित नये स्वरूपों के साथ जुड़ने के लिये प्रेरित किया गया है क्योंकि उसमें वर्णित ज्ञान की रक्षा तभी संभव है।
4.व्यक्ति किस और कितने तरह के होते हैं इसके लिये उसमें पहचान बताई गयी है और श्रेष्ठ मनुष्य के लिये जो मानदंड बताये गये हैं वह एक आईने का काम करते हैं।

उसमें कहीं भी
1. चमत्कारों के आकर्षण का वर्णन नहीं है
2. मनुष्य द्वारा मनुष्य को हेय देखने का संदेश नहीं दिया गया।
3.किसी प्रकार की पूजा पद्धति या देवता की उपासना या किसी व्यक्ति की महिमा का बखान नहीं किया गया। न ही किसी कर्मकांड या रूढि़यों की स्थापना उसमें की गयी है।
श्रीगीता की किसी अन्य पुस्तक से तुलना करना ही हैरानी की बात है। इस तरह वाद पर चलने और नारे लगाने वाले केवल अखबार पढ़ कर ही अपनी विचारधारा बना लेते हैं। देखा जाये तो अन्य सभी धार्मिक पुस्तक से श्रीमद्भागवत गीता की तुलना ही नहीं हैं। जिन लोगों को लगता है कि श्रीगीता का भुलाने से राष्ट्र में एकता स्थापित हो जायेगी तो उनको यह भी समझ लेना चाहिये कि बात केवल पुस्तक के नाम की नहीं बल्कि उसके ज्ञान उसे धारण करने की भी है। अन्य धार्मिक पुस्तकें इतनी बड़ी हैं कि आज के संघर्षमय युग में किसी को उसे फुरसत ही नहीं है और जो पढ़ते हैं वह अपने हिसाब से दूसरों को उनके निजी जीवन में निर्णय लेने के लिये पे्ररित करते हैं। कई बार तो पारिवारिक विवादों में भी उनसे उदाहरण लिये जाते हैं। कई धार्मिक पुस्तकें तो केवल समाज को सांसरिक संबंधों के बारे में संदेश देती हैं और साथ ही उनके सामने कर्मकांडों के निर्वहन की शर्त भी रखती हैं जबकि श्रीगीता के संदेशों में ऐसा नहीं है।
समस्या श्रीगीता को भूलने की नहीं बल्कि उसका ज्ञान धारण न करना ही हैं। धार्मिक पुस्तकों पर प्रतिकूल टिप्पणियां होने से सामान्य आदमी बौखला जाता है और अल्पज्ञानी उसमें से ज्ञान के अंश निकालकर उसके महत्व का प्रतिपादित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह केवल सुनता है और पूछने पर यही कहता है कि -‘पहले पढ़ लो फिर आकर बात करना।’
श्रीगीता के ज्ञान के बाद महाभारत युद्ध हुआ था पर उसमें श्रीभगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि यह ‘युद्ध तू मेरे लिये कर और उसका परिणाम मेरे ऊपर छोड़’
उन्होंने अपना वादा निभाया। अर्जुन को पाप का भागी नहीं बनने दिया क्योंकि उनके उस भक्त ने अपनी देह का त्याग किसी का तीर खाकर नहीं छोड़ी, जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने परमधाम गमन से पहले उसी हिंसा के प्रतिकार में एक बहेलिये का तीर अपने पांव पर लेकर यह स्पष्ट संदेश मानव समाज को दिया कि अहिंसा ही भविष्य की सभ्यताओं के लिये श्रेष्ठ मार्ग है। उन्होंने महाभारत में स्वयं कहीं भी हिंसा नहीं की पर उसका परिणाम स्वयं ही लेकर यह साबित किया कि वह एक योगेश्वर थे।
सच तो यह है कि लोग केवल भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हैं पर उनके जीवन चरित्र से कुछ नहीं सीखते। लोगों को अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने नकारा बना दिया है। वह केवल बहसें करते हैं वह भी अर्थहीन। किसी निष्कर्ष पर तो आज तक कोई पहुंचा ही नहीं है-जिस तरह की बहसें चल रही हैं उससे तो लगता भी नहीं है कि किसी नतीजे पर पहुंचेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के उपदेशों का प्रचार केवल अपने भक्तों में ही करने का निर्देश दिया है क्योंकि उस पर केवल चलने के लिये पहले यह जरूरी है कि उनकी निष्काम भक्ति की जाये।
आखिरी बात यह है कि अन्य धार्मिक ग्रंथ कथित रूप से कहते हैं कि ‘प्रेम करो’,‘अहिंसा धर्म का पालन करो’, परमार्थ करो और अपनी नीयत साफ रखो’, पर वह यह नहीं बताते है कि पांच तत्वों से बनी इस देह में जो शारीरिक,मानसिक और वैचारिक विकार एकत्रित होते हैं उनका निष्कासन कैसे हो? जब तक यह विकार है आदमी प्रेम कर ही नहीं सकता, हिंसा तो हमेशा उसके मन में रहेगी और परमार्थ भी करेगा तो दिखावे का।

श्रीगीता उसका उपाय बताती है कि उसके लिये लिये योगसाधना, ध्यान और गायत्री मंत्र का जाप करो। उससे शरीर के विकार निकल जाते हैं और आदमी स्वतः भी निष्काम भक्ति के भाव को प्राप्त होता है। उसे प्रेम करने के लिये सीखने की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही परमार्थ करने के लिये वह किसी के संदेश का इंतजार नहीं करता। दूसरे धर्म ग्रंथो में आंखों से अच्छा देखने, कानों से सुनने और मन में अच्छा विचार करने का उपदेश देते हैं पर श्रीगीता तो मनुष्य के उस मन पर नियंत्रण करने का तरीका बताती है जिससे वह स्वचालित ढंग से इन सब बातों के लिये प्रेरित होता है। उसे किसी से कुछ सीखने या सुनने की आवश्यकता नहीं होती।

बाकी धर्म ग्रंथों की क्या महत्ता है यह तो उनको पढ़ने वाले जाने पर श्रीगीता को पढ़ने वाले इसके बारे में प्रतिकुल टिप्पणी होने पर भी नहीं बौखलाते क्योंकि वह जानते हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। स्पष्ट है कि जिस वातावरण में सामान्य आदमी रह रहा है, भोजन कर रहा है या पानी पी रहा है उसका उस प्रभाव होगा उसी के अनुसार ही वह दूसरे से अनुकूल प्रतिकूल व्यवहार करेगा। रहने वाले तो श्रीगीता का अध्ययन करने वाले भी कोई आसमान में नहीं रहते वह भी यहां पर्यावरण प्रदूषण झेल रहे हैं पर वह जब अपने सामने समस्याओं का जंगल देखते हैं तो यही कहते हैं कि ‘मुझे अपने पर नियंत्रण रखना चाहिये दूसरा ऐसा करे यह जरूरी नहीं है क्योंकि उसका ज्ञान कितना है उतना ही तो वह करेगा।
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12/14/08

भारतीय अध्यात्म ज्ञान रूपी हिमालय से निकल सकती है कोई भी धारा-आलेख

एक बात निश्चित है कि धर्म नितांत एक निजी विषय है और उस पर सार्वजनिक विषय पर चर्चा करना केवल एक दिखावा करना लगता है। दूसरी बात यह है कि किसी धर्म की स्थापना या प्रचार का कार्य एक व्यवसाय का रूप ले चुका है और आम आदमी इस बात को समझ गया है और वह इन प्रचारकों को गंभीरता ने नहीं लेता। फिर भी समूह में रहने के अभ्यस्त इंसानों के लिये यह आवश्यक है कि वह भाषा,जाति और धर्म के नाम पर बने समूहों के प्रति निष्ठा जताते रहें ताकि विपत्ति के समय उनकी सहायता की आशा की जा सके।

इन्हीं समूहों में बदलाव आते जाते हैं और कई जगह झगड़े चलते हुए भी उनको रोकना कठिन लगता है। धर्म और अध्यात्म में अंतर है। धर्म मनुष्य को बर्हिमुखी और अध्यात्म अंतर्मुखी बनता है। सारे विवादों के बावजूद एक बात अंतिम सत्य के रूप में सामने आ चुकी है कि भारतीय अध्यात्म ज्ञान में ही वह शक्ति है जिसको ग्रहण और धारण कर कोई भी व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से शक्तिशाली हो सकता हैं। इस अध्यात्म ज्ञान की वजह से हिंदू धर्म निर्मित हुआ है। लंबे समय तक हिंदू धर्म को लेकर अेनक सवाल उठते रहे हैं पर उनके उत्तर में केवल विवाद ही खड़े होते हैं।

इस लेखक ने अपने एक पाठ में लिखा था कि ‘ हिंदी हिदू और हिंदूत्व’ शब्द में एक ऐसा बोध है जिसे धारण कर कोई भी अपने को शक्तिशाली समझने लगता है क्योंकि उसमें एक आकर्षण है। एकतरफ जहां हिंदू धर्म के बचाने और विस्तार करने के प्रयास हो रहे हैं तो दूसरी तरफ उसके नाम पर बने एक बृहद समाज के स्वरूप में बदलाव आते जा रहे हैं जिस पर विद्वान दृष्टिपात नहीं कर पाते। पहला तो यह है कि हमारे समाज में पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव इतना पड़ चुका है कि पता ही नहीं लगता कि हम धर्म या अध्यात्म ज्ञान के विषय में कहां खड़े हैं? धार्मिक कर्मकांड और अध्यात्मिक ज्ञान के के प्रथक होने की अनुभूति नहीं होने के कारण विचारों में भटकाव होता है और यही समाज को भी भ्रमित कर रहा है।

कल एक ब्लाग पढ़ रहा था। उसके लेखक श्री रजनीश मंगला ने जर्मनी में हिंदू मंदिर और अफगान हिंदू मंदिर बने होने की चर्चा अत्यंत दिलचस्प ढंग से उठाई थी। उसमें लिखा गया था कि आतंक से परेशान अफगानी हिंदुओं ने जर्मनी में पनाह ली और वहां उन्होंने आकर्षक मंदिरों का निर्माण कराया है। मंदिर मनाने के मामले में वहां भारतीय हिंदूओं के मुकाबले अफगानी हिंदू आगे हैं। किसी उत्सव पर भारतीय हिंदू मंदिर के मुकाबले अफगानी हिंदू मंदिर में कम ही भीड़ होती हैं। अफगानी मंदिर कर्ज लेकर बनाये गये हैं जिसकी वापसी किश्तों में की जा रही है। उन मंदिरों में पुजारी भारत के ही हैं।
अफगानियों के मंदिरों पर ही लिखा गया है ‘अफगानी हिंदू मंदिर’। रजनीश मंगला ने इस आलेख में सवाल उठाया कि क्या अफगानी हिंदू मंदिरों से कभी अफगानी हट जायेगा या कोई ःअफगानी हिदू विचारधारा के रूप में अलग धारा बहेगी। रजनीश मंगला के इस आलेख को दो बार मैंने पढ़ा क्योंकि उसमें मेरी दिलचस्पी बहुत थी। जहां तक अलगा धारा का प्रश्न है तो लगता है कि वह आगे ही बढ़ेगी कम शायद ही हो। सच तो यह है कि अलग धारा बहनी ही चाहिये क्योंकि हिंदू अध्यात्म एक हिमालय की तरह है जहां से कई धारायें प्रवाहित होंगी। अभी नहीं तो आगे इसकी संभावना है। एक ही धारा की कल्पना कर हिंदू धर्म को ही सीमित दायरे मेेंें बांधना होगा।

आखिर अलग धारा का प्रश्न क्यों उठा? अगर हम भारत में हिंदू धर्म की बात करें तो यहां का समाज जातियों और उपजातियेां में बंटा हुआ है और यही उसके शक्तिशाली होने कारण भी है। फिर अफगान हिंदू धारा के बहने से होगा यह कि आगे चलकर अन्य देशों के हिंदू भी इसी तरह अपनी धारा बहायेंगे। इस बात की भी संभावना है कि जब विश्व में सामाजिक और धार्मिक बदलाव आयेंगे तो तो अपनी अध्यात्मिक ज्ञान की शक्ति के कारण हिंदू धर्म ही विस्तार रूप से लेगा। यह लेखक इतिहास को एक कूड़ेदान की तरह मानता है पर उसमें वर्णित घटनाओं पर विचार करें तो हर भारतीय हिंदूओ की कार्यपद्धति को देखें। हिंदू धर्म की रक्षा के लिये सभी तैयार बैठे हैं पर केवल इसी देश के अंदर। बाहर भी हिंदू रहते हैं पर उनके लिये किसी ने कार्य नहीं किया। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हिंदू धर्म से आशय उन सभी धर्मों से है जिनका उदय भारत में हुआ। यहां के शासकों का राज्य अफगानिस्तान तक फैला था पर धीरे धीरे वह सिकुड़ता गया। वजह यह है कि सीमावर्ती राज्यों पर आक्रमण होते रहे पर उनको अपने पीछे के क्षेत्रों से सहयोग न मिलने के कारण हारना पड़ा। इतिहास में इस बारे में बहुत सारे तथ्य दर्ज हैं। अंधविश्वास,कुप्रथाओं और अहंकार में फंसे हिंदू समाज के विभिन्न उपसमूहों में बंटे लोगों और उनके राजाओं ने कभी भी ईमानदारी से विचाराधारा और प्रजा की रक्षा का विचार ही नहीं किया। अपनी राज्य की सीमाओं को अंतिम और अखंड होने के अहंकार ने इस देश के पहले विदेशी आक्रमणकारियों और अब विचाराधाराओं के जाल में फंसा दिया। दो हजार वर्ष तक यह देश गुलाम रहा इस बात को भुलाया नहीं जा सकता।

स्वतंत्रता के बाद विदेशों से आयातित विचारधाराआों की आलोचना या समर्थन में समय नष्ट किया गया जिससे कुछ हाथ नहीं आना था न आया। सत्य यही है कि भौतिकतावाद से उपजे तनाव से बचने के लिये केवल शक्ति ‘भारतीय अध्यात्म ज्ञान’ में ही है। जिसका मूल मंत्र यही है कि प्रातः उठकर योगासन, प्राणायम,ध्यान और प्रार्थना के द्वारा अपने तन,मन और विचार के विकार बाहर निकालकर फिर नया दिन प्रारंभ किया जाये।
भारतीय अध्यात्म की सबसे बड़ी शक्ति ध्यान है। कुछ धार्मिक लोगों ने मूर्तिपूजा का विस्तार किया क्योंकि एक सामान्य आदमी के लिये एकदम ध्यान लगाना कठिन होता है। इसलिये किसी स्वरूप को मन में स्थापित कर उसकी आराधना करने से भी ध्यान का लाभ मिल सकता है। दरअसल ध्यान से आशय यह है कि अपने दिन प्रतिदिन के दैहिक कार्य से हटकर उसे कही अन्यत्र लगाया जाये। इसी मूर्तिपूजा का विरोध अन्य विचारधारा के लोगों ने ही नहीं बल्कि अनेक हिंदू भी करते हैं पर वह इसका महत्व नहीं समझते। विदेशी विचाराधारा से ओतप्रोत लोग भटकाव की स्थिति में दो ही मार्ग ढूंढते हैं-आत्म हत्या या दूसरे की हत्या। जबकि भारतीय निराशा की स्थिति में मंदिर की राह लेते हैं। हमारे देश में अपने अध्यात्म से दूर होने का कारण यहां भी हिंसा का प्रभाव बढ़ रहा है।

बहुत लंबे समय तक भारत के बाहर के हिंदूओं ने प्रतीक्षा की है कि वह भारत में रह रहे हिंदुओं से नैतिक समर्थन प्राप्त करें पर वह शायद नहीं मिल पाया। दूसरा यह है कि हम भारतीय हिंदूओं इस बात को समझ लें कि हमारी शक्ति धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि अध्यात्मिक ज्ञान है जिस पर अभी तक केवल हम अपना ही अधिकार सकझते हैं। अब वह विश्व में फैल रहा हैं। भारतीय योग परंपरा और श्रीगीता के बारे में अब पूरा विश्व जान चुका है। संत कबीर जी के संदेशों से विदेशी भी प्रभावित हैं-यहां याद रहे कि संत कबीर ने सभी प्रकार के धार्मिक अंधविश्वासों का विरोध किया और किसी भी धर्म को उन्होंने बख्शा नहीं।

देश में अधिक आबादी होने के कारण अतिविश्वास के कारण हम भारतीय हिंदू उस अध्यात्म ज्ञान को जानते हैंे पर जीवन में धारण करने से कतराते हैं। जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं वह इस ज्ञान का मतलब जानते हैं। अनेक भारतीय भी जो विदेशों मेेंं बहुत समय से रह रहे हैं वह भी इस बात को समझते हैं। यह अलग बात है कि उनके इसी भाव का दोहने अपने आर्थिक लाभ के लिये कथित साधु और संत करते हैं। ऐसे में विदेशी हिंदू अगर अपनी अलग धारा में बह रहे हैं तो एक उम्मीद तो बंधती है कि वह भी भारतीय अध्यात्म के हिमालय से निकल रही है। जहां ऐसी जगह पर भारतीय हिंदू हैं उनका मार्गदर्शन करना चाहिये। भारतीय अध्यात्म ज्ञान न तो गूढ़ हैं न ही व्यापक जैसा कि कुछ धार्मिक विद्वान कहते हैं। बस वह एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलकर देखा जा सकता है। भारतीय ज्ञान को गूढ या व्यापक कहना कुछ ऐसा ही है कि जैसे आप आगरा में खड़े होकर कहें कि मुझे दिल्ली जाना है क्योंंकि मुंबई दूर है या आप नासिक में खड़े होकर कहें कि मुझे मुंबई जाना है क्योंकि दिल्ली दूर है। ऐसे ही सत्य और माया के दो मार्ग हैं और सत्य का ज्ञान इतना दूर नहीं है जितना मायावी दूनियां की चाहत रखने वाले कथित संत और साधु कहते हैं।
अगर अफगानी लोगों ने लिख दिया है कि ‘अफगानी हिंदू मंदिर तो वह उसे शायद ही बदलें। इस धारा का बहना दिलचस्प भी है और इस बात का प्रमाण भी कि अब अन्य देशों में हिंदू भी खड़े होकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान की रक्षा करेंगे। ऐसे में भारतीय हिंदूओं को उनका हौंसला बढ़ाना ही चाहिये। आखिर वह निकली तो भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान रूपी हिमालय से ही तो है।
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8/1/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (3)

धर्म क्या है? शायद कई लोग नहीं बता पायेंगे? अनेक युद्ध धर्म के नाम पर हुए पर किस धर्म के लिये। महाभारत युद्ध किस धर्म की रक्षा के लिये लड़ा गया था? इस पर अनेक व्याख्यायें मिल जायेंगी। वर्तमान में लोग अनेम धर्मों के नाम बताने लगेंगे-जो कि केवल भ्रम है। धर्म वह है जो मनुष्य द्वारा धारण किया जाता है। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि मनुष्य द्वारा अपनी इस देह धारण करने के बाद जो कर्तव्य अपने लिये स्वयं या स्वाभाविक रूप से स्वतः निर्धारित हो जाते हैं वही धर्म है कि न कर्मकांडों का निर्वहन जैसा प्रचारित किया जाता है। एक व्यक्ति के रूप में मनुष्य द्वारा स्वीकार यह स्वतः निर्धारित कर्तव्य या धर्म कई प्रकार का हो सकता है। एक पुरुष के लिये पिता,पुत्र,पति, भ्राता,मित्र तथा अन्य संबंधों के निर्वाह के लिये कर्तव्य का निर्वहन ही धर्म है। एक स्त्री के लिये माता, पुत्री,बहिन, पत्नी तथा अन्य रूप में कर्तव्य निर्वहन करना ही धर्म का स्वरूप कहा जा सकता है।

महाभारत युद्ध की बात करें तो देखा जाये सभी पक्ष कर्तव्य विमुख हो रहे थे। जिसका चर्म रूप था द्रोपदी का चीरहरण। महाभारत काल में परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह न करना ही अधर्म कहा गया है। धर्म की कोई अन्य संज्ञा वहां नहीं दिखाई देती-आशय यह है कि धर्म का कोई एक नाम नहीं है। भगवान श्रीराम ने भी धर्म की रक्षा के लिये ही युद्ध किये पर किसी धर्म विशेष का नाम रामायण मे भीं नहीं आता। रावण का विधर्मी इसलिये कहा जाता है कि वह अपनी शक्ति के अहंकार में इतना मतवाला हो रहा था कि यज्ञ और हवन करने वाले ऋषियों पर हमले कर उनका सहंार करता था। वह स्वयं भी भगवान शिव का उपासक था पर अन्य देवों के उपासकों पर हमले करने की प्रवृत्ति के कारण वह अधर्मी करार दिया गया। यहंा विचाराधाराओं का वैसा ही द्वंद्व दिखाई देता है जैसा आजकल हो रहा है। एक तरह वह स्वयं भगवान शिव की भक्ति कर रावण ने वरदान प्राप्त किया पर उसे अन्य लोगों द्वारा यज्ञ हवन और अन्य तरीके से पूजा करना सहन नहीं था। उसने उन पर हमला किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अन्य देवों की उपासना हो। भगवान श्रीराम ने उसके अनेक राक्षसों को सीताहरण से पहले ही मार गिराया था और वह भी इसलिये क्योंकि वह दूसरों की पूजा विधि विधाने को रोकने का प्रयास कर रहे थे। इसका आशय यह नहीं है कि भगवान श्रीराम को उसके इष्ट भगवान शिव की उपासना से कोई द्वेष था बल्कि वह स्वयं ही भगवान शिव का सम्मान करते थे। तात्पर्य यह है कि धर्म का रूप यह भी कि कोई किसी की भी उपासना करे पर दूसरे के पूजा विधान से द्वेष न करे।

वर्तमान में जो प्रचलित धर्म हैं उनमें भी वह सब बातें हैं जो सदियों से कही जाती हैं पर उनको नाम दिये गये हैं ताकि उसे एक छत बनाकर लोगों की भीड़ वहां एकत्रित कर उनका आर्थिक और राजनीतिक दोहन किया जा सके। आम आदमी के पास इतना समय नहीं होता कि वह बड़े राजनीतिक ग्रंथ पढ़कर उनका अर्थ समझ सके इसलिये सभी धर्मों में कथित बिचोलिये हैं जो इन किताबों से पढ़कर उनके बारे में लोगों को बताते हैं। इनमें भी कर्मकांडों का वह भाग सुनाकर उसका अनुकरण इसलिये कराया जाता है कि ताकि वह एक समूह में रह सके और दूसरे समूह से अलग दिखें। जब कोई बड़ी वारदात होती है तो आपने सफाई सुनी होगी कि सभी धर्म प्रेम, दया, और अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है, आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, आतंकवादी की कोई जाति नहीं होती, उसकी कोई भाषा नहीं होती, आदि आदि। इसे आप उन समूहों के शीर्षस्थ लोगों की चालाकी भी कह सकते हैं जो वारदात के बाद उनको अपने समूहों या समाजों के बारे में अच्छा कहने का अवसर मिल जाता है।

सच तो यह है कि धारण किया जाने वाले धर्म का कोई नाम नहीं होता क्योंकि वह कर्तव्य के रूप में देह के साथ जुड़ा रहता है और जिसका नाम लेते हैं वह केवल एक भ्रम के अन्य कुछ भी नहीं है।

‘आध्यात्म अपने अंतर्मन की यात्रा है’ अनुरक्ति ब्लाग के ललित मोहन त्रिवेदी ने यही पिछले लेख में अपनी टिप्पणी करते हुए लिखा था। यह यात्रा बहुत सरल भी है और कठिन भी। कठिन यह तय करना है कि हम अपने अंतर्मन की यात्रा करें या नहीं और जब करने निकलें तो फिर बाहर के झंझटों से आदमी स्वतः परे हो जाता है। वह अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होता पर उनका तनाव अपने ऊपर नहीं आने देता। समय के अुनसार अपना धर्म निभाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाले का मन अपने निंयत्रण में रहता है इसलिये उसको कोई भटका नहीं सकता पर जिनको नहीं हैं वह अपने समाजों और समूहों के शीर्षस्थ लोगों को आव्हान पर चाहे जो करने को तैयार हो जाते हैंं। किसी भी धर्म में अध्यात्म ज्ञान का प्रावधान नहीं है। प्रेम, अहिंसा, और दया के उपदेश तो सभी में दिया गया है पर साथ ही अपनी सांसरिक परेशानियों में सर्वशक्तिमान को याद करने की सलाह भी दी जाती है। काम सिद्ध हो जाये तो उसका धन्यवाद नहीं हो तो कह देते हैं उसकी मर्जी पर किसका बस चलता हैं यह मनुष्य को मानसिक रूप से पंगु करने का प्रयास है जिसमें सभी धर्मों के प्रचारक सफल रहते हैं और इस संसार में धार्मिक कहलाकर अपनी पूजा कराते हैं। इसलिये भारतीय अध्यात्म विश्व में सभी जगह स्वीकार किया जा रहा है क्योंकि वह जीवन और सृष्टि के रहस्यों के ज्ञान से भरा पड़ा है-याद रखें भारतीय अध्यात्म में भी किसी भी धर्म का नाम नहीं दिया गया है न ही कर्मकांडों को ही सर्वोपरि बताया गया है। उनका सारांश यही है कि जीवन को सहज भाव से जीते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करो यही धर्म है और इसका ज्ञान ही अध्यात्म है। शेष फिर कभी
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7/16/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (2)

अध्यात्मिक ज्ञान जिस व्यक्ति को होता है उसका मानसिक तथा बौद्धिक शोषण कतई नहीं किया जा सकता है। अध्यात्म ज्ञान कोई अधिक व्यापक नहीं है पर उसका अर्थ समझकर उसे धारण करना बहुत कठिन है। वैसे एक बात स्पष्ट है कि समस्त धार्मिक विचाराधाराऐं अध्यात्मिक ज्ञान के आधार को ही मजबूत करने का दावा करती हैं पर वह उसमें अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषय इस तरह जोड़ दिये गये हैं कि सामान्य मनुष्य भ्रमित हो जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान जो कि सत्य का साक्षी है उसकी चर्चा तो पूरे विश्व में होती है पर उसका अध्ययन, चिंतन और मनन कितने लोग करते हैं और उसमें भी कितने उसे धारण कर पाते हैं? यह अलग चर्चा का विषय है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार करने वाले कथित संतों ने अनेक प्रकार की चमत्करिक कहानियां तथा सांसरिक विषय उसमें इस तरह जोड़े हैं कि उसका मूल स्वरूप ही किसी की समझ में नहीं आता।

भारत में अध्यात्मिक ज्ञान का दावा रखने वाले तो बहुत मिल जायेंगे पर उसके सूक्ष्म रूप का किसी को पता नहीं है। अपने व्यवसाय, नौकरी तथा खेती से निराश होने पर अक्सर लोग कहते हैं कि ‘हमारा काम हैं कर्म करना और फल देना तो परमात्मा का का है।’ सुनने में यह कितना अच्छा लगता है। कहने वाले तो यही कहेंगे कि यह श्रीगीता में ऐसा ही कहा गया है।
श्रीगीता में केवल कर्म की बात नहीं कही गयी बल्कि निष्काम कर्म की बात कही गयी है। जब कोई कहता है कि ‘हमने अपना काम किया और फल देना तो परमात्मा का काम है’ तो यह उसके निष्काम होने का प्रमाण नहीं है क्योंकि अपने कर्म के साथ कहीं न कहीं उसके फल पाने की इच्छा प्रकट होती है।’

पहले तो कर्म का फल का स्वरूप ही समझ में आना चाहिये तभी तो आदमी निष्काम भाव से कार्य कर सकता है। दरअसल निष्काम भाव से कर्म करना ही जीवन से विषादों से मुक्ति दिलाने का उपाय है और लोग निष्काम भाव से काम न करें इसलिये उनको उसका उपदेश दिया जाता है पर प्रेरित तो उस सांसरिक फल के लिये ही किया जाता है जो उनके जीवन और विचारों को सीमित दायरों में बांध देता है। वह सांसरिक पदार्थों की फल समझते हैं जिनका उपयोग भी वह यही करते हैं। अगर कोई मनुष्य नौकरी कर रहा है तो उसका वेतन, व्यवसायी है तो उसका लाभ और मजदूर है तो उसकी मजदूरी क्या फल है? नहीं अगर यह फल है तो फिर वह इसका उपयोग वह अकेला कहां करता है? मनुष्य द्वारा भौतिक मुद्रा अर्जित करना फल नहीं है क्योंकि वह उसे भी तो अपने तथा परिवार के ऊपर ही व्यय करता है। कोई अपने बच्चे की फीस भर रहा है तो कोई अपनी पत्नी का इलाज करा रहा है तो कोई मकान बनवा रहा है। कोई अपने पिता को दे रहा है तो कोई माता को दे रहा है। कभी भाई की मदद कर रहा है। भला इस धनोपब्धि को फल कैसे कहा जाता है। जब वह अपने हाथ से कहीं से धन लेता है तो वह फल नहीं बल्कि अपने कर्तव्यों और दायित्वों के निर्वाह के लिये लेता है। यह धन लेना उसका कर्तव्य है न कि फल! धन प्राप्त करना आपका कर्म है और व्यय करना भी-उसे फल कैसे कहा जा सकता है।

दूसरी बात तो छोडिये जो दुनियां भर का ज्ञान बघार रहे हैं वह भी इसमें से अपने लिये दान मांगते हैं और बताते हैं कि यह आपकी धार्मिक जिम्मेदारी है। सीधा आशय यह है कि आपने जो धन कमाया वह तो आपके कर्म का दायित्व बढ़ाता है और आप उसे कहीं अन्य व्यय कर अपना कर्तव्य निबाहते हैं। जब तक देह है उसे बनाये रखने के लिये व्यय करते हैं पर यह तो हमारा कर्म है। यह फल कहां से कहा जा सकता है?

सवाल यह है कि फिर फल क्या है? फल है हम अपने जीवन में शांति से रह पायें और जब देह त्याग करने का समय आये तो शांति और संतोष के साथ मोक्ष प्राप्त करें। यही असली फल है जिसकी तरफ ले जाने की ताकत केवल भारतीय अध्यात्म के ज्ञान में ही हैं। पहले उस सांसरिक फल का स्वरूप भी समझ लें। अगर हमने किसी से माह भर कार्य करने, अथवा वस्तु बेचने या मजदूरी करने पर किसी से धन मांगा तो क्या वह फल मांगना है। नहीं! यह तो उसे अपने सांसरिक कर्तव्य का निर्वाह करने के लिये प्रेरित करने का प्रयास है जिससे हम अपने आगे के कर्तव्य का निर्वाह कर सकें। मतलब यह कि अगर कोई अध्यात्म का ज्ञान रखता है तो वह अपने कर्तव्य निर्वाह के लिये धन प्राप्त करना फल नहीं बल्कि कर्तव्य ही हैै। यह अलग बात है कि जिन लोगों को पैसा देना नहीं होता वह कह देते हैं-‘क्या, तुम ज्ञानी होकर पैसा मांगते हो।’ याद रखना अध्यात्म का ज्ञान होने का आशय यह कदापि नहीं कि आदमी सांसरिक विषयों को त्याग कर भागने की तैयारी कर ले। एक सामान्य व्यक्ति और अध्यात्मिक ज्ञानी व्यक्ति के बस दृष्टिकोण में अंतर होता है। सामान्य व्यक्ति अपनी धनोपब्धि पर ही प्रसन्न होकर रह जाता है तो उसके जाने पर उसे भारी कष्ट होता है। इसके विपरीत अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला धन मिलने पर उसे फल मानते हुए उसमें लिप्त नहीं होता। सामान्य व्यक्ति एक के बाद दूसरी और दूसरी उपलब्धि के पीछे भागता है और अपने पूरे जीवन में शांति से नहीं बैठ पाता और न मनुष्य देह का सुख उठा पाता है जबकि ज्ञानी अपने लिये शांति से जीने के पल जुटा लेता है और फिर दृष्टा की तरह इस संसार में मानव देह होने का वह आनंद भी उठाता है।

अगर आप देखें तो सारे धर्म तमाम तरह के कर्मकांड प्रतिपादित करते हैं जिनका निर्वाह उसी धनोपलब्धि से किया जा सकता है जो हमने प्राप्त की है। सभी धर्मों के गुरू उसी धन पर अपनी नजरें गड़ाये हुए स्वर्ग में टिकिट रिजर्वेशन करने की गारंटी अपने भक्तो को देते हैं। उनका संदेश तो यही होता है कि ‘ला! माल ला! और ले जा स्वर्ग का टिकिट!

सभी आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि ‘देने वाला तो वही है’, ‘उसकी इच्छा के बिना यहां कुछ भी नहीं हो सकता’ और सभी के मन की इच्छा वही पूरी करता है’। ऐसा कहकर वह सांसरिक उपलब्धियोें को ही फल बताते हैं। कुल मिलाकर सभी धर्मों के कर्मकांड पैसा खर्च कर फल दिलाने के सिद्धांत पर आधारित हैं। जबकि भारतीय अध्यात्म बिना किसी सांसरिक फल के योग साधना और प्राणायम कर देह और मन के विकार दूर करने तथा ध्यान और प्रार्थना के आधार शांति का वह फल दिलाने वह ज्ञान है जो देह रहते और बाद में भी आदमी को संतोष प्रदान करता है। समस्या है गुरू की। श्रीगीता में भी गुरू का गुणगान है जिसका सबसे अधिक प्रचार वह कथित संत करते हैं जिन्होंने गीता के ज्ञान को समझा नहीं पर स्वयं गुरू बनने की लालसा में वह अपने भक्तों को वह अवश्य बताते हैं। अपने भक्तों का अध्यात्म का ज्ञान वह कभी नहीं देते। हां, अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषयों में उलझा कर अपनी भक्त का हृदय फिर उसी सांसरिक दलदल में फंसा देते हैं जहां वह कमल की तरह खिलने की इच्छा रहकर आता है। यह केवल भारतीय धर्मगुरूओं का ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में यही हाल है। धर्म के नाम शोषण केवल इसलिये हो रहा है क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान को सभी दबाये रखना चाहते है ताकि उसके मूल स्वरूप से लोग अवगत न हों।
श्रीगीता में अध्यात्म का जो ज्ञान है वह अनुपम है पर उसे कथित साधु संत अपने हिसाब से व्याख्या इस तरह करते हैं कि वह स्वयं ही अपने भक्तों में भगवान के रूप में स्थापित रहें। अब यह उनकी चालाकी भी हो सकती है या ऐसा भी कि वह स्वयं ही उस ज्ञान को धारण नहीं कर पाते और अपनी यही कमी छिपाने के लिये तमाम तरह के चुटकुले, कहानियां तथा सांसरिक विषयों की प्रधानता पर ही अधिक प्रवचन करते हैं। शेष अगले अंक में

6/1/08

समाज का भ्रामक विभाजन स्वीकार्य नहीं-आलेख

विश्व में आतंकवाद एक ऐसे भ्रम की उपज है जिस पर बहुत बड़ी बहस करने के बाद भी कोई निर्णय नहीं निकल सकता। मैं दूसरे धर्मों के बारे में जानता हूं पर उस लिखता नहीं। वजह मैंने अपने ऊपर ही एक अघोषित सेंसरशिप लगा रखी। मुझे यह भी लगता है कि इस तरह विवाद खड़े कर हम अपने समाज को किसी नयी दिशा में नहीं ले जा सकते। मैं अक्सर अपने धर्म में व्याप्त अंधविश्वास, और रूढि़वादिता के प्रतिवाद में लिखता हूं। मेरे कुछ साथी और मित्र ब्लाग लेखक भी इस पर समय समय पर कड़ी टिप्पणियां करते हैं। मैं जब अपने धर्म में व्याप्त कुरीतियां पर लिखता हूं तो कोई उस पर उंगली नहीं उठाता क्योंकि सभी जानते हैं कि मैं अपने ही भारतीय अध्यात्म के सकारात्मक पक्ष पर भी नियमित रूप से लिखता हूं। हां, सभी ब्लाग लेखक स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म में व्याप्त बुराईयों और पाखंडों को उजागर करते हुए खूब लिखते हैं पर उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति जो निष्ठा है वह भी बता देते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वह मेरी तरह ही उसके सकारात्मक पक्ष पर भी नियमित रूप से लिखें पर उनके लिखे से मेरे अंदर यह विश्वास पैदा होता है कि मेरे जैसे विचार रखने वाले अन्य लोग भी है।
यहां इस देश में हिंदू धर्म को लेकर आलोचना करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है तो सकारात्मक पक्ष पर भी हर कोई लिख सकता है। यह अलग बात है कि भारतीय अध्यात्म को हिंदू धर्म के नाम पर अनदेखा किया जाता है पर सत्य के निकट जितना यह है उसे वही समझ सकता है जो इसका अध्ययन करता है। आधुनिक हिंदी साहित्य में भक्ति काल तो संपूर्ण रूप से इसी अध्यात्म के रहस्यों को उजागर करने के साथ ही जीवन के लिऐ ऐसे संदेश देता है जो अन्यत्र किसी अन्य भाषा में हों यह संभव है ही नहीं। संत कबीर और कविवर रहीम के बारे मेंे अधिक लिखना सूरज को दीपक दिखाना है। अपनी अल्प बुद्धि और मासूम विवेक के साथ जब मैं वर्तमान संदर्भ में व्याख्या रखता हूं तो टिप्पणी करने वाले लिख जाते है कि ‘ताज्जुब है आप वर्तमान संदर्भों में भी इसकी व्याख्या ऐसी करते हैं कि जब यह लिखे गये होंगे तब लिखने और कहने वालों ने सोचा भी नहीं होगा कि आगे कभी ऐसी व्याख्या होगी।‘

यह लेख मैं अपनी आत्म प्रंवचना में नहीं लिख रहा हूं। मेरा आशय यह है कि हम अपने हिंदू धर्म में तमाम तर्क वितर्कों की गुंजायश रखते हैं। इसका लाभ उठाकर कई लोग केवल इसके नकारात्मक स्परूप को सामने दिखाकर दूसरे लोगों के सामने अपने उदार होने का प्रमाण प्रस्तुत करते है। कई लोग अपने समाज में सुधार की दृष्टि से निष्काम भाव से कार्य करते हुए अपने ही अंधविश्वासों और रूढि़वादियों को उजाकर करते हुए उनसे लोगों को दूर रखने के लिये आग्रह के साथ लिखते और बोलते हैं। यानि हम अपने धर्म में जो आडम्बर है उसको उजागर करने में कोताही नहीं करते। इतना ही नही मैं तो यह भी कहता हूं कि हमारे धर्मग्रंथों में कुछ ऐसे वाक्य हैं जो अब अप्रासंगिक हो गये हैं तो समाज भी अब उसे स्वतः नहीं अपनाता पर इसका आशय यह नहीं कि उन धर्मग्रंथों के सारे वाक्य ही गलत हैं। मनृस्मृति में और कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर तमाम लोग आक्षेप करते हैं पर मैंने उनके सार्थक वाक्य यहां रखे हैं और किसी ने उनको चुनौती नहीं दी है। हमारे देश के अध्यात्म के समय के साथ सकारात्मक परिवर्तन स्वीकार करने की गुंजायश है। श्रीगीता में ज्ञान और विज्ञान दोनों में मनुष्य को पारंगत होने का संदेश दिया गया है। सत्य के ज्ञान के कोई बदलाव हो नहीं सकता पर माया के विज्ञान का स्वरूप परिवर्तन शील है और उनको स्वीकार करते हुए आगे हमार समाज बढ़ता जाता है।

मैंने कहा था कि मुझे सिर्फ अपने धर्म पर ही विचार करने का अधिकार है-यह मैं स्वतः मानता हूं। उनकी अच्छाईयों और बुराईयों पर बहस से भी नहीं डरता। एक सवाल जो मुझे परेशान करता है कि अन्य धर्मों में क्या कोई बात विवादास्पद नहीं हैं? क्या उनमें अंधविश्वास, रूढि़वादिता और पाखंड नहीं हैं। क्या उनके सभी धार्मिक गुरू निर्विवाद हैं? क्या उनमें लिखे गये सभी वाक्य सिद्ध वाक्य हैं जो उनके प्रतिवाद के रूप में उनके मतावलंबी लेखक कुछ लिखते ही नहीं?
जहां तक मैंने अनेक धर्मों का अध्ययन किया है उसके बारे में मेरी राय है पर अन्य धर्मों पर टिप्पणी करने का अर्थ है कि अनावश्यक विवादों में फंसना। अगर कुछ कहूंगा तो वह धर्मग्रंथों से दो चार विवादस्पद श्लोक या आधुनिक हिंदी साहित्य से एक-दो दोहा उठाकर सुनायेंगे जिनको हम कई वर्षों से सुनते आ रहे है। मैंने आज तक किसी भी अन्य धर्म पर उस समुदाय के लेखकों द्वारा लिखी गयी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं पढ़ी। संभव है कि दूसरे धर्मों में ऐसी बहस की गुंजायश नहीं हो या फिर उसके लेखकों के मन में अपने धर्म के प्रति वैसी ही संवेदनशीलता न हो जैसी कि हिंदी समुदाय के लेखक के मन में होती है। इसलिये अधिकतर हिंदू लेखक लिखते हुए कभी न कभी अपने धर्म पर लिख जरूर जाते हैं भले ही वह उसमें आडम्बर और रूढि़यों के प्रतिवाद करते हों। यहां हिंदू लेखक कहते हुए मेरे मन में जो वितृष्णा आई उसे मैं बयान नहीं कर सकता पर विषय के प्रवर्तन में अस्पष्टता न रहे इसलिये मुझे ऐसा करना पड़ा। इसके पीछे मेरे मन में एक विचार आता है और मुझे लगता है कि थोड़ी देर के लिये यह विभाजन कर मैं यह बताना चाहता हूं कि भारत में अन्य धर्मों को मानने वाले लोग आपस में ही एकमत नहीं हैं कि वह हिंदू कहलाने में हिचक महसूस करें या नहीं। एक विवादास्पद गैर हिंदू विद्वान को मैंने कहते हुए सुना है कि अगर आप इस देश को हिंदुस्तान कहते हैं तो हम भी हिंदू हैं और हमें संकोच नहीं है पर अगर आप धर्म की बात करते हैं तो हम हिंदू नहीं है। उनका आशय यह है कि इस जमीन पर पैदा होने और किसी मत को मानने के विषय अलग-अलग है।

यहां अब मैं सभी लेखकों एक ही स्थान पर खड़ा करता हूं। भारत की अपने एक संस्कृति है और भारतीय अध्यात्म केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं है। भारतीय संस्कृति और अध्यात्म उत्तरोतर समृद्धि होते जाते हैं। यहां तक कि भगवान के अवतारों के समक्ष कुछ संतो ने अपनी ख्याति अर्जित की है। धर्मग्रंथों में भगवान के अनुसार‘मेरे भक्त मेरे से भी बडे+ हैं’-यही कारण है कि तुलसी दास, सूरदास, मीरा, कबीर, रविदास, रहीम, रसखान तथा अन्य अनेक विद्वानों को भी भारतीय अध्यात्म का भाग माना गया है-अन्य धर्मों के अनेक संतों और मनीषियांे को भी भारतीय अध्यात्म से संबंधित विषयों पर प्रकाशित पत्रिकाओं में स्थान दिया जाता है।
वर्तमान समय में आधुनिक हिंदी में रचे बसे सभी धर्म के लेखकों के लिए यह संभव नहीं है कि वह भारतीय अध्यात्म से अलग हटकर कुछ देख पाते-जिन्होंने इन महान रचनाकारों को पढ़ा वह भला और क्या पढ़ पाते? यहां हम कई ऐसे लेखकों को देख सकते हैं जो हिंदू परिवार से न होने के बावजूद भारतीय अध्यात्म में अटूट निष्ठा रखते हैं। क्या दिलचस्प बात नहीं है कि भारतीय अध्यात्म के प्रमुख आधार श्रीगीता ग्रंथ को तो अन्य धर्मों के मतावलंबी भी चुनौती नहीं दे पाते। भारतीय अध्यात्म से सराबोर सभी हैं चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़े हैं और इसलिये इस देश में किसी भी दूसरे धर्म की आलोचना सुनने को नहीं मिलती। और दूसरे देशों में धर्म के प्रति इतनी संवदेनाएं नहीं है कि इस पर लिखकर लेखक अपना समय नष्ट करना चाहें। इसी संवदेनशीलता का यह परिणाम भी होता है यहां कुछ तत्व लोगों को बांटकर अपना हित साधते हैं। मुश्किल यह है कि अन्य धर्मों के लोग भी कहीं न कहीं भारतीय अध्यात्म में सराबोर है इसलिये अपने धर्म के दोषों पर दृष्टिपात नहीं कर पाते।

एक दिलचस्प वाक्या है। मैं सुबह अध्यात्म रूप से अपनी बात कह देता हूं पर शाम को अपनी हास्य कविताओं में बिना किसी धर्म का नाम लिये आक्षेप करता हूं। शूरूआती दौर मे एक सज्जन ने मुझे लिखा कि आप अपने धर्म पर व्यंग्यात्मक प्रहार करने वाली बात लिख रहे है किसी अन्य के मत पर लिखकर बताईये। मुझे उस पर हंसी आर्यी। तब मैंने सभी धर्मों को एक ही मानने वाले शब्द अपने पाठों में अपनाना शूरू किये सर्वशक्तिमान, दरबार, सेवक, पवित्र पुस्तक और भक्त। इसका आशय यह है कि मैं सभी को एक ही पलड़े में रखता हूं। फिर हमारे देश में अच्छा लेखक वही माना जाता है जो व्यंजना विधा में रखता है।

मेरे मन में कभी भेद नहीं आता। भेदात्मक बुद्धि तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है। अंतर्जाल पर तो जो ब्लाग लेखक ऐसे भेद करता है उसे मैं मूर्ख ही कहूंगा। एक तो यहां छद्म नाम की संभावना भी लगती है। दूसरे करीब-करीब सभी धर्मों के टिप्पणीकार मेरे ब्लाग पर आ चुके हैं। उनकी टिप्पणियों से निष्कर्ष यह है कि उनके शब्द किसी धर्म के परिचायक नहीं होते और प्रेम, मित्रता और सदभावना में इतनी गहराई होती है कि...................मुझे कोई शब्द नहीं मिलता कि मैं उसके लिए कोई पैमाना लिख सकूं।

मैं यहां पांच नाम लिखना चाहता था जो अपनी टिप्पणियां इतने प्रेम से रखते हैं कि मेरा मन पुलकित हो जाता है और तब होता है मेरे मन में ऐसा भाव जो मुझे धर्म, जात, भाषा और क्षेत्रीय भावना से दूर ले जाता है, परंतु उनके नाम लिखने से मुझे ही अपनी बुद्धि में भेद दिखाई देता। मैं समाज को विभाजित करने वाले शब्दों से हालांकि दूर रहता ही हूं और खुलकर कहता हूं कि यह विभाजन भ्रामक है। हां, लिखने के लिये अपना विषय स्पष्ट करने के लिये इस विभाजन का नक्शा पाठकों के सामने रखना पड़ता है पर मैं अपने पाठ का वाहन कभी इस नक्शे पर नहीं चलाता। मैं अकेला ब्लाग लेखक हूं जो कहता हूं कि सभी ब्लाग लेखक और पाठक एक जैसे ही मुझे लगते हैं और समाज के भ्रामक विभाजन वाले शब्दों की संज्ञा उन पर लागू नहीं होती। वह स्वयं मुझसे कहें तब भी उनको बता सकता हूं कि वह गलत है। शेष फिर कभी।

4/4/08

मनुस्मृति:सड़ी-गली और कम तौल कर वस्तु न बेचें

नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमर्हति
न चासारं न च नयूनं न दूरेण तिराहितम्


एक वस्तु के स्थान पर दूसरी, सड़ी गली, तोल में कम, परे से ठीक दिखने वाली पर खराब तथा ढकी हुई वस्तु नहीं बेचना चाहिए। जिस समय ग्राहक को वस्तु बेची जाये तो उसे उसकी वास्तविकता बता देना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस घोर कलियुग में तो व्यापार मेंे कदम-कदम पर धोखे हो रहे हैं। अब तो यह इतना खुलेआम होने लगा कि यह कहना कठिन है कि व्यापार में अब ईमानदारी नाम की भी रह गयी है। धोखाधड़ी को चतुराई और लुट को लोग व्यापार कहने लगे हैं। व्यापारी तो अब सब हो गये है-यहां तक कि साधू संत भी अपनी चीजें बेच रहे हैं और आश्रमों के नाम पर फाइव स्टार होटल बना रहे हैं। धर्म का केवल नाम रह गया है। उसमें भी तमाम तरह की धोखाधड़ी हो रही है। इस पर छोटे लोगों की क्या कहें बड़े-बड़े व्यापारी भी वह सब कर रहे हैं जिसे हमारे धर्मशास्त्रों ने वर्जित किया है। हालत यह है कि इधर ग्राहक से पैसे एंेठते हैं उधर तमाम तरह के दान देकर आयकर से छूट लेते हैं। सच तो यह है कि मनुस्मृति को शायद इसलिये प्रचलन से बाहर कर दिया गया है कि वह कई तरह के कटु सत्य दिखाते हुए आदमी की सही राह पर चलने के लिये प्रेरित करती है।

मनु स्मृति में मनुष्यों में सात्विकता का भाव स्थापित किया गया है। उसमें जीवन के हर पहलु पर विचार प्रकट किया गया है। व्यापार में नैतिकता की बात करने वाली इस पुस्तक में ग्राहक को न ठगने की हिदायत दी गयी है जबकि आजकल अनेक तरह के विज्ञापन धार्मिक स्थानों पर ऐसेी वस्तुओं के लिये भी किये जाते है जो वास्तव में वैसी नहीं होती जैसी की प्रचारित की जाता है। हम भारतवासी बहुत भावुक होते हैं और साधुसंतो पर विश्वास करते है। इसलिये कई तरह के ठगने वाले व्यापार उनकी आड़ में भी हो रहे है।

इसके बावजूद हमें अपने आचरण पर दृष्टि डालनी चाहिए और अगर हम व्यापार कर रहे हैं या सेवा कर रहे हैं तब हमें नैतिकता का पालन करना चाहिए।

1/18/08

धर्म बेचने वालों का नारा है "अहंकार छोड़ दो"(सर्वशक्तिमान-२)

धर्म बेचने वालों का नारा है अंहकार छोड़ दो. उनकी बात सुनकर लोग खुश हो जाते हैं. पांच तत्वों से बनी इस देह में मन बुद्धि और अहंकार ही वह तत्व हैं जिनके हर जीव इस धरती पर विचरण करता है.आपने कुछ ऐसे लोग देखने होंगे जो पागल होते हैं. आप उनसे कुछ भी कहें पर वह आपकी बात पर ध्यान नहीं देंगे. मन उनके पास भी है और बुद्धि भी पर नहीं है तो अहंकार. वह खाते-पीते हैं और बात करते हुए मुस्कराते हैं पर फिर खामोश भी हो जाते हैं. उनके पास अपने मनुष्य होने का अहंकार नहीं है और वह निरीह हो जाते हैं और हर कोई उन पर तरस खाता है.

कई बार आपने देखा होगा ऊंचे मंचों पर बैठे साधू-संत अपने भक्तों से कहते हैं''अहंकार छोड़ दो". आर फिर मुस्कराते हुए लोगों की तरफ देखते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा राज उजागर किया है. लोग भी खुश हो जाते हैं कि उन्होने कोई बडे रहस्य से पर्दा उठाया है. उनका धर्म बेचना व्यवसाय है यह बात जानते हुए भी उसे धारण नहीं कर पाते और उनके पास जाते हैं वजह मन हो गया खाली और बुद्धि से काम लेना नहीं है तो अहंकार है कहाँ जो वह आत्ममंथन करे. विचार करे कि इस देह से अहंकार कभी जा नहीं सकता. निरंकार की उपासना करने की जा सकते हैं पर निरंकार रहा नहीं जा सकता.

मंच पर बैठ संत जो बोलते हैं और उसके बाद क्या होते हैं यह कई लोग जानते हैं. अभी जब सात बाबा रंगे हाथों काले धन को सफ़ेद बनाते हुए पकडे गए थे उनमें एक एस बाबा भी थे जो कई बार कृष्ण कथा करते हुए श्रीगीता के बारे में बोलते हैं और एक ही नारा-अंहकार मत करो. उनकी बातों में जो अंहकार था वह देखने योग्य था और में तो उनके तारीफ करूंगा को उन्होने अपने अहंकार को नियंत्रित किया और धर्म के शिखर पर जाकर विराजमान हुए. आखरी व्यवसाय चाहे कोई भी हो उसे चलाने के लिए कई तरह की चालाकी की आवश्यकता होती है उसमें अहंकार पर नियंत्रण रखना जरूरी होता है.
सभी बाबाओं के बडे आश्रम हैं और उनमें फाईव स्टार होटलों जैसी सुविधाएं है आम भक्त उनसे इतनी आसानी से नहीं मिल सकता जितना किसी धनी व्यक्ति कि लिए संभव है. वह कहते है कि' मन को स्वच्छ रखो और बुद्धि को सात्विक क्योंकि इनको देह से अलग नहीं किया जा सकता. फिर अंहकार छोड़ने का नारा वह क्यों लगाते हैं? भगवान् श्री कृष्ण तो कहते हैं कि तीन गुणों से -सात्विक, राजसी और तामस- परे हो जाये वही योगी है. वह इन्द्रियों पर नियंत्रित करने के लिए कहते हैं जिसका आशय यह है कि अंहकार को भी वैसे ही काबू में रखा जाये जैसे बुद्धि और मन को. अहंकार देह का एक हिस्सा है जो उसके नष्ट होते तक रहता है. उस पर नियंत्रण तो किया जा सकता है पर छोडा नहीं जा सकता.

धर्म बेचने वाले तथाकथित संतों को अहंकार पर नियंत्रण की विधि नहीं मालुम इसलिए उसे छोड़ने का नारा लगते हैं-अंहकार पर नियंत्रण की विधियां मालुम होती तो वह धर्म बेचने का व्यवसाय ही नहीं कर पाते. सबसे बड़ी बात यह हैकि भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के ज्ञान का केवल अपने भक्तों में प्रचार की अनुमति दी है और यह चाहे जहाँ उसे सुनाने लगते हैं. इस तरह देश के लोगों की मानसिकता को ही गुलाम बना दिया है . इसी कारण हमारे देश के लोगों को वाद और नारों पर चलने का लिए अभ्यास हो गया है और इसलिए यह देश बरसों तक गुलाम रहा और आज भी गुलामी से रह रहा है. जिनके पास थोडी बहुत चतुराई हैं वह यहाँ शासन उन्हीं लोगों के सहारे करते हैं जो धर्म के नाम पर नारे लगाते हैं. (क्रमश:)

1/6/08

बाबा रामदेव को चुनौती देने से अच्छा है उनसे इलाज करवाएं

इंडियन मेडिकल एसोसियेशन I.M.A. ने योग गुरु रामदेव के इस बयान का विरोध किया है जिसमें उन्होने कहा था की डाक्टर लोगों की बीमारियों को बढाचढा का बताते हैं। ई।M।आ। ने बाबा को चुनौती भी दी है कि वह अस्पतालों में जाकर केंसर पीडितों का इलाज करके बताएं।

यहाँ पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं प्रतिदिन योग साधना करता हूँ पर बाबा रामदेव का मैं शिष्य नहीं हूँ पर वह जिस तरह लोगों में योग साधना और अन्य विषयों पर चेनता जागृत कर कर रहे हैं उसका समर्थक हूँ और कुछ ऐसे विषय भी हैं जिनसे मेरी सहमति नहीं होती पर इसके बावजूद मानता हूँ कि वह इस भारतीय समाज के लिए जो कर रहे हैं वह बहुत आवश्यक है। इसलिए जब मैंने I.M.A.आ।द्वारा उनकी आलोचना पढी तो मुझे लगा कि शायद वह उनकी bat समझ नहीं पाए। बाबा ने जो कहा है वही आम लोग भी कहते हैं और उन्होने तो केवल दोहराया भर है।

ऐसा नहीं है कि पहले लोग बीमार नहीं पड़ते थे पर अपने गली मोहल्लों में ही इलाज कराकर सही होते और आज भी लोग उनके पास जाते हैं। वजह यह है कि छोटी-मोटी बीमारी वही ठीक हो जाती है। अगर अधिक पढे-लिखे डाक्टर होते हैं तो तमाम तरह के टेस्ट कराने में लोगों का समय और पैसे बर्बाद कर देते हैं। हर बार बीमारी बड़ी होने का अंदेशा डाल देते हैं और आदमी उनके पास जाने से घबडाता है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह तो वैसे भी दिमागी तनाव से होते हैं और अगर किसी को अपनी इन बीमारियों के बारे में पता चले तो वैसे ही उसका मनोबल गिर जाता है। इधर डाक्टर दवाएं लिखते जाते और कहते भी जाते-''आप चिंता मत करो'।

मधुमेह के मरीज जो मरीज खाने के पहले और बाद गोली लेने के चिंता करते हैं और चिंता तो वैसे भी शरीर की दुश्मन मानी जाती है-ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि गोली क्या काम करेगी। चिकित्सा विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर बहुत लोचदार है और कई तरह के समायोजन स्वयं ही करता है अगर गोली लेने के बाद किसी को खाना पचा तो वह गोली लेने के कारण पचा या 'अब खाना पच जायेगा' इस चिता से मुक्त होने के कारण पचा कोई नहीं बता सकता।

यह सब दिमागी खेल है यह तो सभी मानते हैं। फिर I.M.A. के पास इस बात की क्या गारंटी है कि देश के सभी डाक्टर दूध के धुले हैं और अपने व्यवसाय के लिए बीमारी को बढाचढा कर नही बताते। इसलिए उन्हें बाबा रामदेव की आलोचना से पहले देश में जो डाक्टरों के बारे में धारणा व्याप्त है उस पर विचार करना चाहिए।
बाबा रामदेव को कैसर अस्पतालों में जाकर मरीजो को इलाज करने की चुनौती देने से पहले तो उनको इस बात का जवाब देना चाहिए कि क्या वह अपने अस्पतालों में आये मरीजों के अलावा कहीं किसी का इलाज करने जाते हैं?क्या उनको जब पता लगता है कि दूर-दराज के गावों में कोई कैसर का मरीज है तो वहाँ जाते हैं? वैसे भी जिसको डाक्टरों ने कैंसर बता दिया तो उसका मनोबल तो वैसे ही टूट जाता है और बिना मनोबल के योग साधना शुरू कोई नहीं कर सकता। अगर वह बाबा को यह कहकर चुनौती देते हैं कि 'वह तो योगी हैं और उन्हें जाना चाहिए' तो मैं उनको बता तूं जिस भारतीय दर्शन की ईजाद योग है वह यह भी कहता है कि अगर 'कमल जल से दूर है तो सूर्य भी उसको जीवन प्रदान नहीं कर सकता'। आदमी के जीवन के लिए यह मनोबल भी जल की तरह है और बाबा को चुनौती देने वाले अपने यहाँ से ही ऐसे मरीज जिनके बारे में डाक्टरों को पता लगता है कि उसे कैंसर है तो उसे बिना बताये ही बाबा रामदेव के शिविर में ले जाएं और अपनी दवाईयां देकर वहाँ योगासन के साथ उसका इलाज करें तब उनकी विश्वसनीयता बढेगी-जैसा कि खुद I.M.A.ने कहा भी है कि वह योग के प्रभाव को स्वीकार करती हैं।

12/29/07

मनुस्मृति:भोजन के समय दाहिना हाथ ऊपर उठाएं

मनु स्मृति के अनुसार

  • आग को किसी तरह के सामान के नीचे नहीं रखना चाहिए और न उसे लांघना चाहिए, पैरों को आग पर नहीं रखना चाहिऐ और न ही कोई ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे जीव हिंसा का भय हो।
  • संध्याकाळ में भोजन भक्षण, यात्रा और विश्राम नहीं करना चाहिऐ, धरती पर लकीर नहीं खींचनी चाहिए और अपने गले से पहनी हुई माला को नहीं उतारना चाहिए।
  • जल में मल-मूत्र, रक्त तथा विष आदि नहीं बहाना चाहिए, इससे पानी प्रदूषित हो जाता है, पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
  • जिस घर में कोई न हो वहाँ अकेले नहीं सोना चाहिऐ, सोये व्यक्ति को जगाना नहीं चाहिऐ रजस्वला स्त्री से बातचीत नहीं करना चाहिऐ। बिना आमंत्रण के किसी के यज्ञ में शामिल नहीं होना चाहिऐ।
  • अग्निहोत्र में, गायों के निवास स्थान में, विद्वानों के समीप, वेद-शास्त्र आदि पड़ते समय और भोजन के समय अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाएं(खाते समय बीच में उठाते रहें)।

12/1/07

कौटिल्य का अर्थशास्त्र:दुर्गुण संक्रामक रोग की तरह होते हैं

  • चंपा के साथ रहने पर तिलों में वैसे ही सुगन्ध आ जाती है, रस वैसी ही नहीं खाया जाता है पर उसकी गंध तिलों में आ जाती है इस कारण अपना प्रभाव अवश्य डालते हैं। वह संक्रामक माने जाते हैं।

अभिप्राय- किसी व्यक्ति में कोई अच्छा गुण है पर वह यदि बुरे लोगों की संगति में आ जाता है तो उनके दुर्गुणों का प्रभाव उस पर आ जाता है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति अच्छा लगे तो यह भी देखना चाहिये कि वह किन लोगों के बीच रह रहा है और उसका उठाना बैठना किनके साथ है और उसका घर कैसा है। यदि उसकी पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि ठीक नहीं है तो यह मानना चाहिए कि उसमें वह दुर्गुण भी होंगे।

  • जल का गंगाजल का प्रवाह जब सागर में बह जाता है तब वह पीने योग्य नहीं रहता, विद्वान के लिए यह उचित है कि अशुभ गुण वाले का आश्रय कभी न ले अन्यथा वह भी समुद्र में मिल गए जल के समान होगा।

अभिप्राय -जिन लोगों के मन स्वच्छ हैं और जिन्हें हिंसा, पाप या अन्य अपराध करने से डर लगता है उन्हें दुष्ट प्रकृतियों के व्यक्तियों से दूर रहना चाहिऐ, अगर उनकी सोहबत करेंगे और सतत मिलते रहेंगे तो उन पर भी धीरे-धीरे इसका प्रभाव पडेगा। इसके अलावा संपर्क कायम करते हुए यह भी देखना चाहिऐ कि हमारे संस्कार और परिवार कैसा है और जिससे संपर्क कर रहे हैं उसका कैसा है , यह भी देखना चाहिए। ऊपर लिखे गए पहले पैराग्राफ में भी इसी बात की जानकारी दी गयी है।

9/4/07

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। चारों तरफ उल्लास, भक्ति और प्रार्थनाओं के पवित्र वैतरणी प्रवाहमान दृष्टिगोचर होगी। ऐसा क्यों न हो? जिसका संदेश ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण है उन भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति जो करते हैं उनमें प्रेम, अहिंसा और दया के भाव दीपक की तरह सदैव प्रकाशित होते हैं।
भगवान श्री कृष्ण को महायोगेश्वर भी कहा जाता है। श्रीमद भागवत गीता केवल भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व की ऐक अनुपम धरोहर है और जिसका ज्ञान कभी प्राचीन नहीं होता क्योंकि वह शाश्वत सत्य है। उनके जितने भक्त हैं वह उनके उतने ही स्वरूप हैं। हर कोई अपने मन में स्थित स्वरूप के अनुसार उनकी भक्ति करते हैं। मेरे मन में उनके दिव्य चरित्र का ऐक स्वरूप है पर उसकी चर्चा करना कठिन है । ऐक तो उसके लिए शब्द मिलना कठिन है दूसरा थोडा प्रयास कर व्यक्त किये जाएँ तो फिर भक्तो से वाद-विवाद हो सकता है। क्योंकि हर कोई यह चाहता है कि उसके मन में जो स्वरूप हैं वही दूसरे के शब्द और भाव में भी व्यक्त हो। अगर आप कहीं उनके स्वरूप को व्यक्त कर्रें तो सब लोग अपने अंतर्मन में स्थित स्वरूप को व्यक्त करेंगे और भक्ति छोड़ कर प्रवक्ता बन जायेंगे।
यही स्थिति श्रीमद भागवत गीता की ज्ञान चर्चा के बारे में है। गीता गूढ़ रहस्यों से परिपूर्ण पवित्र ग्रंथ है और उसके हर श्लोक में शाश्वत सत्य दृश्व्य है। मैं उसके ज्ञान की चर्चा भी यहाँ नहीं कर सकता क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने उसे केवल अपने भक्तों में ही उसे चर्चा योग्य बताया है और दूसरे यहाँ थोड़े समय में यह संभव भी नहीं है।
भगवान श्री कृष्ण के और श्रीमद भागवत गीता को भक्ति और जिज्ञासा के भाव से पढने वाले भक्तों की कोई कमी नहीं है। भारत से लेकर अमेरिका तक उनके भक्त फैले हैं। सबसे बड़ी बात उनके ज्ञान, चरित्र और संदेश पर अन्य धर्मों के लोग भी प्रसन्नता पूर्वक चर्चा करते हैं-और उनके संदेशों पर पश्चिमी देशों में अनुसंधान हो रहा है। भगवान श्री कृष्ण का ने जीवन को सहज भाव से लेने का संदेश दिया है वह आज ज्यादा प्रासंगिक है, क्योंकि पहले लोग प्राकृति के निकट रहते थे और उनमें सहजता का भाव सहजता से रहता था इसलिये उन्हें यह संदेश अपने लिए ज्यादा महत्वपूर्ण नही न लगता रहा होगा। । पर आज विश्व में भौतिक साधनों की प्रचुरता ने आदमी को प्राकृति आनंद से दूर कर दिया है और अब उसे निकट जाने के लिए उसे स्वांग करने पड़ते हैं। कभी पिकनिक तो कभी पर्यटन और तीर्थ पर जाकर वह उस सुख की अनुभूति करना चाहता है जिसे उसने अंधी दौड़ में गँवा दिया है।

आजकल इन्सान आधुनिक भौतिक साधनों को पाने की दौड़ में वह तन्मयता से लगा रहता है और फिर उसके उपयोग से अपने शरीर और मन को इतना आलसी बना देता है कि दुनिया भर के रोगों के कीटाणु उसकी देह को अपना घर बना लेते हैं। वह चिकित्सक के पास अपने रोग के निवारण के लिए जाता है और जो उसे कुछ दवाएं लिख कर देता है और कहता है 'सुबह ताजी हवा लो और टेंशन मत करो'। सारी दुनिया जानती हैं कि दवाईयां रोग नहीं मिटाती है बल्कि उसका प्रतिरोध करती हैं-सुबह की ताजी हवा, तनाव रहित जीवन और खानी-पीने पर नियंत्रण से ही रोग मिटता है। अगर उन दवाओं से रोग मिटता होता तो चिकित्सक क्यों सुबह घूमने ,खाने से परहेज और तनाव रहित होने की सलाह देते हैं। स्पष्टत:शारीरिक और मानसिक अनुशासनहीनता से ही रोग फैलते हैं और और नियंत्रण करने से मिटते हैं-दवाईयों की भूमिका तो नाममात्र की है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद भागवत गीता में विषाद रहित, स्वस्थ, उल्लास से परिपूर्ण, और भक्ति भाव से जीने का जो मार्ग दिखाया है उसका अनुसरण करें तो भला चिकित्सा घरों के मार्ग पर चलने की आवश्यकता ही क्यों पडे? जिस देह को भगवान् के मंदिर में ले जाकर भजन करना चाहिऐ उसे चिकित्सकों के यहाँ लगने वाली लाइन में खड़ा करें तो इसमें हमारी ही कमी और अज्ञानता उजागर होती है जबकि श्रीमद भागवत गीता में सहजता पूर्वक जीवन व्यतीत करने का संदेश मौजूद है।
जिन भगवान श्री कृष्ण ने पूरे विश्व को शाश्वत सत्य से परिचित कराया, जिन्होंने अर्जुन को अपने विराट स्वरूप के दर्शन कराए और जिन्होंने हाथी को ग्राह से बचाया उन्हें मेरा कोटि-कोटि नमन। वह सदबुद्धि, ज्ञान और अपनी भक्ति प्रदान करें, जिससे इस भवसागर को सहजता से पार कर सकूं। जय श्री कृष्ण

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