अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
आपने अच्छा विषय उठाया है पर निष्काम भाव से काम करना तभी संभव है जब फल का स्वरूप समझा जाये। कोई भी कहीं नौकरी या व्यवसाय करता है तो उसे भौतिक परिलब्धियां प्राप्त होती हैं पर यह फल नहीं है क्योंकि उसका उपयोग तो हर कोई अपने और परिवार के भरण भोषण करता है। आपने एक जगह से धन लिया और दूसरी जगह खर्च किया तो उसे फल कैसे कहा जा सकता है। फल तो वह है जो आपके पास रहे। हम जब भौतिक परिलब्धियों को फल मान लेते हैं तो अपना यह बृहद जीवन संकीर्ण दायरों में कैद कर लेते हैं। हमें अपने दैहिक आवश्यकताओं के लिये परिश्रम और व्यवसाय करना ही होता है और उसके लिये वेतन या दाम प्राप्त करना कर्म का हिस्सा है न कि फल का। जब फल है मन की शांति और मोक्ष। वह भक्ति से प्राप्त होता है। उसमें भी आपको निष्कर्म भाव से लगना चाहिये क्योंकि तभी आपका ध्यान अपनी आत्मा से साक्षात्कार पर केंद्रित हो सकेगा। यही ध्यान आपकी देह, मन और विचारों को शुद्ध करता है जिससे आप जीवन में हर पल नवीनता अनुभव कर सकते हैं। जहां आपने कामनायें स्थापित की वहां यह ध्यान नहीं लगेगा और मामला जस का तस।
अपनी समझ के अनुसार जो संक्षिप्त व्याख्या थी वह प्रस्तुत की। बाकी कोई सिद्ध तो हूं नहीं कि दावा करूं कि यह सब ब्रह्म वाक्य है।
दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
अभिप्राय- किसी व्यक्ति में कोई अच्छा गुण है पर वह यदि बुरे लोगों की संगति में आ जाता है तो उनके दुर्गुणों का प्रभाव उस पर आ जाता है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति अच्छा लगे तो यह भी देखना चाहिये कि वह किन लोगों के बीच रह रहा है और उसका उठाना बैठना किनके साथ है और उसका घर कैसा है। यदि उसकी पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि ठीक नहीं है तो यह मानना चाहिए कि उसमें वह दुर्गुण भी होंगे।
अभिप्राय -जिन लोगों के मन स्वच्छ हैं और जिन्हें हिंसा, पाप या अन्य अपराध करने से डर लगता है उन्हें दुष्ट प्रकृतियों के व्यक्तियों से दूर रहना चाहिऐ, अगर उनकी सोहबत करेंगे और सतत मिलते रहेंगे तो उन पर भी धीरे-धीरे इसका प्रभाव पडेगा। इसके अलावा संपर्क कायम करते हुए यह भी देखना चाहिऐ कि हमारे संस्कार और परिवार कैसा है और जिससे संपर्क कर रहे हैं उसका कैसा है , यह भी देखना चाहिए। ऊपर लिखे गए पहले पैराग्राफ में भी इसी बात की जानकारी दी गयी है।