समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/13/09

बालश्रम को पूरी तरह रोकना कठिन-आलेख

पश्चिमी विचाराधारा के गुलाम हो चुके भारतीय बुद्धिजीवियों का एक शिगुफा है ‘बाल श्रम रोकना।’ व्यक्ति और परिवार से परे समाज के बाह्य रूप पर अपनी दृष्टि केंद्रित कर विचार व्यक्त करने वाले यह बुद्धिजीवी बाल श्रम रोकने का नारा भर लगाते हैं- कभी बाल दिवस पर तो कभी बाल श्रम निषेद्ध दिवस पर चंद स्थानों पर बालकों को काम करते दिखाते हुए उनकी प्रेषित संवेदनायें इस लेखक को हंसने के लिये प्रेरित करती हैं।
शायद यह कोई दूसरा ऐसा लेखक लिखने का साहस नहीं कर सकता क्योंकि इस बात की कम ही संभावना है कि कोई ऐसा भी होगा जो दस वर्ष की आयु में अपने ही दुकान के दर्जी की 24 इंच की साइकिल पर चढ़कर मई की धूप में अपनी काज करने और बटन टांकने के लिये देने कहीं देने का सुअवसर-हां, आज भी यही लगता है-प्राप्त कर सका हो।
भारत में केवल गरीब वर्ग के ही लोग अपने बच्चों से श्रम नहीं करवाते बल्कि छोटे व्यवसायों में जुटे व्यवसायियों में भी अपने बच्चों को धंधा सिखाने के लिये उन्हें अपने साथ रखना पड़ता है। पहले शिक्षा न केवल प्रचार प्रसार बल्कि लोगों के प्रवृत्ति भी बहुत कम थी इसलिये धनिकों के बच्चे भी नहीं पढ़ते थे पर जैसे आधुनिक शिक्षा के सहारे जीवन यापन की सुविधायें बढ़ी लोगों ने अपने बच्चों को विद्यालयों और महाविद्यालयों में भेजना प्रारंभ कर दिया। निम्न मध्यम वर्ग परिवार के लोग अपने बच्चों से विद्यालय से घर आने पर उनसे बाहर का काम करवाते हैं। यह सभी को पता है कि आधुनिक शिक्षा से सभी को नौकरी मिलना संभव नहीं है इसलिये कुछ लोग सुरक्षात्मक भविष्य के लिये अपने बच्चों को अपने ही व्यवसाय का ज्ञान दिलाने के लिये अपने साथ रखते हैं।

हालांकि अब यह मुश्किल हो गया है। वजह यह रही है कि शिक्षा का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहा दूसरा यह भी कि बढ़ते शहरों ने स्कूलों से घरों की दूरी बढ़ा दी है। यह लेखक उन छात्रों में रहा है जो स्कूल से घर पैदल ही लौटते और बाद में अपनी दुकान पर जाते। पुरानी स्मृतियां अब भी शेष हैं। एक पकौड़ी बनाने वाले का लड़का साथ में पढ़ता था जो शाम को अपने पिताजी के साथ पर पर बैठकर बेचता था और यही लेखक उससे खरीद कर भी लाता था। एक लड़का राशन की दुकान पर बैठता था और उससे भी लेखक ने सामान खरीदा। कालांतर में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और सरकारी नौकरी में लगे तो दो लोग डाक्टर भी बन गये। इसके साथ यह भी सच है कि विद्यालय के परीक्षा परिणामों में उस समय द्वितीय श्रेणी-45 प्रतिशत अंक-ही बहुत अच्छे माने जाते थे। तृतीय श्रेणी आने पर भी यह संतोष होता था कि चलो पास तो हुए।
आज हालात बदल गये हैं और बच्चों को पढ़ाई करते देखकर ऐसा नहीं लगता कि उनसे घर के बाहर ही क्या अंदर भी काम करवाया जा सकता है।
70 प्रतिशत तक अंक प्राप्त करने वाले छात्र छात्रायें अपने परिणाम से असंतुष्ट नजर आते हैं तब देखकर दंग रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता-यह इंटरनेट की सुविधा होने की वजह से पता चला है।
भारत में व्यवसायिक और श्रमिक जातियों में अपने बच्चों से श्रम करवाने की परंपरा रही है। यह बुरी नहीं कही जा सकती अगर बच्चों का दैहिक और आर्थिक शोषण न हो और उनको विद्यालय जाने का अवसर मिले। साथ ही उन बच्चों को समाज की तरफ से समय समय पर पुरस्कार और सहायता भी दी जाये।
कहते हैं न कि संस्कार बचपन से ही डाले जा सकते हैं और परिश्रम करना भी एक संस्कार है जो अगर बचपन में नहीं पड़ा तो फिर बाद में कठिन होता है। इसी लेखक ने हायर सैकेंड्री के बाद भी एक जूतों की थोक दुकान पर गर्मी में पेटियां ठोकी हैं। यह आलेख कोई बाल श्रम के समर्थन में नहीं लिखा जा रहा पर वास्तविक धरातल पर खड़े होकर जब तक चिंतन नहीं होगा केवल नारों तक ही विषय सिमटे रहेंगे तब समाज को कथित रूप से सभ्य बनाना संभव नहीं होगा।
समस्या यह नहीं है कि बाल श्रम बढ़ रहा है बल्कि उनके प्रति समाज का रवैया अब अधिक घृणास्पद और संवेदनहीन हो गया है। उनको श्रम करने से रोकने का उपाय करना बुरा नहीं है पर यह जरूरी है कि उनको वैकल्पिक व्यवस्था प्रदान की जाये। बाल श्रमिकों को विद्यालयों भेजने के लिये कानूनन अनिवार्य करना चाहिये। इस देश की एक बहुत बड़ी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे रह रही है और बाल श्रम रोकना एक दिवास्वपन लगता है क्योंकि श्रम साध्य कामों में वैसे ही अधिक नहीं कमाया जा सकता ऐसे में बच्चे अधिक हों तो माता पिता मजबूरी में उनसे काम करवाते हैं।
बचपन में काम न करने देने का विचार पश्चिम से आयातित है पर जरा उनकी संस्कृति पर दृष्टि डालें तो पता लगेगा कि वहां जाकर भारतीय खूब नाम कर रहे हैं और अब जरा विश्लेषण करें तो इनमें अधिकतर वह हैं जो बचपन से व्यवसायिक बुद्धि कौशल से युक्त रहे। इसके अलावा भारत से अनेक मजदूर भी विदेश जाते रहे हैं। भारत की बात छोड़िये अपने उत्तर भारत से ही अनेक मजदूर देश के उन क्षेत्रों में गये हैं जहां उनके श्रम की आवश्यकता है। वह अपने मूल स्थान छोड़कर जाते हैं और अपने बच्चों को भी अधिक आय के चक्कर में काम करवाते हैं। इसे रोकना संभव नहीं है क्योंकि सभी जानते हैं कि मजदूरों के लिये जीवनयापन करना उतना आसान नहीं है जितना समझा जाता है।
प्रसंगवश आस्ट्रेलिया की घटनाओं को देख लें। कुछ लोग बताते हैं वहां अंग्रेज अपने ही उन लोगों को भेजते थे जिनको अपने समाज के लिये अच्छा नहीं समझते थे। वह गोरे लोग ही थे। अपने देश में जो पश्चिमी संस्कृति हावी है वह गोरों से ही प्रभावित है जो बच्चों के काम करने की प्रवृत्ति को निषिद्ध करती है। आस्ट्रेलिया के गोरे नवयुवक इसलिये ही भारतीयों पर हमला कर रहे हैं क्योंकि वह उनके रोजगार छीन रहे हैं। अगर वह गोरे नवयुवक अपने साहबी कल्चर से थोड़ा ऊपर उठकर पढ़ते लिखते और श्रम करना सीखते तो शायद भारतीय उनके सामने नहीं टिक पाते जो कि बचपन से ही अपने शिक्षा को व्यवसायिक ढंग से उपयोग करना सीखते हैं।
कहने वाले तो कई लोग मजाक में कहते हैं कि कोई आदमी लंदन में जाकर वेटर का काम करता है पर यहां अपने आपको मैनेजर बताता है। मतलब वह वहां श्रमसाध्य काम करता है पर यहां उसे छिपाता है। इसका आशय यह है कि हमारा समाज श्रम को अब हेय दृष्टि से देखने लगा है जो कि आने वाले समय में सांस्कृतिक संकट का कारण बनेगा जैसे कि आज पश्चिम के लिये बन रहा है।
गरीब और मजदूरों के बच्चे परिश्रम कर पैसा न कमायें-यह करना तो पूरी तरह से संभव नहीं लगता-हालांकि इसके लिये प्रयास जारी रहना चाहिये। हां, उनको शिक्षा के साथ ही जीवन में विकास के वह सब साधन उपलब्ध कराना चाहिये जो कि दूसरे बच्चों को मिलते हैं-अपने अनुभव यह लेखक यही कह सकता है।
.............................................
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.राजलेख हिन्दी पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

3 comments:

गिरिजेश राव said...

एक वैकल्पिक दृष्टिकोण जिसे भारतीय सन्दर्भ में 'केन्द्र' में होना चाहिए.

साधुवाद,

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही सटीक बात कही है . आभार

समय said...

आपने सही कहा है।

जब तक एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था नहीं पैदा कर ली जाती जहां किसी भी मनुष्य के पास ऐसी मजबूरी ना रहे, इन आदर्शी शगूफ़ों से अपना मन बहलाया जा सकता है, ग्लानि कम की जा सकती है।

और तब तक यानि वैकल्पिक व्यवस्था के बिना जैसा कि आपने कहा है, यह उनके साथ एक दोहरा अन्याय है।

हालांकि मजबूरी के, जीवनयापन हेतु परिस्थितियों द्वारा थोपे हुए बालश्रम(जैसा कि इससे प्रचलित अर्थ लिया जाता है) और कार्यकुशलता, दक्षता या घरेलू दस्तकारी एवं व्यवसाय में निपुणता के लिए हो रहे बालश्रम को अलग-अलग नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है।

शुक्रिया आपका।

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें