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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/12/09

भाषा और लिपि की दीवार खत्म न हो,उंचाई तो कम हो जायेगी-आलेख

कई लोगों का हस्तलेखन बहुत खराब होता है और वह अपना ही लिखा नहीं पढ़ पाते। जिस तरह पूत के पांव पलने मेंं दिखाई देते हैं वैसे ही उसका हस्तलेखन भी पता लग जाता है। अपना भी कुछ हाल ऐसा ही रहा था। इसलिये अपनी रचनायें टाईप होने पर ही कहीं भेज पाता था। टाईपिंग की सुविधा खत्म होने पर फिर रचनायें भेजना ही बंद कर दीं। वैसे तो मैंने अपने जीवन के रोजगार की शुरुआत ही कंप्यूटर से की थी पर बीच मेंं लंबे समय तक उससे संपर्क टूट गया। खैर फिर अंतर्जाल पर सक्रिय होने के बाद ब्लाग पर लिखना प्रारंभ किया तो यह नहीं सोचा था कि यहां भी ऐसा दिन देखने को मिलेगा जब अपना लिखा ही अपने पढ़ने में नहीं आ पायेगा।

हां, यही कई बार हुआ है। यह हुआ है गूगल के अनुवाद और लिप्यांतरण टूलों के कारण। मुझे आज भी याद है उस ब्लाग लेखक की टिप्पणी जिसने एक वर्ष पहले ब्लाग से संबंधित पाठ में मेरे ब्लाग पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि बहुत जल्दी भाषा और लिपि की दीवार दुनियां में खत्म हो जायेगी। उस समय उसने जैसे टूलों की बात की थी वैसे ही टूल उसकी टिप्पणी के तीन माह बाद ही दिखाई देने लगे थे और जहां वह शुरु में प्रयोगात्मक दौर होने के कारण अशुद्ध परिणाम देने वाले थे पर वह अब सुधार की तरफ बढ़ रहे हैं। मेरे लिखे ब्लाग के पाठ अन्य भाषाओं और लिपियों में पढ़े जा रहे हैंं उससे तो यही लगता है। हालांकि यह संख्या कोई अधिक नहीं है कि आत्ममुग्ध हुआ जाये पर एक विचार का विषय तो है और इसमें भविष्य का संकेत भी छिपा लगता है।
यह तो पता नहीं कि हिंदी देवानागरी में लिखा हुआ कितनी भाषाओं और लिपियों में परिवर्तित कर पढ़ा जा सकता है पर जिस दिन भी अपने ब्लाग का अवलोकन करता हूं कोई न कोई ब्लाग अन्य भाषा और लिपि मेंें पढ़ा गया मिलता है कभी कभी यह संख्या तीन से पांच भी होती है। यह भाषाऐं अंग्रेजी से अलग होती हैं भले ही उनकी रोमन लिपि होती है। पिछले कुछ दिनों से तो लगता है कि उर्दू भाषा में भी उनको पढ़ा जा रहा है। एक दो बार ऐसा भी लगा कि शायद कोई अन्य भाषा भी है जिसकी लिपि अरेबिक है और उसमें ब्लाग देखा गया है। रोमन लिपि में पता नहीं कौनसी भाषायें हें जिनमें ब्लाग पढ़े जा रहे हैं यह कहना कठिन है क्योंकि वह समझ में नहीं आती-एक बात तय है कि लिपि उनकी रोमन है पर भाषा अंग्रेजी नहीं है। अरेबिक लिपि में भी जो ब्लाग देखा उसमें कुछ अक्षर संभवतः लिप्यांतरित नहीं हो पाये। यह ब्लाग इस तरह सामने आते हैं कि अपन्र ब्लाग भी पहचान में नहीं आते। अगर दायें बायें अपने लिंकित ब्लाग न हों तो यही लगेगा कि कोई अन्य ब्लाग है। कई ब्लाग पर तो अपने ब्लाग का नाम भी नहीं समझ में आता।

एच.टी.एम.एल. के द्वारा लिखा गया पूरा पाठ ही सर्च इंजिनों की नजर में रहता है और अगर कोई शब्द पाठ के बीच में हों तो भी ढूंढे जाने पर खोजकर्ता के सामने वह पाठ पहुंच जाता है। यही कारण है कि अपना परिचय पाठ के साथ ही जोड़ना ठीक प्रतीत होता है क्योंकि कुछ वेबसाइटों ने चालाकी से केवल पाठ को ही अपने यहां खींचने की योजना बनाई है। वह केवल एच.टी.एम.एल. को अपने यहां पकड़ने का जाल बिछाते हैं। यह एच.टी.एम.एल. यानि हमारा पाठ ही है जिसकी तलाश खोजकर्ताओं को रहती है।

बहरहाल जैसे जैसे समय बदल रहा है नित नित नये परिवर्तन आ रहे हैं। हम जब बात करते हैं हिंदी में लिखने की तो यह भी अब विचार करना चाहिये कि अंतर्जाल पर अन्य भाषी और लिपि के जानकार भी उसे पढ़ सकते हैं। वैसे कहना कठिन है कि हिंदी देवनागरी में लिखे गये शब्दों का अन्य भाषा या लिपि में रूपांतरण करने पर अर्थ और भाव वैसा होता है या नहीं जैसा लेखक ने लिखा है। अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुवाद करने पर क्या हालत है यह भी ज्ञात नहीं पर अंग्रेजी से अनुवाद तभी पढ़ पाते हैं जब सामने अंग्रेजी में लिखा हुआ भी पाठ हो। हालांकि कुछ लोगों का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद कुछ अधिक अच्छा है। इसलिये यह संभव है कि अन्य भाषाओं में यही स्थिति हो। बहरहाल जिस तरह निरंतर यह संख्या बढ़ती जा रही है उससे लगता है कि शायद अंतर्जाल पर धीरे धीरे भाषा और लिपि की दीवार बहुत जल्दी खत्म नहीं भी हो तो भी उसकी उसकी ऊंचाई धीरे धीरे कम होती जायेगी। हिंदी में लिखने का मतलब यह नहीं है कि उसे केवल हिंदी के पाठक ही पढ़ेंगे बल्कि उसे अन्य भाषी पढ़ेंगे यह बात वास्तव में रोमांच पैदा करने वाली है। हालांकि इसके लिये जरूरी होगा कि हिंदी में लिखने वाले अपने पाठों की विषय सामग्री को व्यापक संदर्भों में लिखें। वैसे विश्व में हिंदी का कोई अधिक ऊंचा स्थान नहीं है पर धीरे धीरे इसका प्रभाव बढ़ेगा इसमें संदेह नहीं है पर उसकी शर्त यही है कि हिंदी के ब्लाग लेखकों को अपने रुचिकर विषयों पर ही लिखना पड़ेगा।

एक दिलचस्प बात यह है कि अन्य भाषाओं या लिपियों के पाठकांें की पसंद भी कोई हिंदी भाषियों से अलग नहीं हैं यह बात उनके सर्च इंजिनों में खोज के लिये लिखे शब्दों से जाहिर होता है। अंतर्जाल पर लिखने से अन्य देशों और भाषाओं के लोग भी हमें पढ़ रहे हैं जहां यह बात रोमांच पैदा करती हे वहां यह विचार भी आता है कि अपने पाठों में अधिक से अधिक सकारात्मक सामग्री और दूसरों के लिये प्रशंसात्मक वाक्य हों। अगर नकारात्मक और निंदात्मक सामग्री होगी तो उससे हम हिंदी भाषी लेखकों की छबि विश्व स्तर पर खराब भी हो सकती है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

3 comments:

महेंद्र मिश्रा said...

बढ़िया आलेख प्रस्तुति . बधाई

संगीता पुरी said...

आपने सही कहा कि अपने पाठों में अधिक से अधिक सकारात्मक सामग्री होना चाहिए , ताकि दूसरे लिपि के पाठको को भी पर्याप्‍त सामग्री मिल पाए....अच्‍छे आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई।

आकांक्षा~Akanksha said...

सुन्दर ब्लॉग...सुन्दर रचना...बधाई !!
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