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3/26/15

यह विश्व कप है या अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिता-हिन्दी चिंत्तन लेख(it is A international tournament no world cricket cup-A hindi thought article)




          आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में खेली जा रही क्रिकेट प्रतियोगिता को विश्व स्तरीय मानना चाहिये कि अंतर्राष्ट्रीय! यह प्रश्न हमारे दिमाग में तब आया एक क्रिकेट विशेषज्ञ ने एक चर्चा में कहा कि इसे विश्व कप कहना ही गलत है, यह ता आठ राष्ट्रों के बीच की स्पर्धा है। उनकी बात सही लगती है।  विश्व कप तो फुटबाल या हॉकी का ही हो सकता है।  हमारे प्रचार माध्यम अपने व्यवसायिक कारणों से वर्तमान  क्रिकेट प्रतियोगिता को विश्व कप कहकर अपने उपभोक्ताओं को यह अनुभूति दिलाते हैं कि वह एक विश्व स्तरीय मुकाबले को देख रहे हैं जबकि यह आठ राष्ट्रों में दो के बीच का होता है।  विश्व स्तरीय खेलों में बैडमिंटन, टेनिस,शतरंज, फुटबाल, हाकी तथा अन्य ऐसे खेल होते हैं जिन्हें अधिकतर देशों में खेला जाता है।  इसमें बैडमिंटन, टेनिस, शतरंज  और हाकी में ही हमारे देश के खिलाड़ियों ने पहचान बनाई है। कभी फुटबाल में हमारी टीम का नाम था पर अब वहां हमारी छवि लापता है।
          अन्य खेलों के खिलाड़ियों की चर्चा-जैसे साईना नेहवाल और आनंद-की उसी दिन ही होती है जिस दिन वहा कोई बड़ा मैच या प्रतियोगिता जीतते हैं।  इसके विपरीत क्रिकेट खिलाड़ियों की चर्चा तो उस दिन भी होती है जिस दिन मैच न हो। कभी पार्टी तो कभी रैम्प पर नाचते हुए दिखाया जाता है। कभी कभी उनको टीवी कें जनभागीदारी वाले कार्यक्रमों में भी दिखाया जाता है।  एक तरह से क्रिकेट खेल अनेक लोगों की जेब भरने वाला है इसलिये प्रचार माध्यम इसकी छवि इस तरह बनाये रखते है जैसे कि यह विश्व स्तरीय हो। हम तो मैच देखते हैं पर यह भ्रम कभी नहीं पालते कि कोई विश्व स्तरीय मैच देख रहे हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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3/21/15

बीबीसी की बला भारत का गला-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन(bbc ki bala bharat ka gala-hindi satire thought article)



    
          यह बीबीसी क्या बला है? संभवतः अंग्रेजों का कोई भोंपू है जिसका स्वर और दृश्य भारतीय भोंपू ही हमें सुनाते हैं।  इस विश्व की जनसंख्या छह अरब करीब है जिसमें से आधी तो चीन और भारत की है।  हमारे देशी भोंपू यह बताते हैं कि बीबीसी नाम का भोंपू विश्व में सबसे अधिक सुना और देखा जाता है पर जनसंख्या की दृष्टि से यह बात सही नहीं लगती।  डेढ़ करोड़ चीनी और सवा करोड़ भारतीयों में कम से कम बीबीसी की कोई छवि नहीं है।
          भारतीय भोंपू पहले बीबीसी का रुदन सुनाते हैं फिर उस बहस करते हैं-दोनों ही स्थिति में उनका विज्ञापन का समय पास होता है। हमारा मानना है कि भारतीय प्रचार कर्मियों में आत्म सम्मान और विश्वास दोनों की कमी है।  खाते हिन्दी से है बजाते अंग्रेजी की हैं।  बीबीसी और सीएनएन की बातें अपने चैनल या समाचार पत्र में प्रकाशित कर यही दर्शाते हैं कि उनके पास उधार के मसले ही प्रसारण के लिये हैं।  भारत के लोगों को अपने ही मसलों से फुर्सत नहीं है।  उसे यह पता नहीं कि बीबीसी और सीएनएन जैसे अंग्रेजी प्रसारण संस्थानों को हिन्दी चैनल वाले उसी तरह अपना पितामह मानते हैं जैसे कि देशी विद्वान विदेशी विचारकों मानते हैं।
          बीबीसी जब कोई भारतीय समाचार प्रसारित करता है तो उसका उद्देश्य अपने ही राष्ट्रीय हित की रक्षा करते उसमें ऐसी बातें शामिल करता है जिससे विवाद बढ़े।   स्वयं को लोकतांत्रिक, मानवाधिकारों की रक्षा का पहरेदार तथा अभिव्यक्ति का शहंशाह समझने की प्रवृत्ति अंग्रेजों में स्वाभाविक रूप से है और बीबीसी उसी को ही प्रतिबिंबित करता है।  भारतीय सस्कृति को लघु और अपनी संस्कृति को महान साबित करने में उसे सफलता भारत के दोहरी मानसिकता वाले विद्वानों के कारण ही मिलती है। यह विद्वान मानते हैं कि न खाता न बही, बीबीसी जो कहे वही सही।
          सच यह है कि बीबीसी का नाम अब भारत में अधिक लोकप्रिय नहीं है और भारतीय प्रचार माध्यम उसे केवल उसका नाम केवल अपनी वैश्विम स्तर पर संबद्धता दिखाने के लिये ही लेते हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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3/15/15

मानवीय पराक्रम के बिना महिला सुरक्षा की बात व्यर्थ-हिन्दी चिंत्तन लेख(without men power security of women-hindi thoght)



 हमारे देश में धार्मिक, सामाजिक तथा साहित्यक क्षेत्र के लोगों के पास प्रचार में लोकप्रियता प्राप्त करने के लिये महिलाओं के हितचिंतक दिखने की सहज प्रवृत्ति देखी जाती है।  वैसे तो कहा जाता है कि समाज पुरुष प्रधान है पर यह भी माना जाता है कि अंततः परिवार के अंदर महिलाओं का प्रभाव कम नहीं होता।  यह प्रभाव इतना होता है कि महिलाओं को प्रभावित कर समूचे परिवार पर नियंत्रण किया जा सकता है।  यही कारण है कि धार्मिक तथा सामाजिक पेशेवर सदैव ऐसे संदेश देते हैं जिससे महिलायेें प्रभावित हों। हमारे यहां महिलाओं के विकास, सुरक्षा तथा सामाजिक बराबरी का दर्जा दिलाने का नारा प्रचलित हैं।  कहीं बाल, वृद्ध तथा असहायों की मदद के नारे भी लगते हैं पर महिलाओं के हित चिंतक नारे सहजता से बाज़ार में बिक जाते हैं इसलिये ही प्रचार के माध्यम से अपना पेशा चलाने वाले लोग इसका उपयोग करते हैं।
    आजकल महिलाओं की सुरक्षा की बात अधिक की जा रही है पर इस बात पर कोई चर्चा नहीं करता कि सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में व्याप्त वैमन्यस्य ही नर नारी दोनों के लिये संकट का कारण है। आक्रमण का भय सभी में व्याप्त है। दूसरी समस्या यह है कि अपराधियों के राजदंड का  भय नहीं रहा।  ऐसे  में अगर पुरुष की रक्षा नहीं हो सकती तो महिलाओं की सुरक्षा कैसे हो जायेगी यह तो नारे लगाने वाले ही बता सकते हैं?
    एक मजेदार बात यह है कि सार्वजनिक स्थानों, सड़कों तथा शैक्षणिक संस्थानों में कैमरे लगाकर महिलाओं की रक्षा करने का दावा इस तरह किया जा सकता है जैसे निर्जीव बुत विद्युत संपर्क होने पर रोबोट बनकर महिलाओं की रक्षा कर लेंगे। सभी जानते हैं कि नर या नारी पर जब कोई दैत्य आक्रमण करता है तो उसे रोकने के लिये उसे स्वयं या अन्य पुरुष को दैहिक पराक्रम प्रकट करना ही होता है।  घटना के बाद कैमरे से अपराधी की पहचान कर उसे ढूंढने में भी पराक्रम चाहिये।  यह पराक्रम मानवीय शक्ति के बिना संभव नहीं है। अपराध के विरुद्ध पराक्रम ही उपाय है। हमारे यहां इसी का अभाव है। पराक्रम प्रकट करने के लिये समाज के लोगों के पास दैहिक शक्ति, पराक्रम तथा उसके उपयोग की बुद्धि का होना आवश्यक है। अगर समाज में पराक्रमी लोगों की संख्या अधिक हो तो नर के साथ नारी भी रक्षित हो सकती है वरना तो जो हो रहा है वह हो ही रहा है। मानवीय पराक्रम की प्रेरणा देने के लिये प्रयास न करते हुए अनेक शिखर पुरुष केवल सतही उपायों की बात करते हैं।
    इस तरह के पराक्रम में जिस  प्रेरणा की आवश्यकता है उसके लिये समाज में आर्थिक दृढ़ता, वैचारिक पवित्रता तथा सामाजिक सामंजस्य की आवश्यकता है। हम इन तत्वों का अभाव देख रहे हैं। हमारे यहां पेशेवर विद्वानों के पास अभिव्यक्ति के माध्यम उपलब्ध हैं पर अपने सतही नारों के माध्यम से वह उसका सीमित उपयोग ही कर पाते हैं।  कोई समूचे समाज और राष्ट्र की सुरक्षा की बात नहीं करता क्योंकि उससे लोकप्रियता नहीं मिलती। इसलिये महिलाओं की सुरक्षा के नारे तथा बहसों पर व्यर्थ बहस होती दिखती है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

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3/1/15

रॉबिनहुडीय अर्थव्यवस्था में मध्यम वर्ग का अस्तित्व-हिन्दी चिंत्तन लेख(robinhoodiy arthvyavastha mein madhyam varg ka astitva-hindi thoughta article)



            भारत के समाज शास्त्रियों की समझ पर तरस आता है। हैरानी की बात यह है कि अधिकतर समाज शास्त्री स्वयं ही उस मध्यम वर्ग के हैं जिसकी किसी भी अभियान में शारीरिक श्रम से अधिक बौद्धिक भूमिका होती है। वह  उच्च तथा निम्न वर्ग के मध्य स्थित होकर सामंजस्य की भूमिका निभाता है जिसका ज्ञान सामाजिक ढांचे का अध्ययन करने पर ही हो सकता है। इसका मतलब यह है कि यह समाज शास्त्री जब चिंत्तन करते हैं तो स्वयं को अपने घर परिवार की स्थिति से प्रथक हो जाते हैं।  किसी भी विषय पर चिंत्तन कर अपने भाव सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त कर संचार माध्यमों से प्रचार, अमीरों से पैसा पाना या विचारधारा के पोषकों प्रतिबद्धता दिखाना  ही उनका उद्देश्य रह जाता  है।  यही कारण है कि आज जब भारतीय समाज के बिखराव की बात करते हैं तो यह नहीं समझ पाते कि मध्यम वर्ग का संकट ही इसका कारण है।
            मध्यम वर्ग में शिक्षक, वकील, पत्रकार, चिकित्सक तथा शासकीय कर्मचारी सहित बौद्धिक श्रम करने वाले लोग होते हैं जो न केवल राजकाज वरन् समाज के संचालन की भूमिका निभाते हैं। इतना ही मध्यम वर्ग अपने जीवन में आर्थिक संघर्ष करते हुए अर्थक्षेत्र के समसे बड़ा उपभोक्ता तो होता ही है राजस्व प्रदान करने में इसकी भूमिका भी अधिक होती है। आधुनिक प्रबंधकीय व्यवस्थाऐं ‘रॉबिनहुडीय’ सिद्धांतों पर आधारित हैं।  जिस तरह रॉबिन हुड के बारे में कहा जाता है कि वह अमीरों से छीनकर गरीबों को देता था-हमारे यहां कुछ डकैतों की भूमिका इसी तरह प्रचारित की गयी हैं-उसी तरह हर तरह की राजकीय व्यवस्था में भी इसी तरह का दावा किया जाता है। गरीबों का भले का नारा सर्वत्र प्रचलित है। इस स्थिति में मध्यम वर्ग का संघर्ष सभी जगह बढ़ गया है।  अमेरिका सहित पश्चिम देशों में अभी तक गरीब और अमीर के बीच मध्यम वर्ग कुछ समय तक अपनी कमाई पर जीवित रहा पर अब वह ऋण के जाल में फंसने के बाद अपना स्तर बचाये रखता है।  हमारे यहां भी मध्यम वर्ग पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ पर पहले उसके पास थोड़ी बहुत अपनी संपत्ति होती थी पर बैंकों से आसान शर्तों पर ऋण के जाल में फंसता जा रहा है।
            हम यहां मध्यम वर्ग का अर्थशास्त्र की दृष्टि से नहीं वरन् समाज शास्त्र के आधार पर विचार कर रहे हैं।  हम यह नहीं करते अगर हमारे यह धर्म और जाति के आधार समाज की रक्षा का दावा करने वाले नहीं संगठन तथा शिखर पुरुष नित प्रतिदिन अपने कार्य का प्रचार नहीं करते होते। हमारे देश के अनेक अर्थशास्त्री प्रत्यक्ष कर के दायरे मे अधिक करदाता लाने की बात करते हैं पर जितने हमारे यहां कर लगते हैं उसे देखते हुए तो ऐसा नहीं लगता कि कोई कर से बच नहीं पाता।  जो गरीब बचता भी होगा वह कहीं न कहीं अपनी रक्षा का कर निजी शक्तियों को देता ही है।  हम यहां धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र के आधार पर काम करने वाले कथित शिखर पुरुषों को बता दें कि उनके प्रयास तब तक सफल नहीं होंगे जब तक मध्यम वर्ग स्थिर नहीं रहेगा। जिस तरह रुपये की कीमत का हृास हुआ उसे देखते हुए तो अनेक मध्यम वर्गीय परिवार निम्न वर्ग में पहुंच गये हैं।  एक समय वह अपने समाज की शक्ति थे और आज अपने अस्तित्व के लिये जूझ रहे हैं।  स्थिति यह है कि मध्य श्रेणी के व्यवसायियों के बच्चे अब अपना पैतृक काम ही नहीं करना चाहते-अगर कर रहे हैं तो अपने बुजुर्गों की तरह उनमें श्रद्धा का अभाव दिखता है।  मॉल संस्कृति ने मध्यम वर्ग के व्यवसाय के अस्तित्व के अस्तित्व पर  संकट खड़ा कर दिया है।
            हम अक्सर किसानों की आत्महत्याओं की चर्चा करते हैं पर धनाभाव या ऋण की वजह से मध्यम वर्ग में हुई इस तरह की घटनाओं पर दृष्टिपात नहीं करते। रॉबिनहुडीय राजकीय प्रबंध व्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों में मध्यम वर्ग का अस्तित्व पर भारी संकट खड़ा कर दिया है। हमारे यहां कार्ल मार्क्स के सिद्धांतो के मानने वाले और उसका विरोध करने वाले भी बहुत हैं।  उसने भी समाज को केवल निम्न और धनिक वर्ग दो ही भागों में बांटकर अपने पूंजी ग्रंथ की रचना की।  मजे की बात यह है कि धनिक उसके विरोधी हैं तो गरीबों के पास उस पर विचार करने का समय नहीं है जबकि मध्यम वर्गीय बौद्धिक उसकी विचारधारा के संवाहक हैं।  यह बौद्धिक विभिन्न समाजों के बीच वैसी ही अपनी भूमिका देखना चाहते हैं जैसी सर्वशक्तिमान के विभिन्न रूपों के प्रचारकों की होती है। यह लोग राज्य प्रबंध को रॉबिनहुड के रूप में देखना चाहते हैं।  यह अलग बात है कि उनके विपरीत चलने वाले विचारक भी इसी तरह का विचार रखते हैं। हम यह भी मानते हैं कि यह रॉबिनहुडीय आर्थिक प्रबंध  दिखावा है वरना तो अमीरों के पास इतनी दिव्य शक्तियां आ गयी हैं कि वह तप, योग तथा ज्ञानार्जन से नहीं हो सकती।  हम यहां किसी से याचना नहीं कर रहे पर यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि रॉबिनहुडीय व्यवस्था में मध्यम वर्ग के हारने से कोई भी जातीय, भाषाई, क्षेत्रीय तथा धार्मिक समूह एक इकाई के रूप में बचा नहीं रह सकता।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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2/17/15

जिंदगी और हमदर्दी-हिन्दी कविता(zindagi aur hamdardi-hindi poem)



दीवारों पर लिखे नारों से

इंसानों की जिंदगी

कभी नहीं बदल पाती है।



गुस्सा हो या पीड़ा

स्याही में डुबोने से

मिट नहीं जाती है।



कहें दीपक बापू अंधेरे में

भड़ास की रौशनी से

कितना भी बहलाओ स्वयं को

जिंदगी संवारने के लिये

किसी की हमदर्दी

घर पर चलकर नहीं आती है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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2/6/15

पेशेवरों के आंसू-हिन्दी कविता(peshewar aansu-hindi kavita)




जिनके घर में रहने वाले दिल
मतलब की आग में जले हैं
वह दूसरों के आंगन में
अंध्ोरे पर हमदर्दी जताते हैं।

अपना पूरा दामन हो बदरंग
दूसरों के वस्त्र पर लगे
एक दाग पर ही
हाहाकार मचाते हैं।

कहें दीपक बापू रोने के सौदे से
पेशेवरों ने अपने
महल बनाये है,
बाजार में हर जगह
आंसू उन्होंने सजाये हैं,
खिले हुए फूलों से
मुरझाने के पहले ही
हमदर्दी वह जताते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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1/9/15

कातिल दिमाग-हिन्दी कविता(qatil dimag-hindi kavita)



कातिल दिमाग है जिसका
उसे शिकार का
कोई भी बहाना चाहिये।

हर मर्ज की दवा
मिल जाती बाज़ार में
बीमारी से मरने के लिये
जो तैयार है उसे
कोई भी बहाना चाहिये।

कहें दीपक बापू खूनखराबे पर
आमादा लोगों से
इंसानियत की उम्मीद बेकार है
जिन्हें जंग लड़ना है
हजारों तरीके ढूंढ लेते
हथियार चलाने के लिये
कोई भी बहाना चाहिये।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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12/24/14

मन माया और मय के खेल योग साधना से ही जीता जा सकता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(man aur maya ke khel yoga sadhana se hee jeete ja sakte hain-hindi thought article)



            हमारा मानना है कि मन, माया और मय के विचित्र खेल को योगी ही समझ सकता है। यह तीनों उतार चढ़ाव या कहा जाये अस्थिर प्रकृति के हैं। मन पता नहीं कब  कहां और कैसे मनुष्य को चलने के लिये बाध्य कर दे। माया पता नहीं कब हाथ आये और निकल जाये।  मय का नशा चढ़ता है फिर उतर भी जाता है। अंतर इतना है कि मनुष्य देह में स्थित मन ही है जो माया और मय के पीछे भागता है।  इस तरह उसे सहज लगता है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में कहा जाता है कि मन पर नियंत्रण कर उसका स्वामी होने मनुष्य  प्रसन्न रह सकता है पर वह इसके विपरीत स्वयं बंधुआ बन जाता है जिससे जीवन में उसकी स्थिति उस मोर की तरह हो जाती है जो नाचने के बाद अपने गंदे पांव देखकर रोता है। मनुष्य भी एक के बाद एक भौतिक उपलब्धि प्राप्त करता है पर तन और मन पर आयी थकावट उसे कभी अपनी ही सफलता का पूर्ण आनंद नहीं लेने देती। एक सामान मिलने पर वह  दूसरी, तीसरी और चौथी की कामना होने से  वह भागता रहता है।  चिंत्तन के लिये उसे समय ही नहीं मिलता। सामानों से सुख नहीं मिलता यह अंतिम सत्य है।  सुख कोई बाहर लटकी वस्तु नहीं है जो हाथ लग जाये।  सुख तो एक अनुभूति जो अंदर प्रकट होती है।
            इस संसार को समझने के लिये बाह्य विषयों पर दक्षता से अधिक अपनी ही इस देह रूपी क्षेत्र को जानने की आवश्यकता है। यह योग साधना से ही पूरी हो सकती है।  योग साधना का विषय ऐसा है जिसमें एक बार अगर सिद्धि मिल जाये तो फिर संसार के सभी विषयों का सत्य सहजता से समझा जा सकता है।  एक योग साधक के खाने का भूख से और पानी पीने का प्यास से संबंध नहीं होता। वह  भोजन दवा की गोली या कैप्सूल की तरह यह सोचते हुए उदरस्थ करता है कि कहीं आगे भूख आक्रमण न करे।  वह समय तय कर लेता है कि निश्चित समय पर वह भोजन करेगा चाहे भूख लगे या नहीं।  वह पानी भी दवा की तरह पीता है ताकि उससे प्राणवाणु सहजता से देह में प्रवाहित होती रहे।  एक पारंगत योग साधक भोजन और जल का सेवन करते हुए भी भूख प्यास के अधीन नहीं होता। इससे वह सांसरिक विषयों में भी दृढ़ता पूर्वक निर्लिप्त भाव से स्थित हो जाता है।
            मनुष्य के बाह्य चक्षु सदैव बाहर के विषयों पर केंद्रित रहते हैं इसलिये बुद्धि भी केवल उन्हीं का चिंत्तन करती है।  मन भी विषयों में इतना अभ्यस्त हो जाता है कि मनुष्य परमात्मा की कृपा से प्राप्त इस देह का महत्व नहीं समझ पाता।  देह के बाह्य विकार जल और साबुन से नष्ट किये जा सकते हैं पर अंदर स्थित दोषों के निवारण का उपाय केवल योग साधक ही कर सकता है। सच यह है कि देह के बाह्य विकार भी आंतरिक दोषों से उत्पन्न होते हैं।  आंतरिक दोषों से मन और बुद्धि भ्रमित होती है और अंततः तनाव चेहरे पर प्रकट होता ही है। ऐसा नहीं है कि योग साधक कभी विकार या तनाव ग्रस्त नहीं होते पर वह आसन, प्राणायाम तथा ध्यान की कला से उनका निवारण कर लेते हैं।
            हमारे देश में योग साधना सिखाने वाले बहुत से विद्वान और संस्थान सकिय  हैं पर भारतीय योग संस्थान के शिविरों में  सक्रिय विशारद निष्काम भाव से जिस तरह यह काम करते हैं वह प्रशंसनीय है। सबसे बड़ी बात यह कि वहां निशुल्क सेवा होती है।  शुल्क लेना और देना माया का ही रूप है। भारतीय योग संस्थान के साथ जुड़ने अनेक साधकों के विभिन्न कार्यक्रमों मिलने जो सुखद अनुभव होता उसका शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं है।  इस तरह का सत्संग दुर्लभ होता है।  हम अन्य कार्यक्रमों में सामान्य लोगों से मिलते हैं तो सांसरिक विषयों पर उबाऊ चर्चा होती है पर योग साधकों से मिलने पर हुई योग विषय पर चर्चा अध्यात्मिक शांति मिलती है। तब यह ज्ञान सहज रूप से होता है कि माया, मन और मय के खेल से बचने के लिये योग साधना से बेहतर उपाय नहीं हो सकता।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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12/17/14

इंसानियत का प्रश्न-हिन्दी कविता(insaniya ka prashna-hindi poem)



चालाक और क्रूर इंसान के लिये

पूरा ज़माने के

सभी लोग खिलौना है।



कभी खून बहाते

दिल से उसमें नहाते

इंसानियत का प्रश्न

उनके सामने बौना है।



कहें दीपक बापू हथियारों पर

चलती है जिनकी जिंदगी

दया का अर्थ नहीं जानते,

खून और पानी में

अंतर नहीं मानते,

मिलाकर हाथ उनसे

अपना सुकून खोना है।
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12/12/14

यायावरी में अधिक आनंद-हिन्दी कविता(yayawari mein adhik anand-hindi poem)



डरे सहमे और

अकेलेपन से घबड़ाये लोग

समूह में रहते हैं।



समूह के सरदार

चाहे न हों असरदार

फिर भी उनमे मुख की तरफ

निहारते हुए

उनके नखरे सहते हैं।





कहें दीपक बापू यायावरी में

अधिक आनंद मिलता है,

बंधनों में तो मन

नियमों की चोट से हिलता है,

स्वर्ग इस धरती पर है

उन वीर पुरुषों के लिये

जीवन की धारा में

मुक्त भाव से जो बहते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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12/5/14

अपने अंदर गुण की स्थापना आवश्यक-हिन्दी चिंत्तन लेख(apne andar gun ki sthapna aavashyaka-hindi thought article)




            मनुष्य देह त्रिगुण से प्रभावित है, यह ज्ञान और विज्ञान का श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित सिद्धांत है।  इस सिद्धांत को रटकर सुनाने वाले बहुत हैं पर आशय समझने और समझाने वाले कहीं दिखाई नहीं देते।  अगर श्रीमद्भागव् गीता के सिद्धांतों का वैज्ञानिक पक्ष समझ लिया जाये तो फिर जीवन की धारा ही बदल जायेगी।
            हम अक्सर यह सोचते हैं कि अच्छा बोला, सुना और देखा जाये ताकि जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति हो।  इसके लिये आवश्यक है हम यह माने कि हम आत्मा हैं और उस देह को धारण किये हैं जिसके ‘स्वयं’ होने का भ्रम बोध हो रहा है। आत्मा और देह में भेद का आभास भी योग साधना के निरंतर अभ्यास करने पर तब पाया जा सकता है जब हम इंद्रियों का संयोग करने के चरम शिखर पर पहुंच जाते हैं। मूल रूप से मन और बुद्धि देह का भाग हैं पर योग साधना से  जब आत्मा उनके संपर्क में आता है तब वह स्वयं भी विचार करता है।  वह निष्कर्ष निकालता है। अगर यह संयोग न हो तो आत्मा न तो विचार करता है न कोई निर्देश दे पाता है।  कष्ट आने पर यह सोचकर व्यथित होता है कि उसके पास मन और बुद्धि का अभाव है।  जब आत्मा का इंद्रियों से संयोग हो जाता है तब इस बात की अनूभूति हो जाती है कि बाह्य तत्वों के प्रभाव से ही कोई गुण अंदर आ सकता है।
            हम जब यह कहते हैं कि प्रेम से बोलना, अहिंसा में रत रहना तथा निर्लिप्त भाव से कर्म करना चाहिये। हमारे यहां कदम कदम पर ज्ञान बघारने वाले हैं पर फिर भी समाज मानवीय सिद्धांतों के पालन में पिछड़ रहा है।  योग विज्ञान से परे सद्गुणों का महत्व तो बखान करते हैं पर उनको धारण करने की कला नहीं आती।  हम शराबियों, जुआरियों तथा लोभियों  के बीच जीवन बिताते हुए  व्यसनों के दुष्प्रभाव बखान करते हैं।  फिल्म, टीवी अथवा मनोरंनज के साधनों मे समय बिताते हुएं और समाज के लिये अध्यात्मिक दर्शन आवश्यक मानते हैं।  जो ज्ञान कहीं से सुना तो दूसरे को सुना दिया। मान लेते हैं कि किसी ने ज्ञान सुनाया तो वह  हमने दूसरे को सुनाकर अपना धर्म निभाया इसलिये हम ज्ञानी हैं। धर्म का संबंध केवल कर्मकांडों से जोड़न के कारण ज्ञान के सिद्धांतों को धारण कर उस राह पर देह को चलाने की  हमारे अंदर शक्ति   तथा संकल्प का अभाव हो जाता है। श्रीमद्भागवत् गीता में धारणा शक्ति का वैज्ञानिक वर्णन किया गया है।
            हम अगर संकल्प धारण करें तो कुछ गुण आंतरिक तथा कुछ बाह्य तत्वों से जुड़कर प्राप्त कर सकते हैं। अच्छा बोलने के लिये वैसा पढ़ना और सुनना जरूरी है।  अच्छा देखने के लिये आंतरिक चक्षु के साथ देह का संपर्क करने पर ही यह इच्छा पूरी हो सकती है।  हम आत्ममुग्ध होकर यह कभी न सोचें कि हम गुणवान हैं।  हमें इस बात पर चिंत्तन करना चाहिये कि हमारे आसपास सक्रिय वातावरण, व्यक्ति, विषय और और वस्तु अगर दुष्प्रभाव डालने वाली है तो हम चाहें भी तो उससे बच नहीं सकते।  उनके संपर्क का दुष्प्रभाव हम पर पड़ता है पर आत्मचिंत्तन के अभाव में हम उसे देख नहीं सकते।  जब आत्मचिंत्तन करते हैं तब ऐसे तत्वों से संपर्क रखने का विचार छूट जाता है। यह ज्ञान इंद्रियां ही विषयों तथा गुण ही गुणों में बरतते का सिद्धांत समझने पर ही आता है। अपने अंदर गुण पैदा करने के लिये आसपास सक्रिय वातावरण, विषय, वस्तु तथा व्यक्तियों की  श्रेणी पर अवश्य विचार करना चाहिये।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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