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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

5/27/11

स्वामी शब्द नाम के साथ जोड़ना ढकोसले से कम नहीं-हिन्दी लेख (swami shabd ka dhakosla-hindi lekh)

    अगर इस संसार में किसी भी धर्म के ढकोसलों की बात की जाये तो वह कम नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि सभी धर्मों के ठेकेदार निर्धारित रंगों के कपड़े ही पहनकर अनुयायिायों में अपनी पहचान दिखाते हैं। उनके वस्त्रों का रंग इस कदर चिन्हित होता है कि उसे देखते ही पता चल जाता है कि वह किस धर्म का ठेकेदार है। वैसे अपने यहां गेहूंए रंग पहनने वाले अनेक साधु संत हैं उनमें से कितने सात्विक कितने राजसी और कितने तामसिक हैं यह अल्रग से विचार का विषय है पर एक बात तय है कि ज्ञान से अधिक उनकी पहचान वस्त्रों से होती है। कुछ लोग धवल वस्त्र भी पहनते हैं पर वह भी उनके पंथ और समुदाय की पहचान होती है।
           इन धर्म के ठेकेदारों में से कई तो सत्ता के लिये इतने लालायित रहते हैं कि वह सन्यासी होने के बावजूद सांसरिक छलकपट में लग जाते हैं। वैसे गेरुए और धवल वस्त्रधारी अपने धर्म के प्रशंसक होते हैं पर एक कथित स्वामी गेरुए वस्त्र पहनते हैं और अग्नि का वेश होने का दावा करते हैं। उन्होंने अपने वेश को ही नाम लिया। होना तो यह चाहिए कि वह भी अन्य धर्म के ठेकेदारों की तरह अपने धर्म की प्रशंसा करें-न करें तो कम से कम आस्था रखने वालों का मजाक तो न बनायें। वह अभी कश्मीर गये थे वहां उन्होंने एक उग्रवादी नेता से मिलकर एक सभा की और उसमें कह दिया कि ‘अमरनाथ यात्रा हिन्दुओं का एक बड़ा ढकोसला है।
         हम यहां किसी प्रकार से उनका विरोध नहीं करने जा रहे क्योंकि ज्ञानियों का काम उत्तेजित होना नहीं है मगर यह भी सच है कि वह हर विषय में बिना अध्ययन या मनन के नहीं बोलते न लिखते हैं। बहरहाल वह कह रहे हैं कि अमरनाथ यात्रा ढकोसला है तो हम उनके ही अनेक ढकोसलों की बात तो करेंगे।
        पहली बात तो नाम और वस्त्रों को लेकर ही करेंगे। आम तौर से अनेक माता पिता अपने बच्चे का नाम स्वामी रख देते हैं पर देखा यह गया है कि उनमें से कोई स्वामी नहीं बनता। जितने भी स्वामी नामधारी हैं वह धर्म के क्षेत्र में आने के बाद ही यह पदवी स्वयं धारण करते हैं। फिर गेरुए वस्त्र पहन लेते हैं। यहां यह भी याद रखने वाली है कि गेरुए वस्त्र भी नियमित रूप से आम लोग नहीं पहनते पर स्वामी और संत की पदवी धारण करने वालों की पहचान इसी से बनती है। नाम में माता पिता कभी अग्नि शब्द नहीं लगाते। कम से कम वह यह प्रचारित होते नहीं देखना चाहते कि उनका पुत्र अग्निवेश धारी है। उन्होंने यह सब किया। काम वह करते हैं नक्सलियों की तरफ से सरकार के पास जाकर मध्यस्थता का। वह कथित रूप से आदिवासियों के हितचिंतक हैं और उनको हिंसा में ही उनका कल्याण नज़र आता है। कश्मीर में प्रथकतावादियों में उनको विश्वकल्याण का भाव दिखता है।
           वह विशुद्ध रूप से व्यवसायिक अभियान संचालक हैं। भारतीय समाज में अस्थिरता तथा तनाव पैदा करने के लिये यकीनन कोई उनको आर्थिक सहायता करता होगा। एक बात यहां यह भी बता दें कि गेरुए वस्त्र सामने वाले व्यक्ति पर प्रभाव छोड़ते हैं यह एक वैज्ञानिक अनुसंधान से निकला निष्कर्ष है। उन्होंने गेरुए वस्त्र इसलिये ही पहने होंगे ताकि उनकी बातें प्रभावी हों। दूसरी बात यह कि भारतीय समाज पर प्रतिकूल टिप्पणियों से उनको प्रचार भी इसलिये मिलता है क्योंकि विश्व समुदाय कहता होगा कि ‘आखिर यह बात एक धर्मगुरु कह रहा है?’
         भारत के महान लोकसंत बाबा रामदेव ने योग की शिक्षा का प्रचार पूरे विश्व में किया है। योग एक विज्ञान है उसकी पुष्टि तो सारी दुनियां के स्वास्थ्य और मनोविज्ञान विशेषज्ञ कर रहे हैं। उन्होुंने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिला्फ अभियान प्रारंभ किया। भारत के स्वाभिमान की वापस के उनके अभियान की समस्त चर्चा हुई। समस्या यह थी कि चाहे भले ही वह समस्त धर्मों के लोगों को प्रिय हों पर उनके प्रयासों में कहीं न कहीं हिन्दुत्व का प्रभाव दिखता है जो अनेक लोगों को पसंद नहीं। इससे अन्य धर्म के ठेकेदारों को भारी असुविधा होती दिख रही थी।
          बाबा रामदेव की छवि को खराब करने का बाकायदा अभियान चला। मुश्किल यह थी कि इस अभियान में कोई गेरुए वस्त्र पहनने वाला कोई साधु संत नहीं था। इसके लिये स्वामी अग्नि नाम धारी इन महाशय को चुना गया लगता है। पहले तो इन्होंने अपने एक साक्षात्कार में योग की शक्ति को ही चुनौती देते हुए बताया कि ‘अमुक संत योग साधना करते थे पर अंततः उनको अपने इलाज के लिये अमेरिका जाना पड़ा।’
              तब हैरानी हुई और उनके तथ्य की सच्चाई पर संदेह हुआ। एक बात तय रही कि जो नियमित योग  साधना करेगा वह कभी अमेरिका इलाज के लिये नहीं जायेगा। इधर जब बाबा रामदेव का प्रभाव और प्रचार इतना बढ़ गया तो शायद कुछ लोग डर गये। इसी बीच समाजसेवी अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करने पर यही कथित स्वामी उनके पास पहुंच गये। उस समय ऐसा नहीं लगा कि यह बाबा रामदेव के अभियान को प्रचार से बाहर करने की कोशिश है पर बात की घटनाओं से ऐसा लगा कि यह इन्हीं स्वामी के प्रायोजकों की कोई योजना रही होगी।
       फिर उनके नक्सल प्रभावित इलाकों में सक्रियता देखकर लगा कि वह कहीं  न कहीं  भारतीय दर्शन और संस्कृति  के विरोधियों के मित्र हैं। यकीनन इसके प्रायोजक वह धनपति होंगे जिनको ऐसा करने से संतोष या लाभ मिलता है।
          अगर यह स्वामी अग्नि के वेश नाम धारी सज्जन वाकई ढकोसलेबाज नहीं  हैं तो उनको पहले तो गेरुए वस्त्र त्यागना चाहिए। यह स्वामी नाम धारण करना ही अपने आपमें सबसे बड़ा ढकोसला है। संस्कृत निष्ठ नाम रखने से ऐसा लगता है कि पहले इनको अपने संत के रूप में प्रसिद्ध होने का शौक चर्राया होगा पर नाकाम रहने पर भारतीय दर्शन के विरोध का मार्ग अपनाया होगा। दूसरी संभावना है कि उनका चयन ही सतत भारतीय दर्शन का विरोध करने के लिये किया गया हो फिर गेरुए वस्त्र पहनने के लिये कहा गया हो ताकि लगे कि यह कोई सुधारवादी संत है। 
       इधर अब अन्ना हजारे और यह कथित स्वामी देश भर में जनजागरण का प्रयास कर रहे हैं। अभी तक अन्ना हजारे को साफ सुथरा व्यक्ति बताया गया पर उनकी कोई सहकारी संस्था है जिस पर आक्षेप लग चुके हैं यह अब जाकर पता लगा है। फिर उनके निकटतम सहयोगी  भी कम विवादास्पद नहीं है जिनके बारे में स्वयं अन्ना हजारे साहब ने यह कहा कि ‘मैं उनको जानता नहीं।’
       ऐसे में यह कैसा आंदोलन है जिसके कप्तान अपनी टीम को नहीं जानता। फिर अन्ना हजारे जिस तरह लोकपाल के पद को सर्वशक्तिमान की मूर्ति बताया है वह सच कम ढकोसला ज्यादा लग रहा है। उनके प्रस्तावित लोकपाल के स्वरूप में अनेक बातें आपत्तिजनक हैं खासतौर से उसके चयन में नोबल और मैगसासे पुरस्कार विजेता की भूमिका अस्वीकार्य है। उससे लगता है कि यह पूरा आंदोलन ही प्रचार का ढकोसला और प्रायोजित है। एक तो बाबा रामदेव के अभियान को प्रचार में कमतर बताना दूसरा विश्व में यह संदेश भेजना कि भारत में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नहीं बल्कि दो आंदोलन हो रहे हैं। यह आंदोलन उन्हीं लोगों ने प्रायोजित किया है जो जनता का ध्यान अपने व्यापार से हटाना चाहते हैं। यही कारण है कि बाबा रामदेव के अभियान में जहां हिन्दुत्व की बदबू आने तथा अन्ना हजारे के आंदोलन में सर्वधर्मभाव की खुशबू दिखाने का प्रयास हुआ है।
जहां तक अमरनाथ की यात्रा और वहां पर श्रद्धालुओं की भक्ति को ढकोसला कहने का प्रश्न है। उसका जवाब यह है कि ऐसी भक्ति विरलों को ही नसीब होती है। आखिर वहां जाने वाले भक्त को कौनसा इनाम मिल जाता है। बल्कि जेब से पैसे खर्च होते हैं और शरीर भी कष्ट झेलता है। यह निष्काम भक्ति का सर्वोत्तम रूप है। मूर्ति पूजा के जो लाभ है उसका वर्णन तो चाणक्य ने किया है। यह हमारे अध्यात्मिक ज्ञान का प्रभाव ही है कि ऐसी बातों पर उत्तेजित नहीं होते और न ही दूसरे धर्मों के ढकोसलों की चर्चा करते हैं।
         एक सभा में इन्हीं कथित स्वामी को उनके बयान की वजह से उनको जूता मारने वाले की हम  निंदा करते हैं।    वैसे यह जूते मारने की घटना भी हमें ढकोसला और प्रायोजित लगती है वह भी एक साधु वेश धारी के हस्त कमल से होने पर सहज नहीं लगती। ज्ञानियों के पास ऐसी तर्कशक्ति ऐसी होती है कि अच्छा खास पानी मांग जाये। फिर एक साधु ने ऐसा किया उससे यह लगता है कि वह भी स्वामी जैसा ही रहा होगा। अगर कोई ज्ञानी हो तो वह इन स्वामी को अपने तर्कशक्ति से ऐसा हरा दे कि फिर कुछ बोल ही न सके।
        यह स्वामी बाज़ार के सौदागरों से प्रायोजित है जिसे प्रचार माध्यम बहस के लिये बुलाते हैं। जवाब देने वाले भी वैसे ही हैं। ज्ञानी और विचारवान वर्ग के आम लोगों के लिये बाज़ार और प्रचार के मार्ग बंद हैं और इसलिये ज्ञान का रट्टा लगाने और भारतीय अध्यात्म के ग्रंथ रटने वालों के बीच एक प्रायोजित द्वंद्व चलता है जिसे देखकर हंसी आती है।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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1 comment:

निरामिष said...

आपने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया!!
पूर्ण विवेचना युक्त आलेख।

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