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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

2/4/18

पुते चेहरे चंद शब्द कह पाते, पराये भाव से ही दर्द सह पाते-दीपकबापूवाणी (pute chehre Chand shabd kah pate-DeepakBapuwani)

लोकतंत्र में प्रचार मंत्र चलता है,
अंधेरे में रौशनी का वादा जलता है।
‘दीपकबापू’ आंख कान मुंह बंद रखें
क्रांति का नारा विज्ञापन में पलता है।
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सत्ता के गलियारों में
बेबस का कोई हमदर्द नहीं होता।
गर्दन कटे आम इंसानों की
तख्तनशीनों को इसका दर्द नहीं होता।
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आतंक के सहारे रक्षानीति पली है,
 कत्ल से पहरेदारों की रोटी चली है।
‘दीपकबापू’ भय का व्यापार खूब चलाते
बहस में विज्ञापन की रौशनी जली है।
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पुते चेहरे चंद शब्द कह पाते,
पराये भाव से ही दर्द सह पाते।
‘दीपकबापू’ रुपहले पर्दे के ख्वाब
सच्चाई के दरिया में ही बह जाते।
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नारों पर दिमाग न लगाना
वादों में दिल न फसाना।
कहें दीपकबापू इश्तिहार पढ़कर
सच्चाई से अक्ल न लड़ाना।
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न उनकी हार न जीत है,
दलालों की धंधे से प्रीत है।
कहें दीपकबापू पशु जैसी प्रजा माने
हर दरबार की यही रीत है।
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चीख कर धर्म चेतना जगाते,
रक्षा के नाम दानपात्र लगाते।
‘दीपकबापू’ कमान में तलवार रखे
बंद कमरे में जंग के नारे लगाते।
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जिस पर भरोसा करें तोड़ देता है,
हमारा हिस्सा अपने में जोड़ देता है।
‘दीपकबापू’ नया नारा और वादा
नये धोखे की ओर मोड़ देता है।
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1/24/18

पद्मावत फिल्म के विरोध में हिंसा समाज, धर्म और राष्ट्र को बदनाम कर सकती है-हिन्दी चिंत्तन (Padmavat Film ke virodh mein Hinsa n karen-HindiLekh,HindiArticleOnpadmavat)


पद्मावत फिल्म के विरोध में हिंसा समाज, धर्म और राष्ट्र को बदनाम कर सकती है-हिन्दी चिंत्तन
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हमने बीस साल से फिल्म थियेटर जाना ही छोड़ दिया है। आजकल यह हाल है कि हर फिल्म एक महीने बाद टीवी पर आ जाती है इसलिये कौन तीन घंटे जाकर थियेटर में समय तथा पैसा बर्बाद करे? बहरहाल पद्मावत फिल्म का विवाद पिछले एक दो साल से देख रहे हैं। हमारी अब तक यह समझ में नहीं आ रहा कि इस फिल्म का विरोध कहीं इसके प्रचार के लिये तो नहीं हो रहा। हो सकता है विरोधियों की नीयत साफ हो पर कहीं न कहीं इसे सुनियोजित रूप से प्रचार तो नहीं मिल रहा। हमें नहीं लगता कि टीवी और स्मार्टफोन की वजह से ज्यादा लोग फिल्म देखने थियेटर जाते हो। अब कोई फिल्म सौ दिन या दो सौदिन पूरे करती नहीं दिखती। बहरहाल इस फिल्म को हिन्दूत्व विरोधी बताकर पाखंडियों ने भी खूब प्रचार पाया है। जहां तक हमारा सवाल है तो बिना आव्हान के ही हम यह फिल्म थियेटर में क्या टीवी पर फ्री में भी देखने वाले नहीं है। हम आधुनिक सामाजिक व्यंग्य कथानक पर आधारित फिल्म पंसद करते हैं जैसे कि गोलमाल। मध्यम गति के संगीत पर गीत हमारी पसंद है। सो यह फिल्म तो टीवी पर चलती भी मिले तो हम चैनल बदल देंगे। सबसे ज्यादा बुरा हमें यह लग रहा है कि इस फिल्म के विरोध में जिस तरह सड़कों पर तोड़फोड़ हो रही है उस पर हमें गुस्सा आ रहा है। यह निरर्थक हिंसा समाज विशेष ही नहीं हिन्दू धर्म के साथ ही देश के भी विश्व में बदनाम करने वाली है। यह कमजोर समाज की निशानी है जबकि हम लोग मजबूत चरित्र तथा आदर्श की राह पर चलने वाले लोग हैं जिसकी ताकत मौन होता है और उदासीनता एक शस्त्र। सो उदासीन आसन करें। इस पर लिखा गया यह लेख आप चाहें तो पढ़ सकते हैं।
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1/14/18

कंपनी देव के दर्शन कर लो न हंसी आयेगी न डर लगेगा-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख (Company Devta ke darshan kar lo n hansi ayegi n Dar lagega-HindiSatireArticle)

                कंपनी देव के दर्शन कर लो न हंसी आयेगी न डर लगेगा-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख  
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                  उस विदेशी अर्थशास्त्री का नाम याद नहीं आ रहा जिसने कंपनी के लिये दैत्य शब्द का उपयोग किया था। विदेशी भी इसलिये बता रहे हैं कि लोग देशी को प्रमाणिक नहीं मानते। बहरहाल वाणिज्य स्नातक की उपाधि धारण करने तक हमें इसका आशय नहीं समझ पाये। इसका मतलब तब समझ में आया जब भारत के समाजवादी सिद्धांतों पर उदारता का बुलडोजर चला और निजीकरण ने अपना विकास पथ बनाना शुरु किया। दरअसल कंपनी एक समूह का नाम होता है जिसे कोई सेठ ही सेवक का नाम रखकर चलाता है।नाम होते है-कहीं मुख्य प्रशासनिक निदेशक कहीं मुख्य प्रबंधक आदि आदि।  सबसे ज्यादा अंश इन्हीं सेठों के पास होते हैं-नाम के लिये कुछ अंश सार्वजनिक क्षेत्र में भी बेचे जाते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में भी बहुत मात्रा में बेचे जाते हैं तो भी सत्ता इन्हीं सेठों के पास होती है।  बहरहाल इन सेठों का रूप सेवक के रूप में जरूर दिखता पर व्यवहार तो स्वामी की तरह ही होता है।  सारा सफेद काला कंपनी के नाम होता है। सेठ का नाम अधिकतर जनमानस में चर्चा के लियेनहीं आता-चमके तो सेठजी की वह वाह और डूबे तो कंपनी के नाम को बदनामी मिलती है। बाकी सभी वैसे का वैसा ही होता है जैसा निज व्यापार में होता है। अलबत्ता जिनके पास कंपनी है वह आजकल विश्व की अर्थव्यवस्थाओं में प्रभावशाली लोग होते हैं। उनके सामने राजनेता, फिल्मअभिनेता, पत्रकार और खिलाड़ी नतमस्तक होते हैं। 
     हमारे देश मेंपहले भारतीय दूरभाष निगम को कंपनी में बदला गया। फिर धीरे इस क्षेत्र में निजीकरण हुआ तो उसके बाद कंपनियों ने अपने पांव फैलाये। लोग खुश हुए क्योंकि सभी के पास मोबाइल हाथ में आ गया पर उन्हें पता ही नहीं चला कि उनकी जेब कैसे कट रही है। अब अगर हम यह कहें कि कंपनी दैत्य ने देवता का मुखौटा लगा लिया है क्योंकि भले ही समाज शास्त्री तथा अर्थशास्त्री यह कहते रहें कि राज्य का दायरा सिमटकर निजी हाथों में जा रहा है तब धनपतियों के जनप्रबंधन में हस्तक्षेप से बचा नहीं जा सकता।
      हमने कंपनी दैत्य या देवता का महत्व संक्षिप्त रूप से इसलिये बखान किया ताकि यह बता सकें कि आम जनमानस यह समझ ले कि वह जिन लोगों को अपना मुखिया मानता है उनकी डोर इन्हीं धनपतियों के हाथ में है।  हम अक्सर यह सुनते हैं कि यहां या वहां युद्ध होने वाला है या फिर कहीं कोई हमला होने वाला है पर होता कुछ नहीं होता। कुछ दिन पहले हमने लिखा था कि अमेरिका भले ही उत्तरकोरिया को धमका रहा है पर हमला करेगा नहीं। कई दिन की सनसनी के बाद अब अमेरिका ने उत्तरकोरिया से बातचीत की पेशकश की है।  भारत और पाकिस्तान में संबंध में भी हमारा मानना है कि जब तक कंपनी देवता अपना हित नहीं देखेंगे तब तक नहीं करायेंगे। दरअसल इसके पीछे हमारा यही मानना है कि पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था कंपनी दैत्य या देवता के हाथ में चली गयी है और अब वही तय करने लगा है कि अपने टीवी चैनलों के लिये समाचार, मनोरंजन सामग्री और बहसों के लिये विषय कैसे तय किये जायें? युद्ध से तो कंपनी दैत्य या दानव स्वयं ही मंदी देवी का शिकार हो जायेगा पर बेचने के लिये सनसनी तो चाहिये इसलिये युद्ध जैसी आंशका हमेशा बनाये रखेगा-इससे उसके बनाये हथियारों का धंधा भी चलेगा। डरे जनमानस का मुखिया खुलकर हथियार, विमान और रक्षा के समझौते खरीद सकेगा-उसपर कोई आपत्ति में नहीं करेगा।  बहरहाल हम अध्यात्मिक लेखक के रूप में हम यह लिखते हैं कि माया के खुल को समझ ले वह ज्ञानी है और एक व्यंग्य लेखक के रूप में कहते हैं कि ‘कपंनी देवता का रूप देख लो तब किसी चीज पर न हंसी आयेगी न डर लगेगा।

11/2/17

कहीं रौशनी कहीं अंधेरा पल रहा है-दीपकबापूवाणी (kahin roshni kahin andhera pal raha hai-DeepakBapuwani)


वाणी पर सजे दरबार के बहुत नाम, जैसी जगह देखी वैसा लिया मुख से नाम।
दीपकबापूभक्त रूप धरा थैला फैलाते, चले सवारी राजमार्ग फकीर बस नाम।।
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जिन सामानों में चैन ढूंढा पुराने हो गये, जमीन पर उतरे बिना सपने पुराने हो गये।
दीपकबापूभक्ति में ही शक्ति पाई, ताजा रहा नाम साथ जो थे सभी पुरान हो गये।।
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कहीं रौशनी कहीं अंधेरा पल रहा है, कोई संयोग से खुश कोई वियोग जल रहा है।
दीपकबापूएक जगह कई नजारे देखें, किसी का सूरज उदय तो किसी का ढल रहा है।।
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मौसम के खेल में इंसान चला है, प्रतिकूल में लगे सब बुरा अनुकूल में सब भला है।
दीपकबापूअपने लिये सब सामान जुटाये, चिराग तो वह जो सबके लिये जला है।।
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अपनी आस्था भी सरेआम दिखाते, भक्ति में नाम पर शोर मचाना सिखाते।
दीपकबापूगवैये बन गये रुहानी उस्ताद, शार्गिदो को बस नचाना सिखाते।।
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10/21/17

दिल का मजा क्या जो पांव थका देता है-दीपकबापूवाणी (Dil ka maza paanv ko dhaka deta hai-DeepaBapuWani)

ऊंचे पद चाहें किताबें कभी नहीं पढ़े, चाटुकारिता से तख्त की सीढ़ी चढ़े।
‘दीपकबापू’ देखें नहीं काबलियत का सबूत, तारीफ उनकी जो धोखे से बढ़े।।
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चंदन तिलक लगाने से भक्ति न मिले, बड़े बोले से कभी शक्ति न मिले।
‘दीपकबापू’ धर्म की पोथी सिर पर रखे, भटका मन कभी आसक्ति न हिले।।
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तन का विकार दिखे मन समझे न कोई, बोला शब्द सुने सोच जाने न कोई।
‘दीपकबापू’ दोहरेपन जीने की आदत हो गयी, अपना ही सच माने न कोई।।
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दिल का मजा क्या जो पांव थका देता है, वह जोश क्या जो अक्ल पका देता है।
‘दीपकबापू’ बेचैनी लिये भागते इधर उधर, वह चैन क्या मिले जो दर्द बका देता है।।
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नदियों का जल समेटता समंदर गहरा है, सुंदर वन समेटे पहाड़ घाटियों का पहरा है।
‘दीपकबापू’ आकाश समेटे सूरज चंद्रमा तारे, तारीफ से उसे कैसे खुश करें वह तो बहरा है।।
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10/9/17

अपने लिये रुपये सभी को कमाने हैं-दीपकबापूवाणी (Apne liye rupaye sabhi ko kamane hain-DeepakBapuWani)

भीड़ में चिल्लाने से अच्छा उदास हो जायें, लोगों से दूर अपने ही पास हो जायें।
दीपकबापूदर्द हो बनाया बिकने का सामान, आओ अपने स्वयं ही खस हो जायें।।
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अपने लिये रुपये सभी को कमाने हैं, भल्ला बेचें या भला धंधे उन्हें जमाने हैं।
दीपकबापूवादे करते नारे भी बहुत सुनाये, इंसान शिकारों की तरह लुभाने हैं।।
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सभी को पराये झगड़े पर मजा आता है, गैर गिरे तो हर कोई ताली बजाता है।
दीपकबापूभौतिक जाल में फंसाये अक्ल, वही फटे में टांग डाल सजा पाता है।।
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ज़माने की भलाई का शोर करते हैं, निरर्थक बातों से सभी को बोर करते हैं।
दीपकबापूमन बहलाते वादे और नारे से, शब्दों में पत्थर जैसा जोर भरते हैं।।
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जोगी जिंदगी में महल लगें कैदखाने, असिद्ध जाते अंदर सिद्धि का सौदा लगाने।
दीपकबापूमायाजाल में फंसाया उन्मुक्त भाव, चले बाज़ार त्यागी छवि चमकाने।।
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सच्चे योगी
राजनीति शास्त्र नहीं पढ़े हैं,
राजपदों पर शान से चढ़े हैं।
दीपकबापूदिल के सौदे में
जज़्बात पथरीली सोच में मढ़े हैं।
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झूठों ने भी तकदीर बदली है,
हारे पर सच्चे की पीर पगली है।
दीपकबापूशब्दों में बहकते नहीं
मक्कारों की लालच ठग ली है।।
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छाया पर भरोसा सदा किया करो
कभी धूप से भी लड़ लिया करो
दीपकबापूनिकालकर पसीना
उसकी खुशबू में भी जिया करो।
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घाव सहलाने का मजा लेने दो
हमारा खून बहते जाने दो।
हमें लड़ाई का मजा लेने दो यारों
मुश्किलों को ऐसे ही जाने दो।
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उमस का मौसम बंद हवायें
आओ कुछ पल उदास हो जायें।
दीपकबापूकब तक तक रहे बदहवास
आओ अकेले में अपने पास हो जायें।
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