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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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5/26/07

एक सोच के साथ चलना होगा

NARAD:Hindi Blog Aggregator
इच्छाओं और आशाओं की सतत पूर्ती को ही मनुष्य वास्तविक सुख समझता है -उसे लगता है कि उसकी आत्मा केवल पाने से ही सन्तुष्ट होती है ।इच्छाओं और आशाओं की पूर्ती का यह खेल जीवन भर चलता है पर आदमी कभी सुख नहीं ले पाता । एक इच्छा पूरी होती है दूसरी उत्पन्न हो जाती है-कभी कभी होता यह है एक अभी पूरी ही नही होती है दूसरी मन में उठ कर खडी हो जाती है। हम अपनी इच्छाओं के इस तरह गुलाम हो गये हैं कि हमें रिश्तों और समाज की परवाह ही नहीं रही है ।

हमें याद है जब बहुत गर्मी पड़ती थी तब कि पंखा बहुत गर्म हवा देता था तब कुछ लोगों के पास ही कूलर होता था पर आदमी उस गरमी को झेल कर भी अपने सारे काम करता था । धीरे -धीरे कूलर का फैशन चला फिर टीवी और फिर बायिक और अब कार की सुविधा आसानी से उपलब्ध है । कहते हैं विकास हो गया । पूरी दुनियां एक दुसरे के करीब आ गयी है । पर क्या सुख आ पाया, क्या गरीब का शौषण ख़त्म हो गया ? और क्या भौतिकता की इस अंधी दोड़ ने समाज में अस्थिरता और असुरक्षा का माहौल नहीं बना दिया है?

यह प्रश्न हैं जो हमारे अन्दर उठते हैं । इन प्रश्नों का उत्तर हम खोजने की बजाय केवल तथाकथित विकास पर खुश होकर रह जाते हैं । अगर हम आज की सुख सुविधाओं को देखे तो उसने शारीरिक रुप से राहत हमें जरूर दीं है उसका लाभ उठाकर जहां हमें अपने अन्दर चिन्तन, मनन और आत्ममंथन की क्षमता विकसित करना चाहिऐ थी । हुआ इसका उल्टा ही और हमें जो आराम मिला तो उसमे इतना खो गये कि हमने सोचना और विचार करना कम कर दिया और हालत यह कि आज की नई पीढी को जो अपने संस्कारों और संस्कृति का ज्ञान देना चाहिए वह नहीं दे रहे और परिणाम यह सामने आ रहा है कि उसकी बुध्दी में ज्ञान प्राप्त करने की तीक्ष्ण भाव तो है पर उस ज्ञान को स्थापित करने और उसका उपयोग करने के लिए जो चिन्तन चाहिऐ वह उसमें नहीं है- एक बुजुर्ग सज्जन कह रहे थे कि नई पीढ़ी में बुध्दी की तीक्ष्णता बहुत है पर चिन्तन और मनन की क्षमता कम है ।

बात केवल इतनी ही नहीं है कि हमारे अन्दर बौध्दिक चिन्तन करने की प्रवृति का ह्रास हुआ है वरन समाज के प्रति हमारे मन में जो बेरुखी का जो भाव बना है उससे भविष्य में उसका विघटित स्वरूप सामने आयेगा वह देश के लोगों में अस्थिरता और असुरक्षा का भाव पैदा करेगा -जो कि मानसिक बीमारियों का कारण भी होगा। यह चिता का विषय है ।

मनुष्य का मूल स्वभाव ही स्वार्थी है पर हमारे देश में परमार्थ का भाव सदियों से भरा जाता रहा है जिसके चलते हमारा समाज आज भी विश्व का एक संगठित और संस्कृत समाज माना जाता रहा है , पर लगता नहीं है भविष्य में ऐसा रह पायेगा । आधुनिक सुख-सुविधाओं को अपनाना बुरी बात नहीं है पर उनका दुरुपयोग गंभीर समस्याएँ पैदा कर देता है और हम उन्हें देख रहे हैं पर समझ नहीं रहे । जरा इन समस्याओं पर नीचे गौर फरमायें , और पता नहीं कि आप मेरे से सहमत होते हैं या नहीं-पर कम से कम विचार तो कर ही सकते हैं ।
१.हम सदियों पुरानी विवाह पध्दति को अपनाए हुए हैं ,और कहते हैं कि हमारे पूर्वजों की देन है पर साहब हमारे पूर्वजों के समय में भला कार, मोटर सायकल, फ्रिज, टीवी , और मोबाइल थे ही कहॉ जो वह इसका लेनदेन करते -अब बताएं क्या यह गलत हैं । अगर ज्यादा खरी बात कहें कि भाई हमारे बाप-दादों ने भी यह सब चीजें देखीं थी जो आज हम माँग रहे हैं। एक तरफ पुराने संस्कारों की बात और चीजें माँगते हैं तो आधुनिक वह भी नई माडल की।
२.रात को खाना खाते हैं और पांच सौ फ़ीट दूर स्थित पान की दुकान पर कार या मोटर सायकिल से जाते हैं । इस माहौल ने समाज का माहौल किस तरह बिगाड़ा है जरा सोचिये । किसी अमीर परिवार के लोग अपने उन रिश्तेदारों के पास जाते हैं जो आर्थिक दृष्टि से थोडा कम है तो वहाँ न केवल अपनी फर्माइशों से उन्हें तंग करते हैं वरन उन्हें अपनी अमीरी और उनकी गरीबी का भी मजाक उड़ाते हैं और आज यह हालत है कि बच्चे उस रिश्तेदार के यहां जाना ही पसंद नहीं करते जो स्तर में उनसे थोडा कम हैं । कह देते हैं कि वहां अमुक वस्तुएं नहीं है और हम बोर हो जायेंगे । यहाँ याद रहे कि देश में धन के असमान वितरण ने अमीर-गरीब के बीच खाई बढाई है बल्कि रिश्तेदारों के बीच भी अंतर को बढ़ाया है ।
मैं कोई चिताएं नहीं बढ़ा रहा हूँ पर चर्चा का विषय का विषय प्रस्तुत कर रहा हूँ । आख़िर हमें कहीं न कहीं तो रुकना होगा, क्योंकि हम सब इन हालतों का कहीं न कहीं सामना कर रहे हैं ,पीडा भी होती । जब एक सोच हमारे सामने होता है तो हम उस पीड़ा को सहज भाव से लेते हैं। जहाँ अपने से ज्यादा घनी रिश्तेदारों का सामना करने की शक्ति हम और हमारे परिवार में आती है और अपने से कम धनवान के यहां अपने और अपने परिवार से सदस्यों के व्यवहार पर भी नियत्रण कर ही सकते हैं। हम सोचते हैं पर उसे अपने दिमाग में सदैव स्थापित नहीं करते और इसी कारण न केवल गलतिया कर बैठते हैं और अपमान की असहनीय पीड़ा का भी सामना करना पड़ता है । एक सोच के चलाते हमे दोनों स्थितयों का सामना कराने की शक्ति आ जाती है। शेष अगले अंक में

5/24/07

परनिन्दा न करें, न डरें

NARAD:Hindi Blog Aggregator
जब कोई हमें अपने बारे में आलोचनात्मक बात कहता है तो हम असहज हो जाते हैं और फिर अपनी सफाई देते-देते अपने लिए मुसीबत खडी कर लेते हैं । हम यह मानकर चलते हैं कि हम में कोई कमी नहीं है और दूसरों में दोष ढूंढते रहते हैं और उनकी चर्चा कर अपना मन बहलाया करते हैं । जब कोई हमारी निंदा करता है तो स्वाभाविक रुप से घबडा जाते हैं । यह असहज भाव इसीलिये पैदा होता है कि हम अपने अंतर्मन के बारे में कभी आत्ममंथन नहीं करते , और सदैव बाहर की तरफ ही देखते हैं । सदैव दूसरों के छिद्रान्वेषण में हम यह भी भूल जाते हैं कि हम भी उसी माटी के पुतले हैं जिसके अन्य लोग हैं और दोष हम में हो सकते हैं ।
संत प्रवर कबीरदास कहे हैं कि

सातो सागर में फिरा ,जम्बुद्वीप दे पीठ
परनिंदा नाहीं करे ,सो कोय बिरला दीठ
इसका आशय यह है कि मैं दूर-दूर तक घूमा पर दूसरों की निंदा न करता हो ऐसा कोइ बिरला ही मिला जो किसी की निंदा न करता हो।
परनिंदा करने से हमारे अन्दर यह भ्रम हो जाता है कि हम सबसे श्रेष्ठ हैं और जब कोई पीठ पीछे हमारी आलोचना करता है तो हम घबडा जाते हैं और कहीं सामने ही की तो हम ऎसी सफाई देने लगते है जिसके बारे में हमें खुद यकीन नहीं होता। हम अपने गुणों का बखान करते हैं और सोचते हैं कि हम अपनी इस आत्मप्रवंचना से अपने आलोचना को धो रहे है पर लोग हम पर हँसते है। कभी कोई हमारे सामने अपनी आलोचना से घबडा कर जब कोई इस तरह झूठी आत्मप्रवंचना करता है तो हम उस पर हँसते हैं कि नहीं । कई बार कुछ चालाक लोग हमारी आलोचना के लिए दुसरे के नाम की मदद लेते हैं -अमुक आदमी आपके बारे में यह कह रहा था। उसकी बात सुनकर हम घबडा जाते हैं और वह हमारे असहज भाव का फायदा उठाकर वह हमसे अपना काम निकाल लेता है और इतना ही नहीं वह दुसरे के प्रति हमारा मन भी मैला कर जाता है ।
अत: हमें अपने जीवन में सदैव ही सहजता के भाव से रहना चाहिए , और यह तभी संभव है है जब हम आत्ममंथन करें। साथ ही हमें किसी की निंदा न करना चाहिए और न अपनी निंदा से डरना चाहिए।

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