समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label विचार. Show all posts
Showing posts with label विचार. Show all posts

9/13/10

हिन्दी दिवस-भाषा की दृष्टि से तो संत आसाराम बापू की ‘ऋषि प्रसाद’ भी अच्छी है (magazine of rishi prasad of sant asaram bapu and hindi-hindi diwas par vishesh lekh)

           अगर समाचार पत्र पत्रिकाओं के पत्रकार यह सोचते हैं कि उनके समाचार या लेखों में देवनागरी में अंग्रेजी शीर्षक-जैसे ‘टाईम ऑफ न्यू जनरेशन,’ यूजर्स ऑफ इंटरनेट‘ या ‘न्यू टाईप ड्राइंग रूम’-लिखने से पाठक आकर्षित होता है तो गलतफहमी में हैं। एक नहीं अनेक समाचार पत्र यह मानकर चल रहे हैं कि आजकल के नये शिक्षित युवा ही उनके पाठक हैं और देवनागरी लिपि में अंग्रेजी शीर्षक लिखकर उनको प्रभावित करेंगे तो यह उनकी गलतफहमी के अलावा अन्य कुछ नहीं है। उन्हें इसके दुष्प्रभाव का अनुमान नहीं है क्योंकि इससे हिन्दी समाचार पत्रों के नियमित पाठक के मन में जो वितृष्णा का भाव आता है उसने हिन्दी अखबारों का महत्व कम ही किया है। दूसरी गलतफहमी उनकी यह है कि वह जैसी हिन्दी लिखेंगे वैसी ही समाज का हिस्सा बन जायेगी। उनको शायद अंदाज नहीं है कि उनका एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग तो हिन्दू संतों की हिन्दी पत्र पत्रिकाओं से जुड़ गया है और उनकी ताकत इतनी बड़ी है कि वह दैनिक समाचार पत्र पत्रिकाओं के अपने विरुद्ध होने वाले प्रचारात्मक हमलों की परवाह ही नहीं करते। इसमें संत प्रवर आसाराम बापू की ऋषि प्रसाद एक प्रमुख पत्रिका है। जब समाचार पत्र पत्रिकाओं की हिन्दी को देखते हैं और बाद में जब इन पत्रिकाओं को देखने का अवसर मिलता है तो कहना पड़ता ही है कि हिन्दी की ध्वज वाहक तो ऐसी ही पत्रिकाऐं हैं।
             हिन्दी पाठक को बीच में मिलने वाले अंग्रेजी वाक्य व्यवधान पैदा करते हैं यह बात वही आदमी समझ सकता है जो खुद लिखने के साथ ही पढ़ता है। देश भर के कुछ अखबार अगर अंग्रेजी शीर्षकों के सहारे पाठक जुटाने का प्रयास कर रहे हैं तो यह मानना पड़ता है कि उनमें काम करने वाले पढ़ना नहीं जानते। ऐसा लगता है कि अंग्रेजी दुर्लभ आकर्षक छबि का शिकार देश के लेखन कर्मी हो गये हैं। उनको अंग्रेजी पूरी तरह से आती नहीं और आती है तो अंग्रेजी प्रकाशन संस्थाओं में उनको काम नहीं मिलता। हिन्दी प्रकाशन में काम मिलता है तो अपने को बुद्धिमान साबित करने के लिये अंग्रेजी शीर्षकों का उपयोग करते हैं। यकीनन वह अंग्रेजी के आड़ में अपने हाथ से लिखे जा रहे विषय के प्रति उनके अल्पज्ञान तथा प्रस्तुतीकरण में आत्मविश्वास की कमी साफ दिखाई देंती है।
           यह आत्मविश्वास की कमी शायद इसलिये भी हो सकती है क्योंकि प्रकाशन जगत में गलाकाट प्रतियोगिता होने के कारण समाचार पत्र पत्रिकाओं के दाम आज भी बहुत कम हैं और यकीनन वह केवल पाठकों के सहारे जिंदा नहीं है बल्कि विज्ञापनों के आय से ही उनका काम चलता है। ऐसे में समाचार पत्र पत्रिकाओं के कार्यरत लेखन कर्मियों को इस बात का आभास है कि उनकी कलम में कोई व्यवसायिक शक्ति नहीं है। शायद इसी कारण वह ऐसे में किसी प्रकार भी हिन्दी से अपनी रोटी कमाने तक ही उनका लक्ष्य है और उसके स्वरूप बचाने का फिक्र उनमें नज़र नहीं आती।
          कुछ लोगों को लगता है कि समाचार पत्र पत्रिकाओं की वजह से भाषा में बिगाड़ आयेगा तो वह भी शायद गलत ही है क्योंकि हम जब अध्यात्म पत्र पत्रिकाऐं तथा पाठकों के साथ उसका जुड़ाव देखते हैं तो लगता है कि हिन्दी भाषा का सतत प्रवाह बनाये रखने में उनकी बहुत बड़ी भूमिका रहेगा।
          इस संदर्भ में हम गायत्री पीठ की अखण्ड ज्योति का भी नाम ले सकते हैं तो गोरखपुर के प्रकाशनों को भी नहीं भुलाया जा सकता है। सच बात तो यह है कि हिन्दी अध्यात्म और उसके ज्ञान की भाषा है और समाचार या सामयिक आलेखों में अंग्रेजी का इस तरह इस्तेमाल से उनका प्रभाव ही कम होता है और उनसे भाषा के क्षरण आशंका निर्मूल इसलिये लगती है क्योंकि आज हम अपने देश में हमेशा ही हिन्दी पाठकों का झुकाव अध्यात्म की तरफ रहा है और जब उनसे संबंधित पत्रिकाओं का प्रचलन बढ़ रहा है और समाचार पत्र पत्रिकाऐं हिन्दी से प्रतिबद्धता छोड़कर अपना ही महत्व खो रहे हैं।
          दरअसल हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकाऐं फिल्मों से बहुत प्रभावित लगते हैं जिनमें आधी अंग्रेजी होती है पर उनको शायद इस बात का अंदाज नहीं कि उससे अधिक व्यापक दायरा तो उनका खुद का है। फिल्में देखने वालों से ज्यादा संख्या अखबार पढ़ने वालों की है और हिन्दी का पाठक इस तरह के अंग्रेजी के इस्तेमाल से नाराज ही हो सकता है।
           हम आसाराम बापू के ऋषि प्रसाद की बात करें तो इस बात का अंदाज लग जाता है कि वह पत्रिका उनकी बहुत बड़ी ताकत है। उनके विरुद्ध पूरा प्रचार जगत मोर्चा खोलकर खड़ा रहता है पर वह उसका प्रतिकार वह अपनी इस पत्रिका से करते हैं। जब उनके विरुद्ध कोई बड़ी खबर आती है तो अनेक लोग ‘ऋषि प्रसाद’ का इंतजार करते हैं। जब संत आसाराम जी पर प्रचार के रूप में प्रहार होता है तो ऋषि प्रसाद में प्रतिवाद आता है तो उनके शिष्य सहमत हो जाते हैं। देखा जाये तो संत आसाराम धार्मिक शिखर पुरुष हैं और प्रचार जगत के अनेक शिखर पुरुषों से उनका द्वंद्व चल रहा है पर उसमें अकेले ऋषि प्रसाद से ही वह उनके हमले बेकार कर देते हैं। बड़ों की लड़ाई में हम जैसे छोटे लेखकों की कोई बिसात नहीं है पर हिन्दी के पाठक के रूप में हम यह तो कह ही सकते हैं कि भाषा की दृष्टि से तो उनकी ऋषि प्रसाद ही अच्छी है। महत्वपूर्ण बात यह कि वह अंततः वह भारतीय अध्यात्म का ही वह प्रचार भी करती है।
         हम यहां किसी के चरित्र या आरोप के समर्थन या विरोध में नहीं खड़े हैं बल्कि भाषा की दृष्टि से यह बात कह रहे हैं कि हिन्दी भाषा से जुड़े कर्मियों को कई प्रकार की गलतफहमियां निकाल देनी चाहिए। वह भाषा के साथ खिलवाड़ कर सफलता का गुमान न पालें। हिन्दी का पाठक अपनी भाषा से प्रेम करता है और अध्यात्म के प्रति उसका झुकाव विश्व प्रसिद्ध है ऐसे में अगर हिन्दी व्यवसायिक प्रकाशन जगत हिन्दी से खिलवाड़ कर रहा है तो यह अध्यात्मिक पत्रिकायें उनकी जगह ले रही हैं। कम से कम उसमें पढ़ते हुए भाषाई व्यवधान तो नहीं होता जो कि इन पत्र पत्रिकाओं में होता है। यह बात उनको समझ लेना चाहिए कि व्यवसायिक प्रकाशक हिन्दी से प्रतिबद्धता नहीं रख सकते तो पाठक भी उनके प्रति सद्भाव नहीं दिखा सकता।
------------
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

5/24/10

गुलामों की भाषा-हिन्दी लेख (gulam bhasha-hindi lekh

आजकल के बाज़ार और प्रचार का खेल देखकर लगता है कि कहीं न कहीं वह समाज को नियंत्रित करने के प्रयास निरंतर करता है। बुजुर्ग लोग कहते हैं कि ‘पीछे देख आगे बढ़’। हम पिछला इतिहास देखते हैं तो आगे का भविष्य लिखना मुश्किल होता है और वर्तमान में उसको देखकर आगे बढ़ते हैं तो समझ में यह नहीं आता कि पीछे वाले की रचना कैसी रही होगी? दूसरी बात यह भी कि पीछे वाले की चिंतन क्षमता और अभिव्यक्ति की शैली पर प्रश्न उठते हैं तो उसका निराकरण करना कठिन होता है। ऐसे में बेहतर तरीका यह है कि बहते हुए दरिया के किनारे पर बैठक उसमें बह रहे पानी स्त्रोत की कल्पना करें।
हमने देखा है कि सदा से ही राजनीति, समाज, तथा आर्थिक शिखर पुरुषों के प्रचार से भरा पड़ा रहा है। इसमें बुराई नहीं देखें पर आजकल तो बाज़ार तथा उसका प्रचार खुलकर शिखर पुरुषों के निर्माण का भी काम कर रहा है और इसमें कथित रूप आधुनिकता का दावा करने वाले पुराने वंशवाद के बीज समाज में बोते हैं-स्पष्टतः संदेश देते हैं कि आम आदमी की कोई औकात नहीं है। नेता के पुत्र-पुत्री को नेता, अभिनेता के पुत्र-पुत्री को अभिनेता तथा तथा पूंजीपति के पुत्र-पुत्री को पूंजीपति बताकर उनके शिखर पर बैठने से पहले ही उनका गुणगान करने लगते हैं। यह बाज़ार तथा उसका प्रचारतंत्र कभी कभी यह बताना भी नहीं भूलता कि समाजा के विभिन्न क्षेत्रों के शिखर पुरुषों के पुत्र पुत्रियां विरासत संभालने की तैयारी कर रहे हैं।
हम इस पर आपत्ति नहीं जता रहे बल्कि इतिहास को चुनौती देने जा रहे हैं क्योंकि भारत आज विश्व जगत पर महानतम होने की तरफ अग्रसर है पर उसका कोई शिखर पुरुष इसके योग्य नहीं है कि बाहरी दुनियां पर प्रभाव डाल सके। भारत में भी प्रचार माध्यम भले ही अपनी व्यवसायिक मजबूरियों के कारण भावी शिखर पुरुषों के स्वागत के लिये जुटा हुआ है पर आम जनता तो एक लाचार और बेबस सी दिखती है।
इसका मतलब यह है कि बाज़ार और उसका प्रचार तंत्र एक ऐसे नकली इतिहास का निर्माण करता है जो अस्तित्व नहीं होता। हमारा बाज़ार तथा प्रचार जिन शिखर पुरुषों को गढ़ता है विश्व समुदाय में उसका सम्मान न के बराबर है और है तो केवल इसलिये कि भारतीय समुदाय के शिखर पर वह बैठे हैं।
इधर एक दूसरी बात भी दिख रही है। विदेश में कोई किसी विश्वविद्यालय का कुलपति क्या प्रोफेसर बन जाये या किसी विदेशी प्रयोगशाला में काम करने लगे तो उसका खूब यहां प्रचार होता है। सवाल यह है क्या हमारे देश में कोई गौरवान्वित प्रतिभा नहीं है। दूसरी बात यह है कि देशभक्ति की बात करने वाले बाज़ार के सौदागर तथा उनके प्रचार प्रबंधक क्या इस बात को नहीं जानते कि हर कोई उस देश के लिये वफदार होता है जहां वह रहता है। ऐसे मे विदेश में प्रतिष्ठित भारतीयों से वह क्यों आशा करते हैं कि वह अपने देश के लिये वहां काम करेंगे?
खासतौर से ब्रिटेन और अमेरिका को लेकर भारतीय प्रचार माध्यम अपनी अस्थिर मनोवृति दिखाते हैं। सभी जानते हैं कि ब्रिटेन और अमेरिका स्वाभाविक समानताओं के बावजूद हमारे ही दुश्मन देश पर हाथ रखते हैं। अपने और भारत के आतंकवाद के बीच वह फर्क करते हैं। इतना ही नहीं मानवाधिकारों के नाम पर भारतीय आतंकवादियों को संरक्षण भी देते रहे हैं। सीधी बात कहें तो यह मित्र देश तो कतई नहीं कहे जा सकते। चीन का धोखा प्रमाणिक हैं पर इन दोनों देशों की मित्रता कोई प्रमाणिक नहीं है ऐसे में इनकी गुलामी करने वाले भारतीयों की अपने देश में गुणगान करने की बात समझ में नहीं आती। यह प्रचार माध्यमों की कमजोरी है जिसकी वजह से अमेरिका और ब्रिटेन के यही सोचते हैं कि हम चाहे भारत को कितना भी अपमानित करें वहां की जनता में हमारे विरुद्ध कभी वातावरण नहीं बन सकता क्योंकि वहां के प्रचार माध्यम तो हमारे यहां अपने गुलामों को देखकर खुश होते हैं।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक बार भारत के बंटवारे के बारे में लिखा था। उसने जो लिखा था उसे पढ़कर तो हमें यही लगा-उसकी भाषा में सीधे नहीं लिखा गया था-कि उस समय की पूंजीपति ताकतें जहां तक भारत को संभाल सकती थी वहीं तक उन्होंने अपना देश बनाया। बाकी जगह पाकिस्तान बनने दिया। उन्होंने तो यह बात केवल कश्मीर के संबंध में कही थी कि वहां का उस समय के लोकप्रिय नेता ने कहा था कि वह तो इतना ही कश्मीर देख सकता है और बाकी तक उसकी पहुंच नहीं है-जहां पहुंच नहीं थी वह पाकिस्तान के पास है। उसे पढ़कर तो एक बारगी यह लगा कि पूरा का पूरा स्वतंत्रता आंदोलन ही समाज को व्यस्त रखने का एक बहाना भर था, असली रूपरेखा तो बाज़ार तथा उसके प्रचार माध्यम तय करने लगे थे। यकीनन उस समय बाज़ार तथा प्रचार माध्यम इस तरह ही शिखर पुरुषों का निर्माण करते रहे होंगे जैसे कि आज कर रहे हैं। इतिहास तो जो लिखा गया उस पर अब क्या लिखें।
अपने सामने ही ढेर सारे झूठ को इतिहास बनते देखा है। कई घटनाओं को एतिहासिक बताया गया पर उनका प्रभाव समाज पर स्थाई रूप से नहीं पड़ते देखा। कई कथित महापुरुष जिन्होंने शिखर पर बैठकर केवल मुखौटे की तरह काम किया आज उन्हें देवता बताकर प्रस्तुत किया जाता है। अनेक ऐसे आंदोलन चले जिनका परिणाम नहीं निकला पर चल रहे हैं। इतना ही अनेक आंदोलनों के पीछे उनके आर्थिक स्त्रोत भी संदिग्ध रूप से दिखते रहे हैं पर प्रचार माध्यमों में चर्चा की जाती है
सैद्धांतिक मुद्दों पर जिनका कोई मतलब नहीं दिखाई देता।
देश के आम आदमी से कोई विशिष्टता प्राप्त न करे इसके लिये शिखर पुरुष, पूंजीपति तथा प्रचार एकजुट हैं। हम समाज के किनारे बैठकर देखें तो आजादी से पहले जो महान थे उसके बाद कोई बना ही नहीं। आजादी से पहले भी एक ही महान शख्सियत थी, महात्मा गांधी और फिर कोई नहीं हुआ। हिन्दी साहित्य की बात करें! कितने पद्मश्री बंट गये पर संत कबीर, तुलसी, मीरा, रहीम तथा अन्य भक्तिकालीन रचयिताओं के मुकाबले कोई नहीं ठहरा। बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों ने कोशिश भी नहीं की केवल अपने अनुगामियों को ही आगे बढ़ाया। हालत यह हो गयी है कि अंग्रेजी से महान लेखक छांटे गये और जिनका नाम आम जनता के सामने नहीं आता उनको अनुवाद के माध्यम से लाया गया। हमने अनेक महान लेखक सुने, देखे और पढ़े पर जब भक्तिकालीन रचयिताओं पर नज़र डालते हैं तो सभी कंकड़ पत्थर लगते हैं।
बाज़ार और संगठित प्रचार माध्यमों का जब यह हाल देखते हैं तो उसमें सक्रिय लोगों की बुद्धि पर तरस आता है पर गुलामी संस्कृति के पोषकों से आशा भी क्या की जा सकती है। उनको पहले तो हिन्दी बोलने में ही हिचक होती है अगर बोलते हैं तो अंग्रेजी के शब्द उसमें मिलाते हैं ताकि आम आदमी से अलग लगें-वैसे यह उनकी भाषा संबंध कमजोरी भी हो सकती है। आजकल यह मांग भी होने लगी है कि हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द शामिल किये जायें। दरअसल कुछ सतही सोच वाले विचार वालों का यह शगूफा है क्योंकि चाहे कितना भी कहा जाये पर सच यह है कि बाज़ार की जरूरत हिन्दी बन गयी है इसलिये हिन्दी न सीख सके वह अपनी पैठ बनाने के लिये ऐसे प्रयास कर रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी में लिखेंगे तो उनको पढ़ेगा कौन? उसमें लिखने वाले भी कम थोड़े ही हैं। बहरहाल गुलामी संस्कृति को ढो रहा समाज अब भाषा के सहारे अपने ही देश के साफ सुथरी हिन्दी समझने वालों को भी अपना गुलाम बनाना चाह रहा है। बाज़ार में हिन्दी ही बिक रही है ऐसे में अंग्रेजी में पढ़े लिखे बौद्धिक वर्ग के पास अपना रोजगार बचाने के लिये यही एक रास्ता है कि वह अंग्रेज देश तथा वहां रहने वाले भारतीयों का गुणगान करने के साथ ही हिन्दी में अंग्रेजी शब्द लादने की वकालत करे ताकि शिखर पुरुषों के लिये वह जो चरण वंदना करे वह सुनी जाये क्योंकि वही तो इनाम बांटते और बंटवाते हैं। दरअसल उनकी भाषा ही गुलाम भाषा कही जा सकती है जिसमें स्वतंत्र और मौलिक रचनाओं की गुंजायश नहीं  रह जाती।
-------------
कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

6/23/09

अधंविश्वासों ने धार्मिक आधार को कमजोर किया है-आलेख

एक मित्र ब्लाग लेखक सुरेश चिपलूनकर ने कल कुछ फोटो बनारस शहर और गंगा नदी के भेजे। वह हिंदी ब्लागजगत के सक्रिय लेखक होने के साथ दूसरों से सतत संपर्क रखने की कला में भी सिद्ध हस्त हैं और अक्सर ऐसे फोटो और वेबसाईटें ईमेल पर भेजते रहते हैं जो वैचारिक और चिंतन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है। कल उनके फोटो के साथ इस बात का भी जिक्र था कि हिंदू धर्म के पवित्र माने जाने वाले बनारस और गंगा नदी में कितना कचड़ा दिखाई देता है। मेरा कभी बनारस जाना नहीं हुआ पर उसके बारे मेंे सुनता रहता हूं। अनेक लोग भी इस बात की चर्चा करते हैं कि वहां गंगा में अब प्रदूषण बहुत है। कहने को इसके लिये लोग अनेक कारण बतायेंगे पर सच बात तो यह है कि इसके लिये अंध श्रद्धालू भी कम जिम्मेदार नहीं है। हिंदू अध्यात्म विश्व का सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है पर यह भी उतना ही सच है कि सर्वाधिक अज्ञानी और अंधविश्वासी भारत में ही हैं और इसी कारण भारत के अधिकतर शहर और नदियों की पवित्रता पर विष की चादर बिछ गयी है। देखा जाये तो मंदिर केवल इसलिये बने ताकि लोग एक समूह में आकर वहां सत्संग और कीर्तन कर सकें पर अंधविश्वासों और अज्ञान की वजह से लोगों ने उनको वह कूंआं मान लिया जहां से पुण्य भरकर अपने साथ स्वर्ग ले जाया सके। अपने दैहिक कचड़े को वहां छोड़कर वह यह मान लेते हैं कि वह पवित्र हो गये। उनके उस कचड़े से दूसरे आने वाले श्रद्धालू उनको कितना कोसते हैं और उसका पाप उनके सिर ही आता है यह वह भूल जाते हैं।
पहले उन फोटो की बात करें। उनमें दिखाया गया था कि बनारस की सड़कों पर भारी कचड़ा जमा था। गंगा नदी में लाशें तैर रहीं थीं। कई जगह रेत में तो हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। लाशें देखकर अच्छा खासा आदमी डर जाये। उनको कुत्ते खा रहे थे। कई जगह कौवे उन पर बैठे थे। कई लाशें जलने को तैयारी थी तो पास में लोग नहाते हुए दिख रहे थे। कटे हुए बालों के झुंड वहां जमा थे। यह दृश्य देखकर हृदय से भक्ति करने वाले किसी भी आदमी का मन दुःखी हो सकता है। शरीर के बाल, पुराने जूते और कपड़े मंदिरों या तीर्थों पर जाकर फैंकना किस धर्म का हिस्सा है यह कहना कठिन है क्योंकि जिन ग्रंथों को हिंदू धर्म का आधार माना जाता है उनमें ऐसी कोई चर्चा नहीं है।
यह समस्या केवल बनारस तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के अनेक सिद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों मेेंं ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि हम अपने एक मित्र के साथ स्कूटर पर अपने ही शहर से तीस तीस किलोमीटर दूर एक प्रसिद्ध मंदिर गया। वह भी पवित्र दिन था और मित्र ने आग्रह इस तरह किया कि हमने सोचा चलो हम भी हो आते हैं। वहां जाकर अपना ध्यान भी लगायेंगे और घूमना भी हो जायेगा।

मंदिर पहाड़ी पर था और रास्ते में खेत खलिहान और तालाब देखकर बहुत अच्छा लगा। शहर से दूर ताजी हवा वैसे भी मन को प्रभावित करती है। जब उस मंदिर के निकट पहुंचे तो बहुत भीड़ थी। वैसे उस मंदिर पर भीड़ इतनी नहीं होती पर उस दिन खास दिन था इसलिये आवाजाही अधिक थी। हमने मंदिर से दो किलामीटर स्कूटर रखा-उसको रखने के पांच रुपये दिये क्योंकि ऐसे मौके पर भी भक्तों के साथ कोई रियायत नहीं होती। हम दोनों पैदल पहाड़ी पर चढ़ने लगे। वहां किनारे नाईयों के पास अपने बाल कटवाने वाले लोगों का झुंड लगा हुआ था। किनारे के दोनेां और पड़े बालो के झुंड किसी का मन खराब करने के लिये काफी थे। हम चलते गये तो आगे देखा कि लोग पुरानी चप्पलें वहीं छोड़ गये थे जो कई बार हमारे पैरों में बाधा पैदा कर देती थी। मंदिर पहुंचे तो लंबी लाईन लगी थी। हमने अपने मित्र से कहा कि इस धूप में इतनी देर लाईन में खड़े होना हमारे लिये संभव नहीं हैं। हम तो कभी दोबारा आकर दर्शन कर लेंगे।’
मित्र भी निराश हो गया था पर चलते चलते वह पता नहीं मंदिर से पचास मीटर पहले ही लाईन के बीच में लग गया हम उससे उस समय थोड़ा दूर थे। तब हम मंदिर के पास ही एक टैंट के में अपने बैठने की जगह तलाशने लगे। वह एक मैदान था। वहां बालों, पुराने कपड़ों और चप्पलों के बीच खड़ा होकर हम सोचने लगे कि ‘भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान’ में आखिर ऐसा कहां संदेश मिलता है कि धार्मिक स्थानों को अपने अंधविश्वासों से अपवित्र बनाया जाये। एक तो गर्मी फिर वहां के इस दृश्य ने हमें नरक के दर्शन कराकर पीड़ा ही दी और जब तक मित्र बाहर नहीं आया उससे झेलते रहे। एक बार तो गुस्सा आया कि लोगों से कहैं कि ‘यह कौनसा भक्ति करने का तरीका है।’ पर फिर सोचा कि जिस अध्यात्मिक ज्ञान की बात हम करेंगे उसके बारे में यह अधिक बतायेंगे। यहां कई ऐसे ज्ञानी हैं जिनको कबीर,तुलसी और सूर के दोहे जुबानी याद हैं पर अंधविश्वास की धारा में वही सभी से अधिक बहते हैं।
अगर पूरे बाल कटवा दिये जायें तो दिमाग को तरावट होती है। नये कपड़े या जूते पहने से भी देह को सुखद अनुभूति होती है। अगर किसी पवित्र स्थान पर जाकर ऐसी अनुभूति की तो कोई चमत्कार नहीं है पर उसको सिद्धि से जोड़ना भ्रम है। मंदिर निर्माण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य में सामुदायिकता की भावना का विकास करना है और उसमें सिद्धि और प्रसिद्धि को विचार तो केवल प्रचार या विज्ञापन ही है। जो लोग वहां अपनी गंदगी का त्याग करते हैं वह कहां जायेगी? इस पर कोई नहीं सोचता। अनेक लोग मंदिरों में केवल मत्था टेकने जाते हैं उनके लिये इस प्रकार की गंदगी वहां नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करती है।

चिपलूनकर जी ने ईमेल के ऊपर ही लिख दिया था कि अंधभक्ति और कमजोर दिलवाले इसे नहीं देखें। बहरहाल हमने फोटो देखे और इस बात को समझ गये कि वह कहना क्या चाहते हैं? उन फोटो को यहां दिखाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह एक व्यापक विषय है कि हम अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर अंधविश्वासों का बोझ कम तक ढोते रहेंगे? अक्सर देश की संस्कृति और संस्कार बचाने की बात करने वाले आखिर इस अंधविश्वास से आंखें बंद कर क्यों अपने अभियान चलाते हैं? आम पाठक शायद न समझें पर ब्लाग जगत पर सक्रिय ब्लाग लेखक यही कहना चाहेंगे कि यह सवाल तो सुरेश चिपलूनकर जी से ही किया जाना चाहिये। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि सुरेश चिपलूनकर जी परंपरावादी लेखकों के समूह के सदस्य हैं पर हम ऐसा नहीं मानते। उनकी उग्र लेखनी से निकले आलेखों पर सभी लाजवाब हो जाते हैं और जो विरोध करते हैं तो भी उनके तर्क कमजोर दिखते हैं। सच बात तो यह है कि सुरेश चिपलूनकर न केवल अंध विश्वासों के विरोधी है बल्कि उनके कई पाठ धर्म के नाम पर पाखंड के विरुद्ध लिखे गये हैं। उन्होंने अपने ही उज्जैन शहर के मंदिर पर हो रहे पाखंड और भ्रष्टाचार का उल्लेख अपने पाठ में लिया था। उनके इन प्रहारात्मक लेखों से लोग इसलिये भी प्रभावित होते हैं। उन्हें परंपरावादी लेखक तो हम नहीं मानते बल्कि आधुनिक विचाराधारा के परिपक्व श्रेणी के लेखकों में गिनती करते हैं।
प्रसंगवश परंपरपादी और प्रगतिशील लेखकों की बात भी कर लें। दोनों में कोई अधिक अंतर नहीं है। प्रगतिशील भारत के अंधविश्वासों को निशाना बनाते हुए यहां के समग्र चरित्र पर प्रहार करते हुए विदेशी विचारधाराओं की बात करते हैं जबकि परंपरावादी लेखक अपने पुराने ज्ञान को ही प्रमाणिक मानते हैं और अपने अंधविश्वास और पाखंड से बचते हैं। प्रगतिशील और परंपरावादियों से अलग ऐसे आधुनिक लेखक भी हैं जो अपने पुराने अध्यात्म को प्रमाणिक मानते हुए अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार करने का अवसर नहीं चूकते और यही कारण है कि यह तीसरा वर्ग ही भारत में परिवर्तन के लिये जूझता दिखता है। सच बात तो यह है कि कर्मकांडों का आधार स्थानीय होता है और उनका धर्म से संबंध केवल इसलिये दिखता है क्योंकि देश के अधिकतर लोगों के धार्मिक इष्ट एक ही है। कई जगह एक त्यौहार जिस तरह से मनाया जाता है तो दूसरी जगह दूसरे ढंग से। उसी तरह जाति से भी त्यौहार मनाने के तरीके से भिन्नता का आभास होता है। अगर हम कुल निष्कर्ष निकालें तो केवल अध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर ही सभी एक हैं कर्मकांडों में विरोधाभास है और वह धर्म का आधार कतई नहीं लगते। यह अलग बात है कि पहले पुराने और अब आधुनिक बाजार ने अपनी कमाई के लिये कर्मकांडों को ही धार्मिक आधार बना दिया है। सच बात तो यह है कि अंधविश्वासों की वजह से धर्म बदनाम ही हुआ है और पराये क्या अपने ही लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। भारत के अनेक महापुरुषों में पाखंड और अंधविश्वास से दूर रहने का संदेश दिया है और उनके कृतित्व का ही नतीजा है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है। शेष फिर कभी
...........................................

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

5/28/09

मन को कैद करने वाले पिंजरे-आलेख

वह जो सभी तरफ दिखाया जा रहा है उसका मुख्य उद््देश्य तुम्हें भीड़ बनाना है। वह भीड़ जो समय पड़े तो उसे जाति, भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा सके। इसे बांटकर उन लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सके जिनका काम ही भीड़ पर चला करता है। बदले में भीड़ जुटाने वाले सौंपते हैं उनको तमगे, कप, उपाधियां और सम्मान। भीड़ कभी एक न हो इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया जाता है। भीड़ के एक हिस्से को इसलिये खुश किया जाता है कि दूसरा हिस्सा चिढ़े और इसकी अभिव्यक्ति के लिये साधन ढूंढे जो कि पैसे से बिकते हैं।
यह पूर्वनिर्धारित है पर लगता है कि स्वतः चल रहा है। दिखता तो यह स्वतः चलता है है पर इसका बौद्धिक ढांचा बरसों पहले से बनाया जा चुका है और इस पर नियंत्रण केवल खास लोग और उनके चाटुकारो का है। यकीन करो जो तुम कहीं भी कुछ देख और पढ़ रहे हो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर है तो वह ऐसी है जैसे किसी फिल्म की होती है-एक काल्पनिक कहानी पर जिस तरह कुछ लोग अभिनय करते हैं। लोग फिल्मों को सच मानने लगे हैं। उनमें अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को महानायक और महानायिका बना देते हैं। हालत यह है कि पर्दे का खलनायक भी बाहर नायक की तरह सम्मान पाता है और उसके बारे में कहते हैं कि ‘वह तो एक आम इंसान है।’ मगर नायक का पात्र तो महानता की उपाधि पाता है।

तयशुदा पात्र हैं। कोई हंसता दिख रहा है कोई रोता। फिल्म की तरह समाचार हैं और समाचार ही फिल्म बना रहे हैं। आजकल नई सभ्यता है। पहले तो राहजन हथियारों की दम पर लूट लेते थे पर इस नई सभ्यता में हिंसा वर्जित है क्योंकि आदमी की बुद्धि को तमाम तरह की लालच देकर और काल्पनिक सुख दिखाकर भ्रमित किया जा सकता है और मन के स्वामी होने की वजह से मनुष्य कहलाने वाला जीव बिना किसी रस्सी और जंजीर के पशु बनकर जिस आदमी के पास काल्पनिक रस्सी है उसके पीछे चला जाता है।

जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनको कुछ नहीं करना बस इंसानी मन को पकड़ लेने वाले पिंजरे-फिल्म,टीवी चैनल, अखबार और अंतर्जाल-पर कब्जा करना है। वहां से उसे समयानुसार भड़काने, बहलाने, और हड़काने वाले संदेश, समाचार, कहानियां और कविताओं का प्रसारण करना है। सारे दृश्य काल्पनिक और पूर्व रचित हैं। सर्वशक्तिमान ने यह सृष्टि रची है पर बाकी सब तो उसने इस धरती पर विचरने वाले जीवों पर छोड़ दिया है पर फिर भी ऐसे लोग हैं जो ‘भाग्य का खेल है’ या ‘जैसा
उसने रचा है’हमें देखना है जैसे जुमले कहते हैं पर उनके मन में यही है कि हम ही सब कर रहे हैं। दूसरे को दृष्टा बनने का उपदेश देने वाले लोग स्वतः ही अपनी अंर्तज्योति बुझी होने के कारण भीड़ की तरह हांके जा रहे हैं पर इसे नहीं जानते।

बिल्कुल उत्तेजित मत हो! यकीन करो यह योजना है एक व्यापार की। तुम जिन दृश्यों से चिढ़ते हो उनसे मूंह फेर लो। जिन शब्दों से तुम आहत होते हो उनको पढ़ना या सुनना भूल जाओ। जिन लोगों से तुम्हें दुःख मिलता है उनको याद भी मत करो। तुम उन समाचारों पर ध्यान न देते हुए उनकी चर्चा से दूर हो जाओ जिनसे कष्ट पहुंचता है। यह दृष्टा बनना ही है और फिर देखो उन लोगों का खेल! वह जो तुम्हें हड़काते हैं वह स्वयं ही हडकते नजर आयेंगे। वह जो तुम्हें झूठे खेल से बहला रहे हैं पर खुद दहलने लगेंगे। तुम जिन दृश्यों और समाचारों को सत्य समझ कर विचलित होते हुए उन पर बहसें करते हो उनके पीछे के सच पर जब विचार करने लगोगे तो तुम्हें हंसी आयेगी। जो बाजार में बिक रहा है या दिख रहा है-वह आदमी
हो याशय-उसका मूंह तुम्हारी जेब की तरफ है। जैसे पहले बहुरूपिये दिल बहलाकर पैसे ले जाते थे पर अब उनको आने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तुम्हारे घर में पर्दे सजा दिये हैं। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम्हारा पैसा कैसे उनके पास जा रहा है।

वह तुम्हारा ध्यान किसी चेहरे की तरफ खींचे-चाहे वह हीरोईन का चेहरा हो या सर्वशक्मिान के किसी रूप का-तुम उसे मत देखो और आंखें बंद कर भृकुटि पर नजर रखो। वह तुम्हें संगीत सुनायें तुम ओम शब्द का जाप करने लग जाओ। वह फिल्म चर्चा करें तुम गायत्री मंत्र का जाप करने लगो। अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र अपने अंदर रखो। बाहर कोई सुने यह जरूरी नहीं। बस तुम अपने को सुनना शुरु कर दो। अपने को पढ़ो। अपने सत्य कर्म को देखो दूसरे के अभिनय में रुचि रखने से तुम्हारे मन को शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने शोर मचा रखा है तुम शंाति अपने अंदर ढूंढो। कहीं दूसरे से सुख और मनोरंजन की आस तुम्हें कमजोर बना रही है। अपने मन में अपने लिये ख्वाब और सपने देखो उसने दूसरे पिंजरे में मत फंसने दो।
.............................
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

9/16/08

क्या आतंकी हिंसा अपराध शास्त्र से बाहर का विषय है-संपादकीय

एक शवयात्रा में दो आदमी पीछे जा रहे थे
एक ने कहा-‘बेकार आदमी था। किसी के काम का नहीं था’
दूसरे ने कहा-‘नहीं कैसी बात करते हो। वह दरियादिल आदमी थी। मेरे तो दस काम किये। कभी काम के लिये मना नहीं किया।
दूसरे ने कहा-‘मेरे भी उसने दस काम किये पर एक काम के लिये मना लिया। इसलिये ही तो कहता हूं कि वह ठीक आदमी नहीं था। अगर होता तो एक काम के लिये मना क्यों करता?’

उनके पीछे एक आदमी चल रहा था। उसने पूछा‘-आप यहा तो बताओ। उसका देहावसान कैसे हुआ। क्या बीमार थे? क्या बीमारी थी?’
दोनों ने कहा‘-हमें इससे क्या मतलब हमें तो शवयात्रा में दिखावे के लिये शामिल हुए हैं।’
वह तीसरा आदमी चुपचाप उनके पीछे चलता रहा।’
उसने देखा कि दोनों के साथ उनके समर्थक भी जुड़ते जा रहे थे। कोई मृतक की बुराई करता कोई प्रशंसा। तीसरा आदमी सबसे मृत्यु की वजह पूछता पर कोई नहीं बताता। एक ने तो कह दिया कि अगर हमारी चर्चा में शामिल नहीं होना तो आगे जाकर मुर्दे को कंधा दे। देख नहीं रहा हमारे उस्ताद लोग बहस में उलझे हैं।’
यह कहानी एक तरह देश में चल रही अनेक बहसों के परिणामों का प्रतीक है। देश में बढ़ती कथित आंतकी हिंसा घटनाओं के बाद प्रचार माध्यमों में अनेक तरह की सामग्री देखने को मिलती है। बस वही रुटीन है। ऐसी घटनाओं के बाद सभी प्रचार माध्यम रटी रटाई बातों पर चल पड़ते हैं। अखबारों में तमाम तरह के लेख प्रकाशित होते हैं। इन घटनाओं के पीछे ऐसी कौनसी बात है जो किसी की समझ में नहीं आ रही और इनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है।
अभी दिल्ली में हुए हादसे के बाद अगर प्रचार माध्यमों-जिनमें अंतर्जाल पर ब्लाग भी शामिल हैं-में आये आलेखों को देखा जाये तो एक बात साफ हो जाती है कि लोगों की सोच वहीं तक ही सीमित है जहां तक वह देख पाते हैं या जो उनको बताया जाता है। न तो उनमें मौलिक चिंतन करने की क्षमता है और न ही कल्पना शक्ति।

वैसे तो तमाम तरह की खोजबीन का दावा अनेक लोग करते हैं पर इन आतंकी हिंसक घटनाओं के पीछे का राजफाश कोई नहीं कर पाता। नारों और वाद पर चलते बुद्धिजीवी भी गोल गोल घूमते हुए रटी रटाई बातें लिखते हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया कि जिसमें भारतीय पढ़ खूब लेते हैं पर फिर भूल जाते हैं।
आतंकी हिंसा अपराध है और अपराध शास्त्र के अनुसार तीन कारणों से लोग गलत काम करते हैं-जड़ (धन), जोरु (स्त्री) और जमीन। वैसे तो अपराध शास्त्र के विद्वान बहुत होंगे पर हर आम आदमी को उसका मूल सिद्धांत पता है कि इन तीन कारणों से ही अपराध होते हैं।’

अब सवाल यह है कि आतंकी हिंसा क्या अपराध शास्त्र से बाहर हैं और लोग मानकर चले रहे हैं कि यह अपराध से अलग कोई घटना है। देखा जाये तो आतंकी हिंसा के विरुद्ध सब हैं पर बहसें हो रही हैं धर्म,भाषा और जाति के लेकर। इतिहास सुनाया जा रहा है और वाद और नारे लग रहे हैं। देश के बुद्धिजीवियों पर तरस आता है। आतंकी हिंसा में सबसे अधिक कष्ट उन लोगों का होता है जिनका नजदीकी मारा जाता है। उनसे हमदर्दी दिखाने की बजाय लोग ऐसी बहसें करते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं है। और तो छोडि़ये लोगों ने इस आतंकी हिंसा को भी सभ्य शब्द दे दिया‘आतंकवाद’। फिर वह किसी दूसरे वाद को लेकर फिकरे कस रहे हैं?

ऐसी चर्चायें दो चार दिन चलतीं हैं फिर बंद हो जातीं हैं। जिनके परिवार का सदस्य मारा गया उनकी पीड़ा की तो बाद में कोई खबर नहीं लेता। इसी बीच कोई अन्य घटना हो जाती है और फिर शुरू हो जाती है बहस। कोई इस बात में दिलचस्पी नहीं लेता कि आख्रि इस हिंसा में किसका फायदा है? यकीनन यह फायदा आर्थिक ही है। सच तो यह है कि यह एक तरह का व्यवसाय बन गया लगता है। अगर नहीं तो इस सवाल का जवाब क्या है कि कोई इन घटनाओं के लिये कैसे पैसे उपलब्ध कराता है। जो लोग इन कामों में लिप्त हैं वह कोई अमीर नहीं होते बल्कि चंद रुपयों के लिये वह यह सब करते हैं। तय बात है कि यह धन ऐसे लोग देते हैं जिनको इस हिंसा से प्रत्यक्ष रूप से लाभ होता है। यह फायदा उनको ऐसे व्यवसायों से होता है जो समाज के लिये बुरे माने जाते हैं और उसे निरंतर बनाये रखने के लिये समाज और प्रशासन का ध्यान बंटाये रखना उनके लिये जरूरी है और यह आतंकी हिंसा उनके लिये मददगार हो।
कुछ जानकार लोगों ने दबी जबान से ही सही यह बात लिखी थी कि जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था तब वहां से भारत और पाकिस्तान के बीच दो नंबर का व्यापार दोगुना बढ़ गया। कभी इस पर अधिक बहस नहीं हुई। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगों और सरकारों का ध्यान बंटाने के लिये इस तरह की घटनायें करवायीं जाती हों।
जहां तक किसी समूह विशेष से जोड़ने का सवाल है तो ऐसी हिंसा कई जगह हो रही है और उसमें जाति, धर्म, भाषा ओर वर्ण के आधार पर बने समूह लिप्त हैं। यह सच है कि जब कहीं ऐसी घटना होती है तो उसकी जांच स्थानीय स्तर पर होती है पर राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय अपराध विशेषज्ञों को अब इस बात पर दृष्टिपात करना चाहिये कि इसके लिये धन कौन दे रहा है और उसका फायदा क्या है?’

धर्म, जाति, और भाषा के नाम पर समूह बने भ्रम की राह पर चले रहे हैं और तय बात है कि इसी का लाभ उठाकर आर्थिक लाभ उठाने का प्रयास कई तरह से हो रहा है-यह अलग से चर्चा का विषय है पर ऐसे मामलों में हम उनका नाम लेकर अपराधियों का ही महिमा मंडल करते हैं। अगर इनके आर्थिक स्त्रोतो पर नजर रखते हुए काम किया जाये तभी इन पर नियंत्रण किया जा सकता है।
धर्म,जाति,भाषा और वर्ण के आधार पर कौन कितना अपने समूह का है सब जानते हैं। अमरीका ने पहले इस बात के प्रयास किये कि इनके इस प्रकार के हिंसातंत्र को प्रायोजित करने वाले आर्थिक स्त्रोतों पर ही वह हमला करेगा पर लगता है कि वह इराक युद्ध में उलझकर स्वयं भी भूल गया। यह धन अपने हाथ से कौन दे रहा है उसका पता लग जाये तो फिर यह पता लगाना भी जरूरी है कि उसके पास पैसा कहां से आया? इनके पास पैसा उन्हीं व्यवसायों से जुड़ लोगों से आता होगा जिनमें धर्म के दूने जैसा लाभ है। यह हो सकता है कि ऐसा व्यवसाय करने वाले सीधे आतंकी हिंसा करने वालों को पैसा न दें पर उनसे पैसा लेने वाले कुछ लोग इसलिये भी ऐसी हिंसा करा सकते हैं कि इससे एक तो उनको धन देन वाले चुपचाप धन देते रहें और दूसरा दो नंबर का काम करने वालों का धंधा भी चलता रहे।

जड़,जोरू और जमीन से अलग कोई अपराध नहीं होता। चाहे देशभर के बुद्धिजीवी शीर्षासन कर कहें तब भी वह बात जंचती नहीं। विचारधाराओं और कार्यशैली पर विभिन्न समूहों में मतभेद हो सकते हैं पर किसी में ऐसी ताकत नहीं है जो बिना पैसे कोई लड़ने निकल पड़े और पैसा वही देगा जिसका कोई आर्थिक फायदा होगा। कहीं कहीं आदमी डर के कारण चंदा या हफ्ता देता है पर वह इसलिये क्योंकि तब वह अपने अंदर शारीरिक सुरक्षा का भाव उत्पन्न होने के साथ उसका व्यापार भी चलता है। इधर यह भी हो रहा है कि अपराधियों का महिमा मंडन भी कम नहीं हो रहा। यही कारण है कि लोग प्रचार के लिये भी ऐसा करते हैं जो अंततः उनके आर्थिक लाभ के रूप में ही परिवर्तित होता है। जो अपराधी पकड़े जाते हैं उनके प्रचारकों को प्रचार माध्यम उनकी तरफ से सफाई देते हुए दिखाते हैं। सच तो यह है कि आतंकी हिंसा की आड़ में अनेक लोगों ने नाम और नामा कमाया है और यह सब पैसा कहीं न कहीं देश के लोगों की जेब से ही गया है। हालांकि इनके आर्थिक स्त्रोतों का पता स्थानीय स्तर पर नहीं लग सकता। इसके लिये आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय लोग इसके लिये सक्रिय हों। इसके लिये जरूरी है कि देश में चल रहे दो नंबर के व्यवसायियों में कौन किस किस को धन देते हैं और उसका उनको क्या लाभ है यह देखा जाना जरूरी है। अनेक अपराधी पकड़ जाते हैं पर असली तत्व दृष्टिगोचर नहीं होते। हो सकता है कि हिंसा करने वाले कंपनियों के रूप में सक्रिय हों पर उनके कर्ताधर्ता का पता लगाना जरूरी है।

बुद्धिजीवी लोग इन हिंसक घटनाओं से उत्पन्न बिना मतलब के विषयों पर चर्चा के इस पर बहस क्यों नहीं करते कि आखिर इसका लाभ किसको कैसे हो सकता है। अगर यही बहसों का हाल रहा तो एक दिन देश को आतंकवाद के मसले पर विश्व में मिल रही सहानुभूति समाप्त हो जायेगी ओर यह यहां का आंतरिक मामला मान लिया जायेगा और विदेशों में देश के अपराधियों को शरण मिलती रहेगी। अगर कोई अपराध विशेषज्ञ इसे अलग प्रकार का अपराध मानता है तो फिर कुछ कहना बेकार है पर ऐसा कहने वाले बहुत कम मिलेंगे अगर मिल जाये तो लार्ड मैकाले की प्रशंसा अवश्य करें जिसने इस देश के लोगों की बुद्धि कोई हमेशा के लिये कुंठित कर दिया। ऐसे विषयों पर अपराध विज्ञानियों को चर्चा करना चाहिये पर यहां केवल विचारधाराओं के आधार चलने वाले बुद्धिजीवी बहस करते हैं तब यही लगता है कि वह केवल तयशुदा वाद और नारों पर ही चलते हैं।
--------------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

8/1/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (3)

धर्म क्या है? शायद कई लोग नहीं बता पायेंगे? अनेक युद्ध धर्म के नाम पर हुए पर किस धर्म के लिये। महाभारत युद्ध किस धर्म की रक्षा के लिये लड़ा गया था? इस पर अनेक व्याख्यायें मिल जायेंगी। वर्तमान में लोग अनेम धर्मों के नाम बताने लगेंगे-जो कि केवल भ्रम है। धर्म वह है जो मनुष्य द्वारा धारण किया जाता है। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि मनुष्य द्वारा अपनी इस देह धारण करने के बाद जो कर्तव्य अपने लिये स्वयं या स्वाभाविक रूप से स्वतः निर्धारित हो जाते हैं वही धर्म है कि न कर्मकांडों का निर्वहन जैसा प्रचारित किया जाता है। एक व्यक्ति के रूप में मनुष्य द्वारा स्वीकार यह स्वतः निर्धारित कर्तव्य या धर्म कई प्रकार का हो सकता है। एक पुरुष के लिये पिता,पुत्र,पति, भ्राता,मित्र तथा अन्य संबंधों के निर्वाह के लिये कर्तव्य का निर्वहन ही धर्म है। एक स्त्री के लिये माता, पुत्री,बहिन, पत्नी तथा अन्य रूप में कर्तव्य निर्वहन करना ही धर्म का स्वरूप कहा जा सकता है।

महाभारत युद्ध की बात करें तो देखा जाये सभी पक्ष कर्तव्य विमुख हो रहे थे। जिसका चर्म रूप था द्रोपदी का चीरहरण। महाभारत काल में परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह न करना ही अधर्म कहा गया है। धर्म की कोई अन्य संज्ञा वहां नहीं दिखाई देती-आशय यह है कि धर्म का कोई एक नाम नहीं है। भगवान श्रीराम ने भी धर्म की रक्षा के लिये ही युद्ध किये पर किसी धर्म विशेष का नाम रामायण मे भीं नहीं आता। रावण का विधर्मी इसलिये कहा जाता है कि वह अपनी शक्ति के अहंकार में इतना मतवाला हो रहा था कि यज्ञ और हवन करने वाले ऋषियों पर हमले कर उनका सहंार करता था। वह स्वयं भी भगवान शिव का उपासक था पर अन्य देवों के उपासकों पर हमले करने की प्रवृत्ति के कारण वह अधर्मी करार दिया गया। यहंा विचाराधाराओं का वैसा ही द्वंद्व दिखाई देता है जैसा आजकल हो रहा है। एक तरह वह स्वयं भगवान शिव की भक्ति कर रावण ने वरदान प्राप्त किया पर उसे अन्य लोगों द्वारा यज्ञ हवन और अन्य तरीके से पूजा करना सहन नहीं था। उसने उन पर हमला किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अन्य देवों की उपासना हो। भगवान श्रीराम ने उसके अनेक राक्षसों को सीताहरण से पहले ही मार गिराया था और वह भी इसलिये क्योंकि वह दूसरों की पूजा विधि विधाने को रोकने का प्रयास कर रहे थे। इसका आशय यह नहीं है कि भगवान श्रीराम को उसके इष्ट भगवान शिव की उपासना से कोई द्वेष था बल्कि वह स्वयं ही भगवान शिव का सम्मान करते थे। तात्पर्य यह है कि धर्म का रूप यह भी कि कोई किसी की भी उपासना करे पर दूसरे के पूजा विधान से द्वेष न करे।

वर्तमान में जो प्रचलित धर्म हैं उनमें भी वह सब बातें हैं जो सदियों से कही जाती हैं पर उनको नाम दिये गये हैं ताकि उसे एक छत बनाकर लोगों की भीड़ वहां एकत्रित कर उनका आर्थिक और राजनीतिक दोहन किया जा सके। आम आदमी के पास इतना समय नहीं होता कि वह बड़े राजनीतिक ग्रंथ पढ़कर उनका अर्थ समझ सके इसलिये सभी धर्मों में कथित बिचोलिये हैं जो इन किताबों से पढ़कर उनके बारे में लोगों को बताते हैं। इनमें भी कर्मकांडों का वह भाग सुनाकर उसका अनुकरण इसलिये कराया जाता है कि ताकि वह एक समूह में रह सके और दूसरे समूह से अलग दिखें। जब कोई बड़ी वारदात होती है तो आपने सफाई सुनी होगी कि सभी धर्म प्रेम, दया, और अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है, आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, आतंकवादी की कोई जाति नहीं होती, उसकी कोई भाषा नहीं होती, आदि आदि। इसे आप उन समूहों के शीर्षस्थ लोगों की चालाकी भी कह सकते हैं जो वारदात के बाद उनको अपने समूहों या समाजों के बारे में अच्छा कहने का अवसर मिल जाता है।

सच तो यह है कि धारण किया जाने वाले धर्म का कोई नाम नहीं होता क्योंकि वह कर्तव्य के रूप में देह के साथ जुड़ा रहता है और जिसका नाम लेते हैं वह केवल एक भ्रम के अन्य कुछ भी नहीं है।

‘आध्यात्म अपने अंतर्मन की यात्रा है’ अनुरक्ति ब्लाग के ललित मोहन त्रिवेदी ने यही पिछले लेख में अपनी टिप्पणी करते हुए लिखा था। यह यात्रा बहुत सरल भी है और कठिन भी। कठिन यह तय करना है कि हम अपने अंतर्मन की यात्रा करें या नहीं और जब करने निकलें तो फिर बाहर के झंझटों से आदमी स्वतः परे हो जाता है। वह अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होता पर उनका तनाव अपने ऊपर नहीं आने देता। समय के अुनसार अपना धर्म निभाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाले का मन अपने निंयत्रण में रहता है इसलिये उसको कोई भटका नहीं सकता पर जिनको नहीं हैं वह अपने समाजों और समूहों के शीर्षस्थ लोगों को आव्हान पर चाहे जो करने को तैयार हो जाते हैंं। किसी भी धर्म में अध्यात्म ज्ञान का प्रावधान नहीं है। प्रेम, अहिंसा, और दया के उपदेश तो सभी में दिया गया है पर साथ ही अपनी सांसरिक परेशानियों में सर्वशक्तिमान को याद करने की सलाह भी दी जाती है। काम सिद्ध हो जाये तो उसका धन्यवाद नहीं हो तो कह देते हैं उसकी मर्जी पर किसका बस चलता हैं यह मनुष्य को मानसिक रूप से पंगु करने का प्रयास है जिसमें सभी धर्मों के प्रचारक सफल रहते हैं और इस संसार में धार्मिक कहलाकर अपनी पूजा कराते हैं। इसलिये भारतीय अध्यात्म विश्व में सभी जगह स्वीकार किया जा रहा है क्योंकि वह जीवन और सृष्टि के रहस्यों के ज्ञान से भरा पड़ा है-याद रखें भारतीय अध्यात्म में भी किसी भी धर्म का नाम नहीं दिया गया है न ही कर्मकांडों को ही सर्वोपरि बताया गया है। उनका सारांश यही है कि जीवन को सहज भाव से जीते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करो यही धर्म है और इसका ज्ञान ही अध्यात्म है। शेष फिर कभी
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

12/30/07

कपिल क्रिकेट के साथ लोगों के जजबातों को भी भुनाएं

कपिल देव की आई.सी.एल.अभी भी कोई कमाल नहीं कर पा रही है। इसकी वजह यह है कि कपिल अभी क्रिकेट को एक ऐसा खेल समझ रहे हैं जिससे व्यापार किया जा सकता है, जबकि उन्हें यह भी सोचना चाहिऐ कि यह लोगों के जजबात इससे जुडे हुए हैं और जब तक उनका इस्तेमाल नहीं किया जायेगा तब वह अपनी संस्था को लोगों में लोकप्रिय नहीं बना सकते।
कपिल देव ने अभी हाल ही में दुनिया भर की टीमों के पुराने और सेवानिवृत खिलाडियों को लेकर टीमें बनाईं और मैच करवाए. उनके बारे में देश के समाचार माध्यमों में उनको स्थान मिला पर खेलप्रेमियों ने उनको महत्त्व नहीं दिया इसका कारण यह कि उन टीमों के नाम देश के स्थानीय बडे शहरों के नाम पर रखे। शायद आयोजकों को लगा होगा कि बडे और प्रसिद्ध खिलाडियों की वजह से लोग टूट पड़ेंगे और उनकी दिलचस्पी की वजह से उनको आर्थिक लाभ मिलेगा। ऐसा हुआ नहीं।
कपिल देव और उनके साथी आज इस देश में क्रिकेट का स्वरूप देख रहे हैं उसके पीछे लोगों के मन में जो देश के प्रति जजबात हैं उसे नहीं देख रहे। कहने को यह बी.सी.सी.आई.की टीम है पर इसे भारतीय टीम भी कहा जाता है। कपिल ने १९८३ में जब इस टीम को शिखर पर पहुंचाया तो पूरा देश क्रिकेट का मुरीद हो गया। इसलिए नहीं कि क्रिकेट एक खेल है बल्कि इसलिए कि उनका देश उसमें विश्व विजेता है।
कपिलदेव सोच रहे हैं की स्टार खिलाडी लेकर अपना अभियाय चलते रहें तो गलती पर हैं, उन्हें नये खिलाड़ी जिनको अभी भारतीय टीम में जगह मिलने की आशा नहीं है अपने साथ लेकर अपनी टीम बनाने चाहिए। इतना नहीं अपने विदेशी मित्रों से कहकर हर देश में ऐसी टीम बनवानी चाहिए। वह अगर यह सोच रहे हैं आई।सी।सी।आई की इसी संस्था के माध्यम से वह उससे जुड़ जायेंगे तो गलती कर रहे हैं। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी संस्था बनानी होंगी। जब वह सभी देशों के बीच उनके बैनर तले मुकाबले होंगे तभी पूरे विश्व के आम खेलप्रेमियों का ध्यान उनकी तरफ ध्यान जायेगा। जब वहाँ खिलाड़ी अच्छा खेलंगे तब लोगों के स्टार भी बनेंगे। नये लड़के कम इनामी राशि में भी खेलने के लिए तैयार हो जायेंगे। वैसे भी आजकल क्रिकेट खिलाड़ी खेल से कम विज्ञापन से अधिक कमाते हैं। इसे ही कहा जाता है जजबातों को भुनाना। हालांकि इस चक्कर में हो यह रहा है कि इस प्रयास में लोगों पर वही खिलाड़ी जबरन थोपे जा रहे हैं जिनको अनफिट हुए पांच वर्ष से अधिक हो गए हैं। लोगों का कपिल को समर्थन भी इसलिए मिला कि लोगों को लगा कि कपिल अब नये स्टारों को लायेंगे पर ऐसा हुआ नहीं।

कपिल अगर विश्व में मौजूद क्रिकेट की नियंत्रक संस्थाओं (format) के स्वरूप में ही बढ़ना चाहते हैं तो नहीं लगता कि उनको कोई अधिक सफलता मिलने वाली है। वह शायद सोच रहे थे कि भारत के कुछ स्टार खिलाडी उनसे जुड़ जाएं तो वह आगे बढ़ें तो एक तो इतनी अधिक आर्थिक उपलब्धियाँ छोड़कर उनके पास आयेंगे नहीं और आ गए तो नयेपन की चाह रखने वाले लोग उनसे दूर हो जायेंगे। इसलिए कपिल देव को केवल क्रिकेट को खेल समझते हुए भी इस बात का ध्यान रखें कि अंतत: इसका आर्थिक लाभ लोगों के उसके प्रति मौजूद जजबातों को भुनाने में है। व्यावसायिक क्षेत्रों में आजकल यही हो रहा है। बात अगर है तो बस इतनी कि भारत के लोग थके खिलाडियों और आधे बूढे हो चुके अभिनेताओं की जगह नये चेहरे देखना चाहते हैं वह नही हो रहा है और जो ऐसा करेगा उसे सफलता मिलेगी। आज के भौतिक युग में किसी व्यक्ति को इस आधार पर कभी सम्मान नहीं मिलता कि उसमें अभिनय, कला और खेल में कितनी काबलियत है बल्कि उसकी आर्थिक उपलब्धियाँ ही देखीं जातीं हैं।

12/21/07

उदासी का साया

मन से मनुष्य कहलाया
चलता है उसी के इशारों पर
अन्दर बैठे अहंकार ने
स्वयं ही चलने का अहसास कराया
कह गए बडे-बडे सिद्ध
अपने मन को पहचानो
कभी नाचता है
कभी भागता है
कभी भक्ति भी चाहता है
स्वयं मनस्वी होकर चलो
यही सभी ने समझाया

पर आदमी नहीं समझता
अपनी बुद्धि और अंहकारवश
दूसरों में तलाशता अपने लिए अक्ल
माया के सिंहासन पर बैठे
बुतों के इर्दगिर्द देकर परिक्रमा देकर
बहुत सुकून अनुभव करता
तन की खुशी को ही मन की समझता
इसलिए हांक कर ले जाते है
इस ज़माने के उसे नये खैरख्वाह
रुपहले परदे पर देखे दृश्य को
असली समझता
नाम के मनुष्य बहुत हैं पर
सबका मन मुरझाया
जब तक चलते हैं दृश्य
गूंजता हैं कानों में भयानक शोर
तब तक चलता है
अकेले में छा जाता है उस पर उदासी का साया
-------------------------------------------

12/17/07

गांधीगिरी,गांधीवाद और गांधीमार्ग

गांधीगिरी, गांधीवाद और गांधी मार्ग या विचारधारा तीनों शब्दों का अर्थ भले ही एक जैसे लगते है पर मेरी दृष्टि में में इनका भावार्थ एक नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग मुझे रूढ़ समझें पर विशुद्ध रूप से हिन्दी क्षेत्र का होने के कारण हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे स्मृति पटल में इस तरह अंकित है कि हिन्दी भाषा के हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे लिये सहज हो गया और मुझे किसी भी शब्द का भावार्थ समझने में कठिनाई नहीं होती ।

जब भी हिन्दी भाषा में किसी संज्ञा के साथ गिरी शब्द जुड़ता है तो वह उसके अर्थ के साथ उसके भाव और महत्त्व को कम करता है। दूसरे शब्दों में कहें कि यह उसे निम्नकोटि का भावार्थ प्रदान करता है। मैं किसी काम को लघु नहीं मानता क्योंकि अपने पेट के लिये रोजगार अर्जित करने के लिये कोई निम्न व्यसाय करने से निम्न नहीं होता है और हमारे देश में तो कई ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने इन्हीं निम्न व्यसायों से जुडे होने के बावजूद देश के आध्यात्म को ऐसी दिशा दी जिसके कारण देश आज विश्व्गुरु कहलाता है-पांडवों को भी अपने अज्ञातवास के दौरान निम्नकोटि के काम करना पड़े थे।

यहां इस चर्चा का उद्देश्य केवल भाषा और भाव का है। गिरी शब्द महत्वहीन व्यवसायों और संज्ञाओं में जोडा जाता है और कभी-कभी तो किसी नकारात्मक शब्द को प्रभावी बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है-जैसे उठाईगिरी, दादागिरी और गुंडागिरी। आजकल दो शब्द बहुत शब्द प्रचलित हैं जैसे चमचागिरी और नेतागिरी और इनका उच्चारण कोई उनका महत्व प्रतिपादित करना नहीं होता बल्कि किसी का मजाक उडाने के लिए भी किया जाता है। आपने कभी शिक्षकगिरी , चिकित्सकगिरी , व्यापारीगिरी और अधिकारीगिरी जैसे शब्द नहीं सुने होंगे। तात्पर्य यह है कि यह केवल किसी संज्ञा के मह्त्व को कम प्रदर्शित करता है। ऐसे में गांधी जी के आदर्शों को मानने वाला मुझ जैसा हिन्दीभाषी क्षेत्र का शख्स अपने आपको असहज अनुभव करता है।

अब गांधीवाद शब्द की चर्चा करें। वाद या नारे तो केवल लोगों को यह बताने के लिये हैं कि हम उनके अनुगामी हैं और उनके बारे में हम अधिक जानते हैं इसलिए हम जो कहते हैं वही मानो। अगर आप किसी भी वाद या नारे पर चलने वाले बुद्धिजीवी से उसका स्वरूप पूछें तो सब केवल रटे-रटाए नारे लगाने वाली बात कहेंगे। गरीबों और शोषितों को उठाना, महिलाओं को सम्मान दिलाना और जन कल्याण करना। सो इस पर बात अधिक क्या कहें । इन नारों और वाद पर मैं पहले भी बहुत कुछ लिख चुका हूं।
गांधी विचार या गांधी दर्शन शब्द से मेरा मन प्रुफ़ुल्लित हो जाता है। इस शब्द का प्रयोग जो व्यक्ति करता है उसके बारे में यही सोच हमारे मन में आता है यह वाकई उनके बारे में जानता है। गांधी जी ने ऐसा चरित्र जिया है जिस पर जितना भी लिख जाये कम है। उन्होने कोई अभिनय नहीं किया और न कोई ऐसा अभिनेता इस देश में हुआ कि उनके चरित्र को जी सके। हमारे देश के कुछ लोग वालीवुड का बहुत शोर मचाते हैं पर गांधीजी पर फ़िल्म बनाने वाला और उनका चरित्र निभाने वाला दोनों विदेशी थे। मतलब साफ़ है कि इस देश में उनके वाद पर बहुत चले पर दर्शन किसी ने नहीं अपनाया और ऐसा करते तो तब जब समझ में आता।

हाल में एक फ़िल्म बनी जिसमें एक अभिनेता ने गांधीगिरी की और गांधीजी के कुछ भक्त बहुत प्रसन्न हो गये। भाई लोगों को पता नहीं कि भाषा का शब्द, अर्थ और उसका भाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। गांधीगिरी शब्द का भाव पहले समझो। इस देश की अधिकतर जनता गांव में रह्ती है वह कभी इसे उस भाव से नहीं लेगी जो तथाकथित गांधीवादी समझ रहे हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि हिन्दी क्षेत्रों में गिरी शब्द उसका महत्व कम तो करता ही उसको हास्याभिव्यक्ति भी प्रदान करता है। फ़िर मुंबई को छोड़कर आप किसी भी हिन्दी भाषी क्षेत्र में चले जायें वहां हिन्दी ऐसी नहीं है जैसी वालीवुड की है। उनके फ़िल्मों से हिन्दी का प्रचार तो हो सकता है पर लोग वैसी बोलते नहीं है जैसी उसमें देखते और सुनते हैं।फिल्मों ने देश के चरित्र पर दुष्प्रभाव डाला है पर भाषा अभी बची हुई है।
इस सबके विश्लेषण के साथ मेरा तो यही कहना है कि मैं हमेशा गांधी मार्ग या उनके दर्शन पर चलने के लिये ही कहूंगा क्योंकि गांधिगिरी शब्द मुझे असहज कर देता है और अपने जीवन में कभी भी उसका उच्चारण नहीं कर सकता। हो सकता है मैं गलत हूं पर क्या करूं मैने हिन्दी को जिस रूप में पढा है उसके आधार पर मेरी यह समझ बनी है हालांकि मैं यह दावा भी नहीं करता की मैं एक दम सही हूँ। हिन्दी भाषा में इतनी विशेषज्ञता नहीं है कि ऐसा दावा कर सकूं

12/8/07

गूगल दुनिया के लिए एक ख़तरा!

ऑस्ट्रिया के ग्रेज विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट सर्च इंजन ‘गूगल’ को दुनिया के लिए एक खतरा बताया है। विश्वविद्यालय की संचार और कंप्यूटर संस्थान के अध्यक्ष प्रो.हरमैन माउरर के नेतृत्व वाले एक शोध दल के मुताबिक गूगल अब एक नया स्वरूप लेने जा रहा है जो इंटरनेट की दुनिया में पूर्ण एकाधिकार की कोशिश है। शोध में गूगल के एकाधिकार और इसके ‘खुफिया एजेंसी’ में बदलते जाने की आशंका पर चिंता व्यक्त की गई है।

यह खबर सिफी कॉम पर हैं और गूगल अपने मुख पृष्ठ पर यह दिखा रहा है। वैसे भारत में गूगल ने जिस तरह अपने पाँव फैलाये हैं उसे देखते हुए उसको अभी चुनौती मिलना कठिन है। भारत में गूगल के निरंतर मजबूत होने का कारण उसके हिन्दी, तमिल तेलगु, कन्नड़ और मलयालम भाषा के टूल तो हैं ही उसका सर्च इंजन भी बहुत शक्तिशाली है-यही कारण है की गूगल में इतना आत्मविश्वास है कि वह अपने को खतरा बताने वाली खबर भी स्वयं दिखा रहा है। अगर हम आज अपने हिन्दी चिट्ठों को देखें तो उसमें गूगल की भूमिका को नकारना कठिन है, क्योंकि उसके बिना शायद हिन्दी में चिटठा लिखना इतना आसान नहीं है। ऐसा नहीं है कि अन्य वेब साईटें भी इसके लिए तैयार नहीं हो रहीं होंगी और आज के व्यवसायिक युग में प्रतिस्पर्धा कभी भी हो सकती है।

भारत में याहू भी बहुत विस्तार लिए हुए हैं पर उसके साथ अभी हिन्दी में काम उस रूप में नहीं किया जा सकता जिस तरह गूगल के साथ किया जा सकता है। मैंने शुरू में याहू में ही ईमेल बनाया था और गूगल में बनाने की सोची भी नहीं थी पर जब एक बार नारद पर ब्लोग देखे तो उनको ढूंढते गूगल पर ईमेल बना लिया। फिर तो उसके ब्लोग में घुसा तो आज तक बना हुआ हूँ। उसका एकाधिकार अगर बना हुआ है तो उसकी वजह यही है कि इसने जो सुविधाएं लिखने के उपलब्ध कराईं है उससे सहजता की अनुभूति होती है। जहाँ तक इसके खुफिया एजेंसी में बदलने की बात है वह चिंता की बात है और इसके लिए तो भारत के सरकारी तकनीकी विशेषज्ञों को चौकस रहना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह अपनी खुफिया जानकारी का उपयोग किस रूप में कर सकता है।
इसके दो रूप हो सकते हैं एक तो अपने समर्थन वाली सरकारों को अपनी विरोधी सरकारों की जानकारी उपलब्ध करना और अपनी जानकारी के आधार पर अपना साम्राज्य बनाए रखना या निजी क्षेत्रों में एक संगठन या व्यक्ति की जानकारी दूसरे संगठन या व्यक्ति को देना-ऐसे में उन लोगों को चौकस रहना होगा जो इस पर काम करते हैं पर उनका इस्तेमाल अगर इससे जुडे किसी व्यक्ति ने असामाजिक गतिविधियों के लिए करने का प्रयास किया तो संकट हो सकता है, आजकल इंटरनेट पर आपराधिक गतिविधियों देखकर लगता है कि उनकी घुसपैठ इसके संगठन ने हो सकती हैं क्योंकि आतंकवादी और अपराधिक संगठन हर संस्था में अपनी घुसपैठ करते हैं-ऐसे में इसके प्रशासनिक और तकनीकी प्रमुखों को अपनी साख बचने के लिए सतर्क रहना होगा-क्योंकि आप कितनी भी अच्छी सुविधाएं दीजिये पर राष्ट्र और समाज के हित नहीं सोचते तो किसी भी काम के नहीं है।
बहरहाल इस रंग बदलती दुनिया में कभी इस गूगल से पाला पडेगा यह सोचा भी नहीं था। इसका प्रभाव जहाँ फलदायी लगता है वहीं डराता भी है। इसके हिन्दी ब्लोग तकलीफ दे रहे हैं और प्रकाशित भी हो राहे हैं। मैं कभी कभी सोचता हूँ कहीं गूगल वाले मुझसे चिढे तो नहीं हुए हैं। जब मैं ऐसे लेख लिखता हूँ तो मेरे पास और भी जानकारी आतीं हैं, और उसमें किसी गूगल के नये टूल का पता लगता है और वह टूल बहुत चमत्कारी होते हैं। पर यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है और हो सकता है गूगल को चुतौती मिलने लगे। अगर गूगल समर्थकों को मेरी कोई बात बुरी लगे तो इसमें मैं जिम्मेदार नहीं हूँ क्योंकि उनके बारे में खबर वह अपने मुख पृष्ठ पर दिखा रहे है और इसके लिए वही जिम्मेदार होंगे। ऊपर की खबर मैं वहीं से कापी कर ले आया हूँ।

12/1/07

कौटिल्य का अर्थशास्त्र:दुर्गुण संक्रामक रोग की तरह होते हैं

  • चंपा के साथ रहने पर तिलों में वैसे ही सुगन्ध आ जाती है, रस वैसी ही नहीं खाया जाता है पर उसकी गंध तिलों में आ जाती है इस कारण अपना प्रभाव अवश्य डालते हैं। वह संक्रामक माने जाते हैं।

अभिप्राय- किसी व्यक्ति में कोई अच्छा गुण है पर वह यदि बुरे लोगों की संगति में आ जाता है तो उनके दुर्गुणों का प्रभाव उस पर आ जाता है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति अच्छा लगे तो यह भी देखना चाहिये कि वह किन लोगों के बीच रह रहा है और उसका उठाना बैठना किनके साथ है और उसका घर कैसा है। यदि उसकी पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि ठीक नहीं है तो यह मानना चाहिए कि उसमें वह दुर्गुण भी होंगे।

  • जल का गंगाजल का प्रवाह जब सागर में बह जाता है तब वह पीने योग्य नहीं रहता, विद्वान के लिए यह उचित है कि अशुभ गुण वाले का आश्रय कभी न ले अन्यथा वह भी समुद्र में मिल गए जल के समान होगा।

अभिप्राय -जिन लोगों के मन स्वच्छ हैं और जिन्हें हिंसा, पाप या अन्य अपराध करने से डर लगता है उन्हें दुष्ट प्रकृतियों के व्यक्तियों से दूर रहना चाहिऐ, अगर उनकी सोहबत करेंगे और सतत मिलते रहेंगे तो उन पर भी धीरे-धीरे इसका प्रभाव पडेगा। इसके अलावा संपर्क कायम करते हुए यह भी देखना चाहिऐ कि हमारे संस्कार और परिवार कैसा है और जिससे संपर्क कर रहे हैं उसका कैसा है , यह भी देखना चाहिए। ऊपर लिखे गए पहले पैराग्राफ में भी इसी बात की जानकारी दी गयी है।

11/29/07

औरत के सम्मान की रक्षा बिना विकास निरर्थक

समाज में हमने अपने हिसाब से दो वर्ग बना लिए हैं, इनमें एक वर्ग तो वह है जिसने अग्रेजों द्वारा प्रदत्त शिक्षा पद्धति से अक्षरज्ञान प्राप्त किया है और पेंट शर्ट पहनकर रहता है और उसे हम सभ्रांत वर्ग कहते हैं दूसरा वह है जो मजदूर, किसान और आदिवासियों का है और जिसने नयी प्रणाली से शिक्षा प्राप्त नहीं की और मेहनत और मजदूरी करते हुए जीवन यापन करता है इसे हम असभ्रांत वर्ग का मानते हैं। हमने गुणों के आधार पर कोई वर्गीकरण नहीं किया इसलिए शायद पहनावे और रहन-सहन में आधुनिक रहने वाले लोग अपने को सभ्रांत कहते हैं और निम्न वर्ग के साथ होने वाले दुर्व्यहार को अधिक महत्व नहीं देते।

इस असभ्रांत वर्ग को कुछ तथाकथित सभ्रांत लोग तो अत्यंत हेय दृष्टि से देखते है जैसे कि उनमें कोई गुण नहीं हो जबकि कुछ लोगों को अपने सभ्रांत वर्ग के सदस्य होने का अहंकार इतना होता है कि वह गरीब, मजदूर और किसान को सम्मान योग्य मानना तो दूर उनको अपमानित कर अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

अभी एक घटना जिसमें तथाकथित सभ्रांत वर्ग के लोगों द्वारा सार्वजनिक रूप से एक आदिवासी महिला के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया कोई पहली घटना नहीं है और न यह आखिरी होने वाली है। चूंकि यह घटना ऐसे मौके पर घटित हुई जिस समय मीडिया उस स्थान पर तात्कालिक रूप से सक्रिय था इसलिए लोगों के सामने आ गई वरना तो शायद ही किसी को पता चलता। हालांकि तथाकथित सभ्रांत वर्ग के लोगों के कुकृत्य पर शायद वैसी प्रतिक्रिया देश के अन्य भागों से नहीं आई जैसी आना चाहिऐ थी। इस देश में राम भी हुए हैं तो रावण भी और कृष्ण हुए है तो दुर्योधन भी हुए हैं। सच तो यह है कि कई लोगों के कृत्य तो रावण को भी शर्माने वाले हैं। रावण ने एक बार सीता जी का अपहरण करने के बात फिर कभी और कुकृत्य करने का दुस्साहस नहीं किया पर उसके बाद कई लोग ऐसे हुए है जो स्त्रियों के साथ अपमानजनक व्यवहार करने में बदनाम हो चुके हैं। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि रावण और दुर्योधन ऐसी प्रवृतिया हैं जो आज भी कुछ लोगों में हैं और उनको दण्डित किया जाना चाहिए।

मैं तो यह अपने को समझा नहीं पा रहा हूँ कि कैसे कोई भी किसी भी स्त्री को अपने सामने इस कदर अपमानित होते देख सकता है। ऐसा करने वाले तो पशु हैं और उनके लिए कोई सभ्रांत शब्द लिखता है तो गलत है पर जो देख रहे हैं उनके बारे में क्या कहा जाये? पशु वह हैं नहीं क्योंकि वह स्वयं यह दुष्कृत्य कर नहीं रहे और उनको सभ्य इंसान कहकर इंसानियत का अपमान करना है। ऐसे लोग तो मृतक के समान है जो ऐसा दुष्कृत्य अपने सामने होते देख सकते हैं। मुझे यह देखकर हैरानी हो रही है कि अभी भी उसके लिए कोई आवाज बुलंद करने वाला नहीं है और राजनीतिक रूप से चर्चित घटनाओं पर मीडिया और अन्य स्वयंसेवी संगठनों का ध्यान जाता है पर कई ऐसी घटनाएँ होती हैं जो दूरदराज के इलाकों में घटित होने से कई अखबारों में बीच के पेजों पर ही महत्वहीन खबर के रूप में छप कर रह जातीं हैं। कहीं जादू टोना करने तो कहीं चुडैल कहकर औरतों को बहुत बुरे ढंग से अपमानित किया जाता है।

औरत का सबसे बडा धन उसकी लज्जा होती है और उसे छीनने का मतलब है उसकी प्राण लेना और मेरा विचार है कि इसके लिए तो हत्या जैसा दंड दिया जाना चाहिए-क्योंकि यह भयानक व्यवहार है। दुर्योधन ने द्रोपदी को अपमानित किया तो उसके बाद परिवार सहित विनाश का सामान करना पडा। महाभारत युद्ध से पहले पांडवों का दूत बनकर जब श्री कृष्ण हस्तिनापुर जा रहे थे तब वह उससे पहले अपनी भक्त द्रोपदी से मिलने गए तो उसने आग्रह किया कि वह किसी भी तरह युद्ध करवाएं और श्री कृष्णजी ने उससे युद्ध करवाने का आश्वासन भी दिया। श्री कृष्ण जी अपनी परम भक्त द्रोपदी के अपमान को नहीं भुला सकते थे इसलिए अपनी पूरी शक्ति कौरवों के विनाश में लगा दी। यह आश्चर्य की बात है कि इतना बड़ा उदाहरण होते हुए भी कई लोग इससे सबक नहीं लेते।
ऐसे घटनाओं पर टिप्पणियाँ कर बैठ नहीं जाना चाहिए और देखना चाहिऐ कि उन लोगों के खिलाफ कार्यवाही हो रही है या नहीं। जब तक इस देश में औरतों के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार होगा विकास नहीं होगा दावे चाहे कितने भी कर लिए जाएं। ऐसे मामलों में केवल संवेदना व्यक्त करने से काम नहीं चलाने वाला बल्कि ठोस कार्यवाही होना चाहिऐ और उस पर सभ्रांत वर्ग में भी जो वास्तव में सभ्रांत है उनको सतत दृष्टि रखना चाहिए।

10/20/07

बीस ओवर में भारतीय टीम की जीत

भारत पचास ओवर के मैचों की श्रंखला आस्ट्रेलिया से हार गया पर बीस ओवर के मैच में उसने फिर आस्ट्रेलिया को सात विकेट से हरा दिया। एक दिवसीय मैचों में जिस तरह आस्ट्रेलिया भारत पर हावी था वैसे ही इस बीस ओवर के मैच में भारत के खिलाड़ी उस पर हावी थे । दक्षिण अफ्रीका में बीस ओवर के विश्वकप के सेमीफाइनल में जिस तरह आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी हैरान हो रहे थे वैसे ही आज के मैच में भी हुए। अपने वरिष्ठ खिलाडियों के बोझ से मुक्त होने के बाद भारत के खिलाड़ी किस तरह खतरनाक हो जाते हैं यह इन बीस ओवर के मैचों से जाहिर होता है।
भारत के खिलाडियों को देखकर नहीं लगता कि वह कोई आस्ट्रेलिया की परवाह करते हैं। चाहे जो गेंदबाज आ रहा है उसको मारने के लिए तैयार हो जाते हैं। किसी खिलाडी के आउट होने की चिंता नहीं दिखाते। चाहे जो क्षेत्र रक्षक हो उसके सामने से रन ले जाते हैं। अगर हम यह कहते हैं कि पचास ओवर और बीस ओवर की मैच की तकनीकी में अंतर है तो हमने तो आस्ट्रेलिया को पचास ओवर के मैच भी बीस ओवर की तरह खेलते देखा है-फिर भारत के खिलाडियों को उसमें क्या दिक्कत आती है? अब यह बात साफ हो गई कि भारत के खिलाडियों पर पचास ओवर के मैच में कुछ ऐसे दबाव हैं जो वह झेल नहीं पाते। वैसे यह दाव अच्छा लग गया है। पचास ओवर के मैच में पिटने के बावजूद भारत में बीस ओवर की आड़ में क्रिकेट लोकप्रिय हो रहा है और इसलिए अनफिट खिलाड़ी पचास ओवर के मैच खेलकर अपना काम चलाते रहेंगे और युवा खिलाडी बीस ओवर में मैच जितवा कर भी पचास ओवर की टीम में जूनियर की तरह खेलेंगे।
हालांकि भारत की फील्डिंग बहुत खराब थी पर कोई आस्ट्रेलिया वाले भी इस मामले में खरे नहीं उतरे और उन्होने ओवर थ्रो कर भारत का बोझ हल्का किया। वह भी इस दबाव में थे कि अब तो भारतीय खिलाड़ी खुलकर प्रहार करेंगे और उनसे डरने वाला कोई नहीं है और न ही कोई बैट से गेंद को आगे धकेल कर पीछे भागने वाला है। जो भी खेलेगा वह रन के लिए भाग लेगा सो अंधाधुंध थ्रो किये जिसे भारतीय खिलाडियों को कम से कम बारह रन अधिक मिले और वह आराम से जीत गए। कुल मिलाकर क्रिकेट अब चाहे बीस ओवर का हो या पचास ओवर का बहुत फास्ट हो गया है और अब इसे नये खिलाड़ी खेल सकते हैं। में टीवी पर पुराने क्रिकेट खिलाडियों के बातें सुन रहा था और मुझे नहीं लगता कि वह इस खेल से ज्यादा वाकिफ है क्योंकि सभी पचास ओवर में अनुभव को जरूरी बता रहे हैं। उनकी बातों को सुनकर नहीं लगता कि उन्हें विश्व की अन्य टीमों का ज्ञान है। वह सिर्फ भारत के खिलाडियों को ही देखकर अपने विचार रखते हैं और एक दिवसीय विश्व कप में भारतीय खिलाडियों ने निहायत खराब प्रदर्शन किया उसका उन्हें ध्यान है। बंगलादेश से हार को आज भी पुराने क्रिकेट प्रेमी पचा नहीं पा रहे।
भारतीय टीम के युवा खिलाडियों को इस जीत पर बधाई। वास्तव में जिस तरह वह एक जुट होकर वह बीस ओवरों के मैचों में खेलते हैं वह तारीफ के योग्य हैं। अभी पचास ओवर में भारतीय टीम बहुत पीछे है और उम्मीद करते हैं कि युवाओं को उसमें मौका मिलेगा तो उसमें भी वह ऐसा ही खेलेंगे।

10/12/07

जिंदगी का हिसाब

गुजरा हूँ जिन राहों से
उनका कोई हिसाब नहीं रखा
कई धोखे खाए
पर दुश्मन नहीं बनाए
दोस्तो से कोई शर्तों का
कभी हिसाब नहीं रखा
किसी के दिल में क्या है मेरे लिए
कभी किसी से पूछा नहीं
कौन क्या है मेरे दिल में
यह अपने पास ही रखा
कुछ ने समझा कि इसे ठग लिया
मैं हंसता हूँ क्योंकि मैने अपने को
ठगे जाने के लिए हमेशा तैयार रखा
दोस्तो की उम्मीद पूरी करने की
कोशिश हमेशा मन में रखी
उनसे कुछ मिले यह ख़्याल नहीं रखा
यही वजह हारता दिखा पर
कभी कुछ खोया नहीं
क्योंकि पाकर कुछ अपने पास नहीं रखा

10/11/07

भ्रम में मत पडो लिखते जाओ

नए और फ्लॉप ब्लोग लेखकों को सलाह दीं जाती है कि अभी वह यूनिकोड में लिखने का सिलसिला जारी रखे तो अच्छा रहेगा। कुछ लोगों ने सादा हिंदी फॉण्ट को यूनिकोड में बदलने के सॉफ्टवेयर की बातें कहीं है पर वह न तो स्वयं इसके प्रयोग की पुष्टि कर रहे हैं न ही किसी ऐसे ब्लोग का पता बता रहे है जिस पर इसका किया जाता है। हमारे ब्लोग पर वह टूल का पता लिखते हैं पर उसके उपयोग का कोई प्रमाण नहीं देते यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। वैसे भी हम इन टूलों को स्याही से अधिक महत्व न दें। हमारा मुख्य ध्येय अंतर्जाल पर हिंदी को वह भी देवनागरी में स्थापित करना है और यूनिकोड में अंग्रेजी और कृति देव में हिंदी का बोध करने से कोई लाभ नहीं होगा यह हम लेखकों की समस्या है न कि पढने वालों की। साथ ही यह गलतफहमी भी पालना छोड दें कि आप कोई कम जानते है और दूसरे ज्यादा । मैने अपने अनुभव से यह सीखा है कि जब हम कोई काम करते हैं तो उसकी प्रक्रियाओं से स्वयं ही जानकारी मिलती जाती है।
अत: आप लिखे और जमकर लिखें। रोज पोस्ट डालें और इस तरह का लिखें कि जिसका समाज से सरोकार हो। केवल ब्लोग लेखकों को देखकर नहीं लिखें। इस अंतर्जाल पह सफलता के लिए बस एक ही रास्ता है लिखते जाओ। कमेन्ट आदि कि चिन्ता मत करो वह सब तो चलता रहेगा। अपने मित्रों और अन्य लेखकों को कमेन्ट दो तो वह भी देंगे पर वह एक छोटी प्रक्रिया है, मूल ध्येय है लिखना। मैं चाहता हूँ कि हिंदी में और हमारी संख्या बढ़े। अगर हम लेखक हैं और कर सकते हैं लिखने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। और हिंदी को यूनिकोड में लिखने का अलावा और कोई रास्ता नहीं है और जिस टूल की बात कर रहे हैं उसके बारे में स्थति अभी स्पष्ट नहीं है। उससे दो चार होने में ज्यादा परिश्रम मत करो। मैने इन टूलों की प्रमाणिकता के बारे में जानने का प्रयास किया पर सफल नहीं हो सका।

10/7/07

चिट्ठा शब्द पर चर्चा

ब्लोग का मतलब जिस तरह चिट्ठा लिखा जा रहा है उसे सर्वमान्य तो नहीं माना जा सकता क्योंकि उसमें केवल आंकडे दर्ज होते हैं और अगर उसमें किसी भाषा के शब्द होते हैं भी हैं वह अंकों के सहायक होते हैं। ब्लोग का जन्म १९९९ में हुआ और इसके जन्मदाताओं का मुख्य उद्देश्य अपने संदेश संप्रेषण से था और उसमें भी उनके भाव अंक प्रधान नहीं बल्कि शब्द प्रधान थे। अगर हम इसे हिंदी में सही अनुवाद करना चाहते हैं तो पहले यह जानना जरूरी कौन इसका किस उद्देश्य से उपयोग कर रहा है। आम बातचीत में चिट्ठा शब्द का उपयोग हिसाब-किताब से ही लिया जाता है और उस्मने रचनात्मकता और सृजनशीलता का कहीं बोध नहीं होता जब कि हम यहाँ देख रहे हैं कि कई लोग इसका उपयोग अपने रचना धर्म को निभाने के लिए कर रहे हैं।
जब तक मैने वाणिज्य विषय में पढ़ना शुरू नहीं किया था तब तक चिट्ठा शब्द से मेरा वास्ता ही नहीं पढा था और मैने तब अपनी छोटी-छोटी कवितायेँ लिखने का अभ्यास शुरू भी कर दिया था। चिट्ठा शब्द मेरे सामने आया जब अपने लेखांकन का अध्ययन शुरू किया। उसमें इसे बेलेंस शीट कहा गया और हम हिंदी में उसे चिट्ठा ही कहते थे। इसका सीधा मतलब यह कि चिट्ठा अंक प्रधान है न कि शब्द प्रधान जबकि लोग रहे हैं वह तो अपने मनोभाव की शब्दों में अभिव्यक्ति कर रहे हैं। जब चिट्ठा शब्द आता है तो मेरे दिमाग में आंकडे घूमने लगते हैं। वैसे मैने ब्लोग और ब्लॉगर शब्द भी अंग्रेजी डिक्शनरी (शब्दकोश) में देखने का प्रयास किया पर वह नहीं मिला। मेरे लिए चिट्ठा शब्द केवल आंकड़ों के मायाजाल से अधिक कुछ नहीं है। इसलिये जब मैं लिखता हू तो सीधे ब्लोग ही लिख देता हूँ क्योंकि वह ज्यादा सहज लगता है। हिंदी भाषा की दृष्टि से भी चिट्ठा शब्द आंकड़ों से अधिक संबंधित लगता है। इसके लिए मैं हिंदी में निज पत्रक ही शब्द अधिक सुविधाजनक पाता हूँ और मुझे लगता है इसे ज्यादा लोकप्रियता तो पत्र या पत्रिका शब्द से ही मिल सकती है-जैसे-जैसे यह विधा लोकप्रिय होगी अपने साथ नए शब्द लाएगी इसमें कोई संशय नहीं है ।

जब मुझसे कोई मित्र पूछता है कि इन्टरनेट पर तुम जिस पर लिख रहे हो उसे क्या कहते हैं तो मैं कहता हूँ कि अंग्रेजी में ब्लोग और हिंदी में कहो तो 'निजी पत्रिका' पर लिखता हूँ। तब वह सहजता से समझ जाते हैं और किसी से कहूं कि यह चिट्ठा है तो उसका ध्यान आंकड़ों में खो जाता है। शुरूआत में जब मैने अपने ब्लोग बनाए तो उनमें पत्रिका शब्द कहीं न कहीं जरूर लिखा क्योंकि उस समय मुझे यह मालुम नहीं था कि इसे चौपालों पर चिट्ठा कहा जायेगा-वैसे भी इसे वहीं गढा गया है और अभी इस पर अभी आम लोगों की मुहर लगना बाकी है । मेरे विचारों में यह स्वतन्त्र पत्रकारिता की तरह है।
यह कोई विवाद खडा करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, बल्कि मेरे लक्ष्य यह है कि हम इस शब्द के उन पहलुओं पर विचार करें जो इसकी प्रगति पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। जब हम किसी ने आदमी से कहेंगे कि चलो चिट्ठा लिखो तो उस पर इतना प्रभाव नहीं पडेगा पर अगर हम उससे कहेंगे कि इन्टरनेट पर अपनी पत्रिका निकालो तो उसमें उत्साह पैदा होगा। अभी मैं अपने मित्रों से वार्तालाप में इसे 'पत्रिका' ही कहता हूँ और वह इसे मान भी लेते हैं क्योंकि मेरे लेखन कार्य को देखते हुए इन्हें इस पर कोई हैरानी भी नहीं होती। कुछ लेखक मित्र है और इन्टरनेट पर लिखने का मन बना रहे हैं उनके सामने इसे पत्रिका कहकर ही प्रचारित करता हूँ, क्योंकि उनके सामने चिट्ठा शब्द का उपयोग करना मतलब शब्दों से हटाकर अंकगणित और लेखा में उलझाना ही होगा। वैसे भी मुख्य मतलब तो इन्टरनेट पर हिंदी को बढावा देना है इसे चिट्ठा कहो या निज पत्रक या पत्रिका क्या फर्क पड़ता है। अत: हमें समानार्थी शब्दों को भी ग्रहण करने के मनस्थिति बनानी चाहिए वैसे भी यह कारवाँ आगे बढते हुए नए शब्द गढ़ता जायेगा।

10/6/07

क्या हिंदी में लिखना कठिन है


'क्या इन्टरनेट पर हिन्दी लिखना मुश्किल है?' अगर कोई मुझसे पूछता है तो मैं कहता हूँ कि बिल्कुल नहीं मैं तो हिन्दी में ही लिख रहा हूँ। दिलचस्प बात यह है कि अगर मेरे ब्लोगर मित्रों का कोई टूल मेरे काम नहीं आया और मैं उसी रास्ते पर चल रहा हूँ जिस पर पहले चल रहा था-वह लोग मुझे तभी प्रेरित कर सके जब मेरे अन्दर इन्टरनेट पर लिखने की इच्छा थी और अब भी उन्हीं लोगों को ला पायेंगे जिनकी एसी इच्छा है ।
शुरूआत में मुझे किसी ने नहीं बताया कि गूगल का हिन्दी टूल भी है जिससे हिन्दी में लिखा जा सकता है। वह तो मेरे हाथ लग गया और मैने लिखना शुरू किया। उस पर भी कभी तो हिन्दी टूल तो कभी टाईप राइटर लोड कर मैं अपने कंप्यूटर को ही तकलीफ देता रहा हूँ। मुझे लगता है मुझमें कंप्यूटर का ज्ञान नहीं है तो जो लोग दिशा निर्देशन कर रहे हैं उनमें भी कहीं न कहीं देश में हिन्दी के लोग किसे तरह काम करते हैं उसे जानते हुए भी भूल रहे हैं-यह अब तक हुई चर्चाओं से मुझे लगा है।

पहले तो मैं या बता दूं कि देश के अधिकाश लोग हिन्दी के गोदरेज टाईप राइटर पर भी टाईप करते हैं और रेमिंगटन यहाँ से विदा हुए ही बरसों हो गये हैं। मैने अभी एक टाईप राइटर टूल लोड किया तो पता लगा कि वह अपनी भाषा ही बदल बैठा और मुझे फोरमेट कराना पडा। उस समय तो मैं घबडा गया जब आर की जगह पी और डी की जगह ई टाईप होने लगा-तकनीकी ज्ञान न होने की वजह से यह पता नहीं चल पाता कि गलती कहाँ हुई । अगर आप मुझसे सच पूछें तो अभी भी गूगल के टूल से अधिक कोई टूल नहीं फला। एक टूल लाया था पर फोरमेट करने के बाद उसे दोबारा लाने का विचार नहीं किया-हालांकि अगर तसल्ली से लिखने के लिए वह टूल भी उपयोगी था पर फिर भी वह गूगल जैसा उपयोगी नहीं था। बड़ी रचनाओं कही अन्य टाईप कर वहाँ उसे हिन्दी में करना ठीक लगता है पर आखिर गूगल का ही टूल ही उसको पूरी तरह शुद्ध कर सकता है-यहाँ याद रखने वाली बात यह है कि गूगल को टूल सौ शब्दों से अधिक को हिन्दी में नहीं बदलता।

मैने अपनी कुछ बड़ी रचनायें उस पर लिखीं तो भाई लोग लिखने लगे इतनी बड़ी रचनाएं मत लिखो-तब मैं सोचता हूँ कि जब मुझ पर कम से कम ढाई सौ शब्दों का ही बोझ है तो उसके लिए गूगल का टूल क्या बुरा है। हिन्दी का टूल आयेगा- मैं इस पर यकीन करता हूँ । क्योंकि हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, हो सकता है कि हमारी नज़रों परे होकर कोई इस पर काम कर रहा हो।
जब लोग कहते हैं कि हिन्दी लिखना अभी कठिन है तो मैं हंसता हूँ। अच्छा खासा लिख रहे है और कहते हैं कि हिन्दी लिखना कठिन है। कोई टूल आयेगा या नहीं इस बहस को कोई नया आदमी सुने तो यही सोचेगा कि अभी हिन्दी लिखना कठिन है और उसका मनोबल गिर जायेगा। वैसे इसमें कोई शक नहीं है कि अगर अलग से टूल आ जाये तो बहुत अच्छा है पर अगर गूगल का टूल है तो लोगों को उसके बारे में बताएं, और उन्हें गूगल पर एक ब्लोग बनाने के लिए प्रेरित करते जाएँ। मुझे ताज्जुब है कि जब लोग मेरे सादा हिन्दी फॉण्ट में लिखे को नहीं पढ़ पा रहे थे तब तमाम तरह के विचार दे रहे थे पर किसी ने यह नहीं कहा कि त गूगल पर ब्लागस्पाट काम पर ब्लोग बनाकर काम चलाओ-हालांकि गूगल खुद ही इसके लिए लोगों प्रेरित कर रहा है बस उन्हें ध्यान दिलाने की जरूरत है। साथ ही उन्हें अन्य उपलब्ध टूलों के बारे में भी बताये फिर उन्हें तय करने दें कि वह अपना काम किस तरह करेंगे।

अब सवाल यह कि टूल चाहिऐ कि हिन्दी में लिखना है। जिसे लिखना है तो उसे आज का भी टूल बता दीजिए तो वह सहर्ष लिखेगा और जिसे नहीं लिखना उसे आप नए और सरल टूल दे दीजिए फिर भी नहीं लिखेगा। जिस टूल की बाते कर रहे हैं उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला जब तक हम लोगों को जानकारी नहीं देते कि हिन्दी में लिखा जा सकता है। अच्छे खासे सॉफ्ट इंजीनियर तक हिन्दी के टूल के बारे में तो छोडिये ब्लोग के बारे में भी नहीं जानते अपने संघर्ष के दिनों में मैने यह देखा है। यह सब बकवास मैं इसलिये लिख रहा हूँ कि कुछ लोग निराश होकर रोमन लिपि में हिन्दी लिखने की बात कर रहे हैं तो क्या आपने उन लोगों को बताया है कि अब हिन्दी में भी लिखा जा सकता है और उसके कई तरीके है। दो तीन ब्लोग तो मैने खुद देखे हैं जो रोमन में हिन्दी लिखते हैं और मैं सोचता हूँ कि पता नहीं उनको देवनागरी लिपि नहीं आती या उनको हिन्दी टूल उपलब्ध नहीं है।

कोई आधुनिक और सरल टूल की प्रतीक्षा किये बग़ैर अपने देश के लोगों को उपलब्ध टूलों की जानकारी देते रहिए। मेरे विचार से अगर इस बारे में औपचारिक रूप से शिविर आयोजित किये जाएँ तो बहुत अच्छा रहेगा। एक संगठन बनाएं और कंप्यूटर की ट्रेनिंग देने वाले संस्थाओं से कहें कि अगर वह अपने प्रशिक्षणार्थियों को ब्लोग बनाने का व्यावाहरिक ज्ञान दिलाना चाहते हैं तो हम वरिष्ठ ब्लोगर उपलब्ध हैं। चूंकि कई वरिष्ठ ब्लोगर इस प्रयास में हैं कि इस देश में हिन्दी ब्लोग बनाए जाना चाहिऐ तो उन्हें यह प्रयास भी करना होगा। मेरा वरिष्ठ ब्लोगारों से विनम्र आग्रह है कि अब इधर उधर लिखने के साथ इसे जमीन पर भी उतारने की योजना पर काम करें । लोग उनके नाम अब पत्र-पत्रिकाओं की वजह से जानते है तो प्रेरित भी होंगे- सब नहीं तो जिनको इन्टरनेट पर हिन्दी में लिखने की इच्छा है वह बहुत खुश होंगे। वैसे भी जिस टूल की बात वह कर रहे हैं वह तो चैट करने के लिए बहुत जरूरी है-जहाँ तक लिखने का सवाल है तो मुझे तो कोई दिक्कत नहीं आ रही है-फिर दूसरों को क्यों आयेगी यह मेरी समझ से परे है। हो सकता है कि नया होने की वजह से मुझे कम जानकारी हो अपने विवेक और अनुभव से जो देखा उसे ही लिख रहा हूँ ताकि अधिक से अधिक ब्लोग लेखक आगें आयें। मैं यह नहीं भूलता कि वरिष्ठ ब्लोगारों ने मुझे जिसे तरह प्रेरित कर मदद की और मैं चाहता हूँ कि वह अपने प्रयास इसी तरह जारी रखें।

10/5/07

हिंदी भाषा की आत्मा है देवनागरी लिपि

कुछ लोगों ने अगर यह तय कर लिया है कि वह हिंदी सहित देश की अन्य भाषाओं को रोमन में लिपि में लिखेंगे तो उसकी वजह उनका भाषा प्रेम तो हो ही नहीं सकता-भले ही वह उसका दावा करते हौं। भारत की अधिकांश भाषाओं की लिपि देवनागरी है और आम आदमी उसमें सहजता पूर्वक अध्ययन और लिखने का काम करता है। पर कुछ लोगों को अपने विद्वान होने का प्रदर्शन करने के लिए देवनागरी लिपि पर आपत्ति करना अच्छा लगता है और वह कर रहे हैं। मुझे इसकी संभावना चार वर्ष पूर्व ही लग गयी थी जब यह लगने लगा कि भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है।

एक समय था कि लोग कहते थे कि हिंदी में पढने-लिखने का कोई मतलब नहीं है क्यों कि उससे रोजगार नहीं मिल सकता। सबने विदेशों में जाकर रोजगार पाने के ख़्वाब संजोते हुए अंग्रेजी की तरफ दौड़ लगाई। तब हिंदी के एक सिरे से खारिज करने वालों को उसकी लिपि में दोष देखने का समय ही कहॉ था क्यों कि हिंदी गरीबों की भाषा थी। मैं जानता हूँ कि भाषा का जितना संबंध भाव से है उतना ही रोजी-रोटी से भी है। उस समय भी मुझे यह नहीं लगता था कि हिंदी भाषा या देवनागरी लिपि कोई अवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है और न आज लगता है। यह दुनियां कि इकलौती ऎसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। जब विश्व में भारत एक आर्थिक महाशक्ति बनने के तरफ अग्रसर है और उसके गरीब भी अब थोडा-बहुत पैसा रखने लगे हैं तब उसकी भाषा पर कब्जे की होड़ तो लगनी ही थी और जो लोग इसकी लिपि रोमन में देखना चाहते हैं उनके दो ही उद्देश्य हो सकते हैं ऐक तो उनको लगता है कि इससे उनको अच्छा व्यवसाय मिलने वाला है या फिर उनके मन में और हिंदी लेखकों को लिखते देखकर यह कुंठा हो रही है और वह सोचते हैं कि एक बार रोमन लिपि का मुद्दा उठा कर लोकप्रियता हासिल कर लें और फिर अपनी दूकान चाहे जिसमें चलाएँ।

मैं उनको रोकना नहीं चाहता पर इतना जरूर का सकता हूँ कि हिंदी को रोमन लिपि में पढने वालों की संख्या है पर ज्यादा नहीं है-कुछ ब्लोग लेखकों अगर यह लगता है कि उनके ब्लोग रोमन लिपि में पढते हैं तो दूर कर लें। खासतौर से इस संबंध में विदेशी लोगों का हवाला दिया जाता है-पर वहाँ ऐसे बहुत कम ही लोग होंगे जिन्हें हिंदी देवनागरी लिपि में पढ़ना नहीं आता होगा और वह इसमें दिलचस्पी लेते होंगे। उनकी मानसिकता में ही हिंदी होगी इसमें भी शक है। रोमन में हिंदी पढ़ना अपने आप में बिचारगी की स्थिति है। अभी मैने अपना चिट्ठा एक जगह रोमन लिपि में देखा था और मैं यह सोचकर खुश हुआ कि चलो जो इसे रोमन में पढने की चाहत रखने वाले भी पढ़ सकेंगे-क्यों कि उस पर मेरी कोई मेहनत नहीं थी और अगर कोई ऐक दो लोग पढ़ लेते हैं तो बुराई क्या है, पर मैं वहां से ज्यादा पाठक मिलने की आशा नहीं कर सकता।

ऐसा नहीं है कि रोमन लिपि में हिंदी पढने वाले नहीं मिल सकेंगे क्यों कि हमारे पडोसी देशों में फिल्मों की वजह से हिंदी समझने वालों की संख्या बहुत है और उनमें कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो हिंदी में लिखे को पढने में दिलचस्पी लें और इसमें खास तौर से पाकिस्तान और बंगलादेश के लोग हो सकते हैं, उसी तरह क्षेत्रीय भाषाओं के भी उनके सीमावर्ती देशों के लोगों को रोमन लिपि में पढ़ना अच्छ लग सकता है। पर अगर हम इसी मद्दे नजर अपने देश के पाठकों को नजर अंदाज करेंगे तो गलती करेंगे। हम यह मानकर भी गलती कर रहे हैं कि देश का पाठक तो केवल चौपालों पर ही आकर पढता है और बाहर जो पढ़ रहे हैं वह सब विदेशों के रहने वाले भारतीय है। इन चौपालों के बारे में देश के लोग बहुत कम जानते है और कंप्यूटर में इन्टरनेट पह हिंदी पढने वाले अपने रास्ते से हिंदी का लिखा पढते हैं। जिन्हें हिंदी में लिखने का मोह है और वह देव नागरी लिपि का ज्ञान नहीं रखते या असुविधा महसूस करते हैं उनके लिए रोमन लिखना स्वीकार्य हो सकता है पर वह कोई बड़ा तीर मार लेंगे यह गलत फ़हमी उन्हें नहीं पालना चाहिए, क्यों कि अंतत: हिंदी की लिपि देवनागरी है और वही आम पाठक तक आपको पहुंचा सकती है, एक बात और कि विदेशों में हिंदी का आकर्षण वहाँ की भारतीयों की वजह से कम इस देश की अर्थव्यवस्था के कारण है। इसलिये रोमन लिपि वाले अगर अपने लिखे से पैसा कमाने की ताक़त रखते हैं तो ख़ूब लिखें पर देश की भाषाओं का उद्धार करने की बात न ही करें तो अच्छा है। उसी तरह ब्लोगर भी यह भूल जाये कि उनको रोमन लिपि से कोई आर्थिक या सामाजिक लाभ होने वाला है। हिंदी को जो भी उर्जा मिलेगी वह इस देश के पाठक से ही मिलेगी-और यह नहीं भूलना चाहिए की हिंदी भाषा की आत्मा देवनागरी लिपि ही है।

9/12/07

स्मृतियां तो तनाव पैदा करती है

काल का विभाजन तीन प्रकारों -भूत, भविष्य, और वर्तमान-में किया गया है। इनमें भविष्य का हमें पता ही नहीं होता कि क्या होने वाला है, इसी तरह वर्तमान इतनी तेजी से भूतकाल में परिवर्तित हो रहा है कि हमें पता ही नहीं लगता कि प्रत्येक क्षण भूतकाल में चला जाता है। इसीलिये कभी-कभी सन्देह होता है कि वर्तमान काल को माना भी जाये कि नहीं। इस हालत में ले-देकर विचार करने के लिए हमारे पास भूतकाल ही रह जाता है।

अगर हम थोडा मनन करें तो लगेगा के हम तो केवल भूतकाल के बारे में ही अधिक सोचते हैं या फिर भविष्य की चिंताओं में ही खोये रहते हैं। इसलिये कहा भी जाता है कि मन के पक्षी के दो पंख है-भूत और भविष्य जिसके सहारे वह उड़ता है। अगर उसके यह दो पंख काट दो तो वह उड़ना बंद कर देगा और मनुष्य कालातीत स्थिति में पहुच जायेगा। यह कालातीत स्थिति ही स्वरूप स्थिति (आत्म साक्षात्कार ) की स्थिति है।

अगर थोडा विचार किया जाये कि किस प्रकार भूतकाल की स्मृतियों से अपने को मुक्त करें? हम भूतकाल की अपने लिए प्रिय और सुखद स्मृतियों को सदैव याद रखना चाहते और जो दु:खद स्मृतियां हैं उन्हें भूलना चाहते हैं, यह संभव नहीं है। जिस तरह हम इन्टरनेट पर कोई एक शब्द टाईप का रख दें तो उससे संबधित सारी वेब साईट आ जाती है और उनमें कई सारी हमारे काम की नहीं होती और हम उन्हें अनदेखा करने का प्रयास करते हैं। मस्तिष्क भी एक तरह से प्राकृतिक कंप्यूटर है यह हम सब जानते हैं। जब हम उसमें अपने अन्दर मौजूद स्मृतियों का बटन दबाते हैं तो वह भी स्मृतियां भी चली आती हैं जो हमें अच्छी नहीं लगती और जिनसे हमारे दिमाग में तनाव उत्पन्न होता है। इसलिये हमें सब स्मृतियों को भूलना होगा-अच्छी और बुरी दोनों । महर्षि अष्टावक्र कहते हैं -'सर्वविस्मरणादृते' सब कुछ भूलना होगा। आचार्य रजनीश स्मृति को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु मानते थे।

स्मृति हमेशा भूतकाल की होती है। जो बातें बीत चुकी हैं, जो विषय समाप्त हो चुके हैं, जो लोग हमारे सामने से जा चुके हैं या जिनका निधन हो गया है उन्हीं की स्मृति हमारे मानस पटल पर होती है। यह स्मृति हमेशा ही हमें परेशान करती है। भूतकाल के क्षणों में अर्थात मरे क्षणों में ही अपना समय बिताना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। हमारे प्रत्येक कार्य में ऊर्जा का क्षरण होता है और भूतकाल के चिन्तन और मनन में हमारी ऊर्जा व्यर्थ ही जाती है। यदि हम इसी ऊर्जा का प्रयोग ध्यान में करें तो हमें बहुत लाभ हो सकता है। हमको मन को रोकने में, ध्यान करने में बहुत ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो भूतकाल के चिन्तन में व्यर्थ चली जाती है।

अब विचार इस बात का उठता है कि हम अपनी इन भूतकाल की स्मृतियों से कैसे मुक्ति पायें।इसका उपाय यह है कि जैसे-जैसे मन में ये स्मृतियां आयें उन्हें ध्यान से देखते रहें। केवल ध्यान दें और उनके अच्छे या बुरे होने का विचार ना करें। यह नित्य ध्यान से देखें कि ये तो बीती हुईं है अर्थात यह तो मरी हुईं है इनकी अब कोई दैहिक या भौतिक सत्ता नहीं। यह तभी संभव है जब आपका चित्त शांत हो और चित्त तभी शांत रह सकता है जब हम ध्यान करें। ऐसा करने पर ही वह कालातीत अवस्था ( आत्म साक्षात्कार) की स्थिति प्राप्त होगी। यह एक सर्वश्रेष्ठ उपाय है अगर किया जाये तो जीवन में प्रसन्नता का अनुभव किया जा सकता है।

9/10/07

अच्छा लिखने की कोशिश

मैं कभी भी अच्छा लिखने का प्रयास ही नहीं करता क्योंकि अगर मैं एसा करूंगा तो एक भी लाईन नहीं लिख पाऊँगा-मेरा पूरा समय ही यह सोचते हुए निकल जाएगा कि क्या अच्छा लिखूं-अगर लिखूंगा नहीं तो कैसे पता लगेगा कि अच्छा लिखा कि नही और मैं उसे अच्छा मानूं तो भी क्या पढने वाले उसे मान लेंगे और अपनी रचना बुरी या निरर्थक किसे लगती है? अगर मैं यह तय करने लगूं कि मेरा लिखा अच्छा है या बुरा तो मैं अगली रचना भी नहीं कर पाऊँगा।

कोई भी लिखी गयी रचना अच्छी है या बुरी उसे पढने वाला ही तय कर सकता है और मैं दूसरे की रचनाओं को पढने में ही इस अधिकार का इस्तेमाल करता हूँ। मैं अच्छा लिखने की बजाय अच्छा सोचने और विषय की गहराई में जाने के प्रयास पर जोर देता हूँ और मानता हूँ कि अच्छे या निरर्थक का निर्णय पढने वाले पर ही छोड़ दूं।

लिखते हुए मेरा दिमाग केवल उसी विषय पर रहता है जिस पर लिख रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि उसमे संबंधित तत्व पूरी तरह शामिल हो जाएँ और जब गहराई में पहुंचते ही जब शब्द और वाक्य स्वत:बाहर आने लगते हैं और तब मेरे लिए यह सोचना काठी होता है कि यह रचना किसको अच्छी लगेगी और किसको बुरी। ब्लोग पर मैं सीधे लिखता हूँ और इसीलिये मुझे लगता है कि अपने मूल स्वरूप में नहीं लिख पा रहा हू पर एसा लग रहा है कि धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए उसे पा लूंगा। रचना लिखने के बाद मैं उसके पीछे नहीं जाता यह पता करने के लिए कि उसके पढने वाले पर क्या प्रतिक्रिया हुई। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में जब मेरी रचनाएं छपती हैं तो उसे पढने वाले मेरे मित्र और परिचित उस पर स्वत: प्रतिक्रिया दें तो अलग बात हैं पर मैं कभी उनसे अपने रचनाओं की चर्चा तक नहीं करता हूँ क्योंकि मेरे लिखे और उसके छपने के बीच जो समय है उसमें मैं और भी बहुत लिख चुका होता हूँ। वह लोग खुद अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। मैं उनकी प्रतिक्रियाएँ सहजता से सुनता हूँ।


जब ब्लोग पर लिखना शुरू किया उसके तीन महीने बाद मैंने अपने ऐसे ही मित्र पाठकों को अपने ब्लोग के पते दिए और जब उन्होने यह ब्लोग देखे तो रचनाओं को पढ़कर वह लोग बहुत अप्रसन्न हुए उनका कहना था कि वह उस स्तर की नहीं है जिसके लिए मुझे जाना जाता है । मैंने उन्हें बताया कि यहां मुझे लिखते समय केवल अपने दिमागी विचारों पर ही नहीं बल्कि की बोर्ड की तरफ भी ध्यान रखना पड़ता है और साथ ही अपनी बिजली गुल होने की आशंका भी रहती है, और बहुत बड़ी रचनाएँ यहाँ लिखना मेरे लिए संभव नहीं हो पाता। तब उनका कहना था कि मुझे कागज़ पर लिखकर बाद में उसे टाईप करना चाहिऐ। मैंने एसा प्रयास किया तो अपने ही लिखे को पुन: टाईप करना मेरे को ऐक अत्यंत बोर करने वाला प्रयास लगा। अगर उसे सादा हिंदी फॉण्ट में टाईप करना होता तो मैं सहर्ष तैयार हो जाता पर युनिकोड में एसा करना मुझे बोर करने वाला काम लगता है- सबसे बड़ी दिक्कत वर्तनी की त्रुटियों से है। लिखने के बाद मैं सरसरी तौर से पढता हूँ और त्रुटियों में सुधार करता हूँ पर जब कभी उन्हें दूसरी बार पढता हूँ तो त्रुटियों को देखकर क्षोभ होता है। सादा हिंदी फॉण्ट में मैं इस तरह की गलतियां नहीं करता, कम से कम से वाक्य लिखने में तो बिल्कुल नहीं -यहाँ तो लिखते हुए वाक्य भी गलत हो जाते हैं और जब उन्हें ठीक करने बैठता हूँ तो लिखने से अधिक समय लग जाता है।

मेरे कुछ मित्र फिर भी यही चाहते है कि मुझे इन्टरनेट पर लिखना जारी रखना चाहिये। पन्द्रह मित्रों में दो एसे भी हैं जिन्हें लगता है कि रचनाएं छोटी है पर उतनी ही अच्छी जितनी पत्र-पत्रिकाओं में लिखता हूँ। मतलब यह कि प्रतिक्रियाओं को देखते हुए यह कहना कठिन है कि क्या अच्छा लिखा या क्या बुरा? ऐक बात और कि मैंने अपने मित्र और पाठकों से कोई राय स्वयं नहीं मांगी थी पर उनकी आदत है वह मेरे से मेरे लिखे पर जब भी मिलते हैं चर्चा अवश्य करते हैं। एसे मित्रों की समालोचना से मेरे अन्दर केवल इतना प्रभाव होता है कि अगली बार लिखते समय इस बात का प्रयास करता हूँ कि उन्हें इसका अवसर न मिले पर जब अपनी चरम स्थिति पर पहुँचता हूँ और वाक्य और शब्द अपनी स्वाभाविक गति से बाहर आते हैं तो सब भूल जाता हूँ क्योंकि मुझे विषयों की गहराई में आ जाने पर और कुछ ध्यान नहीं रह पाता।

प्रतिक्रियाएँ लिखने को प्रेरित करतीं है पर अच्छा या बुरा लिखना इस बात पर निर्भर करता है कि विषय के प्रति हम कितना गंभीर है। अक्सर लोगो लिखने के लिए लिखते हैं और चाहते हैं लोग उनकी वाहवाही करें, सीमित दायरे में ऎसी वाहवाही मिल भी जाती है पर जब आपको लिखने के लिए व्यापक दौरे में पाठक चाहिऐ तो आपको अपने विषय के प्रति गंभीर रहना चाहिऐ। मैंने जब इन्टरनेट पर लिखना शुरू किया था तो मुझे यह पता ही नहीं था कि पढने वालों से इतनी जल्दी रू-ब -रू होने की भी इसमें प्रक्रिया है और जिसे कमेन्ट कहते हैं। मैं कमेंट करने वालों को अपने पाठक मित्रों की तरह ही मानता हूँ-उन दोनों में अंतर है तो बस इतना कि मित्र लोग प्रत्यक्ष सामने प्रतिक्रिया देते है जबकि कमेंट लिखने वाले लिख कर विचार देते है- मुझे दोनों में आत्मीयता का भाव एक जैसा ही लगता है। । इससे मुझे प्रसन्नता होती है और लिखते समय कोशिश करता हूँ कि उन्हें अच्छा पढने का अवसर मिले पर बहुत जल्द यहाँ भी भूल जाता हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि किसी भी तरह अपनी यह पोस्ट पूरी करूं और अपने विषय में डूबे होने के कारण् वाक्य और शब्द धाराप्रवाह चले आते हैं और उनको रोकना कठिन होता है साथ ही विषय को सामाजिक् सरोकार से जोडने के प्रयास भी करना आवश्यक लगता है एसे में भावी प्रतिक्रिया का ध्यान रखना कठिन लगता है और अंततः उस रचना के सार्थक और निरर्थक होने का निर्णय पढ्ने वाले पर छोडना ही पडता है। अब अच्छा लिखा या बुरा वह जाने।

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें