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10/13/08

‘बिन फेरे, बने बसेरे’ से चिंतित घनेरे-आलेख

‘बिन फेरे, बने बसेरे’ को जब राज्य की वैधानिकता का प्रमाण मिलना प्रस्तावित भर हुआ है तब देश में एक नयी बहस शुरु हो गयी है-वैसे तो यहां हर वक्त कोई बहस चलती है पर बाकी इस समय पृष्ठभूमि में चली गयी हैं। इसमें एक तरफ वह लोग हैं जो समाज, संस्कृति और धर्म का किला ध्वस्त होने की वजह से आशंकित हैं तो दूसरी तरफ वह लोग इसमें स्त्रियों के अधिकारों को लेकर प्रसन्न है।

सच तो यह है कि इस देश में ऐसी कई बहसें चलती हैं जिनका अपने आप में कोई निष्कर्ष निकलता ही नहीं हैं और खास तौर से स्त्री पुरुष के संबंधों का विषय तो ऐसा है जिस पर आज तक कोइ्र्र दावे से अपनी बात नहीं कह पाया। फिर आजकल के बुद्धिजीवी जिनको वाद और नारों पर चलते हुए वैसा ही करने की आदत हो गयी है।
स्थिति यह है कि बिना विवाह किये ही स्त्री पुरुष के साथ रहने को वैधानिक रूप देने का जो प्रस्ताव है उसका स्वरूप क्या है, यह जाने बिना ही तर्क दिये जा रहे हैं। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में ‘बिन फेरे हम तेरे’ शीर्षक लगाकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया गया। मतलब फिल्म का टाईटल या गाने के आसरे ही अपनी बात कह रहे हैं कोई नया शीर्षक नहीं मिला। जैसे कि ‘बिने फेरे अब बनंेगे बसेरे’ या ‘बिन विवाह, इक घर होगा वाह!’

उस दिन तो हद ही हो गयी एक समाजशास्त्री इस विषय पर एक फिल्म का हवाला देकर अपनी बहस आगे बढ़ा रही थी‘ उस फिल्म में जैसा दिखाया गया है’ ‘अमुक फिल्म की नायिका के साथ यह हुआ’ और ‘अमुक फिल्म का नायक यह कह रहा था’ जैसे जुमले का उपयोग किया और फिर इस कानून का समर्थन किया। अब समझ मेें यह आ नहीं आ रहा था कि वह समाजशास्त्री थीं या फिल्मी कहानी विशेषज्ञ! हिंदी फिल्में कतई समाज का आईना नहीं होती क्योंकि साहित्य से उनका कोई सरोकार नहीं होता।

बुद्धिजीवियों की इस स्थिति को यह लगता है कि या तो फिल्म के दृष्टिकोण से समाज को देखा जायेगा या फिर विदेशी विचाराधारा के आईने इसका आंकलन होगा। सब तरफ बहसे देखें तो केवल सतही तर्कों पर हो रही है। कुछ धर्मशास्त्री तो अपने धर्म के विरुद्ध बता रहे हैं। समाज शास्त्री अपने अपने दृष्टिकोण से इस पर विचार व्यक्त कर रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि इस कानून का विस्तृत ब्यौरा किसी के पास उपलब्ध नहीं है।

एक स्त्री पुरुष का बिना विवाह किये साथ रहना कोई नयी बात नहीं है। बस अंतर यह है कि अधिकतर मामलों में पुरुष का एक विवाह हुआ होता है और वह समाज के डर के मारे दूसरा विवाह तो कर नहंी पाता और फिर उसका किसी अन्य स्त्री से संपर्क हो जाता है और अधिकतर मामलों में वह अविवाहित होती है। ऐसा कोई आज नहीं बल्कि सदियों से हो रहा है। राजा, महाराजों और जमीदारों के ऐसे एक नहंी हजार किस्से हैं जिनकी अपने क्षेत्रों में कहानियां बनी हुईं हैंं। कुछ लोगों ने गोली नाम का एक उपन्यास शायद पढ़ा हो उसमें एक राजा अपनी एक रखैल का विवाह अपने ही एक नौकर से करा देता है जबकि वह उसके पास एक दिन के लिये भी नहीं रहती। उसका पूरा जीवन ही अपने मालिक के सानिध्य में बीतता है। बताते हैं कि इस तरह की गोली प्रथा देश के कुछ हिस्सों में थी जिसमें राजा,महाराज और जमीदार इस तरह महिलाओं को गुलाम बनाकर रखते थे।

आधुनिक भारत में तो यह आम चलने में आ गया है। जिस तरह पहले राजा,महाराजा और जमीदारों की पहचान थी ऐसी विलासिता तो आज वह फैशन हो गयी है। जिन फिल्मों की कहानियों से इस समाज को देखने का प्रयास हो रहे हैं उनके अभिनेता और अभिनेत्रियों के निजी जीवन में तो ऐसी अनेक कहानियां हैं जो समाज में इतनी नहीं होतीं।

एक बात निश्चित है कि देश को पाश्चात्य सभ्यता के रोग ने जिस तरह ग्रस लिया है उससे तो फिलहाल मुक्ति संभव नहीं है। इससे एक तो पारिवारिक संस्कृति ध्वस्त हुई है दूसरे सुख सुविधा के साधनों के उपयोग से आदमी का घरेलू व्यय बढ़ा है और इसने एक ऐसे तनाव को जन्म दिया है जिसकी चर्चा कम ही लोग सार्वजनिक रूप से करते हैं। जिनके पास नहीं है वह अपने परिवार में ऐसी सुविधायें लाने के लिये प्रयत्नशील हैं और यह उनके लिये साधन नहंी बल्कि जीवन का लक्ष्य बनकर रह जाता है। एक आई तो दूसरी लानी है।

‘बिन फेरे बने बसेरे’ की पद्धति को वैधानिक मान्यता मिलने या न मिलने से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला क्योंकि इसे सामाजिक मान्यता मिलने में सदियां लग जायेंगी। जैसे दहेज विरोधी कानून बन गया पर यह प्रथा एक अंश भी बाधित नहीं हुई। यही हाल ‘बिन फेरे बने बसेरे का भी होना है’। हां, यह एकदम आधुनिक किस्म के अविवाहित युवक युवतियों को तत्कालिक रूप से पसंद आयेगा पर बाद में इस पर चलने वाले पछतायेंगे भी। अभी इसका पूरा मसौदा किसी के सामने नहीं आया पर इसे अत्यंत सावधानी से बनाना होगा वरना दुरुपयोग कहीं दुरुपयोग तो तमाम ऐसी विसंगतियां समाज के सामने आयेंगी जिससे झेलना कठिन होगा।

यह बात याद रखने लायक है कि विवाह एक स्त्री और पुरुष के बीच जरूर होता है पर इससे दोनों के परिवार के अन्य लोग भी एक दूसरे के साथ जुड़ते हैं। अगर खुशी में दोनों के रिश्तेदार आते हैं तो दुःख में निभाते भी हैं। जीवन का कोई भरोसा नही है इसलिये विवाह नाम की यह संस्था बनी है। ‘बिना फेरे बने बसेरे‘की पद्धति अपनाने वालों को बाद में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। किसी एक को दुःख पहुंचा तो दूसरा स्वयं ही उसे संभाल सकता है और बाकी रिश्तेदार तो कन्नी काट जायेंगे‘क्या हमें शादी पर बुलाया था जो अब तकलीफ में याद आ रही है?’ खासतौर से जिन लड़कियों के अधिकारों की बात कर रहे हैं उनके सामने ही सबसे अधिक संकट आ सकता है क्योंकि दुःख और तकलीफ में उसे किसी न किसी की सहायता आवश्यकता प्रतीत होती है। हां, यह बात केवल उन्हीं मामलोंे में लागू होती है जहां दोनों का पहला विवाह हो अगर किसी ने एक विवाह कर रखा है दूसरे के साथ ऐसे ही रिश्ता चला रहा है तो फिर उसके बारे में कहना तो व्यर्थ ही है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल तो इसमें यह आने वाला है कि एक वैध विवाह करते हुए केाई दूसरे से ऐसा रिश्ता रख सकता है।

बहरहाल यह प्रथा बड़े शहरों में तो पहले ही चल रही है पर छोटे शहरों में इसका प्रचलन अभी नहीं है। वैसे जो इस कानून का विरोध कर रहे हैं उन्हें समाज का ज्ञान नहीं है। उन्हें लगता हैकि इससे तो समाज में तमाम तरह की विसंगतियां आयेंगी। उनके तर्क गलत हैं क्योंकि वह देश के युवक और युवतियों के मजबूत संस्कारों को अनदेखा कर रहे हैं। भारत में भले ही पाश्चात्य सभ्यता का बोलबाला है पर आज भी युवक युवतियों अगर किसी की तरफ आकर्षित होते हैं तो उनके मन मेेंं विवाह करने की इच्छा भी जाग उठती है। प्यार भले ही पाश्चात्य ढंग से हो पर मिलन हमेशा भारतीय तरीके से ही होता है। युवक युवतियों को एकदम बेवकूफ मानने वाले इन बुद्धिजीवियों पर तो तरस ही आता है। किसी प्रकार का तर्क वितर्क करते हुए इस बात को याद रखना चाहिये कि युवक युवतियों का खून गर्म होता है पर विषाक्त नहीं जो वह अपने अच्छे बुरे का निर्णय कर सकें। ‘बिन फेरे बने बसेरे की राह पर इतने लोग नहीं चलेंगे जितना सोचा जा रहा है और चल रहे हैं उनको रोका भी किसने था।
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