समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label hasya vyangya. Show all posts
Showing posts with label hasya vyangya. Show all posts

10/25/09

‘ब्लाग’ का ला़क्षणिक अर्थ ‘निज पत्रक’ या ‘निजी पत्रिका’-व्यंग्य आलेख (meaning in the hindi of blog word)

ब्लाग का अगर कोई लाक्षणिक अर्थ-इसका हिंदी में कोई शब्दिक अर्थ नहीं है ऐसा कहा जाता है-अगर कुछ हो सकता है तो वह ‘पत्रिका’ या ‘पत्रक’ ही है। यह इसलिये नहीं लिखा जा रहा कि इस ब्लाग लेखक ने अपने अधिकतर ब्लाग पर अनजाने में पत्रिका शब्द लिख दिया था बल्कि अब चारों तरफ इसका प्रयोग देखकर यही निष्कर्ष निकलता है। ‘चिट्ठा‘ शब्द का अंग्रेजी पर्याय बेलेन्सीशीट मौजूद है इसलिये किसी भी सूरत में ब्लाग का अर्थ वह तो हो ही नहीं सकता। यह चिट्ठा शब्द लेखाकारी से संबंधित है और शब्दिक भंडार के लिये इसका प्रयोग हिंदी के लिये असहजता का बोध कराने वाला है-इससे तो इस ‘ब्लाग’ शब्द ही ठीक लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि फिर तो ब्लाग को ही हिंदी के शब्द भंडार में शामिल करना चाहिये। वैसे तो ‘पत्रिका‘ के लिये भी अंग्रेजी में शब्द हैं मेगजीन-इसलिये कुछ लोग उस पर आपत्ति कर सकते हैं। तिस पर हम जैसे मामूली लेखक ने इसे ढूंढा है तो यह संभव नहीं है कि हिंदी के विद्वान इसे स्वीकार करें। हिंदी भाषा के साथ यही त्रासदी है कि उसके प्रमाणिक लेखक बनने के लिये कोई पद या पुरस्कार पीठ के साथ चिपका हो। यह इस लेखक के पास है और मित्रों को कहना है कि आगे भी ऐसी कोई आशा नहीं करना चाहिये।

पहले ब्लाग के लिये इस लेखक ने ‘निज पत्रक’ शब्द का प्रयोग किया था पर उसे प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी। वैसे प्रसंगवश एक बात बता दें कि इस लेखक ने ही संभवतया पोस्ट शब्द के लिये पाठ शब्द लिखा था और आजकल गूगल भी उसका प्रयोग कर रहा है। अब यह पता नहीं कि वह इस लेखक की वजह से है या स्वाभाविक रूप से-संभव है पहले भी किसीने इसका प्रयोग किया हो। इधर पत्रिका शब्द का प्रयोग कई लोगों के लिये असहजता भी पैदा करता है। एक तो डोमेन लेकर पत्रिकायें प्रस्तुत हो रही हैं जिनको यह स्वीकार्य नहीं होगा कि कोई ब्लाग मुफ्त में पत्रिका बन जाये। दूसरा यह है कि अगर ब्लाग के लिये पत्रिका शब्द चल निकला तो फिर कागज पर छपने वाली पत्रिकाओं का के नाम की महत्ता कम हो सकती है। ब्लाग को पत्रिका मानने का आशय यह भी होगा कि भविष्य में इसे बनाने वालों पत्रकार मान लेना। तब तो यह हालत हो जायेगी कि जो भी ब्लाग बनायेगा वह कहेगा‘मैं भी पत्रकार हूं।’
यह लेखक यही सोचकर यह ‘निज पत्रक’ शब्द का प्रयोग करता रहा कि कहीं पत्रिका शब्द लोकप्रिय हो गया तो अनेक लोगों को अफसोस होगा। बहरहाल कल जब गूगल पर पाठ शब्द देखा तो अनुभव हुआ कि अगर हमारा पाठ शब्द वह अपना सकते हैं या संयोगवश मेल खाता है तो क्यों न हम ब्लाग शब्द का अपने द्वारा ईजाद किया गया ‘निज पत्रक’ या ‘निज पत्रिका’ शब्द के साथ आगे बढ़ें। एक बात तय रही कि हम या तो ब्लाग लिखते हैं या ‘निज पत्रक’(निज पत्रिका)-चिट्ठा तो कतई नहीं लिखते। चिट््ठा शब्द हमारे अंदर हीन भावना भी भरता है। वह यह कि हमने वाणिज्य स्नातक की उपाधि तृत्तीय श्रेणी में प्राप्त की। केवल तीन नबरों से द्वितीय श्रेणी रह गयी। हुआ यह कि वाणिज्य स्नातक के द्वित्तीय वर्ष में हमारा लेखा का पेपर बिगड़ गया था। उसमें सामान्य प्रविष्टी रोकड़ बही और लाभ हानि खाता हम सही कर गये पर कमबख्त ‘वार्षिक चिट्ठा बिगड़ गया। द्वितीय वर्ष का यह बोझ हमें तृतीय वर्ष में भी झेलना पड़ा। वहां भी वार्षिक चिट्ठा की प्रस्तुति बेहतरीन नहीं हुई। इस तरह तृतीय श्रेणी में हमारी वाणिज्य स्नातक की उपाधि सिमट गयी।
यह चिट्ठा शब्द सामान्य लोगों की जुबान पर चढ़ना कठिन भी है। कम से कम हम अपने इलाके के बारे में तो यही समझते हैं। हम हिंदी के भाषा विज्ञानी नहीं है पर इतने बेबस भी नहीं है कि तर्क न ढूंढ सकें। कम से कम वाद प्रतिवाद में अपनी बात रखने में हमारे महारथ को हमारे मित्र भी मानते हैं। अपने अनेक मित्रों से सलाह ली। हिंदी के ज्ञाता लोगों ने भी अपनी सहमति दी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ब्लाग लिखने वाले ही एक हमारे पहले के मित्र ने कहा-‘मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं।’
इन्हीं मित्र ने हमसे कहा कि ‘तुम कविता मत लिखो। हमें पसंद नहीं आती। तुम तो गद्य लिखा करो। तुम अगर कहते हो कि यह पत्रिका है तो वह भी मान लेंगे क्योंकि यह कविता में नहीं कह रहे। फिर जहां तक चिट्ठा कहने का प्रश्न है तो हमें भी अच्छा नहीं लगता अलबत्ता ब्लाग जरूर कहेंगे।’
प्रसंगवश हमारे वह मित्र बहुत गजब की गजल और गीत लिखते हैं। ऐसे में कविता के मामले में उनसे बहस करना अपनी भद्द पिटवाना है। यह भी संयोग है कि हमें गद्य लिखने की प्रेरणा देने वाले उन सज्जन ने ब्लाग बना लिया। बहरहाल अपनी अपनी राय है।
चिट्ठा शब्द से उन हिंदी लेखकों को परेशानी होगी जिनका गणिक कमजोर है। यह चिट्ठा कहीं न कहीं लेखांकन की तरफ इशारा करता है। इस पर जिन्होंने वाणिज्य की पढ़ाई की और हमेशा अपने विषय को बोर अनुभव करते रहे उनके लिये भी ‘चिट्ठा शब्द’ पुरानी बुरी यादों को ताजा करेगा। फिर अनेक लोग ऐसे भी है कि कंप्यूटर पर लेखा कार्य करते हैं। जब वह चिट्ठा शब्द का स्मरण करेंगेे तो उनके लिये आंकड़ों का जाल सामने आकर संकट खड़ा करेगा। अचानक ही उनको याद आयेगा कि अमुक आदमी की रोकड़ बही बनाना है-सो लिख लिया चिट्ठा।
वैसे ब्लाग लेखन अभियान को आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाना है तो इसके लिये ‘निज पत्रक‘ या ‘निजी पत्रिका‘ शब्द भी कम आकर्षक नहीं है। हमसे कोई पूछता है कि ‘ब्लाग यानि क्या’?’ जवाब में हम कहते हैं कि ‘समझ लो अपनी निजी पत्रिका निकाल रहे हैं। वहां से पैसा वैसा नहीं मिलता यह भी समझ लेना।’
लोग संतुष्ट हो जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘निज पत्रक’ या ‘निजी पत्रिका’ शब्द भी इसको लोकप्रियता दिलाने में सहायक हो सकता है। हालांकि यह भी है कि अनेक लोग यह बर्दाश्त नहीं करेंगे कि इस देश के ऐरे गैरे नत्थू खैरे हिंदी कलमकार उनके सामने फोकटिया संपादक या लेखक होकर उनको चुनौती दें। खासतौर से जब किसी फोकटिया ने ही ब्लाग शब्द का नामकरण ‘निज पत्रक’ या ‘निजी पत्रिका’ के रूप में किया हो उनकी भौहें तन जायेंगी। मगर इससे क्या? हमारा मानना है कि हिंदी के वर्तमान संगठित ढांचे में बदलाव अपेक्षित हैं और अंतर्जाल के अनेक लेखक इसके लिये जद्दोजेहद करते हुए दिख रहे हैं। यह पता नहीं अंतर्जाल पर लिखने वाले दूसरों को कितना पढ़ते हैं पर हमने देखा है कि अनेक ऐसे पाठ सामने आते हैं कि दिल खुश हो जाता है। एक बार किसी फोरम पर जाते हैं तो कुछ न कुछ नया पढ़ने को मिल ही जाता है। तब यह भ्रम भी समाप्त हो जाता है कि हम ही सबसे अच्छा लिख रहे हैं। शायद अनेक लोगों को मालुम है इसलिये अंतर्जाल पर हिंदी लेखन से मूंह फेरते हुए कहते हैं कि ‘वहां कूड़ा लिखा जा रहा है’। ऐसे में पत्रिका शब्द उनके लिये चिढ़ का कारण भी हो सकता है और कह सकते हैं कि ‘काहे की पत्रिका’, वह तो चिट्ठा है।

--------------------------------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

----------------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

10/23/09

धन पचाने का भी मंत्र होना चाहिए-हास्य व्यंग्य (dhan pachane ka mantra-hasya vyangya in hindi)

उस दिन एक संत को हमने पेट में अन्न पचाने का मंत्र बताते हुए सुना। वह सुबह, दोपहर और रात को भोजन करने से पहले और बाद में जाप किये जाने मंत्र बता रहे थे। हम भी बैठे प्रवचन सुन रहे थे। उसी समय हमारे दिमाग में एक प्रश्न आया कि ‘क्या धन कमाने से पहले और बाद में पचाने के लिये भी कोई मंत्र होगा।’
कुछ देर बाद उन्होंने लक्ष्मी को अपने घर बुलाने का मंत्र भी सुनाया। तब हमने सोचा कि जब धन को लाने का मंत्र बताया है तो उसे पचाने का मंत्र भी बतायेंगे। पूरे प्रवचन समाप्त हो गये पर ऐसा कोई मंत्र सुनाई नहीं दिया। मन में उत्सुकता ओर जिज्ञासा का भाव बना रहा। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो अपने एक सत्संगी से पूछा‘-भई, कोई धन पचाने का भी मंत्र होता है।’
उन सत्संगी ने पहले तो हमें घूर कर देखा और फिर पूछा-‘तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? इधर क्या सुबह पीकर सत्संग सुनने आये हो? ऐसे उल्टे सीधे सवाल करने का मतलब तो यही है कि तुम्हें मजाक सूझता है। भला धन भी पचाने की चीज है। जिसके पास धन है वह हर तरह से समर्थ हो जाता है।’’
इधर हमने भी तमाम तरह की किताबें छान मारी पर कहीं धन पचाने का मंत्र नहीं मिला। ताज्जुब यह देखकर हुआ कि लोग धन को पचाने का कोई मंत्र चाहते भी नहीं है। इधर समाज की जो हालत देखते हैं तब लगता है कि इसका भी कोई मंत्र होना चाहिए।
हमारे ताऊ कहते थे कि धन और अन्न हरेक को हजम नहीं होता। अधिक अन्न से आदमी बीमार पड़ता है तो सभी देखते हैं पर अधिक धन जिसका दिमाग खराब कर दे उसको कोई कोई अनुभव करता है। एक समय था जब सड़क पर निकलते थे तो ऐसा नहीं लगता कि किसी से डर है पर आजकल हालत दूसरे हैं। साइकिल पर हों या स्कूटर पर यह भय रहता है कि किसी मोटर साइकिल या कार वाले से टक्कर हो तो चोट अपने को लगे या हमारी गाड़ी को तो ठीक है पर दूसरे का कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए। ऐसा कोई दिन नहीं होता जब मोटर साइकिलों और कार वालों का आपसी झगड़ा न देखने को मिलता हो। आदमी के पास इतना अधिक धन पास आ रहा है पर जमीन तो उतनी है इसलिये आदमी सड़कों पर अतिक्रमण कर रहा है। चार पहिया वाली गाड़ियां बढ़ी पर सड़कें छोटी होती जा रही हैं। ऐसे में टक्करें तो हंांगी। ऊबड़ खाबड़ सड़कों पर कब तक आदमी गााड़ियां चलाते हुए अपना दिमागी संतुलन बनाये रख सकता है। ऐसे में किसी की नयी कार है तो समझ लीजिये उसे थोड़ी भी टक्कर अपनी अमीरी पर दाग की तरह लगती है और वह दूसरे पर हाथ मारकर उसे साफ करने पार उतारु हो जाता है। सड़कों और शहरों का सच सभी जानते हैं पर याद नहीं रखते। देश के हर शहर का अखबार उठाकर देख लीजिये। सड़क, पानी बिजली और कानून व्यवस्था की शिकायतों से भरा पड़ा मिलेगा। एक तरह से संक्रमण काल मान सकते हैं। कहते हैं कि संक्रमण काल में धीरज रखना चाहिये पर लोग हैं कि आक्रामक हो रहे हैं। इतना धन है कि उनको लगता है कि हम चाहे जो खरीद सकते हैं। इसलिये किसी की थोड़ी गलती पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किये बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता।
उस दिन का वाक्या भूले नहीं भूलता। गैस के चूल्हे की मरम्मत करने वाला एक लड़का अपनी साइकिल पर साजोसामान के साथ जा रहा था। रेल्वे क्रासिंग पर फाटक बंद था। वहां एक कार साइकिल पर चल रहे लड़के के एकदम आगे रुकी। लड़का कोशिश करते हुए भी उसको पीछे से टक्कर मारने से नहीं बच सका। टक्कर कोई जोरदार नहंी थी। लड़का साइकिल उठाकर कार से दूर खड़ा होकर फाटक का इंतजार करने लग गया। इधर कार वाला बाहर निकला। उसने इशारा कर लड़के को अपने पास बुलाया और आराम से उसके गाल पर एक थप्पड़ मारी। वह बिचारा मासूम देखता रह गया। अमीर की गरीब के प्रति यह बदतमीजी इसी बात का प्रमाण था कि धन सभी को हजम नहीं होता।
हम भी एक दिन साइकिल पर जा रहे थे। जिस शहर में हम पलकर बढ़े हुए हैं उसी शहर के मुख्य चैराहे से कुछ दूर हमारी साइकिल के आगे एक कार निकल कर थोड़ी दूर रुकी। यह इतना अप्रत्याशित था कि हमारा संतुलन गड़बड़ा गया पर हमने अपनी साइकिल को रोक लिया और टक्कर नहीं हो पायी। उसमें से कार वाला बाहर आया और अपनी कार को देखने लगा। वह ऐसे पेश आ रहा था कि जैसे उसके बाप ने सड़क उसे खरीद कर दी हो। फिर उसने हमें ऐसे जाने का इशारा किया जेसे कि किसी मामले में बाइज्जत बरी कर रहा हो।

कहने का तात्पर्य यह है कि धन को हजम करना भी एक वैसी कला है जैसे खाने को हजम करना। अगर धन पचने वाली चीज होती तो हार्टअटैक,, डाइबिटीज, ओर उच्च रक्तचाप जैसे राजरोग नहीं फैलते। किसी गरीब या मजदूर को हमने इन बीमारियों का शिकार होते नहीं देखा। आप कहेंगे कि यह तो भोजन के अपच होने के ही परिणाम है पर नहीं चिकित्सक तो यही कहते हैं कि यह राजरोग दिमागी तनाव से पैदा होते हैं। स्पष्टतः यह धन पचाने से जुड़े हुऐ हैं। जब धन आता है तो आदमी अहंकार वश शारीरिक श्रम से परे रहते हुए हमेशा इस प्रयास में रहता है कि वह अपना पभाव किसी पर जमाये। मतलब धन उसे हजम नहीं होता। इसका कोई मंत्र नहीं बताता। हम जानते हैं पर बतायेंगे नहंी क्योंकि इसके लिये फीस हमको चाहिये। इधर मुफ्त सेवा में कोई न नाम मिलता है न नामा। समस्या वही है कि आखिर धन पचाने का मंत्र चाहिये इस बात को मानते कितने लोग हैं?’
--------------------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

----------------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

10/13/08

‘बिन फेरे, बने बसेरे’ से चिंतित घनेरे-आलेख

‘बिन फेरे, बने बसेरे’ को जब राज्य की वैधानिकता का प्रमाण मिलना प्रस्तावित भर हुआ है तब देश में एक नयी बहस शुरु हो गयी है-वैसे तो यहां हर वक्त कोई बहस चलती है पर बाकी इस समय पृष्ठभूमि में चली गयी हैं। इसमें एक तरफ वह लोग हैं जो समाज, संस्कृति और धर्म का किला ध्वस्त होने की वजह से आशंकित हैं तो दूसरी तरफ वह लोग इसमें स्त्रियों के अधिकारों को लेकर प्रसन्न है।

सच तो यह है कि इस देश में ऐसी कई बहसें चलती हैं जिनका अपने आप में कोई निष्कर्ष निकलता ही नहीं हैं और खास तौर से स्त्री पुरुष के संबंधों का विषय तो ऐसा है जिस पर आज तक कोइ्र्र दावे से अपनी बात नहीं कह पाया। फिर आजकल के बुद्धिजीवी जिनको वाद और नारों पर चलते हुए वैसा ही करने की आदत हो गयी है।
स्थिति यह है कि बिना विवाह किये ही स्त्री पुरुष के साथ रहने को वैधानिक रूप देने का जो प्रस्ताव है उसका स्वरूप क्या है, यह जाने बिना ही तर्क दिये जा रहे हैं। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में ‘बिन फेरे हम तेरे’ शीर्षक लगाकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया गया। मतलब फिल्म का टाईटल या गाने के आसरे ही अपनी बात कह रहे हैं कोई नया शीर्षक नहीं मिला। जैसे कि ‘बिने फेरे अब बनंेगे बसेरे’ या ‘बिन विवाह, इक घर होगा वाह!’

उस दिन तो हद ही हो गयी एक समाजशास्त्री इस विषय पर एक फिल्म का हवाला देकर अपनी बहस आगे बढ़ा रही थी‘ उस फिल्म में जैसा दिखाया गया है’ ‘अमुक फिल्म की नायिका के साथ यह हुआ’ और ‘अमुक फिल्म का नायक यह कह रहा था’ जैसे जुमले का उपयोग किया और फिर इस कानून का समर्थन किया। अब समझ मेें यह आ नहीं आ रहा था कि वह समाजशास्त्री थीं या फिल्मी कहानी विशेषज्ञ! हिंदी फिल्में कतई समाज का आईना नहीं होती क्योंकि साहित्य से उनका कोई सरोकार नहीं होता।

बुद्धिजीवियों की इस स्थिति को यह लगता है कि या तो फिल्म के दृष्टिकोण से समाज को देखा जायेगा या फिर विदेशी विचाराधारा के आईने इसका आंकलन होगा। सब तरफ बहसे देखें तो केवल सतही तर्कों पर हो रही है। कुछ धर्मशास्त्री तो अपने धर्म के विरुद्ध बता रहे हैं। समाज शास्त्री अपने अपने दृष्टिकोण से इस पर विचार व्यक्त कर रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि इस कानून का विस्तृत ब्यौरा किसी के पास उपलब्ध नहीं है।

एक स्त्री पुरुष का बिना विवाह किये साथ रहना कोई नयी बात नहीं है। बस अंतर यह है कि अधिकतर मामलों में पुरुष का एक विवाह हुआ होता है और वह समाज के डर के मारे दूसरा विवाह तो कर नहंी पाता और फिर उसका किसी अन्य स्त्री से संपर्क हो जाता है और अधिकतर मामलों में वह अविवाहित होती है। ऐसा कोई आज नहीं बल्कि सदियों से हो रहा है। राजा, महाराजों और जमीदारों के ऐसे एक नहंी हजार किस्से हैं जिनकी अपने क्षेत्रों में कहानियां बनी हुईं हैंं। कुछ लोगों ने गोली नाम का एक उपन्यास शायद पढ़ा हो उसमें एक राजा अपनी एक रखैल का विवाह अपने ही एक नौकर से करा देता है जबकि वह उसके पास एक दिन के लिये भी नहीं रहती। उसका पूरा जीवन ही अपने मालिक के सानिध्य में बीतता है। बताते हैं कि इस तरह की गोली प्रथा देश के कुछ हिस्सों में थी जिसमें राजा,महाराज और जमीदार इस तरह महिलाओं को गुलाम बनाकर रखते थे।

आधुनिक भारत में तो यह आम चलने में आ गया है। जिस तरह पहले राजा,महाराजा और जमीदारों की पहचान थी ऐसी विलासिता तो आज वह फैशन हो गयी है। जिन फिल्मों की कहानियों से इस समाज को देखने का प्रयास हो रहे हैं उनके अभिनेता और अभिनेत्रियों के निजी जीवन में तो ऐसी अनेक कहानियां हैं जो समाज में इतनी नहीं होतीं।

एक बात निश्चित है कि देश को पाश्चात्य सभ्यता के रोग ने जिस तरह ग्रस लिया है उससे तो फिलहाल मुक्ति संभव नहीं है। इससे एक तो पारिवारिक संस्कृति ध्वस्त हुई है दूसरे सुख सुविधा के साधनों के उपयोग से आदमी का घरेलू व्यय बढ़ा है और इसने एक ऐसे तनाव को जन्म दिया है जिसकी चर्चा कम ही लोग सार्वजनिक रूप से करते हैं। जिनके पास नहीं है वह अपने परिवार में ऐसी सुविधायें लाने के लिये प्रयत्नशील हैं और यह उनके लिये साधन नहंी बल्कि जीवन का लक्ष्य बनकर रह जाता है। एक आई तो दूसरी लानी है।

‘बिन फेरे बने बसेरे’ की पद्धति को वैधानिक मान्यता मिलने या न मिलने से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला क्योंकि इसे सामाजिक मान्यता मिलने में सदियां लग जायेंगी। जैसे दहेज विरोधी कानून बन गया पर यह प्रथा एक अंश भी बाधित नहीं हुई। यही हाल ‘बिन फेरे बने बसेरे का भी होना है’। हां, यह एकदम आधुनिक किस्म के अविवाहित युवक युवतियों को तत्कालिक रूप से पसंद आयेगा पर बाद में इस पर चलने वाले पछतायेंगे भी। अभी इसका पूरा मसौदा किसी के सामने नहीं आया पर इसे अत्यंत सावधानी से बनाना होगा वरना दुरुपयोग कहीं दुरुपयोग तो तमाम ऐसी विसंगतियां समाज के सामने आयेंगी जिससे झेलना कठिन होगा।

यह बात याद रखने लायक है कि विवाह एक स्त्री और पुरुष के बीच जरूर होता है पर इससे दोनों के परिवार के अन्य लोग भी एक दूसरे के साथ जुड़ते हैं। अगर खुशी में दोनों के रिश्तेदार आते हैं तो दुःख में निभाते भी हैं। जीवन का कोई भरोसा नही है इसलिये विवाह नाम की यह संस्था बनी है। ‘बिना फेरे बने बसेरे‘की पद्धति अपनाने वालों को बाद में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। किसी एक को दुःख पहुंचा तो दूसरा स्वयं ही उसे संभाल सकता है और बाकी रिश्तेदार तो कन्नी काट जायेंगे‘क्या हमें शादी पर बुलाया था जो अब तकलीफ में याद आ रही है?’ खासतौर से जिन लड़कियों के अधिकारों की बात कर रहे हैं उनके सामने ही सबसे अधिक संकट आ सकता है क्योंकि दुःख और तकलीफ में उसे किसी न किसी की सहायता आवश्यकता प्रतीत होती है। हां, यह बात केवल उन्हीं मामलोंे में लागू होती है जहां दोनों का पहला विवाह हो अगर किसी ने एक विवाह कर रखा है दूसरे के साथ ऐसे ही रिश्ता चला रहा है तो फिर उसके बारे में कहना तो व्यर्थ ही है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल तो इसमें यह आने वाला है कि एक वैध विवाह करते हुए केाई दूसरे से ऐसा रिश्ता रख सकता है।

बहरहाल यह प्रथा बड़े शहरों में तो पहले ही चल रही है पर छोटे शहरों में इसका प्रचलन अभी नहीं है। वैसे जो इस कानून का विरोध कर रहे हैं उन्हें समाज का ज्ञान नहीं है। उन्हें लगता हैकि इससे तो समाज में तमाम तरह की विसंगतियां आयेंगी। उनके तर्क गलत हैं क्योंकि वह देश के युवक और युवतियों के मजबूत संस्कारों को अनदेखा कर रहे हैं। भारत में भले ही पाश्चात्य सभ्यता का बोलबाला है पर आज भी युवक युवतियों अगर किसी की तरफ आकर्षित होते हैं तो उनके मन मेेंं विवाह करने की इच्छा भी जाग उठती है। प्यार भले ही पाश्चात्य ढंग से हो पर मिलन हमेशा भारतीय तरीके से ही होता है। युवक युवतियों को एकदम बेवकूफ मानने वाले इन बुद्धिजीवियों पर तो तरस ही आता है। किसी प्रकार का तर्क वितर्क करते हुए इस बात को याद रखना चाहिये कि युवक युवतियों का खून गर्म होता है पर विषाक्त नहीं जो वह अपने अच्छे बुरे का निर्णय कर सकें। ‘बिन फेरे बने बसेरे की राह पर इतने लोग नहीं चलेंगे जितना सोचा जा रहा है और चल रहे हैं उनको रोका भी किसने था।
------------------------
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें