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3/24/10

धर्म की आड़ में धंधा रोकने के लिये लोगों का जागरुक होना जरूरी-हिन्दी लेख (Hindu Dharma and adhyatma-hindi article)

अभी हाल में भारत में कुछ कथित हिन्दू धर्माचार्यों पर आर्थिक, सामाजिक तथा यौन अपराध करने की रहस्योद्घाटन करने वाले समाचार देखने को मिले थे तब कुछ लोगों ने उस धर्म से जोड़ने की नाकामा कोशिश की थी। इन समाचारों को लेकर ऐसा प्रचार किया गया कि जैसे कि यह केवल हिन्दू धर्म में ही संभव है। अब पश्चिमी देशों में कुछ पादरियों द्वारा ऐसी ही घटनाओं की जानकारी आयी है और उन पर बालकों के साथ यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इसके बावजूद हमारा यह मानना है कि इसे ईसाई धर्म से जोड़ना गलत होगा। यह कहना भी गलत होगा कि ईसाई समाज के अधिकतर पादरी इसमें लिप्त हैं। दरअसल आज के आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग करते हुए अपने चिंतन और विवेक को पुराने दायरों से बाहर निकलकर सोचना चाहिये। अगर हम ऐसा नहीं करते तो निश्चित रूप से समाज और उससे जुड़े धर्मों के प्रति कोई नया नज़रिया नहीं बन पायेगा और पुराने ढर्रे पर आपस संघर्ष और विवाद चलते रहेंगे।
सच बात तो यह है कि कहीं भी धर्म की स्थापना के लिये जन चेतना आंदोलन की आवश्यकता तो हो सकती है पर वहां संगठन बनाने और उसे चलाने की आवश्कता ही नहीं है। जहां संगठन बनते हैं वहां पर पदाधिकारियों की नियुक्ति होती है और तब वहां आम और खास का अंतर भी निर्मित होता है। यही अंतर धर्म की आड़ में अधर्म करने का आधार बनता है क्योंकि वहां आम आदमी को धाार्मिक स्थानों और आयोजनों में एक ग्राहक और खास को उत्पादक या व्यवसायी बना देता है। जहां व्यवसाय वाली बात आई वहां भ्रष्टाचार स्वाभाविक रूप से पनपता है चाहे भले ही वह धर्म प्रचार से क्यो न जुंड़ा हो ऐसे में विश्व में चल रहे किसी भी धर्म के आचार्य पर जब कोई आर्थिक, यौन अथवा राजनीतिक अपराध करने का कोई आरोप लगता है तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है।
हमें यह पता नहीं है कि पश्चिमी में पैदा धर्मों में आध्यात्मिक ज्ञान का कितना तत्व है पर इतना तय है भारतीय धर्मों उससे सराबोर हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के बिना कोई भी ज्ञानी यह दावा नहीं कर सकता कि वह धार्मिक प्रवृत्तियों को धारण करने वाला है। इस अध्यात्म ज्ञान को गुरु से ग्रहण किया जाता है पर मुश्किल यह है कि इसको सुनाने वाले तो बहुत हैं पर धारण करने वाले ज्ञानी नगण्य हैं। आखिर आदमी को अध्यात्मिक शांति के लिये कहंी न कहीं जाना है-चाहे वह धनी हो या गरीब, स्त्री हो या पुरुष, वृद्ध हो या युवा-और इसके लिये वह गुरु को ढूंढता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के संपूर्ण होने का प्रमाण यह भी है कि यहां के धर्म में गुरु को जितना महत्व दिया गया उतना अन्य कहीं देखने को नहीं मिलता। इस बात पर गौरव करना चाहिये पर हमारे देश के अनेक कथित गुरुओं ने अपने लाभ के लिये जिस तरह लोगों की भावनाओं का दोहन किया है उसे देखकर ऐसा करने में संकोच भी होता है। दूसरी बात यह भी है कि जितने भी गुरु हैं उनमें से शायद ही कोई तत्व ज्ञान को समझता हो-रट भले ही लिया हो पर समझ में उनके कुछ नहीं आता।
दरअसल लोग इस बात को नहीं समझते और इसलिये वह धर्म के नाम पर विश्व भर में फैले पाखंड का प्रतिकार करने की सोच भी नहीं पाते। पहली बात तो यह कि धर्म कोइ्र प्रत्यक्ष रूप से लाभ दिलाने वाला कोई माध्यम नहीं है, अगर आप ऐसी अपेक्षा करेंगेे तो यकीनन चालाकियों के जाल में फंसते जायेंगे या फिर इतना ज्ञान प्राप्त करेंगे कि दूसरों के लिये जाल बुन सकते हैं। धर्म का आधार अध्यात्म है। अध्यात्म यानि वह आत्मा जो हमारे अंदर विचरण कर रहा है। उसे जानना और समझना ही तत्व ज्ञान है। जब हम उसे जान और समझ लेते हैं तब हमें इस संसार का सार भी समझ आ जाता है और दुःख हमें विचलित नहीं कर सकते और सुख किसी संकट में नहीं डाल सकते।
भक्ति और योग साधना एकांत में लाभप्रद होते हैं। यही सही है कि इनके करने के तौर तरीके सीखने के गुरु के पास जाना पड़ता है और वहां अन्य शिष्य भी उपस्थित रहते हैं। इसलिये वहां तन्मयता से सीखना चाहिये और फिर उस शिक्षा का उपयोग एकांत साधना में करना चाहिये। एक बार गुरु का दर छोड़ें तो पलट कर नहीं देखें-हमारे अनेक महापुरुषों ने गुरु किये और फिर वहां से निकले तो फिर समाज की सेवा की न कि हर बरस गुरुओं के घर चक्कर लगाकर जिंदगाी का कथित आनंद लिया। जहां भीड़ है वहां धर्म की आशा करना बेकार है क्योंकि अगर वहां एक भी दुष्ट है तो वह प्रत्यक्ष रूप से अपने कर्म तथा अप्रत्यक्ष रूप से अपनी सांसों से विषाक्त वातावरण निर्मित करता है।
एक बात यह भी है कि भारत में उत्पन्न धर्म संगठन पर आधारित नहीं है। उनका लक्ष्य व्यक्ति निर्माण है। यही कारण है कि यहां धर्मगुरुओं पर कोई अंकुश नहीं रहता। ऐसे में कुछ धार्मिक लोगों के पापों के लिये पूरे समाज को जिम्मेदारी नहंी ठहरा सकते। भारत के धर्म प्रत्यक्ष रूप से राजनीति के लिये प्रेरित नहीं करते इसलिये यहां के किसी राजा ने उसके विस्तार का प्रयास भी नहीं किया। इसके विपरीत भारत के बाहर उत्पन्न धर्म मनुष्य को इकाई में स्वतंत्र विचरण से रोककर उस संगठन के आधार से जुड़ने के लिये बाध्य करते हैं और उनमें राजनीतिक प्रभाव के सहारे विस्तार पाने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है।
पश्चिम में जिन धार्मिक लोगों पर यौन शोषण के आरोप लगे हैं उनके पीछे कहीं न कहंी संगठन है और वह चाहें तो उन पर कार्यवाही कर सकते हैं। दूसरी बात यह कि सबसे बड़े धार्मिक गुरु पर भी अनेक भ्रष्ट धार्मिक कर्मकांडियों को छोड़ने या उनकी अपराध की उपेक्षा करने का आरोप है। ऐसे में वहां का समाज कहीं न कहीं अपने को जिम्मेदार मान रहा है और यही कारण है कि अनेक बुद्धिजीवी आरोपियेां के विरुद्ध मुखर हैं क्योंकि उनको लगता है कि नैतिक दबाव के चलते अपराधी धार्मिक कर्मकांडियों को उनके स्थानों से हटवाकर दंडित कराया जा सकता है। भारत में यह स्थित इसलिये नहीं बनती क्योंकि यहां के धार्मिक कर्मकांडी अपनी सत्ता के सहारे स्थापित रहते हैं ऐसे में उन अपराध के लिये कानूनी कार्यवाही तो की जा सकती है पर किसी तरह का सामाजिक दबाव नहीं बन पाता। ऐसे में भक्तों को ऐस भ्रष्ट मठाधीाशों के प्रति उपेक्षासन करने की प्रेरणा ही दी जा सकती है-यह अलग बात है कि ऐसा प्रयास भी नहीं हो पाता।
कहने का अभिप्राय यह है कि पूरे विश्व में धर्म के आधार पर भ्रष्टाचार को रोकने का एक ही उपाय है कि लोगों को अध्यात्म और धर्म में अंतर समझाया जाना चाहिये। हम धार्मिक कर्मकांड स्वर्ग पाने के लिये करते हैं या इस जीवन में शांति पाने की इच्छा होती है-पहले इस बात पर आत्ममंथन करना जरूरी है। धार्मिक कर्मकांडों से स्वर्ग मिलता है यह तो प्रमाणित नहीं है पर एकांत साधना से अध्यात्मिक अभ्यास से मन को शांति मिलती है यह निश्चित है। यह अध्यात्मिक अभ्यास किसी भी प्रचलित धर्म से संबंधित नहीं है। कम से कम भारत में तो किसी धर्म का नाम बहुत समय से प्रचलित नहीं है। यहां धर्म से आशय सत्कर्म, सुविचार और सत्संग से न कि केवल हिन्दू धर्म से। सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म से यहां के संबोधन का प्रचलन अधिक पुराना नहीं है। इसे विदेशियों ने पहचान के रूप में दिया है। इसके विपरीत विदेशी धर्म तो पहनावे, नाम और सर्वशक्तिमान के अपने प्रतीकों के अलावा किसी अन्य को तो मानते ही नहीं है। हम यहां यह नहीं कह रहे कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है पर आशय यह है कि चाहे किसी भी धर्म का दलाल हो-जी हां गलत कर्म करने वालों के लिये ही शब्द ठीक लगता है-उसके दुष्कर्मों से पूरे धर्म समाज के लोग स्वयं को आहत न अनुभव करें। पूरी दुनियां के हर धर्म में अधर्म तो रहना ही है। अगर सारा संसार देवताओं से भरा होता तो फिर धर्म की आवश्यकता ही क्या होती? ऐसे में अपना समय कथित धार्मिक पापियों की चर्चा पर नष्ट करने की बजाय अपने चरित्र और विचार निर्माण की तरफ देना चाहिए। धर्म की आड़ में होने वाले धंधों को रोकने के लिये लोगों को जागरुक होकर धर्म और अध्यात्म में अंतर समझना चाहिये।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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2/12/10

ॐ नमो शिवाय:-आज महाशिवरात्रि है (om namo shivay-today mahashivratri)

‘ किं कारण ब्रह्म’
प्रश्न पूछा गया कि ‘ब्रह्म कौन है?
उत्तर मिलता है कि एको हि रुद्रः।’
आगे चलकर स्पष्ट किया जाता है कि
‘स शिव।।’’
यह भी आगे स्पष्ट किया गया है कि जगत का कारण स्वभाव न होकर स्वयं भगवान् शिव ही इसके अभिन्न निमित्तोपादान कारण है।
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थयं इमोल्लोकानीशत ईशनीभिः।
प्रत्यंजनांस्तिष्ठिति संचकोचान्तकाले
संसृज्य विश्व भुवनानि गोपाः।।
इसका आशय यह है कि जो अपनी शक्ति से इस संसार के शासक पद पर प्रतिष्ठित हैं वह रुद्र एक ही है। इसलिये ही विद्वानों ने जगत में कारण के रूप में किसी अन्य का आश्रय नहीं लिया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि शिव और रुद्र एक दूसरे  पर्यायवायी शब्द हैं।
भगवान रुद्र को इस कारण कहा जाता है क्यों रुत् अर्थात दुःख को विनष्ट कर देते हैं-‘रुत् दुःखम् द्रावयति नाशयतीति रुद्रः।’
भगवान शिव के लिये ही सत्यम् शिवम सुंदरम शब्दों का प्रयोग किया गया है। सत्य जो कि अदृश्य है और इस संसार के संचालन का कारण नहीं है। वह सृष्टिकर्ता है पर वह कर्म का कारण नहीं है। उसमें इद्रियों के गुण नहीं है। वह न सुनता, न बोलता और न कहता है क्योंकि वह कारण नहीं है।
यह मायावी संसार अत्यंत आकर्षक लगता है।  इस सत्य और सुंदरम के बीच स्थित शिव हैं।  वह इस संसार के कारण हैं।  वह परमात्मा का वह स्वरूप हैं जो दृश्यव्य होकर संसार को चलाता दिखता है पर वह सुंदर नहीं है।
कहा जाता है कि जब भगवान शिव की विवाह के लिये बारात निकली थी उसमें शामिल गणों को देखकर लोग डर गये थे।  यह गण हमारी इस सृष्टि रूपी देह में भी विराजमान हैं।  बाहर से शरीर कितना आकर्षक लगता है पर अंदर का दृश्य देखकर कोई भी डर सकता है।  अब तो शरीर के अंदर झांकने वाली मशीनें आ गयी हैं और उससे अगर अपने अंदर देखें तो  स्वयं ही डर जायें। मगर यही डराने वाले तत्व इस आकर्षक शरीर को संभाल रहे हैं यही भयानक गण इस आकर्षक संसार का आधार हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा सत्य के बाद शिव रूप में स्थित होने पर आकर्षक नहीं लगते पर इस संसार को भौतिक रूप से सुंदर बनाते हैं।  शिव तो सत्य और सुंदरम को जोड़ने वाले तत्व हैं और इसके लिये तो उन्होंने विष तक पी लिया जिससे नीलकंठ भी कहलाये।  अगर वह विष नहीं पीते तो क्या संसार का निर्माण होता? शायद नहीं और इसलिये उनको इस जगत के निर्माण संचालन का कारण भी माना गया है। गंगा आकाश में अदृश्य रूप से स्थित है, पर दिखती नहीं। धरती पर उसका स्वरूप आकर्षक दिखता है पर वह शिव नहीं दिखते जिन्होंने उसे जटाओं में धारण किया है, मगर उनकी उपस्थिति की अनुभूति है। वह गंगा के प्रवाह का कारण है। शिवजी की जटायें भले सुंदर न हों पर वह धरा पर बहती पावन नदी गंगा के सौंदर्य का कारण है। यह शिव तत्व ही सारे संसार के चलने का निमित या कारण है।
ऐसे भगवान श्री शिव जी को हार्दिक नमन। ॐ  नमो शिवायः।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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