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9/11/11

पतंजलि योग साधना-आत्मा से चित्त के एकाकार होने पर अपनी बुद्धि का ज्ञान होना संभव (patanjali yog sadhna or vigyan-aatma aur chitta se buddhi ka gyan)

            पतंजलि योग सूत्र या विज्ञान सामान्य बुद्धिमान के लिये अत्यंत जटिल है। जब तक कोई व्यक्ति स्वयं आष्टांग योग का अध्ययन सक्रियता के साथ नहीं करता तब उसके लिये पतंजलि दर्शन समझना एक दुरूह कार्य है। सीधी बात कहें कि जो व्यक्ति योग साधना का अभ्यास करता है तो साथ में रचनाकर्म या प्रवचन में भी उसे दक्ष होना चाहिए। जो लोग रचनाकर्म और प्रवचन में दक्ष नहीं है तो वह सक्रिय होकर भी उसका अध्ययन नहीं कर पाते और जो इस योग साधना के विषय पर रचनाकर्म और प्रवचन कर रहे हैं वह सभी आष्टांग योग के पूर्ण भागों को नहीं जानते। थोड़ा बहुत प्राणायाम और आसन कर अनेक लोग अपने आपको ज्ञानी समझ रहे हैं पर उनको मनुष्य चित्त की महिमा का पता नहीं है। हम चित्त को मन या बुद्धि के रूप में देख सकते हैं। दरअसल हमारा चित्त जड़ है। वह बाह्य दृश्यों से प्रभावित होकर उनके रूप को ग्रहण करता है। उसमें कोई चिंत्तन नहीं है इसलिये किसी पदार्थ को देखने, छूने, सूंघने और उपभोग करने के परिणाम वह नहीं बता सकता। चित्त में उन्हीं वस्तुओं को पाने की कामना होती है जो उसने देखी हैं पर जिसे नहीं देखा उनके बारे में वह विचार नहीं कर सकता।
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि
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न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्।।
          ‘‘यह चित्त स्वप्रकाश वाला नहीं क्योंकि वह केवल जड़ दृश्य है।’’
एकसमये चोभयानवधारणम्।।
        ‘‘एक काल में चित्त और दृश्य का जानना संभव नहीं है।’’
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसंग स्मृतिसंकरश्च।।
          ‘‘एक चित को दूसरे का चित्त मान लेने पर उस चित्त में दूसरे चित्त का दृश्य होगा। इससे अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृतियों का मिश्रण भी हो जायेगा।
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्ती स्वबुद्धिसंवेदनम्।।
         ‘‘यद्यपि मनुष्य की चेतन शक्ति क्रिया से रहित और असंग है तो भी तदाकार हो जाने पर अपनी बुद्धि का ज्ञान उसे हो जाता है।’’
           हम इसी जड़ चित्त को स्वयं समझ बैठते हैं। अगर योग साधना के आठों भागों का अध्ययन कर पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाये तो मनुष्य दृष्टा हो जाता है। तब उसका अपने चित्त पर नियंत्रण हो जाता है। वह उसका उपयोग इस तरह कर सकता है कि दूसरे मनुष्य के चित्त का भी उसे ज्ञान होने लगता है। इतना ही नहीं वह अपने चित्त को दूसरे का मानकर उसकी स्थितियों, स्मृतियों और संकल्पों का भी भान कर सकता है। इतना ही जब योगाभ्यास से चित्त नियंत्रण में आता है तब बाह्य पदार्थों और दृश्यों से उस पर जो प्रभाव होता है उसका अध्ययन करना सहज होता है जिनसे मनुष्य दुष्परिणाम देने वाले संपर्कों से परे रहकर सहजता से जीवन व्यतीत कर सकता है। आत्मा से चित्त के एकाकार होने पर वह प्रकाशमान हो उठता है और यह योग की चरमस्थिति है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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6/30/11

चाणक्य नीति-प्रतिदिन एक श्लोक नहीं तो आधे का ही अध्ययन करें

            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में अनेक ग्रंथ हैं। अक्सर लोग कहते हें कि सभी को पढ़ना मुश्किल है या वह इतने बड़े हैं कि उनका अध्ययन करने का हमारे पास समय नहीं है। कुछ लोग तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनेक ग्रंथों का होना भी दोषपूर्ण मानते हैं । उनका कहना है कि जिस तरह अन्य धर्मों की तरह हमारे धर्म एक किताब होती है उसी तरह हमारे धर्म की भी होती तो समाज के विचारों में इतना विरोधाभास नहीं होता। दरअसल यह सब अपने अज्ञान तथा आलस्य को छिपाने के लिये पैदा किये गये तर्क हैं। अनेक विद्वान यह बात कह चुके है कि समय मिले तो अन्य ग्रंथों का अध्ययन किया जाये वरना तो चारों वेदों का सार श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने व्यक्त कर दिया है। जिसे पढ़कर जीवन और परमात्मा के रहस्य को समझा जा सकता है। उसमें भगवान श्रीकृष्ण जी ने वेदों में स्वर्ग से प्रीति रखने वाले संदर्भों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए अन्य सामग्री का संक्षिप्त और सार गर्भित संदेश प्रस्तुत किया है। अगर श्रीमद्भावगत गीता का एक श्लोक भी प्रतिदिन कोई पढ़ा जाये तो वह तत्वज्ञान को समझ सकते हैं। श्रीमद्भागवत गीता विश्व का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान भी है। जिन लोगों को अध्यात्म में रुचि है वह उसका अध्ययन किये बिना नहंी रह सकते। कई लोग तो प्रतिदिन एक पाठ तो कई कुछ श्लोक पढ़कर उसे समझने का प्रयास करते हैं।
       चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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          श्लोकेन वा तदर्थेन पादेनैकाक्षरेण वा।
         अबन्ध्यं दिवसं कुर्याद् दानाध्ययन कर्मभिः।।
           ‘‘एक श्लोक का अध्ययन और मनन अथवा आधे श्लोक अथवा एक पद अथवा एक अक्षर का ही नित्य स्वाध्याय करना चाहिए।’’
      मुख्य बात मानव हृदय की है। मन में यह विचार होना चाहिए कि हम अपने अंदर बाहर के विकारों को किसी तरह बाहर निकालें। भारतीय अध्यात्म में श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन इसलिये महत्वपूर्ण बताया गया है कि उसमें सांसरिक विषयों की चर्चा कदापि नहीं है। उसके अध्ययन करने पर अन्य विषयों से ध्यान स्वतः हट जाता है और इस तरह पाठक के अंदर नयी स्फूर्ति और नये विचार पैदा होते हैं। समय न हो तो भले ही उसका एक श्लोक रोज पढ़ें उससे भी ज्ञान प्राप्त होता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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11/20/10

बिग बॉस मिथकों के सृजन की एक क्रिया-व्यंग्य चिंत्तन (bigg boss:mithakon ke srijan ki ek mithak ek kriya-vyangya chittan)

श्रीमद्भागवत गीता में एक दो वाक्य समझ में नहीं आता था। अब समझ में आने लगा है। वह क्या है, यह लिखें कि नहीं तय नहीं कर पाये। बहरहाल अब समाज में अच्छे, बुरे, सभ्य, असभ्य तथा विख्यात तथा कुख्यात का अंतर मिट गया है या मिटा दिया गया है यह कहना चाहिए। एक आम आदमी के रूप में जब कोई बदलाव करने की शक्ति का अपने अंदर अभाव महसूस हो तो फिर ‘सब चलता है’ कि तर्ज पर मौन रहना ठीक है। अब हालत यह है कि गुस्सा नहीं  आता। हर बात पर व्यंग्य ही छूटता है। समाज के शिखर पुरुष तो अब जैसे समर्पण की मुद्रा में है और आम आदमी हमेशा की तरह बेबस है। बीच में खड़े पात्रों ने सारी दुनियां की सामाजिक, अर्थिक, राजनीतिक, कल, साहित्य तथा धार्मिक क्षेत्रों में सक्रिय संस्थाओं को अपने हाथ में ले लिया है। कार्ल मार्क्स ने जिस पूंजीवाद की कल्पना की होगी उससे ज्यादा खूंखार वह है। इससे लड़ने के लिये जो उन्होंने पूंजी किताब लिखी उसके ध्वज वाहक होने का दिखावा करने वाले ही उसी पूंजीवाद के सरंक्षक हो गये हैं।
बात लंबी नहीं खीचेंगे क्योंकि आज के समय संक्षिप्तीकरण आवश्यक है। किसी को प्यार की भाषा बोलनी है तो वह बेमतलब है क्योंकि न वह अब आकर्षित करती है न सनसनी फैलाती है पर उससे ज्यादा वह लंबा वाक्य बोलने पड़ते हैं। इसलिये गालियां देकर भी प्रेम किया जा रहा है क्योंकि वह संक्षिप्त होने के साथ ही सनसनी फैलाने वाली होती हैं। लोगों के सामने या पर्दे पर लड़ो और बाहर आकर गले में बाहें डालकर बीयर या वाइन पियो। इधर हम बिग बॉस देखने लगे थे कि आखिर माज़रा क्या है? ऐसा क्या है कि प्रचार माध्यमों को उसकी जरूरत पड़ गयी है।
दरअसल बिग बॉस कोई कार्यक्रम नहीं बल्कि प्रचार माध्यमों को साक्षात्कार दिलाने तथा विज्ञापन जगत को नये चेहरे दिलवाने वाला एक फोरम भर है। चेहरे भी कौनसे? जो पहले अपने अपराधिक कृत्य अथवा मूर्खतापूर्ण गतिविधियों संलिप्पता के कारण बदनाम हुए हों। उन पर फैशियल पोतकर उनको फिर लोगों के सामने पेश करने का काम कर रहा है बिग बॉस!
पिछले चार पांच दिन से टीवी के समाचार चैनलों में जो साक्षात्कार आ रहे हैं वह बिग बॉस से निकले लोग हैं। पहले तो बिग बॉस के कार्यक्रम के समय पर सरकारी नियंत्रण पर विवाद हुआ तो तीन चेहरे ऐसे आये जो बिग बॉस से निकले थे। तीन दिन तक वही चेहरे हर टीवी चैनल पर दिखाई दिये। फिर एक टीवी चैनलों का स्टार समाचार चैनल लाया एक स्वर्गीय नेता के बेटे को साक्षात्कार के लिये। इसी समाचार चैनल की तीन महिला पत्रकारों ने एक सप्ताह पहले ही बाबा रामदेव का साक्षात्कार लिया था। उसके बाद  उसी मीडिया  के बेटे को लाया गया। आज तक समझ में नहीं आया कि स्वर्गीय नेता के उस बेटे की खासियत क्या है?। उसे मीडिया के बेटे क्यों कहा? दरअसल टीवी के ही एक चैनल पर इंसाफ धारावहिक की संचालिका के स्वयंवर कार्यक्रम की पटकथा का सृजन करने का दावा करने वाले एक लेखक को धमकाते हुए समर्थकों ने उस संचालिका के लिये मीडिया की बेटी शब्द का ही उपयोग किया गया था। सो अब हम यह मान कर चल रहे हैं कि पर्दे के पीछे शायद इन लोगों के लिये ऐसे ही संबोधन होते होंगे।
हैरानी इस बात की रही कि बिग बॉस से एक सुपात्र तथा एक सुपात्रनी के
वहां से निकाले जाने की बात टूट रही खबर के रूप में दिखाई जाने लगी। यह दोनों ही विवादास्पद थे-केवल टीवी चैनलों के प्रसारणों में यह बात समझें आम जनता तो इनको जानती ही नहीं। उससे पहले एक विवाहिता जोड़े ने जब बिग बॉस में दोबारा शादी पहली कहकर अपना स्वांग रचा तो उस पर विवाद हुआ या कहें कि प्रचार के लिये करवाया गया। अगले दिन दूल्हा बाहर! टूट रही खबर दिखी। फिर दूल्हा साक्षात्कार देने के लिये उपलब्ध हो गया। दोनों को समाज से बाहर निकालने की घोषणा करने वाला एक धार्मिक ठेकेदार भी चर्चा में दिखा! फिर यह दो अन्य निष्कासित हुए! अब आ गये दोनों समाचार चैनलों में अपना पक्ष रखने के लिये। दूसरे शब्दों में कहें कि समाचार चैनलों में विज्ञापनों के बीच सामग्री बनवाने में सहायता करने के लिये तीनों को प्रसिद्धि का फैशियल लगाने के साथ तैयार कर भेजा गया।
सैलिब्रिटी आखिर क्या है? हिन्दी में पूछे आजकल हस्ती किसे कहा जाता है? अब तो हालत यह है कि लोग बदनाम होने के लिये घूम रहे हैं। अगर यही हालत रही तो आगे हम अपराधियों के यह बयान सुनेंगे कि हमें किसी टीवी चैनल में कोई कार्यक्रम मिले इसलिये ही यह सारा काम किया ताकि हमें सुधारने के अवसर देकर किसी निर्माता को प्रसिद्धि मिले तो हमें पैसा भी जोरदर मिलेगा।
बाज़ार और प्रचार के स्वच्छ बुतनुमा चेहरों के पीछे जो इंसान हैं उनको केवल पैसा चाहिए-कहीं समाज पर नियंत्रण करने जरूरी हो तो यह काम भी वही लोग कर रहे हैं। अब नंबर एक और दो का धंधा कोई मतलब नहीं रखता। यह लोग प्रचार माध्यमों पर भी कहीं  न कहीं अप्रत्यक्ष रूप से अपना नियंत्रण रखते हैं ताकि विज्ञापन की कमाई कहीं अन्यत्र न चली जाये। इधर अपनी कंपनी का विज्ञापन का पैसा देकर प्रचार माध्यम चलाओ उधर लाभांश के रूप में वापस पाओ। एक नंबर वाले अपना सामान बेचते हैं पर दो नंबर वाले विज्ञापनों के लिये चेहरे तलाशते हैं। सभी को मालुम है कि प्रचार के लिये बनने वाली सामग्री के केंद्रों में भी कहीं न कहीं यही दो नंबर वाले होते हैं। सीधी बात कहें तो मैदान पर एक खेल हो रहा है जिसमें खास लोग मैदान में हैं और आम आदमी बाहर बिना टिकट बैठा है जो यह सोचकर खुश हो लेता है चलो अंदर नहीं गये तो क्या बाहर तो अपना अस्तित्व है। दुनियां के आर्थिक, सामजिक, राजनीतिक, कला, तथा धर्म के शिखर पर विराजमान बुत, एक और दो नंबर के धंधे वाले धनपति, समाज की दृष्टि से बुरे धंधे वाले वाले माफिया-पैसा है तो वह भी सम्मानीय होते हैं-और उनके प्रचारक या अनुचरों के घेरे में एक खेल इस मैदान पर हो रहा है।
शायद यह सदियों से चल रहा है बिग बॉस नाम का खेल! ऐसे में आम इंसान मैदान में क्या बाहर ही बैठे देख रहे हैं? मैदान पर देखने वाले भी किराये के हैं या उनकी रक्षा करने वाले पहरेदार! फिल्मों के अभिनेता और अभिनेत्रियां अपने परिवार के सदस्यों को अभिनय में ला रहे हैं। निर्देशक अपने बच्चों को निर्देशक बना रहे हैं। वहां से कोई नया चेहरा नहीं मिल रहा क्योंकि पचास के ऊपर के आदमी को भी नायक की तरह निर्माता निर्देशक भुना रहे हैं। फिर युवा चाहिए तो भला काम करने से छोटी आयु में प्रसिद्धि नहीं मिल सकती इसलिये युवाओं को बदनाम होकर नायक की तरह प्रतिष्ठित करने की कला का नाम है बिग बॉस।
हमने बहुत माथा पच्ची की पर बिग बॉस में कुछ दिखाई नहीं दिया। बहुत देर तक सोचते रहे कि आखिर ऐसा क्या है कि लोग इसे देख रहे हैं? थक गये तो अचानक आंखें बंद होने लगी। वैचारिक क्रियाओं ने स्वतः योग किया और बताया कि टी. आर. पी. नाम का एक भ्रम है। भले ही इन कार्यक्रमों और चैनलों को लोकप्रियता के आधार पर नंबर मिलते हों पर सभी फ्लाप हैं। देश में एक सौ दस करोड़ लोग हैं पर टीवी पर यह कार्यक्रम देखने वाले कितने हैं पता नहीं! मगर भ्रम बेचना है और इसमें आपाधापी में व्यवसायिक सृजनकर्ता अनेक मिथक गढ़ने लगे हैं। दरअसल समाज की इच्छा शक्ति को पूरी तरह मारने में नाकाम रहे यह लोग राम और कृष्ण को भी मिथक कहते हुए अपने पर्दे के नायकों को वर्ष का नायक नायिका, दशक की महानायक महानायिका और सदी का महानतम नायक नायिका गढ़कर अपने मिथकों को सत्य साबित करने का प्रयास करते हैं। यह एक नाकाम कोशिश है, जो केवल पर्दे पर दिखती है? आम आदमी का समाज निराश है, और इनसे उसका कोई मतलब नहीं है। बिग बॉस ऐसे ही मिथकों के सृजन की एक क्रिया है कोई कार्यक्रम नहीं।
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11/16/10

घोटालों में राजा-हिन्दी हास्य कविता (ghotala mein raja-hindi hasya kavita)

उदास फंदेबाज आया और बोला
‘दीपक बापू,
आज की पीढ़ी बहुत अज़ीब हो गयी है,
नैतिकता में बहुत गरीब हो गयी है,
दिवाली पर दिये थे
भतीजे को दारु के लिये
मुंह बंद रखने के भी उसे रुपये दिये,
ले आया बोतल एक सस्ती,
हम भी पीने लगे चढ़ गयी मस्ती,
बाद में पता लगा कि तीन सौ रुपये लेकर
वह दो सौ रुपये वाली बोतल लाया,
इस तरह उसने वहां भी कमाया,
समझ में नहीं आता बड़ा होकर क्या बनेगा।’’

सुनकर पहले गुस्से हुए
फिर टोपी से अपने को हवा देते हुए
कहैं दीपक बापू
‘कमबख्त अपनी दारु की आदत हमको दिखाना,
पर दूसरों से छिपाना,
वैसे चाचा के नक्श-ए-कदम तो भतीजा भी चलेगा,
वैसा ही होगा जिनके बीच पलेगा,
फिर मुंह क्यों लटकाये हो,
कमबख्त इस घटना पर खुशी की बात है
पर तुम साथ मिठाई नहीं लाये हो,
इतनी उम्र में घोटाला करना सीख गया,
आगे वह इसमें राजा बनेगा यह दीख गया,
अरे,
आजकल ईमानदार तो वह होते हैं
जिनके बेईमानी का मौका नहीं मिलता,
वरना तो टूटता है भरोसा सभी जगह,
कहीं ईमानदारी का गुल नहीं खिलता,
वैसे तुम चिंता न करो
तुम चला रहे हो भतीजावाद,
भतीजा भी चलाएगा चाचावाद,
अच्छा हुआ तुम्हें पता चल गया है,
समझ लो तुम्हारी आशाओं का दीपक जल गया है,
बड़े होते ही जनसेवा में उसे लगा लेना,
रहना उसके इर्दगिर्द स्वयं तुम
बाकी सभी को भगा देना,
यकीनन वह घोटालों में राजा बनेगा,
तब तुम्हारा भी तंबू दौलत की शान से तनेगा।
अभी सौ रुपये का विनिवेश किया है तुमने
सर्वशक्तिमान ने चाहा तो
जितनी गिनती हमको नहीं आती
उससे अधिक रुपयों में तुम्हारा धन बनेगा।
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9/29/10

रहबरों का आसरा-हिन्दी कविता

आस्था को कौन गिरा सकता है
विश्वास को कौन तोड़ सकता है,
हृदय में उपस्थित देवताओं को
कौन अपमानित कर सकता है,
जिन इंसानों ने तय कर दिया है
ज़माने की हवा बिगाड़ेंगे
आसमान के ख्वाबी फरिश्तों को
ज़मीन पर लाकर रंग निखारेंगे
अपने मतलब के लिये जज़्बातों को
जलता दिखाकर
झौंक देंगे शहर का आग में
रहबरों का ही आसरा है उनको
इसलिये बड़ा हुआ है हौंसला
कोई उनका क्या बिगाड़ सकता है।
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8/14/10

स्वतंत्रता दिवस पर फिर बजेंगी तालियां-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (15 August, indepandent day- hindi vyangya kavitaen)

फिर एक बार वह लोग
स्वतंत्रता दिवस मनायेंगे,
अपनी गुलामी के जख्म याद कर
उससे मुक्ति पर मुस्करायेंगे।
जिनसे मुक्ति पाई थी
उनको एक दिन दे लेंगे गालियां,
बजेंगी फिर तालियां,
मगर फिर छोड़ी है जो मालिकों ने वसीयत
गुलामों को बांटने की
मुखिया और बंधुआ को छांटने की
उसे पूरा करने में जुट जायेंगे।
---------
कुछ लोग कहते हैं कि
अंग्रेज भारत छोड़ गये,
कुछ उनका शुक्रिया अदा करते हैं कि
वह भारत को जोड़ गये।
सच तो यह है कि
अंग्रेज आज भी कर रहे राज
बस,
नाम का स्वराज छोड़ गये।
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गुलाम बनाने के कानून में
आज़ादी की असलियत तलाश रहे हैं,
मालिक छोड़ गये राज
मगर सिंहासन पर चरण पादुकाऐं छोड़े गये
उसमें खुद मुख्तियारी की आस कर रहे हैं।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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8/13/10

अध्यात्मिक ज्ञान और कर्मकांड-हिन्दी लेख (adhyamik gyan aur karmakand-hindi lekh)

आखिर कुछ कथित पवित्र लोग धर्म प्रचार क्यों करते हैं? यह समझ में नहीं आता! धर्म का संबंध निज आचरण से है। सामान्यतः दूसरे पर दया करना, मीठी वाणी में सभी से चर्चा करना तथा सभी के प्रति समान भाव रखने के साथ ही सर्वशक्तिमान की भक्ति तथा उसके गुणों की पर विचार करना ही धार्मिक आचरण की परिधि में आता है। जब धर्म अपने आचरण से दृश्यव्य है तो फिर उसे दूसरे लोगों को बताने की आवश्यकता क्या है? सामान्य मनुष्य की चिंतन क्षमता कम होती है क्योंकि वह अपनी दिनचर्या में लिप्त रहता है पर उसकी चेतना मृत नही होती। किसी अच्छे व्यक्ति से मिलने पर उसके अंदर सकारात्मक भाव पैदा होता है तो निम्न कोटि का व्यक्ति उसके अंदर नकारात्मक विचार पैदा कर देता है। तब सवाल यह उठता है कि कथित पवित्र लोग अपने आचरण से अपने प्रमाणि करने की बजाय किसी धर्म का नाम लेकर प्रचार क्यों करते हैं?
स्पष्टतः धर्म प्रचार ऐसे लोग करते हैं जिनका आचरण दृश्यव्य नहीं  है या वह उसे दिखाना नहीं चाहते क्योंकि वह स्वयं किसी सांसरिक क्रिया में दैहिक रूप से लिप्त नहीं होते पर उनका मन उसमें बिंधा रहता है। अगर उनका आचरण दृश्यव्य हो जाये तो शायद ही कोई  उनकी धर्म सभाओं में जाये। फिर जिनको धर्म प्रचार का काम सौंपा जाता है उनको सांसरिक कार्य से प्रत्यक्षः मुक्ति दी जाती है या वह ले लेते हैं। जब आदमी सांसरिक कर्म करता है तो कुछ न कुछ ऊंच नीच होता रहता है ऐसे में धर्म प्रचारक की छबि पर दाग का खतरा बना जाता है यही कारण है कि हर धर्म प्रचारक सर्वशक्तिमान के अपने कथित रूप के नाम से बने दरबार में ही आवास बनाते हैं। उनके आवास सामान्य नहीं महलों की तरह होते हैं। अनेक जगह उनको राज्य से करों में रियायत के साथ ही कानूनी संरक्षण भी मिलता है। एक तरह से धर्म प्रचारक तथा उनके आवास समाज से पृथक एक अलग समाज बना लेते है। उनका दायरा बहुत सीमित होता है पर अपने अपने सर्वशक्तिमान के रूपों को मानने वाले भक्तों को अपना ही स्थाई अनुयायी मान लेते हैं तब उनकी शाक्ति विशाल लगती है जो केवल एक प्रचार भ्रम है।
उनका दावा होता है कि ‘हमारे इतने लोग हैं। हमारे सर्वशक्तिमान के स्वरूप को मानने वालों की संख्या बढ़ रही है। हमारी विचारधारा के लोगों की संख्या बहुत अधिक हो रही है।
इधर सर्वशक्तिमान के विभिन्न रूपों को मानने वाले लोगों के मन की थाह लें तो इन धर्मप्रचारकों की वहां कोई औकात नहीं दिखती। मगर राज्य और समाज के शिखर पुरुष अपनी ताकत बनाये रखने के लिये इन्हीं धर्म प्रचारकों को भीड़ पर नियंत्रित करने का ठेका देते हैं ताकि आम इंसान किसी प्रकार की विद्रोहात्मक स्थिति न पैदा करे।
सर्वशक्तिमान का मूल स्वरूप निरंकार है। वह एक है कि अनेक! वह गोरा है या काला! लंबा है या नाटा! वह सुंदर है या असुंदर! इस विषय में प्रमाणिक रूप से कोई नहीं  जानता। साफ कहें तो वह तो अनंत है! मतलब यह कि धर्म प्रचारकों का यह कहना कि वह एक है अपने आप में ही उनके अज्ञान का प्रमाण है। ऐसे में लंबी चौड़ी बहसें होती हैं। कहीं झगड़े होते हैं तो कहंी एकता के लिये अभियान चलते हैं। इस तरह धर्म प्रचारक आम इंसानों की भीड़ की मानसिक रूप से नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। इसके लिये उनको राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तथा अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों के -फिल्म, खेल, कला तथा धार्मिक-शिखर पुरुषों से संरक्षण मिलता है। वह सर्वशक्तिमान के बाद इस धरती पर दूसरी बड़ी शक्ति होने का दावा करते हुए कहते हैं कि ‘हम धर्म प्रचारक हैं।’’
धर्म प्रचार आज से नहीं  बरसों से एक व्यवसाय है। मुश्किल यह है कि हर जीव एक ऐसी देह है जिसे आत्मा धारण करती है और मनुष्य में बुद्धि कुछ अधिक है इसलिये वह सब कुछ पाकर भी शांत नहीं बैठता और उसे अध्यात्मिक शंाति की आवश्यकता पड़ती है और यह धर्म प्रचारक उसे अपने अपने हिसाब से प्रवचन देखकर शांत करना चाहते हैं और वह इनके जाल में फंसता है।
अध्यात्म यानि क्या? अध्यात्म वही आत्मा है जिसे इस देह ने धारण किया है। फिर उसे हम केवल आत्मा क्यों नहीं कहते। आत्मा का अगर स्थिर भाव हो तो उसे आत्मा कहा जाये पर उसके भाव का विस्तार होता है इसलिये उसके साथ अधि शब्द जोड़ा जाता है। यह आत्मा कुछ ऐसा देखना चाहता है जो कोई नहंी देख पाता, वह ऐसी चीज पाना चाहता है जिसे कोई नहीं पा सकता। वह ऐसा कुछ करना चाहता है जो कोई नहंी करना चाहता। वह शांति और सुख का सर्वोच्च शिखर छूना चाहता है जो केवल परमात्मा की भक्ति तथा ज्ञान से ही संभव है। यहीं से शुरु होती है धर्म प्रचारकों की धांधलियां। वह सामान्य जन में भ्रम पैदा करते हैं ताकि उसका अध्यात्म भाव उनका बंधक हो जाये।
किसी गरीब को देखेंगे तो कहेंगे कि ‘विश्वास करो सर्वशक्तिमान सब देगा।’
किसी बीमार को देखेंगे तो  कहेंगे-‘विश्वास करो सर्वशक्तिमान बीमारी ठीक कर देगा।’
किसी परेशान को देखेंगे तो कहेंगे कि-‘विश्वास करो कि सर्वशक्तिमान सब समस्या हल कर देगा।’’
इस देह में फंसे मन को वह गोल गोल इस देह के आसपास ही घुमाते हैं। आदमी की बुद्धि के केंद्र में स्थापित देह के मोह का वह बहुत सटीक इस्तेमाल करते हैं।
यह धर्म प्रचारक अव्वल दर्जे के अज्ञानी और लालची हैं-उनको मूर्ख कहना ठीक नहीं क्योंकि वह तो आम इंसान को मूर्ख बनाते हैं। सांसरिक कर्म में जो कोई अपना स्थापित नहीं  कर पाता वह धर्म प्रचारक बन जाता है।
जब कोई आदमी अपने धर्म प्रचारक होने का दावा करे तो समझ लीजिए कि वह व्यापार कर रहा है। दरअसल हमें अपने मन की शांति के लिए अध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता होती है न कि धर्म के नाम पर मनोरंजन की। इस संसार में जो समस्यायें हैं वह भौतिकता की वजह से हैं। देह है तो बहुत सारी परेशानियां रहेंगी। अगर कोई मर गया तो वह मर गया पर उसको स्वर्ग दिलाने के लिये कर्मकांडों के नाम पर खर्च करने से भी परेशानी होती है मगर लोग करते हैं यह सोचकर कि न करने पर समाज आक्षेप करेगा। दूसरे लोग कहेंगे कि ‘बड़ा अधर्मी आदमी है अपने मरे हुए आत्मीय को स्वर्ग नहीं भिजवा रहा। खर्च से डरता है।’
इस तरह कर्मकांडों से धर्म को जोड़ा गया है जबकि सच यह है कि इनका उस अध्यात्म से कोई लेना देना नहीं है जो हमारा आधार है। दुनियां में बहुत सारे धर्म हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान की खान केवल भारतीय दर्शन में ही है जो संसार के आवश्यक कर्म करते हुए शांति और सफलता से जीवन जीने की राह दिखाता है। वह केवल अध्ययन, मनन और चिंतन से प्राप्त होता है और उसके लिये चाहिए एकांत! शोरशराबे में ज्ञान केवल चीख बनकर रह जाता है। फिर ज्ञान के लिये गुरु के पास जाना पड़ता है। ऐसा गुरु ढूंढना पड़ता है जो ज्ञान बेचने की बजाय उसके आधार पर अपना जीवन निर्वाह करते हुए संसारिक कार्य में निर्लिप्त भाव से से रहता है न कि धर्म प्रचारक बनकर अपने लिये शिष्य ढूंढता है। जब शिक्षित नहीं थे तब संत लोग ज्ञान बांटते थे पर जब अक्षर ज्ञान बढ़ गया है तब यही काम श्रीमद्भागवत गीता के साथ ही कबीर, रहीम, तुलसी, मीरा तथा अन्य महान संतों की वाणी का अध्ययन कर किया जा सकता है। उसके लिये किसी पर आश्रित होने की आवश्यकता नहीं है। एक बात याद रखें अपना ज्ञान तब तक दूसरे को न सुनायें जब तक वह इसके लिये आग्रह न करें क्योंकि एसा करते हुए धीरे धीरे उन धर्म प्रचारकों की श्रेणी में आ जायेंगे जो से कोरे हैं और धार्मिक कर्मकांडों को ही स्वर्ग का रास्ता बताते हैं और मोक्ष के नाम से तो उनको भय लगने लगता है।
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8/11/10

रोंऐ या मुस्करायें-हिन्दी कविता (royen ya muskraen-hindi peom)

सामने तारीफ पर तारीफ वह करते रहे
जो हमने पीठ दिखाई
वह हमारे रूप को शैताना जैसा बताने लगे,
कौन करता है किसकी परवाह
जो दूसरे के लफ्जों पर
रोऐं या मुस्करायें
सभी इंसान
जुबां से उगल रहे बेकार बातें
जैसे जिंदगी का बोझ ढो रहे हैं,
अलबत्ता उनके जज़्बात सो रहे हैं,
आंखें बंद लगती हैं,
भले ही लोग दिखते हैं जगे।
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8/5/10

महंगाई को सस्ता समझ लिया-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (mahangai ko sasta samajh liya-hindi vyangya kavitaen)

महंगाई को सस्ता समझ लिया,
विकास का उसे बस्ता समझ लिया,
अक्ल लेकर उधार की
चला रहे है भलाई करने की दुकान,
अपने घर आ रही दौलत का
बस, केवल एक रस्ता समझ लिया।
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जिनके पेट भरे हैं पकवानों से,
सजी हैं घर की महफिलें धनवानों से,
वह महंगाई से टूट रहे
लोगों का क्या दर्द समझेंगे।
बाज़ार से खरीदकर हथियार
करते हैं अल्मारी में बंद
वह पहरेदार
हिफाजत के लिये क्या लड़ेंगे।
जुबां से निकल रहे गरजते हुए बयान,
दिल में है बस,
अपनी दौलत, शौहरत और ताकत का ध्यान,
अपनी वातानुकूलित कारों का आराम छोड़कर
आम इंसान की तकलीफ का सच समझने के लिए
उबड़ खाबड़ सड़कों पर क्या पांव धरेंगे।
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7/25/10

गुरु की पहचान अवश्य करें-गुरु पूर्णिमा पर विशेष लेख (guru ki pahachan-guru purnima par vishesh lekh)

                  आज गुरुपूर्णिमा का पावन पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। हमारे अध्यात्म दर्शन में गुरु का बहुत महत्व है-इतना कि श्रीमद् भागवत् गीता में गुरुजनों की सेवा को धर्म का एक भाग माना गया है। शायद यही कारण है कि भारतीय जनमानस में गुरु भक्ति का भाव की इतने गहरे में पैठ है कि हर कोई अपने गुरु को भगवान के तुल्य मानता है। यह अलग बात है कि अनेक महान संत गुरु की पहचान बताकर चेताते हैं कि ढोंगियों और लालचियों को स्वीकार न करें तथा किसी को गुरु बनाने से पहले उसकी पहचान कर लेना चाहिए। भारतीय जनमानस की भलमानस का लाभ उठाकर हमेशा ही ऐसे ढोंगियों ने अपने घर भरे हैं जो ज्ञान से अधिक चमत्कारों के सहारे लोगों को मूर्ख बनाते हैं। ऐसे अनेक कथित गुरु आज अधिक सक्रिय हैं जो नाम तो श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण का लेते हैं पर ज्ञान के बारे में पैदल होते हैं।
ऐसा सदियों से हो रहा है यही कारण है कि संत कबीर ने बरसों पहले कहा था कि
‘‘गुरु लोभी शिष लालची दोनों खेलें दांव।
दोनों बूड़े बापुरै, चढ़ि पाथर की नांव।।
              गुरु और शिष्य लालच में आकर दांव खेलते हैं और पत्थर की नाव पर चढ़कर पानी में डूब जाते हैं। संत कबीर को भी हमारे अध्यात्म दर्शन का एक स्तंभ माना जाता है पर उनकी इस चेतावनी का बरसों बाद भी कोई प्रभाव नहीं दिखाई देता। आजकल के गुरु निरंकार की उपासना करने का ज्ञान देने की बजाय पत्थरों की अपनी ही प्रतिमाऐं बनवाकर अपने शिष्यों से पुजवाते हैं। देखा जाये तो हमारे यहां समाधियां पूजने की कभी परंपरा नहीं रही पर गुरु परंपरा को पोषक लोग अपने ही गुरु के स्वर्गवास के बाद उनकी गद्दी पर बैठते हैं और फिर दिवंगत आत्मा के सम्मान में समाधि बनाकर अपने आश्रमों में शिष्यों के आने का क्रम बनाये रखने के लिये करते हैं।
               आजकल तत्वज्ञान से परिपूर्ण तो शायद ही कोई गुरु दिखता है। अगर ऐसा होता तो वह फाईव स्टार आश्रम नहीं बनवाते। संत कबीर दास जी कहते हैं कि-
‘‘सो गुरु निसदिन बन्दिये, जासों पाया राम।
नाम बिना घट अंध हैं, ज्यों दीपक बिना धाम।।’’
                    उस गुरु की हमेशा सेवा करें जिसने राम नाम का धन पाया है क्योंकि बिना राम के नाम हृदय में अंधेरा होता है।
                राम का नाम भी सारे गुरु लेते हैं पर उनके हृदय में सिवाय अपने लाभों के अलावा अन्य कोई भाव नहीं होता। राम का नाम पाने का मतलब यह है कि तत्व ज्ञान हो जाना जिससे सारे भ्रम मिट जाते हैं। अज्ञानी गुरु कभी भी अपने शिष्य का संशय नहीं मिटा सकता। संत कबीरदास जी कहते हैं कि-
‘‘जा गुरु से भ्रम न मिटै, भ्रान्ति न जिवकी जाय।
सौ गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।।’’
                       जिस गुरु की शरण में जाकर भ्रम न मिटै तथा मनुष्य को लगे कि उसकी भ्रांतियां अभी भी बनी हुई है तब उसे यह समझ लेना चाहिए कि उसका गुरु झूठा है और उसका त्याग कर देना चाहिए।
आजकल तो संगठित धर्म प्रचारकों की बाढ़ आ गयी है। अनेक कथित गुरुओं के पास असंख्यक शिष्य हैं फिर भी देश में भ्रष्टाचार और अपराधों का बोलबाला इससे यह तो जाहिर होता है कि भारत में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रभाव सर्वथा अभाव है। व्यवसायिक धर्म प्रचाकर गुरु की खाल ओढ़कर शिष्य रूपी भेड़ों को एक तरह से चरा रहे हैं। मजे की बात यह है कि ऐसे लोग भगवान गुरु नानक देव, संत कबीर दास, कविवर रहीम तथा भक्ति साम्राज्ञी मीरा के नाम का भी आसरा लेते हैं जिनकी तपस्या तथा त्याग से भारतीय अध्यात्म फलाफूला और विश्व में इस देश को अध्यात्म गुरु माना गया। आज के कथित गुरु इसी छबि को भुनाते हैं और विदेशों में जाकर रटा हुआ ज्ञान सुनाकर डॉलरों से जेब भरते हैं।
                   आखिर गुरु और ज्ञान कैसे मिलें। वैसे तो आजकल सच्चे गुरुओं का मिलना कठिन है इसलिये स्वयं ही भगवान श्रीकृष्ण का चक्रधारी रूप मन में रखकर श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें तो स्वतः ही ज्ञान आने लगेगा। दरअसल गुरु की जरूरत ज्ञान के लिये ही है पर भक्ति के लिये केवल स्वयं के संकल्प की आवश्यकता पड़ती है। भक्ति करने पर स्वतः ज्ञान आ जाता है। ऐसे में जिनको ज्ञान पाने की ललक है वह श्रीगीता का अध्ययन भगवान श्रीकृष्ण को इष्ट मानकर करें तो यकीनन उनका कल्याण होगा। गुरुपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों बधाई देते हुए हम आशा करते हैं कि उनका भविष्य मंगलमय हो तथा उन्हें तत्व ज्ञान के साथ ही भक्ति का भी वरदान मिले।
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7/24/10

श्रीमदभागवत गीता केवल सिखाती नहीं विवेक भी जगाती है (shri madabhagavat gita vivek jagati hai)

अगर श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन नित्य करें तो इस बात का आभास सहजता से होता है कि उसमें सिखाया कुछ नहीं गया है बल्कि समझाया गया कि इस संसार का स्वरूप क्या है? उसमें यह कहीं नहीं कहा गया कि आप इस तरह चलें या उस चलें बल्कि यह बताया गया है कि किस तरह की चाल से आप किस तरह की छबि बनायेंगे? उसे पढ़कर आदमी कोई नया भाव नहीं सीखता बल्कि संपूर्ण जीवन सहजता से व्यतीत करें इसका मार्ग बताया गया है।
श्रीमदभागवत गीता पर जब कहीं चर्चा पढ़ने को मिलती है तब इस लेखक के मन में कुछ कुछ नया विचार आता है। यह स्थिति वैसी है जैसे कि श्रीमद्भागवत गीता को रोज पढ़ने पर नित्य कोई नया रहस्य प्रकट होता है। अक्सर अखबार, टीवी तथा अंतर्जाल पर होने वाली चर्चाओं में एक नारा अक्सर सुनाई देता है कि ‘सब पवित्र ग्रंथ एक समान’ उसमें अनेक ग्रंथों का नाम देते हुए श्रीमद्भागवत गीता का नाम भी दे दिया जाता है। कुछ लोग तो यह भी नारा देते हैं कि ‘सभी पवित्र ग्रंथ प्रेम, अहिंसा तथा दया का मार्ग सिखाते हैं’।
ऐसा लगता है कि बड़ी बड़ी बातें करने वाले छोटे नारों को गढ़कर अपना लक्ष्य साधते हैं। उनका उद्देश्य समाज के हर वर्ग के लोगों को प्रभावित करना होता है-अब यह अलग बात है कि कोई दौलत के लिये तो कोई शौहरत के लिए ऐसा करता है। कभी कभी तो लगता है कि श्रीगीता को मानने वाले तो असंख्य है पर उसे समझने वाले बहुत कम है शायद इसलिये श्रीगीता का नाम लेकर ही अधिकतर कथित प्रतिभाशाली लोग लोकप्रियता पाना चाहते हैं।
दुनियां के अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं और उनमें मनुष्य को देवताओं की तरह बनने के नुस्खे बताये गये हैं पर किसी ने देवताओं की पहचान नहीं बतायी। राक्षस या शैतान का उल्लेख सभी करते हैं पर उसे निपटने या वैसे न होने के लिये ज्ञान कहीं नहीं मिलता। दूसरी खुशफहमी यह पैदा की जाती है कि सभी मनुष्यों को देवता बनना चाहिए जो कि एक असंभव काम है। श्रीगीता बताती है कि इस संसार में विभिन्न प्रकार के लोग रहेंगे पर और उनकी पहचान समझना जरूरी है। वह एक आईना देती है जिसमें अपनी छबि देखी जा सकती है। वह ऐसा आईना देती है जो पारदर्शी है जिसमें आप दूसरे आदमी की पहचान कर उसे व्यवहार करने या न करने का निर्णय ले सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसमें एक वैज्ञानिक सूत्र है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ इसका मतलब यह है कि जैसे संकल्पों, विचारों तथा कर्मों से आदमी बंधा है वैसा ही वह व्यवहार करेगा। उस पर खाने पीने और रहने के कारण अच्छे तथा बुरे प्रभाव होंगे। सीधी बात यह है कि अगर आप अगर यह चाहते हैं कि अपने ज्ञान के आईने में आप स्वयं को अच्छे लगें तो अपने संकल्प, विचारों तथा कर्मों में स्चच्छता के साथ अपनी खान पान की आदतों तथा रहन सहन के स्थान का चयन करें। दूसरी बात यह है कि अगर आप आने अंदर दोष देखते हैं तो विचलित होने की बजाय यह जानने का प्रयास करें कि आखिर वह किसी बुरे पदार्थ के ग्रहण करने या किसी व्यक्ति की संगत के परिणाम आया-एक बात यह भी कि जैसे श्रीगीता का अध्ययन करेंगे आपको अपने अंदर भी ढेर सारे दोष दिखाई देंगे और उन्हें दूर करने का मार्ग भी पता लगेगा।
दूसरे व्यक्ति में दोष देखें तो उस पर हंसने या घृणा करने की बजाय इस बात का अनुसंधान करें कि वह आखिर किस कारण से उसमें आया। अगर कोई दुष्ट व्यक्ति आपसे बदतमीजी करेगा तो आप दुःखी नहीं होंगे क्योंकि आप जानते हैं कि इसके पीछे अनेक तत्व है जिनका दुष्प्रभाव उस पर पड़ा है।
श्रीगीता किसी को प्रेम करना अहिंसा में लिप्त होना नहीं सिखाती बल्कि अंदर प्रेम और अहिंसा का भाव अंदर कैसे पैदा हो यह समझाती है। तय बात है कि ऐसे में आपको ऐसे तत्वों से संबद्ध होना होगा जो यह भाव पैदा करें। मतलब सिखाने से प्रेम या अहिंसा का भाव नहीं पैदा होगा बल्कि वैसे तत्वों से संपर्क रखकर ही ऐसा करना संभव है।
श्रीगीता को पढ़ने और उन पर ंिचंतन करने वाले इस बात को जानते हैं कि कोई दूसरे को प्रेम नहीं सिखा सकता क्योंकि जिस व्यक्ति का घृणा पैदा करने वाले तत्वों से संबंध है उसमें प्रेम कहां से पैदा होगा? अलबत्ता स्वयं किसी अन्य व्यक्ति से सद्व्यहार करें क्योंकि अंततः वह उसे लौटायेगा।
श्रीमद्भागत गीता में चार प्रकार के भगवान के भक्त बताये गये है। भगवान की भक्ति होती है तो जीव से प्रेम होता है। अतः भक्ति की तरह प्रेम करने वाले भी चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी। पहले बाकी तीन का प्रेम क्षणिक होता है जबकि ज्ञान का प्रेम हमेशा ही बना रहता है। अगर आपके पास तत्व ज्ञान है तो आप अपने पास प्रेम व्यक्त करने वालों की पहचान कर सकते हैं नहंी तो कोई भी आपको हांक कर ले जायेगा और धोखा देगा।
श्रीमद्भागवत गीता में यह बात साफ तौर से कही गयी है कि प्राणायाम ध्यान, ओम शब्द का स्मरण करने से संपन्न ज्ञान यज्ञ के अमृत की अनुभूति करने वाले भक्त मुझे प्रिय हैं-सीधा आशय यही है कि जीवन के कल्याण का यही उपाय है। यह अमृत पानी पीने वाला नहीं बल्कि मन में अनुभव किया जाने वाला है जिसकी अनुभूति देह और आत्मा दोनों में ही की जा सकती है। व्यक्ति की पहचान भी बताई गयी है जो दो प्रकार के होते हैं-दैवीय प्रकृति और आसुरी प्रकृति वाले। व्यक्ति की तरह भोजन के रूप का ज्ञान भी दिया गया जो तीन तरह का होता है-सात्विक, राजस और तामसी। जैसा भोजन वैसा मनुष्य! इसका ज्ञान होने पर मनुष्य आसानी से अपने आसपास के वातावरण और व्यक्ति की पहचान कर अपना कर्म करता है।
जब श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान कोई इंसान धारण कर लेता है तो वह निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया में इस तरह लिप्त होता है कि उसे सांसरिक पीड़ायें छू तक नहंी पाती क्योंकि वह जानता है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ दूसरी बात यह है कि पीड़ायें उसके पास आती भी नहीं क्योंकि वह उस श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान को आईना बनाकर सामने रख लेता है और पदार्थों को ग्रहण करने और अन्य व्यक्ति से व्यवहार करने में पहचान बड़ी सहजता से कर आगे बढ़ता है। अनुकूल लोगों से संपर्क करता है और प्रतिकूल लोगों से परे रहता है। प्रेम और अहिंसा का भाव उसमें इस तरह बना रहता है कि उसका आभास उसे स्वयं ही होता है। वह जानता है कि जीवन जीने का यही एक सहज रास्ता है।
इसलिये यह कहना ही गलत है कि श्रीमद्भागवत गीता भी अन्य ग्रंथों की तरह प्रेम करना या अहिंसा में लिप्त रहना सिखाती है संकीर्णता का परिचायक है। दरअसल प्रेम या अहिंसा सिखाने वाली बात नहीं बल्कि अपने अंदर कैसे पैदा हो इसका उपाय बताना जरूरी है। फिर इसके लिये अनेक तत्व हैं जिनका ज्ञान हुए बिना किसी में ऐसे भाव नहीं पैदा हो सकते जब तक श्रीगीता का अध्ययन न किया जाये। याद रखिये श्रीमदभागवत गीता दुनियां का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान दोनो ही हैं।
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7/17/10

अपराधों में वर्गीकरण करना ठीक नहीं-हिन्दी लेख (apradh aur kanoon-hindi lekh)

पिछले कई दिनों से देखा गया है कि जब भी कोई नया सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक विवाद प्रचार माध्यमों में चर्चा क्रे लिये लगातार आता है तो उस पर नियंत्रण करने के लिये कानून बनाने की मांग उठत्ी और कई विषय पर कानून बना भी दिया जाता है। ऐसा लगता है कि कानून बनाने की मांग करना या बनाना भी लोकप्रियता का माध्यम बन गया है। मुख्य बात यह है कि कानून का लागू करने वाली संस्थाओं को मजबूत बनाने की बात पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
भारत में कानून लागू करने वाली सबसे बड़ी संस्थाओं में स्थानीय पुलिस को माना जाता है और अगर समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपे समाचारों पर यकीन करें तो अनेक जगह पुलिस बल की कमी के अलावा उसके पास आधुनिक साधनों की कमी की शिकायतें मिलती हैं। हम यहां भूल जाते हैंे कि अगर पुलिस बल और उसके अधिकारी अपने ऊपर काम का अधिक बोझ तथा साधनों की कमी अनुभव करेंगे तो अपराधों से निपटने की उनकी क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा। समस्या यही नहीं है कि पुलिस अपनी ढांचागत समस्याओं के चलते मामलों से निपट नहीं पा रही बल्कि देश की कागजी कार्यवाही पर आधारित कार्यप्रणाली भी पुराने ढर्रे पर चल रही है और उससे कानून को असरकार ढंग से लागू करना मुश्किल हो रहा है यह बात समझनी होगी।
इधर सम्मान के लिये हत्या तथा कन्याओं के साथ घर में अन्याय को लेकर कानून बनाने की मांग के साथ विचार भी चल रहा है। समझ में नहीं आता कि आखिर इस देश में सोच का अकाल क्यों पड़ गया है? देश की व्यवस्था चलाना मजाक नहीं है पर लगता है कि इसे गंभीरता से भी नहीं लिया जा रहा। हर जरा से विवाद पर कानून बनाने का फैशन देश के संविधान के प्रति नयी पीढ़ी में विश्वास कम कर सकता है।
जहां तक चर्चित विवादों के चलते उससे संबंधित विषय पर कानून बनाने की मांग करना या बनाना लोकप्रियता प्राप्त करने का साधन लगता है पर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, आतंकवाद तथा आर्थिक विषमतओं के कारण अपनी निजी समस्याओं से जूझ रहे लोग इससे अधिक खुश होते। उनके निजी जीवन के संघर्ष इतने दुरूह हो गये हैं कि इनकी तरफ उनका ध्यान नहीं जाता। इसके अलावा जो जागरुक लोग हैं वह देश की हालत देखते हुए इस बात को समझते हैं कि यह कानून होने या न होने से अधिक उसे लागू करने का विषय है।
सम्मान के लिये हत्या या कन्याओं को घर में परेशान करने जैसे विषय गंभीर है। देश में स्त्रियों की दशा सदियों से ही खराब है और उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। यह कानून से अधिक समाज सुधारकों के लिये शर्म की बात है और देश में सक्रिय धर्म प्रचारकों के लिये तो डूब मरने वाली बात है जो यहां महापुरुष होने का दावा करते हैं।
कहने का आशय यह है कि समाज की समस्याओं के लिये कानून कम उसके शिखर पुरुष अधिक दोषी है जो समय समय पर अपने अपने सामाजिक समूहों को अपने लाभ के लिये एकत्रित करते हैं और मतलब निकलते ही उसे अपने हाल में छोड़ देते हैं।
हमारे देश में दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा जैसे कानून बने और समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा अन्य प्रचार माध्यमों में अक्सर इस तरह की चर्चा होती है कि इसका दुरुपयोग हुआ है। इतना ही इसमें निर्दोष पुरुष परेशान हुए और दोषियों का बाल बांका भी न हुआ है। आतंकवाद के लिये यह कानून तो देर से बना कि अपराधी अपने को निर्दोष साबित करे दहेज एक्ट में इसका प्रावधान पहले ही कर दिया गया था। निर्दोष लोग परेशान हुए क्योंकि वह सामान्य वर्ग के थे जो बचे वह ऊंचे वर्ग के थे पर यह बात केवल इसी कानून को लागू करने के बारे में नहीं बल्कि हर अपराध में ऐसा ही देखने में आता है।
इधर कुछ घटनायें ऐसी हुई है कि अपने परिवार या समाज की मर्जी के खिलाफ विवाह करने वाली युवतियों की उनके अपने लोगों ने ही हत्या कर दी। आजकल ऐसे समाचार खूब छाये हुए हैं और इस पर कानून बनाने की मांग हो रही है। सवाल यह है कि क्या वर्तमान कानून के चलते इससे निपटना कठिन है?
शायद नहीं! किसी की हत्या करना अपराध है, और इसके लिये अलग से कानून बनाने की कहना ही अपनी सोच के संकीर्ण होने का प्रमाण है। हत्या के प्रकरण में जमानत बड़ी कठिनाई से होती है। हत्या चाहे किसी की भी हुई हो और किसी ने भी की हो उससे निपटने के लिये अलग से कानून बनाने की आवश्यकता इतनी नहीं लगती जितनी प्रकरण से सक्षमता से निपटने की।
महिलाओं के लिये दहेज एक्ट जैसा कानून किसलिये बना? दहेज लेना देना दोनों ही जुर्म है और अनेक प्रकरणों में लड़कियों के माता पिता स्वीकार करते हैं कि उन्होंने दहेज दिया? क्या वह कानून से परे हैं जो उन पर कार्यवाही नहीं की गयी। कन्या भ्रुण हत्या का कानून बना पर उसकी धज्जियां उड़ते हुए सभी ने देखी हैं। सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीना वर्जित कानून में किया गया पर क्या उसे रोका जा सका।
एक बात निश्चित है कि कानून में हत्या, बेईमानी, डकैती तथा ठगी जैसे अपराध रोकने के लिये पर्याप्त प्रावधान है। इसलिये अपराधों में वर्गीकरण करने की बात समझ में नहीं आती। यह अलग बात है कि हमारे देश के प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी वर्ग अपराधों में जाति, भाषा, धर्म, तथा क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों से सोचते हैं पर उनके कहने पर व्यवस्था चलाने को मतलब है कि अंधेरे कुंऐ में देश को ढकेलना। सच तो यह है कि दौलत, शौहरत और बाहुबलियों के बंधुआ बुद्धिजीवी केवल रुदन कीर्तन के अलावा कुछ नहीं करते क्योंकि उनके पास अपनी सोच नहीं है। इसलिये कानून बनाने और उसे लागू करने के विषय में व्यवहारिक ज्ञान के साथ काम करना चाहिए।
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6/23/10

तुम भी लाखों लोगों में एक हो-व्यंग्य कविता

अपने दिल में उठे तमन्नाओं के तूफान से
आकाश में इतना क्यों उछल रहे हो,
अपने लंबे भारी भरकम पांवों के नीचे
क्यों बेबसों को कुचल रहे हो,
हमेशा आकाश की तरफ देखकर
न चला करो
धरती पर छोटे कांटे भी हैं,
जो चुभ गये कभी तो
औकात बता देंगे
सभी की तरह तुम भी जहर फैला रहे हो
अपने अनोखे होने का अहसास न दिलाओ
तुम भी उन लाखों लोगों में एक हो
जो ज़माने के लिये आग उगल रहे हो।

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6/7/10

तारीख पर तारीख-हिन्दी हास्य व्यंग्य (tarikh par tarikh-hindi hasya vyangya)

उसे एक ट्रक ने कुचल दिया और उसके बाद वह कौमा में चला गया। उसके परिवार वालों ने मामला दर्ज कराया। मुकदमा चला पर तारीख दर तारीख लगती रही। इधर परिवार वाले परेशान थे। उनको एक मनोचिकित्सक ने बताया था कि जब उनके मरीज को दिमागी रूप से बहुत आघात पहुंचा है जब मुकदमे के अपने पक्ष में परिणाम आने की खबर सुनेगा तब उठ खड़ा होगा।
परिवार वालों ने डाक्टरों से कहा-‘तब तो इसे झूठी खबर सुना देते हैं ताकि उठ कर खड़ा हो जाये।’
डाक्टर ने कहा-‘अगर बाद में इसे पता लगा कि यह खबर झूठी है तो यह तुरंत स्वर्ग सिधार जायेगा।’
अब घर वाले क्या करें? वह हर बार आकर उसे बताते कि ‘तारीख लगी है।’
डाक्टरों ने उनसे कहा था इसे जिंदा रखने के लिये मुकदमें के बारे में बताते रहें क्योंकि कौमा में जाने से पहले वह चिल्ला रहा था ‘‘मुआवजा’’, ‘‘मुआवजा’’।
मुकदमा चलते चलते छब्बीस साल बीत गये और जिस दिन उसके पक्ष में फैसला हुआ उसको सुनने से पहले ही पह ‘तारीख पर तारीख’ कहता हुआ स्वर्ग सिधार गया।
ऊपर सर्वशक्तिमान के पास पहुंचा तो वहां भी चिल्लाने लगा‘ ‘‘तारीख पर तारीख’’, ‘‘मुआवजा’’ ‘‘मुआवजा’’।’
सर्वशक्तिमान ने उसके मुंह पर जल छिड़का और उससे कहा‘मूर्ख, यह क्या बक रहा है। एक तो छब्बीस साल से मेरा नाम नीचे नहीं जपा और सामने आया है तो दुआ सलाम तो दूर अपना मुकदमा यहां पर भी लेकर आ गया।’
वह आदमी बोला-‘यह भला क्या बात हुई। न नीचे इंसाफ मिला और न आप दे रहे हैं। यह कैसी दुनियां मैंने बनायी है।’
सर्वशक्मिान ने कहा-‘यह दुनियां मैंने बनाई है पर चला तो तुम इंसान ही रहे हो। तुमसे किसने कहा था कि उस रोड पर जाओ जहां ट्रक चलते हैं।’
उस आदमी ने कहा-‘चलिये, आपकी बात सिर आंखों पर, मेरा एक भाई एक कारखाने में गैस रिसने से मर गया था, उसका भी यही हुआ। वह यहां आया होगा, क्या आपने उसे इंसाफ दिया।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘कमबख्त, उसे तो मैंने न स्वर्ग दिया न नरक! दोनों के बीच एक गैस चैंबर है वहीं रखा है। उसे तो अब वही गैस पसंद आ रही है। वह अपनी सांसों के साथ ही प्रदूषण यहां लाया और सभी जगह फैला रहा था। स्वर्ग में तो उसे जगह देने का सवाल ही नहीं और नरक के लोग भी बुरे हैं पर उनकी रक्षा की जिम्मेदारी तो हमारी है इसलिये उसे वहां नहीं रखा। उसे भी क्या न्याय दूं वह उस गैस कारखाने के पास से गुजर ही क्यों रहा था?’
उस आदमी ने कहा-‘यह भला क्या बात हुई? यहां से क्यों जा रहे थे, वहां से क्यों आ रहे थे? न नीचे न्याय न ऊपर!’’
सर्वशक्मिान ने उससे कहा-‘अब तू कुछ भी बहाना बना! तेरे कर्मों का हिसाब तो होगा पर उसमें यह मुकदमा कोई मदद नहीं करेगा।’
इससे पहले कि कुछ सर्वशक्तिमान के दूत उसे दूर घसीट कर ले गये। एक दूत दाो बोला-‘कमबख्त, यहां हिन्दुस्तान से जो आदमी भी आता है अपने सांसरिक मुकदमें की बात करता है ताकि उसके बाकी कर्म भुला दिये जायें। ऐसी चालाकी अब नहीं चलने की। अरे, तू किस्मत वाला है कि तेरे मरने से पहले ही तेरे पक्ष में फैसला हो गया वरना हमारे यहां तो ऐसी चार पीढ़ियों के लोग ‘न्याय’ कहकर चिल्ला रहे हैं जो एक ही मुकदमा लड़े पर फैसला नहीं हुआ। कुछ तो ऐसी भी है कि जिनकी पाचवीं पीढ़ी भी आने को तैयार खड़ी है।’
वह आदमी यह सुनकर खुश हुआ कि ‘उसके मरने से पहले उसके मुकदमें का फैसला हो गया था। तब वह उस दूत से बोला-‘यार, अगर कहीं से उधार दिलवा दो तुम्हें मिठाई खिला दूं।’
दूत बोला-‘बेटा, हमें रिश्वत देने की बात मत कर! यहां पहले मेहनत कर और पैसे कमा क्योंकि तेरे मुकदमें में तेरे तीन वकील ऐसे हैं जो यहां तेरे से फीस लिये बिना आये और उनका पैसा न देना तेरे पाप कर्म में शामिल है। उनका पैसा देने से तु बेईमानी के आरोप से बच जायेगा पर देरी से देने की सजा तो तुझे मिलेगी चाहे कुछ भी कर! यह धरती नहीं है कि विलंब की सजा से बच जायेंगा। ’
उस आदमी के होश उड़ गये। वह फिर चिल्लाने लगा ‘तारीख पर तारीख’ और ‘मुआवजा’, मुआवजा।’
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6/2/10

नये और पुराने राजा-हिन्दी लेख (new and old king-hindi article)

पुराने समय के राजाओं महाराजाओं की आलोचना खूब होती है पर उनकी कुछ विशेषतायें अब याद आती हैं। इन राजाओं ने अपने रहने के लिये महल और किले बनवाये तो जनता के पीने के लिये जलाशय, मनोरंजन के लिये बड़े बड़े उद्यान तथा अन्य सुविधाओं क लिये इमारतों का निर्माण करवाया। जिस काम को हाथ में लिया उसे पूरा कराया। सत्ता के केंद्र बिन्दू राजा ही थे इसलिये जनता से कर वसूलने के अलावा साहूकारों से पैसा वसूलने के लिये उनको हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। विपत्ति का समय होता तो जमींदार और साहूकार उनको स्वयं धन देते थे और बदले में कोई काम करने के लिये कहने का साहस उनमें नहीं होता था क्योंकि वह जानते थे कि राजा सुरक्षित है तो राज्य भी सुरक्षित होगा जो कि उनके लिये फलदायी है। इसलिये भ्रष्टाचार नाम को भी नहीं होता अलबत्ता राजाओं और बादशाहों की विलासिता के चर्चे होते थे जिसका लाभ उठाकर कुछ दरबारी अपने लिये विलासिता की साधन जुटाते थे।
कहने को हमारे देश में लोकतंत्र है। वैसे तो हमारे देश के अधिकतर कर्णधार आम परिवारों से है इसलिये लोकतंत्र के सही अर्थों में काम करने का प्रयास करते हैं पर इसके बावजूद कुछ ऐसे हैं जिनका व्यवहार राजशाही जैसा होता है। इस पर लंबी बहस हो सकती है। मुख्य बात यह है कि पुराने राजा अपने निर्मित इमारत या पार्क के बनवाने के बाद उस पर अपना नाम लिखवाने का कोई प्रयास नहीं करते थे। इतिहास उनका नाम स्वयं दर्ज करता रहा है। वह पैसा भले ही अपने खजाने से देते थे जो जनता से एकत्रित होता था मगर राजाओं के लिये वह एक निजी संपत्ति की तरह होता था पर फिर भी निर्माण कार्य कराने पर निजत्व के प्रचार की वैसी आदत नहीं थी। जबकि आज देश में अनेक जगह पत्थरों पर नये राजाओं के नाम लिखे मिल जाते है। लोकतंत्र में धन जनता का होता है और उसे किसी भी तरह किसी की निजी संपत्ति नहीं माना जा सकता।
कई जगह तो ऐसे पत्थर भी मिल जायेंगे जिनके निर्माण कार्य अभी तक शुरु नहीं हुए होंगे जबकि उनको लगे बरसों हो गये। कई जगह ऐसे पत्थर भी मिल जायेंगे जिनके निर्माण कार्य हुए पर उनका अस्तित्व अब नहीं भी हो गये पर पत्थरों की चमक कायम है। ‘इस सड़क का निर्माण कार्य की शुरुआत अमुक के कर कमलों से हुई’, जबकि सड़क बनी और वह अब गड्ढों में भी तब्दील हो गयी, मगर पत्थर है कि चमक रहा है। इसका कारण यह है कि और कुछ हो न हो उद्घाटन के समय पत्थर बहुत मजबूत लगाया जाता है ताकि उद्घाटनकर्ता नाराज न हो। दरअसल अर्थशास्त्री एडमस्मिथ लोकतंत्र के बारे में कहता है कि उसमें राज्य क्लर्क चलाते हैं, ऐसे दृश्य देखकर उसकी बात याद आती है। पत्थर लगवाने वाले नये राजाओं में कुछ स्वयं प्रबंध कौशल में इतना माहिर नहीं होते नतीजा यह है कि उनके सीधे नियंत्रण में रहने वाले मातहत केवल तात्कालिक रूप से उनको प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं और इसी कारण पत्थर अच्छे लग जाते हैं। बाकी काम के बारे में तो जनता ही जानती है पर उसकी बात सुनता कौन है। यही कारण है कि अनेक बुजुर्ग कभी पुराने राजाओं तो कभी अंग्रेज शासन को याद करते हैं। ऐसे में नये राजाओ में जो अर्थशास्त्र, प्रबंध तथा अध्यात्म की विधा में पारंगत हैं वही कुशलता से काम करन जनता का भला कर पाते हैं। वैसे कहा जाता है कि भले लोग समाज सेवा में सक्रिय नहीं हो रहे इसलिये जिन लोगों को अपने अंदर सामर्थ्य अनुभव हो उनहें सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना चाहिये बिना इस बात की परवाह किये कि भले लोगों के लिये सफलता संदिग्ध है।
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5/29/10

गुलाब के साथ कांटे-हिन्दी लेख (gulab ke sath kante-hindi lekh)

भारत में भी शादी के बाद तलाक की घटनायें बढ़ रही हैं। पहले जब बुजुर्ग लोगों के श्रीमुख से पश्चिमी देशों के मुकाबले अपने देश की संस्कृति, संस्कार और स्वभाव के श्रेष्ठ होने की बात सुनते थे तो उनका तर्क यही होता था कि वहां तलाक ज्यादा होते हैं, वहां की लड़कियां बिना विवाह के मां बन जाती हैं, या फिर विदेशों में लोग माता पिता तथा गुरु की इज्जत नहीं करते थे। उस समय के बच्चे आज बड़े हो गये हैं पर उनके तर्क भी आज इसी तरह के रहते हैं मगर अब यह तर्क खोखले लगते हैं।
देश की सच्चाई से मुंह फेर कर तर्क करना इस देश के बौद्धिक और अबौद्धिक दोनों समाजों की आदत हो गयी है। दरअसल इन बुजुर्गों ने ही अपने बच्चों को पाश्चात्य सभ्यता को आधुनिकता का पर्याय मानकर उस अपनाने दिया। उस पर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संवरते हुए अपनी औलाद के संस्कारों को फलते फूलते देखकर बहुत प्रसन्न हुए पर आज जब उन्हें पश्चिमी सभ्यता की वजह से अकेले पन का दंड भोगना पड़ता है तब भी वह इस सच से मुंह फेरकर अपने देश की कथित संस्कृति की रक्षा करने की बात करते हैं। सवाल यह है कि आखिर इस संस्कृति की रक्षा कौन करे? सभी का एक ही ध्येय है कि हमारे बच्चे अंग्रेजी में पढ़कर बड़े बने जिससे हमारी नाक समाज में ऊंची हो। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि वह उनको गुलामी के लिये-यानि नौकरी करने के लिये-तैयार करते हैं और फिर रोते हैं कि उनके बच्चे पूछ नहीं रहे। अब यह सोचने की बात है कि जब बच्चा दूसरे की गुलामी में चला गया तो फिर उससे अपने पारिवारिक सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। किसी का बच्चा अमेरिका में है तो किसी का जर्मनी में तो किसी का ब्रिटेन में। इसे लोग बड़ी शान से बताते हैं पर उनका अकेलापन उनके चेहरे से झलकने लगता है।
जब देश में तलाक की संख्या बढ़ रही है तब मुहूर्त देखकर शादी करने की बात भी अब शक के दायरे में आ जाती हैै। पहले के बुजुर्ग दावा करते थे कि हमारे यहां शादियां मुहूर्त देखकर की जाती हैं इसलिये इतने तलाक नहीं होते। मगर शादियां तो अब भी मुहूर्त देखकर होती हैं। फिर ऐसा क्या हो रहा है। दरअसल पहले स्त्रियां इतनी मुखर नहीं थी। अपने घर के कष्ट झेलकर खामोश रहती थीं। उस समय के बुजुर्ग पुरुष अंदर ही अंदर घुट रही नारी को खुश मानकर ही ऐसे दावे करते थे। अब हालात बदल गये। अंग्रेजी माया के चक्कर ने जहां कथित रूप से इस देश को सभ्य बनाया तो लोगो में मुखरता भी आयी। पुरुष पश्चिमी संस्कृति से ओतप्रोत स्त्रियों को ही अपनी पत्नी के रूप में पसंद करने लगे। सो पश्चिम की खुशियों के साथ उससे जुड़ी बीमारियां भी यहां आ गयीं। सच है यार, खुशियों के फूलों के साथ कांटे भी जुड़े रहते हैं। गुलाब की चाहत में पौद्या लगायेंगे तो उसमें कांटे भी आयेंगे। कमल लगाना है तो कीचड़ का जमाव करना ही होगा।
यह सब बकवास हमने योग का मतलब समझाने के लिये लिखी है। योग हर इंसान करता है-सहज योग और असहज योग। जब आदमी स्वयं योग करता है तब वह सहज योग की प्रवृत्ति में स्थित होता है पर जब बिना सोचे समझे चलता जाता है तब वह असहज योग को धारण किये होता है। लोग अपने हाल पर कभी सहज होने का प्रयास करते हैं पर अन्य असहजतायें उनके चेहरे पर छायी हुई होती है। खुश होने या दिखने के लिये आदमी जूझता रहता है पर उसके नसीब में नहीं होती। सहज योग का अर्थ है कि अपने ऊपर हमारा नियंत्रण होता है जबकि असहजयोग की स्थिति में स्थिति हम पर नियंत्रण करती है। गुलाब के साथ कांटे होने की सच्चाई को जब हम अपने सहज योग से देखते हैं तो तनाव कर होता है पर जब हम असहज होते हैं तो वह हमारा पीछा हमेशा करती है।
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5/24/10

गुलामों की भाषा-हिन्दी लेख (gulam bhasha-hindi lekh

आजकल के बाज़ार और प्रचार का खेल देखकर लगता है कि कहीं न कहीं वह समाज को नियंत्रित करने के प्रयास निरंतर करता है। बुजुर्ग लोग कहते हैं कि ‘पीछे देख आगे बढ़’। हम पिछला इतिहास देखते हैं तो आगे का भविष्य लिखना मुश्किल होता है और वर्तमान में उसको देखकर आगे बढ़ते हैं तो समझ में यह नहीं आता कि पीछे वाले की रचना कैसी रही होगी? दूसरी बात यह भी कि पीछे वाले की चिंतन क्षमता और अभिव्यक्ति की शैली पर प्रश्न उठते हैं तो उसका निराकरण करना कठिन होता है। ऐसे में बेहतर तरीका यह है कि बहते हुए दरिया के किनारे पर बैठक उसमें बह रहे पानी स्त्रोत की कल्पना करें।
हमने देखा है कि सदा से ही राजनीति, समाज, तथा आर्थिक शिखर पुरुषों के प्रचार से भरा पड़ा रहा है। इसमें बुराई नहीं देखें पर आजकल तो बाज़ार तथा उसका प्रचार खुलकर शिखर पुरुषों के निर्माण का भी काम कर रहा है और इसमें कथित रूप आधुनिकता का दावा करने वाले पुराने वंशवाद के बीज समाज में बोते हैं-स्पष्टतः संदेश देते हैं कि आम आदमी की कोई औकात नहीं है। नेता के पुत्र-पुत्री को नेता, अभिनेता के पुत्र-पुत्री को अभिनेता तथा तथा पूंजीपति के पुत्र-पुत्री को पूंजीपति बताकर उनके शिखर पर बैठने से पहले ही उनका गुणगान करने लगते हैं। यह बाज़ार तथा उसका प्रचारतंत्र कभी कभी यह बताना भी नहीं भूलता कि समाजा के विभिन्न क्षेत्रों के शिखर पुरुषों के पुत्र पुत्रियां विरासत संभालने की तैयारी कर रहे हैं।
हम इस पर आपत्ति नहीं जता रहे बल्कि इतिहास को चुनौती देने जा रहे हैं क्योंकि भारत आज विश्व जगत पर महानतम होने की तरफ अग्रसर है पर उसका कोई शिखर पुरुष इसके योग्य नहीं है कि बाहरी दुनियां पर प्रभाव डाल सके। भारत में भी प्रचार माध्यम भले ही अपनी व्यवसायिक मजबूरियों के कारण भावी शिखर पुरुषों के स्वागत के लिये जुटा हुआ है पर आम जनता तो एक लाचार और बेबस सी दिखती है।
इसका मतलब यह है कि बाज़ार और उसका प्रचार तंत्र एक ऐसे नकली इतिहास का निर्माण करता है जो अस्तित्व नहीं होता। हमारा बाज़ार तथा प्रचार जिन शिखर पुरुषों को गढ़ता है विश्व समुदाय में उसका सम्मान न के बराबर है और है तो केवल इसलिये कि भारतीय समुदाय के शिखर पर वह बैठे हैं।
इधर एक दूसरी बात भी दिख रही है। विदेश में कोई किसी विश्वविद्यालय का कुलपति क्या प्रोफेसर बन जाये या किसी विदेशी प्रयोगशाला में काम करने लगे तो उसका खूब यहां प्रचार होता है। सवाल यह है क्या हमारे देश में कोई गौरवान्वित प्रतिभा नहीं है। दूसरी बात यह है कि देशभक्ति की बात करने वाले बाज़ार के सौदागर तथा उनके प्रचार प्रबंधक क्या इस बात को नहीं जानते कि हर कोई उस देश के लिये वफदार होता है जहां वह रहता है। ऐसे मे विदेश में प्रतिष्ठित भारतीयों से वह क्यों आशा करते हैं कि वह अपने देश के लिये वहां काम करेंगे?
खासतौर से ब्रिटेन और अमेरिका को लेकर भारतीय प्रचार माध्यम अपनी अस्थिर मनोवृति दिखाते हैं। सभी जानते हैं कि ब्रिटेन और अमेरिका स्वाभाविक समानताओं के बावजूद हमारे ही दुश्मन देश पर हाथ रखते हैं। अपने और भारत के आतंकवाद के बीच वह फर्क करते हैं। इतना ही नहीं मानवाधिकारों के नाम पर भारतीय आतंकवादियों को संरक्षण भी देते रहे हैं। सीधी बात कहें तो यह मित्र देश तो कतई नहीं कहे जा सकते। चीन का धोखा प्रमाणिक हैं पर इन दोनों देशों की मित्रता कोई प्रमाणिक नहीं है ऐसे में इनकी गुलामी करने वाले भारतीयों की अपने देश में गुणगान करने की बात समझ में नहीं आती। यह प्रचार माध्यमों की कमजोरी है जिसकी वजह से अमेरिका और ब्रिटेन के यही सोचते हैं कि हम चाहे भारत को कितना भी अपमानित करें वहां की जनता में हमारे विरुद्ध कभी वातावरण नहीं बन सकता क्योंकि वहां के प्रचार माध्यम तो हमारे यहां अपने गुलामों को देखकर खुश होते हैं।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक बार भारत के बंटवारे के बारे में लिखा था। उसने जो लिखा था उसे पढ़कर तो हमें यही लगा-उसकी भाषा में सीधे नहीं लिखा गया था-कि उस समय की पूंजीपति ताकतें जहां तक भारत को संभाल सकती थी वहीं तक उन्होंने अपना देश बनाया। बाकी जगह पाकिस्तान बनने दिया। उन्होंने तो यह बात केवल कश्मीर के संबंध में कही थी कि वहां का उस समय के लोकप्रिय नेता ने कहा था कि वह तो इतना ही कश्मीर देख सकता है और बाकी तक उसकी पहुंच नहीं है-जहां पहुंच नहीं थी वह पाकिस्तान के पास है। उसे पढ़कर तो एक बारगी यह लगा कि पूरा का पूरा स्वतंत्रता आंदोलन ही समाज को व्यस्त रखने का एक बहाना भर था, असली रूपरेखा तो बाज़ार तथा उसके प्रचार माध्यम तय करने लगे थे। यकीनन उस समय बाज़ार तथा प्रचार माध्यम इस तरह ही शिखर पुरुषों का निर्माण करते रहे होंगे जैसे कि आज कर रहे हैं। इतिहास तो जो लिखा गया उस पर अब क्या लिखें।
अपने सामने ही ढेर सारे झूठ को इतिहास बनते देखा है। कई घटनाओं को एतिहासिक बताया गया पर उनका प्रभाव समाज पर स्थाई रूप से नहीं पड़ते देखा। कई कथित महापुरुष जिन्होंने शिखर पर बैठकर केवल मुखौटे की तरह काम किया आज उन्हें देवता बताकर प्रस्तुत किया जाता है। अनेक ऐसे आंदोलन चले जिनका परिणाम नहीं निकला पर चल रहे हैं। इतना ही अनेक आंदोलनों के पीछे उनके आर्थिक स्त्रोत भी संदिग्ध रूप से दिखते रहे हैं पर प्रचार माध्यमों में चर्चा की जाती है
सैद्धांतिक मुद्दों पर जिनका कोई मतलब नहीं दिखाई देता।
देश के आम आदमी से कोई विशिष्टता प्राप्त न करे इसके लिये शिखर पुरुष, पूंजीपति तथा प्रचार एकजुट हैं। हम समाज के किनारे बैठकर देखें तो आजादी से पहले जो महान थे उसके बाद कोई बना ही नहीं। आजादी से पहले भी एक ही महान शख्सियत थी, महात्मा गांधी और फिर कोई नहीं हुआ। हिन्दी साहित्य की बात करें! कितने पद्मश्री बंट गये पर संत कबीर, तुलसी, मीरा, रहीम तथा अन्य भक्तिकालीन रचयिताओं के मुकाबले कोई नहीं ठहरा। बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों ने कोशिश भी नहीं की केवल अपने अनुगामियों को ही आगे बढ़ाया। हालत यह हो गयी है कि अंग्रेजी से महान लेखक छांटे गये और जिनका नाम आम जनता के सामने नहीं आता उनको अनुवाद के माध्यम से लाया गया। हमने अनेक महान लेखक सुने, देखे और पढ़े पर जब भक्तिकालीन रचयिताओं पर नज़र डालते हैं तो सभी कंकड़ पत्थर लगते हैं।
बाज़ार और संगठित प्रचार माध्यमों का जब यह हाल देखते हैं तो उसमें सक्रिय लोगों की बुद्धि पर तरस आता है पर गुलामी संस्कृति के पोषकों से आशा भी क्या की जा सकती है। उनको पहले तो हिन्दी बोलने में ही हिचक होती है अगर बोलते हैं तो अंग्रेजी के शब्द उसमें मिलाते हैं ताकि आम आदमी से अलग लगें-वैसे यह उनकी भाषा संबंध कमजोरी भी हो सकती है। आजकल यह मांग भी होने लगी है कि हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द शामिल किये जायें। दरअसल कुछ सतही सोच वाले विचार वालों का यह शगूफा है क्योंकि चाहे कितना भी कहा जाये पर सच यह है कि बाज़ार की जरूरत हिन्दी बन गयी है इसलिये हिन्दी न सीख सके वह अपनी पैठ बनाने के लिये ऐसे प्रयास कर रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी में लिखेंगे तो उनको पढ़ेगा कौन? उसमें लिखने वाले भी कम थोड़े ही हैं। बहरहाल गुलामी संस्कृति को ढो रहा समाज अब भाषा के सहारे अपने ही देश के साफ सुथरी हिन्दी समझने वालों को भी अपना गुलाम बनाना चाह रहा है। बाज़ार में हिन्दी ही बिक रही है ऐसे में अंग्रेजी में पढ़े लिखे बौद्धिक वर्ग के पास अपना रोजगार बचाने के लिये यही एक रास्ता है कि वह अंग्रेज देश तथा वहां रहने वाले भारतीयों का गुणगान करने के साथ ही हिन्दी में अंग्रेजी शब्द लादने की वकालत करे ताकि शिखर पुरुषों के लिये वह जो चरण वंदना करे वह सुनी जाये क्योंकि वही तो इनाम बांटते और बंटवाते हैं। दरअसल उनकी भाषा ही गुलाम भाषा कही जा सकती है जिसमें स्वतंत्र और मौलिक रचनाओं की गुंजायश नहीं  रह जाती।
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5/13/10

आत्ममंथन-हिन्दी शायरी (atmamanthan-hindi shayari)

जिंदगी के दरिया में बहते हुए
अपने मन की हलचलों के साथ
चला जाता हूं
कभी कभी किनारे पर आकर
करता हूं आत्म मंथन तो
अपने ही दिल के ख्यालों पर
अपने को हंसता पाता हूं।

किया था कुछ लोगों पर भरोसा
दिया था खुद को धोखा
दूसरों को क्या दोष देता।

निभाया था साथ अपनों का
अपनी इज्जत बढ़ाने के सुख की खातिर
क्यों शिकायत करूं कि
मैंने कुछ नहीं पाया।

कई इंसानी बुतों को रास्ता दिखाकर
मैंने अपने चिराग होने का अहसास पाला
उनका क्या दोष
जिन्होंने मतलब निकालकर
पलटकर नहीं देखा।

जब करता हूं आत्म मंथन
होता है यह अनुभव कि
मेरे मन में उठती हुई हलचल
क्षणिक रूप से उठती है
फिर गिरती है जिंदगी के सत्य रूपी दरिया में
व्यर्थ ही उनके साथ कभी हंसकर तो
कभी रोकर समय बिताया।
अपनी हालातों के लिये
बस अपने को ही जिम्मेदार पाया।
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5/8/10

चमाट (थप्पड़) फिक्सिंग-हिन्दी व्यंग्य (fighting fixing-hindi satire article)

फिल्मी हीरो ने बाबा के दरबार में एक टीवी चैनल कर्मी के साथ बदसलूकी की। शायद घसीटा और चमाट (थप्पड़) भी मारी। सर्वशक्तिमान का पर्याय माने जाने बाबा का दरबार, फिल्मी हीरो और मारपीट होना खबर को सनसनी बना देता है। हर चैनल में खबर चल रही है मगर कमबख्त यह फिक्सिंग का ऐसा भूत है जो सभी जगह नज़़र आता है। ऐसा लगता है कि नायक और उसके प्रचार प्रबंधक ने अपनी नयी फिल्म के प्रचार के  लिये उसका प्रायोजन किया होगा। फिल्म आने वाली है और उसकी फिल्म का नाम अभी लोगों  की जुबान पर चढ़ा नहीं है फिर उस हीरो का नाम भी अभी गुमशुदा जैसा लगता है-क्योंकि बहुत समय से उसकी कोई फिल्म भी नहीं आई। सो फिल्म हिट कराने तथा उसका नाम जनता के बीच स्थापित करने के लिये यह शायद ‘एक्शन सीन’ लिखा गया होगा। जिस तरह हर फिल्म के प्रारंम्भिक दौर में प्रणय तथा अंत में मारपीट के दृश्य होते हैं वैसे ही उसकी नयी फिल्म के प्रचार के लिये अब यह दूसरा दौर शुरु हो गया लगता है।
जब उसकी फिल्म बन रही थी तब उसकी नायिका अभिनेत्री के साथ प्रेंम संबंधों की बहुत चर्चा हुई। यहां तक कि एक प्रणय दृश्य के फिल्मांकन में निर्माता पिता शरम के मारे में उठकर चला गया तो पत्नी भी घर छोड़कर चली गयी-ऐसे समाचार भी आये ताकि फिल्म का प्रारंभिक प्रचार बना रहे। इसमें फिक्सिंग का शक इसलिये भी होता है कि बाद में फिर नयी फिल्म के चुबंन तथा नायिका के साथ उस हीरो के प्रेम प्रसंग की चर्चा शुरु हो गयी। मतलब यह समाचार तो केवल प्रस्तावना की तरह इस्तेमाल किया गया ताकि बाकी बातें जोड़कर खबर जोरदार बनें
वह हीरो अपनी फिल्म हिट कराने के लिये बाबा के दरबार में गया-आजकल के आधुनिक सभ्रांत वर्ग में उनको सर्वशक्तिमान का नया रूप मान लिया गया है जिनकी दरबार में जाने से हर धर्म के व्यक्ति की धार्मिक भावना प्रभावित की जा सकती है, यह अलग बात है कि यह केवल एक भ्रम है। अब ऐसी जगह पर कोई फिल्म अभिनेता  शांति से जाकर दर्शन करे तो खबर क्या बनती।
‘अमुक हीरो ने बाबा के दरबार में जाकर दर्शन किये’-यह खबर टीवी चैनलों पर देखकर या समाचार पत्रों में पढ़कर आम दर्शक और पाठक मूंह बिचकाते‘उंह, यह कोई खबर है।’
परिवार समेत गये तो नये लड़के लड़की भी मुंह बिचकाते ‘उंह, परिवार के साथ जाता है, फिल्म की अभिनेत्री को साथ ले जाकर थोड़ा खबर को दिलचस्प नहीं बना सकता था’- इससे खबर रोमांटिक हो जाती।
आजकल के प्रचार प्रबंधक जानते हैं कि बिना प्यार और मारपीट के खबर ठंडी रहती है और लोग नोटिस नहंी करते। फिर आजकल सर्वशक्तिमान के दरबारों में भी माया का खेल है। उनके प्रबंधकों को भी प्रचार चाहिये ताकि दरबारों की चर्चा गाहे बगाहे होती रहे। जहां तक हमारी जानकारी है सभी प्रसिद्ध दरबारों में आज आदमी को बिना पंक्ति में खड़े हुए दर्शन नहीं होते वहां यह खास लोग और प्रचार कर्मी कैसे पहुंच जाते हैं वह भी मूर्तियों के इतने सम्मुख जहां साामान्य भक्त नहीं पहुंच जाता। फिर कैमरा ले जाना निषिद्ध भी रहता है। तब वहां किस तरह खड़ा होता है यह समझ में नहीं आता।
तय बात है कि यह सब प्रतिबंध तो सामान्य लोगों के लिये है। सामान्य भक्त के लिये बस आओ और जाओ जैसी नीति पर सभी दरबारों के प्रबंधक चलते हैं पर जहां खास आदमी की बात आयी और उनमें भी फिल्मी आदमी हो तो फिर सब धरा का धरा रह जाता है। यही चीज हर खबर में फिक्सिंग का शक पैदा करने वाली बनती है।
कहना मुश्किल है कि जिस मीडिया कर्मी से बदसलूकी की गयी वह प्रत्यक्ष रूप से इस फिक्सिंग में शामिल होगा क्योंकि मेहनतकश आदमी को ऐसे काम के लिये प्रत्यक्ष अनुबंधित नहीं किया जा सकता। अल्बत्ता उसका अनजाने में इस तरह उपयोग किया गया होगा जिससे उसे अपनी भूमिका से भी संतोष हो। कम से कम उसके चैनल की टी आर पी बढ़ेगी। फिर सनसनीखेज खबर का आज कोटा पूरा करने पर अपना ही नहीं हर चैनल उसके प्रति कृतज्ञता का भाव दिखायेगा।
वैसे यह टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाओं के पत्रकार ऐसी खबरों के इंतजार में रहते हैं जिसमें उनके द्वारा बनाये गये नये भगवान उनके साथ बदतमीजी कर उन्हें कृतज्ञ करें। शक की पूरी गुंजायश है क्योंकि क्रिकेट, फिल्म तथा अन्य आकर्षक व्यवसायों में लगे लोगों को भगवान बनाने में इन्हीं सगंठित प्रचार माध्यमों का काम है फिर यह कैसे संभव है कि उनके साथ इनकी मुठभेड़ होती है।
वैसे जिस हीरो की शादी हो जाती है वह प्रचारकों के लिये ठंडा है-या कहें कि जिसके पास घोषित रूप से बीबी है वह उनके लिये किसी काम का नहीं है। ऐसे में तलाकशुदा या अविवाहित हीरो से ही सनसनीखेज खबर बनती है। जिस हीरो ने यह चमाट (थप्पड़) नाटक किया है वह विवाहित है और इस समय बीवी के साथ उसके संबंध मुधर भी हैं। ऐसे में उसका प्रचार किस तरह हो? यही एक तरीका हो सकता था कि कोई एक्शन सीन हो जिस पर दिन भर खबर चलती रहे।
कुछ लोग कहते हैं कि टीवी चैनल टीआरपी के लिये जूझ रहे हैं-यही उस हीरो ने भी उनसे कहा-मगर यह उनकी व्यवसायिक मज़बूरी है। उनको रोकने के लिये कहने की आवश्यकता नहीं बल्कि लोगों को समय समय पर यह बताना ही पड़ता है कि कि ‘भई’, आजकल चमाट फिक्सिंग भी होने लगी है।’
कुछ लोग पूछेंगे कि आखिर थप्पड़ की जगह ‘चमाट फिक्सिंग’ शब्द प्रयोग क्यों किया? दरअसल कभी कभी डिस्क  पर पाकिस्तानी नाटक आते हैं उसमें सिंधी भाषा से लिये गये इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। फिर आजकल लोग टीवी चैनलों के कार्यक्रमों के अनुसार ही रोते और हंसते हैं। थप्पड़ शब्द से सनसनी फैलती नहीं लगी इसलिये चमाट शब्द प्रयोग किया कि लोगों के लिये यह शब्द अजूबा नहीं है।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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4/6/10

इश्क और डॉलर-हास्य व्यंग्य कवितायें (ishq aur dollar-hasya vyangya kavita)

सच्चा प्यार जो दिल से मिले
अब कहां मिलता है,
अब तो वह डालरों में बिकता है।
आशिक हो मालामाल
माशुका हो खूबसूरत तो
दिल से दिल जरूर मिलता है।
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आज के शायर गा रहे हैं
इश्क पर लिखे पुराने शायरों के कलाम,
लिखने के जिनके बाद
गुज़र गयी सदियां
पता नहीं कितनी बीती सुबह और शाम।
बताते हैं वह कि
इश्क नहीं देखता देस और परदेस
बना देता है आदमी को दीवाना,
देना नहीं उसे कोई ताना,
तरस आता है उनके बयानों पर,
ढूंढते हैं अमन जाकर मयखानों पर,
जिस इश्क की गालिब सुना गये
वह दिल से नहीं होता,
डालरों से करे आशिक जो
माशुका को सराबोर
उसी से प्यार होता,
क्यों पाक रिश्ते ढूंढ रह हो
आजकल के इश्क में
होता है जो रोज यहां नीलाम।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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