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8/20/12

लाचार लोगों की उम्मीद-हिंदी व्यंग्य कविताएँ (lachar logon ki umeed-hindi vyangya kavitaen or satire poem's)



कोई न कोई किसी का यहां सगा है,
फिर भी हर जगह दगा है
कहें दीपक बापू
हमारे पास नहीं वफा खरीदने की ताकत
बाज़ार में हर कोई ज्यादा दाम मांगने लगा है।
-------------
बरसात हो या सूखा
उनके घर दौलत से भर जाते हैं,
मदद के लिये कागजी काफिले चलतें,
पाने वाले मौत से पहले मर जाते हैं।
कहें दीपक बापू
काली माया ने बना दिये ढेर सारे महल
बसे जिसमें भलाई के व्यापारी
नाउम्मीद होती है फिर भी
लाचार लोग वहां हाजिरी बजाते हैं
---------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
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7/19/11

मनुष्य की स्मृतियां-हिन्दी लेख और कविता (manushya ki smrityan-hindi article and poem)

               स्मृति मनुष्य का गुण है तो दोष भी है। हम स्मृतियां तो चयन करके अपने मस्तिष्क में नहीं रख सकते। अगर किसी ने प्यार किया है तो वह भी स्मृति बनेगा तो किसी ने गाली दी है वह भी स्मृति में अपना स्तंभ बनायेगी। जितनी स्मृतियां मानस पटल पर होंगी उतना ही अधिक ंिचंतन होगा। कालांतर में यह चिंताओं का पिता बन जाता है।
               हमारा मस्तिष्क स्मृतियों का भंडार है। वही उसमें चिंतन और चिंताओं की संवाहक हैं। कुछ विद्वासन मनुष्य में स्मृति का गुण होना अच्छी बात मानते हैं पर कुछ दार्शनिक इस विशेषता को दुर्गुण भी मानते हैं। जिन स्मृतियों से देह में रोमांच पैदा होता है वह अच्छी लगती हैं पर जिनसे निराशा और अवसाद की धारा बहती हैं उनको भुलाना भी कठिन लगता है। मुश्किल यह है कि मनुष्य यह तय नहीं करता कि वह कौनसी स्मृति भुलाये और किसे याद रखे। स्मृतियों पर उसका नियंत्रण नहीं है।
             वैसे कष्टकारक तो वह भी स्मृतियां हैं जिनमें हमें मिली प्रसन्नता का इतिहास दर्ज है। उन खुशी के पलों का दोहराव न होना भी बुरा लगता है। कुल मिलाकर स्मृति मनुष्य की पहचान है पर वह उसकी शक्ति और कमजोरी भी है।
स्मृति पर प्रस्तुत है यह कविता
-----------
हृदय में स्थित स्मृतियां
कभी कभी आंखों के सामने
घूमती लगती हैं,
जिनमें मिलन है तो विरह भी है,
प्रेम भी है, घृणा भी है,
आशा है तो निराशा भी है,
मान है तो अपमान भी है
व्यथित पलों को भुलाना आसान नहीं है
फिर खुशनुमा अहसासों के
पुनः आगमन की प्रतीक्षा में
आंखों भी थकने लगती हैं।
यूं ही स्मृतियां हमेशा ही
मन को विचलित करती हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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11/5/10

छोटी खुशियों से बचाते हैं अपना घौंसला-हिन्दी कविता (chhoti khushiyan aur ghonsla-hindi kavita)

दिवाली की रात
पटाखों की गूंज रही है
आवाज चारों तरफ,
आकाश के अंधेरे को भी
धुंआ अधिक काला किये जा रहा है,
लगता है
खुशी साक्षात उतरकर जमीन पर आयी है।
सोचता हूं
कौन है वह लोग
जो देश की ग़रीबी पर
झूठे आंसु बहाते हैं,
उनकी मदद के नाम पर करते दलाली
ज़माने के आगे चंदे के लिये हाथ बढ़ाते हैं,
कौन है वह चित्रकार
जो देश की भुखमरी पर
बनाते हैं डराने वाली तस्वीर,
दुनियां को दिखाकर इनाम पाते
बदल देते अपनी तकद़ीर,
कौन है वह शायर जो
जो बेबसों पर हमदर्दी दिखाते हुए
लिख जाते हैं गज़ल,
लफ्जों के प्यासे अमीरों को
खुश करने के लिये दर्द सजाते
बात आम इंसान की
महफिलों के लिये ढूंढते महल,
आधे पेट भरे,
फटे कपड़े पहने,
जिनके हाथ में हैं पसीने के गहने,
गरीब और मज़दूर
अपने हाथों से ही छोटी छोटी खुशियां
यूं ही जुटा लेते हैं,
चाहे उनकी मदद रास्ते में
जज़्बात और हमदर्दी के दलाल उठा लेते हैं,
गरीबों और मज़दूरों की लाचारी से भी
बड़ी है उनके बाजूओं की ताकत
और दिल का हौंसला,
अभावों के हमले में भी
छोटी खुशियों से बचाते हैं अपना घौंसला,
हमदर्दी के सौदागरों ने यह
बात कभी नहीं समझाई,
किसी तरह की अपनी कमाई।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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10/19/10

दौड़-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (daud-hindi vyangya kavitaen)

लोगों की हमेशा  बेचैन रहने की 
आदत   ऐसी हो गयी है कि
जरा से सुकून मिलने पर भी
डर जाते हैं,
कहीं कम न हो जाये
दूसरों के मुकाबले
सामान जुटाने की हवस

अभ्यास बना रहे लालच का
इसलिये एक चीज़ मिलने पर
दूसरी के लिये दौड़ जाते हैं।
---------
पुराने कायदों से आज़ाद होकर
दौड़ने के लिये मन तो बहुत करता है,
मगर बिना अक्ल के चले भी
तो गिरने के अंदेशे बहुत हैं,
ज़मीन पर चलने वालों के लिये खतरा कम है
हवा में उड़कर गिरने का भी डर रहता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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2/14/10

फिल्म वही जो सभी को भाये-हिन्दी लेख (a hindi article on film)

एक फिल्म बनी थी संतोषी मां! वह इतनी जोरदार हिट हुई थी कि उसके निर्माताओं की चांदी हो गयी। उसकी इतनी जोरदार सफलता की आशा तो उसके निर्माता निर्देशक तक ने  भी नहीं की।  वह फिल्म महिलाओं को बहुत पसंद आयी और वह दोपहर के शो में अपने घर का निपटाकर मोहल्ले से झुंड बनाकर  देखने जाती थीं।  हमारे शहर में वह फिल्म एक ऐसे थिऐटर में लगी जिसमें पुरानी फिल्में ही लगती थीं। उसका फर्नीचर भी निहायत घटिया था।  कम से कम वह थियेटर इस लायक नहीं था कि अमीर और  गरीब दोनों वर्ग की महिलायें वहां जाना पसंद करें। इसलिये उसमें नई फिल्में नहीं  लगती थीं। संतोषी मां एक छोटे बजट  की धार्मिक फिल्म थी इसलिये कम दर के कारण उसे वह थियेटर मिल गया।
भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में कहीं भी संतोषी मां नाम का पात्र नहीं मिलता, मगर धर्म का ऐसा महत्व है कि वह फिल्म पूरे देश में एतिहासिक कीर्तिमान बनाती रही।  कोई प्रचार नहीं! जो फिल्म देखकर आया उसने दूसरे को बताया और दूसरे ने तीसरे को। साथ ही यह भी बात फैलती रही  एक शहर से दूसरे और दूसरे से तीसरे! आज का  टीवी, रेडियो या अखबार का प्रचार उसके सामने फीका लगता है।  उस फिल्म के बाद ही हमारे देश में शुक्रवार को माता का व्रत रखने का सिलसिला शुरु हुआ जो आज तक जारी है।  एक फिल्म क्या कर सकती है ‘संतोषी मां’ इसका प्रमाण है। साथ ही यह भी कि अगर फिल्म में दम हो तो  वह बिना प्रचार के ही चल सकती है।
आजकल मुंबईया फिल्मों को पहले दिन के दर्शक जुटाने के लिये भी भारी मशक्कत करनी पड़ती है। इसका कारण  है कि देश में मनोरंजन के ढेर सारे साधन हैं और इतने सारे विकल्प हैं कि थोक भाव में लोगों का पहले दिन मिलना मुश्किल काम है।  यही कारण है कि आजकल फिल्मों के प्रसारण से पहले उससे विवाद जोड़ने का प्रचलन शुरु हुआ है। वैसे वह ऐसा न भी करें तो भी फिल्मों को पहले दिन दर्शक मिल जायेंगे।  समस्या तो अगले दिनों की है।
अधिकतर फिल्मी विशेषज्ञ सप्ताह भर के आंकड़ों पर ही फिल्म की सफलता और असफलता का विश्लेषण करते हैं। एक आम आदमी के रूप हमारे लिये किसी  फिल्म की सफलता का आधार यह होता है कि आम  लोग  कितने महीनों तक उसे याद रखते हैं। शोले, सन्यासी, त्रिशुल, दीवार, राम और श्याम, जंजीर और अन्य कई फिल्में ऐसी हैं जिनको लोग आज तक याद करते हैं। अमिताभ बच्चन को इसलिये ही सर्वाधिक सफल माना जाता है क्योंकि उनकी सबसे अधिक यादगार फिल्में हैं।  देखा जाये तो उनके बाद अनिल कपूर ही ऐसे हैं जो सुपर स्टार की पदवी पर रहे।  उनके बाद के अभिनेताओं की फिल्में यादगार नहीं रही।  यही कारण है कि आज के अभिनेता अपनी यादगार इतिहास में बनाये रखने  के लिये आस्कर आदि जैसे विदेशी पुरस्कारों का मुंह जोहते हैं।
अभी हाल ही में दो फिल्में रिलीज हुई। उनको लेकर ढेर सारा विवाद खड़ा हुआ। विशेषज्ञ मानते हैं कि वह भीड़ खींचने के लिये किया गया।  अभी दूसरी  फिल्म का परिणाम तो आना है पर पहले वाली फिल्म का नाम तक लोग भूल गये हैं ।
दरअसल किसी भी फिल्म को पहले और दूसरे दिन फिल्म देखने वाले दर्शक ही उसके भविष्य का निर्माता भी होते हैं क्योंकि वह बाहर आकर जब लोगों का अपना विचार बताते हैं तब अन्य दर्शक वर्ग देखने जाता है। विवादों की वजह से शुरुआती एक या दो दिन अच्छे दर्शक मिल जाते हैं पर  बाद फिल्म की विषय सामग्री ही उसे चला सकती है।
यहां हो यह रहा है कि फिल्म आने से पहले उसका विवाद खड़ा किया जाता है। लोग देखने पहुंचते हैं तो पता लगता है कि ‘सामान्य फिल्म’ है और उनकी यह निराशा अन्य दर्शकों को वहां नहीं पहुंचने देती।  किसी फिल्म की सफलता इस आधार पर विश्लेषक देखते हैं कि उसने कितना राजस्व फिल्म उद्योग को दिलवाया।  अगर विश्लेषकों की बात माने तो अनेक बहुचर्चित फिल्में इस प्रयास में नाकाम रही हैं।  किसी हीरो की लोकप्रियता का भी यही आधार है और इसमें अनेक अभिनेता सफल नहीं हैं।  एक मजे की बात है कि एक दो वर्ष पहले अक्षय कुमार के बारे में कहीं हमने पढ़ा था कि वह सबसे अधिक कमाई फिल्म उद्योग को कराने वाला कलाकार है-जबकि प्रचार में अन्य कलाकारों को बताया जा रहा था।   हालांकि उनकी आखिरी फिल्म भी फ्लाप हो गयी जो कि उनके साथ बहुत कम होता है-फिल्म उद्योग में अधिक राजस्व दिलाने में उनका क्या योगदान है यह भी अब पता नहीं है।  
कहने का अभिप्राय यह है  किसी फिल्म पर एक या दो दिन में अपनी कोई राय कायम नहीं की जा सकती।  अभी हाल ही में विवादों से प्रचार पा चुकी दो फिल्मों के बारे में देखने वालों की यह टिप्पणी है कि वह अत्यंत साधारण हैं। यकीनन यह बात उनके आगामी दर्शकों का मार्ग रोकेगी।
हमारा दूसरा ही अपना आधार है। वह यह कि कौनसी वह फिल्म है जो हमें पूरी देर बैठने को विवश करती है। अभी टीवी पर  नसीरुद्दीन और अनुपम खेर द्वारा अभिनीत  आतंकवाद के विषय पर बनी एक फिल्म ने पूरी तरह हमको बांधे रखा।  उस फिल्म का नाम याद नहीं है पर इतन तय है कि उसे अधिक सफलता नहीं मिली होगी क्योंकि वह संगीत और गीत रहित थी जबकि हिन्दी फिल्मों में सफलता के लिये उनका होना जरूरी है।  किसी भी फिल्म को चहुंमुखी सफलता तभी मिल पाती है जब उसकी कथा, पटकथा, गीत और संगीत समाज के हर प्रकारे की  आयु तथा आर्थिक वर्ग के लोगों को एक साथ प्रभावित करे। इस तरह की फिल्में अब बन ही नहीं रही-यह  निराशा की बात है। यही कारण है कि अब सुपर स्टार बनते नहीं भले ही प्रचारित किये जाते हों।


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2/12/10

ॐ नमो शिवाय:-आज महाशिवरात्रि है (om namo shivay-today mahashivratri)

‘ किं कारण ब्रह्म’
प्रश्न पूछा गया कि ‘ब्रह्म कौन है?
उत्तर मिलता है कि एको हि रुद्रः।’
आगे चलकर स्पष्ट किया जाता है कि
‘स शिव।।’’
यह भी आगे स्पष्ट किया गया है कि जगत का कारण स्वभाव न होकर स्वयं भगवान् शिव ही इसके अभिन्न निमित्तोपादान कारण है।
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थयं इमोल्लोकानीशत ईशनीभिः।
प्रत्यंजनांस्तिष्ठिति संचकोचान्तकाले
संसृज्य विश्व भुवनानि गोपाः।।
इसका आशय यह है कि जो अपनी शक्ति से इस संसार के शासक पद पर प्रतिष्ठित हैं वह रुद्र एक ही है। इसलिये ही विद्वानों ने जगत में कारण के रूप में किसी अन्य का आश्रय नहीं लिया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि शिव और रुद्र एक दूसरे  पर्यायवायी शब्द हैं।
भगवान रुद्र को इस कारण कहा जाता है क्यों रुत् अर्थात दुःख को विनष्ट कर देते हैं-‘रुत् दुःखम् द्रावयति नाशयतीति रुद्रः।’
भगवान शिव के लिये ही सत्यम् शिवम सुंदरम शब्दों का प्रयोग किया गया है। सत्य जो कि अदृश्य है और इस संसार के संचालन का कारण नहीं है। वह सृष्टिकर्ता है पर वह कर्म का कारण नहीं है। उसमें इद्रियों के गुण नहीं है। वह न सुनता, न बोलता और न कहता है क्योंकि वह कारण नहीं है।
यह मायावी संसार अत्यंत आकर्षक लगता है।  इस सत्य और सुंदरम के बीच स्थित शिव हैं।  वह इस संसार के कारण हैं।  वह परमात्मा का वह स्वरूप हैं जो दृश्यव्य होकर संसार को चलाता दिखता है पर वह सुंदर नहीं है।
कहा जाता है कि जब भगवान शिव की विवाह के लिये बारात निकली थी उसमें शामिल गणों को देखकर लोग डर गये थे।  यह गण हमारी इस सृष्टि रूपी देह में भी विराजमान हैं।  बाहर से शरीर कितना आकर्षक लगता है पर अंदर का दृश्य देखकर कोई भी डर सकता है।  अब तो शरीर के अंदर झांकने वाली मशीनें आ गयी हैं और उससे अगर अपने अंदर देखें तो  स्वयं ही डर जायें। मगर यही डराने वाले तत्व इस आकर्षक शरीर को संभाल रहे हैं यही भयानक गण इस आकर्षक संसार का आधार हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा सत्य के बाद शिव रूप में स्थित होने पर आकर्षक नहीं लगते पर इस संसार को भौतिक रूप से सुंदर बनाते हैं।  शिव तो सत्य और सुंदरम को जोड़ने वाले तत्व हैं और इसके लिये तो उन्होंने विष तक पी लिया जिससे नीलकंठ भी कहलाये।  अगर वह विष नहीं पीते तो क्या संसार का निर्माण होता? शायद नहीं और इसलिये उनको इस जगत के निर्माण संचालन का कारण भी माना गया है। गंगा आकाश में अदृश्य रूप से स्थित है, पर दिखती नहीं। धरती पर उसका स्वरूप आकर्षक दिखता है पर वह शिव नहीं दिखते जिन्होंने उसे जटाओं में धारण किया है, मगर उनकी उपस्थिति की अनुभूति है। वह गंगा के प्रवाह का कारण है। शिवजी की जटायें भले सुंदर न हों पर वह धरा पर बहती पावन नदी गंगा के सौंदर्य का कारण है। यह शिव तत्व ही सारे संसार के चलने का निमित या कारण है।
ऐसे भगवान श्री शिव जी को हार्दिक नमन। ॐ  नमो शिवायः।


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1/28/10

अंतर्जातीय विवाहों से समाज में बदलाव की आशा कितनी सही-आलेख (Intercast marriage and society-hinde article)

देश की सामाजिक, आर्थिक तथा पारिवारिक संकटों के निवारण का एक उपाय यह भी सोचा गया है कि अंतर्जातीय विवाहों का स्वीकार्य बनाय जाये। जहां माता पिता स्वयं ही अपनी पुत्री के लिये वर ढूंढते हैं वहां अंतर्जातीय विवाह का प्रयास नहीं करते क्योकि बदनामी का भय रहता ह। पर प्रेमविवाहों को अब मान्यता मिलने लगी है कम से कम सहधर्म के आधार पर यह अब कठिन बात नहीं रही। मगर क्या इससे कोई एतिहासिक परिवर्तन होने जा रहा है और हम क्या अब अगले कुछ वर्षों में एक नया समाज निर्मित होते देखेंगे? अगर सब ठीक हो जाये तो अलग बात है पर अंतर्जातीय या प्रेम विवाहों से ऐसे आसार दिख नहीं रहे कि भारतीय समाज अपने अंदर कोई नई सोच विकसति करने जा रहा है। इस लेखक ने कम से कम पांच ऐसी शादियों को देखा है जो अंतर्जातीय होने के साथ ही पारिवारिक स्वीकृति के साथ धूमधाम से हुईं और जिस दहेज रूपी दानव से मुक्ति की चाहत सभी को है उसकी उपस्थिति भी वहां देखी गयी। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने सोच की दिशा बदले बिना परिवर्तन की आकांक्षा सिवाय हवा में तीर चलाने के अलावा कुछ नहीं दिखाई देती।
नारियों को अपने वर की स्वतंत्रता की वकालत करने वाले विवाह के बाद की परिस्थितियों से अपनी आंखें बंद किये बैठे हैं। सच तो यह है कि लड़की माता पिता के अनुसार विवाह करे या स्वयं प्रेमविवाह उसकी हालातों में परिवर्तन नहीं देखने को मिलता-चिंतकों के लिये यही चिंता का विषय होता है।
मात्र 45 दिन में एक प्रेमविवाह करने वाली लड़की संदेहास्पद स्थिति में मौत के काल में चली जाती है-यह हत्या है या आत्महत्या इस पर विवेचना चल रही है-तब जो सवाल उठते हैं जिनकी अनदेखी करना अपनी संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण होगी और इससे इस बात की पुष्टि भी होगी कि यह देश केवल नारे और बाद पर चलता है और उनको ही चिंतन मान लिया जाता है।
लड़की पढ़ी लिखी तथा अच्छे घराने की थी। इतना ही नहीं वह अच्छी आय कमाने वाली भी थी। जाति अलग थी पर उसके पिता ने उसकी पसंद को स्वीकार करते हुए परंपरागत ढंग से विवाह करते हुए उसके अंतर्जातीय प्रेम विवाह को स्वीकृति प्रदान की। । टीवी पर दे,खी गयी इस खबर को देखकर मन भर आया। यकीनन उसके पति और उसके बीच प्रेम संबंध तो वर्षों पुराने रहे होंगे। कहा जाता है कि माता पिता लड़की को अनजान लड़के के हाथ में सौंपना या किसी लड़की को विवाह बाद प्रेम में करने सोचने की दूट मिलना दकियानूसी विचारधारा है पर क्या इन अंर्तजातीय विवाहों से वह पौंगापन समाप्त हो जाता है। पारंपरिक ढंग से शादी में दहेज लेनदेन के चलते किसी आधुनिक सोच का विकास नहीं माना जा सकता। लंबे समय के प्रेम में भी वह लड़की अपने साथी को क्या समझ पायी? एक प्रतिभाशाली लड़की का इस तरह दहेज के लिये चला जाना अत्यंत दुःखःदायी लगता है।
वैसे सजातीय विवाहों में भी कोई अच्छी स्थिति नहंी रहती पर यह आशा तो की जाती है कि प्रेम विवाह भले ही अंतर्जातीय हों पर दहेज की समस्या का हल हो पर अब उसके भी निराशाजनक परिणाम आने लगे हैं। कुछ अंतर्जातीय विवाहों में बारातियों में एक अजीब सा परायापन लगता है पर यह सोचकर सभी सहज दिखते हैं कि चलो अच्छा हुआ कि प्रेमियों ं का मिलन हुआ पर उनका इस तरह टूटना अत्यंत कष्टकारक लगता है। अंतर्जातीय विवाह टूटने के अनेक प्रसंग भी सामने आने लगे हैं और यह माता पिता की स्वीकृति से हुए थे।
इस देश की समस्या यह नहीं है कि यहां जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर समूह बने हैं। समस्या यह है कि पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण ने उनमें आपनी श्रेष्ठता का भाव पैदा किया है जिससे वैमनस्या फैल रहा हे। टीवी, फ्रिज, कूलर, मोटर साइकिल, कार, कंप्यूटर तथा अन्य आधुनिक साधनों का अनुसंधान भारत में नहीं हुआ पर दहेज जैसी पुरानी परंपरा में इनका जमकर उपयोग हो रहा है। जिस बाप को अपनी शादी में साइकिल भी नहीं मिली वह अपने बेटे की शादी में मोटर साइकिल या कार मांगता है। सबसे अधिक हैरानी तब होती है जब पढ़ीलिखी महिलायें भी बात तो आधुनिकता की करती हैं पर दहेज का मामला हो तो खलनाियका को रोल अदा करते हुए जरा भी नहीं हिचकती।
कहने का अभिप्राय यही है कि देश की कुपरंपरायें, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास तथा अन्य कुरीतियों की भी उतनी ही पुरानी गंदी विचाराधाराएं बहती आ रही हैं जैसे कि पावन नदियां गंगा, यमुना और नर्मदा। हमने अपने लोभ लालच से इन पावन नदियों को भी गंदा कर दिया और अपनी कुत्सित विचारधाराओं को भी आधुनिकता का रूप देकर उनको अधिक भयावह बनाने लगे हैं। जिस तरह यह नदियां स्वच्छ करने के लिये अपने उद्गम स्थल से पवित्र करने की आवश्यकता है-बीच में कहीं से साफ करने की योजनाओं को कोई परिणाम नहीं निकलने वाला-वैसे ही समाज में बदलाव लाने का प्रयास तभी सफल हो सकता है जब लोगों को सोच बदलने के लिये प्रेरित किया जाये। अंतर्जातीय विवाह से नये समाज के निर्माण की बात या जाति पांत का भेद मिटने से धर्म की रक्षा की बात तब तक निरर्थक साबित होगी जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी।
कितने आश्चर्य की बात है कि लड़की जब कमाने लगती है तो लोग सोचते हैं कि उसकी शादी बिना दहेज को हो जायेगी पर माता पिता को फिर भी योग्य वर के लिये पैसा खर्च करना पड़ता है फिर भी उसके खुश रहने की गारंटी नहंी है। सबसे बड़ी बात यह है कि अनेक कथित संस्कृत और आधुनिक माता पिता और उनके लड़के पाश्चात्य सभ्यता की देखादेखी कमाऊ बीवी या बहु के लिये आंखें फैलाकर प्यार के नाम पर शिकार करने के लिये घूम रहे हैं पर दहेज लेना और फिर बहू से सामान्य गृहस्थ औरत की तरह कामकाज की भी अपेक्षा करते हैं। उसे ताने देते हैं। चंद दिन पहले ही उसे प्रेम करने वाला जब पति बन जाता है तो वह उसे संकट से उबारने की बजाय उसे बढ़ाने लगता है। उस लड़की की तब क्या व्यथा होती होगी जब जीवन भर साथ निभाने का वादा करने वाला प्रेमी जब पति बनता है तब अपने माता पिता या बहिन के तानों से उसे बचाने की बजाय
उनके साथ हो जाता है। मुश्किल यही है कि हम अपने यहां पाश्चात्य आधारों पर हम अपना समाज चलाना चाहते हैं पर उसके लिये सहनशीलता हमारे अंदर तब तक ही है जब तक हमें कष्ट नहीं उठाना पड़ता। जहां हमें कष्ट पहुंचता है वहां हम अपने संस्कारों का हवाला देकर अध्यात्मिक होने का प्रयास करते हैं। ऐसे विरोधाभासों से निकलने का कोई मार्ग भी नहीं दिखता क्योंकि हमारे देश के दिशा निर्देशक शादियो के स्वरूपों पर ही सोचते हैं उसके बाद चलने वाली गृहस्थी पर नहीं।
हमारे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि अंतर्जातीय प्रेम विवाह होना ठीक नहीं या सभी का यही हाल है बल्कि इससे समाज में व्यापक सुधार की आशा करना अतिउत्साह का प्रतीक है यही आशय है। जब तक ऐसे विवाहों में दहेज और शादी के समय अनाप शनाप खर्च ये भी बचने का प्रयास करना चाहिये।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/25/10

मृत्यु की धार और जीवन की धारा-आलेख (life and death in haiti arth quake-hindi article)

जब उस भयानक भूकम्प का हैती आक्रमण हुआ होगा तो मृत्यु ने अट्टाहास किया होगा। इतना सारा भोजन एक साथ मिलने का सौभाग्य मृत्य को हमेशा नहीं मिलता। जीवन देवता की सासें कुछ देर रुक गयी होंगी मगर वह भी संभला होगा और जिनकी सांसें बची होंगी उनके बचाने का प्रयास किया होगा। हैती के उस भूकंप की बहुत सारी यादें वहां के उन लोगों में रहेंगी जो जिंदा बच गये होंगे। जहां मौत चहूं और हमला करती है तब जीवन की धारा भले ही पतली होने के बावजूद प्रभावी ढंग से प्रवाहित हो ही जाती है और अपना अस्तित्व प्रमाणित करने के लिये कुछ ऐसे लोगों की सांसें भी बचाती है जो लगभग मुत्यु के पेट में चले गये होंगे। अनेक प्राकृतिक आपदाओं के समय जहां मृत्यु अपना भयानक रूप दिखाती है वहीं जीवन अपनी सहृदयता के कुछ अंश अवश्य प्रस्तुत करता है।
वह लड़का उस दुकान में काम करता था जहां कोकाकोला और स्नैक्स बिकते थे। भूकंप के कंधे पर सवार मृत्यु ने उस दुकान को भी तहस नहस कर दिया। चारों तरफ से दुकान ढह गयी। जब मलबा गिर रहा होगा तब मृत्यु का अट्टाहास शायद ही किसी ने देखा होगा। जो लोग मर गये वह क्या बतायेंगे और जो बच लड़का बच गया वह भी बेहोश हो गया, पता नहीं उसने मौत का चेहरा देखा था कि नहींे।
जब मौत दीवारों और छत को मलबा बनाकर गिरा रही होगी तब उस बेहोश लड़के की बची सांसोें को जीवन देवता ने पढ़ा होगा-उसके खाते में शेष रही सांसों के हिसाब पर उसकी नजर पड़ी होगाी। वह उसके पास गिरने वाले पत्थर और लकड़ी के टुकड़ों को दूर करता होगा या फिर उनको उससे दूर गिेराता होगा। जीवन मृत्यु के इस द्वंद्व को भला वह बंद आंखें कहां देख पायी होंगी जिनको बाद में अपने जीवन की लड़ाई खुद ही लड़नी थी। जीवन ने बचायी होंगी कोकाकोला की बोतलेे और स्नैकस के वह भाग जो बाद में उस लड़के काम आने होंगे क्योंकि उन पर लिखा होगा उनको उदरस्थ करने वालो का नाम जिसे मिटा पाना मृत्यु के बस में नहीं था और इसलिये जीवन उनको संजोने आया था।
पूरे 11 दिन तक वह लड़का वहां पड़ा रहा। लोग आसपास से गुजर रहे थे। वह उनको पुकारता पर कोई नहीं सुन पाता। मृत्यु अपना काम कर चुकी थी पर जीवन भी अभी थका नहीं था। मृत्यु को सारे साधन सहज उपलब्ध हो जाते है। कुछ भी न हो तो वह आकाश को जमीन पर गिरा सकती है पर जीवन के लिये अपना काम धीरज से करना होता है। मौत कुछ भी बिना सोचे समझे अस्त्र शस्त्र जुटाकर आदमी पर पटक सकती है पर जीवन को सोच समझकर अपने साधन जुटाते हुए इंसान की मदद करनी होती है। मौत को समय न अधिक मिलता है न लगता है पर जीवन के पास धीरज के अलावा कोई अन्य उपाय नहीं होता। मौत हवा का सहारा भी ले सकती है पर जीवन देवता का कार्य इस धरती के पदार्थों के बिना नहीं हो सकता-इसलिये उसे कोकाकोला की बोतलें और स्नैक्स के भाग की रक्षा भी करनी होती है।
उस लड़के ने कहा ‘मै चिल्लाया नहीं, केवल प्रार्थना करता रहा।’ वह प्रार्थना कोई अदृश्य शक्ति सुन रही होगी। मृत्यु प्रार्थना का अवसर नहीं देती क्योंकि वह बहुत जल्दी करती है। उसे मालुम है कि मैं रुकी तो कोई प्रार्थना करेगा तब मोहपाश में बंध जाउंगी। एक जगह पढ़ने को मिला था कि पैसा लेकर दूसरे आदमी का कत्ल करने वालो लोगों को सबसे पहले यही सिखाया जाता है कि ‘जिसको मारना हो उसकी आंखों में झांकना नहीं चाहिये, क्योंकि तब उसके प्रति मोह जाग जाता है।’ मौत के इस खेल को कत्ल के सौदागर बहुत अच्छी तरह जानते हैं। मौत आसानी से दी जा सकती है इसलिये लोग इस काम में लिप्त हो जाते हैं जो लिप्त नहीं होते वह भी कोई जीवन की सहज धारा बहाने में दिलचस्पी नहीं रखते। जीवन आसानी से नहीं दिया जा सकता। दूसरे से कुछ छीनना आसान है पर किसी को देने के लिये मन तैयार नहीं होता। दूसरे से मुफ्त पाने की चाह हरेक के मन में होती है पर त्याग का भाव विरलों में होता है। प्रार्थनायें सभी करते हैं पर सर्वशक्तिमान सभी की नहीं सुनता। जब प्रार्थना हृदय से की जाये तब उसके आगे वह भी लाचार होता है। उसको कोई रूप नहंी है, रंग नहीं है और न पहचान है। वह अनंत है और उसका आभास किया जा सकता है वह भी जीवन की बहती धारा में। जब उस लड़के को राहत दल ने बचाया होगा तब उसने जाना होगा कि जीवन का मोल क्या है? सामान्य स्थिति में कौन इस अमूल्य मानव जीवन का महत्व जान पाता है? पता नहीं वह उस जीवन की धारा को समझ पाया कि नहीं जो उसके पास उसकी सांसें बचाने के लिये निरंतर बहती रहीं।

लोहे, पत्थर और लकड़ी की टूटी शिलायें जो मौत ने अपनी धार से काट गिरायी थीं जीवन उसमें दबने के बावजूद अपनी ताकत दिखा रहा था। एक जीवात्मा थी उस देह में जो परमात्मा का स्मरण कर रही थी। वह पल कैसे रहे होंगे जब जीवन उन शिलाओं से बाहर आया होगा? उसकी अनुभूति तो वही कर सकता है जिसने उसे धारण किया हो? जीवन और मृत्यु का यह संघर्ष हमेशा दिखता है पर जब लड़ा जाता है तब होने वाला संताप जितना सताता है उतना ही विजय प्राप्त करने पर आनंद मिलता है। मृत्यु सत्य है पर जीवन भी असत्य नहीं है क्योंकि उसकी धारा भी निरंतर बहती है। एक मिटता है दूसरा पैदा होता है। माया का स्वरूप व्यापक है इसलिये दिखती है, तो मरती भी है जबकि सत्य अत्यंत सूक्ष्म हैं-या कहें कि उसका भौतिक अस्तित्व तो है ही नहीं-इसलिये अदृश्यव्य है मगर जीवन का आधार तो वही है भले ही उसकी धारा अत्यंत पतली होने के बावजूद शक्तिशाली है।
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1/19/10

एक पर्स की कहानी (a pars-Hindi parsnal story)

एक बेजान पर्स की भी कहानी हो सकती है! क्यों नहीं, अगर वह सब्जी की तरह कटने का जुमला उस पर फिट हो सकता है तो कोई कहानी भी हो सकती है। पर्स में माल होता है और माल के पीछे धमाल! धमाल पर्स नहीं करता, बल्कि आदमी करते हैं इसलिये कहानी तो बन ही जाती है।
उस दिन वह बालिका अपने पिताजी के साथ हमारे घर के बाहर आटो से उतरी। मोबाइल से से पिता पुत्री के आने की खबर मिल गयी सो हम उनका इंतजार कर रहे थे।
उसके पिता से हमसे हाथ मिलाया उन्होंने अपने पर्स से सौ का नोट उसकी तरफ बढ़ाया तो वह बोला-‘साहब खुला साठ रुपया दो।’
हमने अपना पर्स खोला और उसमें से साठ रुपया निकालकर उसकी तरफ बढ़ाया।
पिता पुत्री दोनों घर के अंदर दाखिल होने लगे। बालिका ने कहा-‘वाह मौसा जी, अब तो आपने नया पर्स ले ही लिया। पहले हमारे यहां कितना पुराना पर्स ले आये थे। मैंने आपको टोका था न! इसलिये नया खरीदा होगा।’
हमने कहा-‘नहीं! पुराना कट गया तो नया खरीदना पड़ा।’
बालिका भौचक्की रह गयी-‘कब कटा! उसमें कितने पैसा थे।’
हमने कहा-‘नहीं, उसमेें दस या पंद्रह रुपया था। सबसे खुशी इस बात की है कि तुम्हारे घर से आते समय मैंने अपना ए.टी.एम. कार्ड अपनी शर्ट की जेब में रख लिया था।’
बालिका घर के अंदर दाखिल हुई तो हमारे घर में जान पहचान की एक महिला जो उस समय श्रीमतीजी से मिलकर बाहर जा रही थीं बालिका को देखते ही बोली-‘ तुम आ गयी अपने मौसी और मौसा को लेने। कब ले जायेगी?’
उसके पिता या चाचा हमारे पास छोड़ जाते थे और हम उसे छोड़ने मथुरा जाते थे। यह क्रम कई बरसों से चलता रहा है इसलिये उसके आने का मतलब यही होता है कि हम जरूरी उसे छोड़ने मथुरा जायेंगे।
बालिका ने कहा-‘हां, इस बार केवल सात दिन ही रहूंगी। मेरे अगले सोमवार से पेपर है। आज शुक्रवार है और अगले शुक्रवार चली जाऊंगी।’

हमने सिर खुजलाया, क्योंकि हम अगले सप्ताह सफर करने में मूड में नहीं थे। अलबत्ता अनेक बार अपने मन के विपरीत भी चलना ही पड़ता है।
सोमवार सुबह उसने याद दिलाया कि ‘शुक्रवार को मथुरा चलना है। ताज की टिकिट रिजर्व करवा लें।’
पहले छोटी थी तो वह इतने अधिकार से बात नहीं कहती थी पर बड़ी और सयानी होने के कारण अब उसमें दृढ़ता भी आ गयी थी। सोमवार को हम टिकिट नहीं करवा सके। मंगलवार को जाकर करवा ली।
रात को आकर अपने पर्स से टिकिट निकाला और उससे कहा कि‘सभाल कर रखना।’

सब कुछ ठीक ठाक था। वैसे मथुरा कई बार रेल की सामान्य बोगी में बैठकर अनेक बार सफर किया है पर वह हमेशा मुश्किल रहा है। दो बार आगरा में हमारी जेब कट चुकी है। फिर सामान्य बोगी में भीड़ और रिजर्वेशन डिब्बे में रेल कर्मचारियों से विवाद करने की परेशानियेां से बचने का हमें एक ही उपाय नजर आया कि ताज से ही यात्रा की जाये। वैसे मथुरा वृंदावन की यात्रा करने में हमको मजा आता है पर बीच की परेशानी दुःखदायी यादें बन जाती हैं। टिकिट रिजर्व करवाकर हम निश्चिंत हो गये कि यात्रा सुखदायी होगी, मगर यह केवल सोचना ही था!
जाने के एक दिन पहले बालिका की उससे उम्र में बड़ी एक सहेली का फोन आया कि वह भी उसके साथ चलेगी। बालिका ने हामी भर दी।
रात को उसने बताया कि ‘उसकी सहेली का पति उसे छोड़ने आयेगा। वैसे तो वह अकेली भी चली जाती पर उसके साथ छोटा बच्चा है इसलिये मेरी मदद ले रही है।
हमारा माथा ठनका। हमने कहा-‘देखो, हमारी टिकिट रिजर्व है और मैं नहीं चाहता कि उसकी वजह से टिकिट चेकरों से लड़ता फिरूं। ग्वालियर में तो ठीक है पर आगरा में उनसे जूझना पड़ता है।’
बालिका ने कहा-‘उसका पति भी टिकिट रिजर्वेशन कराकर देगा।’
हमने चुप्पी साध ली।
अगले दिन हम शाम को अपने बालिका तथा श्रीमतीजी के साथ घर से निकले। हमने अपना पर्स देखा। उसमें कुछ पांच और दस के नोट थे। अपना ए. टी. एम. निकाल कर शर्ट की जेब में रखा। कुछ चिल्लर जेब में रखी ताकि कहीं पैसा निकालने के लिये पर्स न निकालना पड़े। स्टेशन पर पहुंचने से पहले ही आटो के पैसे भी जेब से निकाल लिये।
स्टेशन पर उसकी सहेली का पति अपनी पत्नी को छोड़ने आया। दोनोें सहेलियां मिली। उसके पति ने एक टिकिट देकर मुझसे कहा कि ‘यह लीजिये आज ही रिजर्व करवाई है।’
मैंने टिकिट में बोगी का नंबर देखा तो मेरा माथा ठनका। वह हमारी बोगी से बहुत दूर थी। मैंने वह टिकिट अपने रखने के लिये पर्स निकाला और उसमें रखा। तत्काल मुझे अपने पर्स निकालने का पछतावा भी हुआ पर सोचा कि ‘यह तो ग्वालियर है? यहंा कभी पर्स नहीं कटा। इसलिये चिंता की बात नहीं।’
मैंने उसके पति से कहा कि ‘यह तीनों एक साथ बैठ जायेंगी। मैं उसकी जगह पर बैठ जाऊंगा।’
उसने कहा-‘नहीं आप साथ ही बैठना। टीसी से कहना तो वह एडजस्ट कर देगा।’
गाड़ी आयी हम उसमें चढ़े। उसकी सहेली अपने नवजात शिशु के साथ ढेर सारा सामान भी ले आयी थी। उसका सामान चढ़ाने की जल्दी में हम यह भूल गये कि एक अदद पर्स की रक्षा भी करना है।’
अंदर बोगी में पहुंचे तो टिकिट का ख्याल कर हमने पीछे पर्स वाली जगह पर हाथ मारा। वह नदारत था। वह हम चिल्लाये क्योंकि गाड़ी चलने वाली थी और बालिका की सहेली का टिकिट उसी में था।
हमारी आवाज सुनकर वहीं खड़े एक आदमी ने पास ही एक लड़के को पकड़ा और कहा-‘शायद, इसने काटा हो। क्योंकि यह आपके पास आने के बाद बाहर भागने की तैयारी में है।’
लड़का हाथ छुराकर भागा पर बोगी के बाहर ही खड़े सहेली के पति के साथ आये एक मित्र ने जो यह माजरा देख रहा था उसे पकड़ लिया। हमने उसकी तलाशी ली। वह भी ललकार रहा था कि ‘ले लो मेरी जेब की तलाशी।’
वाकई उसकी जेबों में हमारा पर्स नहीं था।
हमारा मन उदास होते होते हाथ उसके पेट पर चले गये। जहां ठोस वस्तु का आभास होने पर हमने वहीं हाथ डाला। हमारा पर्स आ हमारे हाथ में आ गया।
हमने तत्काल उसे अपने हाथ में लिया और ट्रेन में चढ़ आये और वह चल दी।
हमने देखा कुछ दूसरे लोग उसे मार रहे थे। यह माजरा उत्तर प्रदेश का एक सिपाही देख रहा था वह बोला-‘देखो, अब उसके लोग ही दिखाने के लिये मार रहे हैं ताकि दूसरे लोग न मारें।
हमें पर्स से ज्यादा इस बात की खुशी थी कि हमें रेल्वे के कर्मचारियों के सामने चोर नहीं बनना पड़ेगा।
हमारे यहां सुबह लाईट जाने के बाद तब आती है जब हम घर से बाहर निकलने वाले होते हैं। कभी हमारे निकलने से पहले आती है तो अपना ईमेल देख लें। अक्सर नहीं होता पर जब होता है तो हम अपनी जेबें ढंग से देखना भूल जाते हैं। कई बार तो पर्स बाहर स्कूटर पर बैठकर यात्रा करता हुआ मिलता है। उस दिन ऐसा ही हुआ।
हमारी मोबाइल की घंटी बजी। हमारे एक मित्र का था। उसने पूछा‘तुम्हारा पर्स कहां है?’
हमने अपनी जेब पर हाथ फिराया। रास्ते में वह किसी आटो वाले को मिला था जिसने उसमें से एक कागज पर मित्र का नंबर देखकर फोन किया था। उस आटो वाले के मोबाइल पर हमने फोन किया और उससे कहा कि ‘आप, पता दें तो समय मिलने पर मैं ले जाऊंगा। उसमें ए.टी.एम. को छोड़कर कोई खास चीज नहीं है। पैसे तो शायद ही हों!’
उसने कहा कि ‘आप अपना पता दें।’
हमने उसे पता दिया तो वह कहने लगा कि ‘आप उस इमारत के बाहर खड़े हो जाईये मेरे पास उधर की ही सवारी है।’
हमारे साथ खड़े एक दोस्त ने कहा-‘देखो भलाई करने वाले आज भी लोग हैं।’
हम दोनों उस इमारत के बाहर होकर उस आटो वाले का इंतजार करते रहे।
उसका नंबर हमारे पास था। वह आया तो हमने उसके नंबर से पहचान लिया।
उसके साथ बैठा एक लड़का उतरा और बोला-‘लीजिये अपना पर्स! इसमें पैसा एक भी नहीं था। आपका ए.टी.एम किसी दूसरे के हाथ लग जाता तो वह आपका नुक्सान कर सकता था। इसलिये आप हमें दो सौ रुपये दो।’
मेरे दोस्त का गुस्सा आ गया। उसने कहा-‘अरे किसे चला रहे हो। चलो हमारे सामने निकाल कर बताओ ए.टी.एम. से पैसे! यह बैंक पास में ही है। अभी जाकर कैंसिल करा देते। वैसे भी यह ए.टी.एम. पुराना हो चुका है हम इसे बदलवाने वाले हैं।’
मैंने उसे पचास रुपये देने चाहे तो उसने नहीं लिये। सौ रुपये दिये तो नानुकर करने लगा। अंदर से आटो वाला बोला-‘अरे साहब दो सौ रुपया दो। अगर हम यह पर्स अपने पास रख लेते तो!
मैंने हंसकर कहा‘मैं तो कुछ नहीं करता। मगर याद रखना इस पर्स को रखने पर एक आदमी रेल्वे स्टेशन पर पिट चुका है। वैसे यह पर्स चार बार खो चुका हूं पर हर बार वापस आता है। आना तो इसे मेरे पास ही था, अलबत्ता संभव है तुम नहीं तो कोई और लाता। हां, इसकी तुम्हें क्या सजा मिलती पता नहीं। यह लो सौ रुपये और चलते बनो।’
बाद में दोस्त बोला-‘यार, इससे अच्छा तो पर्स वापस लेते ही नहीं। नया ए.टी.एम बनवा लेते।’
मैंने उससे कहा-‘सच तो यह है कि इज्जत का सवाल है। उसने हमारा नाम पता तो ले ही लिया था। दस लोगों को पर्स देखकर बताता कि देखो ऐसे भी लोग हैं जिनके पर्स में एक पैसा भी नहीं होता। यह सबूत वापस लेने के लिये मैंने ऐसा किया।’
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1/17/10

तटस्थता-हिन्दी शायरी (Nutural coman men-hindi poem

आंगन में सांपों की

आपसी ज़ंग  देखकर

हम खामोश रहे।

हमें मालुम था कुछ देर बाद

दोनों ही थक कर चले जायेंगे

या आपस में लड़ते मुर्दे का रूप पायेंगे

अब समझ में आया कि

इतिहास की ज़ंगों में

आम इंसान तटस्थ क्यों रहे।

--------



एक मुकुट पहनेगा तभी

जब दूसरा सिंहासन से हटेगा।

इतिहास गवाह है कि

हुक्म करने की जंग में

जमाने का भला करने का दावा

हमेशा धोखा रहा है

आम इंसान के सामने खड़ा रहेगा

हमेशा तलवार का खौफ

लड़ा तो कोई ताज नहीं मिलेगा,

मरा तो कहीं नाम नहीं दिखेगा,

तटस्थ रहकर जान बचा ले आम इंसान

यही है बेहतर

जीत का फल

केवल इज्जतदारों में बंटेगा।

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1/16/10

मनु संदेश-बुद्धिहीन को दंड का उपयोग करना नहीं आता (rajya aur dand-hindu dharma sandesh)

स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। एक बात याद रखें कि बुद्धिमान, ज्ञानी और विद्वान लोगों की समझ से ही समाज, राष्ट्र और धर्म संकट से उबर सकता है। ऐसे लोगों की उपेक्षा से समाज गर्त में चला जाता है और राष्ट्र पर संकट आते रहते हैं।
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1/13/10

ख्वाबों में दुनियां हिला रहे हैं-हिंदी शायरी (khabon ki duniya-hindi shayri)

लिखें  हैं कुछ शब्द

उससे ज्यादा चिल्ला रहे हैं,

जिनका अर्थ खुद नहीं समझा

अपने ख्वाबों को हकीकत की तरह

जमाने को दिखला रहे हैं
।

अब तक वह यही नहीं समझे कि

शब्द छूते हैं इंसान के दिल को

कोई चीख कर दिल नहीं दहलाते

जो  अपने शब्द से ज़माने में

बदलाव के दावे जताते

ख्वाबों में दुनियां हिला रहे हैं
।


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1/10/10

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-ईमानदारी से ही सम्मान बढ़ता है (imandari aur samman-shri guruvani)

‘चोर जार जूआर पीढ़ै घाणीअै।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार चोर और जुआरी घानी में पीसे जाने योग्य होते हैं।
‘सच्चा साहु सचो वणजारि। सचु वणंजहि गुर हेति अपारे।।
सचु विहाझहि सचु कमावहि सचो सचु कमावणआ।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो मनुष्य धर्म के मार्ग का अनुसरण करते हुए ईमानदारी से कमाई करता है उसका व्यापार हमेशा बढ़ता है और उसकी सच्चाई को सारा समाज सराहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या अकेली नहीं है बल्कि कठिनाई इस बात की है कि देश में हालत ऐसे बना दिये गये हैं कि ईमानदारी से काम करने वाले को अधिक धन कमाने का अवसर ही नहीं मिलता। नौकरी, व्यवसाय, कला, साहित्य तथा अन्य व्यवसायिक क्षेत्रों में बेईमानी, चाटुकारिता तथा ढोंग को आश्रय मिल रहा है। यही कारण है कि देश भले ही अन्य देशों के मुकाबले धनी हो रहा है पर फिर भी यहां गरीबी भी बढ़ रही है। सच बात तो यह है कि बिना बेईमानी, भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के शायद ही कोई अमीर बन पाता हो। इतना ही नहीं जिस धर्म को लेकर हम गर्व करते हैं उसकी आड़ जितने अधर्म के काम होते हैं शायद किसी अन्य में नहीं होते।
लोगों की हालत भी यह है कि वह धनी होने पर ही कलाकार, लेखक, ज्ञानी, तथा समाज सेवक मानते हैं। भ्रष्टाचार ऊपर से आता है यह सच है पर नीचे उसे प्रश्रय कौन दे रहा है यह भी देखने वाली बात है। आम आदमी यह जानते हुए भी बेईमानी से धनी बने व्यक्ति का सम्मान करता है भले ही वह कितना भी भ्रष्ट और अधर्मी क्यों न हो?
देश में अधर्म के कारण धन बढ़ रहा है पर कुल व्यापार देखें तो जस का तस है’-यानि देश में गरीब और असहाय तबका वहीं का वहीं है। यह देश के लिये शर्म की बात है कि जहां देश के विश्व में आर्थिक महाशक्ति होने के दावे हो रहे हैं वहीं चालीस प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनको शुद्ध खाना तो दूर अन्न का दाना तक नसीब नहीं है। एक तरह से देश का व्यापार वहीं का वहीं है जहां पहले था। अगर धर्म के सहारे धन कमाने वालों को प्रोत्साहन दिया जाये तभी इस स्थिति से उबरा जा सकता है। हम जब देश की आर्थिक स्थिति की हालत देखते हैं तो उसमें अनेक विरोधाभास दिखाई देते हैं। देश में अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब अधिक गरीब होता दिख रहा है। विश्व में भारत की अमीरी की चमक के साथ गरीबी का अंधेरा भी दिखाई देता है। इसका अध्ययन करें तो यह पता लगता है कि हमारे देश नैतिक पतन भी कम नहीं हुआ है यही कारण है कि विश्व में हमारे धनपतियों का सम्मान नहीं होता
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1/9/10

इससे तो यह संत ही भले हैं-व्यंग्य चिंतन (hindu sant and society-hindi lekh)

उन संत महाराज ने यह अपने प्रवचनों में भक्तों के सामने ही स्वीकार किया कि उनके धन से ही वह सामाजिक कल्याण-बच्चों के लिये स्कूल खोलना, असहायों की सेवा तथा महिलाओं के कल्याण जैसे कार्य- के कार्यक्रम चला रहे हैं। उनका जोर इस बात पर ही था कि अच्छा सोचना चाहिये तो अच्छे काम कर पायेंगे। उनका आशय यही था कि चूंकि वह अच्छा सोचते हैं इसलिये भक्तों के पैसे होने के बावजूद नाम उनका होता है।
सच तो यह है कि यह उनके निरंकार भाव का प्रमाण था जो कि बहुत कम कथित संतों में देखा जाता है। हमारे देश में संतों की अजग गज़ब महिमा है। यह कहना कठिन है कि भारत में गेरुऐ वस्त्र पहनकर धर्म के व्यापार का सिलसिला कब शुरु हुआ पर आजकल तो ऐसे ही लोग संतों की श्रेणी में आते हैं। यह कथित संत अपने आश्रम ऐसे बनवाते है कि पुराने समय के राजा महाराजा भी शरमा जायेे। वातानुकूलित कारों में उनका भ्रमण होता है और निजी विमानों से उनकी यात्रायें संपन्न होती हैं। इनकी भौतिक उपलब्धियां देखकर अनेक युवक युवतियां कामना सहित भक्ति तथा ज्ञानार्जन की प्रक्रिया प्रारंभ इस आशा से करते हैं शायद ऐसी दिव्यता उनको भी प्राप्त हो जाये। यह अलग बात है कि कामना सहित भक्ति तथा दूसरे को सुनाने के लिये ज्ञान का संग्रह करने से भले ही भौतिक वैभव प्राप्त हो जाये पर अध्यात्मिक शांति नहीं प्राप्त हो सकती। फिर यह भौतिक उपलब्धि भी सभी को मिल जाये यह जरूरी नहीं है। कहीं कहीं तो यह भी सुनने में आता है कि मंदिरों में चढ़ावे के बंटवारे को लेकर खूनखराबा तक हो गये।
उन संत महाराज के प्रवचनों की खास बात यह भी लगी कि उन्होंने अपनी मानवीय कमजोरियों की चर्चा भी की-इससे यह लगा कि एक आम आदमी अन्य की भीड़ को संबोधित कर रहा है। ऐसा अन्य संत नहीं कर पाते इसलिये बाकी आम भक्त ही क्या, उनके चेले ही कहते हैं कि हम संत जैसे नहीं हो सकते, क्योंकि वह तो संत हैं, हम तो आम आदमी हैं इसलिये स्वाभाविक कमजोरियों से मुक्त नहीं हो सकते।’
यही कारण है कि ऐसे संतों के संवाद संप्रेक्षण अधिक प्रभावी नहीं होते जबकि उन संत महाराज के कथनों का प्रभाव हो रहा था। यह प्रभाव तभी संभव है जब आप किसी को उपदेश दें तो अपने आम आदमी होने का भी उसे अहसास दिलायें। भले ही उन संत महाराज की भी भौतिक उपलब्धियां हों पर उनके एक कार्यक्रम में हम बहुत पहले गये थे तब योग साधना, ध्यान, और प्राणायम करते हुए उनके फोटो भी देखे थे। वह सुबह योगसाधना सिखाने का भी काम करते हैं। आज उनके प्रवचन सुनते समय हमें एक बात लगी कि योगसाधना करने वाले संतों की वाणी यकीनन अनोखी तथा प्रभावी होती है।
भारत में योगसाधना सिखाने वाले भी कुछ संत हैं-कुछ लोग उनको योग शिक्षक से अधिक नहीं मानते-तो उपदेश देने वाले भी हैं। योगसाधना सिखाने वाले संत भले ही श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान की चर्चा करें पर लगता नहीं हैै कि उसका उनको अभ्यास है। उसी तरह जो श्रीगीता के ज्ञान का उपदेश देते हैं वह योगसाधना करते प्रतीत नहीं होते क्योंकि तत्वज्ञान को वह धारण कर सकें हों, यह लगता नहीं है। उन संत महाराज की भाव भंगिमा में बनावटीपन नहीं दिखा तो केवल इसलिये कि उन्होंने सहज मानवीय कमजोरियेां से अलग दिखने का कोई प्रयास नहीं किया। कहने का तात्पर्य है कि योग विद्या तथा ब्रह्म विद्या में उनका समान अधिकार है जो बहुत संतों में दिखाई देता है।
उनके प्रवचन कार्यक्रम में भी किताबों, दवाईयों और कैसिटों की दुकाने लगी थीं। उन्होंने कार्यक्रम का मंच बनाने वाली दवाई कंपनी का नाम भी लिया जो शायद उनके कार्यक्रम की आंशिक या पूर्ण प्रयोजक भी हो सकती है। उनमें से कुछ दवाईयां हमने भी खरीदी-समय पर उनकी जरूरत पड़ने की संभावना रहती है। ऐसे कार्यक्रमों में जाना अच्छी बात है या नहीं यह अलग बात है पर समाज को इनकी जरूरत है यह सभी मानते हैं। यहां तक कि बरसों तक प्रगतिशील लेखन करने वाले एक स्तंभकार ने भी यह माना था कि आदमी को इनसे तनाव मुक्ति मिलती है। उसने यहां तक लिखा था कि अगर यह व्यवसायी हैं और तनाव मुक्ति बेच रहे हैं तो दूसरे लोग भी तो यही कर रहे हैं।
सवाल यह है कि आम आदमी क्या करे? एक तरफ जिन प्रचार माध्यमों से वह नितांत जुड़ा है उसे वह पश्चिमी देशों का ऐश्वर्य दिखाकर वही सभ्यता अपनाने के लिये प्रेरित कर रहे हैं जिससे वहां के निवासी बोर होकर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में शांति तलाश रहे हैं। इधर भारतीय बाजार भी पाश्चात्य उपभोकता संस्कृति के प्रतीकों के साथ सामने खड़ा है। प्रचार माध्यमों में देख लीजिये फाईव स्टार अस्पतालों के नाम और दवाओं की दुकानों के पते। ऐसे में भारतीय चिकित्सा पद्धति की रक्षा अगर यह संत लोग नहीं करेंगे तो कौन करेगा? शायद आधुनिक हिन्दी स्तंभकार इस बात को नहीं जानते कि इन्हीं संतों की आयुर्वेदिक दवाओं की प्रशंसा आम लोग भी करते हैं। यही कारण है कि वह अपने स्तंभों में उन पर कितना भी बरस लें, आम आदमी उनका समर्थक है।
पश्चिमी चिकित्सा पद्धति जिसे एलौपैथी भी कहा जाता है-एक तरह से डरावनी लगती है। अपनी बीमारी के इलाज के लिये डाक्टर के पास जाओ तो पहले दस प्रकार के टेस्ट कराता है। एक डाक्टर उसी टेस्ट का पास करता है दूसरा खारिज करता है। कम से कम पहली नजर में एलौपैथी का डाक्टर मर्ज को नहीं पहचानता जो कि किसी ‘अच्छे हकीम’ प्रमाण होता है। इस पर दवाईयों कितनी महंगी हैं।
हमारे एक मित्र की मां को कंधे में भारी दर्द उठा। फोन पर खबर मिली तो हम भी उसके साथ हो लिये। वह अपने छोटे बेटे के साथ एक निजी चिकित्सक के अस्पताल में थी जिसने उनको बड़े अस्पताल में इस आशंका से ले जाने का कहा कि शायद अब उनके जाने की बारी है। हमने वहां पहुंचकर जब उनको देखा तो बड़े आराम से बात रही थीं। अपने बेटे से बोली कि ‘डाक्टर ने कहा कि दिल का दौरा पड़ा है।’ उनकी आवाज से हमको यह नहीं लगा कि वह दिल का दौरा पड़ा है। चेहरे पर तनाव था पर आवाज साफ और बुलंद पहले की तरह बुलंद थी। बहरहाल उनको लेकर बड़े अस्पताल पहुंचे। हमने रास्ते में उनसे पूछा-‘आपने आज कोई गरिष्ठ भोजन किया था?’
वह बोली-हां, सुबह पुड़ी खाई थी।’
उनको दंात थे नहीं और हमारा अंदाजा था कि वही आंतों में जाकर फंसी हैं।
अस्पताल के गहन चिकित्सा केंद्र में उनका इलाज शुरु हुआ। एक इंजेक्शन लगने के बाद उनको आराम आया पर डाक्टरों ने अन्य टेस्ट कराने तक वहीं रुकने के लिये भर्ती कर दिया। हम रोज उनको देखने जाते थे। हर रोज उनकी हालत पहले से बदतर मिलती थी। पांचवें दिन डाक्टर ने एक दूसरे टेस्ट के लिये यह कहते हुए बाहर भेजा कि ‘यहां हमारी मशीन खराब है।’
वह टेस्ट कराने भी हम गये। वह जब धीरे धीरे चल रही थी तो हमने कह ही दिया कि ‘कमाल है, इससे अच्छी हालत में आयी थीं। इलाज के बाद आदमी की तबियत सुधरनी चाहिये कि बिगड़नी।’
टेस्ट रिपोर्ट देने वाले से हमने पूछा कि ‘क्या है इनको?’
‘आप ले जाईये डाक्टर बता देगा।’ उसके इस रहस्यमय उत्तर ने हमें हैरान कर दिया।
हम फिर उनको लेकर बड़े अस्पताल ले आये। बड़ा डाक्टर तो नहीं मिला छोटे वाले से हमारी पहचान निकल आयी। उससे पूछा तो उसने सच बता दिया कि ‘इनको छाती में कोई समस्या नहीं है। इसलिये इनकी कुछ दवायें बंद कर देते हैं। पर जो आठ इंजेक्शन लगने हैं वह पूरे यही लगेंगे। उसके बाद आप इनको घर ले जाना।’
दवायें बंद हो गयी। एक औरत जो ठीकठाक अस्पताल में कंधे की पीड़ा की इलाज कराने आयी,दवाऐं खाते हुए मरने की तरफ बढ़ती लग रही थी। वह बंद होने से फिर वापस लौटी। वह दवाओं से ठीक नहीं होती दिखी बल्कि उनके बंद होने के बाद उसने बताया कि‘अब लग रहा है कि सभी को पहचान रही हूं, वरना तो मेरी स्मृति शक्ति भी जा रही थी।’
घर वापसी पर हमने उनसे कहा-‘आपको कुछ नहीं हुआ था। अगर आप चाहती हैं कि आप अस्पताल में जाकर जल्दी दुनियां न छोड़े तो प्राणायाम करें। आप भगवान का लाख लाख शुक्र समझें कि डाक्टरों से उसने आपको बचा लिया।’
हमें सात साल पहले उच्च रक्तचाप हुआ था। होम्योपैथी के डाक्टर ने भी ऐलौपैथी की तरह इलाज करते हुए तमाम टेस्ट करवाये। उसने मधुमेह का भी टेस्ट करवाया। उसी की सलाह पर हम दूसरे होम्योपैथी के डाक्टर के पास गये उसने अपने पर्चे पर हमारी बीमारी का नाम लिखा ‘हाईपर ऐसिडिटी’।
बाद के योगसाधना प्रारंभ की। अनेक बार अपने अंदर आये परिवर्तनों की अनुभूति लगती है। यही कारण है कि हम अक्सर योगसाधना के बारे में लिखते हैं। अनेक बार कथित संतों पर लिखते हैं पर जब अंग्रेजी पद्धति के जाल में फंसे देश को देखते हैं तो फिर यही लगता है कि ‘इससे तो यह संत ही भले हैं।’ कमा रहे हैं तो क्या? साथ ले जायेंगे। बंट तो इसी समाज में रहा है। फिर ठगी की बात है तो ऐसी बहुत सारी बातें हैं जो यहां लिखना बेकार है। कम से कम यह संत लोग भारत की शिक्षा पद्धति, ज्ञान, चिकित्सा पद्धति तथा संस्कृति को बचाने के लिये काम तो कर रहे हैं। उनकी शिक्षा गुलामी के लिये नहीं बल्क् िस्वतंत्र रहने के लिये प्रेरित करती है। कमाने की बात है तो यहां छोड़ कौन रहा है?
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/8/10

लेखक कभी बिचारे नहीं होते-हिन्दी शायरी (lekhak kabhi bichare nahin hote-hindi shayri)

कागज को स्याही से रंगने वाले

शब्दों की मय पीने वाले

लेखक कभी बिचारे नहीं होते।

कलम को चलाकर  घिसें

या टंकण पटल पर उंगलियां नचायें,

पढ़ने वालों का अच्छे लगें या बुरे

पर लिखने वाले का दिल बहलायें

शब्द कभी बिना सहारे नहीं होते।

बहा रहे हैं पसीना,

चुन रहे हैं शब्दों का नगीना,

उनकी मेहनत को नकारा न समझो

सच्चे लेखक ही दुनियां को प्यार करते

भले ही खुद किसी को प्यारे नहीं होते।

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आंखें गढ़ाये

उंगलियों को नचाते हुए

शब्द रचने वाले लेखक पर

मत हंसो

क्योंकि जिंदगी को वही जी पाते हैं।

अकेले बैठे लिखते हुए

उस लेखक को तन्हा न समझो

अपनी कलम से

शब्दों को अपना साथी वह बनाते हैं।

तुम अपनी जुबां से

किसी के लिये बुरा बोलते हो,

हर बात में अपना मतलब तोलते हो,

सिक्कों में खुशी देखने वालों

शब्द रचयिता अपनी शायरियों में

अनमोल मजा पी जाते,

सभी करते हैं अपना वक्त खराब

पर लेखक ही सभी को नकारा  नजर आते,

बोलना आसान है

उससे ज्यादा आसान है चिल्लाना

यह तो सभी लोग करते

पर अपने शब्दों को तीर की तरह लेखक चलायें,

जरूरत हो तो  चिराग की तरह भी जलायें,

लोग करते हैं एक दूसरे पर जख्म

पर लेखक बांटते हमदर्दी

अपने घाव वह पी जाते हैं।

दूसरों को भले ही कुछ भी लगें

पर लेखक कभी खुद को बिचारा नहीं पाते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/1/10

अंतर्जाल पर यौन सामग्री रोकने का प्रयास-हिन्दी आलेख (sex image search on internet in google and yahoo-hindi article)

अगर इन खबरों पर यकीन करें कि गूगल ओर याहू ने अपने सर्च इंजिनों भारतीय क्षेत्र क अंतर्गत ‘यौन सामग्री’ की खोज को बंद करने या सावधानी पूर्वक प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है तो यह कहना पड़ेगा कि इससे निकट भविष्य में इंटरनेट की गतिविधियों में अल्पकाल के लिये कमी आ सकती है और कंपनियों द्वारा प्रदत्त कनेक्शन कम हो सकते हैं। बाद में समय के साथ फिर बढ़ोतरी होगी, यह एक अलग से बहस का विषय हो सकता है।
अगर हम भारत के इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या देखें तो टेलीफोन कंपनियों को बहुत बड़ा बाजार मिला हुआ है। सात से दस करोड़ इंटरनेट कनेक्शनधारियों के होने की बात अक्सर कही जाती है। आंकड़ों के खेल की बजाय हम जमीनी सच्चाई को देखें तो पता लगता है कि अधिकतर लोगों ने टीवी के विकल्प के रूप में इसे चुना है। शैक्षणिक, साहित्यक, कलात्मक तथा अन्य रचानात्मक विषयों के प्रति केवल उन्हीं लोगों का रुझान है जो उनसे स्वयं जुड़े हुए है। कम से कम इंटरनेट विशेषज्ञ तो यही मानते हैं कि भारतीय अंतार्जल प्रयोक्ता यौन से संबंधित सामग्री में अधिक दिलचस्पी ले रहे हैं।
गत वर्ष एक प्रतिबंधित हिन्दी वेबसाईट ‘सविता भाभी’ के बारे में बताया गया कि उसके नियमित प्रयोक्ता बीस हजार तक पहुंच गये थे। अलेक्सा की रैकिंग में उसे एक बेहतर स्थान प्राप्त था। स्पष्टतः वह यौन सामग्री से भरी हुई थी और इसलिये कथित सामाजिक चिंतकों ने उस पर रोक लगाने की मंाग की। उस पर प्रतिबंध लगने से अनेक लोग निराश हुए और अभी तक उसकी तलाश सर्च इंजिनों में हो रही है-यह बात इस लेखक के कम से कम चार ब्लाग पर इस विषय पर लिखे गये लेख, व्यंगय तथा कविताओं की पाठकों की संख्या देखकर लगी है। लेखक ने यह सामग्री प्रयोग के लिये ही लिखी थी और उसके परिणामों ने यह बता दिया कि लोगों की दिलचस्पी किस विषय में’ है-यह अलग बात है कि एैसी वैसी सामग्री न मिलने ने पाठक निराश होकर कोई अन्य सामग्री देखे बिना लौट जाते हैं जबकि कुछ अन्य विषयों में भी दिलचस्पी लेते हैं। कई लोगों ने तो अपनी टिप्पणियों में लिखा है कि अन्य विषयों पर हिन्दी में लिखा जा रहा है इस पर यकीन नहीं होता था।
कहने का तात्पर्य यही कि अन्य विषयों के बारे में हर आम प्रयोक्ता इतना नहीं जानता इसलिये अधिकतर यौन सामग्री देखने के लिये ही अंतर्जाल पर सक्रिय होते हैं। ऐसे में अगर उन्हें यह पता लगेगा कि अब तो यह सामग्री मिल नहीं रही या मुश्किल से मिलेगी तो वह संभवतः अंतर्जाल से विरक्त भी हो सकते हैं इसका प्रभाव टेलीफोन कंपनियों के व्यापार पर पड़ सकता है। बताया तो यह जा रहा है कि ऐसा सरकारी प्रयासों के कारण हुआ है कि याहू तथा गूगल ने भारत में यौन सामग्रंी दिखाना बंद करने या उसे कठिनता से दिखने के लिये तैयार हुईं। इस पर यकीन करना थोड़ा कठिन है। संभव है कि सरकारी प्रयास हुए हों पर बाजार और प्रचार प्रबंधकों की इसके पीछे कोई भूमिका जरूर है। इसके कारण हैं। भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या बहुत तेजी से बड़ी है और इससे अन्य प्रचार माध्यमो पर प्रत्यक्ष अंतर नहीं पड़ा पर अप्रत्यख रूप वही अपने प्रयोक्ता खो रहे हैं। टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में यौन सामग्री प्रस्तुत करने की सीमायें हैं-हालांकि सभी उसे तोड़ने पर आमादा भी दिखते है। वह संगठित हैं, यह बात जहां उनको शक्ति प्रदान करती है वहीं मर्यादित रहने के लिये बाध्य भी करती है। भले ही न रखें पर समाज के लिये अपनी प्रतिबद्धता उनको दिखानी तो पड़ती है। इसके विपरीत अंतर्जाल पर खुला खेल है। चाहे जो जैसी सामग्री प्रस्तुत कर सकता है। संगठित सीमाओं से परे वैयक्तिक आधार पर काम करने वालों ने वह सब किया है जो उनको स्वतंत्र प्रमाणित करता है। यहीं से बाजार के सहारे टिके संगठित प्रचार माध्यामों की परेशानी प्रारंभ होती है। इसी कारण वह चाहते हैं कि ऐसी सामग्री वहां न मिले जिससे उनके प्रयोक्ता कम हो। टीवी चैनल, समाचार पत्र पत्रिकाओं के साथ टेलीफोन कंपनियां भी इसी संगठित प्रचार माध्यम का हिस्सा हैं। इंटरनेट पर अधिक सक्रिय लोग बाजार के लिये भी संकट का विषय हैं क्योंकि वह उसके अनेक उत्पादों को त्याग रहे हैं-जैसे त्यौहारों के अवसर अब लोग ईमेल पर ही अधिक संदेश भेज रहे हैं जिससे उनके ग्रीटिंग कार्ड वगैरह कम बिकते होंगे। एस. एम. एस. संदेश भी कम ही प्रयोग होते होंगे। उल्लेखनीय है कि टीवी तथा रेडियो में अनेक ऐसे कार्यक्रम हैं जो टेलीफोन कपंनियों को एस. एम. एस के प्रयोक्ताओं से अच्छी आय दिलवाते हैं और संभव है कि इंटरनेट प्रयोक्ताओं द्वारा प्रदाय की जा रही राशि खोने का ख्याल उनको न हो इसलिये ही वह भी चाहती हों कि अगर ऐसी यौन सामग्री बंद होने से टीवी और रेडियो के प्रयोक्तओं के कम होने से जो परेशानी बाजार तथा प्रचार माध्यमों को हो रही है उससे निजात मिले।
लोकप्रियता का दावा अनेक चैनल कर रहे हैं पर उनके कार्यक्रमों का स्तर देखा जाये ता लगता नहीं है कि इस समय आम प्रयोक्ता उनके होने या न होने के बारे में सोचता है, फिर इंधर इंटरनेट ने उनसे कितने दर्शक और श्रोता छीने हैं इसका अनुमान किसी को नहीं है अलबत्ता एक बात तय है कि बाजार और प्रचार प्रबंधक कही न कहीं परंपरागत संगठित प्रचार माध्यमों को इस इंटरनेट से चुनौती अनुभव तो करते ही हैं बल्कि वहां स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अनियंत्रित होने का भय भी उनके व्याप्त हो सकता है।
कुछ दिन पहले चीन में भी यौन सामग्री प्रतिबंधित की गयी थी। अगर कोई सोचता है कि उन्होंने अपने समाज की युवा पीढ़ी का दिगभ्रमित होने से बचाने के लिये किया है तो यह भ्रम है। वहां भी ऐसी ही पूंजीवादी ताकतें हैं जिनको सरकार से प्रत्यक्ष सहारा मिलता है। यह समाज के आचरण और चरित्र निर्माण के लिये प्रतिबद्धता भले ही पूरे विश्व में दिखाती हैं पर उनके कार्यक्रम भी जिस तरह उपभोग संस्कृति को प्रोत्साहित करती हैं उससे उनका ढोंग प्रकट भी हो जाता है। समाज की रक्षा की आड़ में सरकारों को प्रेरित कर वह अपने प्रयोक्ताओं को अपने कब्जे में रखना चाहती हैं।
हमारा उद्देश्य यौन सामग्री का प्रोत्साहित करना नहीं है पर नयी पीढ़ी को बरबाद होने से बचाने के नाम पर इस तरह के प्रयासों पर विचार करना जरूरी यूं भी लगता है कि संगठित बाजार और प्रचार माध्यम इस आड़ में अपने लक्ष्य समाज कल्याण के नाम पर ही प्राप्त करते हैं।
केवल सैक्स शब्द पर प्रतिबंध से भी क्या होगा। कुछ लोगों ने बताया कि इन वेबसाईटों से in शब्द हटाकर देखा जाये तो वह यौन सामग्री दिखाती है-याद रहे in शब्द से ही वह अपने सर्वर के माध्यम से भारतीय क्षेत्र को नियंत्रित करती हैं। इसका मतलब यह है कि अन्य देशों में उस पर रोक नहीं है दूसरा यह कि अगर इन को हटाकर यहां के लोग भी देख सकते हैं। ऐसे में भारत और चीन के प्रयासों पर पानी फिर सकता है। न भी फिरे तो सवाल यह आता है कि इन दोनों देशों में ऐसा क्यों हो रहा है। शायद इसलिये कि यह दोनों देश विश्व की बड़ी कंपनियों के बड़े बाजार है। यहां सारे संगठित प्रचार माध्यम उन्हीं के सहारे हैं ऐसे में उनको अपने प्रयोक्ता बचाने हैं तो बाजार को भी उपभोक्ताओं को वस्तुऐं बेचनी हैं। इसलिये कभी कभी तो लगता है कि इन बड़ी वेबसाईटों ने सरकार से अधिक बाजार और प्रचार प्रबंधकों के अनुरोध पर ऐसा किया हेागा।
इस पर उनको कितनी सफलता मिलेगी यह कहना कठिन है क्योंकि सैक्स के अलावा अन्य भी बहुत सारे शब्द हैं जो ऐसी यौन सामग्री उपलब्ध कराते हैं। फिर यू ट्यूब पर अनेक ऐसे फोटो उपलब्ध हैं जिनके साथ सैक्स या सैक्सी के अलावा अन्य टैग और लेबल हैं जो सीधी यौन सामग्री उपलब्ध कराते है। अब यह कहना कठिन है कि केवल सैक्स शब्द पर इस तरह रोक लगाने का प्रयास हो रहा है या हर प्रकार की यौन सामग्री रोकने प्रयास होगा-हालांकि यह एक कठिन काम है। एक बात तय रही है कि सैक्स या यौन सामग्री रोकने से यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि इससे इंटरनेट पर अन्य विषयों के प्रति रुझान बढ़ेगा क्योंकि इस तरह के प्रयोक्ता अन्य विषयों में न के बराबर रुचि रखते हैं इसलिये इंटरनेट कनैकशनों की संख्या कम हो सकती है पर यह दौर हमेशा नहीं रहेगा। बहरहाल अंतर्जाल पर नियंत्रण करने का प्रयास यही बताता है कि इसकी अब अनदेखी नहीं की जा सकती।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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12/28/09

नया वर्ष आ रहा है-हिन्दी व्यंग्य (happy new year coming-hindi satire article)

छोटे शहर के आदमी के लिये यही एक उलझन है कि उसके घरेलू और सामाजिक संस्कार कुछ दूसरे हैं जबकि बाह्य रूप से अनेक बार औपचारिक होकर दूसरे संस्कारों को निभाना पड़ता है। जिनमें अपने यहां ईसवी संवत् तो हमारे जैसे लोगों के लिये हमेशा अजूबा रहा है।
जब नया साल आयेगा तो जो भी मिलेगा उससे कहना पड़ता है कि ‘नव वर्ष मुबारक’। हम नहीं बोलेंगे तो वह बोलेगा तो हमें भी कहना पड़ेगा कि ‘आपको भी।’
सच बात तो यह है कि हृदय में स्पंदन बिल्कुल नहीं है। अपने यहां गुड़ी पड़वा पर ही नया संवत् प्रारंभ होता है। इससे हिन्दू धर्म का हर समाज मनाता है। ऐसे में अगर आपका जातीय, भाषाई या क्षेत्रीय समुदाय अलग भी है तो भी दूसरे से अपनी खुशी बांट सकते हैं। फिर बात मौसम की भी है। उस समय मौसम समशीतोष्ण रहता है और एक तरह देह में खुशी की तरंगे स्वाभाविक रूप से उठती हैं।
बचपन से ही इन संस्कारों के साथ बड़े हुए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी कोई ऐसा शोरगुल नहीं होता था अलबत्ता कुछ लोग एक दूसरे को बधाई देते थे।
जैसे जैसे विद्युतीय तरंगों से युक्त प्रचार माध्यमों को प्रभाव बढ़ा, ऐसे अनेक त्यौहार हैं जो हमारी संस्कृति का भाग नहीं है पर उनका नाम अधिक सुनने को मिलने लगा। दरअसल इसका कारण यह है कि इन प्रचार माध्यमों को बाजार से विज्ञापन मिलते हैं और उसे इन्हीं त्यौहारों से उपभोक्ता चाहिए, वह भी आज की पीढ़ी के नवयुवाओं से जिनके हृदय से अपनी संस्कृति और संस्कार करीब करीब विस्मृत हो रहे हैं।
वैसे तो हर धर्म में अनेक त्यौहार है और हमें किसी पर कोई आपत्ति नहीं है। यहां तक कि अगर दूसरे धर्म का आदमी हो तो हम उसे हृदय से बधाई भी देते है, उस समय हमारे मन में औपचारिक भाव नहीं होता।
हमारा उद्देश्य किसी पर आपत्ति करना नहीं है बल्कि अपने संस्कारों और संस्कृति से अलग हटकर चलने पर मन में होने वाली उथल पुथल पर दृष्टिपात करना है। साथ ही बाजार जिस तरह इन पर्वों पर अपनी कमाई के लिये आक्रामक प्रचार के लिये तैयार होता है उसे भी देखना है। अगर हम देखें तो अब हर त्यौहार दो भागों में बंट गया है। एक तो जो समाज स्वयं मनाता है दूसरा वह जिससे बाजार कमाता है। एक तरफ धर्म का पर्व दूसरी तरफ धन का गर्व।
समस्या अनेक त्यौहारों की नहीं बल्कि बाजार और प्रचार उनको जिस तरह भुनाने का प्रयास करता है उस हंसी आती है। ऐसा करते हुए बाजार तो ठीक पर उसके समर्थक प्रचार माध्यम अपनी सीमायें पार करते लगते हैं जैसे कि वह भारत की मिलीजुली संस्कृति को खिचड़ी संस्कृति समझते हैं।
अभी नया पांच दिन दूर है पर टीवी, एफ.एम. रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकायें उस पर शोर पर शोर मचाये जा रहे हैं। आ रहा है, आ रहा है नया साल आ रहा है। नववर्ष के पहले ही दिन चंद्रग्रहण क्या पूरे वर्ष बुरा प्रभाव डालेगा? या अच्छा होगा-ऐसे सवाल बेतुके हैं। अगर हम भारतीय दृष्टिकोण से बात करें तो यह चंद्रग्रहण वर्ष के बीच में आ रहा है और अगर पाश्चात्य दृष्टिकोण से देखें तो ऐसी चीजें महा बेवकूफी की मानी जाती हैं-याद रहे मायावी विकास में पश्चिम हम से बहुत आगे हैं और जिसे हम जन्नत समझते हैं वह उसे रोज भोगते हैं-अरे, जोरदार ऊंची इमारतें, मक्खन जैसी सड़कें, चमचमाती गाड़ियां और रात को आदमी द्वारा निर्मित ऐसी रौशनी जिसके आगे सूरज की रौशनी बोझिल लगती है, यही तो जन्नत की कल्पना है। हम जो टीवी पर बाहरी दृश्य देखते हैं उसके आधार पर यही कहते हैं कि स्वर्ग इसी धरती पर वह भी पश्चिम में कई जगह है। कहने का तात्पर्य यह है कि बिना किसी धार्मिक कर्मकांड के वह यहीं स्वर्ग भोग रहे हैं तब काहे वह चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के प्रभाव पर वह लोग विचार करेंगे।
एक बात जो सबसे अधिक अखरती है। कोई त्यौहार आया नहीं कि समाचार चैनल और रेडियो वाले उसको बाजार के लिये उपभोक्ता जुटाने का काम शुरु करते हैं। यहां तक तो ठीक! हर चैनल के मनोरंजक कार्यक्रम भी अपनी कहानियों में जबरन उनको ठूंस लेते हैं। यह आपत्ति केवल पाश्चात्य संस्कृति के त्यौहारों पर ही नहीं वरन् भारतीय त्यौहारों पर भी है। दिवाली, होली और राखी अपने देश के लोग मनाते हैं। ऐसे में अवकाश के दिन अगर सामान्य मनोरंजन के कार्यक्रम प्रस्तुत हों तो भी ठीक! वहां भी जबरन उन त्यौहारों को जोड़ जाता है। यह सभी देखकर तो लगता है कि अपने देश में व्यवसायिक प्रवृत्ति का अभाव है। अक्सर आपने भारतीय खिलाड़ियों के बारे में सुना होगा कि वह पैसा खूब कमाते हैं पर उनकी व्यवसायिक सोच नहीं दिखती। यही कारण है कि क्रिकेट में आज भी आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी टीमों जैसा सामथ्र्य भारतीय खिलाड़ियों में नजर नहीं आता जो हाथ से जाता मैच अपनी तरफ खींच लें। दूसरी बात यह है कि आर्थिक क्षेत्र में भारतीयों की सबसे बड़ी समस्या ‘प्रबंध कौशल’ माना जाता है। पहले तो यह सरकारी क्षेत्र में देखा जाता था पर अब तो निजी क्षेत्र में भी यही देखा जा रहा है। समाचार चैनलों की बात करें तो आज भी दूरदर्शन ही ऐसा है जो वास्तव में सही ढंग से काम कर रहा है। बाकी समाचार चैनल तो मनोरंजक चैनलों के विज्ञापन जैसा काम कर रहे हैं। फिर उन पर फिल्मों के अभिनेताओं को भी बिना किसी फिल्म के लोकप्रिय बनाये रखने का जिम्मा है जिस कारण रोज एक कलाकार का जन्म समाचारों के केंद्र में छा जाता है। पहले फिल्म का गासिप छापने वाली पत्रिकायें अलग होती थी। बिकती खूब थी पर फिर भी समाचार और साहित्य का स्तरीय बुद्धि का पाठक उसे देखता तक नहीं था पर आज वही समाचार टीवी चैनलों को रौशन कर यह साबित करने का प्रयास होता दिखता है कि इस देश के आम आदमी की बौद्धिकता का दिवालिया निकल गया है।
उस दिन हमारे एक मित्र के लड़के ने भी यही बात कही थी कि ‘जब हम बाहर जाते हैं तो ऐसा लगता है कि हमारे माता पिता पुरानी संस्कृति के हैं क्योंकि वह नववर्ष और क्रिसमस नहीं मनाते। वह वैलंटाईन डे का मतलब नहीं समझते।’
उसके जाने के बाद उसके पिता ने मेरे से कहा था-‘देखो यह टीवी चैनल किस तरह हमारी संस्कृति का नष्ट कर रहे हैं। वह पश्चिमी त्यौहारों को इस देश में इस तरह प्रचारित कर अपनी संस्कृति को घटिया साबित करने का प्रयास करते हैं।’
हमने कहा-‘नहीं, ऐसी बात नहीं! उनमें तो तो भारतीय त्यौहारों पर भी कार्यक्रम आते हैं यह अलग बात है कि वह हास्याप्रद लगते हैं। सच तो यह है कि हमारे देश में संस्कृति तैयार की जा रही है जिससे बाजार कभी बीमार न हो। हो तो इसी खिचड़ी से काम चलाये।’
हम कोई बाजार या प्रचार की नहीं कर रहे है बल्कि उस असमंजस को बयान कर रहे हैं जो अक्सर हमारे सामने आते हैं। वैसे संभव है कि देश के नवयुवक नवयुवतियां भले ही कुछ देर बाजार के प्रचार में इन त्यौहारों पर खर्च करते हैं पर बाद में वह फिर अपनी दुनियां में लौट आते हैं इसलिये सांस्कृतिक खतरे की बात जमती नहीं। भारतीय त्यौहारों पर विभिन्न मंदिरों में जब हम भीड़ देखते हैं यह भय समाप्त हो जाता है। प्रसंगवश याद आया कि हमारे साथ एक योगी मित्र से उसके अन्य मित्र ने मंदिर में देखकर कहा-‘तुम तो योग साधना करते हो फिर यहां क्यों आते हो?’
उसने जवाब दिया कि ‘यह एक अच्छी आदत है। मूर्तियों में भगवान नहीं है हमें पता है पर फिर भी उसके होने का अहसास मुझे एक आत्मविश्वास देता है। इसलिये यहां ध्यान लगाने जरूर आता हूं। पुरानी आदत है न! छूटती नहीं है। एक बार मूर्ति पूजना शुरु करने के बाद उसे छोड़ना भी नहीं चाहिये, ऐसा मेरे योग गुरु ने बताया था क्योंकि वह भी तनाव का कारण बनता है।’
तब वह अन्य मित्र बोला‘-सच बात तो यह है कि शनिवार या मंगलवार को मैं यहां न आंऊ तो बाकी दिन परेशान रहता हूं।’
कहने का तात्पर्य यह है कि मन ऐसी शय है जब उस पर नियंत्रण स्वयं नहीं करते तो कोई बहाना ले सकते हैं-यह बुरा नहीं है कम से कम उससे तो कतई नहीं कि आपके मन को बांधकर कोई दूसरा ले जाये जिसके पीछे आपको भी जाना है। अपने मन को स्वतंत्र रखने के लिये जरूरी है कि उस पर हमारा नियंत्रण हो।
बाजार और प्रचार का हाल तो सभी देख रहे हैं। अभी चार दिन पड़े हैं पर इधर नये वर्ष को ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे कि आज आ रहा हो। अनेक टीवी चैनल पिछले वर्ष के कार्यक्रमों को प्रस्तुत कर रहे हैं। समाचार चैनल यह कैसे दावा कर सकते हैं कि इन चार दिनों में कोई ऐसी बड़ी घटना नहीं होगी जो इस वर्ष की पहचान बन जाये-या वह तय कर चुके हैं कि वह इन पांच दिनों में कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं प्रस्तुत करेंगे जो इस वर्ष का सबसे अच्छा हो क्योंकि कुछ तो अपने इस वर्ष के हिट कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे हैं। बहरहाल चार दिन तक सुनते रहो कि नया वर्ष आ रहा है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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12/26/09

दिन का दावा, रात का छलावा-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (din ka dava,rat ka chhalava-hindi vyangya kavieaen)

करते हैं जो दिन में

नैतिक आदर्श की बात,

बेशर्म बना देती है

उनको अंधियारी काली रात।

चेहरे की लालिमा को

उनके अंतर्मन का तेज न समझना

मेकअप भी निभाता है

चमकने में उनका साथ,

सूरज की रौशनी में

जिस सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरते

उसी की इज्जत पर रखते हैं रात को लात।।

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खुल रही है समाज के ठेकेदारों की कलई

शरीर पर हैं सफेद कपड़े, नीयत में नंगई।

बरसों तक ढो रहा है समाज, सरदार समझकर

हाथ जोड़े खड़े मुस्कराते रहे, दिल जिनसे कुचले कई।।

नारी उद्धार को लेकर, मचाया हमेशा बवाल

मेहनताने में मांगी, हर बार रात को एक कली नई।

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टूट रहा है विश्वास

मर रही है आस।

जिन्होंने दिये हैं नारी उद्धार पर

कई बार दिन में प्रवचन,

करते रहे वही हमेशा

काली रात के अंधियारे में काम का भजन,

देवी की तरह पूजने का दावा करते दिन में

रात को छलावा खेलें ऐसे, जैसे कि हो वह तास। 
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12/21/09

किश्तों में डूब न जायें जिंदगी-काव्यात्मक चिंतन (kishton par zindagi-kavay chitan)

आजकल कर्जे लेकर सामान खरीदने का एक रिवाज चल रहा है। अमीर न होने पर भी वैसा दिखने वालों की चाहत पूरा करना आसान हो गया है। किश्तों पर अपने लक्ष्य की किश्ती चलाना आसान लगता है पर उसे निभाना उतना सहज नहीं रह जाता। एक आम मध्यम या निम्न वर्गीय व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह अपनी आयसीमा आसानी से बढ़ा सके। उल्टे बढ़ती महंगाई से सभी का किचन व्यय बढ़ जाता है इधर किश्त और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी आने से संकट कभी भी गहरा सकता है।
दरअसल पाश्चात्य सभ्यता पूरी तरह से उपभोक्तावाद पर आधारित है। इसमें अमीर होने से अधिक वैसा दिखने के विश्वास पर आधारित है। कहा जाता है कि आकर्षक, चमत्कारी तथा चतुर दिखोगे तो दुनियां जीत लोगे। वैसे अपने यहां कहा जाता है कि चार्वाक ऋषि कह गये हैं कि ‘कर्ज लेकर खूब घी पियो’। उनका आशय कतई वैसा नहीं रहा होगा जैसा बताया जाता है। ऐसा लगता है कि उन्होंने व्यंग्य विनोद में किसी से कहा होगा जिसे एक कथन मान लिया गया। कर्ज लेकर घी पीना आसान नहीं है। आजकल तो कर्जे देने वाले उसके वसूल करने के तरीके भी जानते हैं। कई लोगों ने अग्रिम में ही अपने चैकों पर हस्ताक्षर कर कर्ज लिये और बाद में उनको सींखचों के पीछे जाना पड़ा।
दरअसल समाज में अमीर या आकर्षक दिखने की ललक एक भ्रम है। भले ही लोग कहते हैं कि ‘आजकल अमीरों की इज्जत है’, या ‘गरीब की भला कैसी इज्जत’, पर यह केवल छलावा है। दरअसल अगर आप जीवन सहजता से गुजारें और अपने अंदर कोई कला या गुण पैदा करें तो निश्चित रूप से आपका सम्मान होगा। जब सारी दुनियां पैसे के पीछे भाग रही है और आप भी तो फिर यह आशा क्यों करते है कि कोई आपका सम्मान करे।
आप ऐसी महफिलों में जाते हैं जहां दिखावा पंसद लोग अपनी हांकते हैं और आप भी हांक रहे हैं पर आपका कोई ऐसा गुण नहीं जिसे वहां दिखा सकें तब सम्मान की आशा क्यों करते हैं?
दरअसल आज के समय सबसे अधिक सुखी व्यक्ति वही है जो स्वतंत्रता पूर्वक सोचता और रहता है। वरना तो लोगों का मान, सम्मान तथा स्वाभिमान अपने से अधिक अमीर के यहां गिरवी है। सभी के ऊपर कोई न कोई है। अगर ऐसा न हो तो अमीर लोग क्यों मंदिरों में जाकर मत्था टेकते हैं।
कई बार मंदिरों में ऐसे लोगों को देखकर आश्चर्य होता है जिनके पास धन और वैभव का भंडार है पर वह मत्था टेकने वहां आते हैं। तब मन में ख्याल आता है कि ‘जब इस आदमी के पास सभी कुछ है फिर यह यहां क्यों आता है?’ तय बात है कि उनके पास मन की शांति नहीं है। यही मन की शांति जिसके पास है वही सबसे अधिक धनी है।
कहते हैं न कि आप बिस्तर खरीद सकते हो पर नींद नहीं! भोजन खरीद सकते हो पर भूख नहीं। मकान खरीद सकते हो पर आनंद नहीं। यह एक विचारणीय बात है। अंतिम सत्य यह है कि अगर आपको नींद अच्छी आती है, खाना जैसा भी मिले पच जाता है और जहां बैठे हैं वही आराम मिल रहा है तो फिर किसी प्रकार की अन्य अमीर रूप की कल्पना नहीं करें क्योंकि अमीर होने पर ऐसे सुख विदा भी हो जाते हैं। इस पर कहीं कर्जे ले लिये तो फिर जिंदगी भी दांव पर लग सकती है।
 इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां
ऊंची इमारत में माचिस जैसा
बड़ा खरीदने में डर लगता है।
रोज चढ़ूंगा सीढ़ियां
सिर पर कर्जे का बोझ लेकर
यह डर सताता है
ब्याज भी शत्रु जैसा नजर आता है
किश्तों में डूब न जायें
जिंदगी की किश्ती
भंवर सामने आता लगता है।
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12/19/09

कायर और कातिल-हिन्दी व्यंग्य कविता (kayar aur katil-hindi vyangya kavita)

 बंदूक बनाने वाले को

उसके विक्रय सलाहकार ने

बिक्री बढ़ाने का

मशविरा कुछ इस तरह दिया

‘शहर भर के कातिलों और लुटेरों को

अपनी बंदूकें इस्तेमाल के लिये

मुफ्त प्रदान कर दो,

चाहो तो कमीशन से भी उनका मुंह भर दो,

उनको अपना पेशा तो उनको करना है,

किसी तरह पेट भरना है,

जहां वारदात  होगी,

तुम्हारे बंदूक के इस्तेमाल की भी खबर होगी,

मुफ्त में विज्ञापन हो जायेगा,

हर कायर अपनी सुरक्षा के लिये

तुम्हारी बंदूक खरीदने आयेगा।

कत्ल और लूट की एक वारदात में

एक बंदूक का इस्तेमाल होगी

पर तुम्हारे यहां लाखों का सौदा चला आयेगा।।’’
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