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6/23/09

अधंविश्वासों ने धार्मिक आधार को कमजोर किया है-आलेख

एक मित्र ब्लाग लेखक सुरेश चिपलूनकर ने कल कुछ फोटो बनारस शहर और गंगा नदी के भेजे। वह हिंदी ब्लागजगत के सक्रिय लेखक होने के साथ दूसरों से सतत संपर्क रखने की कला में भी सिद्ध हस्त हैं और अक्सर ऐसे फोटो और वेबसाईटें ईमेल पर भेजते रहते हैं जो वैचारिक और चिंतन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है। कल उनके फोटो के साथ इस बात का भी जिक्र था कि हिंदू धर्म के पवित्र माने जाने वाले बनारस और गंगा नदी में कितना कचड़ा दिखाई देता है। मेरा कभी बनारस जाना नहीं हुआ पर उसके बारे मेंे सुनता रहता हूं। अनेक लोग भी इस बात की चर्चा करते हैं कि वहां गंगा में अब प्रदूषण बहुत है। कहने को इसके लिये लोग अनेक कारण बतायेंगे पर सच बात तो यह है कि इसके लिये अंध श्रद्धालू भी कम जिम्मेदार नहीं है। हिंदू अध्यात्म विश्व का सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है पर यह भी उतना ही सच है कि सर्वाधिक अज्ञानी और अंधविश्वासी भारत में ही हैं और इसी कारण भारत के अधिकतर शहर और नदियों की पवित्रता पर विष की चादर बिछ गयी है। देखा जाये तो मंदिर केवल इसलिये बने ताकि लोग एक समूह में आकर वहां सत्संग और कीर्तन कर सकें पर अंधविश्वासों और अज्ञान की वजह से लोगों ने उनको वह कूंआं मान लिया जहां से पुण्य भरकर अपने साथ स्वर्ग ले जाया सके। अपने दैहिक कचड़े को वहां छोड़कर वह यह मान लेते हैं कि वह पवित्र हो गये। उनके उस कचड़े से दूसरे आने वाले श्रद्धालू उनको कितना कोसते हैं और उसका पाप उनके सिर ही आता है यह वह भूल जाते हैं।
पहले उन फोटो की बात करें। उनमें दिखाया गया था कि बनारस की सड़कों पर भारी कचड़ा जमा था। गंगा नदी में लाशें तैर रहीं थीं। कई जगह रेत में तो हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। लाशें देखकर अच्छा खासा आदमी डर जाये। उनको कुत्ते खा रहे थे। कई जगह कौवे उन पर बैठे थे। कई लाशें जलने को तैयारी थी तो पास में लोग नहाते हुए दिख रहे थे। कटे हुए बालों के झुंड वहां जमा थे। यह दृश्य देखकर हृदय से भक्ति करने वाले किसी भी आदमी का मन दुःखी हो सकता है। शरीर के बाल, पुराने जूते और कपड़े मंदिरों या तीर्थों पर जाकर फैंकना किस धर्म का हिस्सा है यह कहना कठिन है क्योंकि जिन ग्रंथों को हिंदू धर्म का आधार माना जाता है उनमें ऐसी कोई चर्चा नहीं है।
यह समस्या केवल बनारस तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के अनेक सिद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों मेेंं ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि हम अपने एक मित्र के साथ स्कूटर पर अपने ही शहर से तीस तीस किलोमीटर दूर एक प्रसिद्ध मंदिर गया। वह भी पवित्र दिन था और मित्र ने आग्रह इस तरह किया कि हमने सोचा चलो हम भी हो आते हैं। वहां जाकर अपना ध्यान भी लगायेंगे और घूमना भी हो जायेगा।

मंदिर पहाड़ी पर था और रास्ते में खेत खलिहान और तालाब देखकर बहुत अच्छा लगा। शहर से दूर ताजी हवा वैसे भी मन को प्रभावित करती है। जब उस मंदिर के निकट पहुंचे तो बहुत भीड़ थी। वैसे उस मंदिर पर भीड़ इतनी नहीं होती पर उस दिन खास दिन था इसलिये आवाजाही अधिक थी। हमने मंदिर से दो किलामीटर स्कूटर रखा-उसको रखने के पांच रुपये दिये क्योंकि ऐसे मौके पर भी भक्तों के साथ कोई रियायत नहीं होती। हम दोनों पैदल पहाड़ी पर चढ़ने लगे। वहां किनारे नाईयों के पास अपने बाल कटवाने वाले लोगों का झुंड लगा हुआ था। किनारे के दोनेां और पड़े बालो के झुंड किसी का मन खराब करने के लिये काफी थे। हम चलते गये तो आगे देखा कि लोग पुरानी चप्पलें वहीं छोड़ गये थे जो कई बार हमारे पैरों में बाधा पैदा कर देती थी। मंदिर पहुंचे तो लंबी लाईन लगी थी। हमने अपने मित्र से कहा कि इस धूप में इतनी देर लाईन में खड़े होना हमारे लिये संभव नहीं हैं। हम तो कभी दोबारा आकर दर्शन कर लेंगे।’
मित्र भी निराश हो गया था पर चलते चलते वह पता नहीं मंदिर से पचास मीटर पहले ही लाईन के बीच में लग गया हम उससे उस समय थोड़ा दूर थे। तब हम मंदिर के पास ही एक टैंट के में अपने बैठने की जगह तलाशने लगे। वह एक मैदान था। वहां बालों, पुराने कपड़ों और चप्पलों के बीच खड़ा होकर हम सोचने लगे कि ‘भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान’ में आखिर ऐसा कहां संदेश मिलता है कि धार्मिक स्थानों को अपने अंधविश्वासों से अपवित्र बनाया जाये। एक तो गर्मी फिर वहां के इस दृश्य ने हमें नरक के दर्शन कराकर पीड़ा ही दी और जब तक मित्र बाहर नहीं आया उससे झेलते रहे। एक बार तो गुस्सा आया कि लोगों से कहैं कि ‘यह कौनसा भक्ति करने का तरीका है।’ पर फिर सोचा कि जिस अध्यात्मिक ज्ञान की बात हम करेंगे उसके बारे में यह अधिक बतायेंगे। यहां कई ऐसे ज्ञानी हैं जिनको कबीर,तुलसी और सूर के दोहे जुबानी याद हैं पर अंधविश्वास की धारा में वही सभी से अधिक बहते हैं।
अगर पूरे बाल कटवा दिये जायें तो दिमाग को तरावट होती है। नये कपड़े या जूते पहने से भी देह को सुखद अनुभूति होती है। अगर किसी पवित्र स्थान पर जाकर ऐसी अनुभूति की तो कोई चमत्कार नहीं है पर उसको सिद्धि से जोड़ना भ्रम है। मंदिर निर्माण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य में सामुदायिकता की भावना का विकास करना है और उसमें सिद्धि और प्रसिद्धि को विचार तो केवल प्रचार या विज्ञापन ही है। जो लोग वहां अपनी गंदगी का त्याग करते हैं वह कहां जायेगी? इस पर कोई नहीं सोचता। अनेक लोग मंदिरों में केवल मत्था टेकने जाते हैं उनके लिये इस प्रकार की गंदगी वहां नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करती है।

चिपलूनकर जी ने ईमेल के ऊपर ही लिख दिया था कि अंधभक्ति और कमजोर दिलवाले इसे नहीं देखें। बहरहाल हमने फोटो देखे और इस बात को समझ गये कि वह कहना क्या चाहते हैं? उन फोटो को यहां दिखाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह एक व्यापक विषय है कि हम अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर अंधविश्वासों का बोझ कम तक ढोते रहेंगे? अक्सर देश की संस्कृति और संस्कार बचाने की बात करने वाले आखिर इस अंधविश्वास से आंखें बंद कर क्यों अपने अभियान चलाते हैं? आम पाठक शायद न समझें पर ब्लाग जगत पर सक्रिय ब्लाग लेखक यही कहना चाहेंगे कि यह सवाल तो सुरेश चिपलूनकर जी से ही किया जाना चाहिये। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि सुरेश चिपलूनकर जी परंपरावादी लेखकों के समूह के सदस्य हैं पर हम ऐसा नहीं मानते। उनकी उग्र लेखनी से निकले आलेखों पर सभी लाजवाब हो जाते हैं और जो विरोध करते हैं तो भी उनके तर्क कमजोर दिखते हैं। सच बात तो यह है कि सुरेश चिपलूनकर न केवल अंध विश्वासों के विरोधी है बल्कि उनके कई पाठ धर्म के नाम पर पाखंड के विरुद्ध लिखे गये हैं। उन्होंने अपने ही उज्जैन शहर के मंदिर पर हो रहे पाखंड और भ्रष्टाचार का उल्लेख अपने पाठ में लिया था। उनके इन प्रहारात्मक लेखों से लोग इसलिये भी प्रभावित होते हैं। उन्हें परंपरावादी लेखक तो हम नहीं मानते बल्कि आधुनिक विचाराधारा के परिपक्व श्रेणी के लेखकों में गिनती करते हैं।
प्रसंगवश परंपरपादी और प्रगतिशील लेखकों की बात भी कर लें। दोनों में कोई अधिक अंतर नहीं है। प्रगतिशील भारत के अंधविश्वासों को निशाना बनाते हुए यहां के समग्र चरित्र पर प्रहार करते हुए विदेशी विचारधाराओं की बात करते हैं जबकि परंपरावादी लेखक अपने पुराने ज्ञान को ही प्रमाणिक मानते हैं और अपने अंधविश्वास और पाखंड से बचते हैं। प्रगतिशील और परंपरावादियों से अलग ऐसे आधुनिक लेखक भी हैं जो अपने पुराने अध्यात्म को प्रमाणिक मानते हुए अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार करने का अवसर नहीं चूकते और यही कारण है कि यह तीसरा वर्ग ही भारत में परिवर्तन के लिये जूझता दिखता है। सच बात तो यह है कि कर्मकांडों का आधार स्थानीय होता है और उनका धर्म से संबंध केवल इसलिये दिखता है क्योंकि देश के अधिकतर लोगों के धार्मिक इष्ट एक ही है। कई जगह एक त्यौहार जिस तरह से मनाया जाता है तो दूसरी जगह दूसरे ढंग से। उसी तरह जाति से भी त्यौहार मनाने के तरीके से भिन्नता का आभास होता है। अगर हम कुल निष्कर्ष निकालें तो केवल अध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर ही सभी एक हैं कर्मकांडों में विरोधाभास है और वह धर्म का आधार कतई नहीं लगते। यह अलग बात है कि पहले पुराने और अब आधुनिक बाजार ने अपनी कमाई के लिये कर्मकांडों को ही धार्मिक आधार बना दिया है। सच बात तो यह है कि अंधविश्वासों की वजह से धर्म बदनाम ही हुआ है और पराये क्या अपने ही लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। भारत के अनेक महापुरुषों में पाखंड और अंधविश्वास से दूर रहने का संदेश दिया है और उनके कृतित्व का ही नतीजा है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है। शेष फिर कभी
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8/24/08

आज है जन्माष्टमी का पावन पर्व

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव आज मनाया जा रहा है। जिन लोगों की श्रीगीता में श्रद्धा है वह श्रीकृष्ण के नाम आते ही पुलकित हो जाते हैं। भारतीय अध्यात्म की आधार स्तंभ श्रीगीता का ज्ञान का महत्व वर्णनातीत है पर उसे अगर ज्ञान प्राप्ति के ध्येय और भक्ति भाव से पढ़ा जाये तो वह इतना सहज है कि कुछ समझने की आवश्यकता ही नहीं होती स्वतः आत्मसात होता है। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा और भक्ति भाव से श्रीगीता का अध्ययन करने पर यह ज्ञान मनुष्य के अंदर इस तरह आत्मसात हो जाता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि वह ज्ञानी हो गया है और लोग उसके आचार,विचार और व्यवहार देखकर उसे ज्ञानी या योगी कहना शुरू कर देते है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के ज्ञान की चर्चा केवल अपने भक्तों में करने का संदेश इस तरह दिया है कि आत्मसात ज्ञान होने पर भी ज्ञानी कहीं अन्यत्र इसकी चर्चा चाहकर भी नहीं कर पाते।

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र की महिमा का बखान कोई मनुष्य अपने जीवनकाल में नहीं कर पाता। फिर भी भक्तों के मन में कहीं न कहीं अपने इष्ट को लेकर ऐसा भाव रहता है कि उनका नाम कहीं आने पर उनकी वाणी से उनके महत्व का बखान हो ही जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भारतीय अध्यात्म को श्रीगीता में एक ऐसा अक्षण्ण ज्ञान दिया कि वह इस धरती के जीवन धारण होने तब वह प्रासंगिक रहेगा। आखिर ऐसा क्या है उनके ज्ञान में जो सदियों बाद भी प्रासांगिक लगता है। इसका उत्तर यह है कि जीवन और प्रकृति के रहस्यों का सत्य है जो कभी बदल नहीं सकता। क्योंकि यहां आदमी के देह के उपयोग में आने वाली वस्तृऐं, चक्षुओं से दिखने वाले दृश्य,कानों से सुनने वाले स्वर,नाक में प्रवेश करने वाली गंधों, और हाथ से स्पर्श करने रूपों में परिवर्तन आ सकता है पर उसकी देह के मूल तत्व और उसके संचालन की प्रकृति में बदलाव नहीं हो सकता।
विश्व गुरू कहलाने के बावजूद हम भारतवासी भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त ज्ञान से बहुत दूर जा रहे हैं। ठीक विपरीत दिशा में। उसमें जो वर्णित ज्ञान है उसके अक्षरों पर हम इतराते हैं पर उसका अनुसरण करना तो दूर उसका अर्थ तक नहीं समझते। हमें अपने पावन ग्रंथों के सत्य संदेशों पर अहंकार ने कभी उनके ज्ञान की तरह फटकने भी नहीं दिया। सच है अहंकार न केवल भक्ति में बल्कि ज्ञान प्राप्त करने में भी बाधक होता है।

भगवान श्रीकृष्ण जी के मंदिरों पर तमाम तरह के कार्यक्रम कर या श्रीगीता को दिखाने के लिये सिर से लगाकर दिखावे की भक्ति करना आसान है पर उससे जीवन में कोई लाभ मिल जाये यह संभव नहीं है। अगर ऐसा होता तो तमाम तरह के ऐश्वर्य अर्जित करने वाले लोग अपनी शांति के लिये मंदिरों में नहीं जाते। वहां के सेवक ऐसे वैभवशाली लोगों के साथ विशिष्टता का व्यवहार कर अपने को कृतार्थ अनुभव नहीं करते। ऐसे अनेक दृश्य सच्चे भक्तों के सामने आते हैं और वह इस पर हंसते हैं। मायापति मंदिर में शांति के लिये जा रहा है और कथित अध्यात्मपति उसका वहां प्रवेश देखकर शांति पा रहा है। यह ढोंग कुछ देर तक किया जा सकता है पर अधिक देर नहीं चल पाता। लोगों के पास बृहद मात्रा में माया आ रही है। इतनी कि कोई भी उनका मुकाबला नहीं कर सकता मगर उनके मन में शांति नहीं है।
हां, शांति कोई बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं हैं। उसे अर्जित करने का उपाय श्रीगीता में हैं पर कोई चलना नहीं चाहता। जिन लोगों ने भगवान श्रीकृष्ण की निष्काम भाव से भक्ति की या श्रीगीता का ज्ञान आत्मसात किया वह मंदिरों या आश्रमों में चक्कर लगाने की बजाय जहां होते हैं वहींं उसका स्मरण करते हैं। उनको समय या दिन की परवाह नहीं रहती।
कहते हैं कि पूरा विश्व विकास के पथ पर है। यह बात कहने पर अनेक वैज्ञानिक और सामाजिक विद्वान हंसते हैं। पर्यावरण प्रदूषण, लोगों का संताप और हिंसा का तांडव बढ़ता ही जा रहा है। अनेक लोग अब इस युग में नये अवतार की चर्चा करते हैं। जबकि कुछ भक्त मनीषी कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मैंने मनुष्यों को सारा अध्यात्मिक ज्ञान दे दिया है और अब यहां अवतार नहीं लूंगा। सच क्या है कोई नहीं जानता पर श्रीगीता का ज्ञान एक संपूर्ण ज्ञान है इसमें संदेह नहीं है।
वैसे तो आज के युग में धर्म प्रचार भी व्यवसाय हो गया है पर ऐसा तो हमारे यहां प्राचीनकाल से हो रहा है। पावन धर्मग्रंथों को पढ़ने वाले उतना ही ज्ञान अपने भक्तों को सुनाते हैं जितने से वह उनका अनुयायी बना रहे। अगर संपूर्ण ज्ञान दे देंगे तो फिर तो भक्त तो भगवान की भक्ति में लीन हो जायेगा और फिर क्यों अपने गुरू के पास हर बार दक्षिणा लेकर जायेगा। इस प्रकार धर्म प्रचार का यह व्यापर सदियों से यहां चला आ रहा है।

अहिंसा का व्यवहारिक संदेश तो श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र से ही मिलता है। महाभारत युद्ध के बाद गांधारी ने उनको परिवार समेत नष्ट होने का शाप दिया। उन्होंने उसे सहजता से ग्रहण किया। दुर्योधन को छल से मारने के लिये भीमसेन को उन्होंने ही प्रेरित किया था। देखिये उनकी लीला एक बहेलिये के तीर को उन्होंने अपने पांव आने दिया जो कि उसने धोखे उनके पांव की तरफ छोड़ा था। वह तो परमात्मा थे पर उन्होने परमधाम जाने से पहले अपनी वाणी से नहीं बल्कि अपने कर्म से यह संदेश दिया कि अहिंसा ही मनुष्य के लिये सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। महाभारत युद्ध के समय उन्होंने श्री अर्जुन से कहा कि तू हिंसा मेरे लिये कर। समझ ले तू यह सब मेरे लिये कर रहा है।’

उन्होंने सारी हिंसा के दुष्कर्म के प्रायश्चित के लिये उस बहेलिये का तीर अपने पांव पर लिया। अपने इस कर्म का प्रायश्चित कर उन्होंने यही संदेश दिया कि अंहिंसा ही वह मार्ग है जिस पर मनुष्य को चलना चाहिए। महाभारत युद्ध के समय निहत्थे रहने की शपथ को निभाया। युद्ध की समाप्ति पर उन्होंने अर्जुन को रथ से उतारा और फिर स्वयं नीचे आये और वह आग से जलकर नष्ट हो गया। तब उन्होंने बताया कि विपक्षी योद्धाओं के अस्त्र शस्त्र के प्रहार से वह रथ तो कभी का नष्ट हो गया था और केवल उनके योगबल पर ही वह चल रहा था। श्रीकृष्णजी चाहते तो उस रथ को हमेशा के लिये बचा सकते थे पर वह जानते थे कि लोग फिर इसी रथ को चमत्कारी मानकर इसके आसपास घूमते रहेंगे। उनका इस कार्य में अप्रत्यक्ष रूप से निरंकार और निर्गुण परमात्मा की उपासना करने का संदेश था। उनके दिव्य चरित्र का वर्णन करने वाले कथित साधु संतों ने हमेशा ऐसे संदेशों की उपेक्षा की क्योंकि इससे उनके अनुयायी उनके आकर्षण में नहीं फंसते। उनके बाद तो श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार करने वालों की बाढ़ आ गयी मगर वह सब सकाम भक्ति को ही मानते थे। देखा जाये तो मूर्तिपूजा हमारे अध्यात्म का भाग नहीं है पर उसे अपनाया गया है केवल इसलिये कि उससे अपने आपको भक्त मानने में सुविधा होती है। मूर्तिपूजा करना चाहिये और अपने मस्तिष्क में धारण कर फिर निरंकार की तरफ ध्यान लगाना चाहिए। न कि केवल मूर्तिपूजा कर उसे संपूर्ण भक्ति मान लेना चाहिए। ध्यान लगाकार साकार से निराकार की तरफ जाने का प्रयास करना चाहिए। यह ध्यान ही हमारी ताकत है।

भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र दिव्य है पर उनके मार्ग का अनुसरण करना कोई कठिन काम नहीं जितना बताया जाता है। केवल अपने अंतर्मन में संकल्प की आवश्यकता है। अगर भगवान श्री कृष्ण का नाम हृदय से लिया जाये तो यह संकल्प अपने आप आ जाता है। बस इन पंक्तियों के साथ ही इस आलेख को यही समाप्त करते हैं। उनका स्वरूप तो अत्यंत्र विशाल है और हर दिन उनका है और आगे हम उनके विषय पर चर्चा करेंगे। इसी ब्लाग पर। समस्त ब्लाग लेखकों और पाठकों को इस अवसर पर हार्दिक बधाई। जय श्रीकृष्ण
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