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7/17/10

अपराधों में वर्गीकरण करना ठीक नहीं-हिन्दी लेख (apradh aur kanoon-hindi lekh)

पिछले कई दिनों से देखा गया है कि जब भी कोई नया सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक विवाद प्रचार माध्यमों में चर्चा क्रे लिये लगातार आता है तो उस पर नियंत्रण करने के लिये कानून बनाने की मांग उठत्ी और कई विषय पर कानून बना भी दिया जाता है। ऐसा लगता है कि कानून बनाने की मांग करना या बनाना भी लोकप्रियता का माध्यम बन गया है। मुख्य बात यह है कि कानून का लागू करने वाली संस्थाओं को मजबूत बनाने की बात पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
भारत में कानून लागू करने वाली सबसे बड़ी संस्थाओं में स्थानीय पुलिस को माना जाता है और अगर समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपे समाचारों पर यकीन करें तो अनेक जगह पुलिस बल की कमी के अलावा उसके पास आधुनिक साधनों की कमी की शिकायतें मिलती हैं। हम यहां भूल जाते हैंे कि अगर पुलिस बल और उसके अधिकारी अपने ऊपर काम का अधिक बोझ तथा साधनों की कमी अनुभव करेंगे तो अपराधों से निपटने की उनकी क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा। समस्या यही नहीं है कि पुलिस अपनी ढांचागत समस्याओं के चलते मामलों से निपट नहीं पा रही बल्कि देश की कागजी कार्यवाही पर आधारित कार्यप्रणाली भी पुराने ढर्रे पर चल रही है और उससे कानून को असरकार ढंग से लागू करना मुश्किल हो रहा है यह बात समझनी होगी।
इधर सम्मान के लिये हत्या तथा कन्याओं के साथ घर में अन्याय को लेकर कानून बनाने की मांग के साथ विचार भी चल रहा है। समझ में नहीं आता कि आखिर इस देश में सोच का अकाल क्यों पड़ गया है? देश की व्यवस्था चलाना मजाक नहीं है पर लगता है कि इसे गंभीरता से भी नहीं लिया जा रहा। हर जरा से विवाद पर कानून बनाने का फैशन देश के संविधान के प्रति नयी पीढ़ी में विश्वास कम कर सकता है।
जहां तक चर्चित विवादों के चलते उससे संबंधित विषय पर कानून बनाने की मांग करना या बनाना लोकप्रियता प्राप्त करने का साधन लगता है पर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, आतंकवाद तथा आर्थिक विषमतओं के कारण अपनी निजी समस्याओं से जूझ रहे लोग इससे अधिक खुश होते। उनके निजी जीवन के संघर्ष इतने दुरूह हो गये हैं कि इनकी तरफ उनका ध्यान नहीं जाता। इसके अलावा जो जागरुक लोग हैं वह देश की हालत देखते हुए इस बात को समझते हैं कि यह कानून होने या न होने से अधिक उसे लागू करने का विषय है।
सम्मान के लिये हत्या या कन्याओं को घर में परेशान करने जैसे विषय गंभीर है। देश में स्त्रियों की दशा सदियों से ही खराब है और उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। यह कानून से अधिक समाज सुधारकों के लिये शर्म की बात है और देश में सक्रिय धर्म प्रचारकों के लिये तो डूब मरने वाली बात है जो यहां महापुरुष होने का दावा करते हैं।
कहने का आशय यह है कि समाज की समस्याओं के लिये कानून कम उसके शिखर पुरुष अधिक दोषी है जो समय समय पर अपने अपने सामाजिक समूहों को अपने लाभ के लिये एकत्रित करते हैं और मतलब निकलते ही उसे अपने हाल में छोड़ देते हैं।
हमारे देश में दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा जैसे कानून बने और समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा अन्य प्रचार माध्यमों में अक्सर इस तरह की चर्चा होती है कि इसका दुरुपयोग हुआ है। इतना ही इसमें निर्दोष पुरुष परेशान हुए और दोषियों का बाल बांका भी न हुआ है। आतंकवाद के लिये यह कानून तो देर से बना कि अपराधी अपने को निर्दोष साबित करे दहेज एक्ट में इसका प्रावधान पहले ही कर दिया गया था। निर्दोष लोग परेशान हुए क्योंकि वह सामान्य वर्ग के थे जो बचे वह ऊंचे वर्ग के थे पर यह बात केवल इसी कानून को लागू करने के बारे में नहीं बल्कि हर अपराध में ऐसा ही देखने में आता है।
इधर कुछ घटनायें ऐसी हुई है कि अपने परिवार या समाज की मर्जी के खिलाफ विवाह करने वाली युवतियों की उनके अपने लोगों ने ही हत्या कर दी। आजकल ऐसे समाचार खूब छाये हुए हैं और इस पर कानून बनाने की मांग हो रही है। सवाल यह है कि क्या वर्तमान कानून के चलते इससे निपटना कठिन है?
शायद नहीं! किसी की हत्या करना अपराध है, और इसके लिये अलग से कानून बनाने की कहना ही अपनी सोच के संकीर्ण होने का प्रमाण है। हत्या के प्रकरण में जमानत बड़ी कठिनाई से होती है। हत्या चाहे किसी की भी हुई हो और किसी ने भी की हो उससे निपटने के लिये अलग से कानून बनाने की आवश्यकता इतनी नहीं लगती जितनी प्रकरण से सक्षमता से निपटने की।
महिलाओं के लिये दहेज एक्ट जैसा कानून किसलिये बना? दहेज लेना देना दोनों ही जुर्म है और अनेक प्रकरणों में लड़कियों के माता पिता स्वीकार करते हैं कि उन्होंने दहेज दिया? क्या वह कानून से परे हैं जो उन पर कार्यवाही नहीं की गयी। कन्या भ्रुण हत्या का कानून बना पर उसकी धज्जियां उड़ते हुए सभी ने देखी हैं। सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीना वर्जित कानून में किया गया पर क्या उसे रोका जा सका।
एक बात निश्चित है कि कानून में हत्या, बेईमानी, डकैती तथा ठगी जैसे अपराध रोकने के लिये पर्याप्त प्रावधान है। इसलिये अपराधों में वर्गीकरण करने की बात समझ में नहीं आती। यह अलग बात है कि हमारे देश के प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी वर्ग अपराधों में जाति, भाषा, धर्म, तथा क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों से सोचते हैं पर उनके कहने पर व्यवस्था चलाने को मतलब है कि अंधेरे कुंऐ में देश को ढकेलना। सच तो यह है कि दौलत, शौहरत और बाहुबलियों के बंधुआ बुद्धिजीवी केवल रुदन कीर्तन के अलावा कुछ नहीं करते क्योंकि उनके पास अपनी सोच नहीं है। इसलिये कानून बनाने और उसे लागू करने के विषय में व्यवहारिक ज्ञान के साथ काम करना चाहिए।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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6/23/09

अधंविश्वासों ने धार्मिक आधार को कमजोर किया है-आलेख

एक मित्र ब्लाग लेखक सुरेश चिपलूनकर ने कल कुछ फोटो बनारस शहर और गंगा नदी के भेजे। वह हिंदी ब्लागजगत के सक्रिय लेखक होने के साथ दूसरों से सतत संपर्क रखने की कला में भी सिद्ध हस्त हैं और अक्सर ऐसे फोटो और वेबसाईटें ईमेल पर भेजते रहते हैं जो वैचारिक और चिंतन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है। कल उनके फोटो के साथ इस बात का भी जिक्र था कि हिंदू धर्म के पवित्र माने जाने वाले बनारस और गंगा नदी में कितना कचड़ा दिखाई देता है। मेरा कभी बनारस जाना नहीं हुआ पर उसके बारे मेंे सुनता रहता हूं। अनेक लोग भी इस बात की चर्चा करते हैं कि वहां गंगा में अब प्रदूषण बहुत है। कहने को इसके लिये लोग अनेक कारण बतायेंगे पर सच बात तो यह है कि इसके लिये अंध श्रद्धालू भी कम जिम्मेदार नहीं है। हिंदू अध्यात्म विश्व का सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है पर यह भी उतना ही सच है कि सर्वाधिक अज्ञानी और अंधविश्वासी भारत में ही हैं और इसी कारण भारत के अधिकतर शहर और नदियों की पवित्रता पर विष की चादर बिछ गयी है। देखा जाये तो मंदिर केवल इसलिये बने ताकि लोग एक समूह में आकर वहां सत्संग और कीर्तन कर सकें पर अंधविश्वासों और अज्ञान की वजह से लोगों ने उनको वह कूंआं मान लिया जहां से पुण्य भरकर अपने साथ स्वर्ग ले जाया सके। अपने दैहिक कचड़े को वहां छोड़कर वह यह मान लेते हैं कि वह पवित्र हो गये। उनके उस कचड़े से दूसरे आने वाले श्रद्धालू उनको कितना कोसते हैं और उसका पाप उनके सिर ही आता है यह वह भूल जाते हैं।
पहले उन फोटो की बात करें। उनमें दिखाया गया था कि बनारस की सड़कों पर भारी कचड़ा जमा था। गंगा नदी में लाशें तैर रहीं थीं। कई जगह रेत में तो हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। लाशें देखकर अच्छा खासा आदमी डर जाये। उनको कुत्ते खा रहे थे। कई जगह कौवे उन पर बैठे थे। कई लाशें जलने को तैयारी थी तो पास में लोग नहाते हुए दिख रहे थे। कटे हुए बालों के झुंड वहां जमा थे। यह दृश्य देखकर हृदय से भक्ति करने वाले किसी भी आदमी का मन दुःखी हो सकता है। शरीर के बाल, पुराने जूते और कपड़े मंदिरों या तीर्थों पर जाकर फैंकना किस धर्म का हिस्सा है यह कहना कठिन है क्योंकि जिन ग्रंथों को हिंदू धर्म का आधार माना जाता है उनमें ऐसी कोई चर्चा नहीं है।
यह समस्या केवल बनारस तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश के अनेक सिद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों मेेंं ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि हम अपने एक मित्र के साथ स्कूटर पर अपने ही शहर से तीस तीस किलोमीटर दूर एक प्रसिद्ध मंदिर गया। वह भी पवित्र दिन था और मित्र ने आग्रह इस तरह किया कि हमने सोचा चलो हम भी हो आते हैं। वहां जाकर अपना ध्यान भी लगायेंगे और घूमना भी हो जायेगा।

मंदिर पहाड़ी पर था और रास्ते में खेत खलिहान और तालाब देखकर बहुत अच्छा लगा। शहर से दूर ताजी हवा वैसे भी मन को प्रभावित करती है। जब उस मंदिर के निकट पहुंचे तो बहुत भीड़ थी। वैसे उस मंदिर पर भीड़ इतनी नहीं होती पर उस दिन खास दिन था इसलिये आवाजाही अधिक थी। हमने मंदिर से दो किलामीटर स्कूटर रखा-उसको रखने के पांच रुपये दिये क्योंकि ऐसे मौके पर भी भक्तों के साथ कोई रियायत नहीं होती। हम दोनों पैदल पहाड़ी पर चढ़ने लगे। वहां किनारे नाईयों के पास अपने बाल कटवाने वाले लोगों का झुंड लगा हुआ था। किनारे के दोनेां और पड़े बालो के झुंड किसी का मन खराब करने के लिये काफी थे। हम चलते गये तो आगे देखा कि लोग पुरानी चप्पलें वहीं छोड़ गये थे जो कई बार हमारे पैरों में बाधा पैदा कर देती थी। मंदिर पहुंचे तो लंबी लाईन लगी थी। हमने अपने मित्र से कहा कि इस धूप में इतनी देर लाईन में खड़े होना हमारे लिये संभव नहीं हैं। हम तो कभी दोबारा आकर दर्शन कर लेंगे।’
मित्र भी निराश हो गया था पर चलते चलते वह पता नहीं मंदिर से पचास मीटर पहले ही लाईन के बीच में लग गया हम उससे उस समय थोड़ा दूर थे। तब हम मंदिर के पास ही एक टैंट के में अपने बैठने की जगह तलाशने लगे। वह एक मैदान था। वहां बालों, पुराने कपड़ों और चप्पलों के बीच खड़ा होकर हम सोचने लगे कि ‘भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान’ में आखिर ऐसा कहां संदेश मिलता है कि धार्मिक स्थानों को अपने अंधविश्वासों से अपवित्र बनाया जाये। एक तो गर्मी फिर वहां के इस दृश्य ने हमें नरक के दर्शन कराकर पीड़ा ही दी और जब तक मित्र बाहर नहीं आया उससे झेलते रहे। एक बार तो गुस्सा आया कि लोगों से कहैं कि ‘यह कौनसा भक्ति करने का तरीका है।’ पर फिर सोचा कि जिस अध्यात्मिक ज्ञान की बात हम करेंगे उसके बारे में यह अधिक बतायेंगे। यहां कई ऐसे ज्ञानी हैं जिनको कबीर,तुलसी और सूर के दोहे जुबानी याद हैं पर अंधविश्वास की धारा में वही सभी से अधिक बहते हैं।
अगर पूरे बाल कटवा दिये जायें तो दिमाग को तरावट होती है। नये कपड़े या जूते पहने से भी देह को सुखद अनुभूति होती है। अगर किसी पवित्र स्थान पर जाकर ऐसी अनुभूति की तो कोई चमत्कार नहीं है पर उसको सिद्धि से जोड़ना भ्रम है। मंदिर निर्माण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य में सामुदायिकता की भावना का विकास करना है और उसमें सिद्धि और प्रसिद्धि को विचार तो केवल प्रचार या विज्ञापन ही है। जो लोग वहां अपनी गंदगी का त्याग करते हैं वह कहां जायेगी? इस पर कोई नहीं सोचता। अनेक लोग मंदिरों में केवल मत्था टेकने जाते हैं उनके लिये इस प्रकार की गंदगी वहां नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करती है।

चिपलूनकर जी ने ईमेल के ऊपर ही लिख दिया था कि अंधभक्ति और कमजोर दिलवाले इसे नहीं देखें। बहरहाल हमने फोटो देखे और इस बात को समझ गये कि वह कहना क्या चाहते हैं? उन फोटो को यहां दिखाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह एक व्यापक विषय है कि हम अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर अंधविश्वासों का बोझ कम तक ढोते रहेंगे? अक्सर देश की संस्कृति और संस्कार बचाने की बात करने वाले आखिर इस अंधविश्वास से आंखें बंद कर क्यों अपने अभियान चलाते हैं? आम पाठक शायद न समझें पर ब्लाग जगत पर सक्रिय ब्लाग लेखक यही कहना चाहेंगे कि यह सवाल तो सुरेश चिपलूनकर जी से ही किया जाना चाहिये। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि सुरेश चिपलूनकर जी परंपरावादी लेखकों के समूह के सदस्य हैं पर हम ऐसा नहीं मानते। उनकी उग्र लेखनी से निकले आलेखों पर सभी लाजवाब हो जाते हैं और जो विरोध करते हैं तो भी उनके तर्क कमजोर दिखते हैं। सच बात तो यह है कि सुरेश चिपलूनकर न केवल अंध विश्वासों के विरोधी है बल्कि उनके कई पाठ धर्म के नाम पर पाखंड के विरुद्ध लिखे गये हैं। उन्होंने अपने ही उज्जैन शहर के मंदिर पर हो रहे पाखंड और भ्रष्टाचार का उल्लेख अपने पाठ में लिया था। उनके इन प्रहारात्मक लेखों से लोग इसलिये भी प्रभावित होते हैं। उन्हें परंपरावादी लेखक तो हम नहीं मानते बल्कि आधुनिक विचाराधारा के परिपक्व श्रेणी के लेखकों में गिनती करते हैं।
प्रसंगवश परंपरपादी और प्रगतिशील लेखकों की बात भी कर लें। दोनों में कोई अधिक अंतर नहीं है। प्रगतिशील भारत के अंधविश्वासों को निशाना बनाते हुए यहां के समग्र चरित्र पर प्रहार करते हुए विदेशी विचारधाराओं की बात करते हैं जबकि परंपरावादी लेखक अपने पुराने ज्ञान को ही प्रमाणिक मानते हैं और अपने अंधविश्वास और पाखंड से बचते हैं। प्रगतिशील और परंपरावादियों से अलग ऐसे आधुनिक लेखक भी हैं जो अपने पुराने अध्यात्म को प्रमाणिक मानते हुए अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार करने का अवसर नहीं चूकते और यही कारण है कि यह तीसरा वर्ग ही भारत में परिवर्तन के लिये जूझता दिखता है। सच बात तो यह है कि कर्मकांडों का आधार स्थानीय होता है और उनका धर्म से संबंध केवल इसलिये दिखता है क्योंकि देश के अधिकतर लोगों के धार्मिक इष्ट एक ही है। कई जगह एक त्यौहार जिस तरह से मनाया जाता है तो दूसरी जगह दूसरे ढंग से। उसी तरह जाति से भी त्यौहार मनाने के तरीके से भिन्नता का आभास होता है। अगर हम कुल निष्कर्ष निकालें तो केवल अध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर ही सभी एक हैं कर्मकांडों में विरोधाभास है और वह धर्म का आधार कतई नहीं लगते। यह अलग बात है कि पहले पुराने और अब आधुनिक बाजार ने अपनी कमाई के लिये कर्मकांडों को ही धार्मिक आधार बना दिया है। सच बात तो यह है कि अंधविश्वासों की वजह से धर्म बदनाम ही हुआ है और पराये क्या अपने ही लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। भारत के अनेक महापुरुषों में पाखंड और अंधविश्वास से दूर रहने का संदेश दिया है और उनके कृतित्व का ही नतीजा है कि हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है। शेष फिर कभी
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5/28/09

मन को कैद करने वाले पिंजरे-आलेख

वह जो सभी तरफ दिखाया जा रहा है उसका मुख्य उद््देश्य तुम्हें भीड़ बनाना है। वह भीड़ जो समय पड़े तो उसे जाति, भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा सके। इसे बांटकर उन लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सके जिनका काम ही भीड़ पर चला करता है। बदले में भीड़ जुटाने वाले सौंपते हैं उनको तमगे, कप, उपाधियां और सम्मान। भीड़ कभी एक न हो इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया जाता है। भीड़ के एक हिस्से को इसलिये खुश किया जाता है कि दूसरा हिस्सा चिढ़े और इसकी अभिव्यक्ति के लिये साधन ढूंढे जो कि पैसे से बिकते हैं।
यह पूर्वनिर्धारित है पर लगता है कि स्वतः चल रहा है। दिखता तो यह स्वतः चलता है है पर इसका बौद्धिक ढांचा बरसों पहले से बनाया जा चुका है और इस पर नियंत्रण केवल खास लोग और उनके चाटुकारो का है। यकीन करो जो तुम कहीं भी कुछ देख और पढ़ रहे हो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर है तो वह ऐसी है जैसे किसी फिल्म की होती है-एक काल्पनिक कहानी पर जिस तरह कुछ लोग अभिनय करते हैं। लोग फिल्मों को सच मानने लगे हैं। उनमें अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को महानायक और महानायिका बना देते हैं। हालत यह है कि पर्दे का खलनायक भी बाहर नायक की तरह सम्मान पाता है और उसके बारे में कहते हैं कि ‘वह तो एक आम इंसान है।’ मगर नायक का पात्र तो महानता की उपाधि पाता है।

तयशुदा पात्र हैं। कोई हंसता दिख रहा है कोई रोता। फिल्म की तरह समाचार हैं और समाचार ही फिल्म बना रहे हैं। आजकल नई सभ्यता है। पहले तो राहजन हथियारों की दम पर लूट लेते थे पर इस नई सभ्यता में हिंसा वर्जित है क्योंकि आदमी की बुद्धि को तमाम तरह की लालच देकर और काल्पनिक सुख दिखाकर भ्रमित किया जा सकता है और मन के स्वामी होने की वजह से मनुष्य कहलाने वाला जीव बिना किसी रस्सी और जंजीर के पशु बनकर जिस आदमी के पास काल्पनिक रस्सी है उसके पीछे चला जाता है।

जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनको कुछ नहीं करना बस इंसानी मन को पकड़ लेने वाले पिंजरे-फिल्म,टीवी चैनल, अखबार और अंतर्जाल-पर कब्जा करना है। वहां से उसे समयानुसार भड़काने, बहलाने, और हड़काने वाले संदेश, समाचार, कहानियां और कविताओं का प्रसारण करना है। सारे दृश्य काल्पनिक और पूर्व रचित हैं। सर्वशक्तिमान ने यह सृष्टि रची है पर बाकी सब तो उसने इस धरती पर विचरने वाले जीवों पर छोड़ दिया है पर फिर भी ऐसे लोग हैं जो ‘भाग्य का खेल है’ या ‘जैसा
उसने रचा है’हमें देखना है जैसे जुमले कहते हैं पर उनके मन में यही है कि हम ही सब कर रहे हैं। दूसरे को दृष्टा बनने का उपदेश देने वाले लोग स्वतः ही अपनी अंर्तज्योति बुझी होने के कारण भीड़ की तरह हांके जा रहे हैं पर इसे नहीं जानते।

बिल्कुल उत्तेजित मत हो! यकीन करो यह योजना है एक व्यापार की। तुम जिन दृश्यों से चिढ़ते हो उनसे मूंह फेर लो। जिन शब्दों से तुम आहत होते हो उनको पढ़ना या सुनना भूल जाओ। जिन लोगों से तुम्हें दुःख मिलता है उनको याद भी मत करो। तुम उन समाचारों पर ध्यान न देते हुए उनकी चर्चा से दूर हो जाओ जिनसे कष्ट पहुंचता है। यह दृष्टा बनना ही है और फिर देखो उन लोगों का खेल! वह जो तुम्हें हड़काते हैं वह स्वयं ही हडकते नजर आयेंगे। वह जो तुम्हें झूठे खेल से बहला रहे हैं पर खुद दहलने लगेंगे। तुम जिन दृश्यों और समाचारों को सत्य समझ कर विचलित होते हुए उन पर बहसें करते हो उनके पीछे के सच पर जब विचार करने लगोगे तो तुम्हें हंसी आयेगी। जो बाजार में बिक रहा है या दिख रहा है-वह आदमी
हो याशय-उसका मूंह तुम्हारी जेब की तरफ है। जैसे पहले बहुरूपिये दिल बहलाकर पैसे ले जाते थे पर अब उनको आने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तुम्हारे घर में पर्दे सजा दिये हैं। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम्हारा पैसा कैसे उनके पास जा रहा है।

वह तुम्हारा ध्यान किसी चेहरे की तरफ खींचे-चाहे वह हीरोईन का चेहरा हो या सर्वशक्मिान के किसी रूप का-तुम उसे मत देखो और आंखें बंद कर भृकुटि पर नजर रखो। वह तुम्हें संगीत सुनायें तुम ओम शब्द का जाप करने लग जाओ। वह फिल्म चर्चा करें तुम गायत्री मंत्र का जाप करने लगो। अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र अपने अंदर रखो। बाहर कोई सुने यह जरूरी नहीं। बस तुम अपने को सुनना शुरु कर दो। अपने को पढ़ो। अपने सत्य कर्म को देखो दूसरे के अभिनय में रुचि रखने से तुम्हारे मन को शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने शोर मचा रखा है तुम शंाति अपने अंदर ढूंढो। कहीं दूसरे से सुख और मनोरंजन की आस तुम्हें कमजोर बना रही है। अपने मन में अपने लिये ख्वाब और सपने देखो उसने दूसरे पिंजरे में मत फंसने दो।
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2/27/08

आदमी की पहचान का प्रश्न-हिन्दी आलेख

प्रत्येक आदमी की जो पहचान है वह उसकी जाति, धर्मा, भाषा, क्षेत्र से है और हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते। यह पहचान आखिर छिपाई कैसे जा सकती है? कहीं किसी विशेष पहचान के लोगों की बहुतायत है तो वहाँ अल्पसंख्या वाले अपने को कमजोर अनुभव करते हैं और कभी उनको इसके लिए जलील भी होना पड़ता है। इस पर तमाम तरह के बुद्धिजीवी लोग अपने ख्याल रखते हैं-'ऐसा नहीं होना चाहिए' 'यह ग़लत है' और 'इस अन्याय को रोकना चाहिए'। इसके साथ ही बड़ी-बड़ी बहस होती हैं। मगरा नतीजा धाक के तीन पात। ऐसे विवाद कोई किसी एक देश में होते हैं यह बात नहीं बल्कि ऐसे संघर्षों से पूरी दुनिया का इतिहास भरा पडा है।


बहस करना विचार व्यक्त करना अलग बात है और समस्या के हल के लिए ईमानदारी से काम करना अलग बात है। हम हर पहचान के आदमी को सम्मान देने की बात तो करते हैं पर क्या वह पहचान किसी वास्तविक धरातल पर दिखाईं देती हैं? कभी इस पर विचार नहीं करते। आख़िर हम अपनी दूसरों की पहचान को देखते ही क्यों हैं? कोई अमुक, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र का आदमी है-इस बात पर नज़र डालते ही क्यों हैं? हम तय कैसे करते हैं और कोई हमारे बारे में कैसे तय करता है? हम परंपरा से अलग होकर यह क्यों नहीं कहते कि यहाँ किसी को उसकी वर्त्तमान रूप में प्रचलित पहचान से नहीं देखा जाना चाहिए। जब तक अपनी और दूसरों की वर्तमान प्रचलित पहचान के साथ चलेंगे तब तक समाज में विवाद और फ़साद कम नहीं होंगे। विश्व के किसी इलाक़े में बहुसंख्यक पहचान वाले अपने समूहों से कम त्रस्त नहीं होते पर उनका गुस्सा जब सामूहिक रूपसे उतरता है को उसका सबसे अधिक शिकार पृथक पहचान वाले अल्प संख्या वाले लोगों के समूह बनते हैं-पर इसमें आम आदमी नहीं बल्कि उन लोगों के समूह प्रमुख जिम्मेदार होते हैं क्योंकि जब अपने सदस्यों पर नियंत्रण नहीं रख पाते तब वह उनका ध्यान बंटाने के लिए ऐसे विवाद खड़े करते हैं ताकि अपने नेतृत्व की कमी छिपाने के लिए लोगों का ध्यान कहीं ओर लगाया जाये।हम कहते हैं कि लोगों को उसकी प्रचलित पहचान से मत देखो तो सवाल है की जब हम सबके मन में है यानि हमारे खून में है तो उससे अलग कैसे हुआ जा सहकता है।

पहले हम पाश्चात्य विज्ञान की बात कर लें। उसके अनुसार हम जो देखते, सुनते अनुभव करते हैं वह हमारे रक्त मे स्थापित हो जाता है और जब अवसर आता है तब वह स्वत सामने आता है। किसी का चेहरा और शब्द वैसे के वैसे ही नहीं हम आत्मसात करते वरन वह हमारे शरीर में मौजूद रक्त के कणों में वह सब विलीन हो जाता है। इसका आशय यह है यह जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की पहचान हमारे खून में होती है। उसका कोई भौतिक स्वरूप हमारी देह में नहीं होता. जब कान से शब्द सुनते, आँखों से दृश्य देखते और स्पर्श से अनुभव करते हुए वह पहचान हमारी बुद्धि में आती है।

उसी तरह हमारा दर्शन भी कहता है की हमारी इंद्रियाँ रूप, शब्द, स्पर्श, गंध और रस से ग्रहण करती हैं और वही देह में विकार भी पैदा करतीं हैं। हम अनेक बार तमाम तरह की पहचान के लोगों पर अन्याय के मसले पर मुखर होते हुए उनकी संज्ञा अपने आधार पर तय कर देते हैं। क्या वह एक वास्तविकता है? नहीं! यह एक भ्रम है। कम से कम हमारा दर्शन तो यही कहता है। मनुष्य देह में वह विकार हैं जो उसे अन्याय और दूसरे पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करते हैं। हमने कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया किसी और ने किया पर हम कभी नहीं करेंगे इसकी गारंटी कौन दे सकता है। गुण ही गुणों को बरतते हैं और जब हमारा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण ही नहीं है तो हम कैसे कह सकते हैं की 'उसने किया है और हमने किसी पर अन्याय नहीं किया"। कभी हम भी अपने अहंकार में आकर वह सब कर सकते हैं जो किसी और ने किया होता है।

हम बचपन से लेकर बड़े होते हैं-तब अपने माता-पिता और गुरुओं से ही समाज को विभाजित करने वाले शब्द सीखते हैं। कई तरीके की अच्छी और बुरी विचारधाराएँ उनके कथनों को सुनते हुए हमारी स्मृतियों में बस जातीं ऑरा हमा उनसे कभी अलग नहीं हो पाते और उनसे अलग होने के लिए हमें नया अध्ययन करने की आवश्यकता होती है पर उसका ना तो अवसर मिलता है और न आवश्यकता-इच्छा अनुभव होती है। समय अनुसार उस पर चलते जाते हैं। सिद्धांतों की बात बहुत करते हैं पर उससे अलग नहीं हो सकते इसलिए ऐसी बहसों में उलझ जाते हैं जो बाद में निरर्थक साबित होतीं हैं ।

कुल मिलाकर हमारे मन में समाज, व्यक्ति, भाषा, जाति, और भाषा को लेकर हमारे अंदर पूर्वाग्रह इस तरह स्थापित हो जाते हैं कि हम उनको अपनी पहचान समझने लगते हैं। जब तक इनसे मुक्त होने का मन नहीं बनाएँगे तब तक विभिन्न समाजों में द्वंद्व और विवाद बने रहेंगे यह अलग बात है कि कभी हम स्वयं इसका हिस्सा होंगे तो कभी बाहर बैठकर चर्चा करेंगे। (शेष फिर कभी)

2/2/08

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं (सर्वशक्तिमान-३)

भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और आध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ:: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता। मैं स्वयं ही इस बात का उदाहरण देता हूँ। तमाम तरह के आध्यात्म ग्रंथ मैने बचपन में ही पढ़े और आज भी बड़ी रूचि के साथ पढ्ता हूँ। जब मेरी उम्र आठ साल थी तबा पडोस में रहने वाले एक पन्डित जी की बहू से मेरी माताजी ने पढ़ने के लिए तुलसीदास जी की श्री राम चरितमानस ली थी। मैं भी उसे पढ़ने लगा। मैने उसे धार्मिक भावना से नहीं कहानी की दृष्टि से पढ़ा। उसे कई बार पढ़ा। एक दिन पन्डित जी ने अपनी बहू से वह माँगी तो उसने उनको बताया की ''वह पडोस का लड्का है न वह उसे पढता है।''
उन्होने मुझे बुलाया और कहा'जब पढ़ लो तो वापस कर देना, पर इसको आदर से रखना। तुम इससे बहुत कुछ सीखोगे।''

फिर कभी उन्होने वह मुझसे वापस नहीं माँगी और जब हमने वह मकान खाली किया तब मैं उनको वापस कर आया, पर तब तक मेरे अंदर वह बीज अनुकुरित हो चुका था जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। फिर तो मैने वाल्मीकि रामायण को पढ़ना शुरू किया और अपने जेब खर्च से मैं वह सब धार्मिक किताबें ले आया जो भारतीय अध्यात्म का आधार स्तंभ हैं। आज जब मैं किसी आध्यात्म विषय पर लिखता या बोलता हूँ तो अधिकतर लोग विद्वान होने का अहसास पाल लेते हैं। अब यह मैं नहीं जानता की ऐसा है कि नहीं पर मुझे अपने तर्क भी गढने की आदत भी है और में भी कभी-कभी ऐसे सत्संगों में जाता हूँ पर कुछ नया सुनने से अधिक कोई विचार नहीं आता. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इतना ज्ञान तो मैं किताबों में पड़ चुका हूँ पर फिर भी वहाँ जाना मुझे अच्छा लगता है। इसलिए जब आज कल के तथाकथित बाबा लोग भारत के प्राचीनतम परंपरा के महिमा की बात करते हैं तो ऐसा लगता है की कोई ग्राहकों का समूह उनके सामने खड़ा है जिसे वह भारतीय आध्यात्म- जिसका कोई पेटेंट नहीं है- उसे बेच रहे हैं। वह हमेशा ही शिष्य को सिखाते रहते हैं और वह सीखता नहीं है और हर ख़ास मौके पर उनके दर्शन करने चला जाता है और वहाँ हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट अपने धर्म का पालन करता है जिसका भारत की प्राचीन गुरु-परंपरा से कोई लेना-देना हो मुझे नहीं लगता। एक बात अपने निष्कर्ष के तौर पर कहना चाहता हूँ कि आज के तथाकथित गुरुओं को एकलव्य जैसा शिष्य चाहिऐ जो उनको आज के युग में अपना अंगूठा काटकर न भेंट करे-क्योंकि उससे उनकी आश्रम फाईव स्टार आश्रमों थोडे ही बन पायेगा- बल्कि दूसरों को अंगूठा दिखाकर जुटाए पैसे से उनको भेंट दे पर अर्जुन जैसा शिष्य नहीं चाहिए जो दुष्कर्म करने वालों का समर्थन करने पर उनका प्रतिवाद करे। इन संतो और भक्तों को पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं है भले ही कितना भी बखान कर लें. (क्रमश:)

1/16/08

सर्वशक्तिमान ने जीवन बनाया पर नियम नहीं

सर्वशक्तिमान ने इस धरती पर जीवन का निर्माण इस तरह किया है कि उसका संचालन स्वत: होता रहे पर उसने कोई नियम नहीं बनाया. चालाक लोगों ने उसके नाम पर अनेक ऐसी पुस्तकें और उनका ज्ञान प्रकट किया जो उसने नहीं किया. प्रत्येक जीव की देह पांच तत्वों से बनी और उसमें मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे तत्व स्वत: आये और उसका संचालन करते हैं. आदमी की देह में ऐसा लचीलापन है जिससे वह अपने मन, बुद्धि और अहंकार का अपने अनुसार अच्छा उपयोग कर सकता है क्योंकि वह बन्दर के बाद ऐसा जीव है जिसके पास अपने हाथ भी है और अन्य जीवों में ऐसा नहीं है. एक समय आदमी भी पशुओं जैसा जीवन जीता था पर जैसे-जैसे उसे अपने अन्दर स्थित शक्तियों का अहसास होता चला गया वैसे-वैसे वह अन्य जीवों के मुकाबले अपने जीवन के रहन-सहन में परिवर्तन करता गया.

यहीं से शुरू हुआ मनुष्य में विभाजन और वह शासक और शासित दो वर्गों में बंटता गया-मनुष्य लड़ते तो पहले भी थे और अब भी लड़ रहे है एक-दूंसरे से. यह कोई नियम नहीं कि वह आपस में न लडे. सर्वशक्तिमान ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया. उसने तो केवल जीवन और मृत्यु का नियम बनाया है सुख-दु:ख का नहीं. क्योंकि मनुष्य में यह बुद्धि है कि वह तय करे कि उसे सुख के साथ जीना है या दु:ख के साथ. दूसरे को दु:ख देकर तुम सुखी नहीं रह सकते. तुम दूसरे को गाली दोगे वह तुम्हें देगा. तुम दूसरे को अपमानित करोगे वह तुम्हें करेगा वह तुम्हें करेगा. तुम लोगों को मारने का काम करोगे तो तुम्हें भी कोई मारेगा. यह सर्वशक्तिमान का बनाया नियम नहीं है यह तो एक स्वाभाविक जीवन नियम है.

जो लोग कहते हैं कि यह नियम सर्वशक्तिमान ने बनाया है वह डरपोक हैं या आलसी. क्या यह सब जो अच्छी बाते कह रहे हो उसने कभी कही हैं. नहीं तुम डरते हो और तुम में आत्मविश्वास की कमी है. तुम यह खुद क्यों नहीं कहते कि किसी के साथ अच्छा व्यवहार करने से अपने को भी अच्छा व्यवहार मिलेगा. क्या तुम आलसी हों जो अच्छी बातें सोचने की बजाय दूसरे से अच्छी बातें सीखने को कह रहे हो. अगर तुम्हें कोई अच्छी बात कहनी है तो उसे दूसरे के हवाले से क्यों कहते हो अपने हवाले से क्यों नहीं कहते? अगर दूसरे से कुछ तुम सीख कर कोई विचार व्यक्त करते हो तुम आलसी हो अपना आत्ममंथन नहीं करते और अपनी बुद्धि को आराम से रहने देना चाहते. ''मुझे किसी पर दया दिखाना चाहिए" यह ख्याल अपने आप क्यों नहीं करते. तुम्हें कई बार ऐसा लगता है कि अगर मैं अपने हवाले से अच्छी बात कहूंगा तो लोग यकीन नहीं करेंगे या उस प्रभाव नहीं पड़ेगा तो तुम समझ लो कि डरपोक हो क्योंकि तुमने अपने मन, बुद्धि, और अंहकार का सही विश्लेषण नहीं किया.

कहते हैं कि आदमी को अहंकार नहीं करना चाहिए पर देह है तो अहंकार तो रहेगा. हम उसके बिना चल नहीं सकते. हाँ अहंकार रखो कि तुम एक शक्तिशाली व्यक्ति हो तभी तुम किसी की सहायता कर सकते हो तुम अपने लोगों की रक्षा कर सकते हो. जब तुम किसी को अकारण मारते हो, अपमानित करते हो, दुख देते हो वह वह तुम्हारा अहंकार नहीं है बल्कि कायरता है. अगर देह है तो अहंकार भी रहेगा. हम सो रहे होते हैं और मच्छर काटते हैं तो हम उसे अपने हाथ से भगाते हैं और अगर अहंकार नहीं होगा तो हम उसे भगाएंगे कैसे? अगर अंहकार नहीं करोगे तो आत्म-मंथन नहीं कर सकोगे. दरअसल विद्वान लोग अपने पद, धन और सम्मान के नशे में चूर के अपराधों को अहंकार में किया बताते हैं वह दरअसल उनकी कायरता और आत्म विश्वास की कमीं के कारण होते हैं-लोभ और लालच के कारण होते हैं. अगर उनमें मनुष्य होने का अहंकार होता तो वह ऐसे काम करता है. लोगों कहते हैं कि अमुक व्यक्ति अंहकार के कारण हम से बात नहीं करता पर मैं कहता हूँ कि वह कायर आत्महीनता के भाव से ग्रसित है इसलिए तुमसे बात नहीं करता. उसके पास शब्द नहीं है कि तुमसे बात नहीं करता. तुम भी वैसे ही क्योंकि तुम ऐसा सोच रहे हो और अपने मनुष्य देह में स्थित अहंकार की तरह दृष्टिपात करोगे तो तुम्हें लगेगा कि जो उसके पास है और वही तुम्हारे पास है फिर वह तुमसे धनी और बड़ा कैसे हो सकता है? (क्रमश:)

1/10/08

समाज को साथ लिए बिना भारतीय धनपतियों का सम्मान विदेश में नहीं हो सकता

विश्व में भारतीय लोगों की आर्थिक शक्ति बढ़ रही है पर उनकी प्रतिष्ठा उस तरह नहीं बढ़ रही जैसी की पश्चिमी देशों के संपन्न लोगों की है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संगठनों पर उनका वैसा वर्चस्व नहीं है क्योंकि इसके लिए जिस प्रकार की शक्ति चाहिए वह उसे अर्जित नहीं कर पाए। वह अपने समाज पर नियंत्रण करने से प्राप्त होती है और ऐसा तभी संभव है जब आप अपनी धन-संपदा से कुछ हिस्सा उस पर बिना आर्थिक लाभ के चुकाएँ। अपने समाज के कुछ लोगों के साथ उसके संगठनों को भी शक्तिशाली बनाकर उन पर नियंत्रण करें।
जिन भारतीयों के विदेश में संपन्न होने की इस देश में कुछ लोग अक्सर चर्चा करते रहे हैं उन्होने वहाँ किसी नये स्त्रोतों का निर्माण नहीं किया है बल्कि वहीं मौजूद स्त्रोतों का इस्तेमाल कर आर्थिक शिखर पर पहुँचे हैं। कुछ ऐसे भी संपन्न लोग हैं जो देश में ही हैं पर उन्होने विदेश में भी आर्थिक शक्ति अर्जित की है। टीवी चैनलों और अन्य प्रचार माध्यमों मे उनकी चर्चा होती है पर सामान्य लोगों में उनकी कोई चर्चा नहीं होती। वजह! समाज के लिए वह ऐसे धनपति हैं जिनका समाज को उनके संपन्न ढाँचे से कोई आर्थिक और सामाजिक लाभ नहीं है क्योंकि उन्होने अपने समाज को विकसित करने के लिए कुछ करना तो दूर उसे सतत संचालन में भी कोई भूमिका नहीं दिखाई देती।
भारतीय आध्यात्म को समृद्ध करने वाले सभी महापुरुषों ने धन और वस्तुओं के दान की बहुत सरल व्याख्या की है। जिन महापुरुषों ने दान के महत्व को प्रतिपादित किया है उनके मन में यही बात रही है कि समाज में धनी लोग ग़रीबो और असहायों को सहायता प्रदान करें ताकि उसका सुचारू संचालन होता र्हे। यह अलग बात है कि कुछ लोगों ने अगले जन्म में लाभ मिलने के अंधविशवासों को जोड़कर लोगों को भ्रमित किया और लोग अब यह दान कर्मकांडों पर अपना धन कुपात्र लोगों को देकर नरक जाने से बचना चाहते हैं। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान बघारने वाले भी दान को इस तरह प्रचारित करते हैं कि जैसे उनको दिया गया दान ही असली पुण्य है जबकि श्रीगीता में सुपात्र को दिया गया दान भी फलीभूत बताया गया है और उसमें जन्म आदि की कोई शर्त नहीं है । आज के सन्दर्भ में इस दान को मैं निष्प्रयोजन विनियोजन के रूप में कहता हूँ। भारतीय पूंजीपति अगर कुछ क्षेत्रों में निष्प्रयोजन विनियोजन करते तो उनका नाम होता। कैसे?
१.वह ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ्ने के लिए आर्थिक सहायता दें जिनसे उसका नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करने की संभावना हो।
२।वह ऐसे संगठन और संस्थाओं को योगदान दें जो उनकी विश्व स्तर पर सामाजिक साख बनाने में मदद कर सकें।
३.वह अंतर्जाल पर अपने सर्च इंजन और वेब साईटों का निर्माण करें और उनको इतना व्यापक बनाने के लिए धन का विनिवेश करें ताकि उसमें उनेक समाज की भागीदारी बढ़े। इसके साथ अंतर्जाल पर सक्रिय पत्रिकाओं को मदद दें ताकि इसमें उनके योगदान की चर्चा यहाँ और बाहर दोनों जगह हो।


भारतीय धनपति इस बात से संतुष्ट हैं की उनके पास फिल्मी अभिनेताओं, सामाजिक और धार्मिक संगठनों के लोगों का जमाबडा है, टीवी चैनलों और अख़बारों में उनका प्रचार हो रहा है और यही सामाजिक प्रतिष्ठा का परिचायक तो ग़लतफहमी में हैं। समाज में इज़्ज़त तभी है जब कोई ग़रीब आदमी जिसे आपने धन नहीं दिया वह भी उनको याद करे। इस मामले मने कुछ ऐसे धनाढ्य लोगों के नाम लिए जा सकते हूँ जिन्हें सामान्य लोग आज भी सम्मान से देखते हैं। माननीय जे. आर. डी टाटा, घनश्याम दास बिरला और कैसेट किंग गुलशन कमार को आज भी लोग सम्मान से याद करते हैं टाटा ने जहाँ अस्पताल बनवाए और खेलों में भी अपना योगदान दिया, स्व. घनश्यादाम दास बिरला ने कई जगह धार्मिक तीर्थों पर धमर्शालाएँ और मंदिर बनवाए स्व. गुलशन कुमार ने कटरा में वैष्णोदेवी पर लंगर चलवाए। ऐसे कई लोग हैं जो वैष्णो देवी गये पर उनके लंगर में कुछ भी नहीं खाया फिर भी आज उनको याद करते हैं। हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बात से सहमत न हों पर यह एक वास्तविकता है कि साहूकार वही है जो समाज के लिए किसी न किसी तरह के लिए व्यय करता है।

हमारे आध्यात्म में दान को जो महत्व दिया गया है उसकी कुछ लोगों ने भिखारियों और कर्मकांडों तक ही सीमित रख कर जो व्याखाया की है उससे समाज को तो कोई फायदा नहीं हुआ उल्टे समाज और धर्म बदनाम हुआ सो अलग.
आप इन विदेशियों पर टिप्पणी तो कर सकते हैं पर बताईये किसी नयी आधुनिक चीज़ के निर्माण पर भारत के इन धनपतियों के नाम कोई सृजन किया हुआ कोई कार्य कहीं लिखा हुआ है? आज अंतर्जाल पर जितनी भी सुविधाएँ हैं वह अंग्रेजी वेब साईटों की वजह से हैं। जिस इंडिक या एनी टूल से हम लोग हिन्दी लिख रहे हैं उसको लाने वाली तो एक विदेशी वेब साईट गूगल ही है-अगर देश में कोई टूल बना होगा तो वह भी किसी उत्साही व्यक्ति ने अपना श्रम और समय खर्च कर बनाया होगा। ब्लॉग भी भी विदेशी वेब साईटों के द्वारा दिए गये हैं और अगर हम बात करते हैं कि हिन्दी के विकास की तो इसमें देश के धनपतियों का योगदान आज भी नगण्य है। वह हिन्दी फिल्मों में विनिवेश करते हुए अपने आसपास अभिनेता और अभिनेत्रियों का जमघट लगा सकते हैं जिनको परदे के बाहर हिन्दी बोलना भी नहीं आता हैं पर किसी ने भी अंतर्जाल पर भारतीय भाषाओं के लेखकों को लिखने के लिए क्या कोई सहायता दी हैं? आज जो लेखक इस पर लिख रहे हैं वह इंटरनेट पर अपने कनेक्शन पर पैसा खर्च कर रहे हैं और क्या कोई ऐसी टेलीफ़ोन कंपनी आगे नहीं आई जो इसके लिए उन्हें सुविधा दे। लिखना कोई आसान काम नहीं है पर जो अपने शौक की वजह से लिख रहे हैं तो एक उपभोक्ता की तरह ही न! अंतरजाल पर जो पत्रिकाएँ निकल रहीं है उसके संपादक निष्काम भाव से अकेले जूझ रहे हैं पर क्या किसी धनपति के दिमाग़ में यह आया की इन लोगों को सहायता दें। हाँ, बड़े अख़बार अपने तामझाम लेकर यहाँ आए हैं पर अंतर्जाल पर जो स्वतन्त्र रूप से लिख रहे हैं उसको देखकर मुझे नहीं लगता की वह किसी अख़बार से काम है, कई बार तो यहाँ ऐसे विचार पढ़ने को मिल जाते हैं लो अखबारों में नहीं मिलते।
आप क्रिकेट में ही देख लें। भारत की आर्थिक शक्ति पर ही पूरा विश्व का क्रिकेट चल रहा है और आईसीसीआआई के अंपायर पैनल में भारत के अंपायर ही नहीं हैं। कहते हैं की भारत के अंपायर स्तरीय नहीं हैं? देश के चयनकर्ता कहते हैं की देश में प्रतिभा नहीं है? क्या ऐसी बातों से देश का सम्मान विश्व में बढ़ सकता है: अगर भारत का आम आदमी पूरे विश्व के लिए एक आर्थिक दोहन किए जाने वाला उपभोक्ता है तो यहाँ के जो ख़ास लोग हैं-जिन पर देश के प्रचार माध्यम गर्व करते हुए थकते नहीं है- वह भी वहाँ कोई साहूकार नहीं माने जाते-उनके हैसियत वहाँ एक कुशल प्रबंधक से अधिक नहीं है। यहाँ उनके विज्ञापनों पर चलने वाले टीवी चैनल और अख़बार उनका कितना भी गुणगान कर लें पर समाज को साथ लेकर न चलने की वजह से विश्व की मीडिया में उन्हें कोई सम्मान नहीं है। भारत के कितने भी धनपति बाहर जाकर भले ही संपन्न हो जाये पर सम्मानीय हों पर पर वे अमेरिका के फ़ोर्ड और बिल गैट्स नहीं हो क्योंकि उनको अपने समाज का वैसा समर्थन प्राप्त नहीं है।

1/4/08

मध्यम वर्ग अपने तनाव से मुक्त होना ही नहीं चाहता

समाज में जो अंदरूनी तनाव है उसे कोई सीधे व्यक्त नहीं कर रहा है। जिन लोगों के पास धन-संपदा वह उसकी रक्षा के लिए जूझ रहा है और जिसके पास नहीं है वह अपने अभावों को जीते हुए जैसे-तैसे जीवन निर्वाह करते हुए अपने सामाजिक दायित्यों पूरे कर लेता है। मुख्य समस्या तो सबसे अधिक मुखर मध्यम वर्ग के साथ है। वह अपने को गरीब कहलाना नहीं चाहता और अमीरों की जमात में बैठने की उसकी औकात नहीं है।अपमान वह झेलना नहीं चाहता और सम्मान उसे मिलता नहीं है। इस समस्या का हल यह है की मध्यम वर्ग के लोग एक-दूसरे के साथ जुडे और यह स्वीकार कर लें कि उनको एक दूसरे का सम्मान और सहयोग करने का अलावा और कोई चारा नहीं है।

यह कहना आसान है पर जब जमीन पर देखते हैं तो कई ऐसे धार्मिक, सामाजिक, भाषाई और जातीय विभाजन है जिसकी सीमाओं को तोड़ने का साहस इस वर्ग में नहीं है-सत्य तो यह है कि वह इनकी पहचान का आरोप है। हमारे देश का आध्यात्म कहता है की देह नश्वर है पर इसी देह का सबसे अधिक अभिमान माध्यम वर्ग में ही है। हमारे देश में जन्म, मृत्यु और विवाह के कर्मकांड इतने कठिन बना दिए गए हैं कि उनके निर्वहन में मध्यम वर्ग अपना पूरा जीवन दे देता है पर उससे मुक्त नहीं होना चाहता-अपने पास आर्थिक सामर्थ्य होने के बावजूद वह इन पर खर्च करता है।

मिटटी की इस देह के मिटने के बाद भी जो चला गया उसके सम्मान में तेरहवीं और श्राद्ध की परंपरा किस तर्क पर आधारित है यह पता नहीं। शादी के लायक बेटा है तो उस पर इतना अहंकार कि उसका वर्णन करना कठिन है और बेटी है तो मध्यम वर्ग का आदमी गरीब ही हो जाता है। पहले उसे पढाये-लिखाये और गृह कार्य में दक्ष बनाये और फिर उसके दहेज़ के लिए पैसा एकत्रित करे। दो देह में मौजूद आत्माओं के मिलन के लिए कितने गीत होते हैं पर उससे पहले जो सौदेबाजी होती हैं वह व्यापार से कम नहीं होती। उस समय लगता है कि काहे की संस्कृति और काहे के संस्कार? सब ढकोसला है।

जो परिवार मध्यम वर्ग का है और उसका लड़का रोजगारशुदा है तो वह दहेज़ के लिए किसी धनी परिवार के रिश्ते का इन्तजार करता है। मध्यम वर्गीय पिता के लिए अपने वर्ग के ही किसी लडकी के पिता का बोझ हल्का करने के इरादे से दहेज़ की दर काम करने का उसका इरादा नहीं होता। इस तरह जिस मध्यम वर्ग को समाज का मजबूत आधार माना जाता है वही अपनी हालतों से जूझ रहा है।

यह आश्चर्य समाज में जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र तथा अन्य आधारों पर विभाजन हुआ है उनका नेतृत्व भले ही उसके उच्च वर्ग के लोगों के पास रहता है पर उसका अस्तित्व बनाए रखने में माध्यम वर्ग की भूमिका बहुत होती है, पर अब परंपराओं और रूढियों को बोझ वह जबरन ढो रहा है, इस आशा में कि वह इसकी आड़ में अपनी प्रतिष्ठा बढे और उसका उसे आर्थिक लाभ हो-और वह भी पुत्र का विवाह में धनी परिवार में हो यही संभावना होती है। कुछ लोगों को शायद होता भी हो पर उसका कोई स्थाई नहीं होता, पर इसके बावजूद माध्यम वर्ग अपने दिमागी तनाव से मुक्त नहीं होना चाहता।

11/29/07

औरत के सम्मान की रक्षा बिना विकास निरर्थक

समाज में हमने अपने हिसाब से दो वर्ग बना लिए हैं, इनमें एक वर्ग तो वह है जिसने अग्रेजों द्वारा प्रदत्त शिक्षा पद्धति से अक्षरज्ञान प्राप्त किया है और पेंट शर्ट पहनकर रहता है और उसे हम सभ्रांत वर्ग कहते हैं दूसरा वह है जो मजदूर, किसान और आदिवासियों का है और जिसने नयी प्रणाली से शिक्षा प्राप्त नहीं की और मेहनत और मजदूरी करते हुए जीवन यापन करता है इसे हम असभ्रांत वर्ग का मानते हैं। हमने गुणों के आधार पर कोई वर्गीकरण नहीं किया इसलिए शायद पहनावे और रहन-सहन में आधुनिक रहने वाले लोग अपने को सभ्रांत कहते हैं और निम्न वर्ग के साथ होने वाले दुर्व्यहार को अधिक महत्व नहीं देते।

इस असभ्रांत वर्ग को कुछ तथाकथित सभ्रांत लोग तो अत्यंत हेय दृष्टि से देखते है जैसे कि उनमें कोई गुण नहीं हो जबकि कुछ लोगों को अपने सभ्रांत वर्ग के सदस्य होने का अहंकार इतना होता है कि वह गरीब, मजदूर और किसान को सम्मान योग्य मानना तो दूर उनको अपमानित कर अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

अभी एक घटना जिसमें तथाकथित सभ्रांत वर्ग के लोगों द्वारा सार्वजनिक रूप से एक आदिवासी महिला के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया कोई पहली घटना नहीं है और न यह आखिरी होने वाली है। चूंकि यह घटना ऐसे मौके पर घटित हुई जिस समय मीडिया उस स्थान पर तात्कालिक रूप से सक्रिय था इसलिए लोगों के सामने आ गई वरना तो शायद ही किसी को पता चलता। हालांकि तथाकथित सभ्रांत वर्ग के लोगों के कुकृत्य पर शायद वैसी प्रतिक्रिया देश के अन्य भागों से नहीं आई जैसी आना चाहिऐ थी। इस देश में राम भी हुए हैं तो रावण भी और कृष्ण हुए है तो दुर्योधन भी हुए हैं। सच तो यह है कि कई लोगों के कृत्य तो रावण को भी शर्माने वाले हैं। रावण ने एक बार सीता जी का अपहरण करने के बात फिर कभी और कुकृत्य करने का दुस्साहस नहीं किया पर उसके बाद कई लोग ऐसे हुए है जो स्त्रियों के साथ अपमानजनक व्यवहार करने में बदनाम हो चुके हैं। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि रावण और दुर्योधन ऐसी प्रवृतिया हैं जो आज भी कुछ लोगों में हैं और उनको दण्डित किया जाना चाहिए।

मैं तो यह अपने को समझा नहीं पा रहा हूँ कि कैसे कोई भी किसी भी स्त्री को अपने सामने इस कदर अपमानित होते देख सकता है। ऐसा करने वाले तो पशु हैं और उनके लिए कोई सभ्रांत शब्द लिखता है तो गलत है पर जो देख रहे हैं उनके बारे में क्या कहा जाये? पशु वह हैं नहीं क्योंकि वह स्वयं यह दुष्कृत्य कर नहीं रहे और उनको सभ्य इंसान कहकर इंसानियत का अपमान करना है। ऐसे लोग तो मृतक के समान है जो ऐसा दुष्कृत्य अपने सामने होते देख सकते हैं। मुझे यह देखकर हैरानी हो रही है कि अभी भी उसके लिए कोई आवाज बुलंद करने वाला नहीं है और राजनीतिक रूप से चर्चित घटनाओं पर मीडिया और अन्य स्वयंसेवी संगठनों का ध्यान जाता है पर कई ऐसी घटनाएँ होती हैं जो दूरदराज के इलाकों में घटित होने से कई अखबारों में बीच के पेजों पर ही महत्वहीन खबर के रूप में छप कर रह जातीं हैं। कहीं जादू टोना करने तो कहीं चुडैल कहकर औरतों को बहुत बुरे ढंग से अपमानित किया जाता है।

औरत का सबसे बडा धन उसकी लज्जा होती है और उसे छीनने का मतलब है उसकी प्राण लेना और मेरा विचार है कि इसके लिए तो हत्या जैसा दंड दिया जाना चाहिए-क्योंकि यह भयानक व्यवहार है। दुर्योधन ने द्रोपदी को अपमानित किया तो उसके बाद परिवार सहित विनाश का सामान करना पडा। महाभारत युद्ध से पहले पांडवों का दूत बनकर जब श्री कृष्ण हस्तिनापुर जा रहे थे तब वह उससे पहले अपनी भक्त द्रोपदी से मिलने गए तो उसने आग्रह किया कि वह किसी भी तरह युद्ध करवाएं और श्री कृष्णजी ने उससे युद्ध करवाने का आश्वासन भी दिया। श्री कृष्ण जी अपनी परम भक्त द्रोपदी के अपमान को नहीं भुला सकते थे इसलिए अपनी पूरी शक्ति कौरवों के विनाश में लगा दी। यह आश्चर्य की बात है कि इतना बड़ा उदाहरण होते हुए भी कई लोग इससे सबक नहीं लेते।
ऐसे घटनाओं पर टिप्पणियाँ कर बैठ नहीं जाना चाहिए और देखना चाहिऐ कि उन लोगों के खिलाफ कार्यवाही हो रही है या नहीं। जब तक इस देश में औरतों के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार होगा विकास नहीं होगा दावे चाहे कितने भी कर लिए जाएं। ऐसे मामलों में केवल संवेदना व्यक्त करने से काम नहीं चलाने वाला बल्कि ठोस कार्यवाही होना चाहिऐ और उस पर सभ्रांत वर्ग में भी जो वास्तव में सभ्रांत है उनको सतत दृष्टि रखना चाहिए।

11/9/07

कौटिल्य का अर्थशास्त्र:अब तो उपेक्षासन भी सीख लें

१.शत्रु को अपने से अधिक जानकर उसके बल के कारण उपेक्षा कर स्थिर ही रहता है उसको उपेक्षासन कहते हैं। जैसे भगवान् श्री कृष्ण ने सत्यभामा के लिए स्वर्ग से कल्पवृक्ष उठा लिया तब देवराज इन्द्र ने अपनी पूरी शक्ति का प्रदर्शन न कर उपेक्षा की-अर्थात उनसे युद्ध नहीं किया।
२.दूसरों से उपेक्षित होने से रुक्मी ने भी उपेक्षासन किया। जब कृष्ण से युद्ध करने के उपरांत रुक्मी को किसी ने सहायता नहीं दी तो वह उपेक्षासन कर बैठ गया।

कौटिल्य के इन गूढ़ रहस्यों को समझे तो उनमें बहुत सारे अर्थ निहित हैं। आज एक सभ्य समाज निर्मित हो चुका है और बाहुबल के उपयोग के अवसर बहुत कम रह गए हैं। ऐसे में उनकी नीतियों का अनुसरण और अधिक आवश्यक हो गया है। हम देखते हैं कि हमें उत्तेजित करने के लिए कई विषय उपस्थित किये जाते हैं ताकि हम अपना विवेक खो दें और दूसरे इसका लाभ उठा सकें।

त्योहारों के मौके पर ही देखें। उनका व्यवसायीकरण इस तरह किया गया है कि लगता है कि पैसे खर्च करना ही त्यौहार है और भक्ति, ध्यान और एकांत चिंतन का उनसे कोई संबंध नहीं है। एक से बढ़कर एक विज्ञापन टीवी और अखबारों में आते हैं-यह खरीदो, वह खरीदो और अपना त्यौहार मनाओ। लोग इनको देखकर बहक जाते हैं और अपना पैसा खर्च करते हैं। और तो और इस अवसर पर कर्जों की भी आफर होती है। जिनके पास पैसा नहीं है वह कर्ज लेकर कीमती सामान खरीदने लगते हैं-यह सोचकर के उसे चुका देंगे पर ऐसा होता नहीं है और कर्ज जिसे मर्ज भी कहा जाता है एक दिन लाइलाज हो जाता है।

यहाँ एक बात याद रखना होगा कि विज्ञापन में काम करने वाले अपने कार्य को ''एड केंपैन"यानि विज्ञापन अभियान या युद्ध भी कहते हैं और इसे इस तरह बनाया जाता है कि समझदार से समझदार व्यक्ति अपनी बुद्धि हार जाये। इस समय हर क्षेत्र में तमाम तरह के प्रचार युद्ध छद्म रूप से हम पर थोपे गए हैं और हम उनसे हार राहे हैं, केवल वस्तुओं को खरीदने तक ही यह प्रचार युद्ध सीमित नहीं है बल्कि अन्य विषयों -जैसे आध्यात्मिक, साँस्कृतिक एवं सामाजिक- पर विचार न कर केवल मीडिया द्वारा सुझाए गए विषयों पर ही सोचें, इस तरह हम पर थोपे गए हैं।

हम चूंकि बाजार उदारीकरण के पक्ष में हैं इसलिए उनको रोक नहीं सकते पर उनके प्रति उपेक्षासन का भाव अपनाना चाहिए। यह अब हमारे लिए चुनौती है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने जो सोच इस समाज को दिया था उसकी परवाह तत्कालीन समाज ने इसलिए नहीं की क्योंकि उस समय इसकी अधिक आवश्यकता नहीं थी, और वह अब अधिक प्रासंगिक है क्योंकि ऐसे प्रसंग आ रहे हैं जिनमें उनके नियम और सिद्धांत बहुत नये लगते हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि हमारे प्राचीन मनीषी और विद्वान कितने दूरदर्शी थे।दरअसल हमारे सामाज की वास्तविक परीक्षा का समय अब आ गया है और हमें अपने अन्दर ऐसे विचार और नियम स्थापित करना चाहिए जिससे विजय पा सकें।
हमारे सामने किसी विज्ञापन में कोई वस्तु या कोई विषय होता है तो उस पर गहराई से विचार करना चाहिए, और अगर उसमें अपना और समाज का लाभ न दिखे तो उपेक्षा का भाव बरतना चाहिऐ. हमें किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति पसंद नहीं है तो उसे बुरा कहने की बजाय उपेक्षासन करना चाहिए. अगर हम उसे बुरा कहेंगे तो चार लोग उसे अच्छा भी कहेंगे-उसका विज्ञापन स्वत: होगा. हम उपेक्षा करेंगे तो हमारे चित को शांति मिलेगी.

11/8/07

दीपावली पर सभी को शुभकामनाएं

दीपावली हर वर्ष आती है और समाज के हर वर्ग का सदस्य अपने ढंग से इसका आनंद उठता है। इन त्योहारों को सतत मनाने की प्रक्रिया इसलिए शुरू हुई ताकि लोगों को अपने धर्म और संस्कृति याद रखने में चिंतन करने में सहायता मिल सके और साथ में आनंद भी मिल सके। सभी त्यौहार मनाने के लिए लोग बडे उत्साहित रहते तो केवल आनंद उठाने के लिए चिंतन से उनका वास्ता नहीं रहता। बहुत कम लोग इस बात को याद रखने का प्रयास करते हैं कि वह त्यौहार किस उपलक्ष्य में मनाया जा रहा है।

दीपावली का त्यौहार भगवान् श्री राम के चौदह वर्ष बनवास समाप्त होने के वापस होने पर उनके अपने शहर में वापस आने पर अयोध्यावासियों ने जो खुशी मनायी थी उसके तारतम्य में यह शुरू हुआ। अयोध्यावासियों ने यह त्यौहार अपने राजा की वापसी पर मनाया था पर भारतीय जनमानस ने उन्हें भगवान् स्वरूप अपने हृदय स्थल में स्थापित कर इसे मनाना जारी रखा। अयोध्यावासियों ने भगवान् श्री राम के राज्य का भले ही क्षणिक भौतिक सुख का लाभ उठाया पर उनकी लीलाओं ने पूरे जनमानस में जो प्रभाव छोडा उन्हें हृदय नायक बना दिया।

भगवान श्रीराम ने राज्य किया पर उन्होने राज्य सुख का उपयोग अपने हित के लिए किया हो या उसके सुखों में डूबे रहे हों ऐसी चर्चा कहीं नहीं मिलती। उन्होने राज्य लक्ष्मी और उसके वैभव का उपयोग अपने लिए किया ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। मन,वचन और कर्म से वह समाज के लिए समर्पित रहे-इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोतम कहा जाता। जीवन भर एक पत्निव्रता रहने का व्रत उन्होने लिया और उसको निभाया। राज्य छोड़कर चौदह वर्ष खुशी के साथ वन में रहे पर सीताहरण प्रसंग में कुछ क्षणों को छोड़कर कभी विचलित नहीं हुए। धर्म स्थापना का काम फिर भी उन्होने शुरू किया। सच तो यह है कि वह एक सभ्य समाज की स्थापना का सन्देश उन्होने सबसे पहले दिया। वह नहीं चाहते थे कि लोग पशुओं की तरह असभ्यता से जीवन बिताएं। वह चाहते थे कि स्त्री को सम्मान से देखा जाये और सबको अपने मन के हिसाब से भगवान् की आराधना का अधिकार हो। उनके समय में राक्षस वनों में रहने वाले तपस्वियों के तप,ध्यान और यज्ञ-हवन आदि में बाधाएं पैदा करते थे और इसलिए उनका उन्होने संहार करना शुरू किया। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह राक्षसों की भक्ति विधि से कोई विरोध रखते थे। राजा होते हुए भी उन्होने सबके हित में अपना हित देखा-हो कि आज भी अनुकरणीय है।

ऐसे त्यौहारों के अवसर पर महापुरुषों की चर्चा करना भी जरूरी हैं जिनको स्मरण करते हुए यह त्यौहार मनाये जाते हैं। मैंने अपने अनेक लेखों में भगवान श्री राम के बारे चर्चा की है और मेरा कहना स्पष्ट है कि कई लोग चाहते हैं भगवान् श्री राम की जगह उनके इष्ट समाज के इष्ट बने ताकि वह अपना प्रभा समाज पर कायम कर सकें। कई लोगों में-को जिन्हें सब कुछ मिल जाता है पर समाज में भगवान् के रूप में स्थान नहीं मिलता- यह देखकर निराशा आती है कि उनका चरित्र वैसा नहीं हो सकता और वह भगवान् नहीं बन सकते। अपनी महत्वांकक्षा की पूर्ति न होने पर तमाम तरह के आक्षेप करते हैं या असितत्व पर सवाल उठाते हैं। यह भगवान् श्री राम की लीलाएं ही हैं कि उन्होने ऐसा चरित्र बहुत कठिनाईयाँ झेलते हुए भी व्यतीत किया और वह नैतिकता और मर्यादा के प्रतीक बन गए। उन भगवान् श्री राम को मेरा नमन और सब भक्तो को दीपावली के शुभकामनाएं।

9/9/07

अपनी आक्रामक प्रवृति पर नियंत्रण करें

हमारे जीवन में कई बार एसे अवसर आते हैं जब हमारे अन्दर आक्रामकता का भाव उत्पन्न होता है और उसकी तत्काल अभिव्यक्ति करना चाहते हैं पर हमारे सम्मुख समय, हालात, व्यक्ति और स्थान हमेशा इसकी अनुमति नहीं देते। अगर उस समय हमारे सम्मुख कोई कमजोर व्यक्ति है तो हालात, और स्थान अनुकूल नहीं होते और हम रह जाते हैं। अगर शक्तिशाली व्यक्ति है तो ख़ून के कड़वे घूँट पीकर रह जाते हैं। कुल मिलाकर हमें अपनी ही अपनी आक्रामकता को वश में करना ही पड़ता है। कई बार अगर लगता है कि सब ठीक है तो अपने आक्रामक अभिव्यक्ति को बाहर आने देते हैं पर बाद में इसके लिए पछताना भी पड़ता है, खासतौर से अपने से कमजोर व्यक्ति पर जब इसकी अभिव्यक्ति करने पर कभी कभी पछताना भी पड़ता है क्योंकि पता लगता है कि कोई हमसे अधिक शक्तिशाली व्यक्ति उसको संरक्षण दे रहा है।

फिर हम अपने अन्दर आयी आक्रामकता का क्या करें?
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प्रत्येक जीव में आक्रामकता का भाव होता है और हर कोई अपने से कमजोर पर आक्रामक अभिव्यक्ति प्रकट करता है। हम तो मनुष्य की आक्रामक प्रवृति की चर्चा कर रहे हैं। वैसे आक्रामकता और क्रोध में फर्क है। क्रोध हमें तब आता है जब कोई हालात, व्यक्ति और विषय हमारे प्रतिकूल होता है हालांकि उसकी अभिव्यक्ति के लिए हमें आक्रामक भाव की ही आवश्यकता होती है, पर हम जिस स्वरूप की चर्चा हम कर रहे हैं क्रोध, ख़ुशी, आशा और निराशा किसी भी समय प्रकट हो सकता है।

हम अपनी किसी उपलब्धि पर बहुत प्रसन्न है और अपने मित्रों या रिश्तेदारों के साथ उस पर चर्चा करते समय एसे राज या रहस्य प्रकट कर देंते हैं जिसका बाद में हमें पछतावा होता है और पता लगता है वह हमारी ऐक बहुत बड़ी गलती थी। अपनी सफलता के नशे में हम उत्साह के रुप में चले आ रहे आक्रामक भाव पर नियंत्रण नहीं कर पाते और उन लोगों के सामने अपने राज-रहस्य उगल देते हैं जिनके बारे में पता है कि उसका वह अपने लिए लाभ उठाएंगे या दुष्प्रचार करेंगे।

यही स्थिति तब भी आती है जब हम अपने किसी कार्य या लक्ष्य के संपन्न होने के लिए आशान्वित होने पर उसके राज-रहस्य दूसरों के सम्मुख प्रकट करते हैं और बाद में पता लगता है कि उस पर पानी फिर गया क्योंकि जिन लोगों के सामने अपने मन के भाव व्यक्त किये उन्होने वहां से हटते ही हमारी आशाओं के केंद्र बिन्दु पर हमला कर दिया और हमें बहुत बाद में पता चलता है ।

मतलब यह है कि हमें अपनी आक्रामक प्रवृति-जिसे हम जोश भी कह सकते हैं उस पर नियंत्रण रखना सीख लें और यह तभी संभव है जब हमें उसे पहचाने। ऐसा नहीं है कि हम अपने जीवन में बिना आक्रामक भाव के रह सकते हैं पर अगर हम उसका सही समय, व्यक्ति और हालत देखकर उसकी अभिव्यक्ति होने दें तो हम सफल हो सकते हैं। ग़ुस्से और निराशा से जब हमारे अन्दर आक्रामक या जोश का भाव उत्पन्न होता है तो हमें तत्काल उस तत्व से अपना ध्यान हटा लेना चाहिए जिसकी वजह से वह उत्पन्न हुआ है, इससे हमारे आक्रामक प्रवृति बाधित जरूर होगी पर समाप्त नहीं होगी। फिर जब एकांत में उस पर विचार करेंगे तो हमारी आक्रामक प्रवृति ही हमें उससे निपटने का मार्ग ढूँढने में मदद करेगी। यही स्थिति सफलता और आशा में भी रखना चाहिऐ ताकि जब हम उस पर अकेले में दृष्टिपात करें तो उसका पूरा विश्लेषण कर आगे का मार्ग भी बना सकें।
इसकी पहचान क्या है
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हम अपनी प्रतिदिन की गतिविधियों में लिप्त तो होते हैं पर उस पर कभी विचार नहीं करते इसलिये हमें विशेष प्रकार का अवसर आने पर भी उसे नहीं पहचानते जबकि उसकी वजह से हमारे रक्त प्रवाह और मस्तिष्क में तीव्रता उत्पन्न होती है हमें लगता है कि हम सामान्य है पर होते नहीं हैं। जब हम नित-प्रतिदिन अपने कार्यों पर विचार करेंगे तो हमें यह स्वत: बोध होने लगेगा कि सामान्य और असामान्य हालात क्या है और जब इसका पता लगा जाएगा तो हम अपनी आक्रामक प्रवृति या जोश को भी पहचान लेंगे। फिर हम एसी गलतिया नहीं करेंगे जिसकी वजह से बडे में पछताना पडे। । (क्रमश:) शेष अगले अंकों में

9/1/07

सदैव हंसते रहो

मनुष्य के मुख पर मुसकान सौभाग्य का चिह्न है। हंसना मनुष्य की स्वाभाविक क्रिया है। विधाता के सृष्टि का कोइ दूसरा प्राणी हंसता हुआ नहीं दिखता। प्रसिद्ध चिंत्तक वायर ने ठीक लिखा है-'जब भी संभव हो हंसो, यह ऐक सस्ती दवा है, हंसना मानव-जीवन का ऐक उज्जवल पहलू है।'

पाश्चात्य तत्ववेत्ता स्टर्नने तो यहाँ तक कहा है कि-'मुझे विश्वास है हर बार जब कोई व्यक्ति हंसता या मुसकराता है वह उसके साथ ही अपने जीवन में वृद्धि करता है।'

स्वेट मार्डन प्रसन्नता को धन मानते हुए कहते हैं-'ऐक ऐसा धन है, जिसे सब लोग इकट्ठा कर सकते हैं, वह धन है प्रसन्नता का धन। तुम पर कितनी ही मुसीबतें रहें, तुम कितने कठिनाईयों मैं हो, तुम्हारे सामने अन्धकार ही क्यों न हो, यदि तुम प्रसन्नता को अपनाए रहो तो तुम धनी हो। यह प्रसन्नता तुम्हारे जीवन को उच्च बनाएगी।'

प्रसिद्ध विचारक कार्नेगी का कथन है-'मुसकराहट थके हुए व्यक्ति के लिए विश्राम है, हतोत्साहित के लिए दिन का प्रकाश, सर्दी में ठिठुरते के लिए धुप है और कष्ट के लिए प्रकृति का सर्वोत्तम प्रतिकार है।'

जबकि होमर के शब्दों में-'मुस्कान प्रेम की भाषा है।'

विलियम शेक्सपियर के कथानुसार-'मुसकान के बल पर जो तुम चाहो पा सकते हो। तलवार से इच्छित वस्तु नष्ट हो जाती है।'
प्रसन्नता वास्तव में चन्दन के समान है, उसे दुसरे के मस्तक पर लगाईये, उंगलिया अपने-आप ही सुगन्धित हो जायेंगी। जीन पोल प्रसन्नता को वसंत की तरह हृदय की सबा कलियाँ खिला देने वाली मानते हैं। तभी तो गेट ने प्रसन्नता हो सभी सदगुणों की माँ कहा है।

इसलिये जीवन में सदैव हंसने और प्रसन्न रहने का प्रयास करो, और ऐसे लोगों से संपर्क मत रखो जो तुम्हें दुःख या अप्रसन्नता देकर तुम्हारी हंसी छीनने का प्रयास करते हैं।

8/21/07

विश्वास करें पर सतर्कता के साथ

हर कहानी रोज दोहराई जा रही है फिर भी लोग हैं कि भूल जाते हैं। अपने लोगों में ही दुश्मन छिपे हैं और देख नहीं पाते। कहीं लड़की के साथ व्याभिचार का समाचार आता है तो कहीं बच्चे का अपहरण जान-पहचान या रिश्ते के लोग ही कर लेते हैं। कई खबरें मुझे इतनी हृदय विदारक लगती हैं की सोचने लगता हूँ की जब समाज के यही हालत हैं तो यकीन किस पर किया जाय? इस दुनियाँ में माता-पिता और गुरु के बाद मित्र ही वह जीव है जिस पर विश्वास किया जा सकता है, पर अगर मित्र ही पीठ में छुरा घोंपने लगे तो आदमी के मन में विश्वास उठ जाता है।

समय के साथ समाज में कई तरह के विघटन हुए हैं। संयुक्त परिवारों की जगह विघटित परिवारों ने ले ली है। कई बच्चे तो ऐसे हैं जिन्हें केवल रिश्तों के नाम पता है पर न तो उन्हें उसके प्यार की अनुभूति होती है और न ही उसके महत्व का पता है। कहते हैं की जो चूल्हे के निकट होता है वही दिल के भी होता है। पहले तो लोग घर में ही चूल्हे अलग कर ऐक ही मकान में रहते थे पर शहरों में भूमि की समस्या ने अब घरों को भी अलग कर दिया है। स्थिति यह है की जिस माँ-बाप को ऐक ही बेटा है वह भी उनसे अलग हो जाता है क्योंकि समाज में विचारों के टकराव भी अब पहले से अधिक विस्फोटक रुप से बाहर आने लगे है। तमाम तरह के विवादों के चलते लोग अपने रिश्तेदारों के यहाँ कम मित्रो और परिचितों में आत्मीयता का भाव ढूंढने लगे हैं।

यह बुरा नहीं है पर ऐक बात का विचार करना चाहिये की जिन रिश्तेदारों पर हम जानते हुए भी विश्वास नहीं करते तो अनजान लोगों पर इतनी जल्दी यकीन क्यों कर लेते हैं? हम यह मान लेते हैं जिससे हमारा पैतृक संपति या सामाजिक रिश्ते कि वजह से कोई विवाद या कोइ हमसे सीधा मतलब नहीं है वह हमसे झगड़ा नहीं करेगा पर हम यह भूल जाते हैं की जब उससे संपर्क बढेगा तो मतलब भी बढेगा और फिर रिश्तेदारों जैसे झगडे उसके साथ भी होंगे। देखा जाय तो जहाँ पहले रिश्तेदारों से आदमी के साथ विवाद के चलते मारपीट , ठगी , बेईमानी और अन्य आपराधिक मामलों की शिकायतें आती थीं वैसी ही और उतनी ही अब दोस्ती और जानपहचान में आने लगी हैं।
इसलिये अब वह समय भी नहीं रहा की बिना सोचे समझे अपने पड़ोसी, मित्र और जान पहचान के लोगों के साथ भी संपर्क बढ़ाया जाय और अपनी गुप्त बातें बताई जायें । हमने देखा है की लोग घर के बाहर के स्त्री और पुरुष पर बहुत जल्दी इस आधार पर यकीन कर लेते हैं की वह पड़ोस में रह रहा है कहाँ जायेगा या हमने उसका घर देखा है या बोलता अच्छा है तो उसकी नीयात भी ठीक होगी । यह कोई आधार नहीं है खासतौर से इस कंप्यूटर के युग में तो जितना लोगों की बुद्धि चाकू की तरह तेज हो गये है पर चिंतन और मनन क्षमता बहुत कम हो गयी है। इंटरनेट पर चाट करते हुए ही लोग ऐक दूसरे पर यकीन कर लेते हैं-मुझे यह हास्यप्रद बात लगती है। आजकल शायद यही कारण है कि इंटरनेट पर भी ठगी के नये-नये उदाहरण सामने आ रहे हैं। मैं यह नहीं कहता की सब बुरे हैं पर बुरे लोग अपना हित साधने के लिये उतावले होते हैं यह उनकी पहचान है, इसलिये सतर्क रहते हुए देर-धीरे ही मित्रता की तरफ बढ़ना चाहिये।
मेरा मानना है की जब तक आप अपने मित्र का घर स्वयं न देख लें और उसकी पुष्टि के लिये कहीं इधर-उधर पूछताछ न कर लें तब तक उसे मित्र नहीं कहा जा सकता है और साथ ही वह आपके घर ऐक सामान्य सांसारिक व्यक्ति की तरह न आ जाऐ तब तक उस अपने घर की बात भी न कहँ। में यहाँ किसी पर अविश्वास करने की बात नहीं कह रहा हूँ बल्कि सतर्क रहने के लिये कह रहा हूँ। मुझे लगता है कि सतर्क न रहने की वजह से लोग अधिक धोखा खाते हैं । विश्वास करें पर सतर्कता के साथ

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