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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

5/18/07

व्यसनों से तनाव कम नहीं होता

NARAD:Hindi Blog Aggregator
हम सारा दिन किसी न किसी काम में लगे रहने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अपने जीवनयापन के लिए ऐसा करना जरूरी है । इसके आलावा अपने मन को भी कहीं न कहीं लगाना होता है और इसके विकल्प के रुप में काम करते रहना आवश्यक लगता है । इस प्रयास में हम कई ऐसे काम करते हैं जो आख़िर स्वयं के लिए तकलीफदेह साबित होते हैं-जैसे किसी की अनावश्यक निंदा करना या किसी और व्यक्ति का धन, वैभव और प्रतिष्ठा देखकर उसके बारे में चिन्तन करना। यह सब नहीं करते तो कोई व्यसन पाल लेते हैं जैसे तंबाकू खाना और सिगरेट पीना । कुछ लोग तो शाम को थकावट मिटाने के नाम पर अपने बीबी-बच्चों के सामने ही शराब पीने लगते हैं , इस बात की चिन्ता किये बिना कि इससे उन पर क्या दुष्प्रभाव पडेगा?
ऐसा नहीं है कि यह आदतें केवल पुरुष ही पालते हैं -कई महिलाओं में भी ऎसी आदतें होती हैं - अंतर बस इतना होता है कि महिलाएं छिपकर ऐसे व्यसन करती है ताकि समाज में उनकी बदनामी ना हो पर अपने बच्चों से वह भी छिप पातीं-और अंतत: उन पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है । हम यह सोचते हैं कि इन व्यसनों से मानसिक तनाव कम होता है पर यह हमारा भ्रम होता है , चिकित्सा वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सुख क्षणिक है और कालांतर में यह आदमी की मानसिक शक्ति को हानि पहुँचाता है और वह डरपोक, शक्की और भुलक्कड़ होता जाता है। कुछ तो इतने भयकर रुप से मनोरोगी हो जाते हैं न तो उन्हें स्वयं और न ही परिवार वाले इसे समझ पते है और कहीं इसे उम्र का तकाजा और कहीं इसे स्वभाव तो इसे तात्कालिक स्थिति मानकर टाल दिया जाता है। इस उपेक्षा का यह नतीजा यह होता है लोग धीरे धीरे संपर्क या तो कम करने लगते है या फिर समाप्त ही कर देते हैं। पराए लोग तो छोड़ें अपने ही लोग कन्नी काटने लगते है और कहते हैं उसे तो कोई काम नहीं वह तो केवल शराब पीता है चर्सी है , सारा दिन तंबाकू खाता है या सिगरेट पीता है,उससे बात करने का कोई फायदा नहीं है।इस तरह समाज में हमारा रुत्वा कम होता जाता है और हमारी मनोदशा और खराब होने लगती है और ऐसा लगता है कि हमने जिनके लिए इतना किया या कर रहे हैं वह हमारा सम्मान नही कर रहे हैं और हम क्रोध के वशीभूत होते जाते है यानी अपनी बीमारी और मानसिक तनाव बढाते हैं , पर न कोई हमें समझता है और न हम समझते है यह हो क्या रहा है , यह सब हमारे व्यसन की वजह से होता है।व्यसनों के उपयोग में फंसा आदमी जब भी तनाव में होता है उसके सहारे अपने को बचाना चाहता है क्षणिक रुप से यह अच्छा लगता है पर बाद में फिर वैसी हालत ही हो जाती है है कभी कभी उससे भी बदतर। व्यसन के उपयोग से जितनी जल्दी तनाव खत्म होता है उसका प्रभाव घटते ही उससे ज्यादा तेजी से बढने लगता है । मैं अपने आसपास जब युवकों को व्यसनों में फंसा देखता हूँ तो सोचता हूँ कि वह अपना जीवन आगे कैसे तय करेंगे। एक बार मेरी पहचान का एक युवक सिगरेट पी रहा था , तब बातचीत करते हुए उससे पूछा -" तुम सिगरेट क्यों पीते हो ?"

उसका जवाब था कि -"इससे टेंशन कम होता है ।"
मैंने पूछा-"तुम्हें कैसा टेंशन है , और अभी तो तुम्हारी शादी को केवल एक महीना हुआ है ।"
वह हंसकर बोला-" अपना टेंशन किसी को नहीं बताना इसीलिये तो सिगरेट पी रहा हूँ।
मैंने पूछा-"तुम्हारे पापा भी सिगरेट पीते हैं?"
वह बोला-"हाँ, मैंने तो उनके पैकेट से ही तो सिगरेट निकालकर पीना सीखा है।
फिर थोडी देर चुप रहने के बाद वह बोला -" पर साहब, कहते हैं कि सिगरेट पीने से टेंशन कम होता है पर शुरू में लगता था पर अब नहीं लगता।फिर पीते क्यों हो?"मैंने पूछावह बोला-" अब तो यह मेरी आदत बन गयी है और नहीं पीता हूँ तो दिमाग ही काम नहीं करता। बहुत सोचता हूँ कि यह आदत छोड़ दूं पर मुश्किल लगता है।

मुझे उसकी बेबसी पर दुःख हो रहा था तो उसके पिताजी पर गुस्सा भी आ रहा था जिनकी वजह से उसे यह आदत पडी। इस तरह एक नही कई लोग है जो अपने बच्चों में भी ऎसी आदतें भर देते है जो उनके जीवन के लिए तकलीफदेह होती हैं। शेष अगले अनके में

2 comments:

परमजीत बाली said...

दीपक जी,बहुत ही मसूमियत से लिखा लेख बहुत अच्छा और प्रेरणादायक है। यह भी सच है कि ज्यादा तर व्यसन बच्चा घर से ही सिखता है और ताउम्र उसे छोड़ नही पाता। अधिक समय तक इन व्यसनों से ग्रस्त रहने के कारण बाद में असमय मृत्यू का ग्रास बन जाता है। इस लिए पहले ही सचेत होना जरूरी है। इस लेख ले लिए आप को बहुत-बहुत बधाई।

अनूप शुक्ल said...

सच लिखा अच्छा लिखा!

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