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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

10/1/09

अंतर्जाल पर सहजतापूर्ण अभिव्यक्ति होना जरूरी-आलेख (hindi article on internet)

डरते डरते आदमी डरपोक हो जाता है। उसकी यह आदत हो जाती है कि वह राह चलते हुए कोई अन्य आदमी उसकी तरफ देख ले तो वह डर जाता है। अज्ञानता से उपजा यह डर खतरनाक है। डर क्रूरता को जन्म देता है। यह क्रूरता या तो पीठ पीछे वार के लिये प्रेरित करती है या बदद्आऐं देने को बाध्य करती है। कभी कभी आदमी अनावयक रूप से दूसरे के अहित की कामना केवल इसलिये करता है कि उससे वह डरता है।
इधर अंतर्जाल पर विचरण करते हुए ऐसा लगता है कि इस देश में डरपोक लोगों की फौज खड़ी है। समस्या यह है कि जहां भी आदमी को बोलने या लिखने का अवसर मिलता है वह झूठे नामों से गंदी भाषा में शब्द लिखता है। चलिये गंदी भाषा में शब्द लिखे तो भी ठीक। आदमी तो अच्छी बात कहते हुए भी डरा लगता है। गीत, संगीत, फिल्म, नाटक तथा साहित्य तो देशकाल की सीमा से परे होते हैं पर लोग इस बात को भूलकर अनेक जगह कटु बातें लिख रहे हैं।
हमने कई ऐसी वेबसाईटें देखी जो गीत, संगीत, लेखन तथा फिल्मोें से संबंधित हैं। अब यह ठीक है कि कोई गीत है जिसे हमारे पड़ौसी देश के गायकों ने गाया है। तय बात है कि उसमें उनकी संस्कृति और धर्म की पहचान तो शामिल होगी। उन पर अपने ढंग से नफरतपूर्ण टिप्पणियां देना अच्छी बात नहीं लगती। इतना ही नहीं देश की अनेक वेबसाईटों पर अपनी असहमति गंदी भाषा में प्रकट करना भी कम दुःखदायी नहीं है
हम यह तो मानते हैं कि पड़ौसी राष्ट्रों की संस्कृति और धर्म हमसे अलग है और वे हमारे मित्र राष्ट्र भी नहीं है पर यह भी राजनीतिक कारणों से हैं। हालांकि राजनीति ने पूरे विश्व को गंदा कर दिया है। राजनैतिक नेताओं ने अपने यहां की शिक्षा पद्धतियों में पड़ौसी राष्ट्रों को दुश्मन बताने वाले पाठ शामिल किये जाते हैं। उनको पढ़ते हुए जब बच्चा बड़ा होता है तो उसकी शिक्षा से स्थापित संस्कार स्थाई हो जाते हैं। अभी चीन के बारे में बताया गया था कि वहां का आम आदमी भारत से नफरत करता है। यह नफरत कहां से आयी होगी? शिक्षा पद्धति से ही न! शिक्षा पद्धति में राजनीतिक हस्तक्षेप पश्चिम की ही देन है। चीन, पाकिस्तान तथा भारत का भी एक वर्ग पश्चिम का विरोधी है पर इसके बावजूद नीतियां उनकी पश्चिम जैसी हैं। जैसा समाज अपने लिये राजनीतिक रूप से हितकर हो वैसी ही शिक्षा बचपन से दो-यह नीति पश्चिम की है। व्यक्ति स्वतंत्र रूप से चिंतन न कर केवल राज्य द्वारा प्रदत्त सोच पर ही चले। पाकिस्तान और चीन में तो बस एक ही विचाराधारा काम करती है पर भारत में तीन विचाराधारायें काम करती है। मौलिक सोच की कमी है। यह बात अंतर्जाल पर अति सक्रिय वेबसाईटों पर अपने ही देश के लोगों की टिप्पणियों से पता लगती है।
गुलामी ने इस समाज को कितना डरपोक बना दिया है कि वह किसी एक गीत के एक शब्द पर ही बौखलाकर गालियां लिख देता है। वह भी नाम छिपाते हुए। हमने नाम देखे। नामों के साथ अंक जुड़े होते हैं। यकीनन ऐसे नाम हमारे समाज में नहीं होते। गीत, संगीत और साहित्य की वेबसाईटों और ब्लाग पर यह पता नहीं लगना चाहिये कि आदमी किस देश का है पर टिप्पणी के अभद्र शब्द इसका परिचय देते हैं।
इससे बचना होगा। अंतर्जाल में लिखा गया कोई भी विषय किसी भी भाषा में पढ़ा जा सकता है। अभी उस दिन इस लेखक ने देखा कि उसका ब्लाग चीनी भाषा में पढ़ा जाता है। अनुवाद टूल से उसे इस तरह पढ़ा गया कि लेखक कांउटर पर यह पहचान ही नहीं पा रहा था कि उसका ब्लाग है। वहां पर एक जोरदार ब्लाग लेखक की टिप्पणी फोटो सहित थी तब इस लेखक ने एच. टी.एम.एल. की कापी से जाकर सर्च में उसे पाठ को देखा तो वह मंदी के विषय में लिख गया था। गनीमत है वहां से कोई टिप्पणी नहीं आयी। वरना जिस तरह चीन के बारे में कहा जा रहा है उससे देखते हुए तो वहां से मित्रपूर्ण टिप्पणी की आशा करना व्यर्थ है। हां, मित्र ब्लाग की टिप्पणी भी अच्छी थी। अगर वह अभद्र होती तो आप सोचिये उसका क्या प्रभाव होता?
इसी तरह अन्य वेबसाईटों पर और ब्लाग पर हम भारतीयों को टिप्पणी अवश्य लिखना चाहिये। इस मामले में डरने की जरूरत नहीं है। जो कलाकार, लेखक या गायक हैं उनमें आक्रामक प्रवृत्ति नहीं होती और न ही इतना समय होता है कि वह किसी से संपर्क बढ़ायें। साथ ही अंतर्जाल को अपनी क्रूर भड़ास को व्यक्त करने की बजाय अपनी कोमल अभिव्यक्ति को बाहर आने दें।
किसी को डराये नहीं क्योंकि डरपोक आदमी क्रूर होता है वह हमला न करे तो मन में बुरा सोच भी सकता है और उसकी बद्दुआऐं भी दे सकता है। अगर कोई हमारी चाल ढाल या उपलब्धि से डरकर क्रूरता पूर्ण व्यवहार करता है तो उसका प्रतिकार करें पर वह मूंह से बकता है तो बकने दें। अपनी राह चलें। अगर अंतर्जाल पर पर रचनाकर्म कर रहे हैं तो अज्ञानी और डरपोक लोगों की क्रूरतम भडास झेलने को तैयार रहें हालांकि स्नेह पूर्ण अभिव्यक्ति भी मिलेगी-यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि वह भी अगर गलत नाम से हुई। इतना डरने या डराने की जरूरत नहीं है। अंतर्जाल से जनसमुदाय का संपर्क तभी इस माध्यम से बढ़ेगा जब अभिव्यक्ति सहजतापूर्ण होगी।

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2 comments:

शरद कोकास said...

ऐसा कहा जाता है कि बिल्ली जब डर जाती है तो वह झपट्टा मारती है । कभी कभी मनुष्य भी इस तरह की हरकत करता है । अभिव्यक्ति सहज होनी चाहिये साथ ही उसमें परपीड़क प्रवृत्ति नही होनी चाहिये अत्म पीड़ा और परपीड़ा दोनो ही असहजता के प्रतीक हैं । विचार का अपना महत्व होता है इसे प्रकत करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये कि व्यापकता मे उसका क्या प्रभाव होगा । आपका यह चिंतन महत्वपूर्ण है ।

खुशदीप सहगल said...

दीपक जी, ये सारी ग्रंथियां अपने को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति से उपजती हैं... अगर बड़ा देश है तो वो छोटे देश को हेय दृष्टि से देखता है...अगर कोई बॉस है तो वो अपने मातहतों को कीड़े-मकोड़ों से ज़्यादा नहीं मानता...कोई अमीर है तो वो गरीबी और गरीबों को धरती पर सबसे बड़ा गुनाह मानता है...अब किस-किस को रोइएगा, यहां हर एक के सिर पर तो सलीब है...

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