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11/21/09

नजर, नजारे और नजरिया-हिन्दी कहानी(nazar,nazare aur nazriya-hindi kahani)

हमारी उससे जानपहचान थी पर कोई खास मित्रता नहीं थी। पास की कालोनी में रहता था और पता नहीं कब उससे हमारा परिचय हुआ था। अलबत्ता रास्ते में जब मुलाकत होती तो हमारे बची अभिवादन अवश्य होता। उस दिन वह  रास्ते मेें मिल गया। हमसे उसने पूछा‘-‘कहां जा रहे हो?’

हमने कहा-मंदिर जा रहे हैं। तुम कहां जा रहे हो या आ रहे हो?’

उसने कहा-‘घर से निकला था तफरी करने।  आज छुट्टी है सोचा यह  सड़क भी पैरों से थोड़ा नाप लूं।  रोज कार से चलते हुए शरीर बेडोल हो गया है। चलो तुम्हारे साथ मंदिर चलता हूं।’

हम दोनों साथ साथ मंदिर की ओर चले। रास्ते में वह अपने हाल सुनाने लगा-‘आजकल मनुष्यों में संवदेनाएं तो नाम की भी नहीं रही।  जिसे देखो वही काटने दौड़ता है। कल एक आफिस में गया था अपने काम से! वहां मेरे से एक आदमी ऐसे बात कर रहा था कि वह जैसे मेरा मालिक हो।’

हमने कहा-‘यह तो सभी जगह चल रहा है।  लोग लोहे की चीजें को पूजते पूजते लोहे जैसे हो गये हैं। लोहे के सामान लोगों ने अपने इष्ट बना लिये हैं। जैसा आदमी का इष्ट होता है वैसी उनका सोच भी होता है।

फिर वह बोला-‘आजकल महंगाई भी बहुत बढ़ गयी है।  घर्र  और बच्चों की शिक्षा का खर्च करना कठिन हो गया है।’

         इस तरह की बातें करते हुए हम मंदिर पहुंचे। वहां हम ध्यान लगाने बैठे तो वह मंदिर में माथा टेककर हमारे पास ही बैठ गया।  इधर उधर के दृश्य देखने लगा।  कहीं स्त्री कोई  मंदिर की मूर्ति पर फूल चढ़ा रही थी कोई पुरुष वहां किसी पवित्र किताब का पाठ जोर की आवाज में कर रहा था। कोई प्रसाद चढ़ा रहा था तो कोई बाहर बांट रहा था।  लोग अपनी मस्ती में मस्त थे और वह बैठा देख रहा था।

         ध्यान समाप्त करने के बाद जब वह हमारे साथ बाहर निकला तो कहने लगा कि ‘यार, एक बात है कि मंदिर में आओ तो एक दूसरी दुनियां देखने को मिलती है।  कभी नहीं लगता कि धर्म को कोई खतरा है। सच तो यह है कि जो लोग धर्म के खतरे की बात करते हैं वह शायद इस तरह मंदिरों में नहीं जाते।  वाकई हमारी मंदिर संस्कृति बहुत जोरदार है।  यहां स्त्री पुरुष  दोनों ही आते हैं जिसमें जवान, बच्चे, बूढे़ और अधेड़ वर्ग सभी होते हैं। लोग कहते हैं कि युवक युवतियों को धार्मिक बातें पसंद नहीं आती पर यहां तो उनकी संख्या ही अधिक है। 

         हमने कहा-‘हां, आस्था सभी में होती है और उसे जो अभिव्यक्त करते हैं वही भक्त कहलाते हैं।

फिर हमने उससे कहा कि ‘अभी हमें बाजार से समान खरीदना है, तुम चलोगे साथ? कुछ दूर है पर हमें पैदल घूमना है।’

    उसने कुछ सोचा और बोला-‘थोड़ा दूर है! चलो चलते हैं, मैं भी अपना कुछ सामान खरीद लूंगा।’

हम दोनों थोड़ी दूर स्थित बाजार की तरफ चले। रास्ते में देशी दारु की कलारी भी पड़ती  थी।  वहां भी कुछ लोग अपने काम में व्यस्त दिखे। हमारे पास से एक आदमी निकला जिसके पांव लड़खड़ा रहे थे और उसके मुंह से बदबू भी आ रही थी।’

      हमारे साथ चल रहे उन सज्जन ने कलारी के अंदर की तरफ नजरें की और बोला-‘यार, कमाल है! सुबह सुबह लोग कैसे पीने लगते हैं।  वाकई इस नजारे को  देखो तो ऐसा लगता है कि देश का तो वाकई कचड़ा हो गया है।  समझ में नहीं आता क्या होगा इस देश का? इनमें धर्म कर्म की चीज नहीं है।’

          हमने कहा-‘हां, इस तरह के लोग भी हैं। वैसे यहां तुम्हें धर्म कर्म की बात सोचना भी नहीं चाहिए। अभी तुमने मंदिर में भी देखा था कि वहां धर्म कर्म की बात समझ में आती है। कम से कम वहां इससे अधिक संख्या में लोग थे इसलिये देश की चिंता मत करो।’

वह सोच में पड़ गया और बोला-‘भईया, एक बात समझ में नहीं आती। मंदिर में वहां लोगों की श्रद्धा देखकर लगता है कि हमें धर्म और देश के प्रति आश्वस्त हो जाना चाहिए। यहां कलारी की तरफ देखते हैं तो सभी कुछ अधर्ममय दिखता है।’

हमने कहा-‘यार, अपनी नजर से ही नजरिया है।  यह संसार इसी तरह ही दो प्रकार के लोगों से भरा हुआ है। हम चलते फिरते हैं तो हमारी नजर के  सामने तमाम तरह के नजारे आते हैं, और उनको देखकर हमारा नजरिया बनता है।  अब नजर स्थिर नहीं रह सकती तो नजारे बदलेंगे और उसे हिसाब से नजरिया भी।  इसलिये किसी एक बात को लेकर चिंतित या खुश होने जैसी कोई बात नहीं है।’

वह बोला-‘हां यह बात सही है। इसलिये हमारे संत महात्मा कहते हैं कि सत्संग करो और भले लोगों से संबंध बनाओ। जैसा हम चाहेंगे वैसा ही यह संसार हमारे लिये होगा।’

हमने सहमति में सिर हिलाया। बाद में हम दोनों अलग हुए तब हम सोच रहे थे कि वाकई सत्संग का असर होता है।  कम से कम उसके साथ घूमते हुए ऐसे नजारों को वास्तव में देखने का अवसर मिला जो देखते तो रोज हैं पर उन पर कभी कोई नजरिया नहीं तय करते।  जो बात हम उसे सिखा रहे थे दरअसल वह हम भी नहीं सीखे थे।  वह हमसे ज्ञान ले गया कि दे गया-हमारी समझ में नहीं आया। फिर सोचा-‘अरे यार, यह दुनियां तो पूरे दिन में ही इतने रंग बदलती है तो फिर सदियों में कितनी बार बदलती होगी।  न यहां नजर स्थित है न नजारे, इसलिये नजरिया भी स्थाई नहीं हो सकता।



 


कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com

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10/15/09

चौराहे पर चर्चा-हिंदी लघुकथा (chaurahe par gyan charcha-hindi laghu katha)

वह संत अपनी शिष्य मंडली के साथ रेल में यात्रा करने के लिये उस बोगी में चढ़ गये जिसमेें अधिक भीड़ नहीं थी। दरअसल वह विमान में यात्रा करने की अर्हता और पात्रता रखते थे पर उस दिन वहां से कोई उड़ान नहीं थी जिससे वह अपने से कम स्तर पर यात्रा करने के लिये बाध्य हो गये थे क्योंकि उनको वहां कथा खत्म कर दूसरी जगह प्रारंभ करना थी। उस बोगी में वहां दूसरे लोग भी थे पर अच्छा खासा भक्त समुदाय होने के बावजूद उनका चेहरा लोगों के लिये अधिक पहचाना हुआ नहीं था कि लपककर सभी उनके पास दर्शन करने पहुंच जाते। अलबत्ता भक्त समाज इतना तो था ही जिनके दान से उन्होंने अच्छी संपत्ति अर्जित कर ली थी।
रेल में बैठे क्या करते? समय बिताने के लिये वहां अपने शिष्यों को बातचीत के बहाने उपदेश देने लगे-‘यह मोह माया में फंसी दुनियां है इसमें ज्ञान की बात कहते और सुनते सभी हैं पर धारण उसे कोई ही कर पाता है। अरे, यह लालच, लोभ, काम, क्रोध और मोह ऐसे विकार हैं जिनसे हम जैसे तत्वज्ञानी ही छुटकारा पा सकते हैं।’
वहां एक सज्जन उनके पास थोड़ी दूर बैठे यह सुन रहे थे। उन्होंने उनसे उत्सुक्तावश पूछा-‘महाराज यह तत्व ज्ञान क्या है? उसकी बात करते तो सभी हैं पर समझाता कोई नहीं है।’
वह संत मजाक के अंदाज में बोले-‘अरे वाह, न दान न दक्षिणा! ऐसे ही ज्ञान पाना चाहते हो।’
सभी लोग हंसने लगे। वह सज्जन चुप हो गये। कुछ देर की खामोशी के बाद फिर संत ने उन सज्जन की तरफ देखते हुए कहा-‘देखो भई, हम तो मजाक कर रहे थे। बुरा मत मानना! हम संत इसी तरह ही समझाते हैं।’
उन सज्जन ने कहा-‘महाराज, मैंने अपने महापुरुषों की वाणी पढ़ी और देखी है। उसमें प्रमाद और कौतूहल से बचने को कहा गया है। फिर आप तो संत हैं यह मजाक या प्रमाद किसलिये?’
इससे पहले संत कुछ कहते उनके शिष्य उबल पड़े-‘अरे, कैसे आदमी हो? संतों को उपदेश देते हो। क्या इनको कोई सामान्य आदमी समझ रहे हो? खामोश हो जाओ।’
इधर संत ने अपने शिष्यों को कुछ पुचकारते और डांटते हुए कहा-‘चुप हो जाओ! हमारा ज्ञान रोज सुनते हो पर अभी भी इतना नहीं सीखा कि सभ्य मनुष्य से कैसे बात की जाती है?’
शिष्य चुप हो गये तो फिर वह उन सज्जन से बोले-‘देखो भई, हम तो अपने शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। आप क्यों उसे सुनने का कष्ट उठा रहे थे। आपके समझ में हमारी बात नहीं आती तो आप खामोश रहते।’
उन सज्जन ने कहा-‘पर महाराज, मैंने अपने महापुरुषों की वाणी पढ़ी है उसमें तो लिखा है कि ज्ञानचर्चा चौराहे पर नहीं करना चाहिये।’
बस!अब तो उन संत के शिष्यों का धैर्य जवाब दे गया। उनमें से कुछ तो अपने कमीज की आस्तीनें चढ़ाते हुए उन सज्जन की तरफ बढ़े। एक ने चिल्लाकर कर कहा-‘अबे, तेरी समझ में नहीं आ रहा। यह क्या कोई चौराहा है और जहां महाराज ज्ञानोपदेश कर रहे हैं। हमारे सौभाग्य है कि ऐसे महान पुरुष का सत्संग मिल रहा है। तुम उठो और कहीं दूर अन्यत्र जाकर बैठो। बोगी में बहुंत जगह खाली है।’
बात बढ़ती देख उन्हीं सज्जन के पास बैठे दूसरे सज्जन से कहा-‘चलो भाई, कहीं दूसरी जगह बैठ जाते हैं।’
दोनों सज्जन वहां से उठकर थोड़ी दूर जाकर बैठ गये। दूसरे सज्जन ने पहले से कहा-‘आप भी कहां चक्कर में फंस गये? देखा नहीं उनके शिष्य कैसे आपके विरुद्ध विष वमन कर रहे थे। अरे, आप जानते हैं कि चौराहे पर ज्ञान चर्चा नहीं करना चाहिये पर फिर भी आप स्वयं ही वही कर रहे थे।’
पहले सज्जज ने कहा-‘हां, यह मेरी गलती थी। शायद महापुरुष यह बात मेरे जैसे लोगों के लिये कह गये हैं ज्ञान का व्यापार करने वाले उन संत और मंडली के लिये नहीं। हमारे महापुरुष जानते थे कि हमारे ज्ञान में शब्द और भाव का जो आकर्षण है वह ऐसे कथित संतों के लिये विक्रय की वस्तु हैं जिसका वह चौराहे पर ही व्यापार करेंगे। ऐसे में कोई ज्ञानी भी यही करेगा तो वह पिट भी सकता है।’
दोनों सज्जन आपस में हंस पड़े।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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