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9/30/11

बीमारी, इलाज और परहेज की चर्चा का फैशन-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (bimari, alaj aur parhej ki charcha ka fashan-hindi vyangya kavitaen or satire poem)

अपनी बीमारियां साथ लेकर
शहर में घूम रहे लोग
दवाईयों के साथ परहेज के
नुस्खे मिलने वालों में बांट रहे हैं,
दिल और दिमाग से बीमार समाज में
हमारे चारों तरफ भीड़ है
मगर हम ख्यालों से तंदुरस्त
लोगों को दोस्ती के लिये छांट रहे है।
--------
वह चारों लोग आपस में
बात कर रहे थे
हम उनके पास जाते जाते
चर्चा के विषय के अनुमान कर रहे थे।
शायद वह राजनीति पर बोलते होंगे,
किसी फिल्म की कहानी को तोलते होंगे,
क्रिकेट के स्कोर पर चर्चा होती होगी,
सुना रहा होगा अपने खाने का स्वाद
सभी लग रहे थे भोगी,
जब पास जाकर सुना और देखा
तब पाया
वह तो बीमारी, इलाज और
परहेज पर बात कर रहे थे।
-------------
बीमारियां अब फैशन गयी हैं
लोग बीमारी, इलाज और फैशन
पर सरेआम चर्चा करते हैं,
अपनी बीमारी को अपनी काबलियत
इलाज और परहेज सभी को बताना
शान समझते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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12/9/10

विवाह की याद संजोये रखने का प्रयास-हिन्दी लेख (vivah ki yaad sanjoye rakhne ka prayas-hindi lekh)

कुछ लोगों को अपना या अपने परिवार के सदस्य का जन्म दिन, मुडन, जनेऊ तथा विवाह के कार्यक्रम को यादगार बनाने का जुनून होता है। तय बात है कि यह केवल उन्हीं लोगों पर लागू होती है जिनके पास पर्याप्त पैसा है। मुश्किल तब शुरु होती है जब अल्प धनी उनकी देखा देखी अपना घर गिरवी रखकर कर्ज लेकर ऐसी यादें संजोने का प्रयास किया जाता है। वैसे अपने देश में धनाढ्य लोग चाहे कितना भी समाज में समरसता भाव लाने का उपदेश देते हों पर जब वैभव प्रदर्शन की बात आती है तब वह उससे बाज़ नहीं आते यह जानते हुए भी कि इससे वैमनस्य भी बढ़ता है।
जन्म मृत्यु जीवन का खेल है और इंसान मुंडन, जनेऊ, सगाई तथा विवाह जैसे संस्कारों में अपना खेल कर अपना समय व्यतीत कर मनोंरजन करता है। यह सब एक तरह से हमारे मनुष्य समूह को प्रसन्नता प्रदान करने वाले अवसर हैं। इसी तरह अनेक कर्मकांड भी धर्म के नाम पर रचे गये हैं। एक नारी जीव का पुरुष से संयोग तो विधाता ने पहले ही तय कर दिया है क्योंकि सारे संसार का जीवन इसी संयोग से निर्मित होता है। केवल मनुष्य ही नहीं अन्य जीवों में भूख, प्यास तथा काम के भाव उसी तरह प्रवाहित है जैसे मनुष्यों में। यह अलग बात है कि मनुष्य समुदाय ने विवाह नाम की परंपरा पर इतने सारे कर्मकांड अपना रखे हैं कि ऐसा लगता है कि जैसे स्त्री पुरुष तत्व का संयोग केवल उसी में ही होता है। कहीं बहुविवाह परंपरा है तो कहीं एक ही वर के साथ वधु के जीवन व्यतीत करने की रीति है। हम यहां इस विषय पर बहस नहीं कर रहे कि एक स्त्री या पुरुष को एक समय में एक से अधिक जीवन साथी रखना चाहिए कि नहीं। क्योंकि यह संवेदनशील विषय है और इस पर धर्म जाति तथा क्षेत्र के आधार पर अनेक तरह की परंपराऐं हैं जो विवाद का कारण बनती है। इसके बावजूद यह सत्य है कि विवाह के बाद स्त्री पुरुष के जीवन में अनेक ऐसे परिवर्तन आते हैं जिसकी कल्पना तक वह नहीं कर सकता। कहा भी जाता है कि शादी वह लड्डू है जिसने खाया वह भी पछताता है जो नहीं खाया वह भी रोता है।
विवाह को लेकर भविष्य की कल्पना क्या करेगा कोई भी? आदमी विवाह पूर्व तक चाहे जितने सपने देख ले बाद का जीवन उसके लिये निर्विवाद और शांत नहंी रह पाता। विवाह पश्चात् के जीवन का रंग इतना वीभत्स है कि हमारे समाज के लेखकगण अपनी कहानियेां में केवल विवाह तक ही अपना विषय रखते हैं क्योंकि बाद में गृहस्थ जीवन की कहानियों में सुखद दृश्य अधिक नहीं लिखे जा सकते। फिल्म आदि में भी प्रेम प्रसंग के इर्दगिर्द ही ताना बुना जाता है। स्थिति यह है कि कहीं भाई भाभी का रोल हो तो वह ऐसे कलाकार को दिया जाता है जिसको चरित्र अभिनय निभाने के लिये जाना जाता हो। कोई बड़ा नायक या नायिका विवाहित भाई या भाभी का पात्र नहीं निभाता।
यही स्थिति समाज के चिंतकों की है। आये दिन लड़कियों के घर से भाग जाने पर अक्सर विद्वान लोग टिप्पणी करते हैं कि हरेक को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार होना चाहिए। अनेक नारीवादी लेखक तो ऐसे हैं जो घर से भागने के प्रकरणों का जैसे इंतजार करते हैं। कब कोई विद्रोही जोड़ा सामने आये और उसे कानूनी संरक्षण के लिये वह गुहार लगायें। जबकि हकीकत यह है कि विवाह बाद का जीवन एक ऐसा दौर है जो अनंतकाल तक चलता है। विवाह पश्चात् जीवन में जब नमक, तेल, आटे का का भाव पता चलता है तब सामान्य लोग ही नहींे विशिष्ट लोग भी विवाह की वह यादें भूल जाते हैं जिनको संजोने के लिये उन्होंने ढेर सारे पैसै खर्च किये होते हैं।
शुरु में सभी लोग अपनी शादी का एल्बम, सीडी या उपहार में मिला सामान दिखाते हुए लोगों में अपना जलवा बिखेरते हैं पर जब जीवन का संघर्ष मय रूप सामने आता है तब धीरे धीरे वही विवाह की यादें भयवाह लगती हैं ऐसे में सब कुछ भूल जाता है।
इधर हमारे देश का धनाढ्य वर्ग विवाह के अवसर पर नित नित नये फैशन अपना रहा है। कहीं हेलीकाप्टर पर तो कोई पानी के जहार पर शादी कर रहा है। इतना ही नहीं अब विवाह के समारोह पर जयमाला के समय वर वधु को सीढ़ियों के सहारे ऊंचे मंच का इस्तेमाल किया जाने लगा है। उस समय विशेष दृश्य बनवाने के लिये फोटोग्राफर बाकायदा अभ्यास करते हैं। ऐसा लगता है कि विवाह तो बस यही है। मगर फिर ऐसा ही दृश्य दूसरी जगह! तब सोचते हैं कि भला इसमें विशेष क्या है?
उस दिन एक आदमी ने हमसे पूछा-‘यार, एक बात बताओ हमारे बेटे की शादी में खाना कैसा बना था।’
हम चौके। वह कम से कम हमसे दो महीने पहली वाली बात पूछ रहा था। उसके बाद पता नहीं कितने विवाह कायक्रमों में हम शामिल हो चुके थे। हमने कहा-‘यार, गाज़र का हल्वा अच्छा बना था।’
वह बोला-‘यार, क्यों मज़ाक बनाते हो। वहां तो गाज़र का हल्वा नहंी बना था।’
हमने कहा-‘क्या बात करते हो। हल्वा था वहां, हमें बहुत अच्छा लगा था।’
वह बोला-‘वह तो मूंग की दाल का था।’
हमने कहा-‘हां, वही तो कह रहे हैं। वह तो सर्दी का समय हैं न! इसलिये गाज़र का हल्वा निकल गया। वैसे तुम्हारे बेटे के विवाह कार्यक्रम में ं खाना तो बहुत अच्छा था।’
हमने किसी चीज़ का नाम नहीं लिया क्योंकि खुटका था कि वह वहां रही हो कि नहीं।
वह बोला-‘यार, मेरा एक रिश्तेदार मुझसे कह रहा था कि खाना बेकार बना था। मेरा उससे विवाद हो गया।’
हमने कहा-‘अरे यार, तुम इन बातों को भूल जाओ। कुछ लोग ऐसे हैं जो दूसरों के अच्छे काम से जलते हैं। वैसे एक बात दूसरी भी है कि तुमने खुद तो खाना बनाया नहीं था। बनाने वाला हलवाई और उसके नौकर थे। संभव है कि कोई एक दो चीज़ ठीक न बनी हो।’
वह बोला-‘नहंी, ऐसे कैसे? नाम तो हमारा खराब होता है। वहां सारा खाना अच्छा बना था। तुम बताओ कोई ऐसी चीज थी जो ठीक न बनी हो।’
हमने कहा-‘सब चीजें अच्छी थी। हमने सब खाया। बढ़िया था!’
फिर वह बोला-‘अच्छा बताओ, डेकोरेशन कैसा था! अच्छा था न! वह मेरा रिश्तेदार उसे भी खराब बता रहा था।’
हमने कहा-‘वह भी तो शादीघर वाले स्वयं करते हैं। उसमें तुम्हारा क्या दोष?’
वह बोला-‘ऐसे कैसे? नाम तो हमारा खराब होता है। इतने पैसे खर्च किये हैं तब यह कैसे सहन कर लें कि कोई वहां की साज सज्जा पर उंगली उठाये।’
हमने कहा-’वैसे तुम्हारा रिश्तेदार कोई तुमसे जलने वाला लगता है। मेरे ख्याल से ऐसी साज सज्जा हमें बहुत कम देखने को मिलती है जैसी हमने वहां देखी थी।’
इससे पहले कि वह कोई अन्य सवाल करे, हम वहां से खिसक लिये। सच तो यह है कि उसके बेटे की शादी के बाद हम इतनी शादियों में शामिल हो चुके थे कि उसके दृश्य हमारी स्मरण शक्ति से विलोपित हो चुके थे। ऐसे में हम सोच रहे थे कि आखिर आदमी शादी की यादों को संजोने का प्रयास आखिर करते किसके लिये है? दूसरे याद रखते नहीं और स्वयं याद रखना एक समय बाद व्यर्थ लगता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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9/29/10

रहबरों का आसरा-हिन्दी कविता

आस्था को कौन गिरा सकता है
विश्वास को कौन तोड़ सकता है,
हृदय में उपस्थित देवताओं को
कौन अपमानित कर सकता है,
जिन इंसानों ने तय कर दिया है
ज़माने की हवा बिगाड़ेंगे
आसमान के ख्वाबी फरिश्तों को
ज़मीन पर लाकर रंग निखारेंगे
अपने मतलब के लिये जज़्बातों को
जलता दिखाकर
झौंक देंगे शहर का आग में
रहबरों का ही आसरा है उनको
इसलिये बड़ा हुआ है हौंसला
कोई उनका क्या बिगाड़ सकता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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8/26/10

जल को न जलाओ-हिन्दी शायरी(water trouble-hindi shayari)

जब नदी बनकर बही समंदर
लोहे का बना हो गया लकड़ी का
हर घर उसमें बह गया,
जिस जीवन का मतलब नहीं समझते थे,
तबाही का परवाना लेकर आया
बाढ़ का पानी कह गया।
पैट्रोल गाड़ी चला सकता है
पर जीवन नहीं,
लोहे लंगर के बने ढांचे
फंसे रहे सड़क पर
अपने पैसे पर इतराने वालों!
जिसे रौंदा तुमने हर पल अपने पांव तले
चढ़कर आया वह पानी तुम्हारे सिर
जिसमें तुम्हारा लोहप्रेम ढह गया।
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जल को तुम न जलाओ
वरना वह तुम्हें बहा ले जायेगा,
जिंदगी के आधार को सस्ता न समझना
वरना आग की तरह जलाने लगेगा
जब सिर पर चढ़ा चला आयेगा।
---------

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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8/7/10

खिलाड़ी नहीं खेल चाहिए-हिन्दी व्यंग्य (sports without sportsmen-hindi satire article)

अक्लमंद को इशारा काफी होता है और मूर्ख बरसों तक कोई बात समझाने के बाद भी नहीं समझता। राजधानी दिल्ली में चल राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी चल रही है और उसमें भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं तो कुछ बुद्धिमान-ऐसा वह दावा करते हैं पर हैं तो निरे मूर्ख ही-सवाल कर रहे हैं कि जब हमारे देश में खिलाड़ी ही नहीं है तो फिर राष्ट्रमंडल, एशियाड या ओलम्पिक कराने की जरूरत क्या है? इतना पैसा यहीं कि खिलाड़ियों पर खर्च कर पहले देश के खेल का स्तर ऊंचा क्यों नही किया जाता?
यकीनन ऐसे लोगों को देश की व्यवस्था का ज्ञान नहीं है या फिर अखबार नहीं पढ़ते वरना ऐसा सवाल कभी नहीं करते। खिलाड़ियों का हाल यह है कि अभी दिल्ली में विश्व कप हुआ था जिसमें भारतीय खिलाड़ी उसके शुरु होने से पहले ही पैसों की मांग करने लगे। उनको धमकाया गया कि‘अगर नहीं खेलोगे तो बाहर कर दिय जाओगे!
वह खेले और हारे। अभी तक हमारे देश के व्यवस्थापक यह नहीं समझ सके कि खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाये बिना कोई खेल इस देश में बढ़ नहीं सकता। बाज़ार और देश की व्यवस्था इस तरह मिल गयी है कि यह कहना भी कठिन है कि कौन किसको चला रहा है? हाकी के खेल के प्रचार के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिये। बैंक को एटीएम और क्रेडिट काड के प्रचार के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिये। बीमा पॉलिसी बिकवाने के लिये क्रिकेट खिलाड़ी चाहिए। क्रिकेट खिलाड़ी अपने खेल से पैसा कमा कर देते हैं जिसके बदल उनको व्यवस्था से जुड़े उन संस्थानों के भी विज्ञापन मिल जाते हैं जिनका सीधा संबंध बाज़ार से है।
उस दिन एक ए.टी.एम केंद्र पर पैसा निकालते हुए एक आदमी की नज़र खिलाड़ियों के विज्ञापन पर पड़ गयी। उस आदमी ने कहा-‘आखिर, इतने प्रतिष्ठित बैंक को इन खिलाड़ियों से विज्ञापन की क्या जरूरत पड़ी? उसके पास तो वैसे ही ग्राहक आता है?’
दूसरे आदमी ने कहा-‘यह पैसा खर्च करने की बात है जो तुम समझोगे नहीं।’
यह पैसा खर्च करने की बात है। अगर बैंक चाहे तो किसी हॉकी खिलाड़ी से भी विज्ञापन करा सकता है-आखिर वह हमारा राष्ट्रीय खेल है। मगर वह ऐसा नहीं करेगा क्योंकि इससे वह किसी ऐसे खिलाड़ी को प्रतिष्ठित करेगा जिसका वह लाभ उठायेगा साथ में पैसे भी लेगा। कम लेगा तो कमीशन कम बनेगा इसलिये वैसे भी सस्ता खिलाड़ी उनको नहंी चाहिये। दूसरी बात यह है कि क्रिकेट खिलाड़ी स्वनिर्मित हैं। मतलब उनसे विज्ञापन कराकर उन्हें प्रतिष्ठत करने जैसा पाप नहीं करना पड़ता। उनका पेट भरा हुआ है इसलिये किसी भूखे को खिलाने जैसा अधर्म भी नहीं करना पड़ता।
इस देश के व्यवस्था से जुड़े लोगों की यही समस्या है कि वह स्वयं खेल, कला, या साहित्य से स्वयं नहीं पनपते इसलिये उसका प्रबंधन अपने लेकर अपने मन को तसल्ली देने के साथ उससे संबंधित संस्थाओं पर कब्ज़ा कर अपने को महान सिद्ध करना चाहते हैं। दूसरी बात यह कि उनके मन में ढेर सारी कुंठाये हैं इसलिये वह किसी नये खिलाड़ी, कलाकार या साहित्यकार को शिखर पर पहुंचाना पाप समझते हैं। अगर कोई महिला हो तो उसके देह शोषण का ख्याल उनको आता है पर अगर पुरुष हो तो उससे दूसरी नौकरी करवा लेंगे। फिर भी ऊंचाई पर पहुंचाने का पाप नहीं करेंगे।
सीधी बात कहें तो उनको खिलाड़ी नहंी खेल चाहिये। खिलाड़ी तो खाना खायेगा, कपड़ा मांगेगा और आने जाने की सवारी के लिये उसे भत्ता भी चाहिये। कमीशन देने से वह रहा! ऐसे में जाये वह भाड़ में! मगर खेल चाहिये! क्योंकि खेल होगा तो मैदान बनेगा। उस पर घास लगेगी! कुर्सियां बनेंगी, लाईट लगेगी और ख्ेाल के लिये तमाम सामान भी तो खरीदने का अवसर मिलेगा। यह सब होगा तो ठेके होंगे। ठेका होगा तो कमीशन होगा। कमीशन एक तरह से भ्रष्टाचार की जननी है। मगर अब तो वह भी इतनी पूज्यनीय नहीं रही। ठेका ही ऐसे लोगों को दिया जाता है जो अपने परिवार के सदस्य या रिश्तेदार हों।
जब खेल संगठनों पर सीधे नियंत्रण की बात आ जाती है तो हमारे देश के विकासवादी-जो कि वैसे हर मामले में सरकार से दखल की अपेक्षा रखते हैं-स्वायत्ता की रक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने लगते हैं। उनको यह सरकार नियंत्रण तानाशाही लगती है।
नियम तो यह है कि सरकार जहां पैसा देती है उसके लेखों की जांच करने का अधिकार लेखा परीक्षा संस्थाओं को है पर संभवतः खेल संगठन उससे अछूते हैं-ऐसा लगता है इसलिये उनकी बेईमानी बाहर नहंी आ पाती। यह खेल संगठन पल रहे हैं सरकार के पैसे पर, मगर उनका काम चल रहा है प्राईवेट कंपनी की तरह। इनके अध्यक्षों का व्यवहार तो ऐसा लगता है जैसे कि अन्य पदाधिकारी उनके मुनीम और खिलाड़ी मज़दूर हों। देश में खेलों की जो दशा है उसकी गाथा क्या सुनायें? क्रिकेट तो खैर अब खेल ही नहंी रहा पर शतरंज, टेनिस और बैटमिंटन में जो खिलाड़ी चमक रहे हैं वह उनके निजी प्रयास हैं और कोई खेल संगठन उनको उभारने का दायित्व नहीं ले सकता। ऐसे में खेल संगठनों की स्वायत्ता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। ऐसी स्वायत्ता किस काम की जो परिणाममूलक न हो।
मगर यहां परिणाममूलक संस्था चाहता कौन है? मुख्य विषय है संस्था को मिलने वाला पैसा जो अंततः सरकारी राजस्व से ही प्राप्त होता है। पूरी लड़ाई इसी राजस्व से प्राप्त पैसे को हड़पने की है। ओलंपिक में भारत को एक स्वर्ण पदक मिल जाने पर ही यहां लोग नाचने लगते हैं। कुछ बुद्धिमान तो इतने बेशर्म हैं कि कहते हैं कि ‘खेलों में भाग लेना महत्वपूर्ण है न कि पदक जीतना।’
अगर यह तर्क मान भी लें तो फिर किसलिये इतने तामझाम करते हैं खेलों के विकास के लिये। सीधे कहीं से भी उठाकर खिलाड़ी भेज दो। भाग ही तो लेना है कोई जीतना थोड़े ही है। हम तो कह रहे कि सारे पदाधिकारी ही जाकर खेलने लगो। इतने सारे खिलाड़ियों को शिविर में बुलाकर पैसे खर्च करने की क्या आवश्यकता है? तब हम भी भाग लेने की बात पर तसल्ली कर लेंगे।
साठ साल से इतना पैसा खर्च हुआ पर खिलाड़ी कोई बनाया नहंी! मिल्खा सिंह या पीटी ऊषा जैसा कोई अपने आप पैदा हो जाये अलग बात है वरना तो अपने अपने लोगों को-वह भी बिना सिफारिश के नहीं आ सकते-भी भेजने के आरोप लगते हैं।
इस देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जो कहते हैं वह झूठ बोलते हैं या राजस्व से प्राप्त पैसा हड़पने की उनकी नीयत है। इस देश में इतने सारे गांव और शहर हैं जहां चीन से अधिक प्रतिभायें मिल सकती हैं। उस दिन हम पार्क में आठ से 14 वर्ष के बच्चों को फुलबाल खेलते हुए देख रहे थे। उनके खेलने का तरीका देखकर लगता था कि अगर उनको फुटबाल खिलाड़ी के रूप में चुनकर उन पर खर्च किया जाये तो वहां भी एक दो पेले मिल सकता है।
ऐसे हजारों शहर और गांव है जहां हमारे बच्चों के खेल को निष्काम भाव से खेलते हैं जो कि अच्छा खिलाड़ी बनने में सहायक होता है। मगर नहीं! खेल संगठनों के लोग भी हिन्दी फिल्म वालों की तरह ही वातानुकूलित कमरों में बैठकर खिलाड़ियों का इंतजार करते दिखते हैं। हिन्दी फिल्म वाले कहते हैं कि हिन्दी में लेखक नहीं मिलते। दरअसल वह चाहते हैं कि लेखक उनके लिपिक बन जायें। अखबारों में छपी खबरों से तो यही लगता है कि इन संगठनों के उच्च पदाधिकारी भी मज़दूर चाहते हैं खिलाड़ी नहीं।
हमारा मानना है कि खिलाड़ी भी जमीन में उगता है मगर उसके लिये यह जरूरी है कि खेल के शुभचिंतक किसान बनकर दिखायें न कि अधिकारी। मगर यह कल्पना ही है। हम जानते हैं कि मैदान और खेल का सामान खरीदने का लक्ष्य तय करने वाले वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस इंतजार में रहते हैं कि कब कोई मज़दूर की तरह खिलाड़ी आये और उससे अपना काम करवायें। वह न आये तो बाकी के ठेकेदारों से ही कमीशन पर खिलाड़ी मंगा लेते होंगे। चल गया काम! खेलों में भाग लेने तक का ही लक्ष्य है तो उसे कमीशन लेकर पूरा किया जा सकता है। पिछले पैंसठ सालों से यह नाटक चल रहा है और इसके समाप्त होने के आसार अभी नज़र नहीं आते। इस नाटक का नाम यही है कि ‘खिलाड़ी नहीं खेल चाहिए’।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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7/27/10

ज़िदंगी के कांटे और गुलाब-हिन्दी शायरी (zindagi ke kaanti aur fool-hindi shayari)

जब तक कांटों के साथ था
गुलाब जिंदा रहा
अलग हुआ तो मुरझा गया,
वह चिराग क्या अपना दर्द बयान करे
जिसको जलाने वाला ही बुझा गया।
पल पल रंग बदलती इस जिंदगी में
कभी खुशनुमा पल तो
कभी हादसे भी पेश आते हैं,
उम्मीद में छा जाता ग़म का अंधेरा
जहां टूटे सपने चुभोते हैं नश्तर
वहां तिनके भी फरिश्ते बन जाते हैं,
अपनों ने बढ़ायी हैं जहां उलझने
वहां कोई गैर मसले सुलझा गया।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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7/19/10

नैतिक शिक्षक-लघु हास्य व्यंग्य (naitik shikshak-laghu hasya vyangya)

उस दिन वह शिक्षक अपनी पत्नी के ताने सुनकर घर से निकला था इसलिये उसकी मनस्थिति डांवाडोल हो गयी थी। दरअसल वह शिक्षक अपने यहां पढ़ने वाले छात्रों को बड़े मनोयोग से पढ़ाता था इसलिये उसके विषय में बच्चों का ज्ञान अच्छा हो गया था। अतः उसके यहां कोई ट्यूशन पढ़ने नहीं आता।
पत्नी ने उस दिन उसे ताना यह दिया कि ‘देखो तुम्हारे दोस्त शिक्षकों के यहां कितने ढेर सारे बच्चे ट्यूशन पढ़ने आते हैं। एक तुम हो नालायक निकम्मे! अनेक विद्यालयों से नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाने पर नौकरी से निकाला जा चुका है। खुद तो फंसे ही हो बच्चों का भी भविष्य बिगाड़ते हो। पता नहीं मेरे बाप ने क्या सोचकर तुम्हारे साथ बांध दिया था? यह भी पता नहीं किया कि तुम तनख्वाह से अलग कुछ कमाना जानते हो कि नहीं।
अतः विज्ञान का वह शिक्षक दुःखी था। उसके दिमाग में केवल पत्नी के ताने ही गूंज रहे थे। अपने अंदर की भड़ास निकालने के लिये कक्षा में आते ही अपने बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरु किया-
‘‘बच्चों, हमें चाहे कितना भी कष्ट हो पर ईमानदारी का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। जहां भी हम नौकरी करें अपना काम तनख्वाह से ही चलाने का प्रयास करना सबसे अच्छा है। ऊपरी कमाई की बात तो सोचना भी नहीं चाहिए। यह पाप है और राष्ट्र के साथ गद्दारी।’
वगैरह वगैरह।
अगले दिन बच्चों के अनेक पालक प्राचार्य के पास पहूंच गये। उन्होंने उसकी शिकायत की। एक ने तो यहां तक कहा कि ‘‘यह कौनसा शिक्षक आपने रखा है। हमारे बच्चों का भविष्य बिगाड़ रहा है। हम बच्चों को नौकरी करने के लिये पढ़ा रहे हैं तो केवल इसलिये नहीं कि केवल वेतन से घर चलायें। अरे, वेतन से भला घर चलते हैं। वह बीबी पाल लेंगे पर पर हम मां बाप को कहां से पालेंगे।’
प्राचार्य ने शिक्षक को बुलाया और उससे कहा-‘भईये, तुम क्या हमारे स्कूल को ताला लगवाओगे। मुझे तुम्हारे पिछले रिकार्ड का पता है इसलिये तुम्हें विज्ञान का विषय पढ़ाने के लिये दिया ताकि तुम नैतिकता का पाठ न पढ़ाने लगो। वैसे नैतिकता का पाठ पढ़ाना चाहिये पर बच्चों को नहीं बल्कि कहीं सेमीनार वगैरह हो, या कहीं आदर्श लोगों का सम्मेलन, तभी ऐसी बातें जमती हैं। अपनी ऐसी ही करनी की वजह से यह तुम्हारी बारहवीं नौकरी भी जा सकती है।’
उस शिक्षक ने प्राचार्य की बात सुनी। वहां बैठे पालकों को देखा। अब वह तेरहवीं नौकरी का आसरा इसलिये भी नहीं कर सकता क्योंकि नैतिकता के पाठ पढ़ाने की उसकी बदनामी अब सभी जगह फैल सकती थी।
उसने वहां सभी से माफी मांगी और कहा-‘दरअसल, मैं भूल गया था कि बच्चों को पढ़ा रहा हूं। उस दिन मेरा स्वास्थ्य खराब था इसलिये ऐसी गलती कर गया। अब नहीं करूंगा।’
पालक खुश हो गये। प्राचार्य ने कहा-‘अच्छा है जल्दी समझ गये। तुम भी जरा व्यवहारिक हो जाओ। अपना वर्तमान बिगाड़ा है पर बच्चों को भविष्य मत बिगाड़ो। ऐसी शिक्षा कच्ची उम्र के बच्चों को मत दो जिनसे भविष्य में वह केवल उधार पर जिंदा रहने के लिये मजबूर हों।’
पालक चले गये और शिक्षक भी वहां से निकल आया। प्राचार्य ने अपने पास बैठे लिपिक से कहा-‘पता नहीं, कैसे इस मूर्ख शिक्षक को अपने यहां रख लिया।’
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7/13/10

ऑक्टोपस और मोहब्बत-हिन्दी लघु हास्य व्यंग्य (octopas aor mohbbat-hindi hasya vyangya)

एक माशुका ने अपनी सहेली से कहा-‘‘बड़ी परेशान हो गयी हूं। मेरे दोनों आशिक अब महंगाई के बोझ तले दबे जा रहे हैं। इसलिये शादी के लिये दबाव डाल रहे हैं। दोनों को समझाना कठिन हो रहा है। क्या करूं? एक से शादी करती हूं तो दूसरा रूठता है और दूसरे से करती हूं तो पहला रूठता है।’’
सहेली ने कहा-‘‘दोनों को इतना इंतजार करा कि स्वयं ही तौबा कर लें। उपाय मैं बता देती हूं। आजकल ऑप्टोपस नाम के एक समुद्री जीव की बहुत चर्चा है जो विश्व कप फुटबाल में सटीक भविष्यवाणी करता था। तू दोनों से कह दे कि उसके पास तुमने खाने के दो डिब्बे रख दिये हैं। एक डिब्बे पर खाली कागज का झंडा है दूसरे पर आशिक का नाम लिखा हुआ है। अगर वह नाम वाले कागज के साथ रखे डिब्बे का खाना खाता है तो वह शादी करेगी वरना नहीं।’’
माशुका बोली-‘‘अरे वाह, दोनों नाराज होंगे कि यह शर्त पहले तो नहीं रखी थी। अब क्यों ऐसी बात कर रही हो।’’
सहेली बोली-‘‘तुम भी कहना कि मोहब्बत और शादी अलग अलग विषय हैं। शादी के लिये ज्योतिषियों से पूछना पड़ता है तभी तो मुहूर्त निकलता है। शादी का मतलब है कि सब काम पूरे संस्कार के साथ हो। बिना संस्कार के भला कहीं शादी हो सकती है। इधर आजकल ज्योतिषी धोखेबाज हो गये हैं और उनसे पूछताछ करने में खतरा है इसलिये अब ऑप्टोपस पर भरोसा करना ठीक है। सो मैं तो अब ऑप्टोपस से पूछकर ही शादी करूंगी।’’
माशुका ने कहा-‘‘फिर वह पूछेंगे कि ऑप्टोपस ने खाना खाया कि नहीं, और खाया तो नाम वाले डिब्बे का कि बिना नाम के डिब्बे का।’’
सहेली ने कहा कि‘तुम कह देना कि अभी अभी तो मैं लाई हूं। बच्चा है, कुछ बड़ा हो जाये तो ही खायेगा। अरे, इसका फैशन भी तो अभी शुरु हुआ है।’
माशुका ने कहा-‘वह दोनों ही कहेंगे कि हमें दिखाओ।’
सहेली ने कहा-‘‘कह देना कि ‘पगला गये हो। घर पर रखा है, वहां बुलाकर मां बाप को ऑनर किलिंग (सम्मान हत्या) के लिये निमंत्रण देना है। अरे, आजकल इसका फैशन भी चल रहा है, टीवी देखते हो कि नहीं’, साथ ही कह देना कि ‘इस तरह शक शुबहा करोगे तो शादी के बाद क्या करोगे’, यह सुनकर दोनों चुप हो जायेंगे।’’
माशुका खुश हो गयी और बोली-‘‘हां, यह आइडिया अच्छा है।’’
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7/11/10

पाखंड-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (pakhand-hindi vyangya kavitaen)

हम उन पर हंस नहीं सकते,
क्योंकि ऊंचे सिंहासनों पर बैठे हैं वह
इसलिये उनकी अदाओं को
कभी मजाक नहीं समझ सकते।
पर उनकी चाल देखकर लगता है
उनका कोई आका अपने इशारे से
उनको चला रहा है,
उनकी स्वतंत्र भूमिका पर होता है शक
यह देखकर कि
उनकी जुबां से कोई दूसरा
अपनी बात बुला रहा है,
जिसे वह मजाक नहीं समझ सकते।
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अपने स्वतंत्र होने का पाखंड
वह बरसों से चला रहे हैं,
छोटे गुलामों की भीड़ में
अपने कागज के सिक्के
अपने चेहरे छापकर ढला रहे हैं।
कैलेंडर पर छाप दी कुछ तारीखें
जिस पर अपने स्वतंत्र होने के दिन लिख दी
जिस पर वह घी के दीपक जला रहे हैं।
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7/8/10

मुफ्त में समाज का दिल जीत लो-हास्य कविता (mufta men samaj ka dil jeet lo-hasya kavita)

बरसात के लिये यज्ञ करवाने की बात सुनकर
समाज सेवक जी की पत्नी प्रसन्न हो गयी
और बोली
‘धन्य भाग मेरे जो
आप बरसात होने के लिये यज्ञ करवा रहे हैं,
समाज में अपने साथ मेरी भी इज्जत बढ़वा रहे हैं,
चलो आपके मन में
जन कल्याण की बात तो आई,
मैंने तो अभी तक यही देखा कि
भले के नाम पर चंदा वसूलने के अलावा
किसी अन्य काम की सुधि नहीं आई।’

सुनकर समाज सेवक तमतमाये और बोले
‘यह सुबह सुबह क्या
जन कल्याण की बात कर दी,
अच्छे भले काम पर अपनी लात धर दी,
अरे भागवान,
इस यज्ञ के लिये ढेर सारा
चंदा लोगों से लिया है,
उसमें से कुछ खर्च करना जरूरी है
इसलिये सस्ते में यज्ञ का ठेका दिया है,
फिर यह अपने पुराने धंधे की नयी शुरुआत है
शायद बरसात जोरदार हो जाये,
कहीं बाढ़ अपनी रंगत जमाये,
न हो तो अकाल डाले अपनी छाया,
अपने लिये तो जुट जाये चंदे की माया,
पिछले साल घोटालों की वजह से
बंद कर दिया था चंदे का धंधा,
घोटालों की चर्चा से पास आ रहा था
बदनामी का फंदा,
वैसे चाहो तुम जनता में
अपने धार्मिक होने का ढिंढोरा पीट लो,
मुफ्त में समाज का दिल जीत लो,
मैं तो उन मेहमानों पर ध्यान दूंगा
जिनसे बाढ़ या अकाल के लिये चंदा लूंगा,
किसी का भला करते देखा था मुझे कभी
जो अभी ऐसी मूर्खतापूर्ण बात तुम्हारी बुद्धि में आई।
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7/4/10

कप्तान की शादी और प्रचार माध्यम-हिन्दी लेख (marrige of cricket captain and media-hindi lekh)

बीसीसीआई क्रिकेट टीम के कप्तान की शादी है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। हमने एक समाचार चैनल खोला था समाचार सुनने के लिये है पर कप्तान की शादी का प्रसंग सामने आ गया। इस लेखक ने अक्सर देखा है कि जब बाजार के उत्पादों के किसी विज्ञापन के माडल के-इनमें से अधिकतर क्रिकेट और फिल्म के होते हैं-शादी होने या राजनीति में आने की खबर होती है तो सभी चैनल उसे एक ही समय में प्रसारित करते हैं ताकि दर्शक भाग कर कहीं जा नहीं पाये और न ही उस माडल की आम आदमी उपेक्षा की जा सके। कहने को सारे चैनल अलग दिखते हैं ऐसे मौके पर एक हो जाते हैं। बाजार का उन पर कितना जोरदार नियंत्रण है यह ऐसे मौके पर देखा जा सकता है। इस लेखक ने कम से कम आठ समाचार चैनल बदले होंगे पर हर जगह बस वही बात! कप्तानी की शादी हो रही है इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। आज बाज़ार में घूमते हुए कहीं भी यह सुनाई नहीं दिया कि कप्तान की शादी हो रही है जबकि प्रचार माध्यम शोर मचाये हुए थे। ऐसे में व्यवसायिक प्रचार माध्यमों का यह दावा खोखला दिखता है कि वह तो दर्शकों की मांग के अनुरूप अपनी प्रस्तुति करते हैं। एक अभिनेता की राजनीति में आने की खबर पर भी ऐसा ही देखा गया था।
भारतीय प्रचार माध्यमों तथा आम नागरिकों के बीच अब एक लंबी मनोवैज्ञानिक खाई बन गयी है जिसे हम विश्वास का संकट भी कह सकते हैं। दरअसल प्रचार संगठनों में काम करने वाले लोग जहां अपनी अभिव्यक्ति की शक्ति का महत्व समझते हैं वहीं यह भूल जाते हैं कि अंततः आम आदमी की सहानुभूति के बिना उसका लाभ उठाना संभव नहीं है। एक तरफ प्रचार माध्यम आम आदमी को निहायत मूर्ख मानकर अपने आय अर्जन के इकलौते लक्ष्य पर काम कर रहे हैं वहीं आम आदमी उनको व्यवसायिक छल प्रपंच मानकर उनकी बात पर ध्यान नहीं देता।
ऐसे में अनेक बुद्धिजीवी आम आदमी के चेतना विहीन होने की शिकायत कर रहे हैं तो उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उनकी सीमित सोच ने आदमी के दिमागी दायरे को अत्यंत सीमित कर दिया है। हम टीवी चैनलों और समाचार पत्रों कि महत्व को जानते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि हमें यह भी पता है कि उनकी समाज निर्माण में अत्यंत प्रभावी भूमिका हो्रती है। ऐसे में यह देखना आवश्यक है कि प्रचार माध्यमों की भूमिका किस तरह की है और अगर हम समाज को सुप्तावस्था में देख रहे हैं तो उसके पीछे उनकी कितनी जिम्मेदारी है?
सबसे बड़ी बात यह है कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम मानते हैं कि जो लोग देखना, सुनना और पढ़ना चाहते हैं वही हम प्रस्तुत कर रहे हैं क्योंकि इसके बिना व्यवसाय नहीं चलता।
अगर वह इस तर्क पर काम करते हैं तो उससे जुड़े बुद्धिजीवियों को यह शिकायत नहीं करना चाहिए कि समाज सो रहा है।
समाचारों से जुड़े टीवी चैनलों और अखबारों के संचालकों को अब इस बात का आभास नहीं है कि उनका जिम्मा केवल अपने उपभोक्ताओं के सामने समाचार प्रस्तुत करना ही नहीं है वरन् संपादकीय, लेखों तथा चर्चाओं के द्वारा उनमें विचार निर्माण करने का काम भी है। यहां वह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते कि हर आदमी पढ़ा लिखा है और वह स्वयं ही विचार कर सकता है। एक ब्लाग लेखक के रूप में हम भी यह देख रहे हैें कि अनेक स्तंभकार ब्लाग लेखकों की रचनाओं से विचार लेकर लिख रहे हैं। इसका आशय यह है कि विचारों का क्रमिक विकास तभी संभव है जब कहीं दूसरी जगह से पढ़ा, सुना और देखा जाये।
अब जरा समाचार टीवी चैनलों और अखबारों के समाज में विचार निर्माण के प्रयासों को देखा जाये तो यह नहीं लगता कि वह इस काम को गंभीरता से ले रहे हैं। इस मामले में दूरदर्शन के कुछ प्रयास गंभीरता लिये हुए लगते हैं जबकि व्यवसायिक चैनल पूरी तरह से लापरवाही दिखाते हैं। टीवी चैनलों ने कुछ खास मौकों के लिये दो चार विशेषज्ञ तय कर रखे हैं जो क्रिकेट, आतंकवाद, रेल या बस हादसों तथा महिला उत्पीड़न जैसे विषयों पर आकर रटी रटाई बातें बोलते हैं और खानापूरी हो जाती है। यही स्थिति अनेक समाचार पत्रों की है। उनके लेखों तथा संपादकीयों में समाचारों के दोहराव के अलावा थोड़ी बहुत राय होती है पर वह बेबाक नहीं लगती। इतना ही नहीं उनके विचारों का प्रस्तुतीकरण भी इतना कमजोर रहता है कि पाठक या दर्शक उसे अधिक देर तक ध्यान नहीं रख पाता। यही कारण है कि आजकल कहीं भी कोई बुद्धिमान किसी अखबार की राय का बयान कर अपनी बात नहीं रखता। अखबारों के समाचारों की चर्चा अक्सर मिलती है पर विचार एकदम लापता लगता है।
समाचार टीवी चैनलों ने तो बहुत निराश किया है? जब दूरदर्शन अकेला था तब उसके समाचार सुनने की आम लोगों में एक आदत हो गयी थी और व्यवसायिक समाचार चैनलों ने उसका दोहन भी खूब किया पर उसको नियमित बनाये रखने में नाकाम रहे। यही कारण है कि प्रतिदिन समाचार देखने वाले बहुत लोग अनेक दिन तक तो समाचार चैनल खोलकर देखते तक नहीं हैं। एक घंटे तक समाचार दिखाने का दावा करने वाले यह सभी चैनल बुमश्किल पांच मिनट समाचारों के लिये हैं-उनका शेष समय क्रिकेट, फिल्म और फूहड़ हास्य प्रस्तुत करने में बीत जाता है। यह विज्ञापन चैनल जैसे हो गये हैं। एक तरह से संदेश देते हैं कि यह समाचार और विचार देखना छोड़कर उस तरफ जाओ जो हमारे बाजार नियंत्रकों ने सजा रखा है।
ऐसे में निराश हाथ लगती है। स्थिति यह है कि समाज में चेतना लुप्त होती जा रही है और जिनमें चेतना है उनके पास ऐसे साधन नहीं है जिससे उसमें निरंतरता बनी रहे। हालांकि इधर हिन्दी ब्लाग जगत पर काफी बेबाक राय सामने आ रही है पर वहां जागरुक लोगों की पहुंच अधिक नहीं है। दूसरा यह भी है कि ब्लाग जगत को लेकर प्रचार माध्यम योजनापूर्वक इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि यहां बाजार के मुखौटे ही प्रसिद्ध बने न कि आम लेखक। यही कारण है कि क्रिकेट खिलाड़ियो, फिल्म अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों के ब्लाग तथा वेबसाईट या ब्लाग बनाने के समाचार देते हैं। इससे समाज में यह धारणा बनती जा रही है कि ब्लाग केवल खास लोगों की अभिव्यक्ति के लिये है।
इस लेखक ने अपने एक कार्टूनिस्ट मित्र को ब्लाग बनाने की राय दी तो उसका जवाब था कि मैं भला कोई एक्टर या क्रिकेट खिलाड़ी हूं जो कोई मेरा ब्लाग देखेगा।’
दूसरी मजे की बात यह है कि इस लेखक के अनेक पाठ बिना नाम के छापे जा रहे हैं। गांधी जयंती पर इस लेखक के लिखे गये पाठों का एक स्तंभकार ने उपयोग किया। इस लेखक के मित्र तथा पढ़ने वाले लोग जानते हैं कि उन पाठों में जो विचार व्यक्त किये गये थे वैसे किसी बुद्धिजीवी ने नहीं किये। जो लोग गांधी विषय पर विशारद होने का दावा करते हैं वह उन लेखों को पढेंगे तो हैरान रह जायेंगे-एक लेखक मित्र ने उनको पढ़कर यही कहा था। मगर यह आत्मप्रवंचना नहीं है बल्कि यह बताया जा रहा है कि समाचार में चिंतन और विचार का जो संकट है वह प्रचार माध्यमों की उपेक्षा तथा रूढ़ता के कारण है और हिन्दी ब्लाग जगत ही उसका सामना करने में सक्षम है और यह बेहतर होगा कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम इस आशंका से परे हो जायें कि यहां ब्लाग लेखकों नाम सहित अपने यहां स्थान देने से कोई ऐसी लोकप्रियता मिल जायेगी कि बाजार की बड़ी कंपनियों के विज्ञापन उनको मिलने लगेंगे। अलबत्ता हिन्दी में चिंतन तथा विचार के क्षेत्र में जो जड़ता की स्थिति है उससे निपटने लिये उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम ब्लाग लेखकों से तारतम्य बनायें। अगर क्रिकेट खिलाड़ियों, फिल्म अभिनेताओ तथा अभिनेत्रियों की शादी तथा प्रेम प्रसंगों से समय काटने को ही वह अपना व्यवसायिक धर्म समझते हैं तो फिर हमें कुछ नहीं कहना है।
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6/23/10

तुम भी लाखों लोगों में एक हो-व्यंग्य कविता

अपने दिल में उठे तमन्नाओं के तूफान से
आकाश में इतना क्यों उछल रहे हो,
अपने लंबे भारी भरकम पांवों के नीचे
क्यों बेबसों को कुचल रहे हो,
हमेशा आकाश की तरफ देखकर
न चला करो
धरती पर छोटे कांटे भी हैं,
जो चुभ गये कभी तो
औकात बता देंगे
सभी की तरह तुम भी जहर फैला रहे हो
अपने अनोखे होने का अहसास न दिलाओ
तुम भी उन लाखों लोगों में एक हो
जो ज़माने के लिये आग उगल रहे हो।

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6/7/10

तारीख पर तारीख-हिन्दी हास्य व्यंग्य (tarikh par tarikh-hindi hasya vyangya)

उसे एक ट्रक ने कुचल दिया और उसके बाद वह कौमा में चला गया। उसके परिवार वालों ने मामला दर्ज कराया। मुकदमा चला पर तारीख दर तारीख लगती रही। इधर परिवार वाले परेशान थे। उनको एक मनोचिकित्सक ने बताया था कि जब उनके मरीज को दिमागी रूप से बहुत आघात पहुंचा है जब मुकदमे के अपने पक्ष में परिणाम आने की खबर सुनेगा तब उठ खड़ा होगा।
परिवार वालों ने डाक्टरों से कहा-‘तब तो इसे झूठी खबर सुना देते हैं ताकि उठ कर खड़ा हो जाये।’
डाक्टर ने कहा-‘अगर बाद में इसे पता लगा कि यह खबर झूठी है तो यह तुरंत स्वर्ग सिधार जायेगा।’
अब घर वाले क्या करें? वह हर बार आकर उसे बताते कि ‘तारीख लगी है।’
डाक्टरों ने उनसे कहा था इसे जिंदा रखने के लिये मुकदमें के बारे में बताते रहें क्योंकि कौमा में जाने से पहले वह चिल्ला रहा था ‘‘मुआवजा’’, ‘‘मुआवजा’’।
मुकदमा चलते चलते छब्बीस साल बीत गये और जिस दिन उसके पक्ष में फैसला हुआ उसको सुनने से पहले ही पह ‘तारीख पर तारीख’ कहता हुआ स्वर्ग सिधार गया।
ऊपर सर्वशक्तिमान के पास पहुंचा तो वहां भी चिल्लाने लगा‘ ‘‘तारीख पर तारीख’’, ‘‘मुआवजा’’ ‘‘मुआवजा’’।’
सर्वशक्तिमान ने उसके मुंह पर जल छिड़का और उससे कहा‘मूर्ख, यह क्या बक रहा है। एक तो छब्बीस साल से मेरा नाम नीचे नहीं जपा और सामने आया है तो दुआ सलाम तो दूर अपना मुकदमा यहां पर भी लेकर आ गया।’
वह आदमी बोला-‘यह भला क्या बात हुई। न नीचे इंसाफ मिला और न आप दे रहे हैं। यह कैसी दुनियां मैंने बनायी है।’
सर्वशक्मिान ने कहा-‘यह दुनियां मैंने बनाई है पर चला तो तुम इंसान ही रहे हो। तुमसे किसने कहा था कि उस रोड पर जाओ जहां ट्रक चलते हैं।’
उस आदमी ने कहा-‘चलिये, आपकी बात सिर आंखों पर, मेरा एक भाई एक कारखाने में गैस रिसने से मर गया था, उसका भी यही हुआ। वह यहां आया होगा, क्या आपने उसे इंसाफ दिया।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘कमबख्त, उसे तो मैंने न स्वर्ग दिया न नरक! दोनों के बीच एक गैस चैंबर है वहीं रखा है। उसे तो अब वही गैस पसंद आ रही है। वह अपनी सांसों के साथ ही प्रदूषण यहां लाया और सभी जगह फैला रहा था। स्वर्ग में तो उसे जगह देने का सवाल ही नहीं और नरक के लोग भी बुरे हैं पर उनकी रक्षा की जिम्मेदारी तो हमारी है इसलिये उसे वहां नहीं रखा। उसे भी क्या न्याय दूं वह उस गैस कारखाने के पास से गुजर ही क्यों रहा था?’
उस आदमी ने कहा-‘यह भला क्या बात हुई? यहां से क्यों जा रहे थे, वहां से क्यों आ रहे थे? न नीचे न्याय न ऊपर!’’
सर्वशक्मिान ने उससे कहा-‘अब तू कुछ भी बहाना बना! तेरे कर्मों का हिसाब तो होगा पर उसमें यह मुकदमा कोई मदद नहीं करेगा।’
इससे पहले कि कुछ सर्वशक्तिमान के दूत उसे दूर घसीट कर ले गये। एक दूत दाो बोला-‘कमबख्त, यहां हिन्दुस्तान से जो आदमी भी आता है अपने सांसरिक मुकदमें की बात करता है ताकि उसके बाकी कर्म भुला दिये जायें। ऐसी चालाकी अब नहीं चलने की। अरे, तू किस्मत वाला है कि तेरे मरने से पहले ही तेरे पक्ष में फैसला हो गया वरना हमारे यहां तो ऐसी चार पीढ़ियों के लोग ‘न्याय’ कहकर चिल्ला रहे हैं जो एक ही मुकदमा लड़े पर फैसला नहीं हुआ। कुछ तो ऐसी भी है कि जिनकी पाचवीं पीढ़ी भी आने को तैयार खड़ी है।’
वह आदमी यह सुनकर खुश हुआ कि ‘उसके मरने से पहले उसके मुकदमें का फैसला हो गया था। तब वह उस दूत से बोला-‘यार, अगर कहीं से उधार दिलवा दो तुम्हें मिठाई खिला दूं।’
दूत बोला-‘बेटा, हमें रिश्वत देने की बात मत कर! यहां पहले मेहनत कर और पैसे कमा क्योंकि तेरे मुकदमें में तेरे तीन वकील ऐसे हैं जो यहां तेरे से फीस लिये बिना आये और उनका पैसा न देना तेरे पाप कर्म में शामिल है। उनका पैसा देने से तु बेईमानी के आरोप से बच जायेगा पर देरी से देने की सजा तो तुझे मिलेगी चाहे कुछ भी कर! यह धरती नहीं है कि विलंब की सजा से बच जायेंगा। ’
उस आदमी के होश उड़ गये। वह फिर चिल्लाने लगा ‘तारीख पर तारीख’ और ‘मुआवजा’, मुआवजा।’
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1/13/10

ख्वाबों में दुनियां हिला रहे हैं-हिंदी शायरी (khabon ki duniya-hindi shayri)

लिखें  हैं कुछ शब्द

उससे ज्यादा चिल्ला रहे हैं,

जिनका अर्थ खुद नहीं समझा

अपने ख्वाबों को हकीकत की तरह

जमाने को दिखला रहे हैं
।

अब तक वह यही नहीं समझे कि

शब्द छूते हैं इंसान के दिल को

कोई चीख कर दिल नहीं दहलाते

जो  अपने शब्द से ज़माने में

बदलाव के दावे जताते

ख्वाबों में दुनियां हिला रहे हैं
।


संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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1/9/10

इससे तो यह संत ही भले हैं-व्यंग्य चिंतन (hindu sant and society-hindi lekh)

उन संत महाराज ने यह अपने प्रवचनों में भक्तों के सामने ही स्वीकार किया कि उनके धन से ही वह सामाजिक कल्याण-बच्चों के लिये स्कूल खोलना, असहायों की सेवा तथा महिलाओं के कल्याण जैसे कार्य- के कार्यक्रम चला रहे हैं। उनका जोर इस बात पर ही था कि अच्छा सोचना चाहिये तो अच्छे काम कर पायेंगे। उनका आशय यही था कि चूंकि वह अच्छा सोचते हैं इसलिये भक्तों के पैसे होने के बावजूद नाम उनका होता है।
सच तो यह है कि यह उनके निरंकार भाव का प्रमाण था जो कि बहुत कम कथित संतों में देखा जाता है। हमारे देश में संतों की अजग गज़ब महिमा है। यह कहना कठिन है कि भारत में गेरुऐ वस्त्र पहनकर धर्म के व्यापार का सिलसिला कब शुरु हुआ पर आजकल तो ऐसे ही लोग संतों की श्रेणी में आते हैं। यह कथित संत अपने आश्रम ऐसे बनवाते है कि पुराने समय के राजा महाराजा भी शरमा जायेे। वातानुकूलित कारों में उनका भ्रमण होता है और निजी विमानों से उनकी यात्रायें संपन्न होती हैं। इनकी भौतिक उपलब्धियां देखकर अनेक युवक युवतियां कामना सहित भक्ति तथा ज्ञानार्जन की प्रक्रिया प्रारंभ इस आशा से करते हैं शायद ऐसी दिव्यता उनको भी प्राप्त हो जाये। यह अलग बात है कि कामना सहित भक्ति तथा दूसरे को सुनाने के लिये ज्ञान का संग्रह करने से भले ही भौतिक वैभव प्राप्त हो जाये पर अध्यात्मिक शांति नहीं प्राप्त हो सकती। फिर यह भौतिक उपलब्धि भी सभी को मिल जाये यह जरूरी नहीं है। कहीं कहीं तो यह भी सुनने में आता है कि मंदिरों में चढ़ावे के बंटवारे को लेकर खूनखराबा तक हो गये।
उन संत महाराज के प्रवचनों की खास बात यह भी लगी कि उन्होंने अपनी मानवीय कमजोरियों की चर्चा भी की-इससे यह लगा कि एक आम आदमी अन्य की भीड़ को संबोधित कर रहा है। ऐसा अन्य संत नहीं कर पाते इसलिये बाकी आम भक्त ही क्या, उनके चेले ही कहते हैं कि हम संत जैसे नहीं हो सकते, क्योंकि वह तो संत हैं, हम तो आम आदमी हैं इसलिये स्वाभाविक कमजोरियों से मुक्त नहीं हो सकते।’
यही कारण है कि ऐसे संतों के संवाद संप्रेक्षण अधिक प्रभावी नहीं होते जबकि उन संत महाराज के कथनों का प्रभाव हो रहा था। यह प्रभाव तभी संभव है जब आप किसी को उपदेश दें तो अपने आम आदमी होने का भी उसे अहसास दिलायें। भले ही उन संत महाराज की भी भौतिक उपलब्धियां हों पर उनके एक कार्यक्रम में हम बहुत पहले गये थे तब योग साधना, ध्यान, और प्राणायम करते हुए उनके फोटो भी देखे थे। वह सुबह योगसाधना सिखाने का भी काम करते हैं। आज उनके प्रवचन सुनते समय हमें एक बात लगी कि योगसाधना करने वाले संतों की वाणी यकीनन अनोखी तथा प्रभावी होती है।
भारत में योगसाधना सिखाने वाले भी कुछ संत हैं-कुछ लोग उनको योग शिक्षक से अधिक नहीं मानते-तो उपदेश देने वाले भी हैं। योगसाधना सिखाने वाले संत भले ही श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान की चर्चा करें पर लगता नहीं हैै कि उसका उनको अभ्यास है। उसी तरह जो श्रीगीता के ज्ञान का उपदेश देते हैं वह योगसाधना करते प्रतीत नहीं होते क्योंकि तत्वज्ञान को वह धारण कर सकें हों, यह लगता नहीं है। उन संत महाराज की भाव भंगिमा में बनावटीपन नहीं दिखा तो केवल इसलिये कि उन्होंने सहज मानवीय कमजोरियेां से अलग दिखने का कोई प्रयास नहीं किया। कहने का तात्पर्य है कि योग विद्या तथा ब्रह्म विद्या में उनका समान अधिकार है जो बहुत संतों में दिखाई देता है।
उनके प्रवचन कार्यक्रम में भी किताबों, दवाईयों और कैसिटों की दुकाने लगी थीं। उन्होंने कार्यक्रम का मंच बनाने वाली दवाई कंपनी का नाम भी लिया जो शायद उनके कार्यक्रम की आंशिक या पूर्ण प्रयोजक भी हो सकती है। उनमें से कुछ दवाईयां हमने भी खरीदी-समय पर उनकी जरूरत पड़ने की संभावना रहती है। ऐसे कार्यक्रमों में जाना अच्छी बात है या नहीं यह अलग बात है पर समाज को इनकी जरूरत है यह सभी मानते हैं। यहां तक कि बरसों तक प्रगतिशील लेखन करने वाले एक स्तंभकार ने भी यह माना था कि आदमी को इनसे तनाव मुक्ति मिलती है। उसने यहां तक लिखा था कि अगर यह व्यवसायी हैं और तनाव मुक्ति बेच रहे हैं तो दूसरे लोग भी तो यही कर रहे हैं।
सवाल यह है कि आम आदमी क्या करे? एक तरफ जिन प्रचार माध्यमों से वह नितांत जुड़ा है उसे वह पश्चिमी देशों का ऐश्वर्य दिखाकर वही सभ्यता अपनाने के लिये प्रेरित कर रहे हैं जिससे वहां के निवासी बोर होकर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में शांति तलाश रहे हैं। इधर भारतीय बाजार भी पाश्चात्य उपभोकता संस्कृति के प्रतीकों के साथ सामने खड़ा है। प्रचार माध्यमों में देख लीजिये फाईव स्टार अस्पतालों के नाम और दवाओं की दुकानों के पते। ऐसे में भारतीय चिकित्सा पद्धति की रक्षा अगर यह संत लोग नहीं करेंगे तो कौन करेगा? शायद आधुनिक हिन्दी स्तंभकार इस बात को नहीं जानते कि इन्हीं संतों की आयुर्वेदिक दवाओं की प्रशंसा आम लोग भी करते हैं। यही कारण है कि वह अपने स्तंभों में उन पर कितना भी बरस लें, आम आदमी उनका समर्थक है।
पश्चिमी चिकित्सा पद्धति जिसे एलौपैथी भी कहा जाता है-एक तरह से डरावनी लगती है। अपनी बीमारी के इलाज के लिये डाक्टर के पास जाओ तो पहले दस प्रकार के टेस्ट कराता है। एक डाक्टर उसी टेस्ट का पास करता है दूसरा खारिज करता है। कम से कम पहली नजर में एलौपैथी का डाक्टर मर्ज को नहीं पहचानता जो कि किसी ‘अच्छे हकीम’ प्रमाण होता है। इस पर दवाईयों कितनी महंगी हैं।
हमारे एक मित्र की मां को कंधे में भारी दर्द उठा। फोन पर खबर मिली तो हम भी उसके साथ हो लिये। वह अपने छोटे बेटे के साथ एक निजी चिकित्सक के अस्पताल में थी जिसने उनको बड़े अस्पताल में इस आशंका से ले जाने का कहा कि शायद अब उनके जाने की बारी है। हमने वहां पहुंचकर जब उनको देखा तो बड़े आराम से बात रही थीं। अपने बेटे से बोली कि ‘डाक्टर ने कहा कि दिल का दौरा पड़ा है।’ उनकी आवाज से हमको यह नहीं लगा कि वह दिल का दौरा पड़ा है। चेहरे पर तनाव था पर आवाज साफ और बुलंद पहले की तरह बुलंद थी। बहरहाल उनको लेकर बड़े अस्पताल पहुंचे। हमने रास्ते में उनसे पूछा-‘आपने आज कोई गरिष्ठ भोजन किया था?’
वह बोली-हां, सुबह पुड़ी खाई थी।’
उनको दंात थे नहीं और हमारा अंदाजा था कि वही आंतों में जाकर फंसी हैं।
अस्पताल के गहन चिकित्सा केंद्र में उनका इलाज शुरु हुआ। एक इंजेक्शन लगने के बाद उनको आराम आया पर डाक्टरों ने अन्य टेस्ट कराने तक वहीं रुकने के लिये भर्ती कर दिया। हम रोज उनको देखने जाते थे। हर रोज उनकी हालत पहले से बदतर मिलती थी। पांचवें दिन डाक्टर ने एक दूसरे टेस्ट के लिये यह कहते हुए बाहर भेजा कि ‘यहां हमारी मशीन खराब है।’
वह टेस्ट कराने भी हम गये। वह जब धीरे धीरे चल रही थी तो हमने कह ही दिया कि ‘कमाल है, इससे अच्छी हालत में आयी थीं। इलाज के बाद आदमी की तबियत सुधरनी चाहिये कि बिगड़नी।’
टेस्ट रिपोर्ट देने वाले से हमने पूछा कि ‘क्या है इनको?’
‘आप ले जाईये डाक्टर बता देगा।’ उसके इस रहस्यमय उत्तर ने हमें हैरान कर दिया।
हम फिर उनको लेकर बड़े अस्पताल ले आये। बड़ा डाक्टर तो नहीं मिला छोटे वाले से हमारी पहचान निकल आयी। उससे पूछा तो उसने सच बता दिया कि ‘इनको छाती में कोई समस्या नहीं है। इसलिये इनकी कुछ दवायें बंद कर देते हैं। पर जो आठ इंजेक्शन लगने हैं वह पूरे यही लगेंगे। उसके बाद आप इनको घर ले जाना।’
दवायें बंद हो गयी। एक औरत जो ठीकठाक अस्पताल में कंधे की पीड़ा की इलाज कराने आयी,दवाऐं खाते हुए मरने की तरफ बढ़ती लग रही थी। वह बंद होने से फिर वापस लौटी। वह दवाओं से ठीक नहीं होती दिखी बल्कि उनके बंद होने के बाद उसने बताया कि‘अब लग रहा है कि सभी को पहचान रही हूं, वरना तो मेरी स्मृति शक्ति भी जा रही थी।’
घर वापसी पर हमने उनसे कहा-‘आपको कुछ नहीं हुआ था। अगर आप चाहती हैं कि आप अस्पताल में जाकर जल्दी दुनियां न छोड़े तो प्राणायाम करें। आप भगवान का लाख लाख शुक्र समझें कि डाक्टरों से उसने आपको बचा लिया।’
हमें सात साल पहले उच्च रक्तचाप हुआ था। होम्योपैथी के डाक्टर ने भी ऐलौपैथी की तरह इलाज करते हुए तमाम टेस्ट करवाये। उसने मधुमेह का भी टेस्ट करवाया। उसी की सलाह पर हम दूसरे होम्योपैथी के डाक्टर के पास गये उसने अपने पर्चे पर हमारी बीमारी का नाम लिखा ‘हाईपर ऐसिडिटी’।
बाद के योगसाधना प्रारंभ की। अनेक बार अपने अंदर आये परिवर्तनों की अनुभूति लगती है। यही कारण है कि हम अक्सर योगसाधना के बारे में लिखते हैं। अनेक बार कथित संतों पर लिखते हैं पर जब अंग्रेजी पद्धति के जाल में फंसे देश को देखते हैं तो फिर यही लगता है कि ‘इससे तो यह संत ही भले हैं।’ कमा रहे हैं तो क्या? साथ ले जायेंगे। बंट तो इसी समाज में रहा है। फिर ठगी की बात है तो ऐसी बहुत सारी बातें हैं जो यहां लिखना बेकार है। कम से कम यह संत लोग भारत की शिक्षा पद्धति, ज्ञान, चिकित्सा पद्धति तथा संस्कृति को बचाने के लिये काम तो कर रहे हैं। उनकी शिक्षा गुलामी के लिये नहीं बल्क् िस्वतंत्र रहने के लिये प्रेरित करती है। कमाने की बात है तो यहां छोड़ कौन रहा है?
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12/26/09

दिन का दावा, रात का छलावा-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (din ka dava,rat ka chhalava-hindi vyangya kavieaen)

करते हैं जो दिन में

नैतिक आदर्श की बात,

बेशर्म बना देती है

उनको अंधियारी काली रात।

चेहरे की लालिमा को

उनके अंतर्मन का तेज न समझना

मेकअप भी निभाता है

चमकने में उनका साथ,

सूरज की रौशनी में

जिस सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरते

उसी की इज्जत पर रखते हैं रात को लात।।

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खुल रही है समाज के ठेकेदारों की कलई

शरीर पर हैं सफेद कपड़े, नीयत में नंगई।

बरसों तक ढो रहा है समाज, सरदार समझकर

हाथ जोड़े खड़े मुस्कराते रहे, दिल जिनसे कुचले कई।।

नारी उद्धार को लेकर, मचाया हमेशा बवाल

मेहनताने में मांगी, हर बार रात को एक कली नई।

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टूट रहा है विश्वास

मर रही है आस।

जिन्होंने दिये हैं नारी उद्धार पर

कई बार दिन में प्रवचन,

करते रहे वही हमेशा

काली रात के अंधियारे में काम का भजन,

देवी की तरह पूजने का दावा करते दिन में

रात को छलावा खेलें ऐसे, जैसे कि हो वह तास। 
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11/26/09

किसी समूह की पहचान स्थाई नहीं रह सकती-काव्य चिंतन (samaj ki pahchan-hindi chittan aur kavita)

प्राकृतिक का नियम है परिवर्तन! दिन हुआ है तो रात भी होगी। सूरज उगा है तो जरूर डूबेगा। धूप है तो अंधेरा भी होगा। यह तो प्रतिदिन होने वाले नियम हैं इसलिये दिखाई देते हैं और इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करने की शक्ति हमें अपने अंदर अनुभव नहीं करते इसलिये कोई दावा नहीं करते। मगर परिवर्तनशील प्रकृत्ति के अन्य भी बहुत सारे नियम हैं जो हमें दिखाई नहीं देते। कई जगह छहः महीने का दिन और रात तो कई जगह दशकों का दिन और रात होता है। केवल समय और दिन ही परिवर्तन शील नहीं है बल्कि प्रकृत्ति का स्वरूप भी परिवर्तनशील है। अनेक प्रकार के जीव यहां बने और मिट गये। डायनासोर की चर्चा तो हमने सुनी होगी जिनके बारे में कहा जाता है कि आसमान से टपके किसी कहर की वजह से वह नष्ट हो गये।
इस पृथ्वी का सच कोई नहीं जानता। सभी अनुमान से कहते हैंे कि इस तरह है या उस तरह है। कहने का तात्पर्य यह है कि यहां किसी वस्तु, व्यक्ति, खनिज, अन्न का जो स्वरूप आज है वह कल कुछ दूसरा हो सकता है और आज से पहले कुछ दूसरा रहा होगा। अलबत्ता जीवन निर्माण की प्रक्रिया में कोई परिवर्तन नहीं आता दिखता पर उसके दृश्यव्य बाह्य रूप में परिवर्तन होता है और होता रहेगा।
भाषा, समाज, जाति, तथा अन्य आधारों पर बने व्यक्ति समूहों की यही हश्र होना है इसे कोई रोक नहीं सकता। मनुष्य प्रकृत्ति का दोहन अपनी शक्ति के अनुसार अधिक से अधिक कर सकता है पर उस पर नियंत्रण कभी नही कर सकता। ऐसे में कुछ लोगा यह दावा करते हैं कि वह भाषा, जाति, धर्म, और वर्ण के आधार पर बने अपने समूहों की पहचान बरकरार रखेंगे।
अगर उनसे पूछे कि‘क्यों?’
इसके बिना इस धरा का जीवन नष्ट हो जायेगा। अगर अपनी पहचान नहीं बचाकर रखी तो दूसरी पहचान वाले हमें नष्ट कर देंगे। यह पहचान हमारी अस्मिता है? आदि आदि प्रकार के जवाब।
भला यह कैसे संभव है जो समाज प्राकृतिक परिवर्तनों से बने हैं वह उन्हीं की वजह से नष्ट होने से बच जायें? मगर दावा करने वाले करते हैं। मनुष्य के मन में भावनायें होती हैं और वही उसका संचालन करती हैं। उनका दोहन अपने लाभ के लिये करने वाले व्यापारी उसमें भय, आशंकायें और स्वप्नों का एक जाल रचते हैं। वह ऐसे असंभव काम को अपने हाथों से करने का दावा करते हैं जो उनके बस का है ही नहीं। परिवर्तन को रोकना कठिन है। सौ बरस में मनुष्य का और दो सौ बरस में परिवार का अस्त्तिव मिटने के साथ अपनी पहचान खोता है तो हजार साल में समूह भी अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते हैं। जाति, भाषा, धर्म तथा अन्य आधारों पर बने समूह कोई स्थाई पिंजरा नहीं है जिसमें आकर भगवान का हर जीवन हमेशा फंसता रहे। फिर सवाल यह है कि अपनी पहचान किसलिये बनाये रखना चाहिये? अरे, अपना जीवन आदमी शांति और भक्ति के साथ जिये तो उसे फिर पहचान की क्या जरूरत है? ऐसे में पहचान का ढोंग न करें चाहिये न उसमें फंसे।इस पर प्रस्तुत हैं काव्यात्मक अभिव्यक्ति-

धरती पर उगे हैं इंसान
पर वह उसमें गड़े मुर्दों में
अपनी पहचान खोजते हैं।
अपने लहू से सींचे चमन का
मजा लेने की भला कैसे सोचें
पूरी जिंदगी अपनी पहचान के
संकट से जूझते
उनके पसीने का मजा
जिंदगी के दलाल भोगते हैं।।
-------------
उसने नारा लगाया कि
‘आओ मेरे पीछे
मैं तुम्हें अपनी पहचान बताता हूं
कैसे बचाओ उसे
इसका रास्ता भी बताऊंगा।’
लोग बिना सोचे समझे
चल पड़े उसके पीछे
पर पहचान नहीं मिली
रास्ते पर रखे पत्थरों का
इतिहास सुनाते हुए वह चलता रहा
भीड़ का कारवां भी उसके पीछे था
उसने सौदागरों के इतिहास में
अपना नाम दर्ज कर लिया
पर पहचान का पता किसी को न दिया
कभी जाति की
तो कभी धर्म की
कभी भाषा की चादर बिछाता रहा
पहचान का प्रमाण दिखाता रहा
बस कहता रहा जिंदगी भर
समूह की एकता की बात
जब थक गया तो कहने लगा कि
‘चलते रहो मेरे साथ
आने वाली पीढ़ियों को भी
इसी पहचान की राह चलना है
इसी में जीना और मरना है
मेरी बात मानना बंद किया तो
फिर भूत की तरह सताऊंगा।’

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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11/14/09

राहत और परेशानी-व्यंग्य कवितायें (rahat aur pareshani- hindi vyangya kavitaen)

आसमान से बादल बरस रहे हैं
क्योंकि पेड़ पौधे, पक्षु और पक्षी
पानी को तरस रहे हैं।
आम इंसान को खुशफहमी है कि
देवता उस पर मेहरबान है
उनकी पूजा पर ही ध्यान है,
कुछ इनमें ऐसे भी है
जो राहत का करते हैं व्यापार
सूखा जाता देख उनका दिल झूलस रहे हैं।
-----------
अपने हर ख्वाब को
सच में बदलता देखकर भी
इंसान हताश हो जाता है,
अब नया कौनसा देखे
यह सोचकर परेशानी जुटाता है।

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11/12/09

काहे का गज़ब-हास्य व्यंग्य (kaisa gazab-hindi hasya vyangya)

सप्ताह में उस दुकान से एक बार तो बेकरी का सामान जरूर खरीदते हैं। ऐसा बरसों से चल रहा है। वह दुकानदार अच्छी तरह जान गया है। उसके कुछ पुराने कर्मचारी भी अब देखते ही सामान पूछना शुरु कर देते हैं भले ही दूसरे ग्राहक खड़े हों। हालांकि उस दुकानदार से हमारी कोई खास आत्मीयता नहीं है, यहां तक कि उसके साथ अभिवादन तक नहीं होता। हम दुकान पर पहुंचते ही सीधे सामान मांगना शुरु कर देते हैं।
उस दिन 145 रुपये का सामान लिया और उसे पांच सौ का नोट दिया। उस दुकानदार ने उसे अच्छी तरह रौशनी में देखा और फिर उसने अपनी दराज में रखा और बाकी पैसे वापस करने के लिये नोट गिनने लगा। इसी दौरान वह हमसे कहता रहा कि ‘आजकल नोट नकली आ रहे हैं इसलिये ध्यान से देखना पड़ता है।’ आदि आदि।
हम केवल मुस्कराये। उसने नोट गिनकर हमें दिये। हम उसे बिना गिने ही अपनी जेब में रखने लगे यह सोचकर कि इतना बड़ा सौदा नहीं है कि वह रकम कम देगा-ज्यादा देगा इस पर तो विचार ही नहीं किया? सामान का पैकेट और रुपये हाथ में लेकर अपने स्कूटर के पास पहुंचे और सामान रखकर नोट पर्स में रखने लगे पर लगा कि कुछ गड़बड़ है। नोट अधिक लग रहे थे। हमने गिने तो उसमें सौ रुपया अधिक था।
हमने बिना कुछ सोचे बिचारे वह नोट उसके पास जाकर बढ़ाया और कहा‘-भई, आपने यह सौ का नोट अधिक दे दिया।’
उसे हैरानी हुई और हमसे नोट अपने हाथ में लेते हुए बोला-‘हो सकता है कि बात करते हुए हमसे नोट गिनने में गलती हो गयी। वैसे आप पहले आदमी हैं जो नोट वापस कर रहे हैं। ऐसे कई बार गलती हमें बाद में याद आती है पर कोई भी आदमी हमें नोट वापस नहीं करता। अपने पास रखकर सभी पचा जाते हैं। आपकी ईमानदारी अच्छी लगी।’
हमने हंसते हुए कहा-‘सच तो यह है कि हम नोट गिन नहीं रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर गिने। यकीन करो कि अगर यह एक बार पर्स के हवाले होते तो फिर हमें भी वापस करने की याद नहीं आनी थी। वैसे आपके साथ जिन लोगों ने जानबूझकर ऐसा किया उनको आपका पैसा पच ही गया आप यह कैसे कह सकते हैं?’
वह दुकानदार हमें घूरकर देखने लगा और बोला-‘हां, यह तो नहीं सकता कि वह पचा पाते हैं कि नहीं।’
हमने उससे कहा-‘वह आपका दिया अधिक पैसा रख लेते हैं पर कितनी देर? यह तो माया चलती फिरती है इसलिये वह रुपया आखिर वह फिर कहीं जाना है। यह हमारी ईमानदारी का प्रमाण नहीं बल्कि डर का प्रमाण है। एक तो यह रुपया अधिक देर हमारे पास वैसे ही नहीं रहेगा। दूसरा पचेगा भी नहीं! इसलिये वापस किया।’
अधिक देर बात करना ठीक नहीं था। हमने सौदा रखा और वहां से चले आये। उसके बाद भी अनेक बार उसकी दुकान पर गये पर कभी इसकी चर्चा नहीं की।
उस दिन दुकान पर पहुंचे तो उसने हमसे पूछा-‘आपको मैंने बैग दिया है कि नहीं।’
मुझे आश्चर्य हुआ और हमने उससे कहा-‘नहीं, आपने मुझे कोई बैग नहीं दिया।’
उसने अपने पीछे हाथ किया और एक हैंडबैग हमारी तरफ बढ़ाते हुए कहा-‘मैंने पूछने की गुस्ताखी इसलिये की क्योंकि यह केवल कुछ खास ग्राहकों को दिवाली का गिफ्ट दिया था। मुझे याद नहीं आ रहा था कि आपको दिया कि नहीं। हर साल हम कुछ न कुछ ग्राहकों को उपहार देते हैं।
मैंने वह हैंडबैग अपने हाथ में लिया। उसके यहां के एक कर्मचारी ने मुझसे कहा कि ‘सेठ जी बहुत दिनों से आपको यह उपहार देने के लिये कह रहे थे, मैं ही भूल जाता था। आज सेठ जी खुद पूछा तब मुझे भी याद आया।’
उस समय भी वहां पर पांच लोग दूसरे खड़े थे पर उसने बिना उनका विचार करते हुए मुझे हैंडबैग दिया। इतने बरसों से उसने दूसरे खास ग्राहकों को गिफ्ट दिया पर हमें खास नहीं माना। उसके खास तो उसके थोक व्यापारी रहे होंगे। खेरिज ग्राहकों में उसने किसी दूसरे को खास माना होगा यह भी नहीं लगता। बहरहाल उस सौ रुपये की वापसी ने उसकी नजरों में खास बना दिया। उसकी नजर में हम ईमानदार हैं पर हमें खुद को नहीं लगता। वैसे पहले भी कई बार अनेक दुकानदारों को अधिक पैसे हमने वापस लौटाये हैं। वह लोग कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। किस बात की! ईमानदारी की! अरे भई, हमने कई बरस पहले एक बार अपनी जिंदगी में अजमाया है। रास्ते से बीस का नोट मिला था उसे रख लिया। मगर उसके एक दिन बाद ही हमारी साइकिल को एक टूसीटर वाले ने टक्कर मारकर तोड़ दिया। हम बच गये यह गनीमत थी पर उस साइकिल को बनवाने में सौ रुपये लग गये। बस तब से तय कर लिया कि ऐसे पैसे को हाथ भी नहीं लगायेंगे।
यह हमारा डर है जो जबरदस्ती ईमानदार बनाये दे रहा है। कोई जब यह कहता है तो हम उसे समझाने लग जाते हैं कि ‘भई, ऐसा नहीं है। दरअसल हमारा हाजमा खराब है कि ऐसा पैसा हमें पचता नहीं। यह एक रोग है जिसका इलाज किसी के पास नहीं है।’
पहले शराब पीते थे। अब छोड़ दी। जो अब हमारे सामने पीते हैं और हमें परे देखकर कहते हैं कि‘अच्छा हुआ तुमने छोड़ दी। वाकई क्या गजब की तुम्हारी संकल्प शक्ति है।’
हम उनको समझाते हैं कि‘नहीं यार, इससे हमें उच्च रक्तचाप हो गया था। डाक्टर से कहा छोड़ दो नहीं तो मुश्किल में आ जाओगे यह संकल्प शक्ति नहीं हमारा डर है जो हमें पीने नहीं देता। हम तो उन लोगों के कायल हैं जो शराब पीकर पचा जाते हैं।’
वह पीने वाले कहते हैं कि ‘नहीं यार, तमाम तरह की व्याधियां हमारे शरीर में हैं तुम क्या जानो? मगर क्या करें पीना नहीं छूटता।’
उस दिन पार्क से योग साधना कर वापस आ रहे थे तो एक ऐसे सज्जन हमें मिले जो योग साधना के फायदे हमें सुनाकर उस शिविर में ले गये जिसमें योग साधना सिखाई जा रही थी। इस बात को सात वर्ष होने के आ गये। उन्होंने कुल जमा सात दिन भी वहां हाजिरी नहीं दी पर हमें याद है वह किसी तरह हमें वहां लगे और फिर वह शिविर छोड़ दिया । मगर हम डटे रहे। वह कहने लगे-‘यार गजब करते हो? अनवरत छह साल से ऊपर हो गया पर तुम्हारा क्रम भंग नहीं हुआ। मान गये तुम्हारे दृढ़ निश्चय को!’
हमने उसको भी समझाया-‘यार, यह बात नहीं है। इसके बिना हम अब चल ही नहीं सकते। जब किसी दिन किसी मरीज को अस्पताल से देखकर आते हैं उसके अगले दिन ही अपनी योगसाधना की अवधि और आसन बढ़ा देते हैं क्योंकि हमें डाक्टरों से बहुत डर लगता है। वैसे कभी कभी पौन घंटा घर पर ही करते हैं पर जब किसी की गमी से जाते पर वहां जब अन्य लोग बीमारियों का बखान करते हैं तो उनको उनको सुनकर हमारे अंदर डर का बवंडर खड़ा होता है और हम घर पर ही अधिक समय लगाते हैं या फिर बाहर अपने एक मित्र के यहां करने चले जाते हैं। इसमें दृढ़ संकल्प जैसी कोई चीज हमें नहीं लगती।’
लोग पता नहीं हमारी बात समझते हैं कि नहीं! क्योंकि वही लोग जब दोबारा मिलते हैं तो फिर वही बात-‘आप तो गजब करते हैं।’
हम कभी नहीं समझ पाते कि इसमें गजब क्या है? हम डरते हैं तो बचने के रास्ते ढूंढते रहते हैं और लोग तो बहादुर हैं ओर फिर उनका हाजमा हमसे बेहतर है। उल्टे हम तो उन लोगों के प्रशंसक हैं जो गलत पैसा हजम कर जाते हैं। शराब पीकर भी मजे में रहते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह कि बिना योग साधना के बहुत से लोग स्वस्थ होकर विचरण करते हैं उनकी प्रशंसा करना भी हमें अच्छा लगता है। बचपन से सुनते आ रहे हैं कि बुरे काम का बुरा परिणाम होता है। इसलिये हम उन लोगों को ही योगी मानते हैं जो बुरा काम कर भी अपनी जिंदगी मजे में गुजारते हैं। कम से कम बाहर से तो ऐसा ही लगता है। अंदर की बात वही जाने। बाकी सभी जानते हैं कि हमारे अंदर डर है जिसका कहीं कोई इलाज नहीं है।
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11/10/09

पसंद का संकट-हिंदी व्यंग्य (pasand ka sankat-hindi vyangya)

अधिकतर लड़कियां अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती। यह पता अब जाकर इस आधुनिक समाज को चला है। सच कहें तो सदियों से पेट में दबी बात अब जुबान में आयी है वरना तो कौन इसे मानता? आधुनिक संचार माध्यमों में तमाम बुराईयां हो सकती हैं पर उससे ऐसे सच सामने भी आने लगे हैं जिन पर समाज जानबूझकर पर्दा डालता आया है। अपने घर का सच बताने में हर पुरुष शर्माता है। चार लोगों के बीच वह यह साबित करता है कि उसका अपने घर पर पूरा नियंत्रण है। अगर कोई गलती से कह दे कि ‘मेरी घर में नहीं सुनी जाती है तो सुनने वाले उसकी मजाक उड़ायेंगे।
इसके विपरीत चार औरतें आपस में मिलेंगी तो अपने परिवार के दोष गिनाने में नहीं चूकेंगी। सासें एकत्रित हुईं तो बहुओं और अगर बहुऐं मिली तो सासों की शिकायत करती हैं।
कोई कोई तो कहते भी नहीं झिझकती कि ‘हमारे पति तो अपनी मां के चमचे हैं।’
कोई मां भी कह जाती है कि ‘मेरा लड़का तो जोरु का गुलाम है।
मान लीजिये ऐसे वार्तालाप में कोई पुरुष दूसरे की निंदा सुन रहा हो तो वह भी ऐसा जाल में फंसता है कि चर्चा किये जाने वाले पुरुष को वैसा ही समझ लेता है। अगर औरत के साथ पुरुष का रक्त संबंध हुआ तो वह उस पुरुष के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी भी कर जाता है-‘कैसा आदमी है? क्या उसे घर चलाने की अक्ल नहीं है, लगता है बाप ने कुछ सिखाया ही नहीं है।’
एक औरत मां, पत्नी, बहिन सास तथा दादी तथा अन्य रिश्तों में पुरुष का साथ निभाती है तो पुरुष भी पुत्र, पति, ससुर तथा भाई के रूप में निभाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि स्त्री पुरुष के संबंध उसके रिश्तों के अनुसार बनते और बिगड़ते हैं। जब कहीं स्त्री पुरुष के आपसी रिश्ते बिगड़ते हैं तो रक्त संबंधों के अनुसार हर कोई किसी का पक्ष भी लेता है। कहते हैं कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य कोई नहीं जानता पर यह फार्मूला पुरुष पर भी समान रूप से लागू है।
सफल पुरुष वही है जो स्त्रियों के आपसी संबंधों में बस हां हु ही कहता रहे।
कई बार पत्नी ताना देती है कि ‘जाओ, अपनी मां की बात सुनो। मेरी सुनते ही कहां हो?’
उसके तत्काल बाद मां की भी ताना मिल सकता है कि ‘जा जोरु के गुलाम! तेरी बात पर अब मेरा भरोसा नहीं रहा।’
एक दिन हम एक सेठजी की दुकान पर खड़े थे। उनका एक मित्र आया और बोला-‘तुझे कल सामान खरीदने बाहर चलना है कि नहीं। इतनी देर से दुकान पर न बताने आया और न ही नौकर के हाथ से संदेश भेजा।’
सेठजी ने कहा-‘यार, घर पर एक काम है। देखना पड़ेगा कि चल पाऊंगा कि नहीं।’
उस समय फोन की सुविधा ऐसी नहीं थी जैसी आज है। वह आदमी बोला-‘सीधा कह न! बीबी से पूछे बिना कोई काम नहीं कर सकता।’
सेठजी ने भी सरल भाव से कहा-‘तुम क्या बीबी से बिना पूछे चल रहे हो। परसों जब मैंने चलने को कहा था तो क्यों नहीं चला? तेरा नौकर बता रहा था कि घर से मना कर दिया है। अब तुम मेरे को अपनी सफाई मत देना।’
वह आदमी हंस कर चला गया। उसके जाने के बाद सेठजी हमसे बोले-‘एक बात कहूं। बाहर आदमी कितना भी शेर बनता हो पर घर में होते सभी भीगी बिल्ली हैं। यह अलग बात है कि कोई इस बात को मानता है कि नहीं।’
औरत अगर बहु है तो वह चाहती है कि पति अपनी मां यानि उसकी सास से पहले उसकी बात सुने। अगर मां है तो वह चाहती है कि इतने बरसों से जिस लड़के को पाला है वह मेरी बात सुने।’
फिर इस पर बहने और अन्य रिश्ते भी होते हैं। बहिन सोचती है कि भाई अपनी साली से अधिक हमें तवज्जो दे। साली है तो वह चाहती है कि जीजाजी हमें अपनी बहिन से अधिक सम्मान दें।
हमारे यहां समाज पुरुष प्रधान इसलिये है क्योंकि अभी भी अधिकतर प्रत्यक्ष आय का भार उस पर है-याद रहे अमेरिकी विशेषज्ञ कहते हैं कि सामान्य भारतीय गृहिणियां अपनी पति से अधिक आय करती हैं यानि वह इतना काम करती हैं कि अगर उनका रुपये में मूल्यांकन हो तो पति से अधिक आय उनकी होना चाहिये। इस प्रत्यक्ष आय के कारण उसका प्रभाव घर पर रहता है पर दूसरी समस्या उसके साथ यह है कि वह हमेशा घर से बाहर ही होता है। दिन में घर पर क्या हुआ? किसने क्या कहा? उसे पता तब चलता है जब वह शाम को घर वापस आता है। हर कोई अपने हिसाब से अपनी बात उसे सुनाता है। ऐसे मेें उसकी थकान और तनाव बढ़ जाता है। यह घर घर की कहानी है। इस पर हंसने जैसी कोई बात नहीं है। यदि इन बातों पर आप हंसते हैं तो इसका आशय यह है कि अभी आपका विवाह नहीं हुआ या फिर आप हमसे क्या अपने आपसे अपना सच छिपा रहे हैं।
अब सवाल है कि लड़कियां ही ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है तो फिर उसके जीवन साथी से आप क्या कहेंगे? मां की बात सुन क्योंकि पुरुष तो तू है। इधर दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा के भी कानून बना रखे हैं तब आदमी पर एक दबाव तो रहता ही है। एक अजीब संयोग है कि इस समय वंदेमातरम को लेकर तमाम तरह की चर्चा है ऐसे में ही एक टीवी चैनल से यह संदेश निकला कि ‘लड़कियां ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है।’ इन्हीं लड़कियों में ही भविष्य की मातायें हैं और कभी वंदेमातरम शब्द सुनकर उनको भी खुशी होगी पर अभी उनके लिये इसका क्या मतलब? ऐसे में अगर कोई लड़का अगर पसंद होने और करने के लिये-आजकल दोनों की मर्जी चलती है- किसी लड़की से मिलने गया और जाते ही बोला दिया ‘वंदेमातरम’, तब वह तो पहली नजर में ही अस्वीकृत कर दिया जायेगा। हमने टीवी चैनल के उस कार्यक्रम के कुछ हिस्से कभी कभी देखे हैं और उसमें लड़कियों की लड़कों की माताओं पर टिप्पणियां भी सुनी है तब यह सोचते हैं कि समाज ने बहुत समय से कई बातें दबा कर रखी हैं जो सामने आ रही हैं।
हमारे एक सेठ जी कहते थे कि सफल पुरुष वही है जो औरतों की विवाद में बस हां हु करता रहे। जिस आदमी ने सोचा कि मैं कोई फैसला कर शांति करवाऊं वह अपने घर के साथ ही अपने दिल की भी शांति ऐसे दांव पर लगा देगा कि काम पर भी उसका मन नहीं लगेगा।’
बहरहाल स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के साथ ही स्त्रियों के आपसी रिश्ते भी होते हैं और उनके बीच जब पुरुष फंसता है और बात ऊंच नीच हुई तो पुरुष का ही नाम खराब होता है क्योंकि नाम उसके घर पर ही चलता है। इस विषय पर एक विद्वान का कथन याद आ रहा है। जब यह निर्णय किया गया कि स्कूल में प्रवेश के समय पिता के नाम की अनिवार्यता नहीं होगी और मां भी अपना नाम वहां लिखा सकती है। तब उन विद्वान ने कहा था कि ‘पुरुष का तो बस एक नाम ही था वरना तो घर तो चलाती स्त्रियां ही हैं। अब वह नाम भी पुरुष के हाथ से गया।’
कहने का तात्पर्य यही है कि इस संसार में किसी रिश्ते को समझना और उस बयान करना ही गलती है। हालात, समय और स्वार्थ अपने हिसाब से संबंध बदलते रहते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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