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5/29/10

गुलाब के साथ कांटे-हिन्दी लेख (gulab ke sath kante-hindi lekh)

भारत में भी शादी के बाद तलाक की घटनायें बढ़ रही हैं। पहले जब बुजुर्ग लोगों के श्रीमुख से पश्चिमी देशों के मुकाबले अपने देश की संस्कृति, संस्कार और स्वभाव के श्रेष्ठ होने की बात सुनते थे तो उनका तर्क यही होता था कि वहां तलाक ज्यादा होते हैं, वहां की लड़कियां बिना विवाह के मां बन जाती हैं, या फिर विदेशों में लोग माता पिता तथा गुरु की इज्जत नहीं करते थे। उस समय के बच्चे आज बड़े हो गये हैं पर उनके तर्क भी आज इसी तरह के रहते हैं मगर अब यह तर्क खोखले लगते हैं।
देश की सच्चाई से मुंह फेर कर तर्क करना इस देश के बौद्धिक और अबौद्धिक दोनों समाजों की आदत हो गयी है। दरअसल इन बुजुर्गों ने ही अपने बच्चों को पाश्चात्य सभ्यता को आधुनिकता का पर्याय मानकर उस अपनाने दिया। उस पर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संवरते हुए अपनी औलाद के संस्कारों को फलते फूलते देखकर बहुत प्रसन्न हुए पर आज जब उन्हें पश्चिमी सभ्यता की वजह से अकेले पन का दंड भोगना पड़ता है तब भी वह इस सच से मुंह फेरकर अपने देश की कथित संस्कृति की रक्षा करने की बात करते हैं। सवाल यह है कि आखिर इस संस्कृति की रक्षा कौन करे? सभी का एक ही ध्येय है कि हमारे बच्चे अंग्रेजी में पढ़कर बड़े बने जिससे हमारी नाक समाज में ऊंची हो। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि वह उनको गुलामी के लिये-यानि नौकरी करने के लिये-तैयार करते हैं और फिर रोते हैं कि उनके बच्चे पूछ नहीं रहे। अब यह सोचने की बात है कि जब बच्चा दूसरे की गुलामी में चला गया तो फिर उससे अपने पारिवारिक सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। किसी का बच्चा अमेरिका में है तो किसी का जर्मनी में तो किसी का ब्रिटेन में। इसे लोग बड़ी शान से बताते हैं पर उनका अकेलापन उनके चेहरे से झलकने लगता है।
जब देश में तलाक की संख्या बढ़ रही है तब मुहूर्त देखकर शादी करने की बात भी अब शक के दायरे में आ जाती हैै। पहले के बुजुर्ग दावा करते थे कि हमारे यहां शादियां मुहूर्त देखकर की जाती हैं इसलिये इतने तलाक नहीं होते। मगर शादियां तो अब भी मुहूर्त देखकर होती हैं। फिर ऐसा क्या हो रहा है। दरअसल पहले स्त्रियां इतनी मुखर नहीं थी। अपने घर के कष्ट झेलकर खामोश रहती थीं। उस समय के बुजुर्ग पुरुष अंदर ही अंदर घुट रही नारी को खुश मानकर ही ऐसे दावे करते थे। अब हालात बदल गये। अंग्रेजी माया के चक्कर ने जहां कथित रूप से इस देश को सभ्य बनाया तो लोगो में मुखरता भी आयी। पुरुष पश्चिमी संस्कृति से ओतप्रोत स्त्रियों को ही अपनी पत्नी के रूप में पसंद करने लगे। सो पश्चिम की खुशियों के साथ उससे जुड़ी बीमारियां भी यहां आ गयीं। सच है यार, खुशियों के फूलों के साथ कांटे भी जुड़े रहते हैं। गुलाब की चाहत में पौद्या लगायेंगे तो उसमें कांटे भी आयेंगे। कमल लगाना है तो कीचड़ का जमाव करना ही होगा।
यह सब बकवास हमने योग का मतलब समझाने के लिये लिखी है। योग हर इंसान करता है-सहज योग और असहज योग। जब आदमी स्वयं योग करता है तब वह सहज योग की प्रवृत्ति में स्थित होता है पर जब बिना सोचे समझे चलता जाता है तब वह असहज योग को धारण किये होता है। लोग अपने हाल पर कभी सहज होने का प्रयास करते हैं पर अन्य असहजतायें उनके चेहरे पर छायी हुई होती है। खुश होने या दिखने के लिये आदमी जूझता रहता है पर उसके नसीब में नहीं होती। सहज योग का अर्थ है कि अपने ऊपर हमारा नियंत्रण होता है जबकि असहजयोग की स्थिति में स्थिति हम पर नियंत्रण करती है। गुलाब के साथ कांटे होने की सच्चाई को जब हम अपने सहज योग से देखते हैं तो तनाव कर होता है पर जब हम असहज होते हैं तो वह हमारा पीछा हमेशा करती है।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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1/16/10

मनु संदेश-बुद्धिहीन को दंड का उपयोग करना नहीं आता (rajya aur dand-hindu dharma sandesh)

स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। एक बात याद रखें कि बुद्धिमान, ज्ञानी और विद्वान लोगों की समझ से ही समाज, राष्ट्र और धर्म संकट से उबर सकता है। ऐसे लोगों की उपेक्षा से समाज गर्त में चला जाता है और राष्ट्र पर संकट आते रहते हैं।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.wordpress.com

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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

6/8/08

जीन चलते हैं पर गुण तो गुण में ही बरतते हैं-आलेख (1)

पश्चिमी विज्ञान मानव शरीर में स्थित जीन के आधार पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत करता है जबकि यही विश्लेषण भारतीय दर्शन ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं‘ के आधार पर करता है। पश्चिमी विश्लेषण मनुष्य के स्वभाव में उन जीनों के प्रभाव का वर्णन करते हैं जबकि भारतीय दर्शन उनको गुणों का परिणाम कहकर प्रतिपादित करता है।
मनुष्य की पहचान उसका मन है और देह में स्थित होने के कारण उसमें विद्यमान गुण या जीन से प्रभावित होता है इसमें संशय नहीं हैं। जब शरीर में कोई भीषण विकार या पीड़ा उत्पन्न होती है तब मन कहीं नहीं भाग पाता। उस समय केवल उससे मुक्ति की अपेक्षा के अलावा वह कोई विचार नहीं। करता। मन में विचार आते हैं कि ‘अमुक पीड़ा दूर हो जाये तो फिर मैं एसा कुछ नहीं करूंगा जिससे यह रोग फिर मुझे घेरे।’
कभी अपने आप तो कभी दवा से वह ठीक हो जाता है पर फिर उसका मन सब भूल जाता है। व्यसन करने वाले लोग इस बात को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। जब अपने व्यसन की वजह से भारी तकलीफ में होते हैं तब सोचते हैं कि अब इसका प्रभाव कम हो तो फिर नहीं करेंगे।’

ऐसा होता नहीं है। व्यसन कर प्रभाव कम हाते े ही वह फिर उसी राह पर चलते हैं। अपने ज्ञान के आधार पर मै यह कह सकता हूं कि‘शुरूआत में व्यसन आदमी किसी संगत के प्रभाव में आकर करता है फिर वही चीज-शराब और तंबाकू-मनुष्य के शरीर में अपना गुण या जीन स्थापित कर लेती है और आदमी उसका आदी हो जाता है। याद रहे वह गुण व्यसन करने से पहले उस आदमी में नहीं होता।



पश्चिमी विज्ञान कहता है कि आदमी में प्रेम, घृणा, आत्महत्या, चिढ़चिढ़ेपन तथा अन्य क्रियाओं के जीन होते हैं पर वह यह नहीं बताता कि वह जीन बनते कैंसे हैं? भारतीय दर्शन उसको स्पष्ट करता है कि मनुष्य में सारे गुण खाने-पीने के साथ ही दूसरों की संगत से भी आते हैं। मेरा मानना है कि मनुष्य सांसें लेता और छोड़ता है और उससे उसके पास बैठा आदमी प्रभावित होता है। हां, याद आता है कि पश्चिम के विज्ञानी भी कहते हैं कि सिगरेट पीने वाले अपने से अधिक दूसरे का धुंआ छोड़कर हानि पहुंचाते हैं। इसका अर्थ यह है कि विकार वायु के द्वारा भी आदमी में आते हैं। अगर आप किसी शराबी के पास बैठेंगे और चाहे कितनी भी सात्विक प्रवृत्ति के हों और उसकी बातें लगातार सुन रहे हैं तो उसकी कही बेकार की बातें कहीं न कहीं आपके मन पर आती ही है जो आपका मन वितृष्णा से भर देती है। इसके विपरीत अगर आप किसी संत के प्रवचन-भले ही वह रटकर देता हो-सुनते हैं तो आपके मन में एक अजीब शांति हो जाती है। अगर आप नियमित रूप से किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें जिसे आप ठीक नहीं समझते तो ऐसा लगेगा कि वह आपके तनाव का कारण बन रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि पांच तत्वों-प्रथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु- से बनी यह देह इनके साथ सतत संपर्क में रहती है और उनके परिवर्तनों से प्रभावित होती है और इसके साथ ही उसमें मौजूद मन, बुद्धि और अहंकार की प्रकृति भी प्रभावित होती है। इन परिवर्तनों से मनुष्य की देह में जीन या गुणों का निर्माण और विसर्जन होता है और वह उसका प्रदर्शन वह बाहर व्यवहार से कराते हैं।
पश्चिम के विद्वान इन जीन को लेकर विश्लेषण करते हुए उनके उपचार के लिए अनुसंधान करते हैं। अनेक तरह के आकर्षक तर्क और सुसज्तित प्रयोगशालाओं से निकले निष्कर्ष पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनते हैं और भारतीय अध्यात्म को पूरी तरह नकार चुके हमारे देश के विद्वान अखबार, टीवी चैनलो, रेडियो और किताबों उनका प्रचार कर यहां ख्याति अर्जित करते हैं। हां, लोग सवाल करेंगे कि भारतीय अध्यात्म में भला इसका इलाज क्या है?

हमारा अध्यात्म कहता है लोग तीन तरह के होते हैं सात्विक, राजस और तामस। यहां उनके बारे में विस्तार से चर्चा करना ठीक नहीं लगता पर जैसा आदमी होगा वैसा ही उसका भोजन और कर्म होगा। वैसे ही उसके अंदर गुणों का निर्माण होगा।

श्रीगीता के सातवों अध्याय के (श्लोक आठ) अनुसार आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा जो स्वभाव से ही मन को प्रिय हो ऐसा भोजन सात्विक को प्रिय होते हैं।

नौवें श्लोक के अनुसार कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक, दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।


दसवें श्लोक के अनुसार -अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट तथा अपवित्र है वह भोजन तामस को प्रिय होता है।



पश्चिम के स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार देह की अधिकतर बीमारियां पेट के कारण ही होती हैं। यही विज्ञान यह भी कहता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। हमारा अध्यात्म और दर्शन भी यही कहता है कि गुण ही गुण को बरतते है। इसके बावजूद पश्चिमी विज्ञान और भारतीय अध्यात्म में मौलिक अंतर है। पश्चिमी विज्ञान शरीर और मन को प्रथक मानकर अलग अलग विश्लेषण करता है। वह मनुष्य की समस्त क्रियाओं यथा उठना, बैठना, चलना और कामक्रीडा आदि को अलग अलग कर उसकी व्याख्या करता है। इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म या दर्शन मनुष्य को एक इकाई मानता है और उसके अंदर मौजूद गुणों के प्रभाव का अध्ययन करता है। अगर योग की भाषा के कहें तो सारा खेल ‘मस्तिष्क में स्थित ‘आज्ञा चक्र’ का है। पश्चिमी विज्ञान भी यह तो मानता है कि मानसिक तनाव की वजह से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं और वह उनका इलाज भी ढूंढता है पर जिन मानसिक विकारों से वह उत्पन्न होते हैं और मनुष्य की देह में अस्तित्वहीन रहें ऐसा इलाज उसके पास नहीं है।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान केवल धर्म प्रवचन के लिऐ नहीं है वह जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित है। यह मनुष्य के देह और मन में स्थित विकारों को दूर करने के लिए केवल शब्दिक संदेश नहीं देता बल्कि योगासन, प्राणायम और ध्यान के द्वारा उनको दूर करने का उपाय भी बताता है। अध्यात्म यानि हमारी देह में प्राणवान जीव आत्मा और उससे जानने की क्रिया है ज्ञान। अन्य विचाराधारायें आदमी को प्रेम, परोपकार और दया करने के का संदेश देती हैं पर वह देह में आये कैसे यह केवल भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान ही बताता हैं। अगर सुबह उठकर योगासन, प्राणायम, और ध्यान किया जाये तो देह में वह जीन या गुण स्वयं ही आते है जिनसे आदमी प्रेम, परोपकार और दया करने लगता है। देह और मन के विकार को निकाले बिना आदमी को सही राह पर चलने का उपदेश ऐसा ही है जैसे पंचर ट्यूब में हवा भरना।
अगर कोई आदमी बीमार होता है तो डाक्टर कहते हैं कि चिकनाई रहित हल्का भोजन करो जबकि भारतीय दर्शन कहता है कि चिकना, रसयुक्त स्थिर भोजन ही सात्विक है। इसका अर्थ यह है कि डाक्टर जिनको यह भोजन मना कर रहा है उनमें विकार ही इस सात्विक भोजन के कारण है। ऐसा भोजन करने के लिये परिश्रम करना जरूरी है पर आजकल धनी लोग इसे करते नहीं है। श्रीगीता कहती है कि अकुशल श्रम से सात्विक लोग परहेज नहीं करते। आजकल के लोग अकुशल श्रम करने में संकोच करते हैं और यही कारण है कि लोगों में आत्म्विश्वास की कमी होती जा रही है और ऐसे जीन या दुर्गुण उसमें स्वतः आ जाते हैं जो उसे झूठे प्रेम,पुत्यकार की भावना से उपकार और कपटपूर्ण दया में लिप्त कर देते हैं। कुल मिलाकर पश्चिमी विज्ञान की खोज जीन चलते हैं जबकि भारतीय दशैन की खोज ‘गुण ही गुण बरतते हैं। वैसे देखा जाये तो देश में जितनी अधिक पुस्तकें पश्चिमी ज्ञान से संबंधित है भारत के पुरातन ज्ञान उसके अनुपात में कम है पर वह वास्तविकता पर आधारित हैं। संत कबीर दास जी के अनुसार अधिक पुस्तकें पढ़ने से आदमी भ्रमित हो जाता है और शायद यही कारण है कि लोग भ्रमित होकर ही अपना जीवन गुजार रहे हैं। इस विषय पर इसी ब्लाग पर मै फिर कभी लिखूंगा क्योंकि यह आलेख लिखते समय दो बार लाईट जा चुकी है और मेरा क्रम बीच में टूटा हुआ था इसलिये हो सकता है कि विषयांतर हुआ हो पर उस दौरान भी मैं इसी विषय पर सोचता रहा था। बहुत सारे विचार है जो आगे लिखूंगा।

6/1/08

समाज का भ्रामक विभाजन स्वीकार्य नहीं-आलेख

विश्व में आतंकवाद एक ऐसे भ्रम की उपज है जिस पर बहुत बड़ी बहस करने के बाद भी कोई निर्णय नहीं निकल सकता। मैं दूसरे धर्मों के बारे में जानता हूं पर उस लिखता नहीं। वजह मैंने अपने ऊपर ही एक अघोषित सेंसरशिप लगा रखी। मुझे यह भी लगता है कि इस तरह विवाद खड़े कर हम अपने समाज को किसी नयी दिशा में नहीं ले जा सकते। मैं अक्सर अपने धर्म में व्याप्त अंधविश्वास, और रूढि़वादिता के प्रतिवाद में लिखता हूं। मेरे कुछ साथी और मित्र ब्लाग लेखक भी इस पर समय समय पर कड़ी टिप्पणियां करते हैं। मैं जब अपने धर्म में व्याप्त कुरीतियां पर लिखता हूं तो कोई उस पर उंगली नहीं उठाता क्योंकि सभी जानते हैं कि मैं अपने ही भारतीय अध्यात्म के सकारात्मक पक्ष पर भी नियमित रूप से लिखता हूं। हां, सभी ब्लाग लेखक स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म में व्याप्त बुराईयों और पाखंडों को उजागर करते हुए खूब लिखते हैं पर उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति जो निष्ठा है वह भी बता देते हैं। यह जरूरी नहीं है कि वह मेरी तरह ही उसके सकारात्मक पक्ष पर भी नियमित रूप से लिखें पर उनके लिखे से मेरे अंदर यह विश्वास पैदा होता है कि मेरे जैसे विचार रखने वाले अन्य लोग भी है।
यहां इस देश में हिंदू धर्म को लेकर आलोचना करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है तो सकारात्मक पक्ष पर भी हर कोई लिख सकता है। यह अलग बात है कि भारतीय अध्यात्म को हिंदू धर्म के नाम पर अनदेखा किया जाता है पर सत्य के निकट जितना यह है उसे वही समझ सकता है जो इसका अध्ययन करता है। आधुनिक हिंदी साहित्य में भक्ति काल तो संपूर्ण रूप से इसी अध्यात्म के रहस्यों को उजागर करने के साथ ही जीवन के लिऐ ऐसे संदेश देता है जो अन्यत्र किसी अन्य भाषा में हों यह संभव है ही नहीं। संत कबीर और कविवर रहीम के बारे मेंे अधिक लिखना सूरज को दीपक दिखाना है। अपनी अल्प बुद्धि और मासूम विवेक के साथ जब मैं वर्तमान संदर्भ में व्याख्या रखता हूं तो टिप्पणी करने वाले लिख जाते है कि ‘ताज्जुब है आप वर्तमान संदर्भों में भी इसकी व्याख्या ऐसी करते हैं कि जब यह लिखे गये होंगे तब लिखने और कहने वालों ने सोचा भी नहीं होगा कि आगे कभी ऐसी व्याख्या होगी।‘

यह लेख मैं अपनी आत्म प्रंवचना में नहीं लिख रहा हूं। मेरा आशय यह है कि हम अपने हिंदू धर्म में तमाम तर्क वितर्कों की गुंजायश रखते हैं। इसका लाभ उठाकर कई लोग केवल इसके नकारात्मक स्परूप को सामने दिखाकर दूसरे लोगों के सामने अपने उदार होने का प्रमाण प्रस्तुत करते है। कई लोग अपने समाज में सुधार की दृष्टि से निष्काम भाव से कार्य करते हुए अपने ही अंधविश्वासों और रूढि़वादियों को उजाकर करते हुए उनसे लोगों को दूर रखने के लिये आग्रह के साथ लिखते और बोलते हैं। यानि हम अपने धर्म में जो आडम्बर है उसको उजागर करने में कोताही नहीं करते। इतना ही नही मैं तो यह भी कहता हूं कि हमारे धर्मग्रंथों में कुछ ऐसे वाक्य हैं जो अब अप्रासंगिक हो गये हैं तो समाज भी अब उसे स्वतः नहीं अपनाता पर इसका आशय यह नहीं कि उन धर्मग्रंथों के सारे वाक्य ही गलत हैं। मनृस्मृति में और कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर तमाम लोग आक्षेप करते हैं पर मैंने उनके सार्थक वाक्य यहां रखे हैं और किसी ने उनको चुनौती नहीं दी है। हमारे देश के अध्यात्म के समय के साथ सकारात्मक परिवर्तन स्वीकार करने की गुंजायश है। श्रीगीता में ज्ञान और विज्ञान दोनों में मनुष्य को पारंगत होने का संदेश दिया गया है। सत्य के ज्ञान के कोई बदलाव हो नहीं सकता पर माया के विज्ञान का स्वरूप परिवर्तन शील है और उनको स्वीकार करते हुए आगे हमार समाज बढ़ता जाता है।

मैंने कहा था कि मुझे सिर्फ अपने धर्म पर ही विचार करने का अधिकार है-यह मैं स्वतः मानता हूं। उनकी अच्छाईयों और बुराईयों पर बहस से भी नहीं डरता। एक सवाल जो मुझे परेशान करता है कि अन्य धर्मों में क्या कोई बात विवादास्पद नहीं हैं? क्या उनमें अंधविश्वास, रूढि़वादिता और पाखंड नहीं हैं। क्या उनके सभी धार्मिक गुरू निर्विवाद हैं? क्या उनमें लिखे गये सभी वाक्य सिद्ध वाक्य हैं जो उनके प्रतिवाद के रूप में उनके मतावलंबी लेखक कुछ लिखते ही नहीं?
जहां तक मैंने अनेक धर्मों का अध्ययन किया है उसके बारे में मेरी राय है पर अन्य धर्मों पर टिप्पणी करने का अर्थ है कि अनावश्यक विवादों में फंसना। अगर कुछ कहूंगा तो वह धर्मग्रंथों से दो चार विवादस्पद श्लोक या आधुनिक हिंदी साहित्य से एक-दो दोहा उठाकर सुनायेंगे जिनको हम कई वर्षों से सुनते आ रहे है। मैंने आज तक किसी भी अन्य धर्म पर उस समुदाय के लेखकों द्वारा लिखी गयी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं पढ़ी। संभव है कि दूसरे धर्मों में ऐसी बहस की गुंजायश नहीं हो या फिर उसके लेखकों के मन में अपने धर्म के प्रति वैसी ही संवेदनशीलता न हो जैसी कि हिंदी समुदाय के लेखक के मन में होती है। इसलिये अधिकतर हिंदू लेखक लिखते हुए कभी न कभी अपने धर्म पर लिख जरूर जाते हैं भले ही वह उसमें आडम्बर और रूढि़यों के प्रतिवाद करते हों। यहां हिंदू लेखक कहते हुए मेरे मन में जो वितृष्णा आई उसे मैं बयान नहीं कर सकता पर विषय के प्रवर्तन में अस्पष्टता न रहे इसलिये मुझे ऐसा करना पड़ा। इसके पीछे मेरे मन में एक विचार आता है और मुझे लगता है कि थोड़ी देर के लिये यह विभाजन कर मैं यह बताना चाहता हूं कि भारत में अन्य धर्मों को मानने वाले लोग आपस में ही एकमत नहीं हैं कि वह हिंदू कहलाने में हिचक महसूस करें या नहीं। एक विवादास्पद गैर हिंदू विद्वान को मैंने कहते हुए सुना है कि अगर आप इस देश को हिंदुस्तान कहते हैं तो हम भी हिंदू हैं और हमें संकोच नहीं है पर अगर आप धर्म की बात करते हैं तो हम हिंदू नहीं है। उनका आशय यह है कि इस जमीन पर पैदा होने और किसी मत को मानने के विषय अलग-अलग है।

यहां अब मैं सभी लेखकों एक ही स्थान पर खड़ा करता हूं। भारत की अपने एक संस्कृति है और भारतीय अध्यात्म केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं है। भारतीय संस्कृति और अध्यात्म उत्तरोतर समृद्धि होते जाते हैं। यहां तक कि भगवान के अवतारों के समक्ष कुछ संतो ने अपनी ख्याति अर्जित की है। धर्मग्रंथों में भगवान के अनुसार‘मेरे भक्त मेरे से भी बडे+ हैं’-यही कारण है कि तुलसी दास, सूरदास, मीरा, कबीर, रविदास, रहीम, रसखान तथा अन्य अनेक विद्वानों को भी भारतीय अध्यात्म का भाग माना गया है-अन्य धर्मों के अनेक संतों और मनीषियांे को भी भारतीय अध्यात्म से संबंधित विषयों पर प्रकाशित पत्रिकाओं में स्थान दिया जाता है।
वर्तमान समय में आधुनिक हिंदी में रचे बसे सभी धर्म के लेखकों के लिए यह संभव नहीं है कि वह भारतीय अध्यात्म से अलग हटकर कुछ देख पाते-जिन्होंने इन महान रचनाकारों को पढ़ा वह भला और क्या पढ़ पाते? यहां हम कई ऐसे लेखकों को देख सकते हैं जो हिंदू परिवार से न होने के बावजूद भारतीय अध्यात्म में अटूट निष्ठा रखते हैं। क्या दिलचस्प बात नहीं है कि भारतीय अध्यात्म के प्रमुख आधार श्रीगीता ग्रंथ को तो अन्य धर्मों के मतावलंबी भी चुनौती नहीं दे पाते। भारतीय अध्यात्म से सराबोर सभी हैं चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़े हैं और इसलिये इस देश में किसी भी दूसरे धर्म की आलोचना सुनने को नहीं मिलती। और दूसरे देशों में धर्म के प्रति इतनी संवदेनाएं नहीं है कि इस पर लिखकर लेखक अपना समय नष्ट करना चाहें। इसी संवदेनशीलता का यह परिणाम भी होता है यहां कुछ तत्व लोगों को बांटकर अपना हित साधते हैं। मुश्किल यह है कि अन्य धर्मों के लोग भी कहीं न कहीं भारतीय अध्यात्म में सराबोर है इसलिये अपने धर्म के दोषों पर दृष्टिपात नहीं कर पाते।

एक दिलचस्प वाक्या है। मैं सुबह अध्यात्म रूप से अपनी बात कह देता हूं पर शाम को अपनी हास्य कविताओं में बिना किसी धर्म का नाम लिये आक्षेप करता हूं। शूरूआती दौर मे एक सज्जन ने मुझे लिखा कि आप अपने धर्म पर व्यंग्यात्मक प्रहार करने वाली बात लिख रहे है किसी अन्य के मत पर लिखकर बताईये। मुझे उस पर हंसी आर्यी। तब मैंने सभी धर्मों को एक ही मानने वाले शब्द अपने पाठों में अपनाना शूरू किये सर्वशक्तिमान, दरबार, सेवक, पवित्र पुस्तक और भक्त। इसका आशय यह है कि मैं सभी को एक ही पलड़े में रखता हूं। फिर हमारे देश में अच्छा लेखक वही माना जाता है जो व्यंजना विधा में रखता है।

मेरे मन में कभी भेद नहीं आता। भेदात्मक बुद्धि तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है। अंतर्जाल पर तो जो ब्लाग लेखक ऐसे भेद करता है उसे मैं मूर्ख ही कहूंगा। एक तो यहां छद्म नाम की संभावना भी लगती है। दूसरे करीब-करीब सभी धर्मों के टिप्पणीकार मेरे ब्लाग पर आ चुके हैं। उनकी टिप्पणियों से निष्कर्ष यह है कि उनके शब्द किसी धर्म के परिचायक नहीं होते और प्रेम, मित्रता और सदभावना में इतनी गहराई होती है कि...................मुझे कोई शब्द नहीं मिलता कि मैं उसके लिए कोई पैमाना लिख सकूं।

मैं यहां पांच नाम लिखना चाहता था जो अपनी टिप्पणियां इतने प्रेम से रखते हैं कि मेरा मन पुलकित हो जाता है और तब होता है मेरे मन में ऐसा भाव जो मुझे धर्म, जात, भाषा और क्षेत्रीय भावना से दूर ले जाता है, परंतु उनके नाम लिखने से मुझे ही अपनी बुद्धि में भेद दिखाई देता। मैं समाज को विभाजित करने वाले शब्दों से हालांकि दूर रहता ही हूं और खुलकर कहता हूं कि यह विभाजन भ्रामक है। हां, लिखने के लिये अपना विषय स्पष्ट करने के लिये इस विभाजन का नक्शा पाठकों के सामने रखना पड़ता है पर मैं अपने पाठ का वाहन कभी इस नक्शे पर नहीं चलाता। मैं अकेला ब्लाग लेखक हूं जो कहता हूं कि सभी ब्लाग लेखक और पाठक एक जैसे ही मुझे लगते हैं और समाज के भ्रामक विभाजन वाले शब्दों की संज्ञा उन पर लागू नहीं होती। वह स्वयं मुझसे कहें तब भी उनको बता सकता हूं कि वह गलत है। शेष फिर कभी।

5/10/08

अध्यात्म का ज्ञान और सांसरिक उत्पाद मिलने का एक ही स्थान

भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहले और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।
adhyatm, alekh, bharat, chintan, megazine, अभिव्यक्ति, अर्थशास्त्र, संस्कार, हिंदी संपादकीय

2/2/08

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं (सर्वशक्तिमान-३)

भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और आध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ:: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता। मैं स्वयं ही इस बात का उदाहरण देता हूँ। तमाम तरह के आध्यात्म ग्रंथ मैने बचपन में ही पढ़े और आज भी बड़ी रूचि के साथ पढ्ता हूँ। जब मेरी उम्र आठ साल थी तबा पडोस में रहने वाले एक पन्डित जी की बहू से मेरी माताजी ने पढ़ने के लिए तुलसीदास जी की श्री राम चरितमानस ली थी। मैं भी उसे पढ़ने लगा। मैने उसे धार्मिक भावना से नहीं कहानी की दृष्टि से पढ़ा। उसे कई बार पढ़ा। एक दिन पन्डित जी ने अपनी बहू से वह माँगी तो उसने उनको बताया की ''वह पडोस का लड्का है न वह उसे पढता है।''
उन्होने मुझे बुलाया और कहा'जब पढ़ लो तो वापस कर देना, पर इसको आदर से रखना। तुम इससे बहुत कुछ सीखोगे।''

फिर कभी उन्होने वह मुझसे वापस नहीं माँगी और जब हमने वह मकान खाली किया तब मैं उनको वापस कर आया, पर तब तक मेरे अंदर वह बीज अनुकुरित हो चुका था जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। फिर तो मैने वाल्मीकि रामायण को पढ़ना शुरू किया और अपने जेब खर्च से मैं वह सब धार्मिक किताबें ले आया जो भारतीय अध्यात्म का आधार स्तंभ हैं। आज जब मैं किसी आध्यात्म विषय पर लिखता या बोलता हूँ तो अधिकतर लोग विद्वान होने का अहसास पाल लेते हैं। अब यह मैं नहीं जानता की ऐसा है कि नहीं पर मुझे अपने तर्क भी गढने की आदत भी है और में भी कभी-कभी ऐसे सत्संगों में जाता हूँ पर कुछ नया सुनने से अधिक कोई विचार नहीं आता. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इतना ज्ञान तो मैं किताबों में पड़ चुका हूँ पर फिर भी वहाँ जाना मुझे अच्छा लगता है। इसलिए जब आज कल के तथाकथित बाबा लोग भारत के प्राचीनतम परंपरा के महिमा की बात करते हैं तो ऐसा लगता है की कोई ग्राहकों का समूह उनके सामने खड़ा है जिसे वह भारतीय आध्यात्म- जिसका कोई पेटेंट नहीं है- उसे बेच रहे हैं। वह हमेशा ही शिष्य को सिखाते रहते हैं और वह सीखता नहीं है और हर ख़ास मौके पर उनके दर्शन करने चला जाता है और वहाँ हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट अपने धर्म का पालन करता है जिसका भारत की प्राचीन गुरु-परंपरा से कोई लेना-देना हो मुझे नहीं लगता। एक बात अपने निष्कर्ष के तौर पर कहना चाहता हूँ कि आज के तथाकथित गुरुओं को एकलव्य जैसा शिष्य चाहिऐ जो उनको आज के युग में अपना अंगूठा काटकर न भेंट करे-क्योंकि उससे उनकी आश्रम फाईव स्टार आश्रमों थोडे ही बन पायेगा- बल्कि दूसरों को अंगूठा दिखाकर जुटाए पैसे से उनको भेंट दे पर अर्जुन जैसा शिष्य नहीं चाहिए जो दुष्कर्म करने वालों का समर्थन करने पर उनका प्रतिवाद करे। इन संतो और भक्तों को पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं है भले ही कितना भी बखान कर लें. (क्रमश:)

1/6/08

बाबा रामदेव को चुनौती देने से अच्छा है उनसे इलाज करवाएं

इंडियन मेडिकल एसोसियेशन I.M.A. ने योग गुरु रामदेव के इस बयान का विरोध किया है जिसमें उन्होने कहा था की डाक्टर लोगों की बीमारियों को बढाचढा का बताते हैं। ई।M।आ। ने बाबा को चुनौती भी दी है कि वह अस्पतालों में जाकर केंसर पीडितों का इलाज करके बताएं।

यहाँ पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं प्रतिदिन योग साधना करता हूँ पर बाबा रामदेव का मैं शिष्य नहीं हूँ पर वह जिस तरह लोगों में योग साधना और अन्य विषयों पर चेनता जागृत कर कर रहे हैं उसका समर्थक हूँ और कुछ ऐसे विषय भी हैं जिनसे मेरी सहमति नहीं होती पर इसके बावजूद मानता हूँ कि वह इस भारतीय समाज के लिए जो कर रहे हैं वह बहुत आवश्यक है। इसलिए जब मैंने I.M.A.आ।द्वारा उनकी आलोचना पढी तो मुझे लगा कि शायद वह उनकी bat समझ नहीं पाए। बाबा ने जो कहा है वही आम लोग भी कहते हैं और उन्होने तो केवल दोहराया भर है।

ऐसा नहीं है कि पहले लोग बीमार नहीं पड़ते थे पर अपने गली मोहल्लों में ही इलाज कराकर सही होते और आज भी लोग उनके पास जाते हैं। वजह यह है कि छोटी-मोटी बीमारी वही ठीक हो जाती है। अगर अधिक पढे-लिखे डाक्टर होते हैं तो तमाम तरह के टेस्ट कराने में लोगों का समय और पैसे बर्बाद कर देते हैं। हर बार बीमारी बड़ी होने का अंदेशा डाल देते हैं और आदमी उनके पास जाने से घबडाता है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह तो वैसे भी दिमागी तनाव से होते हैं और अगर किसी को अपनी इन बीमारियों के बारे में पता चले तो वैसे ही उसका मनोबल गिर जाता है। इधर डाक्टर दवाएं लिखते जाते और कहते भी जाते-''आप चिंता मत करो'।

मधुमेह के मरीज जो मरीज खाने के पहले और बाद गोली लेने के चिंता करते हैं और चिंता तो वैसे भी शरीर की दुश्मन मानी जाती है-ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि गोली क्या काम करेगी। चिकित्सा विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर बहुत लोचदार है और कई तरह के समायोजन स्वयं ही करता है अगर गोली लेने के बाद किसी को खाना पचा तो वह गोली लेने के कारण पचा या 'अब खाना पच जायेगा' इस चिता से मुक्त होने के कारण पचा कोई नहीं बता सकता।

यह सब दिमागी खेल है यह तो सभी मानते हैं। फिर I.M.A. के पास इस बात की क्या गारंटी है कि देश के सभी डाक्टर दूध के धुले हैं और अपने व्यवसाय के लिए बीमारी को बढाचढा कर नही बताते। इसलिए उन्हें बाबा रामदेव की आलोचना से पहले देश में जो डाक्टरों के बारे में धारणा व्याप्त है उस पर विचार करना चाहिए।
बाबा रामदेव को कैसर अस्पतालों में जाकर मरीजो को इलाज करने की चुनौती देने से पहले तो उनको इस बात का जवाब देना चाहिए कि क्या वह अपने अस्पतालों में आये मरीजों के अलावा कहीं किसी का इलाज करने जाते हैं?क्या उनको जब पता लगता है कि दूर-दराज के गावों में कोई कैसर का मरीज है तो वहाँ जाते हैं? वैसे भी जिसको डाक्टरों ने कैंसर बता दिया तो उसका मनोबल तो वैसे ही टूट जाता है और बिना मनोबल के योग साधना शुरू कोई नहीं कर सकता। अगर वह बाबा को यह कहकर चुनौती देते हैं कि 'वह तो योगी हैं और उन्हें जाना चाहिए' तो मैं उनको बता तूं जिस भारतीय दर्शन की ईजाद योग है वह यह भी कहता है कि अगर 'कमल जल से दूर है तो सूर्य भी उसको जीवन प्रदान नहीं कर सकता'। आदमी के जीवन के लिए यह मनोबल भी जल की तरह है और बाबा को चुनौती देने वाले अपने यहाँ से ही ऐसे मरीज जिनके बारे में डाक्टरों को पता लगता है कि उसे कैंसर है तो उसे बिना बताये ही बाबा रामदेव के शिविर में ले जाएं और अपनी दवाईयां देकर वहाँ योगासन के साथ उसका इलाज करें तब उनकी विश्वसनीयता बढेगी-जैसा कि खुद I.M.A.ने कहा भी है कि वह योग के प्रभाव को स्वीकार करती हैं।

11/3/07

मनु स्मृति:दूसरे के अधीन होना दु:खकारक

१.जो कार्य दूसरों के अधीन रहकर ही किये जा सकते हैं उनको पूरी तरह त्याग देना ही श्रेयस्कर है, तथान अपने अधीन सभी कार्यों का अनुष्ठान पूरे प्रयत्न करना चाहिए।

२.जो कुछ दूसरे के अधीन है, वह सब दु:ख है और जो अपने वश में है वही सुख है। यही सुख-दुख के लक्षण हैं।

३.जिस कार्य से मन की शांति तथा अंतरात्मा को प्रसन्नता प्राप्त हो, उसे करने का पूरा प्रयत्न करना चाहिऐ, परन्तु जिस कार्य से मन में अशांति होती है उसे त्याग देना ही अच्छा है।

४.परमात्मा की सता में अविश्वास रखना, वेदों की निंदा करना, देवताओं की अवज्ञा, शत्रुता-विरोध, पाखण्ड, अंहकार, क्रोध करना तथा स्वभाव में उग्रता होना ऐसे दोष हैं, जिनका त्याग करना चाहिऐ।
५.किसी के द्वारा अपराध हो जाने पर क्रोधवश उसे पीटने के लिए डंडा नहीं उठाना चाहिए, व्यक्ति को केवल अपने पुत्र या शिष्य को शिक्षित करने की मर्यादा निभाने के लिए ही उसे पीटने का अधिकार है।

9/15/07

श्री गणेश जी को कोटि-कोटि नमन

महाभारत ग्रंथ की रचना के साथ वेद्व्यास जी का नाम जुडा हुआ है, पर इस बात की चर्चा बहुत कम ही होती है उसके लेखक तो भगवान श्री गणेश जी ही थे। भगवान ब्रह्मा जी के आदेश पर श्री वेदव्यास से ने यह ग्रंथ लिखने के लिये ही गणेश जी का स्मरणं किया था। वह प्रकट हुए तो वेदव्यास जी ने उनसे आग्रह किया कि मैं महाभारत की कथा बोलता जाऊंगा और आप लिखते जाईयेगा।
श्री गणेश जी बहुत प्रसंन हुए और बोले-' मैं लिखता जाऊंगा पर मेरी कलम नहीं रुकना चाहिये।'
वेदव्यास जी ने उनकी बात मान ली साथ ही कहा-'आप भी सोच समझ कर लिखियेगा।'
आज हम जिस श्रीमदभागवत गीता का जो विश्व व्यापी प्रभाव देख रहे हैं वह महाभारत ग्रंथ का ही एक भाग है और कहना चाहिये कि सबसे महत्वपूर्ण भी है। भारत के विद्वान मनीषियों ने इसे सोच-विचारकर महाभारत से प्रथक करने का निर्णय किया क्योंकि इसमें शाश्वत सत्य का जो उदघाटन किया गया है उसको देखते हुए आवश्यक भी था।
श्रीमदभागवत गीता की चर्चा आज पूरे विश्व में होती है और यही कारण है कि भगवान श्री क्रुष्ण का नाम जहां घर-घर में जाना जाता पर कई लोगों को तो यह भी पता नहीं कि इस पवित्र ग्रंथ को विश्व में स्थापित करने का श्रेय श्री गणेश जी की कलम को भी है। महर्षि वेदव्यास का नाम तो फ़िर भी चर्चा में आता है पर श्री गीता के नाम से तो कभी श्री गणेश जी का नाम जोडा ही नहीं जाता।महाभारत जैसा इतना बृहद ग्रंथ लिखने के बावजूद उस पर अपना नाम तक उन्होने अंकित नही किया। भगवान श्री कृष्ण ने जिस निष्काम भाव से कर्म करने का जो उपदेश दिया उसके एक प्रतीक श्री गणेश जी भी है, आमतौर से ऐसी चर्चा बहुत कम लोग करते है। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वही महर्षि वेद्व्यास जी ने बोला और गणेश जी ने लिखा केवल इसलिये ही उनको बुद्धि का देवता नहीं माना जाता बल्कि उन्होने कई ऐसे उदाहरण भी प्रस्तुत किये जिससे इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि मनुष्य की बुद्धि ही उसकी पहचान है। अपनी बुद्धि से वह जैसे कर्म करेगा वैसी ही उसकी मानव समाज में पहचान होगी। जब देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कहलाने के लिये पूरी दुनिया की परिक्रमा करने की होड लगी तब वह बहुत देर तक वहीं अपने माता-पिता के पास बैठे रहे और फ़िर उठे और उनकी परिक्रमा कर वहीं बैठ गये और विजेता घोषित किये गये। इसी कारण उन को पूजा में सबसे पहले स्थान मिला। कभी उनके क्रोध कराने या युद्ध में भाग लेने की चर्चा भी नही आती। अन्य देवताओं द्वारा युद्ध में भाग लेने और अपनी शक्ति के द्वारा उसमें विजय प्राप्त करने के ढेर सारे प्रसंग है पर श्री गणेश जी बौद्धिक् शौर्य से सारे संसार को पल भर में जीतने के पराक्रम के कारण सारे विश्व में शुभ का प्रतीक बन गये। अगर उनके चरित्र को देखें तो मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की कितनी प्रधानता हो सकती है इसका ज्ञान मिलता है
अगर हम देखें तो वास्तव में मनुष्य अपनी ही बुद्धि के अनुसार ही अच्छे और बुरे कर्म करता है। इसी कारण हमेशा ही यह कहा जाता है कि अपनी बुद्धि में अच्छे विचार और संस्कार धारण करो तो स्वतः ही अच्छे काम करोगे। हमने देख होगा कि वैसे तो धनवान, उच्च पदासीन लोग सदैव सम्मान पाते हैं पर जब विपत्ति आती है तब सलाह्-मशविरा के लिये बुद्धिमान लोगों की शरण ली जाती है और वह उसका निवारण भी करते हैं। यही कारण है कि बौद्धिक शौर्य के प्रतीक भगवान श्री गणेश जी विघ्न निवारक भी माना जाता है और इसलिये कोई शुभ कार्य प्रारम्भ होने से पहले उनकी स्तुति की जाती है। मन में यह भाव रहता है कि चूंकि कोई भी काम बौद्धिक चातुर्य के बिना सम्पंन नही हो सकता इसलिये श्री गणेश जी का स्मरणं किया जाता है।
गणेश चतुर्थी के इस पावन पर्व पर हमें यह याद रखना चाहिये कि शिव्-पार्वती पुत्र श्री गणेश महाराज न केवल शुभ के प्रतीक हैं बलिक उनसे यह प्रेरणा भी मिलती है कि अपने जीवन का लक्ष्य अगर पाया जा सकता है तो वह केवल बौद्धिक शौर्य, धैर्य और संयम से पाया जा सकता है। अपनी सफ़लता के लिये किसी को गिराने, अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये दूसरे की निंदा करने और अपनी उपलब्धि की लिये दूसरे का अधिकार छीनने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही सहजता, सरलता और शांति से अपना कार्य संपन्न करने की प्रेरणा भी मिलती है।
भगवान गणेश सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों के ईश माने जाते हैं। गुणों का ईश ही प्रणवस्वरूप 'ॐ' है। प्रणवस्वरूप 'ॐ' में गणेश जी की मूर्ति सदा स्थित रहती है। अत: 'ॐ' गणेश जी की प्रणवाकार मूर्ति है, जो वेद मन्त्र के प्रारंभ में रहती है। इसीलिये 'ॐ' को गणेश जी की साक्षात मूर्ति मानकर वेदों के पढने वाले सबसे पहले 'ॐ' का उच्चारण करते हैं। श्री गणेश जीं को मेरा कोटि-कोटि नमन।

9/11/07

शाश्वत प्रेम के कितने रुप

'प्रेम' शब्द मूलरूप से संस्कृत के 'प्रेमन' शब्द से उत्पन्न हुआ है। प्रेम का शाब्दिक अर्थ है-'प्रिय का भाव'। ऐक अन्य प्रकार की व्युत्पत्ति दिखाई देती है, जहाँ प्रेम को 'प्रीञ' धातु से मनिन' प्रत्यय करके सिद्ध किया गया है (प्रीञ+मनिन=प्रेमन)। इस द्वितीय व्युत्पत्ति के अनुसार प्रेम का अर्थ है-प्रेम होना, तृप्त होना, आनन्दित होना या प्रेम, तृप्त और आनंदित करना।
निर्गुण-निराकार ब्रह्म को अद्वैत मतावलंबियों 'सच्चिदानंद' कहा है। वह सत है क्योंकि उसका विनाश नही होता, वह चित है क्योंकि स्वयं प्रकाशमान और ज्ञानमय है तथा आनंद रुप है इसलिये कि वह प्रेममय है। यदि वह आनंदात्मक न हो तो उसके अस्तित्त्व और और चैतन्य की क्या सार्थकता रह जायेगी। सत-चित का भी प्रयोजन यह आनंद या प्रेम ही है। इसी प्रेम लक्षण के वशीभूत होकर वह परिपूर्ण, अखंड ब्रह्म सृष्टि के लिए विवश हो गया। वह न अकेले प्रेम कर सका , न तृप्त हो सका और न आनंद मना सका। तब उसके मन में एक से अनेक बन जाने की इच्छा हुई और वह सृष्टि कर्म में प्रवृत्त हुआ।
आनंद स्वरूप प्रेम से ही सभी भूतों की उत्पत्ति होती है, उसमें ही लोग जीते हैं और उसमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यही तथ्य तैत्तिरीयोपनिषद (३.६) की पंक्तियों में प्रतिपादित किया गया है।
प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड और उससे परे जो कुछ है- सब इसकी परिधि में आ जाते हैं। प्रेम संज्ञा भी है और क्रिया वाचक भी है। संज्ञा इसलिये कि सब में अंत:स्थ भाव रुप (मन का स्थायी भाव) है और यह भाव व्यक्त भी होता है अव्यक्त भी। क्रियात्मक इसलिये कि समस्त चराचर के व्यापारों का प्रेरक भी है व्यापारात्मक भी है। किन्तु मूल है अंत:स्थ का अव्यक्त भाव, जो अनादि और अनंत है, जो सर्वत्र और सब में व्याप्त है। यही अव्यक्त भाव रुप प्रेम सात्विक, राजस और तामस इन तीन गुणों के प्रभाव से विविध विकारों के रुप में बुद्धि में प्रतिबिंबित होता है और व्यवहार में व्यक्त होता है ।
यही प्रेम बडों के प्रति आदर, छोटों के लिए स्नेह, समान उम्र वालों के लिए प्यार, बच्चों के लिए वात्सल्य, भगवान् के प्रति भक्ति , आदरणीय लोगों के लिए श्रद्धा, जरूरतमंदों के प्रति दया एवं उदारता से युक्त होकर सेवा, विषय-सुखों के संबध में राग और उससे उदासीनता के कारण विराग, स्व से (अपने से) जुडे रहने से मोह और प्रदर्शन से युक्त होकर अहंकार, यथार्थ में आग्रह के कारण सत्य, जीव मात्र के अहित से विरत होने में अहिंसा, अप्रिय के प्रति अनुचित प्रतिक्रिया के कारण घृणा और न जाने किन-किन नामों से संबोधित होता है। प्रेम तो वह भाव है जो ईश्वर और सामान्य जीव के अंतर तक को मिटा देता है। जब अपने में और विश्व में ऐक-जैसा ही भाव आ जाय, और बना रहे तो वह तीनों गुणों से परे शुद्ध प्रेम है।
यह प्रेम साध्य भी है प्रेम पाने का साधन भी है। साधारण प्राणी सर्वत्र ऐक साथ प्रेम नहीं कर सकता-इस तथ्य को देखते हुए ही हमारे देश के पूज्य महर्षियों ने भक्ति का मार्ग दिखाया जिससे मनुष्य अदृश्य ईश्वर से प्रेम कर सके। इन्द्रियों के वशीभूत दुर्बल प्राणियों के लिए ईश्वर से प्रेम की साधना निरापद है जबकि लौकिक प्रेम में भटकाव का भय पग-पग पर बना रहता है। ईश्वरीय प्रेम को सर्वोच्च प्रतिपादित करने के पीछे यही रहस्य छिपा है और ईश्वरीय प्रेम का अभ्यास सिद्ध होने के पश्चात प्राणी 'तादात्म्य भाव' की स्थिति में आरूढ़ हो जाता है और तब शुद्ध प्रेम की स्थिति उसे स्वयंसिद्ध हो जाती है। प्रेम की इस दशा में पहुंचकर साधक को अपने ही अन्दर सारा विश्व दृष्टिगोचर होने लगता है और संपूर्ण विश्व में उसे अपने ही स्वरूप के दर्शन होने लगते है। समस्त चराचर जगत में जब अपने प्रियतम इष्ट के दर्शन होने लगें तो समझ लेना चाहिऐ कि हमें अनन्य और शाश्वत प्रेम की प्राप्ति हो गयी।
(कल्याण से साभार)
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8/26/07

धर्मशास्त्रों से: मन में निर्मलता लाने के उपाय

इस बात को सभी जानते और मानते हैं कि जीवन को ऊपर उठाने के लिए हृदय, चित्त और मन को शुद्ध करना जरूरी है। मन का मैल निकाले बिना न लोक सुधरता है न परलोक सुधरता है।

मन का मेल निकाले बिना न साधना होगी न भक्ति। मन का मैल निकले बिना न कर्म पवित्र होगा न ज्ञान की ही प्राप्ति होगी। साधू, संत, फकीर और माहात्मा चित्त को निर्मल करने पर इसीलिये जोर देते हैं।

मन का मैल कैसे निकले? चित्त की मलिनता कैसे मिटे इसके लिए महर्षि पंतजलि ने ऐक बढ़िया साधन बताया है-मैत्री, करुणा, मुदिता (हर्ष का भाव) और उपेक्षा के भाव का विकास। योग सूत्र में उन्होने कहा है कि-

सुखी व्यक्ति के लिए मैत्री की भावना अपने अन्दर पैदा करो।
दुःखी व्यक्ति के लिए करुणा का भाव अपने अन्दर स्थापित करो।
पुण्यात्मा के लिए मुदिता(हर्ष का भाव) की भावना रखो।
पापात्मा के प्रति उपेक्षा का भाव रखो;

ऐसा करने से चित्त प्रसन्न और निर्मल बनता है।

8/18/07

अधर्म से हुआ विकास क्षणिक रुप से ही लाभदायक

  1. भजन, निद्रा, भय और मैथुन की प्रवृति मनुष्य और पशुओं में ऐक समान होती है पर धर्म ही ऐक ऐसा विषय है जो दोनों को प्रथक करता है।
  2. समस्त प्राणियों को परलोक में अपनी सहायता के लिए धर्म का शनै:शनै: उसी प्रकार संचय करना चाहिए जैसे दीमक बांबी का संचय कर लेती है।
  3. पुराणों का मत है कि ईश्वर प्रसाद ही कर्मों का फल है और कर्ता को फल देकर ही रहता है
  4. मनुष्य की सात्विक प्रवृति को ही धर्म कहते हैं। मनीषियों का कथन है कि मन के द्वारा हे किया हुआ धर्म श्रेष्ठ है।
  5. सभी प्राणी जिस सुख की इच्छा रखते हैं वह धर्म से ही उत्पन्न होता है।
  6. धर्म का पालन करते हुए जो धन प्राप्त होता है वही सच्चा धन है
  7. अधर्म की आचरण से मनुष्य को जो विकास या वृद्धि दिखाई देती है वह क्षणिक होती है। मनुष्य अधर्म से विकास कि ओर बढ़ता दिखाई देता है और उसको इसमें कल्याण होता भी दिखता है। वह अपने शत्रुओं को भी परास्त करता है पर अंतत: स्वयं समूल नष्ट हो जाता है।

8/11/07

कौटिल्य का अर्थशास्त्र: दुर्जन की संगति मरुस्थल समान

  1. चन्द्रमा और खिला हुआ कमल जिस तरह सरोवर के चित्त को प्रसन्न कर देता है उसी प्रकार सज्जन पुरुष की चेष्टा भी अन्य प्राणियों के हृदय को प्रसन्न कर देती है।
  2. सूर्य की तीव्र किरणों से तपते, शरीर को जला देने वाले मरुस्थल के समान दुर्जन व्यक्ति की संगति का त्याग कर देना ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर है।
  3. पर्वत के समन अचल पुरुष के भी अंतकरण में दुर्जन अकस्मात प्रवेश कर उनके मन को अग्नि के समान जला डालते है- और उन्हें भी पीडा देते हैं।
  4. जिनके श्वास से अग्नि के कण निकलते हैं, धूम्र से धुम्राय्मान मुख वारे सर्प की संगति अच्छी है पर दुर्जन की संगति अच्छी नहीं है।
  5. जो केवल आहार मात्र से ही चलता है, क्षणमात्र में ही दुःख से नष्ट हो जाता है। इस छायामात्र देह को जल के बुलबुले के समन ही जानना चाहिए जो कभी भी नष्ट हो सकती है।

मनु स्मृति: भोजन प्रसन्नता से ग्रहण करें

  1. मनुष्य हो या पशु पानी सभी की मूलभूत आवश्यकता होती है। जिस प्रकार पानी के अभाव में प्राणी व्याकुल हो जाते हैं यहां तक कि उनके प्राण भी निकल जाते हैं, उसी प्रकार पानी न मिलने से वृक्ष भी भारी कष्ट का अनुभव करते हैं। पानी की कमी से वृक्षों-वनस्पतियों का सूखना तो ऊपर से दिखाई देता है लेकिन उनका कष्ट प्राणी को ऊपर से दिखाई नहीं देता।
  2. मनुष्य को जैसा भोजन प्राप्त हो उसे देखकर प्रसन्नता का अनुभव करना चाहिऐ। प्राप्त भोजन में गुण-दोष निकाले बिना उसे ईश्वर का प्रसाद समझ कर प्रसन्नता से ग्रहण करें, जूठन न छोड़ें। यह अन्न सदैव मुझे प्राप्त हो यह भावना रखने चाहिए।
  3. प्रसन्नता से ग्रहण किया भोजन बल-वीर्य की वृद्धि करता है, जबकि निंदा और निराशा से किया भोजन सामर्थ्य और वीर्य को नष्ट करता है।
  4. भूख से बैचैन होने पर भी विवेकशील व्यक्ति प्रतिग्रह को धर्म और न्याय के विरुद्ध जानकर तथा प्रतिग्रह से मिलने वाली वस्तुओं के लाभ का ज्ञान होते हुए भी उसे ग्रहण नहीं करते।

5/19/07

एक भक्त की कलम से

NARAD:Hindi Blog Aggregatorहर व्यक्ति के मन में उसके इष्ट का वास होता है, यह अलग बात है कि कोई उसे जानता है और कोई नही । जब आदमी बच्चा होता है तब उसके माता पिता जिस इष्ट की आराधना करते हैं, धीरे धीरे वह उसके मन में दाखिल होकर उसका स्वामी हो जाता है। हां, अपने कामकाज और अन्य कारणों से आदमी उसके प्रति उदासीन हो जाता है पर जब उसकी कोई उसकी चर्चा करता है तो उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है-और अगर कोई उसकी निंदा करे तो उसे गुस्सा आ जाता है। चूंकि अधिकांश लोग इस संसार में ही ज्यादा मन लगाते हैं तो अपने इष्ट की तरफ से ध्यान हटा लेते हैं और उनकी मन स्थिति कमजोर हो जाती है और अगर उसे कोई यह कहे के अमुक आदमी ने तुम्हारे इष्ट का अपमान किया है तू वह उत्तेजित हो जाते है । अब कुछ नाराज होकर तथाकथित रुप से शाब्दिक रुप से अपने क्रोध का प्रदर्शन कर रह जाते हैं तो कुछ अपनी शार्रीरिक शक्ति का उपयोग करने लग जाते हैं। भारत का आदमी धर्म के बारे में बहुत संवेदनशील है और यहां इसी वजह से धर्म के ठेकेदार ज्यादा ही है जो गाहे-बगाहे अपने स्वार्थों के लिए ऐसे फसाद कराते रहते हैं जिससे उनका प्रभाव न केवल अपने समाज में बल्कि दुसरे समाजों में भी बना रहे । यही कारण है कि विश्व में आध्यात्मिक गुरू कहलाने के बावजूद हमारे देश के लोगों की छबि रूढ़ वादी और अंधविश्वास के कारण अच्छी नहीं बनी है।

जो मेरा इष्ट है वही तुम्हारा भी इष्ट है यह हम सब मानते हैं, फिर आख़िर यह झगडा क्यों होता है? केवल इसीलिये हे न कि उसके स्वरूप हम अलग देखते हैं। हम दावा करते हैं कि हम अपने इष्ट को मानते है पर हम उस इष्ट को अपने हृदय में धारण कितना करते हैं यह कभी सोचा ही नहीं । नाम लेकर नामा बटोरने चल पड़ते है और सोचते हैं कि हो गया हमारा जीवन धन्य ! हमारे देश में अनेक महापुरुष हुए हैं कुछ को अवतार कहा जाता है तो कुछ को संत । यहां बता दें के हमारे समाज में संत और अवतार का दर्जा समान माना जाता है। क्योंकि संतों को गुरुओं के रुप में मान्यता मिलती है और कहा जता है कि गुरू ही गोविन्द के दर्शन कराते हैं इसीलिये वह बडे हैं। अवतारी पुरुष भी गुरू का सम्मान करना ही धर्म और भक्ती का एक हिस्सा मानते हैं-और यह बातें वही समझ पा ता है जो अपने इष्ट और गुरू को धारण करे। हमारे देश में कई गुरूओं के कई चेले मिल जाएंगे और अपने गुरुओं और इष्ट का बखान करेंगे जैसे आध्यात्म की बात न करके वाक्युध्दु कर रहे हौं । अपनी भक्ती अपने मन में रखने की बात होती है लोग चिल्लाकर उसका बखान करते है और होता यह कि कई जगह तो इस बात पर बात-बात में सामुहिक झगडा हो जाता है किसका इष्ट बड़ा है।

मैं अपने इष्ट और गुरू के बारे में मानता हूँ कि कोई उनके अपमान करने की ताकत ही नहीं रखता ! वजह साफ है कि मैं जानता हूँ कि मेरे इष्ट और गुरू मेरे मन में है कोई उन्हें देख ही नहीं सकता तो अपमान क्या खाक करेगा। अगर कोई व्यक्ति मुझसे आकर कहे कि अमुक व्यक्ति ने तुम्हारे गुरू और इष्ट का अपमान किया है तो मेरे अन्दर कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी -क्योंकि मैं समझता हूँ कि उस व्यक्ति के मन में कुछ ऐसा है जो वह अपना स्वार्थ सिध्द करना चाहता है-अगर सच्चा भक्त होता तो वहाँ से उठकर चल देता जहाँ निंदा रह रही थी। वह मुझसे अगर यह कहेगा कि तुम्हारा और मेरा इष्ट और गुरू है एक है और चलकर उस निंदक से लड़ते हैं तो भी मैं उसकी बात पर ध्यान नही दूंगा क्योंकि जिस इष्ट को मैंने धारण किया है उसके चरित्र से सीखा है कि आदमी को सहज भाव का त्याग नहीं करना चाहिए और युध्द अस्त्र-शस्त्र से नहीं बल्कि कुशलता से जीते जाते है और कभी कभी तो एसी कुशलता दिखानी चाहिए कि बिना हिंसा के ही युध्द जीत लिया जाये। मेरे गुरू ने मुझे सिखाया है कि दुष्ट लोग ही संतों और दुसरे के इष्ट पर आक्षेप करते हैं और वह लोग अपने पापों का बोझ इतना बड़ा लेते हैं कि एक दिन खुद उसके तले दबकर भारी तकलीफ में आ जाते हैं।

कुल मिलाकर भक्ती बाहर दिखने की चीज नहीं है वह तो अपने मन में धारण करने के लिए है क्योंकि उससे हमारे विचार और भाव शुध्द रहते है। हमारे इष्ट और गुरू का कोई अपमान भी कर सकता है यह मानने का मतलब ही यही है कि हमारे भक्ति-भाव में कहीं कोई कमी है जो हम उत्तेजित हो जाते हैं। अपमान एक खराब शब्द है तो उससे हम सुने ही क्यों ? जितने भी गुरू हुए हैं वह यही कहते हैं कि बुरा मत कहों, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो -क्या हमें अपने इष्ट और गुरुओं की बात नहीं माननी चाहिए । मैं अपने जैसे भक्तों से मुखातिब हूँ जो बडे भावुक होते हैं और उम्मीद हैं वह मेरी बात समझ ही गये होंगें - भले ही उनके गुरू और इष्ट का स्वरूप अलग हो पर हैं तो भक्त ही न ! जो भक्ती के अलावा और किसी बात पर ध्यान नहीं देते और कुछ लोग उनकी इस तल्लीनता में भंग डालने के लिए ऐसे मसले लाते है जिससे उनकी भक्ती और समाज की शांति में खलल पडे। ऐसे भक्तो को मेरा प्रणाम इस सलाह के साथ कि वह अपने भक्ती में तल्लीन रहें किसी की बातों में न आयें ।

5/9/07

हिंदू धर्म में ज्ञान के साथ विज्ञान भी मौजूद है

NARAD:Hindi Blog Aggregator पिछले कयी दिनों से देश में धर्म को लेकर अनेक तरह के विचार व्यक्त किये जा रहे हैं। एक खास बात जो सामने आ रही है युवा वर्ग में धर्म के प्रति रुझान बढ रहा है । इसका मुख्य कारण यह है कि आजकल घरों में उनको ऐसा धार्मिक माहौल नहीं मिल रहा जैसे पहले वाली पीढ़ी को मिलता था, इसके अलावा उन्हें बाल्यावस्था में ही ऐसे भौतिक साधन मिल रहे हैं जिनसे अमेरिकी अब अपने यहां बोरियत अनुभव करने लगे हैं , उनसे उकताने के बाद जब युवक और युवतियां कहीं अध्यात्म पर चर्चा सुनते है तो उन्हें नवीन भाव का अनुभव होता है ।हालांकि आज के अनेक धर्म गुरू केवल अपनी स्वार्थ सिध्दी के कारण ही इस क्षेत्र मैं हैं , उनका उद्देश्य केवल अर्थोपाजन करना ही है न कि धार्मिक परंपराओं को बढ़ाने के लिए प्रयास करना -यही कारण है कि जितने भी धर्म गुरू हैं वह करोड़ों में खेल रहे हैं , फिर भी किया क्या जाये ? युवक-युवतियों को अपनी उकताहट दूर करने तथा मन में शांति के लिए उनके पास इन संतों के प्रवचन सुनने का अलावा कोई चारा भी तो नहीं है।
मैं देश में चल रहे माहौल को जब देखता हूँ जिसमें हिदू धर्म के प्रति लोगों के मन में तमाम विचार आते हैं पर उनका कोई निराकरण करने वाला कोई नहीं है। धर्म के नाम पर भ्रम और भक्ती के नाम पर अंधविश्वास को जिस तरह बेचा जा रहा है, वह चिंता का विषय है । विरोध करने पर आदमी को नास्तिक और तर्क देने पर कडी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। हिंदू धर्म की को पूरी दुनिया सम्मान की दृष्टि से देखती है पर अपने ही देश में धर्म के ठेकेदोरों ने लोगों की बुध्दी का दोहन केवल अपने तुच्छ स्वार्थों की खातिर कर इसको बदनाम कर दिया। हिंदू धर्म के तमाम ग्रंथ हैं और उनमें कुछ ऎसी तमाम बातें है जो उस समय ठीक थीं जिस समय वह कहीं और लिखी गयी थीं, समय के साथ लोग उनसे बिना कहे दूर होते गये। पर जीवन के आर्थिक, सामाजिक , स्वास्थ्य और विज्ञान की दृष्टि से जितना हमारे ग्रंथों में हैं उतना किसी अन्य धर्म में नहीं है। हाँ, इस धर्म को बदनाम करने के लिए इसके विरोधी केवल उन बातों को ही दोहराते हैं जो किन्हीं खास घटनाओं या हालतों में लिखीं गयी थीं और आज अप्रासंगिक हो गयी हैं और लोग उन्हें अब दोहराते ही नहीं है। अब आप लोग कहेंगे कि इतनी सारी पुस्तकों के कारण ही हिंदु धर्म के प्रति भ्रांति फैली है तो मैं आपको बता दूं कि सारे ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवत गीता में है। जिसने गीता पढ़ ली और उससे ज्यादा समझ ली उसे कुछ और पढने की जरूरत ही नहीं है। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई संत या सन्यासी नहीं हूँ न बनूंगा क्योंकि गीता पढने वाला कभी सन्यास नही लेता । वैसे भी आजकल केवल धर्म का ज्ञान होना इतना जरूरी नहीं जितना धर्म के व्यापार के लिए अच्छे प्रबंधक साथ में न रखना । इस पर ज्यादा प्रकाश विस्तार से मैं बाद में डालूँगा , आज मैं ज्ञान सहित विज्ञान वाले इस ग्रंथ में जो भृकुटी पर ध्यान रखने की बात कही गयी है वह कितनी महत्वपूर्ण है-उसे बताना चाहूंगा । शायद भारत में भी कभी इस बात की चर्चा नही हुई कि हिंदु धर्म की सबसे बड़ी ताकत क्या है जो इतने सारे आक्रमणों के बावजूद यह बचा रहा है। अगर लोगों को यह लगता है कि हिंदू कर्म कान्ड भी धर्म का हिस्सा हैं तो मैं आपको बता दूं कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहीं भी कर्मकांड के महत्व की स्थापना नहीं की । उन्होने गीता में ध्यान के सिध्दांत की जो स्थापना की वह आज के युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ध्यान वह शक्ति है जो हमें मानसिक और शारीरिक रुप से मजबूत करती है जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है। मैं अपने हिसाब से ध्यान की व्याख्या करता हूँ ।
अब तो अनेक पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं हिंदूं की असली शक्ति उनके ध्यान में है, और ज्ञान का केंद्र श्रीमदभागवत गीता में है ।
ध्यान क्या है पहले इस बात को समझ लें । हम सोते हैं और नींद लग जाती है तो लगता है आराम मिल गया पर आजकल की व्यस्त जिन्दगी में तमाम तरह के ऐसे तनाव हैं जो पहले नहीं थे । पहले आदमी सीमित दायरे में रहते हुए शुध्द चीजों का सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे और उनकी चिताएँ भी सीमित थीं इसीलिये उनका ध्यान नींद में भी लग जाता था । शुध्द वातावरण का सेवन करने के कारण उन्हें न तो ध्यान की जरूरत महसूस हुई और न गीता के ज्ञान को समझने की। हालांकि मैं अपने देश के पूर्वजों का आभारी हूँ कि उन्होने धार्मिक भावनाओं से सुनते-सुनाते इसे अपनी आगे आने वाली पीढी को विरासत में सौंपते रहे । आज हमारे कार्य के स्वरूप और क्षेत्र में व्यापक रुप से विस्तार हुआ है और हम अपने मस्तिष्क के नसों को इतनी हानि पहुंचा चुके होते हैं कि हमें रात की नींद ही काफी नहीं लगती और हम बराबर तनाव महसूस करते हैं । रात में हम सोते हैं तब भी हमारा मस्तिष्क बराबर कार्य करता है और वह दिन भर की घटनाओं से प्रभावित रहता है। ध्यान हमेशा ही जाग्रत अवस्था में ही लगता है । ध्यान का मतलब है अपने दिमाग की सर्विस या ओवेर्हालिंग । जिस तरह स्कूटर कार मोटर सायकिल फ्रिज पंखा एसी और कूलर की सर्विस कराते हैं वैसे ही हमें खुद अपने दिमाग की भी करनी होगी। एक तरह से हमें अपना मनोचिकित्सक स्वयं ही बनना होगा। जिस बात का जिक्र मैंने शुरू में नहीं किया वह यह कि मुझे याद है जब चार वर्ष पूर्व किसी अखबार में पढा था कि एक अमेरिकी विज्ञानिक का मत है कि हिंदूओं कि सबसे बड़ी ताकत है ध्यान । फिर भी भारत के प्रचार माध्यमों ने इसे वह स्थान नहीं दिया जो देना चाहिए था । यहां मैं ध्यान की विधि बताना ठीक समझता हूँ । सुबह नींद से उठकर कहीं खुले में शांत स्थान पर बैठ जाएँ और पहले थोडा पेट को पिच्काये ताकी हमारे शरीर में से वायू विकार निकल जाएँ और फिर नाक पर दोनों ओर उंगली रखकर एक तरफ से बंद कर सांस लें और दूसरी तरफ से छोड़ें। ऐसा कम से कम बीस बार करें और दोनों तरफ से सांस लेने और छोड़ने का प्रयास करें । उसके बाद बीस बार अपने श्री मुख से ॐ शब्द का जाप करे और फिर बीस बार ही मन में जाप करें और धीरे अपने ध्यान को भृकुटी पर स्थापित करें। जो विचार आते हैं उन्हें आने दीजिए क्योंकि वह मस्तिष्क में मौजूद विकार हीं हैं जो उस समय भस्म हो रहे होते हैं। यह आप समझ लीजिये । धीरे धीरे अपने ध्यान को शून्य में जाने दीजिए-न जा रहा है तो बांसुरी वाले के स्वरूप को वहन स्थापित करिये -धीरे स्वयं ही आपको ताजगी का अहसास होने लगेगा । अपने ध्यान पर जमें रहें उसे भृकुटी पर जमे रहने दीजिए । ऐसा नहीं है कि केवल सुबह ही ध्यान किया जाता है आप जब भी तनाव और थकान अनुभव करे कहीं भी बैठकर यह करें। शुरूआत में यह सब थोडा कठिन और महत्वहीन लगेगा पर आप तय कर लीजिये कि मैं अपने को खुश रखने के लिए यह सब करूंगा ।कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर यह मेरा किया हुआ अनुभव है। अगर मैं यह ध्यान न करूं तो इस तरह कंप्यूटर पर काम नहीं कर सकता जिस तरह कर रहा हूँ। कम्प्युटर, टीवी और मोबाइल से जिस तरह की किरणें उठती है उससे हमारे दिमाग को हानि पहूंचती है यह भी वही वैज्ञानिक बताते हैं जिन्होंने इसे बनाया है। शरीर को होने वाली हानि तो दिखती है पर दिमाग को होने वाली का पता नहीं लगता। ध्यान वह दवा है जो इसका इलाज करने की ताक़त की रखता है। ध्यान पर ऐसे अनेक प्रयोग किये गये हैं जिनसे पता लगता है वह आदमी के मन में एक स्फूर्ति पैदा करता है। शेष अगले अंकों में।

4/30/07

महायोगी की आलोचना से पूर्व आत्मविश्लेषण करें

भारत में आजकल एक फैशन हो गया है कि अगर आपको सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करनी हो तो हिंदू धर्म या उससे जुडे किसी संत पर आक्षेप कर आसानी से प्राप्त की जा सकती है। मुझे ऐसे लोगों से कोई शिक़ायत नहीं है न उनसे कहने या उन्हें समझाने की जरूरत है। अभी कुछ दिनों से बाबा रामदेव पर लोग प्रतिकूल टिप्पणी कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में लगे है । इस समय वह भारत में ही नहीं वरन पूरे विश्व में लोकप्रिय हो रहे हैं ,और मुझे नहीं लगता कि आजादी के बाद कोई व्यक्ति इतनी लोकप्रियता हासिल कर सका हो। सूचना तकनीकी में हम विश्व में उंचे स्थान पर हैं पर वहां किसी व्यक्ति विशेष को यह सम्मान नहीं प्राप्त हो सका है। बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से योगासन, प्राणायाम, और ध्यान की जो विद्या भारत में लुप्त हो चुकी थी उसे एक बार फिर सम्मानजनक स्थान दिलाया है, उससे कई लोगों के मन में कुंठा उत्पन्न हो गयी है और वह योजनापूर्वक उन्हें बदनाम आकर रहे हैं।पहले यह मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने आज से चार वर्ष पूर्व जब योग साधना प्रारंभ की थी तब बाबा रामदेव का नाम भी नही सुना था। भारतीय योग संस्थान के निशुल्क शिविर में योग करते हुए लगभग डेढ़ वर्ष बाद मैंने उनका नाम सूना था। आज जब मुझसे कोई पूछता है "क्या तुम बाबा रामदेव वाला योग करते हो?मैं उनसे कहता हूँ -"हाँ, तुम भी किया करो ।कहने का तात्पर्य यह है इस समय योग का मतलब ही बाबा रामदेव के योग से हो गया है। मुझे इस पर कोई आपत्ति भी नहीं है क्योंकि मैं ह्रदय से चाहता हूँ कि योग का प्रचार और प्रसार बढ़े । मैं बाबा रामदेव का भक्त या शिष्य भी नहीं हूँ फिर भी लोगों को यह सलाह देने में मुझे कोई झिझक नहीं होती कि वह उनके कार्यक्रमों को देखकर योग सीखें और उसका लाभ उठाएं । इसमें मेरा कोई निजी फायदा नहीं है पर मुझे यह संतुष्टि होती है कि मैं जिन लोगों से योग सीखा हूँ वह गुरू जैसे दिखने वाले लोग नहीं है पर उन्होने गुरूद्क्षिना में इसके प्रचार के लिए काम करने को कहा था। बाबा रामदेव का समर्थन करने के पीछे केवल योग के प्रति मेरी निष्ठा ही नहीं है बल्कि यह सोच भी है कि योग सिखाना भी कोई आसान काम नहीं -योग शिक्षा वैसे ही भारत में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाई है और इसे विषय के रुप में स्कूलों में शामिल करने का बहुत विरोध हो रहा है ऐसे में लार्ड मैकाले की शिक्षा से स्वयं को विद्धान की पदवी से अलंकृत कर स्वयंभू तो योग के नाम से बौखला जाते हैं, और उनके उलुलजुलुल बयानों को मीडिया में स्थान भी मिलता है। कुछ दिन पहले बाबा रामदेव के शिविर में एक बीमार व्यक्ति की मौत हो गयी थी तो मीडिया ने इस तरह प्रचारित करने का प्रयास किया जैसे वह योग्साध्ना से मरा हो, जबकि उसकी बिमारी उसे इस हाल में लाई थी। उस समय एक सवाल उठा था कि अंगरेजी पध्दति से सुसज्जित अस्पतालों में जब कई मरीज आपरेशन टेबल पर ही मर जाते हैं तो क्या इतनी चीख पुकार मचती है और कोई उन्हें बंद करने की बात करता है। ट्रकों, कारों, और मोटर सायाकिलों की टक्कर में सैंकड़ों लोग मर जाते हैं तो कोई यह कहता है इन्हें बंद कर दो? और इन वाहनों से निकलने वाले धुएँ ने हमारे पर्यावरण को इस क़दर प्रदूषित किया है जिससे लोगों में सांस की बीमारियाँ बढ गयी है तो क्या कोई यह कहने वाला है कि विदेशों से पैट्रोल का आयत बंद कर दो?बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से जुडी इस विधा को पुन: शिखर पर पहुंचाया है इसके लिए उन्हें साधुवाद देने की बजाय उनके कृत्य में छिद्र ढूँढने का प्रयास करने वाले लोग उनकी योग शिक्षा की बजाय उनके वक्तव्यों को तोड़ मरोड़ कर उसे इस तरह पेश करते हैं कि उसकी आलोचना के जा सके। जहाँ तक योग साधना से होने वाले लाभों का सवाल है तो उसे वही समझ सकता है जिसने योगासन, प्राणायाम , ध्यान और मत्रोच्चार किया हो। शरीर की बीमारी तो पता चलती है पर मानसिक और वैचारिक बीमारी का व्यक्ति को स्वयं ही पता नहीं रहता और योग उन्हें भी ठीक कर देता है। जहां तक उनकी फार्मेसी में निर्मित दवाओं पर सवाल उठाने का मामला है बाबा रामदेव कई बार कह चुके हैं वह बीमारियों के इलाज में दवा को द्वितीय वरीयता देते हैं, और जहाँ तक हो सके रोग को योग साधना से दूर कराने का प्रयास करते हैं। फिर भी कोई न कोई उनकी दवाए उठाकर लाता है और लगता है अपनी विद्वता दिखाने। आज तक कोई किसी अंगरेजी दवा का सैम्पल उठाकर नहीं लाया कि उसमे कितने साईट इफेक्ट होते हैं। इस देश में कितने लोग अंगरेजी बिमारिओं से मरे यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की।अब रहा उनके द्वारा हिंदू धर्म के प्रचार का सवाल तो यह केवल उनसे ही क्यों पूछा जा रहा है? क्या अन्य धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार नहीं कर रहे हैं। मैं केवल बाबा रामदेव ही नहीं अन्य हिंदू संतों की भी बात करता हूँ । जो लोग उन पर सवाल उठाते हैं वह पहले अपना आत्म विश्लेषण करें तो उन्हें अपने अन्दर ढ़ेर सारे दोष दिखाई देंगे। दो या तीन घंटे तक अपने सामने बैठे भक्तो और श्रोताओं को-वह भी बीस से तीस हज़ार की संख्या में -प्रभावित करना कोई आसान काम नहीं है। यह बिना योग साधना, श्री मद्भागवत का अध्ययन और इश्वर भक्ती के साथ कडी तपस्या और परिश्रम के बिना संभव नहीं है । उनकी आलोचना केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो उन जैसा हो। इसके अलावा उनसे यह भी निवेदन है कि आलोचना से पहले कुछ दिन तक योग साधना भी करके देख लें ।

4/7/07

घर से बाहर रोज निकलते हैं, कभी दिल से भी निकलें

अगर हम घर में लगातार बैठे रहते हैं तो एक समय ऐसा आ जाता है कि हमें बोरियत होने लगती है। हमें लगता है कि हम थक गये हैं , तब हमारा मन विचलित हो जाता है, हम सोचने लगते हैं कि कहीं बाहर घूमे आयें, और फिर हम वहां से निकल पड़ते हैं। जब घूम कर घर लौटते हैं तो वही घर हमें स्वर्ग लगाने लगता है जो पहले नरक की तरह लग रहा था। यह जो हमारे शरीर में मन है वह बहुत चचल है हम उसके हर इशारे पर नाचते हैं पर हमें पता ही नहीं लगता कि हमें कोइ नचा रहा है । हम अपने मन के दास बने रहते हैं पर लगता है हम स्वतंत्र हैं। मन चला रहा है और हम सोचते हैं कि हम चल रहे हैं। हम पूरी ज़िन्दगी इसी भ्रम में निकालते हैं कि हम कर रहें हैं पर करवाता मन है। सारा जीवन भौतिक वस्तुओं के संग्रह में निकाल देते हैं और खुश नही रह पाते । हमेशा एक खालीपन घेरे रहता है। पहले यह समझ लें कि हम हैं क्या? हम एक आत्मा है जो इस शरीर में स्वतंत्र विचरण करना चाहती है। वह पाने में नहीं त्याग में खुश होती है । वह ऐसे प्रेम की भूखी है जो निस्वार्थ हो। वह इस देह से ऐसा काम कराना चाहती है जो लोक और परलोक में भी हितकर हो और समस्त्जीवों के लिए हितकर हो।
हमें प्रकर्ति ने बुध्दी बहुत दीं है पर हम उसका दस प्रतिशत ही उपयोग कर पाते हैं। हम लोगों में भी यह पूरा दस प्रतिशत वह लोग ही इस्तेमाल कर पाते हैं जो दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। वर्ना तो लोग जिस तरह शरीर से शरीएर से आलसी होते हैं उतने ही दिमाग से भी होते हैं। कई बार ऐसा मौका आता है कि हम अपने ही लोगों पर झल्लाने लगते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि हम व्यर्थ ही ज़िन्दगी बरबाद कर रहें हैं। हम ऐसे लोगों से भी चिढ जाते हैं जिन्हे हम सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। दरअसल हम झूठे प्रेम और ममता मोह से अपने दिमाग में इतने विकार एकत्रित कर चुके होता हैं कि उसकी नसों में रक्त प्रवाह अव्रुध्द होने लगता है और फिर वह तनाव में आ जाता है । कहते हैं कि स्वस्थ आदमी के शरीर मैं ही स्वस्थ दिमाग रहता है। स्वस्थ शरीर का मतलब है जिसमें रक्त प्रवाह सब जगह पहुंचे। जैसे ही रक्त प्रवाह अव्रुध्द होने लगता है शरीर बीमार पड़ने लगता है। और हम मानसिक अवसाद का शिकार होने लगते हैं।
हम जिसे अपना ह्रदय या आत्मा समझते हैं वह हमारा मन है और झल्ला रहा है वह हमारी आत्मा, ह्रदय या कहें दिल है जो इन सांसारिक पदार्थों को इस्तेमाल करने से सन्तुष्ट नही हो सकता । वय एक तो परमात्मा की भक्ती से प्र्स्न्न्न होता है या निष्काम पेम, स्वर्थाराहित दया से हे उसे सन्तोष मिलता है। जिस तरह हमारा दिमाग एक जगह बैठकर घबडा जाता है वैसे ही हमारी आत्मा भी केवल इस देह का बोझ उठाते घबडा जाता है। हम समझ नहीं पाते उसकी व्याकुलता को।
आख़िर इसका उपाय क्या है ? क्योंकि अगर उपाय नहीं बताएँगे तो फिर इस चर्चा का कोइ मतलब नहीं रहेगा । इतनी चर्चा करने का मतलब यह था कि पहले उस हालत पर विचार कर लें जो हमारे साथ होती है पर हम उसे बयां करने के लिए शब्द नहीं ढूँढ पाते और तकलीफ भोगेते रहते है। इसका उपाय है चयन। कहीं एकांत, शांत और खुले स्थान पर हम सुखासन में बैठाकर ध्यान लगाएं । ध्यान यानी क्या? इसमें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। बस बैठाकर अपने आँखें बंद कर लें और सारा ध्यान नाक के ऊपर रखें आपके अन्दर जो विचारों का क्रम आयेगा उससे परेशान न होन- दरअसल वह विचार नहीं है , उसे तो अच्छा ही समझें। जैसे चाहे हम मिठाई खायें या करेला वह पेट में जाकर गंदगी में बदल जाता हैवैसे जो हम अच्छा या बुरा देखते हैं और सुनते है वह हमारे ख़ून में जाकर गंदगी में बदल जाता है। इन सबको निकलना जरूरी है। हम मित्र देखें या शत्रू ख़ून में जाकर दोनों का प्रभाव एक जैसा ही होता जैसा ही होता है। ध्यान में विचार आने का मतलब है कि जो हमारे दिमाग में आ रहा है वह गंदगी है और उस समल वहभस्म हो रहा है। शेष अगले अंकों में ।

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