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10/12/11

अथर्ववेद से संदेश-हिंसक भाव से परे रहें (atharvaved se sandesh-hinsa se pare rehen)

            मानव समाज में हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति एक चिंताजनक विषय है। मुख्य बात यह है कि आजकल कथित सभ्य समाज के बुद्धिजीवी अनेक हिंसक तत्वों के आक्रोश की अभिव्यक्ति का यह कहकर समर्थन करते हैं कि अपने प्रति अन्याय का प्रतिकार करने के लिये हिंसा के अलावा उनके पास कोई मार्ग नहीं है। जबकि यह बुद्धिजीवी स्वयं किसी पर एक कंकर भी नहीं फैंक सकते। स्पष्टत है कि आज के उदारीकरण के युग में हिंसक तत्व भी प्रायोजित हो गये हैं और कहीं न कहीं बुद्धिजीवी अपने प्रायोजकों के हितों के अनुसार उनका समर्थन और विरोध करते हैं। कलमवीरों का बंदूकचियों का समर्थन करना अब एक आम बात हो गयी है।
         एक मजे की बात यह है कि अनेक धार्मिक तथा धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी भारतीय धर्म ग्रंथों से हिंसक घटनाओं के प्रति भी अपना नजरिया रखते हैं। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने रावण का तथा द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने कंस का वध किया-इस पर समर्थन या विरोध करने पर भी अनेक नजरिये सामने आते हैं। कुछ लोग तो इस कदर भारतीय धर्म से विमुख हो गये हैं कि उनको वेदों, पुराणों, उपनिषदों, मनुस्मृति, तथा श्रीमद्भागवत गीता में भी हिंसक प्रतिरोध के औचित्य के दर्शन होते हैं। जबकि उस हिंसा का अर्थ वह कदापि नहीं है जैसा कि प्रचारित किया गया है। हिंसा का दंड भी हिंसा ही होती है इस बात को हमारा भारतीय अध्यात्म मानते हुए उससे बचने की सलाह देता है। दिक्कत यह है कि लोग आधा अधूरा अध्ययन कर अपना ज्ञान बघारने चल पड़ते हैं।
हिंसा को रोकने के लिये अथर्ववेद में प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि
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मा नो हिंसनिधि नो ब्रू हि परिणो वृडग्धि मा मां त्वया समरामहिं।
         ‘‘मै हिंसा न करूं ऐसा उपदेश दो, मेरी रक्षा करो, मुझे किसी पर क्रोध न आये तथा मैं किसी का विरोध न करूं।’’
              हमें परमात्मा से प्रार्थना करना चाहिए कि हमारे अंदर कभी हिंसक भाव या क्रोध न आये तथा हम किसी से झगड़ा न करें। यह बात भारतीय दर्शन स्पष्ट रूप से कहता है। आज जब खानपान, रहन सहन तथा पर्यावरण प्रदूषण के कारण् मानव समाज में सहिष्णुता के भाव का ह्रास  हुआ है वहीं भारतीय अध्यात्म से उसकी दूरी ने पूरे विश्व समाज को संकटमय मना दिया है। हिंसा किसी परिणाम पर नहीं पहुंचती। कम से कम सात्विक लोगों की दृष्टि से हिंसा निषिद्ध है। राजस प्रवृत्ति के लोगों को भी हिंसा से बचना चाहिए यदि वह राजकर्म से जुड़े न हों। भगवान राम ने रावण के साथ युद्ध किया था पर उनका लक्ष्य सीता को पाना था। भगवान श्री कृष्ण ने भी अपनी माता तथा पिता के उद्धार के लिये कंस को मारा पर धर्म की स्थापना करने के लिये जिस महाभारत युद्ध में श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश दिया उसमें हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा की। इससे यह बात तो समझ लेना चाहिए कि हथियार उठाने या प्रत्यक्ष हिंसा में लिप्त रहने वाला मनुष्य कभी धर्म की स्थापना नहीं कर सकता चाहे दावा कितना भी करता हो।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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9/11/11

पतंजलि योग साधना-आत्मा से चित्त के एकाकार होने पर अपनी बुद्धि का ज्ञान होना संभव (patanjali yog sadhna or vigyan-aatma aur chitta se buddhi ka gyan)

            पतंजलि योग सूत्र या विज्ञान सामान्य बुद्धिमान के लिये अत्यंत जटिल है। जब तक कोई व्यक्ति स्वयं आष्टांग योग का अध्ययन सक्रियता के साथ नहीं करता तब उसके लिये पतंजलि दर्शन समझना एक दुरूह कार्य है। सीधी बात कहें कि जो व्यक्ति योग साधना का अभ्यास करता है तो साथ में रचनाकर्म या प्रवचन में भी उसे दक्ष होना चाहिए। जो लोग रचनाकर्म और प्रवचन में दक्ष नहीं है तो वह सक्रिय होकर भी उसका अध्ययन नहीं कर पाते और जो इस योग साधना के विषय पर रचनाकर्म और प्रवचन कर रहे हैं वह सभी आष्टांग योग के पूर्ण भागों को नहीं जानते। थोड़ा बहुत प्राणायाम और आसन कर अनेक लोग अपने आपको ज्ञानी समझ रहे हैं पर उनको मनुष्य चित्त की महिमा का पता नहीं है। हम चित्त को मन या बुद्धि के रूप में देख सकते हैं। दरअसल हमारा चित्त जड़ है। वह बाह्य दृश्यों से प्रभावित होकर उनके रूप को ग्रहण करता है। उसमें कोई चिंत्तन नहीं है इसलिये किसी पदार्थ को देखने, छूने, सूंघने और उपभोग करने के परिणाम वह नहीं बता सकता। चित्त में उन्हीं वस्तुओं को पाने की कामना होती है जो उसने देखी हैं पर जिसे नहीं देखा उनके बारे में वह विचार नहीं कर सकता।
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि
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न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्।।
          ‘‘यह चित्त स्वप्रकाश वाला नहीं क्योंकि वह केवल जड़ दृश्य है।’’
एकसमये चोभयानवधारणम्।।
        ‘‘एक काल में चित्त और दृश्य का जानना संभव नहीं है।’’
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसंग स्मृतिसंकरश्च।।
          ‘‘एक चित को दूसरे का चित्त मान लेने पर उस चित्त में दूसरे चित्त का दृश्य होगा। इससे अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृतियों का मिश्रण भी हो जायेगा।
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्ती स्वबुद्धिसंवेदनम्।।
         ‘‘यद्यपि मनुष्य की चेतन शक्ति क्रिया से रहित और असंग है तो भी तदाकार हो जाने पर अपनी बुद्धि का ज्ञान उसे हो जाता है।’’
           हम इसी जड़ चित्त को स्वयं समझ बैठते हैं। अगर योग साधना के आठों भागों का अध्ययन कर पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाये तो मनुष्य दृष्टा हो जाता है। तब उसका अपने चित्त पर नियंत्रण हो जाता है। वह उसका उपयोग इस तरह कर सकता है कि दूसरे मनुष्य के चित्त का भी उसे ज्ञान होने लगता है। इतना ही नहीं वह अपने चित्त को दूसरे का मानकर उसकी स्थितियों, स्मृतियों और संकल्पों का भी भान कर सकता है। इतना ही जब योगाभ्यास से चित्त नियंत्रण में आता है तब बाह्य पदार्थों और दृश्यों से उस पर जो प्रभाव होता है उसका अध्ययन करना सहज होता है जिनसे मनुष्य दुष्परिणाम देने वाले संपर्कों से परे रहकर सहजता से जीवन व्यतीत कर सकता है। आत्मा से चित्त के एकाकार होने पर वह प्रकाशमान हो उठता है और यह योग की चरमस्थिति है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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6/30/11

चाणक्य नीति-प्रतिदिन एक श्लोक नहीं तो आधे का ही अध्ययन करें

            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में अनेक ग्रंथ हैं। अक्सर लोग कहते हें कि सभी को पढ़ना मुश्किल है या वह इतने बड़े हैं कि उनका अध्ययन करने का हमारे पास समय नहीं है। कुछ लोग तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनेक ग्रंथों का होना भी दोषपूर्ण मानते हैं । उनका कहना है कि जिस तरह अन्य धर्मों की तरह हमारे धर्म एक किताब होती है उसी तरह हमारे धर्म की भी होती तो समाज के विचारों में इतना विरोधाभास नहीं होता। दरअसल यह सब अपने अज्ञान तथा आलस्य को छिपाने के लिये पैदा किये गये तर्क हैं। अनेक विद्वान यह बात कह चुके है कि समय मिले तो अन्य ग्रंथों का अध्ययन किया जाये वरना तो चारों वेदों का सार श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने व्यक्त कर दिया है। जिसे पढ़कर जीवन और परमात्मा के रहस्य को समझा जा सकता है। उसमें भगवान श्रीकृष्ण जी ने वेदों में स्वर्ग से प्रीति रखने वाले संदर्भों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए अन्य सामग्री का संक्षिप्त और सार गर्भित संदेश प्रस्तुत किया है। अगर श्रीमद्भावगत गीता का एक श्लोक भी प्रतिदिन कोई पढ़ा जाये तो वह तत्वज्ञान को समझ सकते हैं। श्रीमद्भागवत गीता विश्व का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान भी है। जिन लोगों को अध्यात्म में रुचि है वह उसका अध्ययन किये बिना नहंी रह सकते। कई लोग तो प्रतिदिन एक पाठ तो कई कुछ श्लोक पढ़कर उसे समझने का प्रयास करते हैं।
       चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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          श्लोकेन वा तदर्थेन पादेनैकाक्षरेण वा।
         अबन्ध्यं दिवसं कुर्याद् दानाध्ययन कर्मभिः।।
           ‘‘एक श्लोक का अध्ययन और मनन अथवा आधे श्लोक अथवा एक पद अथवा एक अक्षर का ही नित्य स्वाध्याय करना चाहिए।’’
      मुख्य बात मानव हृदय की है। मन में यह विचार होना चाहिए कि हम अपने अंदर बाहर के विकारों को किसी तरह बाहर निकालें। भारतीय अध्यात्म में श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन इसलिये महत्वपूर्ण बताया गया है कि उसमें सांसरिक विषयों की चर्चा कदापि नहीं है। उसके अध्ययन करने पर अन्य विषयों से ध्यान स्वतः हट जाता है और इस तरह पाठक के अंदर नयी स्फूर्ति और नये विचार पैदा होते हैं। समय न हो तो भले ही उसका एक श्लोक रोज पढ़ें उससे भी ज्ञान प्राप्त होता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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6/11/11

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-ऊंचे पद से गिरने का भय पतन का कारण बनता है(kautilya ka arthshastra-unche pad se girane ka bhay patan ka karan)

          यह संसार बड़ा विचित्र है। हर मनुष्य यह इच्छा करता है कि वह अपने स्वाजातीय बंधुओं में महान कहलाये। इसके लिये वह धन, प्रतिष्ठा, उच्च पद और शारीरिक शक्ति का संचय करता है ताकि वह अपने निकटस्थ मानवीय समाज पर शासन कर सके। सभी लोग उसके सामनेे ऐसे पेश आयें जैसे कि प्रजा राजा के समक्ष पेश आती है। पूज्यता का यह भाव उसे संसार के ऐसे कर्मों में लिप्त कर देता है जो पहले उसके उत्थान और बाद में पतन का कारण बनते है। मूलतः यह स्थिति राजस भाव वाले लोगों में देखी जाती है। राजस भाव वाले लोग समाज पर नियंत्रण कर अपनी पूजा कराने के बहुत इच्छुक रहते हैं।
        कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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          उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदयायच्छते महान्।
            नचैर्नीचैस्तरां याति निपातभ्यशशकया।।
           ‘‘ऊंचे पद की इच्छा करता हुआ मनुष्य महान हो जाता है पर अपने महापद से गिरने के भय की आशंका से नीचे आने लगता है। अंततः उसका पतन हो जाता है।
          समाज पर नियंत्रण करने के प्रयासों को राजनीति कर्म कहा जाता है पर देखा जाये तो हर मनुष्य कहीं न कहीं पूज्यता को बोध से ग्रसित रहता है और कहीं न कहीं वह ऐसे प्रयास करता है जिससे समाज में उसका सम्मान बढ़े। भले ही कोई मनुष्य परमार्थ भाव से निष्काम कर्म न करे पर वह ऐसा जाहिर करता है कि वह तो पूरे समाज के लिये काम प्रयास करता है। राजस भाव की दृष्टि से आज की लोकतांत्रिक प्रणाली में सक्रियता तो एक सामान्य कर्म है जिसमें अनेक लोग शामिल नेता कहलाते हैं पर देखा जाये तो हर मनुष्य चाहे वह किसी राजनीतिक पद पर नहीं हो वह भी राजसी कर्म में लिप्त रहता ही है। धनपति, कलाकार, संगीतकार, अभिनेता और लेखक भी समाज में पुजने का मन में भाव लिये अपने कर्म करते हैं। इनमें से कुछ सफल रहते हैं तो कुछ नहीं।
         एक मजे की बात यह है कि आदमी अपने प्रयासों से बड़ा बन जाता है। यहां तक कि वह ऐसे कर्म भी कर लेता है कि अगर वह कुछ अन्य कर्म न भी करे तो भी उसका नाम इतिहास में दर्ज हो जाये पर प्रतिष्ठा का मोह ऐसा रहता है कि आदमी निरंतर इस भय से सक्रिय रहता है कि वह कहंी कम न हो जाये। लोग कहीं उसे भूल न जायें। इस कारण वह अतिसक्रियता दिखाता है और यही प्रयास उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ देता है और फिर वह ऐसी गलतियां भी करता है जो उसकी छवि घूमिल करती हैं और पहले की कमाई सारी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाती है।
         ऐसा लगता है कि आधुनिक युग में राजनीति, कला, साहित्य, व्यापार तथा अन्य सामाजिक क्षेत्रों में कार्यरत कम लोग ही कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ते हैं। जो पढ़ते हैं उनमें शायद ही कोई इतना सक्रिय रहता है। जो सक्रिय हैं उन्होंने शायद ही कौटिल्य का अर्थशास्त्र का अध्ययन किया हो। यही कारण है कि हम अक्सर यह देखते हैं कि प्रतिष्ठित से प्रतिष्ठित लोग अनेक बार अपनी छवि धूमिल कर लेते हैं। तब लगता है कि लोगों को कौटिल्य का अर्थशास्त्र का अध्ययन कर उसके ज्ञान को धारण कर ही अपने क्षेत्र में सक्रिय रहना चाहिए।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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9/11/10

गणेश चतुर्थी-श्री गणेश जी का अमूर्तिमान लेखकीय स्वरूप भी स्मरणीय (today ganesh chaturthi-vishesh hindi lekh)

आज पूरे देश में गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है। देश के लगभग सभी शहरों और गांवों में उनकी जगह जगह मूर्तियों की स्थापना की जा रही है। भगवान श्रीगणेश ही का हमारे जीवन में कितना धार्मिक महत्व यह इसी बात से समझा जा सकता है कि किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में उनका स्मरण किया जाता है। इसका कारण उनको भगवान शिव तथा अन्य देवताओं द्वारा दिया गया है वह वरदान है जो उनको अपने बौद्धिक कौशल के कारण मिला था।
एक समय देवताओं में अपनी श्रेष्ठता को लेकर होड़ लगी थी। श्रेष्ठ देवता के चयन के लिये यह तय किया गया कि जो इस प्रथ्वी का दौरा सबसे पहले कर लौटेगा वही उसका दावेदार होगा। सारे देवतागण उसके लिये दौड़ पड़े मगर श्री गणेश महाराज अपने माता पिता के पास बैठे अपनी लीला करते रहे। जब बाकी देवताओं के वापस लौटने की संभावना देखी तो तत्काल उठे और अपने माता पिता भगवान शिव और पार्वती की प्रदक्षिणा कर घोषणा की कि उन्होंने तो सारी सृष्टि का दौरा कर लिया क्योंकि भगवान शिव और माता पार्वती ही उनके लिये सृष्टि स्वरूप हैं। उनके इस तर्क को स्वीकार किया गया और यह आशीर्वाद दिया गया कि जो मनुष्य किसी भी शुभ कर्म के प्रारंभ में उनकी छबि की स्थापना करेगा उसे उसका अच्छा फल प्राप्त होगा। उसके बाद से उनको शुभफलदायक माना जाने लगा।
मगर उनका यह रूप सकाम भक्तों के लिये ही सर्वोपरि है जबकि निष्काम तथा ज्ञानी भक्त उनको महाभारत ग्रंथ के लेखक के रूप में भी उनकी याद करते हैं जिसमें सम्मिलित श्रीगीता संदेश बाद में भारतीय अध्यात्म का एक महान स्त्रोत बन गया और जिसा आज पूरा विश्व लोहा मानता है। वैसे महाभारत के रचनाकार तो ऋषि वेदव्यास जी है पर उसकी रचना श्री गणेश महाराज की कलम से ही हुई है।
श्री गणेशजी का चेहरा हाथी का है और सवारी चूहे की है जो कि उनके भक्तों में विनोद का भाव भी पैदा करता है। उनको यह चेहरा उनके पिता भगवान शिव ने ही दिया जिन्होंने क्रोधवश उसे काट दिया था। एक बार माता पार्वती जी नहा रही थी और उन्होंने अपने पुत्र बालक गणेश को यह निर्देश दिया कि वह दरवाजे पर बैठकर पहरा दें और किसी को घर के अंदर न आने दें। आज्ञाकारी बालक गणेश जी वहीं जम गये। थोड़ी देर बात भगवान शिव आये तो श्री गणेश जी ने उनको अंदर जाने से रोका। पिता पुत्र में विवाद हुआ और भगवान शिव ने अपने ही बेटे का सिर अपने फरसे से काट दिया। बाद में उनको पछतावा हुआ और फिर उनको हाथी का सिर लगाकर पुनः जीवन प्रदान किया गया।
भगवान श्रीगणेश का चरित्र बहुत विशाल है। जब श्री वेदव्यास महाभारत की रचना कर रहे थे तब उन्होंने उसके लेखन के लिये श्रीगणेश जी का स्मरण किया। लिखने के लिये श्रीगणेश जी यह शर्त रखी कि जब तक वेदव्यास की वाणी चलती रहेगी वह लिखते रहेंगे और जब वह रुक जायेगी तो लिखना बंद कर देंगे।
हमारे अध्यात्म में अनेक भगवान हैं मगर श्री गणेश जी की हस्तलिपि में लिखी गयी श्री मद्भागवत गीता को एक अनुपम ग्रंथ है जिसके कारण सकाम था निष्काम दोनों ही प्रकार के भक्तों में उनको श्रेष्ठ माना जाता है। सकाम भक्ति तथा राजस भाव वाले मनुष्य श्रीमद्भागवत गीता का पूज्यनीय तो मानते हैं पर उसके ज्ञान से यह सोचकर घबड़ाते हैं कि वह उनको सांसरिक कर्म से विरक्त कर देगी। यह उनका वहम है। जबकि इसके विपरीत श्रीमद्भागवत गीता तो निष्काम भक्ति तथा निष्प्रयोजन दया के साथ ही देह, मन और विचारों में शुद्धता लाने का मंत्र बताने वाला एक महान ग्रंथ है और हृदय में पवित्र भाव लाकर उसका अध्ययन करने से जीवन के ऐसे रहस्य हमारे सामने प्रकट हो जाते हैं जो हमारे ज्ञान चक्षु खोल देते हैं। इस संसार वह स्वरूप हमारे सामने आता है जो सामान्य रूप से नहीं दिखता। मूर्तिमान श्रीगणेश जी का वह अमूर्तिमान लेखकीय स्वरूप उन ज्ञानियों को बहुत लुभाता है जो श्री गीता संदेश का महत्व समझते हैं।
गणेश चतुर्थी के अवसर पर हिन्दी ब्लाग जगत के साथी लेखकों और पाठकों को हार्दिक बधाई तथा शुभ कामनायें। ॐ  नमो गणेशायनमः।
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लेखक संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,Gwalior
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8/13/10

अध्यात्मिक ज्ञान और कर्मकांड-हिन्दी लेख (adhyamik gyan aur karmakand-hindi lekh)

आखिर कुछ कथित पवित्र लोग धर्म प्रचार क्यों करते हैं? यह समझ में नहीं आता! धर्म का संबंध निज आचरण से है। सामान्यतः दूसरे पर दया करना, मीठी वाणी में सभी से चर्चा करना तथा सभी के प्रति समान भाव रखने के साथ ही सर्वशक्तिमान की भक्ति तथा उसके गुणों की पर विचार करना ही धार्मिक आचरण की परिधि में आता है। जब धर्म अपने आचरण से दृश्यव्य है तो फिर उसे दूसरे लोगों को बताने की आवश्यकता क्या है? सामान्य मनुष्य की चिंतन क्षमता कम होती है क्योंकि वह अपनी दिनचर्या में लिप्त रहता है पर उसकी चेतना मृत नही होती। किसी अच्छे व्यक्ति से मिलने पर उसके अंदर सकारात्मक भाव पैदा होता है तो निम्न कोटि का व्यक्ति उसके अंदर नकारात्मक विचार पैदा कर देता है। तब सवाल यह उठता है कि कथित पवित्र लोग अपने आचरण से अपने प्रमाणि करने की बजाय किसी धर्म का नाम लेकर प्रचार क्यों करते हैं?
स्पष्टतः धर्म प्रचार ऐसे लोग करते हैं जिनका आचरण दृश्यव्य नहीं  है या वह उसे दिखाना नहीं चाहते क्योंकि वह स्वयं किसी सांसरिक क्रिया में दैहिक रूप से लिप्त नहीं होते पर उनका मन उसमें बिंधा रहता है। अगर उनका आचरण दृश्यव्य हो जाये तो शायद ही कोई  उनकी धर्म सभाओं में जाये। फिर जिनको धर्म प्रचार का काम सौंपा जाता है उनको सांसरिक कार्य से प्रत्यक्षः मुक्ति दी जाती है या वह ले लेते हैं। जब आदमी सांसरिक कर्म करता है तो कुछ न कुछ ऊंच नीच होता रहता है ऐसे में धर्म प्रचारक की छबि पर दाग का खतरा बना जाता है यही कारण है कि हर धर्म प्रचारक सर्वशक्तिमान के अपने कथित रूप के नाम से बने दरबार में ही आवास बनाते हैं। उनके आवास सामान्य नहीं महलों की तरह होते हैं। अनेक जगह उनको राज्य से करों में रियायत के साथ ही कानूनी संरक्षण भी मिलता है। एक तरह से धर्म प्रचारक तथा उनके आवास समाज से पृथक एक अलग समाज बना लेते है। उनका दायरा बहुत सीमित होता है पर अपने अपने सर्वशक्तिमान के रूपों को मानने वाले भक्तों को अपना ही स्थाई अनुयायी मान लेते हैं तब उनकी शाक्ति विशाल लगती है जो केवल एक प्रचार भ्रम है।
उनका दावा होता है कि ‘हमारे इतने लोग हैं। हमारे सर्वशक्तिमान के स्वरूप को मानने वालों की संख्या बढ़ रही है। हमारी विचारधारा के लोगों की संख्या बहुत अधिक हो रही है।
इधर सर्वशक्तिमान के विभिन्न रूपों को मानने वाले लोगों के मन की थाह लें तो इन धर्मप्रचारकों की वहां कोई औकात नहीं दिखती। मगर राज्य और समाज के शिखर पुरुष अपनी ताकत बनाये रखने के लिये इन्हीं धर्म प्रचारकों को भीड़ पर नियंत्रित करने का ठेका देते हैं ताकि आम इंसान किसी प्रकार की विद्रोहात्मक स्थिति न पैदा करे।
सर्वशक्तिमान का मूल स्वरूप निरंकार है। वह एक है कि अनेक! वह गोरा है या काला! लंबा है या नाटा! वह सुंदर है या असुंदर! इस विषय में प्रमाणिक रूप से कोई नहीं  जानता। साफ कहें तो वह तो अनंत है! मतलब यह कि धर्म प्रचारकों का यह कहना कि वह एक है अपने आप में ही उनके अज्ञान का प्रमाण है। ऐसे में लंबी चौड़ी बहसें होती हैं। कहीं झगड़े होते हैं तो कहंी एकता के लिये अभियान चलते हैं। इस तरह धर्म प्रचारक आम इंसानों की भीड़ की मानसिक रूप से नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। इसके लिये उनको राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तथा अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों के -फिल्म, खेल, कला तथा धार्मिक-शिखर पुरुषों से संरक्षण मिलता है। वह सर्वशक्तिमान के बाद इस धरती पर दूसरी बड़ी शक्ति होने का दावा करते हुए कहते हैं कि ‘हम धर्म प्रचारक हैं।’’
धर्म प्रचार आज से नहीं  बरसों से एक व्यवसाय है। मुश्किल यह है कि हर जीव एक ऐसी देह है जिसे आत्मा धारण करती है और मनुष्य में बुद्धि कुछ अधिक है इसलिये वह सब कुछ पाकर भी शांत नहीं बैठता और उसे अध्यात्मिक शंाति की आवश्यकता पड़ती है और यह धर्म प्रचारक उसे अपने अपने हिसाब से प्रवचन देखकर शांत करना चाहते हैं और वह इनके जाल में फंसता है।
अध्यात्म यानि क्या? अध्यात्म वही आत्मा है जिसे इस देह ने धारण किया है। फिर उसे हम केवल आत्मा क्यों नहीं कहते। आत्मा का अगर स्थिर भाव हो तो उसे आत्मा कहा जाये पर उसके भाव का विस्तार होता है इसलिये उसके साथ अधि शब्द जोड़ा जाता है। यह आत्मा कुछ ऐसा देखना चाहता है जो कोई नहंी देख पाता, वह ऐसी चीज पाना चाहता है जिसे कोई नहीं पा सकता। वह ऐसा कुछ करना चाहता है जो कोई नहंी करना चाहता। वह शांति और सुख का सर्वोच्च शिखर छूना चाहता है जो केवल परमात्मा की भक्ति तथा ज्ञान से ही संभव है। यहीं से शुरु होती है धर्म प्रचारकों की धांधलियां। वह सामान्य जन में भ्रम पैदा करते हैं ताकि उसका अध्यात्म भाव उनका बंधक हो जाये।
किसी गरीब को देखेंगे तो कहेंगे कि ‘विश्वास करो सर्वशक्तिमान सब देगा।’
किसी बीमार को देखेंगे तो  कहेंगे-‘विश्वास करो सर्वशक्तिमान बीमारी ठीक कर देगा।’
किसी परेशान को देखेंगे तो कहेंगे कि-‘विश्वास करो कि सर्वशक्तिमान सब समस्या हल कर देगा।’’
इस देह में फंसे मन को वह गोल गोल इस देह के आसपास ही घुमाते हैं। आदमी की बुद्धि के केंद्र में स्थापित देह के मोह का वह बहुत सटीक इस्तेमाल करते हैं।
यह धर्म प्रचारक अव्वल दर्जे के अज्ञानी और लालची हैं-उनको मूर्ख कहना ठीक नहीं क्योंकि वह तो आम इंसान को मूर्ख बनाते हैं। सांसरिक कर्म में जो कोई अपना स्थापित नहीं  कर पाता वह धर्म प्रचारक बन जाता है।
जब कोई आदमी अपने धर्म प्रचारक होने का दावा करे तो समझ लीजिए कि वह व्यापार कर रहा है। दरअसल हमें अपने मन की शांति के लिए अध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता होती है न कि धर्म के नाम पर मनोरंजन की। इस संसार में जो समस्यायें हैं वह भौतिकता की वजह से हैं। देह है तो बहुत सारी परेशानियां रहेंगी। अगर कोई मर गया तो वह मर गया पर उसको स्वर्ग दिलाने के लिये कर्मकांडों के नाम पर खर्च करने से भी परेशानी होती है मगर लोग करते हैं यह सोचकर कि न करने पर समाज आक्षेप करेगा। दूसरे लोग कहेंगे कि ‘बड़ा अधर्मी आदमी है अपने मरे हुए आत्मीय को स्वर्ग नहीं भिजवा रहा। खर्च से डरता है।’
इस तरह कर्मकांडों से धर्म को जोड़ा गया है जबकि सच यह है कि इनका उस अध्यात्म से कोई लेना देना नहीं है जो हमारा आधार है। दुनियां में बहुत सारे धर्म हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान की खान केवल भारतीय दर्शन में ही है जो संसार के आवश्यक कर्म करते हुए शांति और सफलता से जीवन जीने की राह दिखाता है। वह केवल अध्ययन, मनन और चिंतन से प्राप्त होता है और उसके लिये चाहिए एकांत! शोरशराबे में ज्ञान केवल चीख बनकर रह जाता है। फिर ज्ञान के लिये गुरु के पास जाना पड़ता है। ऐसा गुरु ढूंढना पड़ता है जो ज्ञान बेचने की बजाय उसके आधार पर अपना जीवन निर्वाह करते हुए संसारिक कार्य में निर्लिप्त भाव से से रहता है न कि धर्म प्रचारक बनकर अपने लिये शिष्य ढूंढता है। जब शिक्षित नहीं थे तब संत लोग ज्ञान बांटते थे पर जब अक्षर ज्ञान बढ़ गया है तब यही काम श्रीमद्भागवत गीता के साथ ही कबीर, रहीम, तुलसी, मीरा तथा अन्य महान संतों की वाणी का अध्ययन कर किया जा सकता है। उसके लिये किसी पर आश्रित होने की आवश्यकता नहीं है। एक बात याद रखें अपना ज्ञान तब तक दूसरे को न सुनायें जब तक वह इसके लिये आग्रह न करें क्योंकि एसा करते हुए धीरे धीरे उन धर्म प्रचारकों की श्रेणी में आ जायेंगे जो से कोरे हैं और धार्मिक कर्मकांडों को ही स्वर्ग का रास्ता बताते हैं और मोक्ष के नाम से तो उनको भय लगने लगता है।
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7/24/10

श्रीमदभागवत गीता केवल सिखाती नहीं विवेक भी जगाती है (shri madabhagavat gita vivek jagati hai)

अगर श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन नित्य करें तो इस बात का आभास सहजता से होता है कि उसमें सिखाया कुछ नहीं गया है बल्कि समझाया गया कि इस संसार का स्वरूप क्या है? उसमें यह कहीं नहीं कहा गया कि आप इस तरह चलें या उस चलें बल्कि यह बताया गया है कि किस तरह की चाल से आप किस तरह की छबि बनायेंगे? उसे पढ़कर आदमी कोई नया भाव नहीं सीखता बल्कि संपूर्ण जीवन सहजता से व्यतीत करें इसका मार्ग बताया गया है।
श्रीमदभागवत गीता पर जब कहीं चर्चा पढ़ने को मिलती है तब इस लेखक के मन में कुछ कुछ नया विचार आता है। यह स्थिति वैसी है जैसे कि श्रीमद्भागवत गीता को रोज पढ़ने पर नित्य कोई नया रहस्य प्रकट होता है। अक्सर अखबार, टीवी तथा अंतर्जाल पर होने वाली चर्चाओं में एक नारा अक्सर सुनाई देता है कि ‘सब पवित्र ग्रंथ एक समान’ उसमें अनेक ग्रंथों का नाम देते हुए श्रीमद्भागवत गीता का नाम भी दे दिया जाता है। कुछ लोग तो यह भी नारा देते हैं कि ‘सभी पवित्र ग्रंथ प्रेम, अहिंसा तथा दया का मार्ग सिखाते हैं’।
ऐसा लगता है कि बड़ी बड़ी बातें करने वाले छोटे नारों को गढ़कर अपना लक्ष्य साधते हैं। उनका उद्देश्य समाज के हर वर्ग के लोगों को प्रभावित करना होता है-अब यह अलग बात है कि कोई दौलत के लिये तो कोई शौहरत के लिए ऐसा करता है। कभी कभी तो लगता है कि श्रीगीता को मानने वाले तो असंख्य है पर उसे समझने वाले बहुत कम है शायद इसलिये श्रीगीता का नाम लेकर ही अधिकतर कथित प्रतिभाशाली लोग लोकप्रियता पाना चाहते हैं।
दुनियां के अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं और उनमें मनुष्य को देवताओं की तरह बनने के नुस्खे बताये गये हैं पर किसी ने देवताओं की पहचान नहीं बतायी। राक्षस या शैतान का उल्लेख सभी करते हैं पर उसे निपटने या वैसे न होने के लिये ज्ञान कहीं नहीं मिलता। दूसरी खुशफहमी यह पैदा की जाती है कि सभी मनुष्यों को देवता बनना चाहिए जो कि एक असंभव काम है। श्रीगीता बताती है कि इस संसार में विभिन्न प्रकार के लोग रहेंगे पर और उनकी पहचान समझना जरूरी है। वह एक आईना देती है जिसमें अपनी छबि देखी जा सकती है। वह ऐसा आईना देती है जो पारदर्शी है जिसमें आप दूसरे आदमी की पहचान कर उसे व्यवहार करने या न करने का निर्णय ले सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसमें एक वैज्ञानिक सूत्र है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ इसका मतलब यह है कि जैसे संकल्पों, विचारों तथा कर्मों से आदमी बंधा है वैसा ही वह व्यवहार करेगा। उस पर खाने पीने और रहने के कारण अच्छे तथा बुरे प्रभाव होंगे। सीधी बात यह है कि अगर आप अगर यह चाहते हैं कि अपने ज्ञान के आईने में आप स्वयं को अच्छे लगें तो अपने संकल्प, विचारों तथा कर्मों में स्चच्छता के साथ अपनी खान पान की आदतों तथा रहन सहन के स्थान का चयन करें। दूसरी बात यह है कि अगर आप आने अंदर दोष देखते हैं तो विचलित होने की बजाय यह जानने का प्रयास करें कि आखिर वह किसी बुरे पदार्थ के ग्रहण करने या किसी व्यक्ति की संगत के परिणाम आया-एक बात यह भी कि जैसे श्रीगीता का अध्ययन करेंगे आपको अपने अंदर भी ढेर सारे दोष दिखाई देंगे और उन्हें दूर करने का मार्ग भी पता लगेगा।
दूसरे व्यक्ति में दोष देखें तो उस पर हंसने या घृणा करने की बजाय इस बात का अनुसंधान करें कि वह आखिर किस कारण से उसमें आया। अगर कोई दुष्ट व्यक्ति आपसे बदतमीजी करेगा तो आप दुःखी नहीं होंगे क्योंकि आप जानते हैं कि इसके पीछे अनेक तत्व है जिनका दुष्प्रभाव उस पर पड़ा है।
श्रीगीता किसी को प्रेम करना अहिंसा में लिप्त होना नहीं सिखाती बल्कि अंदर प्रेम और अहिंसा का भाव अंदर कैसे पैदा हो यह समझाती है। तय बात है कि ऐसे में आपको ऐसे तत्वों से संबद्ध होना होगा जो यह भाव पैदा करें। मतलब सिखाने से प्रेम या अहिंसा का भाव नहीं पैदा होगा बल्कि वैसे तत्वों से संपर्क रखकर ही ऐसा करना संभव है।
श्रीगीता को पढ़ने और उन पर ंिचंतन करने वाले इस बात को जानते हैं कि कोई दूसरे को प्रेम नहीं सिखा सकता क्योंकि जिस व्यक्ति का घृणा पैदा करने वाले तत्वों से संबंध है उसमें प्रेम कहां से पैदा होगा? अलबत्ता स्वयं किसी अन्य व्यक्ति से सद्व्यहार करें क्योंकि अंततः वह उसे लौटायेगा।
श्रीमद्भागत गीता में चार प्रकार के भगवान के भक्त बताये गये है। भगवान की भक्ति होती है तो जीव से प्रेम होता है। अतः भक्ति की तरह प्रेम करने वाले भी चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी। पहले बाकी तीन का प्रेम क्षणिक होता है जबकि ज्ञान का प्रेम हमेशा ही बना रहता है। अगर आपके पास तत्व ज्ञान है तो आप अपने पास प्रेम व्यक्त करने वालों की पहचान कर सकते हैं नहंी तो कोई भी आपको हांक कर ले जायेगा और धोखा देगा।
श्रीमद्भागवत गीता में यह बात साफ तौर से कही गयी है कि प्राणायाम ध्यान, ओम शब्द का स्मरण करने से संपन्न ज्ञान यज्ञ के अमृत की अनुभूति करने वाले भक्त मुझे प्रिय हैं-सीधा आशय यही है कि जीवन के कल्याण का यही उपाय है। यह अमृत पानी पीने वाला नहीं बल्कि मन में अनुभव किया जाने वाला है जिसकी अनुभूति देह और आत्मा दोनों में ही की जा सकती है। व्यक्ति की पहचान भी बताई गयी है जो दो प्रकार के होते हैं-दैवीय प्रकृति और आसुरी प्रकृति वाले। व्यक्ति की तरह भोजन के रूप का ज्ञान भी दिया गया जो तीन तरह का होता है-सात्विक, राजस और तामसी। जैसा भोजन वैसा मनुष्य! इसका ज्ञान होने पर मनुष्य आसानी से अपने आसपास के वातावरण और व्यक्ति की पहचान कर अपना कर्म करता है।
जब श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान कोई इंसान धारण कर लेता है तो वह निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया में इस तरह लिप्त होता है कि उसे सांसरिक पीड़ायें छू तक नहंी पाती क्योंकि वह जानता है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ दूसरी बात यह है कि पीड़ायें उसके पास आती भी नहीं क्योंकि वह उस श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान को आईना बनाकर सामने रख लेता है और पदार्थों को ग्रहण करने और अन्य व्यक्ति से व्यवहार करने में पहचान बड़ी सहजता से कर आगे बढ़ता है। अनुकूल लोगों से संपर्क करता है और प्रतिकूल लोगों से परे रहता है। प्रेम और अहिंसा का भाव उसमें इस तरह बना रहता है कि उसका आभास उसे स्वयं ही होता है। वह जानता है कि जीवन जीने का यही एक सहज रास्ता है।
इसलिये यह कहना ही गलत है कि श्रीमद्भागवत गीता भी अन्य ग्रंथों की तरह प्रेम करना या अहिंसा में लिप्त रहना सिखाती है संकीर्णता का परिचायक है। दरअसल प्रेम या अहिंसा सिखाने वाली बात नहीं बल्कि अपने अंदर कैसे पैदा हो इसका उपाय बताना जरूरी है। फिर इसके लिये अनेक तत्व हैं जिनका ज्ञान हुए बिना किसी में ऐसे भाव नहीं पैदा हो सकते जब तक श्रीगीता का अध्ययन न किया जाये। याद रखिये श्रीमदभागवत गीता दुनियां का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान दोनो ही हैं।
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3/16/10

आज से भारतीय संवत् 2067 प्रारंभ-विशेष हिन्दी लेख (Today hindu new year-special hindi article)

आज से नववर्ष 2067 प्रारंभ हो गया। प्राचीन काल में जब संचार माध्यम इतने प्रभावी नहीं थे तब इस संवत् को लोग अनेक नामों से पुकारते थे-कम से कम इससे यह तो प्रमाणित तो होता है कि राजनीति से खंड खंड होने के बावजूद सामाजिक रूप से यहां एकता थी। इसके अलावा भारत में वर्ष का निर्धारण करने वाले अनेक अन्य संवत् भी हैं पर यह विक्रमी संवत् सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। सिंधी समाज में आज गुड़ी पड़वा भी बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
दरअसल काल गणना की आज तक कोई तार्किक विधि नहीं बनी है पर फिर भी भारतीय वर्ष सृष्टि के अधिक निकट बैठता है। विश्व में सर्वाधिक प्रचलित ईसवी संवत् एकदम अवैज्ञानिक है-कम से कम भारत में तो यही लगता है। यहां वर्ष को मौसमों के हिसाब से भी तीन भागों में बांटा जाता है-गर्मी, सर्दी और बरसात। ऐसी विधि अन्यत्र देखने को नहीं मिलती।
कुछ पश्चिमी विशेषज्ञ  धर्म के मामले में हिन्दू धर्म और संस्कृति को अधिक प्रासंगिक मानते हैं। इसका कारण यह है कि इसे मानने वाले रूढ़ नहीं होते-अगर उनको कोई  नई चीज या विचार उपयुक्त लगता है उसे मानकर अपना लेते हैं। किसी एक किताब का रट्टा लगाते हुए जिंदगी नहीं बिताते बल्कि नवीन सोच के साथ आगे बढ़ते जाते हैं। इसके विपरीत गैर भारतीय विचारधाराओं वाले केवल अपनी नियत किताबों के आगे किसी को कुछ नहीं समझते और हर नया विचार उनके लिये बुरा या त्याज्य होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो गैर भारतीय विचाराधाराऐं मनुष्य को स्वतंत्र रूप से विचरण करने के विरुद्ध हैं-वह राज्य का परिवार और समाज के अंदरूनी विषयों में हस्तक्षेप चाहती हैं।
सच तो यह है कि गैर भारतीय धार्मिक विचाराधारायें कहीं न कहीं अपने अभ्युदय स्थलों के प्रभाव और प्रशंसा का विस्तार करने की पक्षधर रही हैं और येनकेन प्रकरेण किसी भी तरह धनबल, बाहूबल और समूह बल के आधार पर योजनाबद्ध राजनीतक प्रयास करती हैं। इसके विपरीत सभी भारतीय धर्म केवल मनुष्य में स्व चेतना जाग्रत करने का पक्षधर रहे हैं। उनका मानना है कि आदमी स्वतंत्र रूप से चलता रहे तो समाज में परिवर्तन आयेंगे और उसे किसी शक्ति के साथ रोकना अप्राकृतिक क्रिया है।
एक मजे की बात यह है कि भारत के प्राचीन ग्रंथों को लेकर अनेक गैर भारतीय धर्म मानने वाले ही नहीं बल्कि स्वधर्मी  कथित विचारक  भी हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाते हैं-खास तौर से वेद, रामायण और महाभारत को लेकर। पता नहीं उनको यह कैसे भ्रम हो गया है कि वह वेद निर्मित समाज है जबकि गैर भारतीय धर्मी मानने वाले देशी लोग तथा विदेशी संस्कृति के पोषक स्वधर्मी भी वेद, पुराण और उपनिषदों के विरोधाभासों से भरे चंद श्लोकों को लेकर भारतीय धर्म के विरोध में डटे रहते हैं। उनको यह समझाना कठिन है कि वेदकालीन समाज तो कभी का विलुप्त हो चुका है क्योंकि हमारे देश में समाजों के पतन और अभ्यदुय की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो मानव चेतना से ही चलती है न कि किताबी बातों से। वेदों के बाद भी ढेर सारी रचनायें हुईं हैं जिनसे यह समाज मार्गदर्शन लेता रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि चारों वेदों का सार श्रीमद्भागवत गीता में आ गया है-उसमें वेदों की स्वर्ग से प्रीति रखने वाली बातों को निषेध किया गया है। श्रीमद्भागवत गीता के बाद भी यह समाज केवल उसके साथ चिपका नहंी रहा भले ही उसकी आज भी प्रासंगिकता है क्योंकि समय समय पर पैदा हुए महापुरुष उसी संदेश को दोहराते रहे जो श्रीगीता में हैं। भगवान श्रीगुरुनानक देव, संत कबीर, तुलसीदास और रविदास जैसे महान संतों के सानिध्य में यह समाज आगे बढ़ता गया है। अन्य समाजों से आगे होने का दावा इस आधार पर भी करना गलत नहीं है क्योंकि हिन्दू धर्म के आलोचक वेदों से चिपक कर रह जाते हैं तथा उन्हें संत कबीर वाणी, चाणक्य नीति, विदुर नीति, श्रीगुरुग्रंथ साहिब तथा अन्य महापुरुषों की रचनायें नहीं दिखती जिनका समाज पर वेदों से अधिक गहरा प्रभाव है।
अब यह उनको कौन समझाये कि जिन वेदों, पुराणों और उपनिषदों के विवादास्पद विषयों को लेकर तुम जो ललकार रहे हो उनकी बहुत सी बातों को संपादन करते हुए हटाया जा चुका है-यह काम हमारे देश में जन्में महापुरुष कर चुके हैं-चाहें तो वह श्रीगीता को पढ़कर देख लें। संत कबीरदास जी और श्रीगुरुनानक देव जी ने भारत की जाति पाति और सामाजिक व्यवस्था पर जो करारी चोट की वैसी तो यह आधुनिक आलोचक भी नहंी कर सकते। कहने का तात्पर्य यह है कि अंधविश्वास, रूढ़िवादिता तथा अन्य धार्मिक पाखंडों से दूर रखने के लिये हमारे भारत में ही जन्में महापुरुषों ने ही बहुत प्रयास किये जिस कारण यह हिन्दू समाज आज विश्व का सबसे अधिक वैज्ञानिक, धार्मिक तथा ज्ञनी समाज माना जाता है। बाकी धर्म छोड़े और पकड़े जाते हैं जबकि हिन्दू धर्म केवल माना जाता है और उसे अपनाने के लिये गर्दन घुमाकर स्वीकृति की आवश्यकता  नहीं  होती बल्कि उस पर चलकर दिखाकर प्रमाणित किया जाता है।
इस नववर्ष पर सभी पाठकों, मित्र ब्लाग लेखकों तथा देश के सभी लोगों को बधाई। आने वाले वर्ष में देश और समाज प्रगति करे यही कामना है। इस अवसर पर हमारा तो यही कहना है कि अध्यात्मिक ज्ञान के बिना हम चाहे जहां भी पहुंचे मन में शांति नहीं रह सकती। इतना ही नहीं अगर अध्यात्मिक ज्ञान से व्यक्ति को तीक्ष्ण बुद्धि भी प्राप्त होती है। अतः प्रतिदिन येाग साधना करने के बाद मंत्रोच्चार करने के साथ भगवान का नाम अवश्य लें इससे अनेक लाभ होते हैं और यह करने पर ही पता लगते हैं उनका शाब्दिक वर्णन करना संभव नहीं है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/16/10

मनु संदेश-बुद्धिहीन को दंड का उपयोग करना नहीं आता (rajya aur dand-hindu dharma sandesh)

स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। एक बात याद रखें कि बुद्धिमान, ज्ञानी और विद्वान लोगों की समझ से ही समाज, राष्ट्र और धर्म संकट से उबर सकता है। ऐसे लोगों की उपेक्षा से समाज गर्त में चला जाता है और राष्ट्र पर संकट आते रहते हैं।
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1/10/10

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-ईमानदारी से ही सम्मान बढ़ता है (imandari aur samman-shri guruvani)

‘चोर जार जूआर पीढ़ै घाणीअै।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार चोर और जुआरी घानी में पीसे जाने योग्य होते हैं।
‘सच्चा साहु सचो वणजारि। सचु वणंजहि गुर हेति अपारे।।
सचु विहाझहि सचु कमावहि सचो सचु कमावणआ।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो मनुष्य धर्म के मार्ग का अनुसरण करते हुए ईमानदारी से कमाई करता है उसका व्यापार हमेशा बढ़ता है और उसकी सच्चाई को सारा समाज सराहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या अकेली नहीं है बल्कि कठिनाई इस बात की है कि देश में हालत ऐसे बना दिये गये हैं कि ईमानदारी से काम करने वाले को अधिक धन कमाने का अवसर ही नहीं मिलता। नौकरी, व्यवसाय, कला, साहित्य तथा अन्य व्यवसायिक क्षेत्रों में बेईमानी, चाटुकारिता तथा ढोंग को आश्रय मिल रहा है। यही कारण है कि देश भले ही अन्य देशों के मुकाबले धनी हो रहा है पर फिर भी यहां गरीबी भी बढ़ रही है। सच बात तो यह है कि बिना बेईमानी, भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के शायद ही कोई अमीर बन पाता हो। इतना ही नहीं जिस धर्म को लेकर हम गर्व करते हैं उसकी आड़ जितने अधर्म के काम होते हैं शायद किसी अन्य में नहीं होते।
लोगों की हालत भी यह है कि वह धनी होने पर ही कलाकार, लेखक, ज्ञानी, तथा समाज सेवक मानते हैं। भ्रष्टाचार ऊपर से आता है यह सच है पर नीचे उसे प्रश्रय कौन दे रहा है यह भी देखने वाली बात है। आम आदमी यह जानते हुए भी बेईमानी से धनी बने व्यक्ति का सम्मान करता है भले ही वह कितना भी भ्रष्ट और अधर्मी क्यों न हो?
देश में अधर्म के कारण धन बढ़ रहा है पर कुल व्यापार देखें तो जस का तस है’-यानि देश में गरीब और असहाय तबका वहीं का वहीं है। यह देश के लिये शर्म की बात है कि जहां देश के विश्व में आर्थिक महाशक्ति होने के दावे हो रहे हैं वहीं चालीस प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनको शुद्ध खाना तो दूर अन्न का दाना तक नसीब नहीं है। एक तरह से देश का व्यापार वहीं का वहीं है जहां पहले था। अगर धर्म के सहारे धन कमाने वालों को प्रोत्साहन दिया जाये तभी इस स्थिति से उबरा जा सकता है। हम जब देश की आर्थिक स्थिति की हालत देखते हैं तो उसमें अनेक विरोधाभास दिखाई देते हैं। देश में अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब अधिक गरीब होता दिख रहा है। विश्व में भारत की अमीरी की चमक के साथ गरीबी का अंधेरा भी दिखाई देता है। इसका अध्ययन करें तो यह पता लगता है कि हमारे देश नैतिक पतन भी कम नहीं हुआ है यही कारण है कि विश्व में हमारे धनपतियों का सम्मान नहीं होता
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