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2/15/14

अतिनाटकीय प्रचार भाव कम कर देती है-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख(atinatkiyata prachar bhaav kam kar detee hai-hindi vyangya chinttan)



      लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी राजनीति में सक्रिय रहने वाले लोगों को आम जनमानस में प्रचार माध्यमों से अपनी छवि बनाने का प्रयास करना ही पड़ता है। इसी प्रयास में उन्हें कभी गंभीर तो कभी नाटकीय दृश्य उपस्थित करने ही होते हैं।  हम अपने देश में चुनाव राजनीति में सक्रिय लोगों की नाटकीयता देखकर उन पर प्रतिकूल टिप्पणियां कर सकते हैं पर यकीन मानिए जिस पाश्चात्य समाज से हमने लोकतंत्र का ज्ञान  उधार पर लिया है वहां भी इसी तरह ही सब चलता रहता है। 
      चूंकि चुनावी राजनीति में सक्रिय लोगों को जनमानस में प्रचार माध्यमों के साथ ही आम सभाये आदि भी करनी होती हैं तो उनमें पैसा तो खर्च होता ही है और इसके लिये उनको धनपतियों से चंदा लेना ही पड़ता है।  हमारा मानना यह है कि इसमें भी कोई बुराई नहीं है।  पहले राजतंत्र के दौरान साहुकारों, सामंतों और जमींदारों को अपने राजा के सामने जाकर तोहफे साथ लेकर सलाम ठोकना पड़ता था।  यह अलग बात है कि वह राजा पर अपने व्यवसायिक हितों के अनुकूल चलने के लिये वह बाध्य नहीं कर सकते थे।  राज्य व्यवस्था और राजा बचा रहे तो समाज बचा रहता है और साहूकारों, जमीदारों और सामंतों के लिये यही जरूरी है तभी उनकी आय तथा परिवार की रक्षा हो सकती है। 
      आधुनिक लोकतंत्र में धनपतियों को यही नीति अपनानी पड़ती है तो आश्चर्य नहीं है क्योंकि इससे भी राज्य की स्थिरता बनी रहती है। प्रारंभिक लोकतांत्रिक दौर में यह देखा  गया कि जनप्रतिनिधियों पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगते थे पर शनै शैन विश्व में महंगाई का प्रकोप बढ़ा और चुनाव लड़ना सहज नहीं रहा तो इन धनपतियों के हाथों पश्चिमी देशों के राजनेता भी नतमस्तक होने लगे। देखा जाये तो राजतंत्र की जगह लोकतंत्र की स्थापना का लाभ धनपतियों को ज्यादा मिला है क्योंकि इसमें कोई स्थाई राज्य प्रमुख नहीं रहता।  निश्चित अवधि के बाद बदलाव होता रहता है।  जिस व्यक्ति को पद पर बने रहना है वह इन्हीं धनपतियों का मोहताज हो जाता है।
      आजकल के धनपतियों का व्यवसायिक दायर इतना बढ़ गया है कि खेल, राजनीति, फिल्म, कला, साहित्य, और पत्रकारिता तक के क्षेत्र में उनका दबदबा दिखाई देता है।  तेल बेचने, खेल खेलने, फिल्म बनाने, टीवी चैनल चलाने, समाचार पत्र प्रकाशित करने तथा तथा धार्मिक कार्यक्रम करने के साथ ही अनेक छोटे बड़े धंधों में वह  विनिवेश करते हैं।  एक ही पूंजीपति अनेक प्रकार के धंधों में लगा रहता है। एक तरह से पूरा समाज ही उनकी पकड़ में हैं। ऐसे में अगर कोई केवल पूंजीपति है तो उसे प्रसिद्धि के लिये कोई अन्य काम करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में भ्रष्टाचार का व्यापक रूप में सामने आता है।  कौटिल्य का अर्थशास्त्र में राजा से राजकर्मियों के भ्रष्टाचार पर नजर रखने की बात कही जाती है पर अब लोकतंत्र में राजा हो नहीं सकता।  आधुनिक लोकतंत्र के प्रभाव से पूंजीपति ही एक तरह से राजा बन गये हैं। पूर्व काल में राजा के बाद सामंतों, साहूंकारों और जमीदारों का नंबर आता था। उस दृष्टि से देखें तो आज के पूंजीपति इन तीनों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और वही राजा बन गये हैं तब यह कहा जाना चाहिये कि अब एक राजा विहीन व्यवस्था है जिसे समाज की दृष्टि से खतरनाक ही कहा जा सकता है भले ही हम लोकतांत्रिक होने का दंभ पाल लें।
      चुनावी राजनीति में स्वयं को प्रजारक्षक साबित करने के लिये नाटकीयता का सहारा लेना ही पड़ता है। इस नाटकीयता से प्रचार माध्यमों को सामग्री मिलती है जिसे वह अपने विज्ञापनों के बीच प्रसारित कर सकते हैं।  इन्हीं प्रचार माध्यमों से जनता अपना मानस बनाती और बिगाड़ती है। पूंजीपति भी इसी आधार पर अपने चंदे की राशि का मापदंड तय करते हैं।  इस तरह नोट और वोट पाने के लिये इस लोकतांत्रिक नाटक में नाटकीयता नहीं होगी तो वह सफल नहीं हो सकता।  गड़बड़ वहां होती है जहां अतिनाटकीयता हो जाती है।
      दो तीन साल पहले अन्ना हजारे का आंदोलन चला जिसे प्रचार माध्यमों ने खूब भुनाया।  भारत में भ्रष्टाचार एक समस्या है और जनता उससे त्रस्त थी।  ऐसे में अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून पास करवाने के लिये आंदोलन छेड़ा।  लोगों की समझ में यह तो आया कि वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे हैं पर उनका जनलोकपाल कानून बनवाने का विषय आमजनों के लिये अगेय यानि समझ से परे रहा।  लोग एक जनहित वाली व्यवस्था तो चाहते हैं पर उसके लिये कानून वगैरह बनाने का विषय उनके लिये अगेय ही रहता है। वैसे भी अगर इच्छा शक्ति हो तो वर्तमान कानूनों के आधार पर भ्रष्टाचार पर कार्यवाही हो सकती है पर हमारे देश में आजादी से पूर्व ही कानून बनवाने के लिये आंदोलन कर लोकप्रियता प्रांप्त करने की परिपाटी भी रही है। यह अलग बात है कि व्यवस्था के कुप्रबंध के चलते सारे कानून धरे रह जाते हैं।  इस आदंोलन में नाटकीयता थी पर जब उसने अति की सीमा पारी की तो जनमानस हताश होने लगा जिससे अन्ना हजारे अपने तय कानूनी प्रारूप से कुछ पीछे हटे और मान गये जिससे वह बन गया। अन्ना का आंदोलन थमा तो उनके भक्तों ने अपना राजनीतिक अभियान प्रारंभ किया।  ऐसा लगता है कि उन्होंने तो एकदम पटकथा लिखकर ही अपने नाटकीय अभियान को प्रारंभ किया।  अब उसमें इतनी नाटकीयता आ गयी कि  लोग उनसे भी उकताने लगे।  यह अन्ना भक्त उस जनलोकपाल को जोकपाल कहते हैं जिस पर अन्ना सहमत हो चुके हैं।  अब तो यह जनलोकपाल का विषय लेकर पूरे देश में पहुंचाना चाहते हैं।  मगर मुर्गे की वही एक टांग! भ्रष्टाचार मुद्दा है पर जनलोकपाल अगेय विषय है। फिर इनकी अतिनाटकीयता उसी प्रचार पर्दे पर दिख रही है जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलवायी है। आंदोलनकारी से नायक बने इन अन्ना भक्तों को शायद यह पता नहीं है कि उनके प्रयास कभी कभी तो हास्य का भाव पैदा करते हैं। हालांकि राजनीति में कुछ भी कहना कठिन है पर एक बात तय है कि अतिनाटकीयता से उनको उसी प्रचार में हानि पहुंचेगी जिसने उनके नायकत्व का भाव बढ़ाया जो कि घटने लगा है।
      मजेदार बात यह है कि कभी लगता है कि अन्ना के राजनीतिक भक्तों के  किसी एक प्रयास उनका  प्रचार भाव बढ़ा तो किसी से घटा दिखता है। कभी कभी तो लगता है कि प्रचार माध्यमों के प्रबंधक चाहते हैं कि यह सब चलता रहे ताकि उनके पास विज्ञापनों के बीच समाचारों प्रसारण की सामग्री बनती रहे। सच बात तो यह है कि अगर इस तरह के नाटकीय समाचार प्रसारण वाली सामग्री न हो तो अनेक समाचार चैनल श्रोताओं और दर्शकों के लिये तरसत रहे जायेंगे।  यह अलग बात है कि इसमें अगर अतिनाटकीयता का भाव आया तो अंततः लोग उससे विरक्त हो जायेंगे। हालांकि लोकतांत्रिक व्यवस्था को धनपतियों ने एकदम ऐसी राजाविहीन व्यवस्था बना दी है जिसमें उनका व्यक्तित्वसर्वोपरि है और अन्य जनता उन्हें चुपचाप झेलती रहे, जिसे भेदने का प्रयास अन्ना के राजकीय भक्त कर रहे हैं उसमें यह  अतिनाटकीयता संकट नहीं बनेगी कहना कठिन है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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11/17/12

अपनी स्थितियों पर विदेश में आत्ममंथन करते रहना चाहिए-हिन्दी लेख

         आयरलैंड में एक भारतीय महिला दंत चिकित्सक की मौत चिकित्सकीय सुविधा के अभाव में हुई।  बताया जाता है कि वह महिला दंत चिकित्सक गर्भवती।  गर्भ की स्थिति बिगड़ जाने से गर्भपात आवश्यक था मगर कैथोलिक धर्माधारित राज्य व्यवस्था के कारण चिकित्सकों ने इलाज करने में लापरवाही दिखाई। कैथोलिक धार्मिक व्यवस्था में गर्भपात स्वीकार्य नहीं है।  यही कारण है कि चिकित्सक गर्भ में पल रहे बच्चे की सांस टूटने का इंतजार करते रहे और गर्भवती महिला चिकित्सक  उनसे अपने जीवन की याचना करते हुए स्वयं ही स्वर्ग सिधार गयी। इसमें दो तरह के बातें दिमाग में आती हैं। एक तो यह कि  आयरलैंड में संभवतः यह इस तरह का पहला मामला हुआ होगा जब किसी महिला का गर्भ बिगड़ा होगा और आयरलैंड के चिकित्सक धार्मिक भीरु हैं उनकी समझ में इससे अधिक कुछ समझ में नहीं आया होगा कि वह पहले गर्भ के बच्चे की चिंता करें और उससे धारण करने वाली महिला की बाद में। दूसरा यह कि चूंकि भारतीय महिला चिकित्सक के अपनी धर्म से प्रथक होने की वजह से उन्हें उसके बचाने के प्रयासों में उसके पति से धन्यवाद की औपचारिक भेंट और फीस पाने से  अधिक उनके समक्ष अपने धर्मभीरु होने का प्रमाण पेश करने की उत्सुकता अधिक रही होगी।
            हमारे देश के लोगों को अपने भारतीय धर्म का अभ्यस्त होने की वजह से इस वजह का आभास नहीं है कि विदेशी धार्मिक विचाराधारायें मनुष्य के हर निजी कार्य में हस्तक्षेप कर यह साबित करती हैं कि मनुष्य तो मूर्ख, लालची, कामी, क्रोधी और मोही पैदा होता है।  उसे सुधारने के लिये उसे हर पल का ज्ञान देना चाहिए।  इसके विपरीत हमारे देश के धर्म तथा समाज निरंतर स्थितियों के अनुसार चलने की प्रेरणा देता है। सबसे पहले अपनी तथा अन्य जीवों की देह रक्षा का संदेश देता हैं।  विकास और विज्ञान के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाला ही ज्ञानी होता है।  साथ ही हमारा अध्यात्मिक ज्ञान मानता है कि सभी लोग ऐक जैसे नहीं होते।  दैवीय तथा आसुरी दोनों प्रकृतियों के लोग समाज में रहते हैं।  एकदम सभी लोग ज्ञानी, त्यागी, निष्काम भावी और ईमानदार  नहीं हो सकते तो सभी मूर्ख, लालची और लोभी भी नहीं हो सकते।  इसके विपरीत  विदेशी धार्मिक मानती हैं कि उनके मार्ग पर चलने वाली ही देव हैं और बाकी सब असुर।  कहने का अभिप्राय यह है कि खुले में सांस लेने के आदी भारतीय लोग विदेशी नौकरी और वहां आकर्षण देखकर यह मान लेते हैं कि वहां हमारे जैसे ही लोग हैं।  ऐसे में उन लोगो को जो भारतीय धर्म से इतर विदेशी धार्मिक विचाराधाराओं पर चलने वाले देशों में जाते हैं तो उनको लगता है कि यहां हमसे बेहतर समाज है।  महिला चिकित्सक की मौत तो एक ऐसे राष्ट्र में हुई है जहां फिर भी प्रचार माध्यम कुछ आजाद हैं मगर जहां धर्मभीरु राष्ट्रों में कोई खबर वहां के शासकों के बिना बाहर जा नहीं सकती वहां रहने वाले भारतीयों के साथ जो होता है उनकी खबरें मिलती ही नहीं या इतनी विलंब से मिलती है कि उनपर प्रतिक्रिया देना बासी हो जाता है। 
    हमारे यह वर्तमान काल में विदेशी नौकरी की बहुत चाहत है।  पहले अप्रवासी दूल्हे लेने का फैशन भी चला पर अब पोले सामने आने लगी हैं। आगे चलकर इन नौकरियों का सच भी सामने आयेगा।
            चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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           शैलेले 'शैले न माणिक्यं भौक्तिकं न गजे गजे।
           साधवो न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने।।
           हिन्दी में भावार्थ-हर पर्वत पर माणिक्य नहीं मिलते। प्रत्येक हाथी के मस्तक पर मोती नहीं होते। सज्जन पुरुषों का निवास भी सभी जगह नहीं होता।  सभी वनों में चंदन नहीं उगता।

            कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययाऽगमौ।
            क कश्चाऽहं का च में शक्तिरिति चिन्तर्य मूहुर्ममूहुः।।
            हिन्दी में भावार्थ-समय कैसा है, मित्र कौन है, देश कैसा है, कमाई और खर्च की स्थिति क्या है, मैं कौन हूं और मेरी शक्ति कितनी है-यह ऐसे विषय पर हर मनुष्य को सदैव विचार करते रहना चाहिए।
  
            विदेशों में जाकर काम करना बुरा नहीं है पर हमेशा ही अपने स्वास्थ्य, धन, शक्ति और वहां की सामाजिक स्थितियों का भी अध्ययन करते रहना चाहिए।  हमारे देश में जब कोई स्त्री गर्भवती होती है तो उसके परिवार वाले बच्चे के जन्म तक सतत उसके स्वाथ्य पर नजर रखते हैं।  हमेशा सभी के  साथ बुरा नहीं होता पर आशंकाओं के चलते गर्भिणी स्त्री पर नजर रखी जाती है।  जीवन में कभी आनंद कभी निराशा तो कभी उत्साह कभी रोग का आक्रमण होता रहता है।  ऐसा नहीं है कि विदेशों में भारतीय लोग नहीं रह रहे पर जिन लोगों ने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को आत्मसात किया है वह संकट में विकल्पों का प्रबंध किये रहते हैं।  जिन लोगों ने केवल पाश्चात्य संस्कृति को ही जीवन का एक सत्य प्रमाण माना है मुश्किलों उनको तब होती है जब प्रतिकूल स्थितियां आती हैं  तब पता लगता है कि सब यहां वैसा नहीं है जैसा हम सोच रहे थे।
      विदेशों में रहने वाले लोगों का क्या कहें, अपने ही देश में अनेक लोग टीवी, मॉल, गाड़ियों और इंटरनेट की रंगीनियों में इतना खो गये हैं कि अध्यात्म तो छोड़िये उन सांसरिक विषयों कि मूल पर भी चिंतन नहीं करते जिनसे उनका वास्ता पड़ता रहता है।  उनकी नाक, कान और आंखें बाहर की तरफ इतनी व्यस्त हैं कि आत्ममंथन करने का न उनको समय मिलता न उन्हें परवाह है।  जिन्हें जीवन सहजता से जीना है उनको निरंतर भारतीय अध्यात्म ज्ञान का अध्ययन करते रहना चाहिए।  विदेशों के भूगोल को सभी जानते हैं पर वहां के इतिहास की भी जानकारी रखना चाहिए। भारत में पाश्चात्य विचारधाराओं के समर्थक अपने देश के इतिहास की क्रूरतम घटनाओं को सुनाकर यह साबित करते हैं कि हमारा समाज असभ्य है पर जिन ज्ञानियों ने पश्चिमी इतिहास पढ़ा है वह जानते हैं कि वहां यहां से भी अधिक कू्रर और असंवेदनशील समाज रहा है।  समय के साथ अगर यहां बदलाव आया है तो वहां भी आया है इसके बावजूद अनेक ऐसी कड़वी सच्चाईयां सामने आती है जो इतिहास की पुनरावृत्ति भर होती है।



लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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8/13/12

इंसान और अफसोस-हिन्दी कविता (insan ka fasos-hindi poem or kavita)


मिट्टी से बना इंसान
रात और दिन में चलता बुत की तरह
कोई उनमें शाह नहीं होता,
समंदर जैसी लहरें उठती हैं मन में
पर पिंजरे में बंद है, वह अथाह नहीं होता,
कहें दीपक बापू
भलाई बेच रहे लोग
अपना घर भरने के लिये
महफिलों में गरीबी पर  अफसोस के सुर
गाये जाते मजे के लिये
मगर गरीब का कोई हमराह नहीं होता।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ग्वालियर


कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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3/23/12

विक्रम संवत् 2069 प्रारंभ होने पर बधाई-हिन्दी लेख (vikrami sanvat 2069 and indian culture-hindi article on new year)

                 आज से हिन्दू वर्ष विक्रम संवत् 2069 प्रारंभ हो गया है। हमारे देश में पश्चिमी सभ्यता, परिधान, खान पान, रहन सहन, शिक्षा तथा विचाराधाराओं ने इस तरह प्रभाव डाला है कि समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग इस बात से बेखबर रहता है कि उसका अपना भी कोई सांस्कृतिक तथा सभ्यता का आधार है। ईसवी नववर्ष प्रारंभ होने पर जहां चहुंओर नववर्ष की बधाई का क्रम चलता है वहीं भारतीय संवत् के प्रारंभ होने पर केवल अध्यात्म से जुड़े लोगों के बीच ही चहल पहल दिखाई देती है। आज से ही नवरात्रि भी प्रारंभ हो गयी है। इस अवसर पर जहां धार्मिक श्रद्धालु मंदिरों में सुबह जल और फूल चढ़कार अपनी हार्दिक अभिव्यक्ति प्रकट करते हैं।
            हम यह नहीं कहते कि पाश्चात्य संस्कृति अपनाने में बुराई है पर यह स्पष्ट कर देते हैं कि भाषा और भाव का भूमि से संबंध होता है। जिस तरह रेगिस्तान में ऊंट का महत्व है उसी तरह हरित प्रदेश में गाय बैल की उपस्थिति स्वाभाविक रूप से देखी जाती है। रहने को तो लोग मरुभूमि में भी रहते हैं तो बर्फीली जगहों पर भी मानव बस्ती देखी जाती है। दोनों जगहों पर मनुष्य का मूल स्वभाव प्राकृतिक रूप से भले ही एक जैसा दिखता हो पर रहन सहन के कारण विचार तथा व्यवहार में अंतर परिलक्षित होता है। हम इसे बदल नहीं सकते पर देखा जा रहा है कि हमारे यहां का बुद्धिमान वर्ग समाज में अप्राकृतिक परिवर्तन की जोरदार कोशिश करता है। जहां अंग्रेजी पैदा हुई वहां हिन्दी की धारा प्रवाहित कर जहां वह खुश होना चाहता है वहीं जहां हिन्दी की जड़ें हैं वहां अंग्रेजी का फूल खिलाने का प्रयास कर रहा है। चूंकि बाज़ार, प्रचार तथा प्रकाशन के संस्थान उसके संरक्षक है इसलिये यह वर्ग समाज को अपने हिसाब से प्रभावित कर रहा है। ऐसे में केवल वही लोग इसके प्रभाव से बचे हैं जो भारतीय अध्यात्मिक के साथ हृदय के साथ जुड़े हैं। वरना तो इस वर्ग ने अपने मार्ग दर्शन में समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को भटकाव की राह पर ला दिया है। यह वर्ग पश्चिम और पूर्व के बीच हतप्रभ होकर खड़ा दिखता है।
           अभी एक बहुत बड़े अध्यात्मिक गुरु ने कहीं कह दिया कि सरकारी स्कूल नक्सलवादी पैदा कर रहे हैं। उनको बंद कर देना चाहिए। इस पर जमकर विवाद उठा। चूंकि इससे सनसनी फैल सकती थी इसलिये इस खबर को हाथों हाथ उठा लिया गया। हमें हैरानी हुई। उस अध्यात्मिक गुरु ने बिना किसी शोध या अध्ययन के ऐसी बात कही जिसका कोई आधार नहीं है पर हमारे प्रचार माध्यम आखिर उसका प्रचार क्यों कर रहे थे? क्या इस आड़ में निजी स्कूलों का प्रचार हो रहा था। यह बात एक अध्यात्मिक गुरु ने कही थी और यकीनन उनके भक्त उनकी बात को धारण करेंगे। हमारे यहां गुरु भक्ति का संस्कार इस तरह स्थापित किया गया है कि परमात्मा के प्रति श्रद्धा गौण मान ली जाती है। यह अलग बात है कि उनकी संख्या कम है। हम इसे अध्यात्म की आड़ में एक ऐसा व्यवसायिक प्रयास कह सकते हैं जो आजकल अनेक लोग कर रहे हैं। इस अवसर पर हमारा इरादा भारतीय शिक्षा पद्धति पर लिखने का था पर ऐसा लगा कि यह व्यर्थ होगा। हमारा यह विचार नकारखाने में तूती बजने जैसा होगा। भारतीय शिक्षा पद्धति में इतने छेद हैं कि इसे बदलने के लिये अनेक लोग मांग करते हैं पर वह इस शिक्षा पद्धति से शिक्षित होने के कारण मौलिक सोच की शक्ति खो चुके हैं इसलिये कोई दूसरा मार्ग उनको नहीं  सूझता। भारतीय शिक्षा पद्धति आदमी को इस कदर गुलाम बना देती है कि वह तो सरकारी नौकरी ढूंढता है न मिलने पर वह किसी पूंजीपति का मुर्गा भी बन जाता है।
      अगर हम अपने देश को यहाँ के लोगों  की दृष्टि से गौरवपूर्ण देखना चाहते हैं तो सबसे पहले भारतीय अध्यात्म में उसके सूत्र ढूंढने होंगे। हम देख रहे हैं कि आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा साहित्यक शिखरों पर बैठे लोग विश्व की दृष्टि में अपने देश को गौरवशाली होते देखना चाहते हैं पर क्या वह कभी सोचते हैं कि यहीं रहने वाले लोगों की दृष्टि में अपना देश क्या बना गया है? अगर वाकई यह देश यहां के लोगों की दृष्टि में गौरवशाली होता तो फिर हमारे यहां भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का ऐसा प्रभाव नहीं होता औ और लोकपाल बनाने का विचार जन्म नहीं लेता। तय बात है कि हमारी कार्यशैली तथा विचारों में विरोधाभास है।
इस अवसर पर अपने ब्लॉग लेखक और फेसबुक पर सक्रिय मित्रों तथा पाठकों को बधाई। इस कामना के साथ कि उनका नववर्ष मंगलमय हो।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/9/12

फेसबुक पर वार्तालाप में भाषा का तोतलापन अखरता है-हिन्दी लेख (fecebook par vartalap mein bhasha ka totlapan akharta hai-hindi lkeh)

        फेसबुक पर आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि पुराने लोग भी सक्रिय हैं पर उनमें अधिकतर लेखक नहीं है इसलिये हिन्दी साहित्य की परंपराओं के ज्ञान का उनमें अभाव है। ऐसे में नयी पीढ़ी के लोगों से यह अपेक्षा तो करना कठिन है कि वह उन्हें समझ सकें खासतौर से जब वह स्वरचनाकर्म से अधिक कट पेस्ट यानि किसी का पाठ उठाकर अपने पृष्ठ पर रखने के आदी हों। हमारे प्रचार माध्यमों ने तो नयी पीढ़ी में यह बात स्थापित कर दी है कि ब्लॉग, ट्विटर या फेसबुक पर केवल आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, फिल्म, टीवी तथा कला क्षेत्र के शिखर पुरुष ही लिखते हैं और उनकी ही परवाह करना चाहिए। आम लेखक तो फोकटिया हैं और उनकी कोई बात सम्मानीय या पठनीय नहीं है।
       यही कारण कि फेसबुक तथा ब्लॉग पर जब हमने अपनी रचनायें बिना नाम के देखीं तो वहां प्रतिकूल टिप्पणियां लिखीं। ऐसा लगता है कि बजाय प्रतिकूल टिप्पणियां करने के साथ उनको यह बात समझाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में साभार रचनायें लेने की परंपरा है। उसमें लेखक का नाम अवश्य दिया जाता है। जिन टीवी चैनलों के पास किसी खास समाचार का दृश्यव्य प्रसारण नहीं है वह दूसरे से साभार लेते हैं। हालांकि यह उदाहरण समझाने के लिये पर्याप्त या उचित नहीं है। हिन्दी टीवी चैनल साभार प्रसारण लेते हैं पर वह या तो विदेशी चैनल का या फिर देश का अंग्रेजी चैनल हो। मतलब यह कि हिन्दी वाले की हिन्दी से सोतिया डाह तो रहती ही है। यह बात इंटरनेट पर भी दिखाई देती है जब चोरी के पाठ प्रकाशित होते दिखते हैं।
         बहरहाल फेसबुक पर एक वेबसाईट संचालिका ने हमसे अपने पाठ प्रकाशित करने की अनुमति मांगी तो हमने उसे सहर्ष नाम प्रकाशित करने की शर्त पर दी। उसने ऐसा किया भी! उसकी इस क्रिया पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। दरअसल उसने भ्रष्टाचार पर उस कविता को ही लिया जो कि हमारी इस विषय पर लिखी गयी सबसे हिट कविता है। इसी कविता ने एक नहीं दो ब्लॉग को हिट बना रखा है। हमें यह देखकर हैरानी हो रही है कि केवल ब्लॉग को नियमित या अपडेट बनाये रखने के लिये लिखी गयीं कविताओं ने अधिक पाठक जुटायें हैं बनिस्बत उन बड़े लेखों के जो बड़े मनोयोग से लिखे गये। इसका कारण यह भी है कि नयी पीढ़ी के युवा ज्यादा समय खराब करने के थोड़े समय में अधिक पढ़ना चाहता है। वह कहानी भी कविता में पढ़ना चाहता है। अगर विषय गंभीर हो तो एक लघु कथा लिखने से काम चल सकता है पर हास्य हो तो कविता ही ठीक जमती है।
          हमें इंटरनेट पर सक्रियता से जहां खुशी मिली वहीं इस बात का दुःख भी होने लगा है कि नयी पीढ़ी भाषा के लिहाज से तोतली हो रही है। रोमन लिपि में अंग्रेजी और हिन्दी का मिश्रण प्रसन्नता नहीं दे सकता। हैरानी की बात है कि हिन्दी टूलों की उपलब्धता के चलते यह हो रहा है। खासतौर से जब यह जीमेल पर ही उपलब्ध हो और प्रयोक्ता उसके उपयोग में असमर्थ हों। लड़के लड़कियां अगर यह सोच रहे हैं कि वह अभिव्यक्त होकर कोई बड़ा नाम करेंगे तो वह गलतफहमी में हैं। फेसबुक पर लिखने के बाद प्रतिक्रियायें मिल जाती हैं पर कालांतर में वह भी बोरियत लगने लगेगी। फेसबुक पर तो यह आशा करना ही बेकार है कि कोई अपने अभिव्यक्त होने की लंबी पारी खेल सकता है। इससे अच्छा तो यह है कि ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर ब्लॉग लिखकर प्रयास करना श्रेयस्कर है। फेसबुक में केवल अपने समूहों से जुड़े हुए लोग ही साथी होते हैं जबकि ब्लॉग एक सार्वजनिक पत्रिका की तरह उपयोग में लाये जा सकते हैं। जिन युवक युवतियों में मन में हिन्दी लिखने का आनंद प्राप्त करने की इच्छा है वह फेसबुक के साथ ही ब्लॉग जरूर बनायें। कुछ समय तक उनको टिप्पणियां मिलेंगी पर बाद में बंद हो जायेंगी मगर सर्च इंजिनों में वह हमेशा जीवंत बना रहेगा। ऐसे में अगर केवल अपने अंदर बैठे लेखक को जिंदा रखने के लिये एकांत यात्रा करनी होगी। हालांकि ब्लॉग पर फेसबुक की तरह लिखना अधिक परिणामदायक नहीं रहेगा ऐसे में हिन्दी टूलों के साथ प्रभावी हिन्दी का भी ज्ञान रखना होगा। वह केवल पुराने लेखकों की रचनाओं से मिल सकता है। नये लेखकों ने तो अंग्रेजी का मिश्रण करना प्रारंभ कर दिया है।      
              फेसबुक पर पिछले एक दो महीने से हम अधिक सक्रिय रहे हैं। वहां अपने ब्लॉग के लिंक देखने अक्सर जाना होता है। अनेक महानुभावों ने संपर्क किया है। उनसे चैट में भाषा का तोतलापन अखरता है। हम आपसी संवाद पर अपने साथियों पर कोई आक्षेप नहीं कर रहे पर इतना तय है कि यह रोमन लिपि में लिखना या पढ़ना हमको तोतलापन लगता है। चूंकि लेखक हमेशा भावुक होता है इसलिये हमारे लिये वार्तालाप के समय टिप्पणियां करना ठीक नहीं लगता। यह सही है कि ऐसे संवाद के समय शीघ्रता होती है इसलिये कही दूसरी जगह से कट पेस्ट करने में देरी करना अच्छा नहीं लगता है पर अभ्यास हो जाये तो कुछ भी असहज नहीं है। हिन्दी तो फिर भी सरलता से लिखी जाती है पर चीनी लिखने में कठिन है मगर फिर भी चीन के नागरिक उसमें लिखते हुए संकोच नहीं करते। हमारा उद्देश्य आक्षेप करना नहीं बल्कि नयी पीढ़ी के लोगों को यह समझाना है कि भाषा की कमी उनकी अभिव्यक्ति को कमजोर बनाने के साथ विचार को क्षणिक आवेग के रूप में प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात आत्मीयता का वैसा संबंध वह कभी नहीं बना सकती जैसे कि हमारे अपने साथ ब्लॉग लेखकों के साथ प्रभावी हिन्दी के कारण बने।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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12/14/11

आओ भोग रोग और योग पर चर्चा करें-हिन्दी लेख (bhog rog aur yog par charcha-hindi lekh or article)

           भारत में विश्व की करीब बीस प्रतिशत आबादी है पर हृदय रोगियों की संख्या पचास फीसदी हो गयी है। देश के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा अंतर्राष्ट्रीय विषयों में मस्त रहने वाला हमारा समाज शायद ही इस पर चिंतित होता दिखा रहा है। इसके अलावा आये दिन मधुमेह, चर्बी, सांस तथा अन्य रोगियों की संख्या भी निरंतर बढते रहने के आकंड़े आते रहते हैं पर शायद ही कोई बहस इस पर होती है कि हमारा समाज स्वास्थ्य की दृष्टि से कितना खोखला होता जा रहा हैं उससे भी हैरानी की बात यह है कि अनेक मनोविज्ञानिक विशेषज्ञ तो यह भी कहते हैं कि देश की आबादी का एक बहुत बडा मनोविकारों का शिकार है पर इलाज की यह स्थिति है कि मनोरोगी न स्वयं यह बात जानते हैं न उनके परिजन इसे स्वीकार करते हैं। ऐसे में हम जब ज्वलंत विषयों पर चर्चा करते हैं तो वह कहना कठिन होता है कि सामने वाला मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति है।
       समाज में हम जब दैहिक तथा मानसिक रोगियों की जो स्थिति देख रहे है तो अत्यंत चिंताजनक है। अपने आसपास के लोगों से व्यवहार करते समय उनसे हम सतर्कता बरतें पर यह तभी संभव है कि हम यह जान पायें कि वह रोगी है। किसी को कोई दैहिक काम दें तो यह पता लगाना कठिन है कि वह उसे कर पायेगा या नहीं। उसमें क्षमता है कि नहीं। साथ ही जब किसी के साथ आपसी संवाद करें तो यह कहना भी कठिन है कि वह मानसिक विकार से ग्रसित है कि नहीं। सच बात तो यह है कि अब पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति ढूंढना कठिन है जबकि हम अपने समाज को एक शक्तिशाली होने का भ्रम पाल रहे हैं।
       एक नहीं ऐसी बल्कि कई ऐसी घटनायें हो रही हैं कि लोग मोटर साइकिल या कार लेकर रास्ते पर निकल पड़ते हैं। खाली मार्ग देखकर अनौपचारिक रेस लगाने लगते हैं बिना यह विचारे कि आगे कोई दूसरा वाहन हो सकता है या कहीं कोई गड्ढा या पेड आ सकता है। किसी दूसरे वाहन से टकराव हो सकता है। नतीजा दुर्घटनायें होती है। इसमें कई जवान मौतें हो चुकी हैं। अगर आप ऐसे वाहन चालकों की मनोविज्ञानिक स्थिति का पता लगाये तब उनका कोई परिजन नहीं मानेगा कि दिमागी रूप से वह अस्वस्थ थे पर मनोविज्ञानिक मानते हैं कि यह सब मनोविकारों का नतीजा है। सवाल यह है कि हमने आखिर सभ्य और स्वस्थ मानव के लिये कौनसे मानक तय किये हैं। हमारे एक योगाचार्य कहते हैं कि बढ़ती दुर्घटनायें इस बात का प्रमाण है कि लोगों का आज्ञाचक्र स्वभाविक ढंग से काम नहीं करता है।
          पश्चिमी रहन सहन के चलते लोगों की जीवन शैली में बदलाव आया है पर हमारी जलवायु वैसी नहीं है जैसे कि अमेरिका या यूरोप में है। कभी सर्दी और गर्मी का मौसम तो कभी बरसात अपना उग्र रूप दिखाती है। लोगों ने आनंद लेने के लिये तौर तरीकों में ंपरिवर्तन किया है। शोरशराबा करना और भीड़ लगाकर अपने वैभव और व्यक्तित्व का प्रदर्शन करने की बढ़ती प्रवृत्ति ने लोगों को विलासी बना दिया है।       इन्हीं विलासिता पूर्ण साधनों के एकत्रीकरण के लिये अपराध भी बढ़ा है।
            पहले तो धनवानों के लिये राजरोगों का भय था पर भोजन, जल, तथा औषधियों के नकली या मिलावटी होने की वजह से अल्प धनियों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है। ऐसे में हम जब आर्थिक विकास की बात करते हैं तो हंसी और निराशा दोनों ही आती है। अध्यात्मिक विकास की बात को एकदम नकार दिया गया है। कहीं कहंी तो धर्म के नाम पर भी आदमी की अध्यात्मिक भूख शांत करने के लिये नृत्य संगीत और गीतों का सृजन फिल्मी तर्ज पर हो रहा है। ऐसे में लगता नहीं है कि हम अपने पुराने समाज को याद करते हैं जो सीमित साधनों में प्रसन्नचित्त रहता था। अगर यही विकास है तो फिर हमें मानना चाहिए कि यह विकृत विकास है जिसमें मानव सभ्यता चमकदार दिखाई देती है पर दरअसल वह विनाश की तरफ बढ़ रही है।
        आज हमारे समाज में योग के प्रति रुझान इसलिये नहीं बढ़ा कि उसकी शक्ति की व्यापकता को लोग समझ रहे हैं बल्कि वह अपने भोगों से उत्पन्न विकारों से मुक्ति पाने वाली दवा के रूप में इसे मान रहे हैं। यही कारण है कि प्राणायाम तथा आसनों का प्रचार अधिक हो रहा है जबकि ध्यान के साथ धारणा को एकदम भुला दिया गया है। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा समाज आधुनिक भोगों के साथ जीना चाहता है और भारतीय अध्यात्म से उसका बस इतना ही संबंध है कि वह इसके लिये अधिक शक्ति प्रदान करे। सीधी बात कहें आधुनिक भौतिकतवाद के प्रति समाज का आकर्षण चरम पर है जो अंततः उसके विनाश का कारण बन सकता है। यह अलग बात है कि दर्द पूरे समाज को एक साथ नहीं होता। टुकड़ों टुकड़ों में होता है। जख्म होता है तो धीरे धीरे उसका दर्द कम होता है पर दूसरे को होता है तो वह कराहता है और पहले वाला उसे देखता है। इस तरह क्रम चल रहा है। इस बात का कौन ध्यान रखता है कि आजकल जवान मौतों का सिलसिला अधिक हो गया है और उसे रोका जाना चाहिए। कहने वाले तो कह सकते हैं कि मौत तो किसी भी आयु में हो सकती है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
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12/9/11

फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर पर सक्रियता में खास और आम जनमानस-हिन्दी लेख (facebook,blog,twitter and coman man-hindi lekh or article)

            अगर हम व्यक्ति की अभिव्यक्ति को उसके अंतर्मन की सही स्थिति माने तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि वह वैसा ही जैसा शब्द लिखता है या बोलता है। बोलना लिखने से ज्यादा आसान है इसलिये लोग बोलते ज्यादा लिखते कम हैं। इस पर जब लिखने की बाध्यता हो तब कोई भी आदमी चिंता में पड़ जाता है और उसका चिंत्तन हवा होकर उसे शून्य में धकेल देता है। हम बात कर रहे है इंटरनेट पर अभद्र शब्द लिखकर नाम कमाने वालों की उस प्रवृत्ति का, जो अब आम हो गयी है। गाली गलौच और या खालीपीली का मजाक इस बात को दर्शाता है कि आदमी में विवेक की कमी है। फेसबुक, ट्विटर, ब्लाग या वेबसाईटों पर अनेक बार ऐसे शब्द देखने को मिलते है जब लगता है कि अविवेकी लोगों का एक बहुत बड़ा समूह इंटरनेट पर अपनी भड़ास निकालने के लिये सक्रिय हो गया है। इनसे निजात पाना संभव नहीं है पर इतना तो अवश्य किया जा सकता है कि इनकी टिप्पणियों को अपने पृष्ठों पर जगह ही नहीं दी जाये।
             पहले ब्लाग, फिर ट्विटर और ऑरकुट पर लोगों की सक्रियता इतनी नहीं थी पर अब फेसबुक ने एक तरह से आम जनमानस को इससे जोड़ दिया है। देखा जाये तो ब्लॉग पर लोगों की सक्रियता कम हो गयी है पर वास्तव में अपनी बात को प्रमाणिक ढंग से कहने वालों के लिये वही एक जोरदार जगह बनी हुई है। जिन लोगों को टिप्पणियों का इंतजार नहीं है और न ही व्यवसायिक रूप से अपनी सफलता दिखाने की बाध्यता है उनके लिये ब्लॉग पर लिखना स्वयं की रचना करने की भूख शांत करने का एक शानदार माध्यम है। फेसबुक ने नयी पीढ़ी को तेजी से इंटरनेट की तरफ आकर्षित किया है। इसका कारण यह है कि उसमें आपसी संपर्क, संवाद, तथा संदेश प्रेषण का यह एक जोरदार माध्यम बना है। त्वरित प्रतिक्रिया के साथ ही अपने आत्मीय, प्रिय तथा मैत्री संपर्कों को निरंतर सक्रियता देखकर एक प्रसन्नता का अनुभव होता है। इस लेखक ने बहुत दिनों तक फेसबुक पर खाता बनाकर उसे देखा तक नहीं पर अपने कुछ प्रियजनों के साथ जब संपर्क हुआ तो ऐसा कोई दिन नहीं होता कि उसे न देखते हों। पहले फेसबुक के प्रति उदासीनता का भाव इसलिये था क्योंकि वहां अपने खालीपन को बिताने का कोई विषय नहीं था। कुछ आत्मीय जनों की सक्रियता देखकर प्रसन्नता होती है। यह एक आम व्यक्ति की स्थिति है पर जब हम अपने लेखकीय स्वरूप के साथ इंटरनेट पर आते हैं तब फेसबुक एकदम सीमित साधन लगता है। आत्मीय, प्रिय तथा मै़त्री भाव वाले लोग हमारे साहित्यरूप से स्नेह नहीं करते बल्कि व्यक्तिगत व्यवहार के प्रति उनका आकर्षण होता है। ऐसे में उनके साथ हास्य कवितायें, निबंध, लेख तथा व्यंग्य जैसे विषय साझा करना अपने को ही मजाक लगता है। हमारी रचना का उद्देश्य अपने साथ जुड़े पाठकों तक अपना संदेश पहुंचाना होता है जो हमारी व्यक्तिगत छवि नहीं देख पाते। एक लेखक वाह वाह या हाय हाय की परवाह किये बिना ही आगे बढ़ सकता है। ऐसे में व्यक्तिगत संपर्क उसके लिये सीमित दायरा होता है पर आम जनमानस अपने समूह के साथ जुड़ना ही एक जोरदार माध्यम बन जाता है।
          बहरहाल फेसबुक ने अनेक प्रकार के समूह बनाये हैं। इन समूहों की वजह से व्यवसायिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक संगठनों ने इसमें घुसकर अपना हित साधने का लक्ष्य बना लिया है। तय बात है कि यह संगठन आपस में प्रतिस्पर्धा रखते है और उनके अनुयायी एक दूसरे के साथ शाब्दिक द्वैरथ करते हुए कभी कभार मर्यादा का उल्लंघन कर जाते हैं। इन संगठनों के साथ जुड़े लोगों में आमजनमानस के मुकाबले कहीं अधिक आत्मविश्वास है इसलिये वह अपनी अभिव्यक्ति में गुस्सा खुलकर व्यक्त करते हैं तो गाली गलौच और मजाक भी कर जाते हैं। आम जनमानस ऐसा नहीं कर सकता। खासतौर से प्रबुद्ध वर्ग का व्यक्ति हमेशा अपनी छवि को लेकर जस तरह सतर्क रहता है इसलिये वह ऐसी हरकतें नहीं कर सकता। हम अपनी छह साल के अनुभव इंटरनेट पर सबकुछ जानने का दावा तो नहीं कर सकते पर इतना अवश्य कहेंगे कि इंटरनेट पर पेशेवर वर्ग ने ही अश्लीलता को प्रोत्साहन दिया है। एक तरह से उन्होंने यह संदेश दिया है कि अगर आप गाली गलौच कहीं नहीं दे सकते या गुस्सा व्यक्त करने का आपके पास कोई मंच नहीं है तो आप इंटरनेट पर इसके लिये एकांत साधना कर सकते हैं। यह अलग बात है कि इस एकांत साधना पर इन्हीं व्यवसायिक इंटरनेट कर्मियों की नज़र रहती है। संभवत यह पेशेवर इंटरनेट कंपनियों, टेलीफोन उपक्रमों तथा प्रचार समितियों के हो सकते हैं जो शायद ब्लॉग, टिवट्र और फेसबुक पर प्रारंम्भिक टिप्पणियां कर प्रयोक्ता को प्रोत्साहित करने का काम करते हैं। इसके बाद आता है राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा साहित्यक संगठनों तथा उनके शिखर पुरुषों के अनुयायियों का जो अपने द्वैरथ का संचालन यहां कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि इन लोगों ने मर्यादा की सीमाओं का उल्लंघन किया है इसलिये अब इंटरनेट पर पर नियंत्रण की बात कर रही है। कुछ लोगों को लगता है कि यह नियंत्रण इस हद तक जा सकता है कि आमआदमी की प्रतिक्रिया का मंच-ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक, ऑरकुट, तथा वेबसाईटें-टूट भी सकता है। अगर ऐसा है तो दुर्भाग्यपूर्ण होगा क्योंकि अंततः संगठित इंटरनेट प्रयोक्ता तो फिर अपने पुराने मंच-टीवी, अखबार तथा आम सभाऐं-ढूंढ लेंगे पर आम आदमी का क्या होगा जो ऐसे द्वैरथों में पहले तो पड़ता नहीं अगर पड़ता है तो अपनी औकात में रहता है। वह मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता पर उसके साथ अमर्यादित विषय सामग्री इस तरह साझा की जाती है कि उसे समझ में नहीं आता कि वह उसे कैसे रोके-याद रखने वाली बात यह है कि अनेक लोग इस बात को नहीं जानते कि वह अपने यहां आयी सामग्री को प्रतिबंधित कैसे करें?
     वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने अपनी छवि से ढेर सारे ऐसे इंटरनेट प्रयोक्ताओं को जोड़ रखा है जो आम श्रेणी में आते हैं। ऐसे लोग इन पर इन दोनों महानुभावों पर इंटरनेट के चश्में से नज़र रखते हैं पर वह इनके समर्थन में अमर्यादित सीमाओं के पार नहीं जा सकते। अगर कोई सीमा के पार जा रहा है तो यह बात तय है कि वह संगठित क्षेत्र का प्रयोक्ता है जिसे अपने साथ अनेक लोगों के साथ होने का आत्मविश्वास है। आमजनमानस में यह आत्मविश्वास नहीं होता कि वह गाली गलौच का इस्तेमाल करे या फिर किसी बड़ी हस्ती की मजाक उड़ाये। अतः इंटरनेट पर नियंत्रण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि आम जनमानस के मन में कोई आतंक न पैदा हो। अगर ऐसा हुआ तो इंटरनेट से लोग दूर होना प्रारंभ कर देंगे तब जो हानि होगी उसका आभास अभी नहीं है।
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11/20/11

स्वामी रामदेव को समझाने की बजाय खुद समझें-हिन्दी लेख (swami ramdev and patanjali yog sasnthan in haridwar-hindi lekh or article)

            आज सुबह अपनी ही आनंद नगर कॉलोनी के पर्यटन में पतंजलि योग संस्थान के सानिध्य में आयोजित एक सात दिवसीय योग शिविर का उद्घाटन शिविर को देखने का अवसर मिल गया। बाबा रामदेव तो नहंी थे पर उनकी अनुपस्थिति कोई मायने भी नहीं रखती क्योंकि जो योग साधना का अभ्यास करवा रहे थे वह योग्य शिक्षक लगे। सिंहासन और हास्यासन का आनंद पूरी तरह लिया। यह आनंद तब दोगुना लिया जा सकता है आप योग साधना निरंतर करते हों। भारतीय योग संस्थान के योग शिविर में-जो वह बिना किसी प्रचार के आयोजित करता है-भी इस तरह का योगाभ्यास कराया जाता है पर वहां कम लोग ही पहुंचते हैं। इसका कारण यह है कि उसके शिविरों में कोई प्रसिद्ध हस्ती का नाम नहीं जुड़ा। पतंजलि योग संस्थान के नाम से स्वामी रामदेव का नाम जुड़ा हैै और यही कारण है कि उसके शिविर अधिक से अधिक लोग जुटा लेते हैं। यह अलग बात है कि वह स्थाई नहीं होते जबकि भारतीय योग संस्थान के शिविर नियमित रूप से चलते हैं।
यह लेखक न तो बाबा रामदेव का शिष्य है न ही उनका समर्थक पर इसके बावजूद उनके योग प्रचार से प्रसन्नता होती है। इस प्रसन्नता का कारण समाज के प्रति निष्काम प्रेम है। नौ बरस नितांत योग साधना कर चुकने के बाद आदमी का मन कैसे होता है, यह वही समझ सकता है जिसने किया हो। दूसरी बात यह भी है कि चार बरस से श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन के बाद इस बात का अनुभव हुआ कि जब तत्वज्ञान का आभास हो जाता है तब आदमी निरंकार दृष्टा होकर चिंतन करता है। ऐसे में शुभकर्म करने वाला कोई अन्य व्यक्ति क्यों न हो तत्वज्ञानी उसकी प्रशंसा करेगा।
        दरअसल यह लेख अगर एक दिन पहले लिखते तो शायद इस शिविर की चर्चा नहीं होती। इस लेख को लिखने का मूल उद्देश्य स्वामी रामदेव के कृत्तिव पर प्रकाश डालना जरूरी है। यह विचार स्वामी अग्निवेश के एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार को देखने सुनने के बाद आया।
         पहले स्वामी अग्निवेश की बात कर लें। वह 73 वर्ष के हैं यह बात कल उनके श्रीमुख से पता चली। इसका मतलब यह कि वह अन्ना हजारे से एक वर्ष छोटे हैं। अग्निवेश जी की आयु देखकर मन श्रद्धा से इसलिये भर गया क्योंकि उनके चेहरे और देह से वह इतनी बड़ी आयु के नहीं दिखते। उन्होंने इसका राज संयम बरतने को बताया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अपने ही साथियों के प्रति उनका जो बर्ताव टीवी चैनलों पर दिखाया गया उससे उनकी छवि खलनायक की बनी। इतना ही नहीं अमरनाथ को लेकर हिन्दू समाज पर उनकी टिप्पणी ने भी उनकी छवि खराब की थी। चूंकि हमने पहले भी कहा है कि बाज़ार और प्रचार समूह अपने प्रायोजित आदमी की छवि बनाने और बिगाड़ने का काम करते हैं और स्वामी अग्निवेश कहीं न कहीं उनके ही नायक हैं। संभव है कि स्वामी अग्निवेश को इसका आभास न हो बल्कि उनके पर्दे के पीछे सक्रिय साथी उनकी गतिविधियों का जिम्मा लेकर काम चला रहे हों पर यह तय है कि कहीं न कहीं उनके साथ बाज़ार का समर्थन है। यही कारण है कि छवि खराब होने के बाद उसे सुधारने के लिये उनको बिग बॉस में लाया गया और अब तमाम तरह के साक्षात्कार प्रसारित हो रहे हैं। हमने अपने पहले के पाठों में उनकी आलोचना की है पर कल के साक्षात्कार ने उनके प्रति हमारे मन में आकर्षण पैदा किया। सबसे पहले तो उनकी इस बात के लिये प्रशंसा कर चाहिए कि उन्होंने अपने संयम से आयु को मात दी है। मतलब उनसे भी सीखने लायक कुछ है। उन्होंने एक बात स्वीकार की कि अहंकारवश उन्होंने अपने साथियों के प्रति भूल की तो उनके साथी भी अहंकार में रहे हैं। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया पर प्रकृतियों से द्वंद्व की बात मानी। वह आर्यसमाजी हैं यह भी एक अच्छी बात लगी। उन्होंने गीता का अध्ययन किया है यह भी लगा। अखरी तो बस एक बात वह यह कि वह बाबा रामदेव के प्रति दुराग्रह रखते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने स्वामी रामदेव के एक निकटस्थ आदमी से कहा था कि वह व्यापार से अलग होकर काम करें वरना उनके विरोधी गलतियां निकालकर बदनाम करेंगे।
        इसी साक्षात्कार में तीनों महिला संचालनकर्ता बार बार ढोंगी साधुओं का जिक्र इस तरह कर रही थीं जैसे कि भक्तों से पैसा लेने वाला हर साधु ढोंगी हो। इतना ही नहीं वह इस तरह बोल रही थीं कि आधुनिक साज सज्जा से काम करने वाले सारे संत केवल पैसे से काम रहे हों। स्वामी अग्निवेश भी लगता है कि इससे सहमत थे। हमारी बात यहीं से शुरु होती है।
        हम यहां बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता में कहीं नहीं लिखा हुआ है कि माया से परे रहो। सांसरिक कर्म से विरक्त होना ही सन्यास है। दरअसल श्रीगीता में कहा गया कि हमें दृष्टा और देह के ंअंतर को समझते हुए आत्मिक रूप से कहीं भी सांसरिक विषयों में लिप्त नहीं होना चाहिए। धन से दूर रहने की बात इसलिये भी गलत लगेगी क्योंकि उसमें दान आदि करने का भी महत्व बताया गया है। स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वह किसी को शिष्य नहीं बनाते। यह अच्छी बात है पर जो शिष्य बनाते हैं उन पर उनको आक्षेप करने का अधिकार नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि हम स्वामी अग्निवेश के अनेक कृत्यों से सहमत न होने के बावजूद उनके गुणों की चर्चा कर रहे हैं। यह श्रीगीता के ज्ञान की ही देन है। स्वामी अग्निवेश धर्मं के नाम पर ढोंग के विरोधी हैं। हम भी हैं। इसके बावजूद हम कर्मकांडियों के प्रति घृणा भाव नहीं रखते। यह घृणा मनुष्य के नकारात्मक भाव का प्रमाण है जो उसे दायरों में बांध देती है। स्वामी अग्निवेश को अधिक शिष्य मिलने भी नहीं थे। उनके साथ जो लोग भी है तो वह समर्थक होंगे प्रशंसक नहीं। अमरनाथ यात्रा पर उनकी टिप्पणियां सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना हमें पसंद नहीं था। दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करना अहंकार भाव दिखाना है जो तामस बुद्धि का परिचायक है। आयु में अग्निवेश हम से बड़े हैं इसलिये उनके प्रति हमारे मन में सम्मान है पर जहां अध्यात्म की बात आती है तो सबसे पहले यह देखना ही पड़ता है कि आदमी अपने ज्ञान के साथ कितना समय बिता रहा है।
      कुछ लोग शायद हमसे नाराज होंगे यह जानकर कि हम तो किसी भी साधु या संत को ढोंगी कहने के बाद मन में पछताते हैं। इसका कारण भी बताये देते हैं कि हम में इतनी कुब्बत नहंी है कि हम स्वामी रामदेव, आसाराम बापू, सुधांशु महाराज तथा मोरारी बापू की तरह अध्यात्म की शक्ति के सहारे इतनी भीड़ जुटा लें। जो भीड़ जुटती है उसमें सभी को अज्ञानी कहना भी तामस बुद्धि का परिचायक है क्योंकि हम स्वयं भी कुछ अच्छा सुनने की खातिर वहां जाते हैं। अगर कभी अवसर मिला तो स्वामी अग्निवेश की सभा सुनने भी जा सकते हैं यह जानते हुए कि वह हमारे मन को अप्रिय लगने की बात कर सकते है। हमारे अंदर ज्ञान और गुण की चाह है पर अपने ज्ञान के कारण यह यकीन भी है कि हम स्वामी अग्निवेश में भी ढूंढ निकाल सकते हैं। अगर धार्मिक संतों के पास काला धन है तो स्वामी अग्निवेश जी के कार्यक्रमों के आयोजक भी दूध के धुले नहीं हो सकते। इसके बावजूद हमें स्वामी अग्निवेश ने प्रभावित किया यह बात मानने में संकोच नहीं है। वह अरविंद केज़रीवाल के और अन्ना हजारे के प्रति कोई कठोर बात करते हुए झिझक रहे थे जो कि उनके मर्यादित स्वभाव का प्रमाण है।
       चाहे योग शिविर हो या प्रवचन का कार्यक्रम उनके आयोजन पर पैसा खर्च होता है। सीधी बात कहें तो माया का खेल है तो माया से ही जीता जा सकता है। हमारा समाज इसके लिये खर्च करने को तैयार भी रहता है। एक समय था जब फिल्म, क्रिकेट और टीवी ने लोगों के मन को बांध दिया पर फिर लोग ऊब गये तो यही अध्यात्म संत उनके काम आये। एक आयु के बाद जब आदमी थकने लगता है तब वह आसरा ढूंढता है। यह आश्रम, मंदिर तथा दरबार उसके लिये एक आसरा बन जाते हैं। इनके निर्माण पर पैसा खर्च होता है और इसके लिये भक्तों से दान या सहायता लेनी पड़ती है। स्वामी अग्निवेश सत्य के ज्ञानी है पर माया के खेल से अनभिज्ञ है। ज्ञानी तो इस देश में बहुत लोग हैं पर अधिक भीड़ सभी के पास नहीं जाती। माया भी बहुत लोगों के पास है पर सभी संतों की तरह नहीं पुजते। सीधी बात यह है कि जिसके पास ज्ञान का संग्रह और माया की शक्ति है वही बड़े प्रसिद्ध संत बन पाये हैं।
      स्वामी अग्निवेश बजाय अनर्गल विषयों पर में लगने के अगर आर्य समाज का ही विचार आगे बढ़ाते तो शायद बेहतर रहता। प्रसिद्ध की बात छोड़कर अगर योग्यता के आधार पर तुलना की जाये तो वह बाबा रामदेव के आगे बहुत छोटे लगते हैं। बाबा रामदेव ने जिस कदर योग साधना की पुनःप्रतिष्ठा की है वह अनुकरणीय है। उनके पतंजलि योग संस्थान का पूरे देश में काम चल रहा है। अब तो उन्होंने अनेक साधकों को शिक्षक होने योग्य भी बना दिया है। उनके शिविर लग रहे है। धन अगर नहीं होगा तो यह प्रचारतंत्र चलेगा कैसे? अलबत्ता हम स्वामी अग्निवेश से यह अपेक्षा जरूर करेंगे कि वह योग साधना की आलोचना करने की बजाय अपने नियम और संयम के विषयों पर लोगों को जागरुक करने का काम करें। भ्रष्टाचार केवल नारे लगाने या आंदोलन चलाने से हटने वाला नहीं है बल्कि लोगों में नियम और संयम से चलने की शिक्षा देने पर ही उसका निराकरण संभव है।
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10/22/11

लीबिया के तानाशाह गद्दाफी की मौत, राजसी वृत्ति और कर्म करने वाले लोगों के लिये सबक-हिन्दी लेख

                लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को आज से 42 वर्ष पूर्व अगर कोई अपनी उस प्रकार की मृत्यु की तस्वीर खींचकर बता देता तो वह कतई राजनीति में नहीं आता। लीबिया के सर्वोच्च पद पर रहते हुए उसने ढेर सारे सुख भोगे होंगे। उन सुखों की कल्पना तक उसने बचपन में नही की होगी। वह बेखटके अपने राज्य सुख भोगता रहा। इस दौरान अपनी शक्ति में मदांध होकर उसने अनेक ऐसे भी काम किये होंगे जो कि राजस पुरुष के हाथ से अहंकारवश हो ही जाते हैं। अगर उसे कोई भविष्यवाणी कर यह बता देता कि राज्य प्रमुख पद पर प्रतिष्ठित होने से उसको इस तरह की मौत मिलेगी तो वह हर हाल में रहना मंजूर करता पर राजनीति में नहीं आता। मिठाई खाने वाले को अगर यह बताया जाये कि उसकी मिठाई में जहर है तो वह उसे नहीं खायेगा। इंसान कितना भी भूखा हो पर पर उसमें जहर होने की सूचना उसे विरक्त कर देती है।
         ऐसा हमेशा होता नहीं है कि आदमी अपने कर्म फल का अनुमान करे। विश्व भर में अनेक ज्योतिषवेता हैं पर वह ऐसी भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि किसी की मौत दर्दनाक होगी या सहज। अनुमान से किसी की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो जाये पर उसके लिये संयोग जिम्मेदार होता है। इसके बावजूद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि अंततः राजस कर्म का परिणाम अहंकार, लोभ तथा काम के कारण दुःख के रूप में प्रकट होता है। पहले तो सात्विक लोग राजस कर्म करते नहीं पर अगर करें तो वह सात्विक मार्ग पर नहीं चल सकते। अक्सर लोगों को लगता है कि राजकाज में संलग्न रहना ही राजस कर्म है पर ज्ञानी जानते हैं कि राजस भाव अधिकतर सभी लोगों में रहता है-यह अलग बात है कि कुछ लोग सहजता से राजसी कर्म करते हैं तो कुछ तामस प्रवृत्ति की सहायत लेते हैं जैसा कि गद्दाफी ने किया।
        मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि वह अपने सांसरिक कर्म से अन्य मनुष्यों पर शासन करना चाहता है। सभी लोग राजा बनकर प्रजा पर शासन करे यह जरूरी नहीं है पर अपने आसपास के लोगों से प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहना भी इसी प्रवृत्ति का प्रतीक है। यही राजस भाव है जो कि अंततः सुख के बाद दुःख का कारण बनता है।
गद्दाफी को एकदम बेरहमी से मारा गया। इतनी बेरहमी से कोई आवारा कुत्ते को भी नहीं मारता। उसके शरीर में गोलियां लग चुकी थीं। वह खून से सराबोर था। उसे जब अस्पताल ले जाने की आवश्यकता थी तब लोग उसे पीट रहे थे। अगर इस तरह कोई व्यक्ति राह पर दुर्घटना के बाद मिले तो अनजान लोग भी उसकी सहायता के लिये आयेंगे जबकि गद्दाफी पिट रहा था। उसीे घायल तस्वीरें टीवी चैनलों पर दिखाकर बताया गया कि उसका खून गोलियां लगने के कारण निकल रहा था। देखा जाये तो गोलियां ताजा लगी थीं और जिस तरह उसकी स्थिति थी उसे देखकर प्रतीत होता था कि अगर उस समय भी वह अस्पताल ले जाया जाता तो बचता नहीं क्योंकि कालांतर में गोलियों की पीड़ा बढ़ने और रक्त स्त्राव से उसका जीवन नष्ट होना था। गद्दाफी के 42 वर्ष के सौभाग्य ने साथ छोड़ा तो पलभर का दुर्भाग्य उसके लिये मौत का संदेश ले आया।
        गद्दाफी की यह मौत अच्छे खासे आदमी को राजकाज के कर्म में लिप्त होने से रोक सकती है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि अमेरिका से मित्रता रखने वाले देशों के राज्यप्रमुखों को भी डरा सकती है। यह सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका पूरे विश्व का खैरख्वाह बन गया हैं मध्यएशिया के तेल उत्पादक देशों पर उसका नियंत्रण रहा है। जो भी वहां तानाशह है वह अभी तक किसी न किसी रूप में उसके हितचिंतक ही रहे हैं। इराक के सद्दाम हुसैन अमेरिका तो गद्दाफी ब्रिटेन के प्रिय रहे पर अंततः दोनों को बुरी मौत मिली। ऐसे में जिन लोगों को अमेरिका और ब्रिटेन से राजनीतिक या आर्थिक मदद मिलती है उन्हें यह समझना चाहिए कि पश्चिमी देश किसी के सगे नहीं है। उल्टे उनके निकट रहने से सारी कमजोरियां उनकी नज़र में आ जाती हैं और समय आने पर वह पुराने मित्र को निपटाने के लिये नये शत्रु खड़े कर बुरी हालत कर देते हैं। सद्दाम हुसैन और गद्दाफी को निपटाने क्रे लिये उनके ही देश में विरोधी खड़े किये। फिर पश्चिमी देशों ने पहले उनकी सेना को तहस नहस किया जिससे विद्रोहियों ने उनको निपटाया। दूसरी बात यह कि अगर अमेरिका या ब्रिटेन का एक बात पल्लू पकड़ा तो फिर उसे छुड़ाने का प्रयास करने की बजाय नियमित रूप उसे उनके सामने अपनी उपयोगिता साबित करना चाहिए।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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10/6/11

आज दशहरा पर्वः आत्ममंथन का दिन-हिन्दी लेख (aaj today dashahara-atmamanthan ka divas din)

        आज सारे देश में दशहरा पर्व मनाया जा रहा है। भगवान श्रीराम की युद्ध में लंकापति रावण पर विजय के रूप के समरण के रूप में मनाये जाने वाले इस दशहरा पर्व से उल्लास से मनाया जाने परंपरा बरसो से इस देश में रही है पर फटाखे जलाकर, घर के सामान पूजकर तथा मिठाई खाकर इस दिन को बेकार कर दिया जाता है जबकि इस विषय पर अध्यात्मिक चर्चा कर मन और विचारों में शुद्धता लाने कप प्रयास किया जाना चाहिए। मूल बात यह है कि ऐसे पर्व आत्ममंथन और सामाजिक चिंतन के लिये उपयोग किये जाने चाहिए। यह अलग बात है कि अनेक कथित धार्मिक विशेषज्ञ इस दिन अपने अनुयायियों को मन का रावण मारने तथा आत्मा रूपी सीता की रक्षा करने का उपदेश भर देते हैं। वैसे देखा जाये तो इसे पर्व का उपयोग बाज़ार अच्छी तरह उपयोग करता है। प्रचार माध्यम जहां तक हो सके उपभोग की वस्तुओं के उपयोग के लिये प्रेरित करते हुए राम राम किये जाते हैं। बीची बीच में रावण की कलुषित गतिविधियों की चर्चा भी होती है। ऐसे में हमारे मूल अध्यात्मिक दर्शन की तरफ किसी का ध्यान जाता ही नहीं।
        कुछ लोगों का मानना है कि राम एक मिथक हैं और श्रीबाल्मीकी जी ने उनको इस तरह प्रस्तुत किया है कि वह सत्य स्वरूप प्रतीत होते हैं। इस दृष्टि से श्रीसीता और रावण सहित रामायण के अनेक पात्रों को औपन्यासिक मानने वाले लोग इस बात को नहीं जानते कि इस संसार में सात्विक, राजस तथा तामसी प्रवृत्तियों की उपस्थिति सदैव रही है और हर काल में अच्छे और बुरे लोगों की उपस्थिति रहनी है। ऐसे में अगर श्री राम और रावण को मिथक मानना गलत है। आधुनिक इतिहास में अनेक ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने महान चरित्र से इतिहास में नाम दर्ज कराया। हमारे देश में महात्मा गांधी ने तो अपनी सादगी, उच्च विचार तथा सात्विक कर्मों से ऐसा इतिहास रचा कि अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ठ आइंस्टीन ने उनके बारे कहा था कि हजारों वर्ष बाद कौन इस बात पर यकीन करेगा कि इस दुनियां में ऐसा भी कोई महान आदमी हुआ होगा। यही स्थिति भगवान श्रीराम के बारे कही जा सकती है कि त्याग, संघर्ष तथा आत्मविश्वास के साथ ही ज्ञान का ऐसा विशाल भंडार रखने वाला व्यक्तित्व इस संसार में किसी के पास रहा होगा इस बात पर यकीन करना कठिन है। मगर यह सत्य मानना होगा कि ऐसे अध्यात्मिक पुरुष कभी मिथक नहीं होते क्योंकि यह संभव नहीं है कि कल्पनाओं को इतनी दृढ़ता से विस्तार दिया जाये कि वह सत्य लगने लगें।
         बाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम, श्रीसीता जी, श्रीलक्ष्मण जी, श्रीभरत जी और श्रीशत्रुध्न का जो वर्णन किया गया है हम उनका अध्ययन करें तो पायेंगे कि मनुष्य देह उन प्रकृतियों पर ध्यान जाता है जो उसे नायकत्व का दर्जा दिलाती हैं तो कैकयी और रावण के आचरण से खलनायकत्व का आभास होता है। भगवान श्रीराम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता हैं पर उन्होंने कहीं ऐसा दावा नहीं किया। उसी तरह उनके सेवक हनुमान को भी अवतारी बताते हुए कहानियां हैं पर वह कभी स्वयं उसकी पुष्टि नहीं करते। कुछ लोग मानते हैं कि बाल्मीकी रामायण की रचना के बाद कालांतार में उसे बदल भी गया है जबकि यह मूल रचना भगवान श्रीराम के जन्म तथा राज्याभिषेक तक ही लिखी गयी थी। उत्तर रामायण के पृष्ठ बाद में लाये गये हैं। इसका कारण यह है कि महर्षि बाल्मीकी स्वयं निरंकार राम के भक्त थे और उन्होंने समाज में उनको साकार रूप से स्थापित करने के प्रयास से ही यह रचना की थी इसलिये वह उसमें उत्तर रामायण के भाग की रचना नहीं कर सकते थे जिनके उनके चरित्र के विरोधाभास के दर्शन होते हैं। अगर भगवान श्रीराम के जन्म और राज्यभिषेक तक ही उनकी रचना को मूल माना जाये तो यकीनन सभी पात्रों के अवतारी होने की पुष्टि नहीं होती। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम अवतार थे पर उन्होंने अपने अवतारी होने का दावा इसलिये किया ताकि सामान्य मनुष्यों के रूप में उनकी लीला के अलौकिक अर्थ न लिये जायें। ऐसे में श्रीमद्भागवत गीता का स्मरण होता है भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘ मैं धनुर्धरों मे राम हूं’। भगवान श्रीराम की तरह श्रीकृष्ण को भी भगवान श्री विष्णु नारायण का अवतार माना जाता है। इस तरह की चर्चा करने का मतलब यह है कि हम जब अपने अध्यात्मिक नायकों में असामान्य पुरुष की जगह सामान्य रूप ढूंढना चाहिए ताकि हम अपने मन को दृढ़ता प्रदान कर सकें। भगवान श्रीराम को आचरण ऐसा नहीं है कि सामान्य मनुष्य धारण नहीं कर सके। बात केवल यह है कि उसके लिये संकल्प होना चाहिए। त्याग, समाज सेवा तथा संघर्ष की प्रवृत्ति का अनुसरण करें।
      इस पावन पर्व पर साथी ब्लॉग लेखकों तथा पाठकों को बधाई। साथ ही यह कामना है कि सभी अपने अंदर मानसिक शुद्धता लाने के साथ ही अपने सद्विचारों पर दृढ़तापूर्वक चलने का व्रत लें।
दीपक भारतदीप
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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9/30/11

बीमारी, इलाज और परहेज की चर्चा का फैशन-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (bimari, alaj aur parhej ki charcha ka fashan-hindi vyangya kavitaen or satire poem)

अपनी बीमारियां साथ लेकर
शहर में घूम रहे लोग
दवाईयों के साथ परहेज के
नुस्खे मिलने वालों में बांट रहे हैं,
दिल और दिमाग से बीमार समाज में
हमारे चारों तरफ भीड़ है
मगर हम ख्यालों से तंदुरस्त
लोगों को दोस्ती के लिये छांट रहे है।
--------
वह चारों लोग आपस में
बात कर रहे थे
हम उनके पास जाते जाते
चर्चा के विषय के अनुमान कर रहे थे।
शायद वह राजनीति पर बोलते होंगे,
किसी फिल्म की कहानी को तोलते होंगे,
क्रिकेट के स्कोर पर चर्चा होती होगी,
सुना रहा होगा अपने खाने का स्वाद
सभी लग रहे थे भोगी,
जब पास जाकर सुना और देखा
तब पाया
वह तो बीमारी, इलाज और
परहेज पर बात कर रहे थे।
-------------
बीमारियां अब फैशन गयी हैं
लोग बीमारी, इलाज और फैशन
पर सरेआम चर्चा करते हैं,
अपनी बीमारी को अपनी काबलियत
इलाज और परहेज सभी को बताना
शान समझते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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9/15/11

अमेरिकी साम्राज्यवादी और भारत के जनवादी बुद्धिजीवी-हिन्दी लेख (america aur indian indian janvadi buddhijivi-hindi lekh

         अमेरिका के प्रतिवेदनों पर भारतीय प्रचार माध्यम इतना हल्ला क्यों मचाता है? ऐसा लगता है अमेरिका दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस है जो उनका गोपनीय प्रतिवेदन लिखता है। मजे की बात यह है कि जिन लोगों का गोपनीय प्रतिवेदन प्रतिकूल होता है वह कभी उसका विरोध नहीं करते और जिनका प्रशंसनीय है वह उछलने लगते हैैं। कभी कभी तो यह देखकर हैरानी होती है कि शिखर पुरुषों के दिल का हाल उनके देश के लोग तक नहीं जान पाते पर अमेरिका राजनयिक को पता लग जाता है वह भी उनके ही श्रीमुख से! खंडन होना चाहिए पर होता नहीं। कई बार तो निंदा योग्य बयानों की भी निंदा नहीं होती।
          अभी तक वामपंथी बुद्धिजीवियों से अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोध करने का नारा सुनते थे मगर तब यह समझ में नहीं आता था कि आखिर यह है किस प्रकार का! दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवियों ने पूंजीवाद और अमेरिका का विरोध एक साथ किया है इसलिये हमेशा ही उनके बारे में भ्रमपूर्ण स्थिति रही है। चूंकि वामपंथी पूंजी पर राज्य के नियंत्रण की बात करते हैं तो भारतीय समाज उसे स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि राज्य के नियंत्रण से भी देश का कोई भला नहीं हुआ! फिर आज की कंपनी प्रणाली जरूर ब्रिटेन और अमेरिका की देन हो पर समाज में पूंजी और श्रम की अपनी स्वायत्ता तो भारतीय अर्थशास्त्र की ही देन है। राज्य को अनियंत्रित पूंजी के मद से उपजे अपराध तथा श्रम का शोषण रोकने का अधिकार तो भारतीय अर्थशास्त्र मानता है पर वह उनका निंयत्रणकर्ता होना उसमें स्वीकार नहीं है। यहीं आकर भारतीय समाज वामपंथियों से छिटक जाता है क्योंकि उसको लगता है कि उसकी आर्थिक और श्रमशील गतिविधियों पर राज्य का नियत्रंण नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोधक होने का दावा करने वाले वामपंथी कभी भारतीय समाज में स्थान नहीं बना पाये।
           दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी अमेरिकी साम्राज्य के भौतिक स्वरूप का ही बखान करते हैं। उसने जापान पर बम फैंका, उसने जर्मनी को रौंदा तथा वियतनाम पर हमला किया, तथा उसने अफगानिस्तान पर हमला किया तथा इराक पर हमला किया आदि बातें कहकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज को आंदोलित करने का प्रयास किया मगर अभौतिक या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने जो कारगुजारियां की इसकी चर्चा नहीं की।
             वामपंथी अब भी कहते हैं कि अमेरिका साम्राज्यवाद फैला रहा है! इसका मतलब वह केवल इतिहास में जीते हैं। सच बात तो यह है कि अमेरिका सभी जगह राज्य कर रहा है। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने हमेशा ही इतिहास सुनाया है-यह हो गया, वह हो गया, इसलिये अब यह होगा और वह होगा। प्रतिरोध करने के नाम पर चंद नारे लगा लिये और कभी कभार प्रदर्शन कर लिया। यह देखा ही नहीं कि अमेरिका धीरे धीरे अब दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस बनता जा रहा है।
         अपने प्रचार माध्यमों ने हद ही कर दी है। अमेरिका किसी भी देश के शिखर पुरुष का गोपनीय प्रतिवेदन जारी करता है तो अपने यहां के प्रचार माध्यम उसे ऐसे उठाये घूमते हैं जैसे कि इस नये वैश्विक ब्रह्मा ने कोई नयी बात कर दी हो। दरअसल हमारे देश के प्रचार माध्यमों का आधार पूंजी है और जिसका उद्गमा स्थल ऐसा लगता है अमेरिका है। सभी विकासशील देशों के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुष अमेरिका पैसा भेजते हैं पर वह विनिवेश होकर यहां आता है। आर्थिक और सामाजिक शिखर पुरुषों की बात तो छोड़िये हमारे देश के धार्मिक पुरुष भी अमेरिका के अनुयायी लगते हैं। इनमें से कई अपने शिष्यों को दर्शन देने अमेरिका जाते हैं।
        वामपंथी बुद्धिजीवी भारत में बढ़ती महंगाई का राज नहीं जान पाये। क्या उनको नहीं है कि इस देश में पांच सौ और हजार के नोट के लिये आसानी से प्रचलन में रहें इसके लिये महंगाई योजना पूर्वक बढ़ाई जा रही है। देश की कंपनियां आम जनमानस को अपनी जेब में पांच सौ और हजार के नोट जेब में घूमते देखना चाहती हैं। ऐसा लगता है कि भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व के विकासशील देशों में पेट्रोल की आड़ में महंगाई खेल हो रहा है। कम से कम भारत में तो स्थिति अजीब है। इधर सुनने में आ रहा था कि पेट्रोल के दाम गिरेंगे पर भारत कंपनियों ने फिर उसे बढ़ा दिया।
          भारत से रुपया बाहर जाता है तो डालर बन जाता है। अगर मान लीजिये किसी ने आज एक हजार रुपये अमेरिका या अन्य देश की बैंक में जमा किया तो उसके खाते में बीस डॉलर जमा होंगे। काला धन जमा करने वालों ब्याज तो मिलना दूर उनको रखने के पैसे भी देने पड़ते हैं-ऐसा हमने प्रचार माध्यमों में पढ़ा और सुना है। अगर भारतीय रुपया स्थिर रहा तो यह बीस डॉलर देश में आयेंगे एक हजार के रूप में। अगर रुपया गिरा तो विदेश में काला धन जमा करने वाला को ही लाभ होता है। समझ लीजिये साठ रुपये के मुकाबले एक डालर का मूल्य निर्धारित हुआ तो यह बीस डॉलर बारह सौ रुपये हो जायेंगे। इसी तरह भारतीय जमाकर्ता फायदे में रहेगा।
         फिर विदेश रुपया भेजने के लिये मोटी रकम होती होगी। अक्सर कहा जाता है कि हजार पांच सौ रुपये के नोट से मुद्रा का आवागमन सुविधाजनक होता है-यह अलग बात है कि हमारे यहां अभी भी अनेक लोग इसे देख भी नहीं पाते होंगे। अगर भेजी जाने वाली रकम सौ या पचास रुपये की होगी तो ढेर सारे ड्रम भर जायेंगे। इसलिये हजार रुपये का नोट ज्यादा उपयोगी है। मुश्किल दूसरी है कि हजार और पांच सौ के नोट छोटी वस्तुओं के खरीदने में अभी पूरी तरह सहायक नहीं है। इसलिये यह लगता है कि इस देश को हजार और पांच सौ नोट के लायक बनाया जा रहा है।
इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि हर क्षेत्र के शिखर पुरुष का ध्यान भारत पर कम अमेरिका पर अधिक रहता हैं। वहां का राष्ट्रपति क्या कह रहा है? वहां का अखबार क्या लिख रहा है? अमेरिका की भारत के शिखर पुरुषों बारे में क्या सोच है? इस पर भारतीय प्रचार माध्यम उछलते हैं। तय बात है कि प्रचार माध्यमों के मालिकों का कहीं न कहीं झुकाव अमेरिका के प्रति है तभी तो उनके कार्यकर्ता उसका प्रचार करते हैं।
        भारत के विकास का दावा संदेहास्पद भी इसी कारण से हो रहा है क्योंकि यहां सौ रुपये से ऊपर की मुद्रा का प्रचलन बढ़ रहा है। याद रखिये हमारी जानकारी के अनुसार किसी भी विकसित देश की मुद्रा सौ से अधिक की नहीं है।
दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी इतिहास का रोना रोते हुए अमेरिका को कोसते हैं पर नारों से आगे नही जाते। अपने वाद का झंडा उठाये हुए अमेरिका के रणनीतिकारों की चालाकियों को भांप नहीं पाते। वह भारतीय संदर्भों की बजाय विदेशी संदर्भों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। अमेरिका और कंपनी दैत्य किस तरह विश्व के आम जनमानस को त्रस्त कर रहा है इसका आभास नहीं है। अफगानिस्तान और इराक में उसकी सैन्य उपस्थिति पर हल्ला मचाने वाले भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी देश के अंदर ही स्थित अमेरिका के कंपनी दैत्य पर नज़र नहीं रख पाते। देश के आम आदमी को पांच सौ और हजार के नोट के उपयोग लायक बनाने की जो योजना चलती दिख रही है उसका आभास हमें इसलिये भी होता है कि दिन ब दिन महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि आने वाले समय में समाज का निम्न मध्यम वर्ग भरभर्राकर ढहते हुए गरीबी की रेखा के नीचे जाता दिख रहा है। मध्यम वर्ग गरीब होता जा रहा है तो उच्च मध्यम वर्ग तरक्की कर अमीर बन गया है। यह विषम आर्थिक स्तर देश के समाज को किस तरह नष्ट करेगा इसका अनुमान किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने शायद ही किया हो।
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9/11/11

पतंजलि योग साधना-आत्मा से चित्त के एकाकार होने पर अपनी बुद्धि का ज्ञान होना संभव (patanjali yog sadhna or vigyan-aatma aur chitta se buddhi ka gyan)

            पतंजलि योग सूत्र या विज्ञान सामान्य बुद्धिमान के लिये अत्यंत जटिल है। जब तक कोई व्यक्ति स्वयं आष्टांग योग का अध्ययन सक्रियता के साथ नहीं करता तब उसके लिये पतंजलि दर्शन समझना एक दुरूह कार्य है। सीधी बात कहें कि जो व्यक्ति योग साधना का अभ्यास करता है तो साथ में रचनाकर्म या प्रवचन में भी उसे दक्ष होना चाहिए। जो लोग रचनाकर्म और प्रवचन में दक्ष नहीं है तो वह सक्रिय होकर भी उसका अध्ययन नहीं कर पाते और जो इस योग साधना के विषय पर रचनाकर्म और प्रवचन कर रहे हैं वह सभी आष्टांग योग के पूर्ण भागों को नहीं जानते। थोड़ा बहुत प्राणायाम और आसन कर अनेक लोग अपने आपको ज्ञानी समझ रहे हैं पर उनको मनुष्य चित्त की महिमा का पता नहीं है। हम चित्त को मन या बुद्धि के रूप में देख सकते हैं। दरअसल हमारा चित्त जड़ है। वह बाह्य दृश्यों से प्रभावित होकर उनके रूप को ग्रहण करता है। उसमें कोई चिंत्तन नहीं है इसलिये किसी पदार्थ को देखने, छूने, सूंघने और उपभोग करने के परिणाम वह नहीं बता सकता। चित्त में उन्हीं वस्तुओं को पाने की कामना होती है जो उसने देखी हैं पर जिसे नहीं देखा उनके बारे में वह विचार नहीं कर सकता।
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि
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न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्।।
          ‘‘यह चित्त स्वप्रकाश वाला नहीं क्योंकि वह केवल जड़ दृश्य है।’’
एकसमये चोभयानवधारणम्।।
        ‘‘एक काल में चित्त और दृश्य का जानना संभव नहीं है।’’
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसंग स्मृतिसंकरश्च।।
          ‘‘एक चित को दूसरे का चित्त मान लेने पर उस चित्त में दूसरे चित्त का दृश्य होगा। इससे अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृतियों का मिश्रण भी हो जायेगा।
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्ती स्वबुद्धिसंवेदनम्।।
         ‘‘यद्यपि मनुष्य की चेतन शक्ति क्रिया से रहित और असंग है तो भी तदाकार हो जाने पर अपनी बुद्धि का ज्ञान उसे हो जाता है।’’
           हम इसी जड़ चित्त को स्वयं समझ बैठते हैं। अगर योग साधना के आठों भागों का अध्ययन कर पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाये तो मनुष्य दृष्टा हो जाता है। तब उसका अपने चित्त पर नियंत्रण हो जाता है। वह उसका उपयोग इस तरह कर सकता है कि दूसरे मनुष्य के चित्त का भी उसे ज्ञान होने लगता है। इतना ही नहीं वह अपने चित्त को दूसरे का मानकर उसकी स्थितियों, स्मृतियों और संकल्पों का भी भान कर सकता है। इतना ही जब योगाभ्यास से चित्त नियंत्रण में आता है तब बाह्य पदार्थों और दृश्यों से उस पर जो प्रभाव होता है उसका अध्ययन करना सहज होता है जिनसे मनुष्य दुष्परिणाम देने वाले संपर्कों से परे रहकर सहजता से जीवन व्यतीत कर सकता है। आत्मा से चित्त के एकाकार होने पर वह प्रकाशमान हो उठता है और यह योग की चरमस्थिति है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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8/26/11

भ्रष्टाचार पर निबंध-हिन्दी हास्य कविता (essay on corruption or bhrashtachar par nibandh-hindi hasya kavita)

पोते ने दादा से कहा
‘‘कक्षा की हिन्दी शिक्षिका ने
सभी विद्यार्थियों  घर से
भ्रष्टाचार पर निबंध लिखने को कहा है,
आप जरा मदद करो
कुछ जोरदार तर्क भरो
ताकि मेरी श्रेणी सुधर जाये
वरना मैंने फिसड्डी होने का दर्द बहुत सहा है,
पहले तो मेरे यही समझ में नहीं आता कि
भ्रष्टाचार होता किस तरह है,
सभी चेहरे ईमानदार दिखते
फिर बेईमानी होने की क्या वजह है,
आप तो अनेक बार आंदोलन कर चुके हैं,
कई बार अनशन तो हड़ताल कर
इतिहास में अपना नाम भर चुके हैं,
इसलिये भ्रष्टाचार पर निबंध जोरदार लिखायें,
पहले मुझे बाद में समाज के मार्ग दिखायें।’’
सुनकर बोले दादाजी
‘‘बेटा,
कल चलना मेरे साथ स्कूल,
तुम्हारी शिक्षिका को समझाऊंगा
भ्रष्टाचार पर निबंध लिखवाने की बात जायेगी भूल,
तुम चाहे तो अब भी अनशन करा लो,
नौकरी अब करता नहीं
इसलिये सुबह दूध सब्जी लाने के काम से
चाहे हड़ताल धरा लो,
मगर यह भंष्टाचार पर निबंध लिखने में
मदद की बात सोचना भी नहीं,
इस पर पूरा पुराण लिखना पड़ेगा
अपने सिर के बाल नौचना न पड़ें कहीं,
वैसे तुम्हारी शिक्षिका को समझाऊंगा
इस बालपन में भला
हमारे बच्चों को भ्रष्टाचार के विषय से
अवगत क्यों करा रही हो,
सीख जायेंगे सब कुछ
जब बड़े ओहदे पर पहुंच जायेंगे,
नहीं पहुंचे तो भी
इसके परिणाम जरूर समझ पायेंगे,
बड़े बड़े लोग माथापच्ची कर भी
भ्रष्टाचार के आगे हार जाते हैं,
जेब सबसे अधिक वही भरते

जो बहसों में ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं,
हिन्दी में ईमानदारी और नैतिकता पाठ
कभी न पढ़ायें,
भ्रष्टाचार जैसे विषय पर
हमारे बच्चों का खून अभी से न जलाये
बड़े होकर वैसे भी भ्रष्टाचार पर बहस करेंगे,
कहीं देखेंगे फिल्म, कहीं  कविता कहेंगे,
इससे अच्छा तो शीला की जवानी को इंगित करती,
बदनाम मुन्नी के नाम में प्रतिष्ठा भरती,
कविता इनको लिखना सिखायें,
संभव है कुछ बालक
भविष्य में हास्य कवि होकर आपका नाम
गुरु के रूप में रौशन कर दिखायें।’’
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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8/15/11

भ्रष्टाचार और चंदा-हास्य कविता (bharshtachar or corruption-hasya kavita or comic poem)

समाज सेवक को धनपति ने
अपनी शराब पार्टी में बुलाकर
अकेले में कहा
‘‘यार, अपनी कमाई बहुत हो रही है,
पर मजा नहीं आ रहा है,
लोगों के कल्याण के नाम पर
तुम्हें चंदा देते हैं
गरीबों की भीड़ कम नहीं हुई
कभी लोग भड़क न उठें
यह डर सता रहा है,
इसलिये तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाओ,
यहां जिंदा कौम रहती है यह
संदेश विदेशों में फैलाओ,
बस इतना ख्यान रखना
भ्रष्टाचार के खिलाफनारे लगाना,
किसी पर आरोप लगाकर
उसकी पहचान मत बताना,
तुम तो जानते हो
हमारा काम बिना रिश्वत
दिये बिना चलता नहीं,
टेबल के नीचे से न दो पैसे
तो किसी का पेन काम के लिये मचलता नहीं,
फिर कई बड़े लोग
तुम्हें जानते हैं,
उनका भी ख्याल रखना
तुमको वह अपना सबसे बड़ा दलाल मानते हैं
इसलिये
हवा में भाषणबाजी कर
अपना अभियान चलाना,
हमें भी है विदेश में
अपने देश की जिंदा पहचान बताना,
अब तुम रकम बताओ,
अपना चेक ले जाओ।

समाज सेवक ने चेक की रकम देखी
फिर वापस करते हुए कहा
‘यह क्या रकम भरते हो,
लड़ा रहे हो उस भ्रष्टाचार नाम के शेर से
जिसका पालन तुम ही करते हो,
पहले से कम से कम पांच गुना
रकम वाला चेक लिखो,
कम से कम हमारे सामने तो
ईमानदार दिखो,
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए
जब मैदान में आयेंगे,
भले किसी का नाम लें
पर हमारे कई प्रायोजक
डरकर साथ छोड़ जायेंगे,
बाल कल्याण और स्त्री उद्धार वाले हमारे धंधे
सब बंद हो जायेंगे,
भ्रष्टाचार विरोधी होकर
हमारी कमाई के दायरे तंग हो जायेंगे,
बंद हो जायेगा
शराब और जुआ खानों पर जाना,
बंद हो जायेगा वहां का नजराना,
जब चारों तरफ मचेगा कोहराम,
तुम्हारा बढ़ जायेगा दो नंबर का काम,
इसलिये हमारा चंदा बढ़ाओ,
वरना भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
हम कतई न उलझाओ।’’
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8/7/11

अमेरिकी डॉलर का संकट-हिन्दी व्यंग्य लेख (trouble of american dollar-hindi satire thought article)

                  जब अमेरिका की अर्थव्यवस्था डगमगाती है तब विश्व के प्रचार माध्यम ऐसे जताते हैं कि सभी देशों के लोग कांप रहे हैं। दुनियां के उद्योगपति, पूंजीपति और प्रतिष्ठत लोगों के आर्तनाद तब प्रचार माध्यमों में सुनाई देता है गोया कह रहे हों कि ‘‘भगवान, अमेरिका को बचा लो।’
          वैसे तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि आखिर अमेरिका की अर्थव्यवस्था का रहस्य क्या है पर अभी   हाल ही में पता चला कि अमेरिका की जनप्रतिनिधि सभा सरकार को कर्ज लेने के संबंध में रियायतें देने से आनाकानी कर रही थी। यह जनप्रतिनिधि भी वहीं के हैं और सरकारी भी वहीं की। इसका मतलब यह अंदरूनी विवाद था जिस पर पूरे विश्व के बड़े लोग आंखों लगाये बैठे रहे कि कहीं अमेरिका का बाजा बजा तो अपनी भी बारात निकल जायेगी। दरअसल आजतक अमेरिका का बजट आज तक समझ में नहीं आया। अब पता लग रहा है कि दुनियां को धमकाने वाला अमेरिका ऊपर से नीचे तक कर्ज में डूबा है मगर फिर भी साहुकार कहलाता है।
       मूलतः भारत का अमेरिका से कोई आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा तथा वैचारिक संबंध नहीं है जिससे उसे सहोदर राष्ट्र कहा सके। प्रत्यक्ष उससे कोई शत्रुता वाली बात नहीं है वह इसी आधार पर ही मित्र कहा जाता है पर अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के साथ वह जो संबंध निभाता है वह एक तरह से दुश्मनी जैसा ही व्यवहार है। भारत की प्राकृतिक और खनिज संपदा, मानव संसाधन, अध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक शक्ति इतनी विशाल है कि उसे अमेरिका पर निर्भर रहने की आवश्यकता भी नहीं है तब यहां उसकी आर्थिक स्थिति डगमगाने पर चिंता करना व्यर्थ ही कहा जा सकता है पर जब हम देखते हैं कि हमारे यहां के प्रचार माध्यम उस पर विलाप कर रहे हों उस समय यह प्रश्न उठता है कि कहीं भारत के कुछ लोगों के वैयक्तिक आधार तो नहीं बिखर रहे है जिससे वह घबड़ा गये है। इस तरह का संदेह होने का कारण यह है कि डॉलर आज भी विश्व बाज़ार में विनिमय का साधन है। इसका मतलब यह है कि डॉलर उन लोगों के पास भी हो सकता है जो अमेरिका में नहीं है और जिन विदेशियों के पास है वह चाहेंगे कि अमेरिका बचा रहे ताकि उनका धन भी बचे। दूसरा यह कि दुनियां भर में आर्थिक लेनदेन का लेखा डॉलर में ही रखा जाता है। प्राकृतिक, खनिज और मानव संसाधन में अन्य देशों से कम धनी अमेरिका की मुद्रा डॉलर बहुत महंगी होती जा रही है। मान लीजिये किसी भारतीय के पास दस डॉलर हैं तो इसका मतलब यह समझें कि उसके पास पचास रुपये हैं। अगर डॉलर का रेट मान लीजिये 52 रुपये हो गया तो उसके 520 रुपये हो गये। अगर अमेरिका की घटती साख के साथ डॉलर कहीं आठ आने का हो गया तो उसके पास पांच रुपये रह जायेंगे। यही कारण है कि हमारे देश के शक्तिशाली आर्थिक पुरुष विदेशी बैंकों में अपना पैसा रखते रहे हैं क्योंकि डॉलर के भाव बढ़ने के साथ उनका रुपया वैसे ही बढ़ जाता है। अमेरिका कर्ज लेता है पर किससे और कहां से इसका पता नहीं लगता। फिर वह हथियार और आधुनिक तकनीकी बेचता है और उसके लिये भी सहायता देता है। देखा जाये तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आधार गोलमोल हैं जबकि इसके विपरीत भारतीय बजट संसद में हर तरह से स्पष्ट व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया जाता है। फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन तथा उनकी तरह विकसित अन्य यूरोपीय राष्ट्र अमेरिका की परवाह नहीं करते। यहां तक कि उन्होंने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपना यूरो भी उतार दिया है पर चूंकि अमेरिका दूसरों के गोलमाल को भी अपने यहां समायोजित करता है इसलिये डॉलर आज भी अधिक पंसदीदा मुद्रा है। यही कारण है कि डॉलरधारी लोग अमेरिका के संपन्न और शक्तिशाली होने की न केवल कामना करते हैं बल्कि उसकी मदद को हर समय तैयार रहते हैं।
          कहा जाता है कि पुजारी की दौड़ सर्वशक्तिमान के दरबार तक, यह बात दुनियां भर के विकासशील देशों के आर्थिक शिखर पुरुषों पर लागू होती है। अब यह कहना मुश्किल है कि दुनियां भर के काले धनिक लोग अमेरिका को चला रहे हैं या वही उनका संरक्षक है। अगर अमेरिकी डॉलर विश्व में विनिमय का प्रमुख मुद्रा का रूप खो बैठे तो रुपये के मुकाबले उसकी गिरावट कितनी होगी अंदाजा नहीं है। कम से कम भारतीय रुपया एक डॉलर से कम तो कभी रहने वाला नहीं है। दरअसल डॉलर का मूल्य अधिक होने का कारण है यह भी है कि दुनियां भर के छात्र, शिक्षक, इंजिनीयर, व्यापानी तथा फिल्मकार अमेरिका जाते हैं। अमीरों के लिये अमेरिका एक स्वर्ग जैसा है। वह अमेरिका जाते हैं तो उनको डॉलर चाहिए। तय बात है कि डॉलर की मांग अधिक रहती है। मांग और आपूर्ति के नियम से उसका मूल्य अधिक रहना ही है। फिर वह लोग वहां अधिक जाते हैं वहां की वस्तुओं और सेवाओं की कीमत भी बढ़ती है। अनेक बार अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाता है तो उसे चेताया जाता है कि अंततः हानि उसकी ही होनी है। बाद में वह प्रतिबंध हटा लेता है या ढीला कर देता है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशी देशों पर आधारित है यह बात उसके कर्ज लेकर घी पीने की आदत से पता चल ही जाती है।
               आम भारतीय को इसकी बिल्कुल परवाह नहीं है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में गिरावट है कि नहीं पर इतना तय है कि कहीं न कहीं उसके परिश्रम से अर्जित धन अमेरिका को भी सहारा देता है। अगर कुछ भारतीय अमेरिका न जायें न उससे सामान खरीदें तो शायद डॉलर बुरी हालत में आ जाये। डॉलर का अधिक भाव होने से हमारी चीजें और श्रम उसे सस्ता पड़ता है। जबकि उसकी चीजें और सेवायें हमें महंगी पड़ती हैं। इस तरह हमारे श्रमिक और छोटे व्यापारी घाटे में ही रहते हैं। बहरहाल 1971 में पाकिस्तान के लिये सातवां बेड़ा भेजने की घटना कभी भूली नहीं जा सकती इसलिये आज भी अमेरिका को इस देश के आमलोगों को वैसा मित्रभाव नहीं मिलता जैसा कि उसके स्वदेशी प्रशंसक चाहते हैं। वैसे प्रकृति के कुछ नियम हैं। कछुआ और खरगोश की दौड़े में कछुआ इसलिये जीता क्योंकि वह धीरे धीरे चला था। भारत को हम कछुआ कहेंगे और अमेरिका को खरगोश। भारत धीरे धीरे ही विश्व के राजनीतिक पटल पर उठा रहा है और आगे उसका भविष्य उज्जवल रहने वाला है जबकि अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में जापान पर परमाणु बम गिराने के बाद दुनियां में तेजी से उभर कर आया। अब वह शनैःशनै पतनोन्मुख होता दिख रहा है। लगता है कि अफगानिस्तान का युद्ध उसे ले डूबेगा। अमेरिकी रणनीतिकार वहां से निकलने की सोच रहे हैं पर जिस तरह वहां अभी हाल अमेरिकी के सील सैनिकों की मौत हुई है वह उसकी सामरिक शक्ति को भी चुनौती मिलने लगी हैं। यह सील सैनिक उसी समूह के हैं जिन्होंने पाकिस्तान में घुसकर दुनियां के सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मारा था। बहरहाल अमेरिका भी एक विशालकाय जहाज है भले ही भंवर में फंस गया है पर डूबने में बहुत समय लेगा।
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8/2/11

नार्वे में आतंकवादी हमला-भारतीय संदर्भों का विचार निरर्थक

             नार्वे में बहुसंस्कृतिवादी विरोधी एक व्यक्ति ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर अनेक लोगों का मार डाला। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों से प्राप्त जानकारी कुछ हैरान करने वाली है। कम से कम उससे एक बात प्रमाणित होती है कि आज के आधुनिक संचार माध्यमों के प्रसारणों और प्रकाशनों का प्रभाव आज की नयी पीढ़ी पर हाल होता है। जिस तरह उसने भारत के बारे में विचार व्यक्त किये हैं उससे साफ लगता है कि वह प्रचार माध्यमों के प्रसारणों और प्रकाशनों से प्रभावित है। साथ ही यह भी प्रमाणित होता है कि वह भारतीय क्षेत्र की धार्मिक, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, भाषा, तथा सांस्कृतिक विविधता से परिचित नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वह भारत की उस अध्यात्मिक शक्ति से तो उस बिल्कुल अनभिज्ञ जिसकी वजह से यह देश विश्व का अध्यात्मिक गुरू कहा जाता है।
          मूल बात यह है कि उसने अपनी जिस विचाराधारा के लिये यह कांड किया वह आगे कतई नहीं बढ़ने वाली। फिर उसने मार्क्सवादी तथा अन्य धर्मों के विरुद्ध जो अपनी कटु अभिव्यक्ति दी है वह प्रभाहीन तथा तर्कहीन है। मुख्य बात यह है कि आप जब किसी भी व्यक्ति, समूह या विचाराधारा की आलोचना करते हैं तो आपको ठीक उसके विपरीत अपनी व्यक्तिगत कार्यशैली और व्यवहार से अपनी सिद्धि साबित करनी होती है। सीधी बात कहें कि जब आप किसी व्यक्ति, समूह या विचाराधारा पर क्रूरता, हिंसक कायरता और और स्वार्थ सिद्ध होने का आरोप लगाते हैं तो आपको अपनी जीवन शैली से अपने अंदर की उदारता, अहिंसक, वीरता और परोपकार की भावना को बाहर लाकर प्रमाणित करना चाहिए। इसके विपरीत अगर आप अपने विपरीत चलने वालों का ही अनुसरण करते हैं तो फिर इसका आशय यह है कि आप भी उतने ही पाखंडी हैं जितना आप अपन विरोधियों के बारे में कह रहे हैं। उस व्यक्ति न हिंसा कर यही काम किया है। उसने किसी को निंदनीय कहा पर जिस मार्ग पर चला तो वह भी क्रूरता, मूर्खता तथा दंडनीय श्रेणी में ही आता है।
          हम भारतीय इतिहास की बात करें तो क्षुद्र स्वार्थों की खातिर राजकीय अहंकार की वजह से यहां अनेक युद्ध हुए हैं। अनेक राजाओं ने आपस ंमें केवल इसलिये युद्ध किये क्योंकि वह एक दूसरे का वैभव सहन नहीं कर सकते थे। इतना ही नहीं इन्हीं राजाओं की वजह से प्रजा त्रस्त भी रही और इसी कारण यहां राजनीतिक अशांति होने से आर्थिक, शैक्षणिक सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में हुए विकास का प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ-यह बात हम अभी तक ज्ञात इतिहास के आधार पर ही कह रहे हैं।
      मुगलकाल में भारतीय समाज संक्रमण काल से गुजरा पर उसी समय हमारे हिंन्दी साहित्य का भक्ति काल का दौर भी चला। उस समय धाार्मिक रूप से देश में बदलाव आया। मुगलकाल में सांस्कृतिक हªास होने की बात कही जाती है पर क्या यह सच नहीं है कि उस समय भी उसका हिंसा से प्रतिकार करने की बात सामने नहीं आयी बल्कि उस समय के शाब्दिक ऋषियों ने जो रचनाऐं की वह आज हमारे अध्यात्म की ऐसी अनमोल धरोहर बनी जिसका लोहा आज पूरा विश्व मानता है। इसी मुगल काल में तुलसीदास जी की महान रचना ‘रामचरितमानस’ प्रकट हुई और जिसका प्रभाव हम आज तक देख रहे हैं। हमारा मानना है कि रामचरित मानस के व्यंजना विधा में कहे गये कुछ दोहों पर कुछ लोग भले ही नाकभौं सिकोड़ें पर सच बात यह है कि उदारता, चिंतनशीलता और धार्मिक सहिष्णुत वाला जो हम अपना आज का समुदाय देख रहे हैं वह उनकी रचना से सकारात्मक रूप से प्रभावित हुआ है। उस समय भारतीय आस्थाओं पर आक्रमण को नाकाम करने में भक्ति काल के शाब्दिक ऋषियो का-कबीर, तुलसी, मीरा, सूरदास, रहीम तथा अन्य महान रचनाकार-महान योगदान रहा है और उनकी रचनाओं में कहीं भी हिंसा का तत्व शामिल नहीं है। सच बात तो यह है कि इन लोगों ने किसी धार्मिक, सांस्कृतिक तथा वैचारिक आक्रमण का प्रतिकार करने का लक्ष्य मानकर रचनायें नहीं की बल्कि समाज में चेतना लाने के लिये अपनी अभिव्यक्ति से ऐसा मार्ग दिखाया जिसमें राजकीय गतिविधियों की गंदगी से उनको दूर रखा।
        वैसे कहीं भी धार्मिक सांस्कृतिक या वैचारिक आक्रमण की बात वास्तव में एक भ्रम है पर फिर भी हमें अपने समाज की चिंतन क्षमता बनाये रखने के प्रयास हमें भक्तिकाल के रचनाकारों से सीखना चाहिए। जब हम यह मानते हैं कि हमारे समाज पर कहीं से धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा वैचारिक हमला हो रहा है तब उसका मुकाबला बुद्धि और विवेक से ही संभव है हिंसा से नहीं। भारत के मध्ययुगीन इतिहास में ही हिन्दी के स्वर्णकाल का चलना इस बात का प्रमाण है कि ऐसे संक्रमण काल में रचनाकार, कलाकार तथा अध्यात्मिक पुरुष ही समाज की रक्षा कर सकते हैं। यह अलग बात है कि आज के समाज के शिखर पुरुष किसी ऐसे रचनाकार या कलाकार को प्रश्रय नहीं देते जो उनका दरबारी न हो।
         नार्वे के आक्रमणकारी ने भारतीय समाज की स्थिति को रेखांकित किया है पर उसे इतिहास की जानकारी नहीं है। संभव है भारतीय समाज से जुड़े कुछ लोग उससे हमदर्दी दिखायें पर यह अज्ञान का प्रमाण है। हम यह दावा भले ही करें कि हमारे समाज की रक्षा तलवार वीरों ने की है पर सच यही है कि अध्यात्मिक पुरुषों के अथक प्रयासों से आज हम वर्तमान समाज को इतना सभ्य और शक्तिशाली देख रहे हैं पर जिस तरह विदेशी विचाराधाराओं को स्वीकार करने की मनोवृत्ति दिख रही है वह कोई देश के लिये अत्यंत दुःखदायी है। एक मजेदार बात यह है कि नार्वे के उस आक्रमणकारी का मानना है कि भारत से बाहर रह रहे अप्रवासी नागरिक बहुसांस्कृतिकवाद के उस संकट को समझ सकते हैं जो देश में रह रहे लोग समझ नहीं रहे। उसकी बात पर यकीन किया जाये तो यह कहना ही पड़ता है कि भारत से बाहर रह रहे लोग अपनी देश की धार्मिक और सांस्कृतिक शक्ति को नहीं जानते। वह धरा से कटे हुए हैं इसलिये पश्चिम में चल रहे धार्मिक संघर्षों में भारतीय संदर्भ ढूंढ रहे हैं। हम देखें तो इतिहास बताता है कि पश्चिम में धर्म के आधार पर संघर्ष चलता रहा है। पश्चिम और मध्यएशिया के देशों के बीच धार्मिक विवाद अभी का नहीं वरन् बहुत पुराना है। पहले परिवहन और संचार के साधन विकसित नहीं थे इसलिये भारतीय जनमानस उससे अनभिज्ञ रहा है पर जैसे उनका विकास हुआ और फिर भारतीय शिक्षित वर्ग दोनों ही विचारधाराओं से जुड़ा वैसे वैसे वही वैचारिक विवाद भी यहां आ गया है।
अब भारत में वैचारिक जगत में यह संघर्ष इसलिये चलता दिख रहा है क्योंकि चाहे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी दोनों ही प्रकार के विचारक विदेशियों के इतिहास में अपने देश के संदर्भ ढूंढ रहे हैं। सामान्य लोगों में उनका प्रभाव इतना ही होता है कि वह चर्चाओं में उनके तथ्यों का उल्लेख करते हैं पर व्यवहार में सब जानते हैं कि स्वार्थों की वजह से सबसे संबंध रखना पड़ता है। इसलिये सामान्य जीवन में आमतौर से लोग धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा भाषाई भेदों से दूर ही रहते हैं।
       दरअसल इस लेखक को यह प्रेरणा अपने ही लेख से मिली। हुआ यूं कि हिंसा के अव्यवाहारि होने के संबंध में लिखे एक लेख को नार्वे की हिंसा के बाद कुछ लोगों को पढ़ते हुए देखा। यह लेख नीचे प्रस्तुत है और अब भी प्रासांगिक है। मायावी लोग हिंसा के लिये प्रेरित करते हैं पर उनका लक्ष्य वह नहीं होता जो बताते हैं। यह अलग बात है कि कमजोर दिमाग वाले लोग उनके प्रभाव में आ जाते हैं। मूलतः हिंसा कभी निर्णायक नहीं होती और जिन लोगों को लगता है कि यह सब बकवास है उनको भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। हम तो यह मानते हैं कि नार्वे की आतंकवादी घटना में भारतीय संदर्भ आये हैं पर इतना तय है कि इसका प्रेरक हमारा दर्शन नहीं है।
हिंसा में उद्भव है तो पराभव भी-हिन्दी लेख (gandhiji ki ahinsa niti-hindi article)
            जब किसी व्यक्ति के हाथ में हथियार होता है तो वह उसे चलाकर दिखाना चाहता है कि वह एक योद्धा है। उसका मन स्वाभाविक रूप से हिंसा के लिये प्रवृत्त होता है। जब लोग उससे डरते हैं तो उसे विजय की अनुभूति होती है पर दरअसल ऐसा करके वह अपने लिये संकट बुलाता है। जब उसे हिंसा के लिये तत्पर देखकर भीड़ में लोग चुप हैं तो उनमें उसे जैसे ही कुछ लोग भी जरूर होंगे जो यह हथियार जुटाकर उसे चुनौती देने का अपना सोच बनायें। ऐसा करके वह अपने विरोधी बना रहा होता है।
हिंसा चाहे हाथ से या वाणी से, तात्कालिक रूप से लाभदायक भले लगे कालांतर में अपने पतन का कारण भी होती है।
          इसे देश में बुद्धिजीवियों में हिटलर और गांधीजी को लेकर हमेशा बहस चलती है। अनेक लोग गांधी को अहिंसा नीति का यह कहते हुए विरोध करते हैं कि उससे समाज की रक्षा नहंी हो सकती पर जब देश में एक संविधान और सेना है तो समाज को हिंसा से रक्षित बनाने का ख्याल ही बेमानी है। दरअसल गांधी ने अहिंसा के रूप में कोई नया विचार व्यक्त नहीं किया था क्योंकि वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में सदियों से मौजूद है। उन्होंने आधुनिक सभ्यता- जिसमें देशों के गठन और उनके संविधानों के कारण समाजों वाद विवाद से पनपने वाली हिंसक संघर्षों की परंपरा कम हो रही थी-में अहिंसा की राजनीति करना सिखाया।
पहले हिटलर की बात करें। हिटलर का अंत क्या हुआ? उसने आत्महत्या की थी। उसने अपने देश के लिये अनेक युद्ध किये पर उससे अपने देश को क्या मिला? एक विभाजन! हिटलर मर गया उसके बाद भी जर्मनी खड़ा रहा और अब तो दोनों जर्मनी भी एक हो गये। उसी हिटलर को आज जर्मनी में नफरत से देखा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जो हिटलर की चाल चलेगा, वैसी ही मौत मरेगा।
वैसे तो गांधीजी के इस देश में भक्त बहुत हैं पर वह अहिंसा की उनकी नीति की व्याख्या कम ही लोग कर पाये हैं। वह उनकी नीतियों की बात तो करते हैं पर उसके परिणामों का सकारात्मक पक्ष नहीं रखते। गांधीजी ने अंग्रेजों को मानसिक रूप से इतना तंग किया होगा इसका अंदाजा उनके भक्त भी नहीं लगा सकते। एक तरफ पूरा विश्व गांधी जी को सराहता है और हिटलर के नाम से हर कोई नफरत करता है। सच तो यह है कि हिंसा या हिंसक आंदोलन करना हमेशा ही विरोधियों और शत्रुओं को जीत का आसानी से अवसर देना ही है। किसी वस्तु या बहिष्कार की अहिंसक कोशिश और हिंसक कोशिश में अंतर होता है।
            गांधी जी ने लोगों को विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने की अपील की। तब अनेक लोगों ने अपने ही घर से विदेशी वस्तुऐं निकालकर आग के हवाले की। इतिहास में ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता कि उस समय लोगों ने विदेशी वस्तुओं के विक्रय केंद्र जलाये या उनके इस्तेमाल करने वालों को पीटा। इस बात का भी उल्लेख नहीं मिलता कि कितने लोगों ने तब भी विदेशी वस्तुओं का उपयोग जारी रखा। मान लीजिये अगर उस समय गांधी समर्थकों ने हिंसा का सहारा लिया होता तो क्या होता? प्रचार माध्यम बता रहे होते कि किस तरह अभी भी ऐसे लोग हैं जो विदेशी वस्तुओं का उपयेाग कर रहे हैं? हो सकता है कि कुछ यह भी कहते कि ‘देखिये गांधी जी को जनता करारा जवाब’।
       उस महान विभूति को अपने ही देश में अप्रासंगिक बनाने के लिये अनेक विदेशी ताकतें सक्रिय हैं और उनका मुख्य उद्देश्य गांधीजी को विश्व मसीहा को तोड़ते रहना है। हमारे यहां के अनेक बुद्धिजीवी हिटलर की प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते। एक आत्महत्या करने वाला व्यक्ति उनका प्रेरक है, तब उनकी बुद्धि की स्तर समझा जा सकता है। हिटलर कभी विजेता न बन सका और गांधी जी के नाम की प्रसिद्धि इतनी है कि उसके सामने जीत हार का विचार ही नहीं आता। हिंसा में उद्भव है तो पराभव भी है। अहिंसा की राजनीति भी कोई ऐसे वैसे लोग नहीं कर सकते। जिनके पास बुद्धि, बल और धैर्य है उन्हीं के बूते ही इस पथ पर चलना।
हमारे यहां अनेक आंदोलन होते हैं जिनके व्यक्ति, फिल्म, वस्तु, समाज या भाषा के बहिष्कार का आह्वान होता है। उनकी सबसे बड़ी कमी यही होती है कि वह हिंसा से ओतप्रोत होकर जनसमर्थन से दूर हो जाते हैं। ऐसे आंदोलन करने वाले अपने बहिष्कार के साथ दूसरे पर दबाव डालने लगते हैं। तय बात है कि हिंसा होती है। इस कारण सैद्धांतिक रूप से सहमत होने वाले भी दूर हो जाते हैं और उससे विरोधियों को भी अवसर मिल जाता है। तब यह बात दब जाती है कि कितने लोगों ने बहिष्कार किया बल्कि कितने लोगों ने नहीं किया यह सिद्ध कर आंदोलन की हवा निकाल दी जाती है।
         सच तो यह है कि इस देश में जो हिंसक आंदोलन चल रहे हैं उनकी सफलता इसलिये संदिग्ध रही है क्योंकि वह हिंसक हो उठते हैं-दूसरे शब्दों में कहें तो येनकेन प्रकरेण उनकी विरोधी ही उनका लाभ उठाते हैं। भारत का जनमानस कभी हिंसा का साथ नहीं देता, यही कारण है कि इस देश पर विदेशी काबिज हो गये क्योंकि देश के शिखर पुरुष आपस में हिंसा करते थे और जनता का समर्थन कम हो गया होगा।
अंतिम बात यह कि हिंसा चाहे तलवार से हो वाणी से दोनों ही स्वयं के लिये खतरनाक है। किसी के लिये अभद्र और आक्रामक शब्द लिख कर हम यह सोचकर भले ही प्रसन्न हों कि हमने अपनी भड़ास निकाल ली पर अंततोगत्वा वह अपने लिये ही खतरनाक है। तब आपके अपने भी यह सोचकर डर जाते हैं कि कहीं ऐसे ही शब्दों का प्रयोग कहीं उनके विरुद्ध भी न करने लगें। हिटलर पराजित हुआ, उसने आत्म हत्या की क्योंकि वह हिंसा में लीन था जबकि गांधीजी ने अपना जीवन सहजता से व्यतीत किया क्योंकि उनको अपने प्रति कहीं भी हिंसा का भय नहीं था। नाथूराम गोडसे उनके शरीर को नष्ट कर सका पर उनके व्यक्तित्व को नहीं जो हमेशा ही सूरज की तरह चमकता रहने वाला था। भले ही कुछ लोग इस बात को न माने पर सच यह है कि उनकी अहिंसा की राजनीति आज के समाज के लिये उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस समय थी। गांधीजी को संत कहा जाता है पर इसका अर्थ कतई नहीं है कि उनमें राजनीतिक चतुराई का अभाव था, और उनके द्वारा चलाया गया अहिंसक आंदोलन इसी का ही प्रमाण है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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